राजा जनमेजय ने पूछा_मुनिवर ! बाणशय्या पर पड़े हुए भीष्म जी ने किस प्रकार अपने शरीर का परित्याग किया ? उस समय उन्होंने कि योग की धारणा की ? वैशम्पायनजी ने कहा_राजन् ! तुम पवित्र भाव से एकाग्रचित्त एवं सावधान होकर महात्मा भीष्म के देहत्याग का वृतांत सुनो। जब दक्षिणायन समाप्त हुआ और सूर्य उत्तरमार्ग पर आ गये, उस समय भीष्म जी ने ध्यानमग्न होकर मन को परमात्मा में लगाया। उनके आस_पास अनेकों उत्तम ब्राह्मण विराजमान वेदों के ज्ञाता व्यास, देवर्षि नारद, देवस्थान, वात्स्य, अश्मक, सुमन्तु, जैमिनि, पैर, शाण्डिल्य, देवल, मैत्रेय, वशिष्ठ, कौशिक ( विश्वामित्र, हारीत, लोमश, दत्तात्रेय, वृहस्पति, शुक्र, च्यवन, सनत्कुमार, कपिल, वाल्मीकि, तुम्बुरु, कुरु, मौदगल्य, परशुराम, तृणविन्दु, वायु, संवर्त, पुलिस, कच, कश्यप, पुलस्त्य, क्रत्रु, दक्ष, पराशर,मरीचि, अंगिरा, काव्य, गौतम, गालव, धौम्य विभाण्ड, माण्डव्य, धौम्य, कृषाणु_भौतिक, उलूक, मार्कण्डेय, भास्करि और पूरण_ये तथा और भी बहुत_से सौभाग्यशाली इस अवसरमुनि जो श्रद्धा, शम-दम आदि गुणों से सम्पन्नथे, भीष्मजी को घेरे हुए थे। इन ऋषियों के बीच में भीष्म जी ग्रहों से घिरे हुए चन्द्रमा के समान शोभा पा रहे थे। शरशैय्या पर पड़े ही पड़े वे हाथ जोड़कर पवित्र भाव से श्रीकृष्ण का ध्यान करने लगे। ध्यान करते _करते अत्यन्त हर्ष से भर गये। उनके कण्ठ का स्वर स्पष्ट सुनाई देने लगा। वे संसार के स्वामी योगेश्वर भगवान् वासुदेव की स्तुति करने लगे।भीष्म जी बोले_मैं श्रीकृष्ण के अराधना की इच्छा से जिस वाणी का प्रयोग करना चाहता हूं, वह विस्तृत हो या संक्षिप्त, उसे सुनकर वे पुरुषोत्तम मुझपर प्रसन्न हों। जो स्वत: शुद्ध है, जिनकी प्राप्ति का मार्ग भी सर्वथा शुद्ध है, जो सबसे विलक्षण हंस स्वरूप है और प्रथाओं का पालन करनेवाले परमेष्ठी हैं, उन परमात्मा की मैं शरण लेता हूं। संपूर्ण जड़ता को धारण करनेवाले श्रीहरि परब्रह्म परमात्मा हैं, उनका न आदि है न अंत। उन्हें न देवता जान पाते हैं न ऋषि। एकमात्र ये नारायण ही सबको जानते हैं। नारायण से ही ऋषि प्रकट हुए हैं, सिद्धों और बड़े _बड़े नागों का भी उन्हीं से प्रादुर्भाव हुआ है। देवता और देवर्षि भी उनके विषय में इतना ही जानते हैं कि वे अविनाशी परमात्मा हैं। किन्तु वे भगवान नारायण कौन हैं, कहां से आये हैं_इन बातों का यथार्थ ज्ञान देव, राक्षस और सर्पों में से किसी को नहीं है। उन्हीं में संपूर्ण प्राणी स्थित होते हैं और उन्हीं में उनका लक्ष्य होता है। जैसे गोरे के मन के पिरोते होते हैं, उसी प्रकार उन भूतेश्वर परमात्मा में संपूर्ण त्रिगुणात्मक गुण पिरोते हुए हैं। भगवान् कभी नष्ट न होनेवाले एक तने हुए लम्बे सूत के समान हैं; उनमें यह कार्य_कारणरूप जगत् उसी प्रकार गुंथा हुआ है, जैसे सूत में माला। संपूर्ण विश्व उन्हीं के आधार पर टिका हुआ है, यह उन्हीं की रचना है। उन श्रीहरि के हजारों मस्तक, हजारों पैर तथा हजारों नेत्र हैं; हजारों भुजाओं, हजारों मुकुटों तथा हजारों मुखों से देदीप्यमान रहते हैं। वे ही इस जगत् के परम अनिल हैं, उन्हीं को नारायन कहते हैं।