Wednesday, 4 February 2026

पाप और उनके प्रायश्चित्तों का वर्णन

युधिष्ठिर ने पूछा_पितामह ! कृपा करके यह बताइएये कि किन कर्मों को करने से मनुष्य प्रायश्चित का भागी बनता है और ऐसी स्थिति में क्या करने से वह पापयुक्त होता है ? व्यासजी ने कहा_ जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्मों का आचरण न करके निषिद्ध कर्म कर बैठता है, उसे ऐसा विपरीत आचरण करने से प्रायश्चित्त कर भागी बनना पड़ता है। जो ब्रह्मचारी सूर्योदय या सूर्यास्त के समय होता रहे अथवा जिस पुरुष के वस्त्र या दांत काले हो, उन्हें प्रायश्चित करना चाहिये। इसके सिवा बड़े भाई के अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई, ब्राह्मण का वध करनेवाला, निन्दा, छोटी कन्या का विवाह हो जाने के बाद उसकी बड़ी बहिन से विवाह करनेवाला, बड़ी बहिन के अविवाहित रहते हुए उसकी छोटी बहिन से विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी,, द्विज की हत्या करनेवाला, सुपात्र को दान न देनेवाला, मांस बेचने वाला, आग लगानेवाला और स्त्री वध करनेवाला, दूसरों का घर जलानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरु का अपमान तथा सदाचार की मर्यादा का उल्लंघन करनेवाला_ये सभी पापी माने जाते हैं, इन्हें प्रायश्चित करना चाहिए। इनके सिवा, जो लोक और वेद से विरुद्ध दूसरे न करने योग्य कर्म हैं, उन्हें भी बताता हूं, तुम एकाग्रचित्त से सुनो। अपने धर्म को त्यागना, दूसरे के धर्म का आचरण करना, यज्ञ करने के अनाधिकारी से यज्ञ कराना, अभक्ष्य भक्षण करना, शरणागत को त्यागना, माता_पिता और भरण_पोषण के अधिकारी सेवक आदि का भरण_पोषण न करना, दूध_दही आदि रसों को बेचना, पशु_पक्षियों को मारना, ब्राह्मणों को दक्षिणा न देना और ब्राह्मणों का धन छीन लेना_धर्मतत्व को जाननेवालों ने ये सभी कर्मन करने योग्य बताये हैं।राजन् ! जो पुरुष पिता के साथ झगड़ा करता है, गुरु स्त्री के साथ समागम करता है और ऋतुकाल होने पर अपनी स्त्री के साथ सहवास नहीं करता, वह धर्म का त्याग करनेवाला है। राजन् ! जो पुरुष पिता के साथ झगड़ा करता है, गुरु स्त्री के साथ समागम करता है और ऋतुकाल होने पर अपनी स्त्री के साथ सहवास नहीं करता, वह धर्म का त्याग करनेवाला है। इस प्रकार संक्षेप में विस्तार से ऊपर जो कर्म कहे गये हैं, इनमें से किन्हीं को करने पर और किन्हीं को न करने पर मनुष्य प्रायश्चित का भागी होता है। अब जिन_जिन कारणों से इन कर्मोंको करने पर भी मनुष्य को पाप नहीं लगता वह सुनो। यदि युद्धस्थल में कोई वेद_वेदान्तों का पारगामी ब्राह्मण भी हाथ में हथियार लेकर मारने के लिये आवे तो उसका वध करने से ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता।राजन् ! इस विषय में वेद का मंत्र भी है। मैं तुमसे वही बात कह रहा हूं जो वेद_वाक्य के अनुसार धर्म यानी गयी है। यदि कोई पुरुष अपने धर्म में डिगे हुए आततायी ब्राह्मण को मार डाले तो इससे भी वह ब्रह्महत्यारा नहीं होता। अनजान में अथवा प्राण संकट के समय भी यदि मदिरा पान कर लें तो बाद में धर्मात्माओं की आज्ञा के अनुसार उसका पुनः संस्कार होना चाहिये। इसी प्रकार अन्य सब अभक्ष्य लक्षणों के विषय में भी समझना चाहिये। यदि कभी ऐसी कोई भूल हो जाय तो प्रायश्चित से ही उसकी शुद्धि होती है।
चोरी सर्वथा निषिद्ध ही है, किन्तु आपत्ति के समय यदि गुरु के लिये चोरी की जाय तो उसमें दोष नहीं है। यदि चोरी करने में किसी प्रकार की कामना न हो, उससे प्राप्त हुई वस्तु को स्वयं न भोगा जाय तथा आपत्काल में ब्राह्मण के सिवा किसी अन्य का धन ले लिया जाय तो भी चोरी का पाप नहीं लगता। अपने या किसी दूसरे के प्राणों की रक्षा के लिये, गुरु के लिये, एकान्त में स्त्री के साथ अथवा विवाह के प्रसंग में झूठ बोलने से भी पाप नहीं होता। यदि किसी कारण से स्वप्न में वीर्य स्खलित हो जाय तो इससे ब्रह्मचारी का व्रत भंग नहीं होता, किन्तु इसके लिये उसे प्रज्जवलित अग्नि में घृत की आहुतियां छोड़कर प्रायश्चित करना चाहिये। यदि बड़ा भाई पतित हो जाय या संन्यास ले ले तो छोटे भाई को विवाह करने में दोष नहीं है।  अज्ञानवश किसी आपात्र ब्राह्मण को दान देने से तथा योग्य ब्राह्मण का सत्कार न करने से भी कोई दोष नहीं है। व्यभिचारिणी स्त्री का तिरस्कार करने में भी कोई दोष नहीं है। ऐसा करने से तो उसकी शुद्धि ही होती है और उसका भरण_पोषण करनेवाले को कोई दोष भी नहीं लगता। जो सेवक कामकाज करने में असमर्थ हैं, उसे त्यागने में दोष नहीं है तथा गऔओं के लिये वन में आग लगाने में भी दोष नहीं माना जाता। राजन् ! ये सब तो मैंने वे कर्म बताये जिन्हें करने से कोई दोष नहीं होता। अब मैं विस्तारपूर्वक प्रायश्चित्तों का वर्णन करता हूं। राजन् ! कृच्छ्र_चान्द्रायणादि तप, अग्निहोत्र आदि कर्म और दान के द्वारा मनुष्य तभी अपने पाप से छूट सकता है, जब वह फिर पाप में प्रवृत न हो। यदि किसी ने ब्रह्महत्या की हो तो वह भिक्षा मांगकर एक समय भोजन करें, अपना सब काम स्वयं ही करें, हाथ में खप्पर और आंग्लांग ( खाट का पाया रखें, नित्य ब्रह्मचर्य व्रत रखें, भिक्षा मांगने के समय सर्वदा खड़ा रहे, किसी से ईर्ष्या न करें, पृथ्वी पर शयन करें और लोक में अपने कर्म को प्रकट करें। इस प्रकार बारह वर्ष तक करने से उसकी शुद्धि हो जाती है। अथवा अपनी इच्छा से किसी शस्त्रधारी विद्वान का निशाना बन जाय या जलती हुई आग में गिरे अथवा नीचे सिर किये किसी भी वेद का पाठ करते हुए तीन बार सौ_सो योजन की यात्रा करें या किसी वेदज्ञ ब्राह्मण को अपना सर्वस्व समर्पण कर दे, अथवा जिनसे जीवन भर निर्वाह हो सके इतना धन या सब सामान से भरा हुआ घर ब्राह्मण को दान करे । इस प्रकार गौ और ब्राह्मणों की रक्षा करनेवाले पुरुषों की ब्रह्महत्या से मुक्ति हो सकती है। यदि कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार भोजन करने से तीन वर्षों में एक_एक मांस में भोजनक्रम का परिवर्तन करते हुए अत्यन्त तीव्र कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार अन्न ग्रहण करें तो एक वर्ष में ब्रह्महत्या से छुटकारा हो सकता है।' तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना मांगे जो मिल जाय वह का लेना तथा तीन