युधिष्ठिर ने पूछा_पितामह ! कृपा करके यह बताइएये कि किन कर्मों को करने से मनुष्य प्रायश्चित का भागी बनता है और ऐसी स्थिति में क्या करने से वह पापयुक्त होता है ? व्यासजी ने कहा_ जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्मों का आचरण न करके निषिद्ध कर्म कर बैठता है, उसे ऐसा विपरीत आचरण करने से प्रायश्चित्त कर भागी बनना पड़ता है। जो ब्रह्मचारी सूर्योदय या सूर्यास्त के समय होता रहे अथवा जिस पुरुष के वस्त्र या दांत काले हो, उन्हें प्रायश्चित करना चाहिये। इसके सिवा बड़े भाई के अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई, ब्राह्मण का वध करनेवाला, निन्दा, छोटी कन्या का विवाह हो जाने के बाद उसकी बड़ी बहिन से विवाह करनेवाला, बड़ी बहिन के अविवाहित रहते हुए उसकी छोटी बहिन से विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी,, द्विज की हत्या करनेवाला, सुपात्र को दान न देनेवाला, मांस बेचने वाला, आग लगानेवाला और स्त्री वध करनेवाला, दूसरों का घर जलानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरु का अपमान तथा सदाचार की मर्यादा का उल्लंघन करनेवाला_ये सभी पापी माने जाते हैं, इन्हें प्रायश्चित करना चाहिए। इनके सिवा, जो लोक और वेद से विरुद्ध दूसरे न करने योग्य कर्म हैं, उन्हें भी बताता हूं, तुम एकाग्रचित्त से सुनो। अपने धर्म को त्यागना, दूसरे के धर्म का आचरण करना, यज्ञ करने के अनाधिकारी से यज्ञ कराना, अभक्ष्य भक्षण करना, शरणागत को त्यागना, माता_पिता और भरण_पोषण के अधिकारी सेवक आदि का भरण_पोषण न करना, दूध_दही आदि रसों को बेचना, पशु_पक्षियों को मारना, ब्राह्मणों को दक्षिणा न देना और ब्राह्मणों का धन छीन लेना_धर्मतत्व को जाननेवालों ने ये सभी कर्मन करने योग्य बताये हैं।राजन् ! जो पुरुष पिता के साथ झगड़ा करता है, गुरु स्त्री के साथ समागम करता है और ऋतुकाल होने पर अपनी स्त्री के साथ सहवास नहीं करता, वह धर्म का त्याग करनेवाला है। राजन् ! जो पुरुष पिता के साथ झगड़ा करता है, गुरु स्त्री के साथ समागम करता है और ऋतुकाल होने पर अपनी स्त्री के साथ सहवास नहीं करता, वह धर्म का त्याग करनेवाला है। इस प्रकार संक्षेप में विस्तार से ऊपर जो कर्म कहे गये हैं, इनमें से किन्हीं को करने पर और किन्हीं को न करने पर मनुष्य प्रायश्चित का भागी होता है। अब जिन_जिन कारणों से इन कर्मोंको करने पर भी मनुष्य को पाप नहीं लगता वह सुनो। यदि युद्धस्थल में कोई वेद_वेदान्तों का पारगामी ब्राह्मण भी हाथ में हथियार लेकर मारने के लिये आवे तो उसका वध करने से ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता।राजन् ! इस विषय में वेद का मंत्र भी है। मैं तुमसे वही बात कह रहा हूं जो वेद_वाक्य के अनुसार धर्म यानी गयी है। यदि कोई पुरुष अपने धर्म में डिगे हुए आततायी ब्राह्मण को मार डाले तो इससे भी वह ब्रह्महत्यारा नहीं होता। अनजान में अथवा प्राण संकट के समय भी यदि मदिरा पान कर लें तो बाद में धर्मात्माओं की आज्ञा के अनुसार उसका पुनः संस्कार होना चाहिये। इसी प्रकार अन्य सब अभक्ष्य लक्षणों के विषय में भी समझना चाहिये। यदि कभी ऐसी कोई भूल हो जाय तो प्रायश्चित से ही उसकी शुद्धि होती है।
