Monday, 7 September 2026

भीष्म द्वारा भगवान की स्तुति

राजा जनमेजय ने पूछा_मुनिवर ! बाणशय्या पर पड़े हुए भीष्म जी ने किस प्रकार अपने शरीर का परित्याग किया ? उस समय उन्होंने कि योग की धारणा की ? वैशम्पायनजी ने कहा_राजन् ! तुम पवित्र भाव से एकाग्रचित्त एवं सावधान होकर महात्मा भीष्म के देहत्याग का वृतांत सुनो। जब दक्षिणायन समाप्त हुआ और सूर्य उत्तरमार्ग पर आ गये, उस समय भीष्म जी ने ध्यानमग्न होकर मन को परमात्मा में लगाया। उनके आस_पास अनेकों उत्तम ब्राह्मण विराजमान वेदों के ज्ञाता व्यास, देवर्षि नारद, देवस्थान, वात्स्य, अश्मक, सुमन्तु, जैमिनि, पैर, शाण्डिल्य, देवल, मैत्रेय, वशिष्ठ, कौशिक ( विश्वामित्र, हारीत, लोमश, दत्तात्रेय, वृहस्पति, शुक्र, च्यवन, सनत्कुमार, कपिल, वाल्मीकि, तुम्बुरु, कुरु, मौदगल्य, परशुराम, तृणविन्दु, वायु, संवर्त, पुलिस, कच, कश्यप, पुलस्त्य, क्रत्रु, दक्ष, पराशर,मरीचि, अंगिरा, काव्य, गौतम, गालव, धौम्य विभाण्ड, माण्डव्य, धौम्य, कृषाणु_भौतिक, उलूक, मार्कण्डेय, भास्करि और पूरण_ये तथा और भी बहुत_से सौभाग्यशाली इस अवसरमुनि जो श्रद्धा, शम-दम आदि गुणों से सम्पन्नथे, भीष्मजी को घेरे हुए थे। इन ऋषियों के बीच में भीष्म जी ग्रहों से घिरे हुए चन्द्रमा के समान शोभा पा रहे थे। शरशैय्या पर पड़े ही पड़े वे हाथ जोड़कर पवित्र भाव से श्रीकृष्ण का ध्यान करने लगे। ध्यान करते _करते अत्यन्त हर्ष से भर गये। उनके कण्ठ का स्वर स्पष्ट सुनाई देने लगा। वे संसार के स्वामी योगेश्वर भगवान् वासुदेव की स्तुति करने लगे।भीष्म जी बोले_मैं श्रीकृष्ण के अराधना की इच्छा से जिस वाणी का प्रयोग करना चाहता हूं, वह विस्तृत हो या संक्षिप्त, उसे सुनकर वे पुरुषोत्तम मुझपर प्रसन्न हों। जो स्वत: शुद्ध है, जिनकी प्राप्ति का मार्ग भी सर्वथा शुद्ध है, जो सबसे विलक्षण हंस स्वरूप है और प्रथाओं का पालन करनेवाले परमेष्ठी हैं, उन परमात्मा की मैं शरण लेता हूं। संपूर्ण जड़ता को धारण करनेवाले श्रीहरि परब्रह्म परमात्मा हैं, उनका न आदि है न अंत। उन्हें न देवता जान पाते हैं न ऋषि। एकमात्र ये नारायण ही सबको जानते हैं। नारायण से ही ऋषि प्रकट हुए हैं, सिद्धों और बड़े _बड़े नागों का भी उन्हीं से प्रादुर्भाव हुआ है। देवता और देवर्षि भी उनके विषय में इतना ही जानते हैं कि वे अविनाशी परमात्मा हैं। किन्तु वे भगवान नारायण कौन हैं, कहां से आये हैं_इन बातों का यथार्थ ज्ञान देव, राक्षस और सर्पों में से किसी को नहीं है। उन्हीं में संपूर्ण प्राणी स्थित होते हैं और उन्हीं में उनका लक्ष्य होता है। जैसे गोरे के मन के पिरोते होते हैं, उसी प्रकार उन भूतेश्वर परमात्मा में संपूर्ण त्रिगुणात्मक गुण पिरोते हुए हैं। भगवान् कभी नष्ट न होनेवाले एक तने हुए लम्बे सूत के समान हैं; उनमें यह कार्य_कारणरूप जगत् उसी प्रकार गुंथा हुआ है, जैसे सूत में माला। संपूर्ण विश्व उन्हीं के आधार पर टिका हुआ है, यह उन्हीं की रचना है। उन श्रीहरि के हजारों मस्तक, हजारों पैर तथा हजारों नेत्र हैं; हजारों भुजाओं, हजारों मुकुटों तथा हजारों मुखों से देदीप्यमान रहते हैं। वे ही इस जगत् के परम अनिल हैं, उन्हीं को नारायन कहते हैं।