दिन उपवास करना_इस प्रकार बारह दिन का कृ्च्छ्रव्रत होता है। इसी क्रम से छः वर्ष तक रहने से ब्रह्महत्या छूट सकती है। यही क्रम यदि तीन_तीन दिन में परिवर्तित न होकर एक एक सप्ताह में और विषम मासों में आठ_आठ दिन बदलते हुए एक एक मास के कृ्च्छ्रव्रत के नुसार चले तो तीन वर्षों में शुद्धि हो जायगी और यदि एक मास अयाचित भोजन तथा एक मास उपवास _इस प्रकार चार_चार मांस के कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार चले तो एक ही वर्ष में ब्रह्महत्या का पाप छूट जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार यदि उपवास ही किया जाय तो और भी जल्दी शुद्धि हो सकती है। इसके सिवा अश्वमेध यज्ञ से भी नि:संदेह यह पाप छूट सकता है। श्रुति का कथन है कि जो इस प्रकार के लोग अवभृथ (यज्ञान्त ) स्नान करते हैं वे सभी सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं। जो पुरुष ब्राह्मण के लिये युद्ध में प्राण दे देता है, वह भी ब्रह्महत्या से छूट जाता है। ब्रह्महत्यारा होने पर भी जो सुपात्र ब्राह्मणों को एक लाख गौएं दान देता है उसके तो सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य दूध देनेवाली पच्चीस हजार कपिला गौएं सुपात्रों को दान करता है, वह भी सब पापों से छूट जाता है। मरने के समय दरिद्र और सत्पुरुषों को बछड़े वाले एक हजार दुधारू गौएं देने से भी मनुष्य इस पाप से मुक्त हो सकता है।जो राजा सुपात्र ब्राह्मणों को कम्बोज देश में उत्पन्न हुए सौ घोड़े दान करता है, वह भी ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाता है। जो व्यक्ति किसी एक पुरुष को उसका मनोरथ पूर्ण होने योग्य दान देता है और फिर किसी के आगे उसकी जिक्र नहीं करता वह भी पापयुक्त हो जाता है। जलहीन देश में पर्वत से गिरकर और अग्नि में प्रवेश करके अथवा महआप्रस्थआन की विधि से हिमालय में गलकर प्राण दे देने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। यदि किसी ब्राह्मण ने मद्यपान किया है तो वृहस्पतिवार भाग करने से उसकी शुद्धि हो जाती है। एकबार मद्य पीने पर जो निष्कपट भाव से भूमिदान करता है और फिर कभी शराब नहीं छूता वह भी शुद्ध हो जाता है। जो पुरुष गुरुपत्नी के साथ समागम करता है वह या तो जलती हुई लोहे की शिला पर पड़ जाय या अपनी मूत्रएन्द्रइय को काटकर ऊपर की ओर देखता हुआ दूर तक चला जाय।इसके सिवा, अपना शरीर त्याग देने से भी वह इस पाप से मुक्त छूट सकता है। अथवा जो महाव्रत का ( एक महीने तक जल भी न पीने के नियम का ) पालन करता है, ब्राह्मणों को अपना सर्वस्व दे देता है या गुरु के लिये युद्ध में प्राण होम देता है वह भी इस पाप से मुक्त हो जाता है।
झूठ बोलकर आजीविका चलानेवाला अथवा गुरु का अपमान करनेवाला पुरुष गुरुजी को मनचाही वस्तु देकर प्रसन्न कर लेने से उसे पाप से छूट जाता है। जिसका ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित हो गया हो, उसे ब्रह्महत्या के लिये बताया हुआ प्रायश्चित करना चाहिए। अथवा छः महीने तक शरीर पर गौ का चमड़ा ओढ़ने से वह उस पाप से छूट सकता है। यदि कोई मनुष्य किसी का धन चुरा ले तो किसी_न_किसी उपाय से उसे उतना ही धन लौटा लेने से वह उस पाप से मुक्त हो सकता है। बड़े भाई के अविवाहित रहते विवाह करनेवाला छोटा भाई और उसका बड़ा भाई दोनों संयमपूर्वक बारह दिन का कृ्च्छ्रव्रत करने से पवित्र हो जाते हैं। इसके सिवा, यदि वह छोटा भाई बड़े भाई के कर लेने पर अपनी विवाहिता स्त्री के साथ फिर फिर विवाह संस्कार करा लें तो क्त दोष निवृत हो जाता है और ऐसा करने से स्त्री को भी कोई दोष नहीं होता। यदि अपनी स्त्री के प्रति किसी पाप आचरण की शंका हो तो पुन: रजस्वला हो स्नान करने तक उसका समागम न करें। भस्म से जैसे बर्तन साफ हो जाते हैं, उसी प्रकार रजशुद्धि से स्त्री शुद्ध हो जाती है।पशु_पक्षियों के वध करनेवाला तथा तरह_तरह के बहुत _से पेड़ों को काटनेवाला पुरुष तीन दिन तक वायु भक्षण करें और लोगों के सामने अपना कुकर्म प्रकट कर दे। इससे वह शुद्ध हो जाता है।
जो पुरुष किसी प्रकार की हिंसा नहीं करता, राग_द्वेष एवं मान-अपमान से शून्य है, विशेष भाषण नहीं करता और मिताहार करते हुए पवित्र और एकान्त देश में रहकर गायत्री का जप करता है, वह सब पापों से मुक्त है जाता है। अन्य सब प्रकार के पापों की मुक्ति के लिये भी, ब्राह्मणों ने धर्माधर्म के निर्णय में प्रमाणभूत शास्त्रों के कथन से यही विधि निश्चित की है। जो मनुष्य दिन में आकाश की ओर दृष्टि रखता है, रात्रि में खुले मैदान में सोता है, तीन बार दिन में और तीन बार रात्रि में वस्त्रों सहित जल में घुसकर स्नान करता है और इस व्रत का पालन करते समय स्त्री, शूद्र और पतित से बात नहीं करता वह अज्ञानवश किये हुए सब पापों से मुक्त हो जाता है। मनुष्य को अपने किये हुए शुभ या अशुभ कर्म का फल मरने के बाद भोगना पड़ता है। इसमें जिसकी अधिकता होती है, उसी का फल उसे मिलता है। इसलिये दान, तप और शुभ कर्मों के द्वारा पुण्य की ही वृद्धि करनी चाहिये, जिससे वह पाप को दबाकर स्वयं बढ़ सके। सर्वदा शुभ कर्मों का आचरण करें, पापकर्म से दूर रहें और सुपात्र को धन दान करें ऐसा करने से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
राजन् ! इसी प्रकार विवेकी पुरुष के लिये लक्ष्य और अभक्ष्य, वाच्य और अवाच्य तथा जानबूझकर और बिना जाने हुए पापों के भी प्रायश्चित बताये गये हैं। जो पाप जानबूझकर किया जाता है वह बड़ा होता है और अनजापंन में शिक्षा हुआ पाप छोटा माना जाता है। ऊपर कहीं हुई विधि से पाप निवृति हो सकती है। जो आस्तिक और श्रद्धालु है उसी के लिये यह विधि कहीं गयी है। नास्तिक, अश्रद्धा दु और दम्भ एवं द्वेषप्रधान पुरुषों के लिये इसका कोई उपयोग नहीं है। जो पुरुष मरकर सुख भोगना चाहता है, उसे श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण एवं धर्म का सेवन करना चाहिये। राजन् ! तुमने अपने प्राणों की रक्षा के लिये अथवा स्वधर।म के पालन के लिये ही इनका वध किया है; इसलिये तुम तो इतने ही कारण से इस पाप से सर्वथा मुक्त हो जाओगे। फिर भी यदि तुम्हें कुछ पश्चाताप है तो प्रायश्चित करो। इस प्रकार अनार्य पुरुषों की तरह रोष में भरकर अपना नाश मत करो।