वे सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और स्थूल से भी स्थूल हैं, भारी से भी भारी और उत्तम से भी उत्तम हैं। वाक् और अनुवादकों में ( मंत्र और ब्राह्मणों में ) तथा कर्म और ब्रह्म का प्रतिपादन करनेवाले वाक्यों में जिस सत्य का प्रतिपादन किया गया है, वह सत्कर्मा भगवान् वासुदेव ही हैं; वे ही 'साम' संज्ञक ऋचाओं के परमार्थ तत्व हैं। विशुद्ध अंत:करण में उनका नित्य निवास ( साक्षात्कार ) होता है, वे अपने भक्तों का सदा पालन करते रहते हैं। श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध_इन चार स्वरूपों में वे ही प्रकट होते हैं और भक्तजन उन चार दिव्य नामों से उन्हीं की पूजा किया करते हैं। भगवान् वासुदेव की ही प्रसन्नता के लिये नित्य जप ( नैत्विक कर्म ) का अनुष्ठान किया जाता है, वे ही सके भीतर विराजमान हैं। वे सबके आत्मा, सबको जाननेवाले, सर्वस्वरूप एवं सबको उत्पन्न करनेवाले हैं।
जैसे करती अग्नि प्रकट करती है, उसी प्रकार देवकी देवी ने इस भूमण्डल पर रहनेवाले ब्राह्मणों, वेदों और वेदों की रक्षा के लिये जिन्हें वसुदेव के समान से प्रकट किया था, संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर अनन्य भाव से स्थित रहनेवाला साधक मोक्ष के उद्देश्य से अपने विशुद्ध अंत:करण में जिन शुद्ध_शुद्ध आत्मारूप गोविन्द का ज्ञानदृष्टि साक्षात्कार करता है, जिनका पराक्रम इन्द्र और वायु से बहुत बढ़कर है, जिनके तेजके सामने सूर्य की कोई हस्ती नहीं है और जिनके स्वरूप तक मनुष्य के मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों की पहुंच नहीं हो पाती, उन प्रजापालन परमेश्वर की मैं शरण लेता हूं।
पुराणों में जिनका ' पुरुष ' नाम से वर्णन किया गया है, जो युगों के आरम्भ में ' ब्रह्म' और युगान्त के समय 'संकर्षण' कहे गये हैं, उन उपासनीय परमेश्वर की मैं उपासना करता हूं। जो एक होकर भी अनेक रूपों में प्रकट हुए हैं, समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं, यज्ञादि कर्मों में लगे हुए अनन्य भक्त जिन परमात्मा का मंजन करते हैं, जिन्हें संसार का कोषागार कहते हैं, जिनमें ही संपूर्ण प्रजाएं स्थित हैं, पानी के ऊपर जल_पक्षियों की तरह जिनके ही ऊपर इस संपूर्ण जगत् की चेष्टाएं हो रही हैं, जो परमार्थ सत्य-स्वरूप और एकाक्षर ब्रह्म ( प्रणव ) हैं, सत् और असत् से विलक्षण हैं, जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जिन्हें न देवता ठीक_ठीक