वे सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और स्थूल से भी स्थूल हैं, भारी से भी भारी और उत्तम से भी उत्तम हैं। वाक् और अनुवादकों में ( मंत्र और ब्राह्मणों में ) तथा कर्म और ब्रह्म का प्रतिपादन करनेवाले वाक्यों में जिस सत्य का प्रतिपादन किया गया है, वह सत्कर्मा भगवान् वासुदेव ही हैं; वे ही 'साम' संज्ञक ऋचाओं के परमार्थ तत्व हैं। विशुद्ध अंत:करण में उनका नित्य निवास ( साक्षात्कार ) होता है, वे अपने भक्तों का सदा पालन करते रहते हैं। श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध_इन चार स्वरूपों में वे ही प्रकट होते हैं और भक्तजन उन चार दिव्य नामों से उन्हीं की पूजा किया करते हैं। भगवान् वासुदेव की ही प्रसन्नता के लिये नित्य जप ( नैत्विक कर्म ) का अनुष्ठान किया जाता है, वे ही सके भीतर विराजमान हैं। वे सबके आत्मा, सबको जाननेवाले, सर्वस्वरूप एवं सबको उत्पन्न करनेवाले हैं।
जैसे करती अग्नि प्रकट करती है, उसी प्रकार देवकी देवी ने इस भूमण्डल पर रहनेवाले ब्राह्मणों, वेदों और वेदों की रक्षा के लिये जिन्हें वसुदेव के समान से प्रकट किया था, संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर अनन्य भाव से स्थित रहनेवाला साधक मोक्ष के उद्देश्य से अपने विशुद्ध अंत:करण में जिन शुद्ध_शुद्ध आत्मारूप गोविन्द का ज्ञानदृष्टि साक्षात्कार करता है, जिनका पराक्रम इन्द्र और वायु से बहुत बढ़कर है, जिनके तेजके सामने सूर्य की कोई हस्ती नहीं है और जिनके स्वरूप तक मनुष्य के मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों की पहुंच नहीं हो पाती, उन प्रजापालन परमेश्वर की मैं शरण लेता हूं।
पुराणों में जिनका ' पुरुष ' नाम से वर्णन किया गया है, जो युगों के आरम्भ में ' ब्रह्म' और युगान्त के समय 'संकर्षण' कहे गये हैं, उन उपासनीय परमेश्वर की मैं उपासना करता हूं। जो एक होकर भी अनेक रूपों में प्रकट हुए हैं, समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं, यज्ञादि कर्मों में लगे हुए अनन्य भक्त जिन परमात्मा का मंजन करते हैं, जिन्हें संसार का कोषागार कहते हैं, जिनमें ही संपूर्ण प्रजाएं स्थित हैं, पानी के ऊपर जल_पक्षियों की तरह जिनके ही ऊपर इस संपूर्ण जगत् की चेष्टाएं हो रही हैं, जो परमार्थ सत्य-स्वरूप और एकाक्षर ब्रह्म ( प्रणव ) हैं, सत् और असत् से विलक्षण हैं, जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जिन्हें न देवता ठीक_ठीक