Thursday, 18 December 2025

श्रीव्यासजी का राजा युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देना

श्री वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! नारदजी की बात सुनकर राजा युधिष्ठिर चुप हो गये। उस समय उन्हें शोकग्रस्त देखकर सब प्रकार के धर्म का रहस्य जाननेवाले महर्षि व्यास ने कहा, 'युधिष्ठिर ! राजाओं का धर्म प्रथाओं का पालन करना ही है। इसलिये तुम अपना पैतृक सिंहासन स्वीकार करो। वेदों ने तप को तो ब्राह्मणों का ही नित्य धर्म बताया है। क्षत्रिय तो सब प्रकार के धर।म की रक्षा करनेवाला ही है। जो मनुष्य विषयासक्त होकर धर्मविधि का उल्लंघन करता है, वह लोकमर्यादा का विघातक है, क्षत्रिय को बाहुबल से उसका दमन करना चाहिये। जो व्यक्ति मओहवश शास्त्र प्रमाण को न माने वह अपना सेवक हो, पुत्र हो, तपस्वी हैं अथवा कोई भी क्यों‌न हो , उस पापी का सब प्रकार से दमन करें और उसे नष्ट कर दे। जो राजा नष्ट होते हुए धर्म की रक्षा नहीं करता, वह धर्म का घात करनेवाला है। तुमने तो अनुयायियों सहित उन धर्म_घातियों का ही नाश किया है, इसलिये तुम तो अपने धर्म में ही स्थित हो ? राजा का तो यही धर्म है कि दुष्टों का वध करें, सुपात्रों को दान दें और प्रजा की रक्षा करें।' राजा युधिष्ठिर ने कहा_'तपोधन ! आप सभी धर्मो में शिरोमणि हैं। आपके लिये धर्म सर्वदा प्रत्यक्ष है। आपके वचनों में मुझे तनिक भी संदेह नहीं है; किन्तु भगवन्! इस राज्य के लिये मैंने अनेकों अवध्य पुरुषों का वध करा डाला है, मेरे लिये वे ही कर्म मुझे जला रहे हैं। व्यासजी बोले_राजन् ! उद्धत पुरुषों को दण्ड देना तो राजा का कर्तव्य ही है। इसी नियम के अनुसार तुमने कौरवों को मारा है। इसलिये अब तुम मन को शोकग्रस्त न करो। सदोष मालूम होने पर भी अपने धर्म का पालन करते हुए तुम्हें इस प्रकार की आत्मग्लानि तुम्हें शोभा नहीं देती। शास्त्रों में जो पाप कर्मों के प्रायश्चित बताये गये हैं, उन्हें भी शरीरधारी ही कर सकता है, शरीर छोड़ जाने पर तो वे भी नहीं किये जा सकते। अत: राजन् ! यदि तुम जीवित रहोगे तो अपने पाप का प्रायश्चित कर सकोगे। प्रायश्चित किये बिना ही यदि शरीर छूट गया तो तुम्हारे हाथ केवल पश्चाताप ही लगेगा। युधिष्ठिर ने कहा_दादाजी ! मैंने राज्य के लोभ से अपने पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ससुर, गुरु, पापा, दादा, अनेकों वीर, क्षत्रिय, सम्बन्धी, सुहृदं, समवयस्क, भांजे, जाति भाई और भिन्न-भिन्न देशों से आये हुए राजाओं का वध करा डाला है। उसका मुझे क्या दण्ड मिलेगा ? इस चिंता से मैं बार_बार जलता रहता हूं। जब मैं पृथ्वी को उन श्रीसम्पन्न नृपश्रेष्ठों से सूनी देखता हूं और इस भयानक जातिवाद तथा इसमें मारे गये सैकड़ों शत्रुपक्ष के वीरों और करोड़ों दूसरे लोगों को याद करता हूं तो मुझे बड़ा ही पश्चाताप होता है। आह ! आज तो अफवाएं अपने पुत्र, पति और भाइयों से शून्य हो गयी हैं, उनकी क्या दशा होगी ? वे उनका नाश करनेवाले हम पाण्डव और यादवों को कोस रही होगी और अत्यन्त दिन होकर पृथ्वी पर पछाड़ें का रही होगी। विप्रवर ! उन स्त्रियों का अपने मृत संबंधियों के प्रति जैसा प्रेम है उससे मुझे तो यही निश्चय होता है कि वे सब नि:संदेह प्राण त्याग देंगी। धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है, अतः: इस प्रकार हमें स्त्रीवाद का ही पाप लगेगा। अपने सुहृदों को मारकर हमने बड़ा भारी पाप किया है; इसलिये अब हमें सिर नीचा किये नरक में ही गिरना पड़ेगा। अतः: अब हम भीषण तपस्या करके अपने शरीर को त्याग देंगे। आपकी दृष्टि में तपस्या के योग्य कोई उत्तम तपोवन हो तो बताने की कृपा करें। व्यासजी ने कहा_राजन् ! तुम क्षत्रियों में अग्रगण्य हो। तुमने अपने धर्म के अनुसार ही इन क्षत्रियों को मारा है, इसलिये तुम शोक न करो। सदोष मालूम होने पर भी अपने धर्म का पालन करते हुए तुम्हें इस प्रकार की आत्मग्लानि शोभा नहीं देती। शास्त्रों में जो पापकर्म के प्रायश्चित बताये गये हैं, उन्हें भी शरीरधारी ही कर सकता है, शरीर छोड़ देने पर तो वे भी नहीं किये जा सकते। अतः राजन् ! यदि तुम जीवित रहोगे तो अपने पाप का प्रायश्चित कर सकोगे। प्रायश्चित्त किये बिना ही यदि शरीर छूट गया तो तुम्हारे हात पश्चाताप ही लगेगा। युधिष्ठिर ने कहा_दादाजी ! मैंने राज्य के लोभ में अपने पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ससुर, गुरु, मामा, दादा, अनेकों वीर, क्षत्रिय, सम्बन्धी, सुहृदं, समवयस्क, भानजे,जाति भाई और भिन्न_भिन्न देशों से आये हुए राजाओं का वध करा डाला है। उसका मुझे क्या दण्ड मिलेगा ? इस चिंता से मैं रात_दिन बार_बार जलता रहता हूं। जब मैं पृथ्वी को उन श्रीसम्पन्न नृपश्रेष्ठों से सूनी देखता हूं और इस भयानक जातिवाद तथा इसमें मारे गये सैकड़ों शत्रुपक्ष के वीरों और करोड़ों दूसरे लोगो को याद करता हूं तो मुझे बड़ा ही पश्चाताप होता है। आह ! आज जो अबलाएं अपने पुत्र पति और भाइयों से शून्य हो गयी हैं, उनकी क्या दशा होगी ? वे उनका नाश करनेवाले, हम पाण्डवों और और यादवों को कोस रही होंगी और अत्यंत दीन होकर पृथ्वी पर पछाड़ें का रही होंगी।विप्रवर ! उन स्त्रियों का अपने मृत संबंधियों के प्रति जैसा प्रेम है, उससे मुझे तो यही निश्चय होता है कि सब नि:संदेह प्राण त्याग देंगी। धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है, अतः इस प्रकार हमें स्त्रीवाद का ही पाप लगेगा। अपने सुहृदों को मारकर हमने बड़ा भारी पाप किया है; इसलिये अब हमें सिर नीचा किये हैंनरक में ही गिरना पड़ेगा। अतः अब हम भीषण तपस्या करके अपने शरीर को त्याग देंगे। आपकी दृष्टि में तपस्या के योग्य कोई उत्तम तपोवन हो तो बताने की कृपा करें।
व्यासजी ने कहा_राजन् ! तुम क्षत्रियों में अग्रगण्य हो। तुमने अपने धर्म के अनुसार ही इन क्षत्रियों को मारा है, इसलिये तुम शोक न करो। वे सब तो अपने अपराध से ही मारे गये हैं। तुम, भीम, अर्जुन या नकुल_सहदेव उन्हें मारनेवाले नहीं हो। इनका संहार तो काल ने किया है। उसका तो न कोई न कोई माता है, न पिता, वह किसी पर दया भी नहीं करता, वह तो प्रजा के कर्मों का साक्षीमात्र है। तुम्हारा युद्ध तो उसके लिये केवल निमित्तमात्र था। वह इसी प्रकार एक प्राणी से दूसरे की हत्या कराता रहता है। इस संसार कर्म के लिये वह एक भगवान् का ही स्वरूप है। इसके सिवा तुम्हें कौरवों के विनाशकारी कर्मों पर ध्यान देना चाहिये, जिनके कारण उन्हें काल के गाल में जाना पड़ा है। जिस प्रकार लोहार का बनाया हुआ यंत्र अपना काम करने में उसके अधीन रहता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् कालाधीन कर्म की प्रेरणा से प्रवृत हो रहा है। फिर भी तुम्हारे चित्त में जो इन सब को मरवाने से व्यर्थ संताप हो रहा है, उसके दोष से छूटने के लिये तुम प्रायश्चित कर लो। राजन् ! यह बात सुनी हो जाती है कि पूर्वकाल में राज्यलक्ष्मी के लिये ही देवता और असुरों में बारह हजार वर्षों तक युद्ध हुआ था। उसमें देवताओं ने दैत्यों का संहार करके स्वर्ग और पृथ्वी का आधिपत्य प्राप्त किया था। जो लोग धर्म का नाश करना चाहते हैं और अधर्म को फैलानेवाले हैं, उन्हें मार ही डालना चाहिये। इसी से देवताओं ने उस युद्ध में अट्ठासी हजार शालावृक नामक दैत्यों को भी मार डाला था। यदि एक पुरूष को मारकर कुटुंब के शेष व्यक्तियों को सुख मिले अथवा एक कुटुंब का सफाया करने से देश में शान्ति स्थापित हो तो उसे नष्ट करने में कोई दोष नहीं है। राजन् ! किसी समय अधर्म दिखाई देनेवाला कर्म ही धर्म है जाता है और धर्म दिखाई देनेवाला अधर्म बन जाता है। इस प्रकार बुद्धिमान पुरुष को धर्म और अधर्म का रहस्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिये। धर्मराज ! तुमने शास्त्र श्रवण किया है, इसलिये धर्माधर्म के विषय में अपनी बुद्धि स्थिर रखो। देखो ! पूर्वकाल में जो देवताओं का धर्म मार्ग था, उसी का तुमने भी अनुसरण किया है। तुम जैसे धर्मप्राण पुरुष कभी नरक का द्वार नहीं देखते। इसलिये तुम अपने भाइयों को और सुहृद_संबंधियों को धैर्य दो। जो पुरुष हृदय में पाप की भावना रखकर किसी कुकर्म में प्रवृत होता है और उसे करके भी किसी प्रकार लज्जित नहीं होता, उसी को पाप का भागी होना पड़ता है_ऐसा शास्त्र का कथन है। ऐसे पाप का न कोई प्रायश्चित है और न कभी नाश ही होता है। तुम्हारा हृदय तो शुद्ध करना पड़ा और अब इस कर्म को करके भी पश्चाताप कर रहे हो। इसके लिये अश्वमेध यज्ञ बड़ा अच्छा प्रायश्चित है। उसका अनुष्ठान करो तुम निष्पाप हो जाओगे।

इन्द्र ने भी मरुतों की सहायता से अपने शत्रुओं को परास्त करके एक के बाद एक_इस प्रकार सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे। इसी से वे 'शतक्रतु'  नाम से प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार स्वर्ग पर आधिपत्य प्राप्त करके उन्होंने पापों से छुटकारा पाया था। स्वर्ग में देवता और ऋषि भी उसकी उपासना करते हैं। तुमने भी इस वसुन्धरा को अपने पराक्रम से प्राप्त किया है और अपने बाहुबल से तुमने राजाओं को परास्त किया है। अब तुम मित्रों के साथ उनके देश और राजधानियों में जाकर उनके भाई, पुत्र और पौत्रों को अपने _अपने राज्य पर अभिषिक्त करो।भरतश्रेष्ठ ! इस तरह सारे राज्य में शान्ति स्थापित कर तुम असुरविजयी इन्द्र के समान अश्वमेध यज्ञ द्वारा भगवान् का यजन करो। राजन् ! इस युद्ध में जो क्षत्रिय मारे गये हैं, उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। वे तो काल की शक्ति से मोहित होकर अपने कुकर्मों के कारण मौत के मुख में पड़े हैं। उन्हें क्षात्रधर्म के पालन का पूरा फल प्राप्त हुआ है तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य मिला है। इसका पालन करते हुए तुम धर्म की रक्षा करो। मरने पर कल्याण करनेवाली यही चीज है।




Wednesday, 19 November 2025

श्रीकृष्ण का नारदजी द्वारा सृंजय के प्रति कहे हुए अनेकों राजाओं के दृष्टांत सुनाकर राजाओं के दृष्टांत सुनाकर राजा युधिष्ठिर को समझाना