जानते हैं न ऋषि, अपने मन और इन्द्रियों को वशीभूत करके संपूर्ण देवता, असुर, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि तथा नारायण जिनकी सर्वथा पूजा किया करते हैं, जो संसार रूपी दु:आ से छुड़ाने के लिये सबसे बड़ी औषधि है, जो जन्म, मरण से परे स्वायंभू एवं सनातन देवता हैं तथा इन नेत्रों और बुद्धि की पहुंच से बाहर हैं, उन भगवान् नारायण की मैं शरण लेता हूं। जो इस विश्व के विधाता और चराचर जगत् के स्वामी हैं, जिन्हें संसार का साक्षी तथा अविनाशी परमपद कहते हैं, उन परमात्मा की मैं शरण ग्रहण करता हूं। जो सुवर्ण के समान कान्ति वाले और दैत्यों के संहारक हैं एक होने पर भी जिन्हें अदिति देवी ने अपने गर्भ से बारह आदित्यों के रूप में प्रकट किया, उन पूर्णरूप परमेश्वर को नमस्कार है। जो अपनी अमृतमयी कलाओं से शुक्लपक्ष में देवताओं को और कृष्णपक्ष मे़ख पितरों को तृप्त करते हैं तथा जो संपूर्ण द्विजों के राजा हैं उन चन्द्रमा के रूप में प्रकट हुए परमात्मा को प्रणाम है। जो अज्ञानमय महान अंधकार से भी परे और ज्ञानलोक से अत्यन्त प्रकाशित होनेवाले आत्मा हैं, जिन्हें जान लेने पर मनुष्य मौत के चंगुल से छुट जाता है, उन ज्ञेयरूप परमेश्वर को नमस्कार है। उक्त नामक वृहत् यज्ञ के समय, अग्न्याधान काल में तथा महायाग में ब्राह्मणव्न्द जिनका ब्रह्म के रूप में स्तवन करते हैं, उन वेद भगवान को नमस्कार है। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद जिसके आश्रय हैं, पांच प्रकार का भविष्य जिसका स्वरूप है, गायत्री आदि सात छंद ही जिसके साथ तंतु है, उस वज्र के रूप में प्रकट हुए परमात्मा को प्रणाम है। चार ( आश्रावय ),चार ( अस्तु श्रौषट ), दो ( यज ), पांच (ये यजामहे ), और दो (वषट् ) वाले मंत्रों से जिन्हें भविष्य अर्पण किया जाता है, उन होम स्वरूप परमेश्वर को नमस्कार है। जो 'यजु:' नाम धारण करनेवाले वेदरुपी पुरुष हैं, गायत्री आदि चन्द जिनके हाथ_पैर आदि अवयव हैं, यज्ञ ही जिनका अवयव है, यज्ञ ही जिनका मस्तक है तथा 'रथन्तर' और 'वृहत्' नामक सात ही जिनकी शान्त्वनाभरी वाणी है, उन स्त्रोतरूपी भगवान को प्रणाम है। जो हजार वर्षों में पूर्ण होनेवाले प्रजापतियों के यज्ञ में सोने सोने के पानेवाले पंछी के रूप में प्रकट हुए थे, उन हंसधारीरूप परमेश्वर को प्रणाम है। पदों के समूस्ह जिनके अंग हैं, संधि जिनके शरीर का जोड़ है, स्वर और व्यंजन जिनके आभूषण का काम करते हैं तथा जि,नन्हें दिव्य अक्षर कहते हैं, उन परमेश्वर को वाणी के रूप में नमस्कार है। जिन्होंने तीनों लोकों का हित करने के लिये यज्ञमय बराह का स्वरूप धारण करके इस पृथ्वी को रसातल से ऊपर उठाया था उन वीर्य स्वरूप भगवान को प्रणाम है। जो अपनी योगमाया का आश्रय लेकर शेषनाग के हजार फनों से बने हुए पलंग पर