चोरी सर्वथा निषिद्ध ही है, किन्तु आपत्ति के समय यदि गुरु के लिये चोरी की जाय तो उसमें दोष नहीं है। यदि चोरी करने में किसी प्रकार की कामना न हो, उससे प्राप्त हुई वस्तु को स्वयं न भोगा जाय तथा आपत्काल में ब्राह्मण के सिवा किसी अन्य का धन ले लिया जाय तो भी चोरी का पाप नहीं लगता। अपने या किसी दूसरे के प्राणों की रक्षा के लिये, गुरु के लिये, एकान्त में स्त्री के साथ अथवा विवाह के प्रसंग में झूठ बोलने से भी पाप नहीं होता। यदि किसी कारण से स्वप्न में वीर्य स्खलित हो जाय तो इससे ब्रह्मचारी का व्रत भंग नहीं होता, किन्तु इसके लिये उसे प्रज्जवलित अग्नि में घृत की आहुतियां छोड़कर प्रायश्चित करना चाहिये। यदि बड़ा भाई पतित हो जाय या संन्यास ले ले तो छोटे भाई को विवाह करने में दोष नहीं है। अज्ञानवश किसी आपात्र ब्राह्मण को दान देने से तथा योग्य ब्राह्मण का सत्कार न करने से भी कोई दोष नहीं है। व्यभिचारिणी स्त्री का तिरस्कार करने में भी कोई दोष नहीं है। ऐसा करने से तो उसकी शुद्धि ही होती है और उसका भरण_पोषण करनेवाले को कोई दोष भी नहीं लगता। जो सेवक कामकाज करने में असमर्थ हैं, उसे त्यागने में दोष नहीं है तथा गऔओं के लिये वन में आग लगाने में भी दोष नहीं माना जाता। राजन् ! ये सब तो मैंने वे कर्म बताये जिन्हें करने से कोई दोष नहीं होता। अब मैं विस्तारपूर्वक प्रायश्चित्तों का वर्णन करता हूं। राजन् ! कृच्छ्र_चान्द्रायणादि तप, अग्निहोत्र आदि कर्म और दान के द्वारा मनुष्य तभी अपने पाप से छूट सकता है, जब वह फिर पाप में प्रवृत न हो। यदि किसी ने ब्रह्महत्या की हो तो वह भिक्षा मांगकर एक समय भोजन करें, अपना सब काम स्वयं ही करें, हाथ में खप्पर और आंग्लांग ( खाट का पाया रखें, नित्य ब्रह्मचर्य व्रत रखें, भिक्षा मांगने के समय सर्वदा खड़ा रहे, किसी से ईर्ष्या न करें, पृथ्वी पर शयन करें और लोक में अपने कर्म को प्रकट करें। इस प्रकार बारह वर्ष तक करने से उसकी शुद्धि हो जाती है। अथवा अपनी इच्छा से किसी शस्त्रधारी विद्वान का निशाना बन जाय या जलती हुई आग में गिरे अथवा नीचे सिर किये किसी भी वेद का पाठ करते हुए तीन बार सौ_सो योजन की यात्रा करें या किसी वेदज्ञ ब्राह्मण को अपना सर्वस्व समर्पण कर दे, अथवा जिनसे जीवन भर निर्वाह हो सके इतना धन या सब सामान से भरा हुआ घर ब्राह्मण को दान करे । इस प्रकार गौ और ब्राह्मणों की रक्षा करनेवाले पुरुषों की ब्रह्महत्या से मुक्ति हो सकती है। यदि कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार भोजन करने से तीन वर्षों में एक_एक मांस में भोजनक्रम का परिवर्तन करते हुए अत्यन्त तीव्र कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार अन्न ग्रहण करें तो एक वर्ष में ब्रह्महत्या से छुटकारा हो सकता है।' तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना मांगे जो मिल जाय वह का लेना तथा तीन दिन उपवास करना_इस प्रकार बारह