वैशम्पायनजी बोले_राजन् ! व्यासजी का यह उपदेश सुनकर राजा युधिष्ठिर ने कुछ भी नहीं कहा। उन्हें चुप देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा, 'माधव ! धर्मराज युधिष्ठिर बन्धुओं के शोक से अत्यंत पीड़ित हैं; ये शोकसागर में डूबे जा रहे हैं। आप उन्हें ढ़ाढ़स बंधाइये।'अर्जुन के इस प्रकार कहने पर कमलनयन श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिर के पास जाकर बैठ गये। धर्मराज श्रीकृष्ण की बात टाल नहीं सकते थे; क्योंकि बचपन से ही श्रीकृष्ण के प्रति उनकी अर्जुन से भी बढ़कर प्रीति थी। तब श्री श्यामसुंदर ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें अपने वचनों से प्रसन्न करते हुए कहा_'राजन् ! अब आप शोक न करें। यह आपके शरीर को सुखायें देता है। जो लोग इस रणांगण में मारे गये हैं, उनका मिलना तो अब संभव है नहीं। जिस प्रकार जगने पर स्वप्न में प्राप्त होनेवाले सब लाभ व्यर्थ हो जाते हैं, उसी प्रकार इस महायुद्ध में जो क्षत्रिय मारे गये उन्हें तो तुम गए हुए ही समझो। उन सभी ने बड़े_बड़े वीरों के साथ लोहा लेकर अपने प्राण त्यागे हैं। शस्त्रों से मारे जाने के कारण वे सब स्वर्ग को ही गये हैं।  आप उनके लिये शोक न करें। वे सभी बड़े शूरवीर, क्षात्रधर्म में तत्पर रहनेवाले और वेद_वेदांगों के पारदर्शी थे। उन्होंने वीरों के योग्य उत्तम गति पायी है; इसलिये आप किसी प्रकार की चिंता न करें। इस विषय में मैं आपको एक प्राचीन प्रसंग सुनाता हूं। एक बार राजा सृंजय पुत्रशोक में डूबे हुए थे। उस समय उनसे श्री नारदजी ने कहा_'सृंजय !
 सुख_दु:ख से तो मैं, तुम और सारी प्रजा में से कोई भी छूटा हुआ नहीं है, इसलिये इसके लिये क्या शोक किया जाय। तुम अपने शोक को शान्त करो और मैं जो कहता हूं उसपर ध्यान दो।यह प्राचीन राजाओं का बड़ा मनोहर प्रसंग है। इसे सुनने से क्रूर ग्रहों का शमन होता है और आयु की वृद्धि होती है। राजन् ! हमलोग सुनते ही हैं कि राजा सुहोत्र मर गया।वह बड़ा ही अतिथि सेवी था। इन्द्र ने एक साल तक उसके राज्य में सुवर्ण की वर्षा की थी। उसके राज्यकाल में पृथ्वी का वसुमति नाम चरितार्थ हो गया था। नदियों में भी उस समय सुवर्ण ही बहता था। इन्द्र ने उनके कछुए, केकड़े, नाके, मगर और शिशुंकों को भी सोने का कर दिया था। राजा सुहोत्र ने उन सारे सुवर्ण को कउरउजआंगल देश में इकट्ठा कराया और एक भारी यज्ञ का आयोजन करके उसे ब्राह्मणों को दे दिया। सृंजय ! वह अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों में ही श्रेष्ठ था और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यवान था। किन्तु अन्त में वह मर भी गया; इसलिये तुम्हें अपने पुत्र का शोक नहीं करना चाहिये। 'सृंजय ! उशीनगर के पुत्र शिविर के मरने की बात भी हमने सुनी ही है। प्रजापति ब्रह्माजी भी राज्य का भार संभालने में उसके समान किसी दूसरे भूत या भावी राजा को नहीं समझते थे। तुम्हारे पुत्र तो न दक्षिणा देनेवाला और न यज्ञ करनेवाला। तुम्हारी तथा तुम्हारे पुत्र की अपेक्षा तो वह अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों बातों में बढ़ _चढ़कर था। किन्तु वह भी मर ही गया; इसलिये तुम अपने पुत्र के लिये शोक न करो। 'दुष्यन्त के पुत्र भरत ने हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ किये थे। वह भी तुमसे और तुम्हारे पुत्र से अर्थात् चारों बातों में बढ़ा_चढ़ा था। किन्तु वह भी काल के गाल में चला ही गया; इसलिये तुम अपने लड़कें के लिये शोक मत करो। 'सृंजय ! सुना जाता है कि दशरथनन्दन राम प्रजा को अपनी संतान के समान पालते थे। उनके राज्य में कोई भी स्त्री विधवा या अनाथा नहीं थी, मेघ समय पर वर्षा करते थे, समय पर अन्न पकता था और सर्वदा सुकाल रहता था। उस समय कोई जीव पानी में डूबकर नहीं मरता था, किसी को आग से कष्ट नहीं पहुंचता था और लोगों का भी कोई भय नहीं था। स्त्री और पुरुषों की सहस्त्रों वर्ष की आयु होती थी, विवाद तो स्त्रियों में भी नहीं होता था, पुरुषों की तो बात ही क्या ? प्रजा सर्वदा धर्म में तत्पर रहती थी और सब लोग संतुष्ट, पूर्णकाम, निर्भय, स्वेच्छाचार आचरण करनेवाले एवं सत्यवादी थे। जबतक उन्होंने राज्य किया, वृक्ष सर्वदा फल_फूलों से लदे रहे और गौएं दोहनी भरकर दूध देती रहीं। उन्होंने बड़ी_बड़ी दक्षिणाओंवाले दस अश्वमेध यज्ञ किये थे, जिनमें आने_जाने के लिये किसी को भी रोक_टोक नहीं थी। महाबाहु राम नित्यनवयौवनशाली, श्यामवर्ण, अरुणनयन, अजानुबाहु सुन्दर मुख वाले और सिंह के समान कंधों वाले थे। इसने राजा अंगार, मरीज, गय, अंग और ब्रहद्रथ को भी परास्त कर दिया था। सूर्यके उदय स्थान से लेकर अस्त होने के स्थान तक सारा देश राजा मान्धाता के अधिकार में ही था। हम सुनते हैं, राजा भगीरथ भी नहीं रहा। उसने यज्ञानुष्ठान करते समय सुवर्ण से लदी हुई दस लाख कन्याएं दक्षिणा में दान कर दी थी। उनमें में से प्रत्येक कन्याएं रथ में बैठी हुई थी, प्रत्येक रथ में चार_चार घोड़े थे और उसके पीछे सुवर्ण तथा कमल की मालाओं से विभूषित सौ_सौ हाथी थे, एक_एक घोड़े के पीछे हजार_हजार गौएं और प्रत्येक गौ के साथ एक_एक हजार भेड़ और बेकरियां थीं। तीनों लोकों में प्रवाहित होनेवाली गंगाजी उनकी पुत्री होकर प्रकट हुई थीं। इसी से वे भागीरथी कहलायीं। किन्तु देखो, वे भी मर ही गये। इसलिये अपने पुत्र के लिये तुम शोक मत करो। 'सृंजय ! सुना जाता है कि,  राजा दिलीप भी जीवित नहीं रहे। उसके महान् कर्मों का तो ब्राह्मण लोग अबतक बखान करते हैं। उन्होंने जब यज्ञानुष्ठान किया था तो इन्द्र आदि देवताओं ने प्रत्यक्ष होकर उसमें भाग लिया था। उनके यज्ञपात्र और यूप भी सोने के थे तथा उनके यज्ञोत्सव छ: हजार देवता और गंधर्वों ने सातों स्वरों के अनुसार नृत्य किया था। जिन लोगों ने उन सत्यवादी महात्मा दिलीप का दर्शन किया था वे भी स्वर्ग के अधिकारी हो गये थे। उनके ताजमहलों में वएदधवनइ, धनुष की प्रत्यंचा की टंकार और याचकों का कोलाहल_ये तीन शब्द कभी बन्द नहीं होते थे। किन्तु मृत्यु ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र के लिये शोक मत करो। 'युवनाश्व के पुत्र राजा मान्धाता भी मर ही गये। उनके पिता ने भूल से यज्ञ का अभिमन्त्रित जल पी लिया था। इसी से उन्होंने पिता के उदर से ही जन्म लिया। वे बड़े ही वैभवशाली और त्रिलोक विजयी थे। उनका रूप साक्षात् देवताओं के समान था। उन्हें राजा युवनाश्व की गोद में लेटा देखकर देवताओं में आपस में चर्चा होने लगी कि यह बालक किसका स्तनपान करेगा ? तब इन्द्र ने कहा 'मां धाता' ( मेरा दूध पायेगा )। ऐसा कहकर उन्होंने उसका नाम मान्धाता रख दिया। इसी समय इन्द्र के साथ से दूध की धारा निकलने लगी और उन्होंने उसे उस बालक के मुंह में छोड़ा। उसे पीने से वह एक ही दिन में सौ पर बढ़ गया और बारह दिन में ही बारह वर्ष का_सा जान पड़ने लगा। यह बालक बड़ा ही धर्मात्मा, शूरवीर और युद्ध में इन्द्र के समान पराक्रमी हुआ । इसने राजा अंगार, मरीज, गया, अंग और ब्रहद्रथ को भी परास्त कर दिया था। सूर्य के उदय स्थान से लेकर अस्त होने के स्थान से लेकर अस्त होने के स्थान से लेकर सारा देश राजा मान्धाता के अधिकार में ही था। उन्होंने सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ किये थे तथा दस योजना लम्बे और एक योजन ऊंचे सोने के मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को दान दिये थे। किन्तु आज उन परम तथापि मान्धाता का भी कहीं नाम निशान नहीं है। फिर तुम अपने पुत्र के लिये क्यों शोक करते हो ?'सृंजय ! नाभाग के पुत्र राजा अम्बरीष अब नहीं रहे हैं_यह बात भी सुनी ही जाती है। उन्होंने बड़ा भारी यज्ञ करके ब्राह्मणों का ऐसा सत्कार किया था कि वे उनकी सराहना करते हुए यही कहते थे कि 'ऐसा यज्ञ न तो पहले किसी ने किया है और न भविष्य मेही कोई करेगा ।' उस यज्ञ में जिन लाखों राजाओं ने सेवा कार्य किया था, वे सभी अश्वमेध यज्ञ का फल भोगने के लिये उत्तरायण मार्ग से हिरण्यगर्भलोक में गये थे; किन्तु कराल काल ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र का शोक त्याग दो।
'सृंजय ! अमूर्त्तरया के पुत्र गया गया की मृत्यु के विषय में भी हम सुनते ही हैं। एक बार यज्ञ में अग्निदेव उससे प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा। तब गय ने कहा कि 'अग्निदेव ! आपकी कृपा से मेरे पास अक्षय धन है, धर्म में श्रद्धा रहे और सत्य में मन का अनुराग हो।' इस प्रकार अग्निदेव की कृपा से उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो गये। उन्होंने हजार वर्षों तक पूर्णिमा, अमावस्या और चातुर्मास्य में अनेकों बार अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया और हजार वर्षों तक ही नित्यप्रति प्रातःकाल उठकर एक_एक लाख गौएं और सौ_सौ खच्चर ब्राह्मणों को दान किये। किन्तु अन्त में काल ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र का शोक त्याग दो। 'राजन् ! इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए राजा सगर अब इस संसार में नहीं हैं_यह हम सुनते ही हैं। इनके साठ हजार पुत्र थे, जो उनके पीछे_पीछे चलते थे। अपने बाहुबल से उन्होंने इस पृथ्वी पर एकछत्र राज्य स्थापित किया था और हजार अश्वमेध यज्ञ करके देवताओं को तृप्त किया था। उन यज्ञों में उन्होंने ब्राह्मणों को सोने के महल दान किये थे। उन्होंने समुद्र पर्यन्त सारी पृथ्वी खुदवा डाली थी तथा उनके नाम के अनुसार ही समुद्र का नाम 'सागर' पड़ा है। परन्तु अन्त में वे ही मर ही गये; इसलिये तुम अपने पुत्र के लिये शोक न करो। 'राजन् ! इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए राजा पृथु का देह भी आज नहीं है। महर्षियों ने महान् वन के बीच में इनका राज्याभिषेक किया था और यह सोचकर कि ये सब लोकों में धर्म की मर्यादा प्रतीत ( स्थापित ) करेंगे, उनका नाम 'पृथु' रखा था। उन्हें देखकर सभी प्रजा ने एक स्वर से कहा था कि हम इनसे प्रसन्न हैं। इस प्रकार प्रजा का रंजन करने के कारण ही वे 'राजा' कहलाये। जिस समय वे राज्य करते थे, पृथ्वी बिना जोते ही धान्य उत्पन्न करती थी, औषधियों के पुट_पुट में रस था और सभी गौएं दोहनी भरकर दूध देती थीं। मनुष्य निरोग, पूर्णकाम और निर्भय थे। वे इच्छानुसार खेतों या घरों में रहते थे। जिस समय राजा समुद्र के पास जाते थे उसका जल स्थिर हो जाता था और नदियां बहना बन्द कर देती थीं। मनुष्य निरोग पूर्णकाम और निर्भय थे। उन्होंने एक अश्वमेध महायज्ञ करके उसमें ब्राह्मणों को इक्कीस पर्वत दान किये थे। किन्तु अन्त में उन्हें भी काल का ग्रास बनना पड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र का शोक छोड़ दो।' इस प्रकार उपदेश देकर नारदजी ने पूछा 'राजन् ! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो ! क्या मेरी बातों पर तुमने कुछ भी ध्यान नहीं ? मैंने जो कुछ कहा है वह व्यर्थ ही नहीं है।'सृंजय ने कहा_महर्षै ! आपका उपदेश व्यर्थ नहीं हुआ है। आपका दर्शन करके मेरा सारा शोक दूर हो गया है। आपकी बातें सुनने की लालसा अभी शात नहीं हुईं हैं, अमृतपान के समान उसके लिये मेरी उत्कण्ठित बनी ही हुई है। फिर भी मेरी ऐसी इच्छा है कि एक बार आपकी कृपा से पुत्र के साथ मेरा समागम हो जाय। नारदजी बोले _राजन् ! महर्षि पर्वत ने तुम्हें सुवर्णकी नाम का पुत्र दिया था। वह तो अब नष्ट हो चुका। इसके स्थान पर मैं तुम्हें हजार वर्ष तक जीवित रहनेवाला हिरण्याक्ष नाम का दूसरा पुत्र देता हूं। श्रीकृष्ण की यह बात समाप्त होने पर नारदजी ने भी उनके कथन का अनुमोदन किया और राजा युधिष्ठिर को सुवर्णकी का सारा चरित्र सुनाकर कहा कि राजन् ! जब सृंजय ने अपने मृत पुत्र को जीवित करने के लिये बहुत आग्रह किया तो मैंने उसे संजीव कर दिया। इससे उसके माता-पिता को बहुत प्रसन्नता हुई।
कालांतर में पिता का स्वर्गवास होने पर सुवर्णकी ने ग्यारह सौ वर्ष तक पृथ्वी पर राज्य किया। इसके बाद वह स्वर्ग सिधारा। धर्मराज ! अब तुम भी अपने हृदय का संताप दूर कर दो एवं श्रीकृष्ण और व्यासजी के कथनानुसार अपने पैतृक राजसिंहासन पर बैठकर शासन का भार संभालो। यह सब करते हुए यदि तुम बड़े _बड़े यज्ञों का अनुष्ठान करोगे तो अपने अभीष्ट लोक प्राप्त कर लोगे।