शयन करते हैं, उन निद्रारूप परमात्मा को नमस्कार है। जिनका सारा व्यवहार केवल धर्म के लिये ही है, उन वश में की हुई इन्द्रियों के द्वारा जो मोक्ष के साधन भूत वैदिक उपायों से काम लेकर संतों की धर्म_मर्यादा का प्रसार करते हैं, उन सत्य-स्वरूप परमात्मा को नमस्कार है। जो भिन्न_भिन्न धर्मों का आचरण करके अलग_अलग उनके फल की इच्छा रखते हैं, ऐसे पुरुष पृथक् धर्मों के द्वारा जिनकी पूजा करते हैं, उन धर्ममय भगवान् को प्रणाम है।
जिस अनंग की प्रेरणा से संपूर्ण अंगधारी प्राणियों का जन्म होता है, जिनसे समस्त जीव उन्मत्त हो उठते हैं, उस काम के रूप में प्रकट हुए परमेश्वर को नमस्कार है। जो स्थूल जगत् में अव्यक्त रूप से विराजमान हैं, बड़े _बड़े महर्षि जिसके तत्व का अनुसंधान करते रहते हैं, जो संपूर्ण क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ के रूप में बैठा हुआ है, उस क्षेत्ररूपी परमात्मा को प्रणाम है। जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं के भेद से त्रिविध प्रतीत होते हैं, गुणों के कार्यभूत सोलह विकारों से आवृत होने पर भी अपने स्वरूप में ही स्थित हैं, सांख्यमत के अनुयायी जिन्हें उक्त सोलह विकारों के साक्षी और उनसे निर्लिप्त सत्रहवां तत्व ( पुरुष ) मानते हैं, उन सांख्य रूप परमात्मा को नमस्कार है। जो नींद को जीतकर प्राणों पर विजय पा चुके है और इन्द्रियों को अपने वश में करके शुद्ध तत्व में स्थित हो गये हैं, वे निरंतर योगाभ्यास में लगे हुए योगीजन समाधि में जिनके ज्योतिर्मय स्वरूप का साक्षात्कार करते हैं, उन योगरूप परमात्मा को प्रणाम है। पाप और पुण्य का क्षय हो जाने पर पुनर्जन्म के भय से मुक्त हुए शान्तचित्त संन्यासी जिन्हें प्राप्त करते हैं, उन मोक्ष रूप परमेश्वर को नमस्कार है। सृष्टि के एक हजार युग बीतने पर प्रचंड ज्वालाओं से युक्त प्रलयकालीन अग्नि का रूप धारण कर जो संपूर्ण प्राणियों का संसार करते हैं, उन उग्ररूप धारी परमात्मा को प्रणाम है।इस प्रकार संपूर्ण भूतों का भक्षण करके जो इस जगत् को जलमय कर देते हैं और स्वयं बच्चे का रूप धारण कर अक्षय वट के पत्ते पर शयन करते हैं, उन मायामय बाल_मुकुन्द को नमस्कार है। जिसपर विश्व टिका हुआ है, वह ब्रह्माण्ड कमल जिन पुण्डरीकाक्ष भगवान् की नाभि से प्रकट हुआ है। उन कमल रूपधारी परमेश्वर को प्रणाम है। जिनके हजारों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामी रूप से सबके भीतर विराजमान हैं, उनका स्वरूप किसी सीमा में आबद्ध नहीं है, जो चारों समुद्रों के मिलने से एकार्णव हो जाने पर योगनिद्रा का आश्रय लेकर शयन करते हैं, उन योगनिद्रा रूप भगवान् को नमस्कार है। जिनके मस्तक के बालों की जगह मेघ हैं, शरीर की संधियों में नदियां हैं और उधर में चारों समुद्र हैं, उन जल रूपी