जानते हैं न ऋषि, अपने मन और इन्द्रियों को वशीभूत करके संपूर्ण देवता, असुर, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि तथा नारायण जिनकी सर्वथा पूजा किया करते हैं, जो संसार रूपी दु:आ से छुड़ाने के लिये सबसे बड़ी औषधि है, जो जन्म, मरण से परे स्वायंभू एवं सनातन देवता हैं तथा इन नेत्रों और बुद्धि की पहुंच से बाहर हैं, उन भगवान् नारायण की मैं शरण लेता हूं। जो इस विश्व के विधाता और चराचर जगत् के स्वामी हैं, जिन्हें संसार का साक्षी तथा अविनाशी परमपद कहते हैं, उन परमात्मा की मैं शरण ग्रहण करता हूं। जो सुवर्ण के समान कान्ति वाले और दैत्यों के संहारक हैं एक होने पर भी जिन्हें अदिति देवी ने अपने गर्भ से बारह आदित्यों के रूप में प्रकट किया, उन पूर्णरूप परमेश्वर को नमस्कार है। जो अपनी अमृतमयी कलाओं से शुक्लपक्ष में देवताओं को और कृष्णपक्ष मे़ख पितरों को तृप्त करते हैं तथा जो संपूर्ण द्विजों के राजा हैं उन चन्द्रमा के रूप में प्रकट हुए परमात्मा को प्रणाम है। जो अज्ञानमय महान अंधकार से भी परे और ज्ञानलोक से अत्यन्त प्रकाशित होनेवाले आत्मा हैं, जिन्हें जान लेने पर मनुष्य मौत के चंगुल से छुट जाता है, उन ज्ञेयरूप परमेश्वर को नमस्कार है। उक्त नामक वृहत् यज्ञ के समय, अग्न्याधान काल में तथा महायाग में ब्राह्मणव्न्द जिनका ब्रह्म के रूप में स्तवन करते हैं, उन वेद भगवान को नमस्कार है। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद जिसके आश्रय हैं, पांच प्रकार का भविष्य जिसका स्वरूप है, गायत्री आदि सात छंद ही जिसके साथ तंतु है, उस वज्र के रूप में प्रकट हुए परमात्मा को प्रणाम है। चार ( आश्रावय ),चार ( अस्तु श्रौषट ), दो ( यज ), पांच (ये यजामहे ), और दो (वषट् ) वाले मंत्रों से जिन्हें भविष्य अर्पण किया जाता है, उन होम स्वरूप परमेश्वर को नमस्कार है। जो 'यजु:' नाम धारण करनेवाले वेदरुपी पुरुष हैं, गायत्री आदि चन्द जिनके हाथ_पैर आदि अवयव हैं, यज्ञ ही जिनका अवयव है, यज्ञ ही जिनका मस्तक है तथा 'रथन्तर' और 'वृहत्' नामक सात ही जिनकी शान्त्वनाभरी वाणी है, उन स्त्रोतरूपी भगवान को प्रणाम है। जो हजार वर्षों में पूर्ण होनेवाले प्रजापतियों के यज्ञ में सोने सोने के पानेवाले पंछी के रूप में प्रकट हुए थे, उन हंसधारीरूप परमेश्वर को प्रणाम है। पदों के समूस्ह जिनके अंग हैं, संधि जिनके शरीर का जोड़ है, स्वर और व्यंजन जिनके आभूषण का काम करते हैं तथा जि,नन्हें दिव्य अक्षर कहते हैं, उन परमेश्वर को वाणी के रूप में नमस्कार है। जिन्होंने तीनों लोकों का हित करने के लिये यज्ञमय बराह का स्वरूप धारण करके इस पृथ्वी को रसातल से ऊपर उठाया था उन वीर्य स्वरूप भगवान को प्रणाम है। जो अपनी योगमाया का आश्रय लेकर शेषनाग के हजार फनों से बने हुए पलंग पर शयन करते हैं, उन निद्रारूप