दिन का कृ्च्छ्रव्रत होता है। इसी क्रम से छः वर्ष तक रहने से ब्रह्महत्या छूट सकती है। यही क्रम यदि तीन_तीन दिन में परिवर्तित न होकर एक एक सप्ताह में और विषम मासों में आठ_आठ दिन बदलते हुए एक एक मास के कृ्च्छ्रव्रत के नुसार चले तो तीन वर्षों में शुद्धि हो जायगी और यदि एक मास अयाचित भोजन तथा एक मास उपवास _इस प्रकार चार_चार मांस के कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार चले तो एक ही वर्ष में ब्रह्महत्या का पाप छूट जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार यदि उपवास ही किया जाय तो और भी जल्दी शुद्धि हो सकती है। इसके सिवा अश्वमेध यज्ञ से भी नि:संदेह यह पाप छूट सकता है। श्रुति का कथन है कि जो इस प्रकार के लोग अवभृथ (यज्ञान्त ) स्नान करते हैं वे सभी सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं। जो पुरुष ब्राह्मण के लिये युद्ध में प्राण दे देता है, वह भी ब्रह्महत्या से छूट जाता है। ब्रह्महत्यारा होने पर भी जो सुपात्र ब्राह्मणों को एक लाख गौएं दान देता है उसके तो सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य दूध देनेवाली पच्चीस हजार कपिला गौएं सुपात्रों को दान करता है, वह भी सब पापों से छूट जाता है। मरने के समय दरिद्र और सत्पुरुषों को बछड़े वाले एक हजार दुधारू गौएं देने से भी मनुष्य इस पाप से मुक्त हो सकता है।जो राजा सुपात्र ब्राह्मणों को कम्बोज देश में उत्पन्न हुए सौ घोड़े दान करता है, वह भी ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाता है। जो व्यक्ति किसी एक पुरुष को उसका मनोरथ पूर्ण होने योग्य दान देता है और फिर किसी के आगे उसकी जिक्र नहीं करता वह भी पापयुक्त हो जाता है। जलहीन देश में पर्वत से गिरकर और अग्नि में प्रवेश करके अथवा महआप्रस्थआन की विधि से हिमालय में गलकर प्राण दे देने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। यदि किसी ब्राह्मण ने मद्यपान किया है तो वृहस्पतिवार भाग करने से उसकी शुद्धि हो जाती है। एकबार मद्य पीने पर जो निष्कपट भाव से भूमिदान करता है और फिर कभी शराब नहीं छूता वह भी शुद्ध हो जाता है। जो पुरुष गुरुपत्नी के साथ समागम करता है वह या तो जलती हुई लोहे की शिला पर पड़ जाय या अपनी मूत्रएन्द्रइय को काटकर ऊपर की ओर देखता हुआ दूर तक चला जाय।इसके सिवा, अपना शरीर त्याग देने से भी वह इस पाप से मुक्त छूट सकता है। अथवा जो महाव्रत का ( एक महीने तक जल भी न पीने के नियम का ) पालन करता है, ब्राह्मणों को अपना सर्वस्व दे देता है या गुरु के लिये युद्ध में प्राण होम देता है वह भी इस पाप से मुक्त हो जाता है।