परमात्मा को प्रणाम है। सृष्टि और प्रलय रूप समस्त विकार जिनसे उत्पन्न होते हैं और जिनमें ही सबका लय होता है, उन कार्यरूप परमेश्वर को नमस्कार है। जो रात में भी बैठे होते हैं और दिन के समय साक्षी रूप में स्थित रहते हैं तथा जो सदा ही सबके भले_बुरे को देखते रहते हैं, उन द्रष्टा रूपी परमात्मा को प्रणाम है। जिन्हें कोई भी काम करने में रुकावट नहीं होती, जो धर्म का काम करने को सर्वदा उद्यत रहते हैं तथा जो बैकुण्ठनाथ के स्वरूप हैं, उन कार्यरूप भगवान् को नमस्कार है। जिन्होंने धर्मात्मा होकर भी क्रोध में भरकर धर्म के गौरव का उल्लंघन करनेवाले क्षत्रिय_समाज का युद्ध में इक्कीस बार संसार किया, कठोरता का अभिनय करनेवाले उन भगवान् परशुराम को प्रणाम है। जो प्रत्येक शरीर के भीतर वायु रूप में स्थित हो अपने को प्राण_अपान आदि पांच स्वरूपों में विभक्त करके संपूर्ण प्राणियों को क्रियाशील बनाते हैं, उसने वायु रूप परमेश्वर को नमस्कार है। जो प्रत्येक युग में योगमाया के बल से अवतार धारण करते हैं और मास,ऋतु, अयन तथा वर्षों के द्वारा सृष्टि और प्रलय करते रहते हैं, उन कार्यरूप परमात्मा को प्रणाम है।
इस विश्व की रक्षा करनेवाले परमेश्वर ! आपको प्रणाम है। विश्व_आत्मा और विश्व की उत्पत्ति स्थान भूत परमेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप पांचों भूतों से परे हैं और संपूर्ण प्राणियों के लिये मोक्ष स्वरूप ब्रह्म हैं। तीनों लोकों में व्याप्त हुए आपको नमस्कार है, त्रिभुवन से परे रहनेवाले आपको प्रणाम है, संपूर्ण दिशाओं में परे रहनेवाले आप प्रभु को नमस्कार है। आप सब पदार्थों से पूर्ण भण्डार हैं। संसार की उत्पत्ति करनेवाले अविनाशी भगवान् विष्णु ! आपको नमस्कार है। हृषिकेश ! आप सबके जन्मदाता और संहारकर्ता हैं।आप किसी से पराजित नहीं होते। मैं तीनों लोकों में आपके दिव्य जन्म कर्म का रहस्य नहीं जान पाता, मैं तो तत्व दृष्टि से जो आपका सनातन रूप है, उसी की ओर लक्ष्य रखता हूं। स्वर्ग लोक आपके मस्तक से, पृथ्वी देवी आपके पैरों से और तीन लोक आपके तीन पगों से व्याप्त है, आप सनातन पुरुष हैं। दिशाएं आपकी भुजाएं, सूर्य आपके नेत्र और प्रजापति शुक्राचार्य आपके वीर्य हैं; आपने ही तेजस्वी वायु के रूप से ऊपर के सातों लोकों को व्याप्त कर रखा है। जिनकी कान्ति अलसी के फूल की तरह सांवली है और शरीर पर पीताम्बर शोभा देता है, जो अपने स्वरूप से कभी च्युत नहीं होते, उन भगवान् गोविन्द को जो लोग नमस्कार करते हैं, उन्हें कभी भय नहीं होता। भगवान् श्रीकृष्ण को एक प्रोबार भी प्रणाम किया जाय तो वह दस अश्वमेघ यज्ञ के अन्त में किये गये स्नान के समान फल देनेवाला होता है। इसके सिवा प्रणाम में एक विशेषता है_दस अश्वमेघ करनेवाले का तो पुनः इस संसार में जन्म होता है, किन्तु श्रीकृष्ण को प्रणाम करनेवाला मनुष्य फिर भवबंधन में नहीं पड़ता। जिन्होंने श्रीकृष्ण भजन का ही व्रत ले रखा है, जो श्रीकृष्ण का निरंतर स्मरण करते हुए रात को सोते हैं और उन्हीं का स्मरण करते हुए सबेरे उठते हैं, वे श्रीकृष्णस्वरूप होकर उनमें इस तरह मिल जाते हैं, जैसे मंत्र पढ़कर हवन किया हुआ घी अग्नि में मिल जाता है।