Tuesday, 21 October 2025

श्रीव्यासजी का राजा युधिष्ठिर को कन्या मुनि का कहा हुआ धर्मोपदेश सुनाना

वैशम्पायनजी कहते हैं_जनमेजय ! पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र राजा युधिष्ठिर को अपने सम्बन्धितों के शोक से संतप्त होकर प्राण त्यागने के लिये तैयार देख श्रीव्यासजी उनका शोक दूर करने के लिये बोले_'युधिष्ठिर ! इस विषय में कन्या ब्राह्मण का कहा हुआ एक प्राचीन इतिहास है। उसपर ध्यान दो। एक बार विदेहराज जनक ने दु:ख और शोक से वशीभूत होकर महामति विप्रवर कन्या से पूछा था कि 'अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुष को कैसा वर्ताव करना चाहिये ? 'इसपर अश्मा ने कहा_'राजन् ! यह पुरुष कैसे जन्म लेता है उसके साथ ही सुख और दु:ख उसके पीछे लग जाते हैं। वे इसके ज्ञान को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे वायु बादलों को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसी से मनुष्य के हृदय में 'मैं कुलीन हूं, सिद्ध हूं, कोई साधारण मनुष्य नहीं हूं' ये तीन बातें घुस बैठती हैं। इसके नशे में भरकर वह अपने बाप_दादों से प्राप्त हुई पूंजी को लुटाकर कंगाल हो जाता है और फिर दूसरों के धन पर मन ले आता है। उसे मर्यादा का कोई ख्याल नहीं रहता। वह अनुचित उपायों से धन लुटाने लगता है। यह देखकर राजा लोग उसे दण्ड देते हैं।इसलिये मनुष्य के ऊपर सुख या दु:ख जो कुछ आ पड़े उसे सहना ही चाहिये, क्योंकि उसे दूर करने का कोई उपाय भी तो नहीं है। अप्रिय ओं का संयोग, प्रेमियों का वियोग, इष्ट, अनिष्ट और सुख_दु:ख_इनकी प्राप्ति प्रारब्धानुसार ही होती है। इसी प्रकार जन्म_मरण और हानि_लाभ भी दैवाधीन ही है। वैद्यों को भी रोगी होते देखा जाता है, बलवआन् भी कभी_कभी निर्बल हो जाते हैं तथा श्रीमान् भी कंगाल होते देखे गये हैं। यह काल का उलट_फेर बड़ा ही अद्भुत है। अच्छे कुल में जन्म, पुरुषार्थ, आरोग्य, रूप, सौभाग्य और ऐश्वर्य _ये सब प्रारब्ध से ही मिलते हैं।
जो कंगाल हैं और चाहते भी नहीं हैं, उनके तो की की पुत्र हो जाते हैं और जो सम्पन्न हैं, उन्हें एक भी नसीब नहीं होता है; विधाता की करनी बड़ी ही विचित्र है। लोग, अग्नि, जल, शस्त्र, भूख_प्यास, आपत्ति, विष, ज्वर, मृत्यु और ऊंची स्थिति से गिरना_ये सब जीव के जन्म के समय ही निश्चित हो जाते हैं। उसी नियम के अनुसार इसे इन स्थितियों में जाना पड़ता है। आजतक न तो कोई इनसे छूट सका और न अब छूट सकता है। इस काल के दबाव से सब जीवों का इष्ट और अनिष्ट पदार्थों के साथ सम्बध होता है। वायु, आकाश, अग्नि, चन्द्रमा, दिन, रात, नक्षत्र, नदी और पर्वतों को भी काल के सिवा और कौन बनाता और स्थिर रखता है ? सर्दी, गर्मी और वर्षा का चक्र भी काल के ही योग से चलता है। यही बात मनुष्यों के सुख_,दु:ख के विषय में भी है। राजन् ! जब मनुष्य पर मृत्यु या वृद्धावस्था की चढ़ाई होती है तो औषधि, मंत्र, होम और जप कोई भी उसे बचा नहीं सकते। जिस प्रकार समुद्र में दो लक्कड़ कभी मिलते कभी बिछुड़ी जाते हैं, इसी प्रकार यहां जीवों का समागम होता है। इस संसार में हमारे माता_पिता और सैकड़ों स्त्री_पुत्र हो चुके हैं। परंतु सोचो तो वास्तव में वे किसके हुए और हम अपने को किसका कहें ? इस जीव का न तो कोई संबंधी हुआ है और न होगा ही। रास्ते में चलते हुए बटोहियों के समान ही हमारा स्त्री, बंधु और सुहृदगण से समागम हो जाता है। अतः विवेकी पुरुष को अपने मन में इसी पर विचार करना चाहिये कि_मैं कहां हूं ? कहां जाऊंगा ? कौन हूं ? यहां किस कारण से आया हूं और किसलिये इसका शोक करूं ? यह संसार अनित्य है और चक्र के समान घूमता रहता है। इसमें माता_पिता, भाई और मित्रों का समागम रास्ते में मिले हुए बटोहियों के समान ही है। कल्याणकारी पुरुष को चाहिये कि शास्त्राज्ञा का उल्लंघन न करके उसमें श्रद्धा ज्ञरखे, पितरों का श्राद्ध और देवताओं का पूजन करें, यज्ञों का अनुष्ठान करें तथा धर्म , अर्थ और काम का सेवन करें। हाय ! यह सारा संसार अगाध काल समुद्र में डूबा हुआ है। उसमें जरा_मृत्यु जैसे विशाल ग्राहक भरे हुए हैं, किन्तु इसे कुछ होश ही नहीं है। वैद्य लोग भी बड़े कड़वे_कड़वे काढ़े और तरह_तरह के धृत पीते रहते हैं; तो भी; समुद्र जैसे अपने तट का उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार मृत्यु को वे भी पार नहीं कर पाते। जो रसायनों को जाननेवाले वैद्य तरह_तरह के रसायनिक द्रव्यों का सेवन करते रहते हैं, किन्तु उन्हें भी बुढ़ापे से जर्जर होते देखा जाता है।
इसी प्रकार तपस्वी, स्वाध्यायशील, दानी और बड़े_बड़े यज्ञ करनेवाले भी जरा और मृत्यु को पार नहीं कर सकते। जन्म लेनेवाले सभी जीवों के दिन_रात, मास_वर्ष और पक्ष एकबार बीतकर फिर कभी नहीं लौटते। मृत्यु का यह लम्बा रास्ता सभी जीवों को तय करना पड़ता है। अतः ऐसा कोई भी मरण वर्मा मनुष्य नहीं है, जिसे काल के वशीभूत होककर इसमें से निकलना न पड़े। इस मार्ग में स्त्री आदि के साथ जो समागम होता है, वह राहगीरों के समान कुछ ही क्षणों का है। इनमें से किसी के भी साथ मनुष्य का नित्य सहवास नहीं हो सकता। जब अपने शरीर के साथ भी मनुष्य का नित्य सहवास नहीं हो सकता। जब अपने शरीर के साथ ही बहुत दिनों तक सम्बन्ध नहीं रहता तो दूसरे सम्बन्धितों के साथ तो यह ही कैसे सकता है ? राजन् ! आज तुम्हारे बाप_दादे कहां गये ? अब न तो तुम ही उन्हें देखते हो और न वे ही तुम्हें देखते हैं। स्वर्ग और नरक तो मनुष्य इन नेत्रों से देख नहीं सकता। उन्हें देखने के लिये तो सत्पुरुष शास्त्र रूपी नेत्रों से ही काम लेते हैं। अतः तुम शास्त्र के अनुसार ही आचरण करो। मनुष्य को पहले ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। इसके बाद वह गृहस्थाश्रम स्वीकार करके पितर और देवताओं के ऋण से मुक्त होने के लिये संतानोत्पादन और यज्ञानुष्ठान करें। ऐसे सूक्ष्मदर्शी गृहस्थ को अपने हृदय का शोक त्यागकर इहलोक, स्वर्गलोक अथवा परमात्मा की अराधना करनी चाहिये। जो राजा शास्त्रानुसार धर्म का आचरण और द्रव्य संग्रह करता है उसका संपूर्ण चराचर लोक में सुयश फैल जाता है। व्यासजी कहते हैं_युधिष्ठिर ! अश्मा मुनि से इस प्रकार धर्म का रहस्य जानकर राजा जनक की बुद्धि शुद्ध हो गयी, उसका सब मनोरथ पूरा हो गया और वह वैक्सीन हो मुनि से आज्ञा लेकर अपने भवन को चला गया। इसी प्रका तुम भी शोक त्यागकर खड़े हो जाओ। मन को प्रसन्न करो और शास्त्र धर्म के अनुसार जीते हुए इस पृथ्वी के राज्य को भोगो।

Wednesday, 1 October 2025

व्यासजी का युधिष्ठिर से काल की महिमा कहना तथा युधिष्ठिर का अर्जुन के प्रति पुनः अपना शोक प्रकट करना