झूठ बोलकर आजीविका चलानेवाला अथवा गुरु का अपमान करनेवाला पुरुष गुरुजी को मनचाही वस्तु देकर प्रसन्न कर लेने से उसे पाप से छूट जाता है। जिसका ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित हो गया हो, उसे ब्रह्महत्या के लिये बताया हुआ प्रायश्चित करना चाहिए। अथवा छः महीने तक शरीर पर गौ का चमड़ा ओढ़ने से वह उस पाप से छूट सकता है। यदि कोई मनुष्य किसी का धन चुरा ले तो किसी_न_किसी उपाय से उसे उतना ही धन लौटा लेने से वह उस पाप से मुक्त हो सकता है। बड़े भाई के अविवाहित रहते विवाह करनेवाला छोटा भाई और उसका बड़ा भाई दोनों संयमपूर्वक बारह दिन का कृ्च्छ्रव्रत करने से पवित्र हो जाते हैं। इसके सिवा, यदि वह छोटा भाई बड़े भाई के कर लेने पर अपनी विवाहिता स्त्री के साथ फिर फिर विवाह संस्कार करा लें तो क्त दोष निवृत हो जाता है और ऐसा करने से स्त्री को भी कोई दोष नहीं होता। यदि अपनी स्त्री के प्रति किसी पाप आचरण की शंका हो तो पुन: रजस्वला हो स्नान करने तक उसका समागम न करें। भस्म से जैसे बर्तन साफ हो जाते हैं, उसी प्रकार रजशुद्धि से स्त्री शुद्ध हो जाती है।पशु_पक्षियों के वध करनेवाला तथा तरह_तरह के बहुत _से पेड़ों को काटनेवाला पुरुष तीन दिन तक वायु भक्षण करें और लोगों के सामने अपना कुकर्म प्रकट कर दे। इससे वह शुद्ध हो जाता है।
जो पुरुष किसी प्रकार की हिंसा नहीं करता, राग_द्वेष एवं मान-अपमान से शून्य है, विशेष भाषण नहीं करता और मिताहार करते हुए पवित्र और एकान्त देश में रहकर गायत्री का जप करता है, वह सब पापों से मुक्त है जाता है। अन्य सब प्रकार के पापों की मुक्ति के लिये भी, ब्राह्मणों ने धर्माधर्म के निर्णय में प्रमाणभूत शास्त्रों के कथन से यही विधि निश्चित की है। जो मनुष्य दिन में आकाश की ओर दृष्टि रखता है, रात्रि में खुले मैदान में सोता है, तीन बार दिन में और तीन बार रात्रि में वस्त्रों सहित जल में घुसकर स्नान करता है और इस व्रत का पालन करते समय स्त्री, शूद्र और पतित से बात नहीं करता वह अज्ञानवश किये हुए सब पापों से मुक्त हो जाता है। मनुष्य को अपने किये हुए शुभ या अशुभ कर्म का फल मरने के बाद भोगना पड़ता है। इसमें जिसकी अधिकता होती है, उसी का फल उसे मिलता है। इसलिये दान, तप और शुभ कर्मों के द्वारा पुण्य की ही वृद्धि करनी चाहिये, जिससे वह पाप को दबाकर स्वयं बढ़ सके। सर्वदा शुभ कर्मों का आचरण करें, पापकर्म से दूर रहें और सुपात्र को धन दान करें ऐसा करने से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
राजन् ! इसी प्रकार विवेकी पुरुष के लिये लक्ष्य और अभक्ष्य, वाच्य और अवाच्य तथा जानबूझकर और बिना जाने हुए पापों के भी प्रायश्चित बताये गये हैं। जो पाप जानबूझकर किया जाता है वह बड़ा होता है और अनजापंन में शिक्षा हुआ पाप छोटा माना जाता है। ऊपर कहीं हुई विधि से पाप निवृति हो सकती है। जो आस्तिक और श्रद्धालु है उसी के लिये यह विधि कहीं गयी है। नास्तिक, अश्रद्धा दु और दम्भ एवं द्वेषप्रधान पुरुषों के लिये इसका कोई उपयोग नहीं है। जो पुरुष मरकर सुख भोगना चाहता है, उसे श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण एवं धर्म का सेवन करना चाहिये। राजन् ! तुमने अपने प्राणों की रक्षा के लिये अथवा स्वधर।म के पालन के लिये ही इनका वध किया है; इसलिये तुम तो इतने ही कारण से इस पाप से सर्वथा मुक्त हो जाओगे। फिर भी यदि तुम्हें कुछ पश्चाताप है तो प्रायश्चित करो। इस प्रकार अनार्य पुरुषों की तरह रोष में भरकर अपना नाश मत करो।