परमात्मा को नमस्कार है। जिनका सारा व्यवहार केवल धर्म के लिये ही है, उन वश में की हुई इन्द्रियों के द्वारा जो मोक्ष के साधन भूत वैदिक उपायों से काम लेकर संतों की धर्म_मर्यादा का प्रसार करते हैं, उन सत्य-स्वरूप परमात्मा को नमस्कार है। जो भिन्न_भिन्न धर्मों का आचरण करके अलग_अलग उनके फल की इच्छा रखते हैं, ऐसे पुरुष पृथक् धर्मों के द्वारा जिनकी पूजा करते हैं, उन धर्ममय भगवान् को प्रणाम है।
 जिस अनंग की प्रेरणा से संपूर्ण अंगधारी प्राणियों का जन्म होता है, जिनसे समस्त जीव उन्मत्त हो उठते हैं, उस काम के रूप में प्रकट हुए परमेश्वर को नमस्कार है। जो स्थूल जगत् में अव्यक्त रूप से विराजमान हैं, बड़े _बड़े महर्षि जिसके तत्व का अनुसंधान करते रहते हैं, जो संपूर्ण क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ के रूप में बैठा हुआ है, उस क्षेत्ररूपी परमात्मा को प्रणाम है। जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं के भेद से त्रिविध प्रतीत होते हैं, गुणों के कार्यभूत सोलह विकारों से आवृत होने पर भी अपने स्वरूप में ही स्थित हैं, सांख्यमत के अनुयायी जिन्हें उक्त सोलह विकारों के साक्षी और उनसे निर्लिप्त सत्रहवां तत्व ( पुरुष ) मानते हैं, उन सांख्य रूप परमात्मा को नमस्कार है। जो नींद को जीतकर प्राणों पर विजय पा चुके है और इन्द्रियों को अपने वश में करके शुद्ध तत्व में स्थित हो गये हैं, वे निरंतर योगाभ्यास में लगे हुए योगीजन समाधि में जिनके ज्योतिर्मय स्वरूप का साक्षात्कार करते हैं, उन योगरूप परमात्मा को प्रणाम है। पाप और पुण्य का क्षय हो जाने पर पुनर्जन्म के भय से मुक्त हुए शान्तचित्त संन्यासी जिन्हें प्राप्त करते हैं, उन मोक्ष रूप परमेश्वर को नमस्कार है। सृष्टि के एक हजार युग बीतने पर प्रचंड ज्वालाओं से युक्त प्रलयकालीन अग्नि का रूप धारण कर जो संपूर्ण प्राणियों का संसार करते हैं, उन उग्ररूप धारी परमात्मा को प्रणाम है।इस प्रकार संपूर्ण भूतों का भक्षण करके जो इस जगत् को जलमय कर देते हैं और स्वयं बच्चे का रूप धारण कर अक्षय वट के पत्ते पर शयन करते हैं, उन मायामय बाल_मुकुन्द को नमस्कार है। जिसपर विश्व टिका हुआ है, वह ब्रह्माण्ड कमल जिन पुण्डरीकाक्ष भगवान् की नाभि से प्रकट हुआ है। उन कमल रूपधारी परमेश्वर को प्रणाम है। जिनके हजारों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामी रूप से सबके भीतर विराजमान हैं, उनका स्वरूप किसी सीमा में आबद्ध नहीं है, जो चारों समुद्रों के मिलने से एकार्णव हो जाने पर योगनिद्रा का आश्रय लेकर शयन करते हैं, उन योगनिद्रा रूप भगवान् को नमस्कार है। जिनके मस्तक के बालों की जगह मेघ हैं, शरीर की संधियों में नदियां हैं और उधर में चारों समुद्र हैं, उन जल रूपी परमात्मा को प्रणाम है। सृष्टि और प्रलय रूप समस्त विकार