वैशम्पायनजी कहते हैं_राजमहर्षि व्यास की बात सुनकर राजा युधिष्ठिर ने कहा, 'भगवन् ! इस पृथ्वी के राज्य और तरह_तरह के भोगों से मेरे मन को प्रसन्नता नहीं है, मुझे तो यह शोक खाये जा रहा है। जिनके पति और पुत्र नष्ट हो गये हैं, ऐसी इन अफवाहों का विलाप सुनकर मुझे तनिक भी चैन नहीं है। राजा युधिष्ठिर के इस प्रकार कहने पर वेदपारंगत श्रीव्यासजी ने कहा_'राजन् ! जो लोग मरू गये हैं वे तो अब किसी भी कर्म या यज्ञादि से मिल नहीं सकते और न कोई ऐसा पुरुष ही है जो उन्हें लाकर दे दे। बुद्धि या शास्त्राध्ययन के द्वारा असमय ही किसी विशेष वस्तु को पा लेना मनुष्य के वश की बात नहीं है। कभी_कभी तो मूर्ख मनुष्य को भी उत्तम वस्तु की प्राप्ति हो जाती है। वास्तव में कार्य की सिद्धि में काल ही की प्रधानता है। शिल्प, मंत्र और औषधियां भी दुर्भाग्य के समय फल नहीं देतीं। समय की अनुकूलता होने पर जब सौभाग्य का उदय होता है तो वे ही सफलता और बुद्धि की निमित्त बन जाती है। समय आने पर ही मेघ जल बरसाते हैं, बिना समय के वृक्षों में फल_फूल भी नहीं लगते तथा जबतक अनुकूल समय नहीं आता तब तक पक्षी, सर्प, हाथी और हरिणों में कामोन्माद नहीं आता, स्त्रियां गर्भ धारण नहीं करतीं, जाड़ा, गर्मी और वर्षा ऋतुएं नहीं आतीं। किसी का जन्म या मरण नहीं होता, बालक बोलना आरम्भ नहीं करता, मनुष्य पर यौवन नहीं आता और बोया हुआ बीज अंकुरित नहीं होता। इसी प्रकार सूर्य के उदय और अस्त, चन्द्रमा के वृद्धि और ह्रास तथा समुद्र के उतार_चढ़ाव भी बिना अनुकूल समय आये नहीं होते। राजन् ! इस विषय में राजा सएनजइत् ने जो कुछ कहा था वह प्राचीन उपदेश मैं तुम्हें सुनाता हूं। 'राजा ने कहा था_'यह दु:सह कालचक्र सभी मनुष्यों पर अपना प्रभाव डालता है। पृथ्वी के सभी पदार्थ समय आने पर जीर्ण होकर नष्ट हो जाते हैं। धन, स्त्री, पुत्र अथवा पिता के नष्ट हो जाने पर पुरुष 'हाय ! कैसा दु:ख है' ऐसा सौचकर ही फिर उस दु:ख की निवृत्ति का उपाय करता है। किन्तु तुम मूर्ख बनकर शोक क्यों करते हो ? जो शोकरूप ही थे उनके लिये शोक क्या करना। तुम्हारे दु:ख मानने से तो दु:खों की और भय मानने से भयों की वृद्धि ही होगी। न तो यह शरीर मेरा है और सारी पृथ्वी ही मेरी है। यह जैसी मेरी है वैसे ही और सबकी भी है। ऐसी दृष्टि रखने से जीव कभी मोह में नहीं फंसता। शोक के हजारों स्थान हैं और हर्ष के भी सैकड़ों अवसर हैं। किन्तु उनका प्रभाव रोज_रोज मूर्खों पर ही पड़ता है, विद्वानों पर नहीं। संसार में तो केवल दु:ख ही है, सुख तो है ही नहीं; इसलिये लोगों को दु:ख की ही उपलब्धि होती है। यहां सुख के पीछे दु:ख और दु:ख के पीछे सुख लगा ही रहता है। सुख का अन्त तो दु:ख में ही होता है।। कभी_कभी दु:ख से भी सुख की प्राप्ति हो जाती है; इसलिये जिसे नित्य सुख की इच्छा हो वह सुख_दुख दोनों को ही त्याग दे। सुख या दु:ख अथवा प्रिय और अप्रिय जो कुछ प्राप्त हो उसे हृदय में अवसाद न लाकर प्रसन्नता से ग्रहण करें। भाई ! अपने स्त्री और पुत्रों के प्रति  अनुकूल आचरण में थोड़ी सी भी कभी कर दो, फिर तुम्हें मालूम हो जायगा कि कौन किस हेतु से किसका किस प्रकार संबंधी है।" युधिष्ठिर ! यह सुख_दुख के मर्म को जाननेवाले परम धर्मज्ञ महामति सएनजइत् का कथन है। जिस पुरुष को जो दु:ख सता रहा है उससे कभी शान्ति मिलनेवाली नहीं है। दु:खों का अन्त कभी नहीं आता। एक के पीछे दूसरा दु:ख पैदा होता ही रहता है। सुख_दु:ख, उत्पत्ति_नाश, लाभ_हानि और जीवन_मरण_ये क्रमशः आते ही रहते हैं। अतः धीर पुरुषों को इनके कारण हर्ष या शोक नहीं करना चाहिये।
राजाओं का योग तो युद्ध की दीक्षा लेना, युद्ध करना, दण्ड नीति का ठीक_ठीक व्यवहार करना तथा यज्ञ में दक्षिणा और धनवान देना ही है। इन्हीं से उनकी शुद्धि होती है। जो राजा बुद्धिमानी से न्यायपूर्वक राज्य शासन करता है, अहंकार त्यागकर यज्ञानुष्ठान करता है, सब प्रथाओं को धर्म के अनुसार चलाता है, युद्ध में विजय पाकर राज्य की रक्षा करता है, सओमयआग करते हुए प्रजा का पालन करता है, युक्तिपूर्वक दण्ड विधान करता है, वेद_शास्त्रों का अच्छी तरह अभ्यास करता है और चारों वर्णों को अपने _अपने धर्म में स्थित रखता है, वह शुद्ध चित्त होकर अन्त में स्वर्गसुख भोगता है तथा स्वर्गस्थ हो जाने पर भी जिसके आचरण की पुरवासी, देशवासी और मंत्री लोग प्रशंसा करते हैं, उसी राजा को श्रेष्ठ समझना चाहिये।' व्यासजी के इस प्रकार कहने पर युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा_'भैया ! तुम जो समझते हो धन से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है तथा निर्धन को स्वर्गसुख और अर्थ की भी प्राप्ति नहीं हो सकती_यह ठीक नहीं है।अनेकों मुनियों ने तपस्या में लगे रहकर ही सनातन लोकों को प्राप्त किया है। जो धर्मप्राण पुरुष ब्रह्मचर्य आश्रम में रहकर वेदाध्ययन द्वारा ऋषियों की सम्प्रदाय परंपरा की रक्षा करते रहते हैं दे देवगण उन्हें ही 'ब्राह्मण' कहते हैं। जो लोग स्वाध्यायनिष्ठ, ज्ञाननिष्ठ या धर्मनिष्ठ हैं उन्हीं को तुम ऋषि समझो। वानप्रस्थों के कहने से तो हमें यह बात मालूम हुई है कि राज्य के सब काम भी ज्ञाननिष्ठों के ही हाथ में रखे। अज, पृश्रि, सिकत अरुण और केतु नाम के ऋषिगणों ने तो स्वाध्याय के द्वारा ही स्वर्ग प्राप्त कर लिया था। दान, अध्ययन, यज्ञ और निग्रह_ये सभी कर्म बहुत कठिन है। इन वेदोक्त कर्मों का आश्रय लेकर लोग दक्षिणायन मार्ग से स्वर्गलोक में जाते हैं; किन्तु जो नियम के अनुसार उत्तर मार्ग पर दृष्टि रखता है, उसे योगियों को प्राप्त होनेवाले सनातन लोकों की उपलब्धि होती है। प्राचीन काल के विद्वान् इन दोनों में से उत्तर मार्ग की ही प्रशंसा करते हैं। वास्तव में संतोष ही सबसे बड़ा स्वर्ग है, संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। संतोष से बढ़कर कोई चीज नहीं है। जिन पुरुषों ने क्रोध और हर्ष को अच्छी तरह वश में कर लिया है, उन्हीं को वह उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। 
इस प्रसंग में राजा ययाति की कही हुई यह कथा प्रसिद्ध है, जिसपर ध्यान देने से पुरुष कछुआ जैसे अपने अंगों को सिकोड़ लेता है उसी प्रकार
अपनी सब वासनाओं को समेट लेता है। 'राजा ययाति ने कहा था_'जब वह पुरुष किसी से नहीं डरता और इससे भी किसी को भय नहीं रहता तथा इसे किसी वस्तु की इच्छा या किसी से द्वेष नहीं रहता, उस समय वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। जब यह कर्म, मन और वाणी से सभी जीवों के प्रति दुर्भावना का त्याग कर देता है तो इसे ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है। जिसके मान और मोह दब गये हैं और जिसने बहुत पुरुषों का संग करना छोड़ दिया है, उस आत्मज्ञ महात्मा के लिये मोक्ष सुलभ हो जाता है।' 'अर्जुन ! मैं तो साफ देखता हूं कि मनुष्य धन के पीछे पड़ा हुआ है और उसके द्वारा त्याज्य कर्मों का छूटना बड़ा ही कठिन है। साधु या भी उसके लिये दुर्लभ ही है। शोक और भय से रहित होने पर भी जो पुरुष सदाचार से डिगा हुआ है, उसे धन की थोड़ी _सी तृष्णा भी हो तो वह दूसरे से ऐसा वैर ठान लेता है कि उसे पाप किमी कोई परवा नहीं होती। ब्रह्मा ने तो यज्ञ के लिये ही धन उत्पन्न किया है और यज्ञ की रक्षा के लिये ही मनुष्य की रचना की है। इसलिये सारे धन का उपयोग यज्ञ के लिये ही करना चाहिये। उसे भोग में लगाना अच्छा नहीं है। इसी से लोगों का विचार है कि कि धन कभी किसी एक का नहीं है। अतः श्रद्धावान पुरुष को उसे दान और यज्ञ में लगाते रहना चाहिये। जो धन मिले उसे दान में ही लगा दें, भोगों में न लगावें। दान देने में भी दो भूलें हुआ करती हैं। उनपर ध्यान रखना चाहिए। एक तो कुपात्र के पास धन पहुंच जाना और दूसरे सुपात्र को न मिलना। 'अर्जुन ! इस युद्ध में बालक अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्र, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, द्रुपद, वृषसेन, धृष्टकेतू तथा भिन्न-भिन्न देशों के अनेकों नृपतिगण काम आ गये हैं। इस सारे बन्धुवध की जड़ में ही हूं। हाय ! मैं बड़ा ही राज्यों और क्रूर हूं। मैंने अपने कुटुंब का भी मूलोच्छेद करा डाला। इसी से मेरा शोक जरा भी दूर नहीं होता, मैं अत्यंत आतुर हो रहा हूं। मैं कैसा मूर्ख और गुरुद्रोही हूं ? भला, यह राज्य कितने दिन टिकनेवाला है; इसी के लोभ में पड़कर मैंने अपने दादा भीष्मजी को भी मरवा डाला। अरे ! उन्होंने तो हमें पाल_पोसकर बच्चे से बड़ा किया था। गुरुवार द्रोणाचार्य को मेरी सत्यवादिता में विश्वास था, इसीलिये उन्होंने मुझसे अपने पुत्र के वध के विषय में पूछा था। किन्तु मैंने हाथी की आड़ लेकर झूठ बोल दिया। ऐसा भारी पाप करके भला, मेरी किस लोक में गति होगी ? हाय मुझसे बड़ा और कौन पापी होगा ? मैंने तो अपने बड़े भाई कर्ण को भी मरवा डाला। इस राज्य के लोभ से ही मैंने बालक अभिमन्यु को कौरवों की सेवा में झोंक दिया। तबसे तो तुम्हारी और मेरी आंखें ही नहीं उठतीं। बेचारी द्रौपदी के पांचों पुत्र मारे गये। उनका शोक भी मुझे बाराबर सालता रहता है। अब तो तुम मुझे प्रायोपवेश के लिये ही बैठा समझो। मैं यहीं बैठे_बैठे अपना शरीर सुखा डालूंगा। इस गंगा तट पर ही मैं अपने रातों को नष्ट कर दूंगा। आप सब लोग मुझे इस प्रायश्चित की आज्ञा दीजिये।