जो नरक के भय से बचाने के लिये रक्षागृह का निर्माण करनेवाले और संसार रूपी सरिता की भंवर से पार उतारने के लिये काट की नाव के समान है, उन भगवान् विष्णु को नमस्कार है। जो ब्राह्मणों के प्रेमी तथा गौ और ब्राह्मणों के हितकारी हैं, जिनसे समस्त विश्व का कल्याण होता है, उन सच्चिदानंद स्वरूप भगवान गोविन्द को प्रणाम है। 'हरि' ये दो अक्षर दुर्गम पथ में संकट के समय प्राणों के लिये राह_खर्च के समान है, संसार रुपी रोग से छुटकारा दिलाने के लिये औषध के तुल्य है तथा सब प्रकार के दु:ख_शोक से उद्धार करनेवाले हैं। जैसे सत्य विष्णुमय हैं, जैसे सारा संसार विष्णु भय है, उस प्रकार इस सत्य के प्रभाव से मेरे सारे पाप नष्ट हो जायं। देवताओं में श्रेष्ठ कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण ! मैं आपका शरणागत भक्त हूं और अभीष्ट गति को प्राप्त करना चाहता हूं, जिसमें मेरा कल्याण हो, वह आप ही सोचिये। जो विद्या और तप के जन्मस्थान हैं, जिनको दूसरा कोई जन्म देनेवाला नहीं है, उन भगवान् विष्णु का मैंने इस प्रकार वाणी रूप यज्ञ से पूजन किया है। प जइससे हे भगवान् जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों। नारायण ही परम ब्रह्म हैं, नारायण ही परम तप हैं, नारायण ही सबसे बड़े देवता हैं और भगवान् नारायण ही सबकुछ हैं। वैशम्पायनजी कहते हैं_भीष्मजी का मन भगवान् श्रीकृष्ण से लगा हुआ था, उन्होंने ऊपर बतायी हुई स्तुति करने के पश्चात् 'नम: कृष्णाय' कंकर उन्हें प्रणाम किया। भगवान् भी अपने योगबल से भीष्म जी की भक्ति को जानकर अव्यक्त रूप से वहां पहुंचे और उन्हें तीनों लोकों की बातों का बोध करानेवाला दिव्य ज्ञान देकर लौट गये। जब भीष्मजी का बोलना बन्द हो गया तो वहां बैठे हुए ब्राह्मणवादी महर्षियों ने आंखों में आंसू भरकर गद्गद् कण्ठ से श्रीकृष्ण की स्तुति की। फिर वे धीरे_धीरे भीष्म जी की प्रशंसा करने लगे। दूसरे रथ पर महात्मा युधिष्ठिर और अर्जुन जा रहे थे। तीसरे पर भीम, नकुल तथा सहदेव_ ये तीनों भाई सवार थे। कृपाचार्य, युयुत्सु और संजय भी अपने_अपने रथ पर बैठकर भीष्म जी के पास चले। उस समय बहुत _से ब्राह्मण मार्ग में पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति कर रहे थे और भगवान् प्रसन्नतापूर्वक उसे सुनते जा रहे थे।
कुछ लोग हाथ जोड़कर भगवान् के चरणों में प्रणाम करते थे और उन्हें आनन्दित करते हुए चले जा रहे थे।