जिनसे उत्पन्न होते हैं और जिनमें ही सबका लय होता है, उन कार्यरूप परमेश्वर को नमस्कार है। जो रात में भी बैठे होते हैं और दिन के समय साक्षी रूप में स्थित रहते हैं तथा जो सदा ही सबके भले_बुरे को देखते रहते हैं, उन द्रष्टा रूपी परमात्मा को प्रणाम है। जिन्हें कोई भी काम करने में रुकावट नहीं होती, जो धर्म का काम करने को सर्वदा उद्यत रहते हैं तथा जो बैकुण्ठनाथ के स्वरूप हैं, उन कार्यरूप भगवान् को नमस्कार है। जिन्होंने धर्मात्मा होकर भी क्रोध में भरकर धर्म के गौरव का उल्लंघन करनेवाले क्षत्रिय_समाज का युद्ध में इक्कीस बार संसार किया, कठोरता का अभिनय करनेवाले उन भगवान् परशुराम को प्रणाम है। जो प्रत्येक शरीर के भीतर वायु रूप में स्थित हो अपने को प्राण_अपान आदि पांच स्वरूपों में विभक्त करके संपूर्ण प्राणियों को क्रियाशील बनाते हैं, उसने वायु रूप परमेश्वर को नमस्कार है। जो प्रत्येक युग में योगमाया के बल से अवतार धारण करते हैं और मास,ऋतु, अयन तथा वर्षों के द्वारा सृष्टि और प्रलय करते रहते हैं, उन कार्यरूप परमात्मा को प्रणाम है।
इस विश्व की रक्षा करनेवाले परमेश्वर ! आपको प्रणाम है। विश्व_आत्मा और विश्व की उत्पत्ति स्थान भूत परमेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप पांचों भूतों से परे हैं और संपूर्ण प्राणियों के लिये मोक्ष स्वरूप ब्रह्म हैं। तीनों लोकों में व्याप्त हुए आपको नमस्कार है, त्रिभुवन से परे रहनेवाले आपको प्रणाम है, संपूर्ण दिशाओं में परे रहनेवाले आप प्रभु को नमस्कार है। आप सब पदार्थों से पूर्ण भण्डार हैं। संसार की उत्पत्ति करनेवाले अविनाशी भगवान् विष्णु ! आपको नमस्कार है। हृषिकेश ! आप सबके जन्मदाता और संहारकर्ता हैं।आप किसी से पराजित नहीं होते। मैं तीनों लोकों में आपके दिव्य जन्म कर्म का रहस्य नहीं जान पाता, मैं तो तत्व दृष्टि से जो आपका सनातन रूप है, उसी की ओर लक्ष्य रखता हूं। स्वर्ग लोक आपके मस्तक से, पृथ्वी देवी आपके पैरों से और तीन लोक आपके तीन पगों से व्याप्त है, आप सनातन पुरुष हैं। दिशाएं आपकी भुजाएं, सूर्य आपके नेत्र और प्रजापति शुक्राचार्य आपके वीर्य हैं; आपने ही तेजस्वी वायु के रूप से ऊपर के सातों लोकों को व्याप्त कर रखा है। जिनकी कान्ति अलसी के फूल की तरह सांवली है और शरीर पर पीताम्बर शोभा देता है, जो अपने स्वरूप से कभी च्युत नहीं होते, उन भगवान् गोविन्द को जो लोग नमस्कार करते हैं, उन्हें कभी भय नहीं होता। भगवान् श्रीकृष्ण को एक ‌ प्रोबार भी प्रणाम किया जाय तो वह दस अश्वमेघ यज्ञ के अन्त में किये गये स्नान के समान फल देनेवाला होता है। इसके सिवा प्रणाम में एक विशेषता है_दस अश्वमेघ करनेवाले का तो पुनः इस संसार में जन्म होता है, किन्तु श्रीकृष्ण को प्रणाम करनेवाला मनुष्य फिर भवबंधन में नहीं पड़ता। जिन्होंने श्रीकृष्ण भजन का ही व्रत ले रखा है, जो श्रीकृष्ण का निरंतर स्मरण करते हुए रात को सोते हैं और उन्हीं का स्मरण करते हुए सबेरे उठते हैं, वे श्रीकृष्णस्वरूप होकर उनमें इस तरह मिल जाते हैं, जैसे मंत्र पढ़कर हवन किया हुआ घी अग्नि में मिल जाता है।