Monday, 8 September 2025

महर्षि व्यास का शंख_लिखित और राजा हयग्रीव के दृष्टांत देकर युधिष्ठिर को प्रजापालन के लिये उत्साहित करना

वैशम्पायनजी कहते हैं_ जनमेजय ! अर्जुन के इस प्रकार समझाने पर कुन्तिनन्दन युधिष्ठिर ने कोई उत्तर नहीं दिया। तब महर्षि व्यास कहने लगे_'सौम्य ! अर्जुन का कथन बहुत ठीक है। गृहस्थ_धर्म बहुत उत्तम है और शास्त्रों में उसका वर्णन किया गया है। धर्मज्ञ ! तुम शास्त्रानुसार स्वधर्म का ही आचरण करो। तुम्हारे लिये घर छोड़कर वन में जाने का विधान नहीं है। देखो, देवता, पितर, अतिथि और सेवक इन सबका निर्वाह गृहस्थ के द्वारा ही होता है। अतः तुम इन सबका पालन करो। पक्षु_पक्षी और समस्त प्राणियों का पेट भी गृहस्थों के कारण भरता है, इसलिये गृहस्थ ही सबसे श्रेष्ठ है।  तुम्हें वेद का पूरा ज्ञान है और तुमने तपस्या भी बहुत बड़ी की है। इसलिये अपने इस पैतृक राज्य का भार उठाने में तुम सब प्रकार से समर्थ हो। राजन् ! तप, यज्ञ, विद्या, भिक्षा, इन्द्रियों का संयम, ध्यान, एकान्तसेवन, संतोष और शास्त्रज्ञान_ ये सब बातें तो ब्राह्मणों को सिद्धि देनेवाली है।
क्षत्रियों के धर्म यद्यपि तुम जानते ही हो तो भी मैं उन्हें सुनाता हूं_यज्ञ, विद्याभ्यास, शत्रुओं पर चढ़ाई करना, राज्यलक्ष्मी की प्राप्ति से कभी संतुष्ट न होना, दण्ड देना, दबदबा रखना, प्रजा का पालन करना, समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त करना, तप, सदाचार, द्रव्योपार्जन और सुपात्र को दान देना_क्षत्रिय के ये सब कर्म उसे इहलोक और परलोक दोनों में ही सफलता देनेवाले हैं।इनमें भी दण्ड धारण करना उसका सबसे प्रधान धर्म है। इसके लिये उसमें सर्वदा बल रहना चाहिये; क्योंकि दण्ड विधान बल के द्वारा ही हो सकता है। राजन् क्षत्रियों को तो इन्हीं धर्मों के द्वारा सिद्धि प्राप्त हो सकती है। हमने सुना है कि राजर्षि सुध्युम्न ने दण्डधारण के द्वारा ही परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी। इस विषय में यह प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है; तुम ध्यान देकर सुनो। 'शंख और लिखित नामक दो भाई थे। वे बड़े ही तपस्वी थे। बाहुदा नदी के तीर पर उनके अलग_अलग आश्रम थे, जो बड़े ही रमणीय और  सर्वदा फल_पुष्पादि से लदे रहते थे। एक बार लिखित शंख के आश्रम पर आये। दैववश उस समय शंख बाहर गये हुए थे। लिखित ने भाई की अनुपस्थिति में वहां के बहुत _से पके फल तोड़ लिये और वे उन्हें वहीं बैठकर खाने लगे। इतने में ही शंख वहां आ गये। उन्होंने लिखित को फल खाते देकर कहा, 'भैया ! तुम्हें ये फल कहां से मिले।' इसपर लिखित ने बड़े भाई के पास जाकर उनसे हंसते_हंसते कहा, ये तो मैंने इस सामनेवाले वृक्ष से ही थोड़े हैं।' इसपर शंख ने कहा, 'तुमने मुझसे बिना पूछे स्वयं ही फल तोड़कर तो चोरी की है, इसलिये तुम राछजा के पास जाओ और उसे अपना सब कर्म सुनाकर कहो कि 'राजन् ! बिना दिये दूसरे की चीज लेकर मैंने चोरी का अपराध किया है, इसलिये यह सब जानकर आप अपना धर्मपालन कीजिये और तुरन्त ही मुझे वह दण्ड दीजिये जो चोर को दिया जाता है। 'तब भाई की आज्ञा सिर पर धारण कर लिखित राजा सुध्युम्न के पास गये और उनसे बोले, 'राजन् ! मैंने बिना आज्ञा लिये अपने बड़े भाई के फल खा लिये हैं, इसलिये आप मुझे दण्ड दीजिये।' 'सुद्युम्न ने कहा, 'विप्रवर ! यदि आप दण्ड देने में राजा को प्रमाण मानते हैं तो क्षमा करने का भी उसको अधिकार है ही। अतः: मैं आपको क्षमा करता हूं। इसके सिवा मेरे योग्य कोई सेवा हो तो उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये। मैं उसे पालन करने का प्रयत्न करुंगा।' 'परन्तु राजा के बहुत प्रार्थना करने पर भी लिखित ने दण्ड के लिये ही आग्रह किया। उसके सिवा और किसी प्रकार की बात उन्होंने स्वीकार नहीं की। तब राजा ने चोरी का दण्ड देते हुए उनके दोनों हाथ कटवा दिये। इस प्रकार दण्ड पाकर वे शंख के पास आये और अत्यन्त दिन होकर उनसे प्रार्थना की कि ' मुझे दण्ड प्राप्त हो गया है,  अब आप मुझ मन्दमति को क्षमा करें।' 'शंख ने कहा, 'भैया ! मैं तुमपर कुपित नहीं हूं। तुम तो धर्म को जाननेवाले हैं। तुम्हें धर्म का उल्लंघन हो गया था। उसी का तुम्हें दण्ड मिला है। अब तुम शीघ्र ही बाहुदा नदी के तट पर जाकर विधिवत् देवता और पितरों का तर्पण करो। भविष्य में कभी अधर्म में मन मत ले आना। 'शंख की बात सुनकर लिखित ने बाहुदा के पुनीत एवं में स्नान किया और फिर वेज्योंही तर्पण करने के लिये तैयार हुए कि उनकी भुजाओं में से कमल के समान दो हाथ प्रकट हो गये। इससे उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने भाई को जाकर वे हाथ दिखाये। शंख ने कहा, 'भाई ! तुम शंका न करो। मैंने अपने तप के प्रभाव से ये हाथ उत्पन्न किये हैं।' इसपर लिखित ने पूछा, 'विप्रवर ! यदि आपके पास तप का ऐसा प्रभाव है तो आपने पहले ही मेरी शुद्धि क्यों नहीं कर दी ?' शंख बोले, 'यह ठीक है; परन्तु तुम्हें दण्ड देने का अधिकार मुझे नहीं है; यह तो राजा का ही काम है। इससे राजा की भी शुद्धि हुई है और पितरों सहित तुम भी पवित्र हो गये हो।' इसी प्रकार प्रणेताओं के पुत्र दक्ष ने भी उत्तम सिद्धि प्राप्त की थी। प्रथाओं का पालन करना_यही क्षत्रियों का मुख्य धर्म है। इसलिये राजन् ! आप शोक त्यागियों। अपने भाई अर्जुन की हितकारिणी बात पर ध्यान दीजिये। क्षत्रियों का प्रधान कर्तव्य तो दण्ड धारण करना ही है, मूंड़ मुड़ाना उनका काम नहीं है‌।'तात ! वन में रहते समय तुम्हारे धीर_वीर भाइयों ने जो मनोरथ किये थे उन्हें अब सफल होने दो। तुम नहुष पुत्र ययाति के समान पृथ्वी का पालन करो। अपने भाइयों के साथ धर्म अर्थ और काम का भोग करो। पीछे प्रसन्नता से वन में चले जाना। पहले अतिथियों, पितरों और देवताओं के ऋण से उऋण हो लो, इसके बाद यह सब करना। अभी तो सर्वमेध और अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करो। यदि तुम अपने भाइयों के साथ बड़ी_बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञ करोगे तो तुम्हें अतुलित यश प्राप्त होगा।  'राजन् ! मैं तुमसे जो बात कहता हूं उसपर ध्यान दो वैसा करने से तुम अपने धर्म से नहीं गिरोगे। देखो, जो राजा कर का छठा भाग लेकर भी राष्ट्र की रक्षा नहीं करता वह अपनी प्रजा के चतुर्थांश पाप का भागी बनता है। यदि राजा धर्मशास्त्र का उल्लंघन करता है तो पतित हो जाता है और यदि उसका अनुसरण करता है तो निर्भय हो रहता है। यदि काम क्रोध छोड़कर वह पिता के समान सारी प्रजा के प्रति समदृष्टि रखें तो इस शास्त्रोक्त बुद्धि का आश्रय लेने से उसे किसी प्रकार पाप का संसर्ग नहीं होता । 
शत्रुओं को अपने तेज और बुद्धि के बल से काबू में रखना चाहिये। पापियों के साथ कभी मेल नहीं करना चाहिये तथा अपने राज्य में पुण्यकर्मों का अनुष्ठान कराना चाहिये। शूरवीर, श्रेष्ठ, सत्कर्म करनेवाले विद्वान्, वेदपाठी, ब्राह्मण और धनवानों की विशेष रक्षा करनी चाहिये। जो बहुश्रुत हैं उन्हें धर्म कृत्यों में नियुक्त करना चाहिये तथा एक व्यक्ति में, चाहे वह कैसा भी गुणवान् हो कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। जो राजा प्रजा की रक्षा नहीं करता, वइनयहईन है, मानी है, मान्य पुरुषों का सत्कार नहीं करता और गुणों में भी दोष दृष्टि करता है, वह पापी हो जाता है और लोक में उसे दुर्दांत ( क्रूर ) कहा जाता है। की बार प्रजा लोग जो राजा की ओर से सुरक्षित न होने के कारण अनावृष्टि आदि दैविक आपत्तियों से नष्ट हो जाते हैं तथा चोरों के उपद्रवादी से दु:ख पाते हैं, उसमें राजा ही दोष का भागी होता है। किन्तु पूरे_पूरे विचार और नीति के साथ सब प्रकार प्रयत्न करने पर भी यदि सफलता न मिले तो उस अवस्था में राजा को पाप नहीं होता। ' राजन् ! इस विषय में मैं तुम्हें हयग्रीव का प्रसंग सुनाया हूं। वह बड़ा शूरवीर और पवित्र कर्म करनेवाला था। उसने संग्राम में अपने शत्रुओं को परास्त कर दिया था। परन्तु पीछे ना:सहाय हो जाने पर शत्रुओं ने उसे हराकर मार डाला। वह शत्रुओं का निग्रह और प्रजा का पालन करने में बड़ा ही कुशल था। इससे उसे बड़ी कीर्ति भी मिली थी। उसने विचारपूर्वक न्याय के अनुसार अपने राज्य का पालन किया, अहंकार को पास नहीं आने दिया और अनेकों यज्ञों का अनुष्ठान किया। इस प्रकार संपूर्ण लोकों को अपने सुयश से व्याप्त करके वह महात्मा स्वर्ग में सुख भोग रहा है। उसने यज्ञादि के अनुष्ठान से दैवी और दण्ड नीति से मानुष सिद्धि प्राप्त की थी तथा धर्मशास्त्र के अनुसार प्रजा का पालन किया था। वह बड़ा विद्वान, त्यागी, श्रद्धालु और कृतज्ञ था। इस लोक में उसने अनेकों पुण्यकर्म किये और फिर देह त्यागकर उन पुण्यलोकों को प्राप्त किया जो बड़े _बड़े मेधावी, विद्वान, माननीय और प्रयागराज तीर्थस्थानों में शरीर छोड़नेवालों को मिलते हैं।'