जो नरक के भय से बचाने के लिये रक्षागृह का निर्माण करनेवाले और संसार रूपी सरिता की भंवर से पार उतारने के लिये काट की नाव के समान है, उन भगवान् विष्णु को नमस्कार है। जो ब्राह्मणों के प्रेमी तथा गौ और ब्राह्मणों के हितकारी हैं, जिनसे समस्त विश्व का कल्याण होता है, उन सच्चिदानंद स्वरूप भगवान गोविन्द को प्रणाम है। 'हरि' ये दो अक्षर दुर्गम पथ में संकट के समय प्राणों के लिये राह_खर्च के समान है, संसार रुपी रोग से छुटकारा दिलाने के लिये औषध के तुल्य है तथा सब प्रकार के दु:ख_शोक से उद्धार करनेवाले हैं। जैसे सत्य विष्णुमय हैं, जैसे सारा संसार विष्णु भय है, उस प्रकार इस सत्य के प्रभाव से मेरे सारे पाप नष्ट हो जायं। देवताओं में श्रेष्ठ कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण ! मैं आपका शरणागत भक्त हूं और अभीष्ट गति को प्राप्त करना चाहता हूं, जिसमें मेरा कल्याण हो, वह आप ही सोचिये। जो विद्या और तप के जन्मस्थान हैं, जिनको दूसरा कोई जन्म देनेवाला नहीं है, उन भगवान् विष्णु का मैंने इस प्रकार वाणी रूप यज्ञ से पूजन किया है। प जइससे हे भगवान् जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों। नारायण ही परम ब्रह्म हैं, नारायण ही परम तप हैं, नारायण ही सबसे बड़े देवता हैं और भगवान् नारायण ही सबकुछ हैं। वैशम्पायनजी कहते हैं_भीष्मजी का मन भगवान् श्रीकृष्ण से लगा हुआ था, उन्होंने ऊपर बतायी हुई स्तुति करने के पश्चात् 'नम: कृष्णाय' कंकर उन्हें प्रणाम किया। भगवान् भी अपने योगबल से भीष्म जी की भक्ति को जानकर अव्यक्त रूप से वहां पहुंचे और उन्हें तीनों लोकों की बातों का बोध करानेवाला दिव्य ज्ञान देकर लौट गये। जब भीष्मजी का बोलना बन्द हो गया तो वहां बैठे हुए ब्राह्मणवादी महर्षियों ने आंखों में आंसू भरकर गद्गद् कण्ठ से श्रीकृष्ण की स्तुति की। फिर वे धीरे_धीरे भीष्म जी की प्रशंसा करने लगे। दूसरे रथ पर महात्मा युधिष्ठिर और अर्जुन जा रहे थे। तीसरे पर भीम, नकुल तथा सहदेव_ ये तीनों भाई सवार थे। कृपाचार्य, युयुत्सु और संजय भी अपने_अपने रथ पर बैठकर भीष्म जी के पास चले। उस समय बहुत _से ब्राह्मण मार्ग में पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति कर रहे थे और भगवान् प्रसन्नतापूर्वक उसे सुनते जा रहे थे। 
कुछ लोग हाथ जोड़कर भगवान् के चरणों में प्रणाम करते थे और उन्हें आनन्दित करते हुए चले जा रहे थे।

Sunday, 28 June 2026

युधिष्ठिर का भगवान् श्रीकृष्ण की आज्ञा से उनके साथ भीष्मजी के पास जाने का विचार

वैशम्पायनजी कहते हैं_इस प्रकार संपूर्ण नगर की प्रजा को संतुष्ट करके वे भगवान् श्रीकृष्ण के पास गये और हाथ जोड़कर खड़े हों गये।उन्होंने देखा भगवान् रत्नों तथा सुवर्ण से भूषित एक बड़े पलंग पर बैठे हुए हैं, उनकी श्यामसुंदर छबि नईलमएघ के समान सुशोभित हो रही है, शरीर से तेज बरस रहा है और उनके अंग_अंग में दिव्य आभूषण शोभा पा रहे हैं। उनका पीताम्बरी श्याम विग्रह स्वर्णजड़ित नीलम के समान जान पड़ता है। वक्ष:स्थल पर कौस्तुभ मणि चमक रही है।इस मनोहर झांकी की तीनों लोकों में कहीं भी उपमा नहीं है। दर्शन के पश्चात् भगवान् के निकट पहुंचकर राजा युधिष्ठिर मुस्कराते हुए बोले_'भगवन् ! आपही कईज्ञकऋपआ से हमने राज्य पाया है, आपही की दया से हम विजयी हुए और धर्म से भ्रष्ट नहीं होने पाये।'इस प्रकार राजा ने की बातें कहीं, पर भगवान् ने उनका कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वे उस समय ध्यानमग्न हो रहे थे। उनको इस स्थिति में देखकर युधिष्ठिर ने कहा_'भगवन् ! यह क्या, आप किसी का ध्यान कर रहे हैं ?यह तो बड़े आश्चर्य की बात है ! माधव ! आपके रोंगटे खड़े हो गये हैं, शरीर जरा भी हिलता नहीं, बुद्धि तथा मन स्थिर है। आपका यह विग्रह काट, दीवार और पत्थर की तरह निश्चेष्ट हो रहा है, हिल_डुल नहीं रहा है। जहां हवा नहीं है, उस स्थान में जैसे दीपक लौ कांपती नहीं, एकत्र जलती रहती है, उसी तरह आप स्थिर हैं, मानो पाषाण मूर्ति हों।यदि मैं सुनने का अधिकारी होऊं ओर यह मुझसे छिपाने की बात ज्ञान हो, तो आप मेरे संदेह को दूर कीजिये। मैं आपकी शरण में आकर बार-बार याचना करता हूं। पुरुषोत्तम ! आप ही इस जगत् को बनाने और बिगाड़नेवाले हैं, आप ही क्षर और अक्षर पुरुष हैं, आपका न आदिदि है न अंत। आप सबके आदि कारण हैं।मैं आपका शरणागत भक्त हूं और माता टेककर आपके चरणों में प्रणाम करता हूं; आप मुझे इस ज्ञान का रहस्य बता दीजिये।'युधिष्ठिर की प्रार्थना सुनकर मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों को अपन_अपने स्थान पर स्थापित करके भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए बोले_'भैया ! बाण_शैय्या पर पड़े हुए भीष्मजी मेरा ध्यान कर रहे हैं, इसलिये मेरा भी मन उनमें लग गया है।भगवती गंगा ने जिन्हें विधिवत् अपने गर्भ में धारण किया, जिन्होंने महर्षि वशिष्ठजी से शिक्षा पायी, जो संपूर्ण दिव्यास्त्रों तथा अंगों सहित चारों वेदों के ज्ञाता हैं संपूर्ण विद्याओं के आधार हैं, भूत, भविष्य और वर्तमान जिनकी दृष्टि के सामने है, उन धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भीष्मजी के पास इस समय मैं मन_ही_मन पहुंच गया था।श्रेष्ठ भीष्मजी के स्वर्गवासी हो जाने पर यह पृथ्वी अमावस्या के रात के समान श्रीहीन हो जायगी। इसलिये आप गंगा नन्दन भीष्मजी के पास चलकर उनके चरणों में प्रणाम कीजिये और आपके मन में जितने संदेह हैं, उन सबको उनसे पूछिये।