Saturday, 16 August 2025

महर्षि देवस्थान और अर्जुन का राजा युधिष्ठिर को समझाना

वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! युधिष्ठिर की बात पूरी होने पर वहां बैठे देवस्थान नाम के एक तपस्वी ने ये युक्तियुक्त वचन कहने आरम्भ किये, 'अज्ञातशत्रो ! आपने धर्मानुसार ये सारी पृथ्वी जीती है। इसे आपको व्यर्थ ही नहीं त्याग देना चाहिये। राजन् ! ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ और सन्यास_ये चारों आश्रम ब्रह्म को प्राप्त करने की चार सीढ़ियां हैं और इनका वेद में प्रतिपादन किया गया है। अतः: आपको इन्हें क्रम से ही पार करना चाहिये। आप अभी बड़ी_बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञ कीजिये। स्वाध्याय यज्ञ तो ऋषिलोग किया करते हैं और कोई_कोई ज्ञानयज्ञ भी करते हैं । गृहस्थ तो यज्ञ के लिये ही संपूर्ण धन का संचय करते हैं। वे यदि अपने शरीर अथवा किसी अयोग्य कार्य के लिये उसका दुरुपयोग करते हैं तो भ्रूणहत्या_जैसे दोष के भागी बनते हैं। ब्रह्मा ने यज्ञ के लिये ही धन की रचना की है और यज्ञ के लिये ही पुरुष को उसका रक्षक नियुक्त किया है। अतः यज्ञ के लिये सारा धन खर्च कर देना चाहिये। उसके बाद शीघ्र ही कामना की सिद्धि हो जाती है। राजन् ! अविक्षित के पुत्र राजा मरीच ने बड़ी धूमधाम से इन्द्र का यजन किया था। उनके यज्ञ में लक्ष्मी देवी स्वयं पधारी थीं और उनके सभी यज्ञपात्र सुवर्ण के थे। राजा हरिश्चन्द्र का‌नाम भी आपने सुना ही होगा। उन्होंने भी बड़ा धन खर्च करके इन्द्र का यजन किया था, उससे वे पुण्यों के भागी हुए और शोकरहित हो गये। इसलिये सारा धन यज्ञ में ही लगा देना चाहिये। "राजन् ! मनुष्य के मन में संतोष होना स्वर्ग से भी बढ़कर है। संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। संतोष से बढ़कर संसार में कोई बात नहीं है। उसकी ठीक_ठीक स्थिति तभी होती है जब मनुष्य कछुआ जैसे अपने अंगों को सिकोड़ लेता है, उसी प्रकार अपनी सब कामनाओं को सब ओर से समेट लेता है। उस समय तुरंत ही आत्मज्योति:स्वरूप परमात्मा अपने अंत:कर्ण में ही प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है। जब मनुष्य किसी से भी भय नहीं मानता तो उससे भी किसी को कोई डर नहीं रहता। वह काम और द्वेष को जीत लेता है तथा आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है। 'कोई लोग तो शान्ति की प्रशंसा करते हैं और कोई उद्योग के गुण गाते हैं। कोई इनमें से प्रत्येक को ही अच्छा बताते हैं और कोई एक साथ ही दोनों को। कोई यज्ञ को ही अच्छा बताते हैं और कोई एक साथ ही दोनों को। कोई यज्ञ को ही अच्छा बताते हैं, कोई संन्यास को और कोई दान को। कोई सबकुछ छोड़कर चुपचाप भगवान् के ध्यान में मग्न रहते हैं और कोई राज्य पाकर प
राजा का पालन करते रहना ही अच्छा समझते हैं। किन्तु इन सब बातों पर विचार करके बुद्धिमानों ने तो यही निश्चय किया है कि किसी से द्रोह न करना, सत्य भाषण देना, दान देना, सबपर दया रखना, इन्द्रियों का दमन करना, अपनी ही स्त्री से पुत्रोंत्पति करना तथा मृदुता, लज्जा और अचंचलता_ये ही रवाना धर्म हैं तथा ऐसा ही स्वायंभुव मनु ने भी कहा है। राजन् ! आप भी प्रयत्न पूर्वक इसी धर्म का पालन करें। भूपति का यह धर्म है कि इन्द्रियों को सर्वदा अपने अधीन रखें, प्रिय और अप्रिय में समान रहे, यज्ञानुष्ठान से जो बचे उसी अन्न का सेवन करें, शास्त्र के रहस्य को जाने, दुष्टों का दमन करता रहे, साधुओं की रक्षा करें, प्रजा को धर्म मार्ग पर ले जाकर उसके साथ धर्मानुसार व्यवहार करें और अन्त में पुत्र को राज्यलक्ष्मी सौंपकर वन में चला जाय। वहां भी वन के फल_मूलादि से निर्वाह करता हुआ आलस्य त्यागकर शास्त्रोक्त कर्मों का ही विधिपूर्वक आचरण करें। जो राजा इस प्रकार वर्ताव करता है, वहीं धर्म को जाननेवाला है। उसके इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं। इस प्रकार जो धर्म का अनुसरण करते थे, सत्य, दान और तप में लगे रहते थे, दया आदि गुणों से सम्पन्न थे, काम क्रोधादि दोषों से दूर रहते थे, सर्वदा प्रजापालन में तत्पर रहते थे, उत्तम धर्मों का आचरण करते थे और गौ एवं ब्राह्मणों की रक्षा के लिये युद्ध ठानते थे, ऐसे अनेकों राजा उत्तम गति को प्राप्त हो चुके हैं। इसी प्रकार रुद्र, वसु, आदित्य, साध्य और अनेकों राजर्षियों ने भी इसी धर्म का आश्रय लिया था तथा निरंतर सावधान रहकर अपने पवित्र कर्मों का आचरण करने से स्वर्ग प्राप्त किया था।' वैशम्पायनजी कहते हैं_जनमेजय ! इस प्रकार जब देवस्थान मुनि का भाषण समाप्त हुआ तो अर्जुन ने अपने बड़े भाई युधिष्ठिर से, जो अभी तक बहुत उदास थे, फिर कहा, 'राजन् ! आप धर्मज्ञ हैं, आपने क्षत्रिय_धर्म के अनुसार ही यह दुर्लभ राज्य प्राप्त किया है। फिर आप इतने दु:खी क्यों हैं ? महाराज ! आप क्षात्रधर्म का विचार कीजिये। क्षत्रिय के लिये तो धर्मयुद्ध में मर जाना अनेकों यज्ञों से भी बढ़कर है। तप और त्याग तो ब्राह्मणों केज्ञधम हैं। दूसरे के धन से अपना निर्वाह करना यह क्षत्रिय का धर्म नहीं है। आप तो सब धर्मों को जानते हैं, धर्मात्मा हैं, बुद्धिमान हैं, कार्यकुशल हैं और संसार में आगे_पीछे की सब बातों पर दृष्टि रखनेवाले हैं तथा अपने क्षात्रधर्म के अनुसार शत्रुओं को परास्त करके यह निष्कंटक राज्य प्राप्त किया है। अतः अब मन को वश में रखकर आप यज्ञ_ दानादि का अनुष्ठान कीजिये। देखिये, इन्द्र कश्यप ब्राह्मण का पुत्र था, परन्तु अपने कर्म से वह क्षत्रिय हो गया था। लोक में उसके इस कर्म को प्रशंसनीय ही माना गया है। अतः जो कुछ हो चुका है, उसके लिये आप शोक न करें। वे सब वीर तो क्षात्रधर्म के अनुसार शस्त्रों से मारे जाकर परम गति को ही प्राप्त हुए हैं।