कौरव वंश का भार संभालनेवाले भीष्मरूपी सूर्य जिस समय अस्त हो जायेंगे, उस समय सब प्रकार के ज्ञानों का प्रकाश नष्ट हो जायगा; इसलिये मैं आपको वहां चलने के लिये कहता हूं।भगवान् श्रीकृष्ण की यथार्थ बातें सुनकर युधिष्ठिर का गला भर आया, वे नेत्रों से आंसू बहाते हुए कहने लगे_माधव ! आप भीष्मजी का जैसा प्रभाव बतला रहे हैं, वह सब ठीक है, उनमें संदेह के लिये गुंजाइश नहीं है।मुझे भी उनका प्रभाव मालूम है। उनके महान् प्रभाव और सौभाग्य के विषय में मैंने की महात्मा ब्राह्मणों की बातें सुनी हैं। आप तो संपूर्ण जगत् के विधाता ही हैं; आप जो कुछ कहा रहे हैं, उसमें अन्यथा विचार करने की आवश्यकता नहीं है। भगवन् ! यदि आप मुझपर अनुग्रह करना चाहते हो तो आपको ही आगे करके हमलोग भीष्मजी के पास चलने का विचार करते हैं। सूर्य के उत्तरायण होते ही वे देवलोक में चले जायेंगे, इसलिये अब उन्हें भी आपका दर्शन मिलना ही चाहिये।' धर्मराज की बात सुनकर मधुसूदन ने पास ही बैठे हुए सात्यकि से कहा_'तुम रथ तैयार कराओ।' आज्ञा पाकर सात्यकि शिविर से बाहर निकले और दारुका से बोले_भगवान् श्रीकृष्ण का रथ जोतकर लाओ। सात्यकि के कथनानुसार दारुक ने रथ जोतकर तैयार किया। भगवान् के उस रथ में सब ओर होना जड़ा हुआ था, उसका भीतरी भाग नाना प्रकार की अद्भुत मणियों से सजाया गया था। सूर्य की किरणों के पड़ने से उसकी आभा अत्यन्त उद्दीप्त हो रही थी। उसमें शैब्य और सुग्रीव आदि घोड़े जुते हुए थे। इस प्रकार रथ तैयार करके दारुका भगवान् के पास गया और हाथ जोड़कर उसने उनको इस बात की इत्तिला की।

Tuesday, 2 June 2026

युधिष्ठिर द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति, भाइयों और कुटुम्बियों का सत्कार तथा नाना प्रकार के दान

वैशम्पायनजी कहते हैं_युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो जाने पर वे भगवान् श्रीकृष्ण से हाथ जोड़कर बोले_भगवन् ! आपकी ही कृपा, नीति, बल बुद्धि और पराक्रम से मुझे अपने बाप_दादों का यह राज्य प्राप्त हुआ है।कमललोचन ! मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं। पवित्र अंत:कर्ण वाले ब्राह्मण आपकी अनेकों नामों द्वारा युति किया करते हैं। यह संपूर्ण विश्व आपकी लीला है, आपही से इसकी उत्पत्ति हुई है और डंडाआप ही इसके आत्मा हैं; आपको सादर नमस्कार है। आप सर्वत्र व्यापक विष्णु और विजयी होने से  'जिष्णु' कहलाते हैं। हरे ! आपही सच्चिदानंद स्वरूप श्रीकृष्ण, विकुण्ठधाम के अधिपति वैकुण्ठ और क्षर_अक्षर पुरुष से उत्तम पुरुषोत्तम हैं। आप पुराण पुरुष परमात्मा ने ही सात बार अदिति के गर्भ से अवतार लिया है।  (आदित्य और वामन के रूप में दो बार साक्षात् अदिति के गर्भ से और और पृश्रिगर्भ, परशुराम, श्रीराम, बलराम और श्रीकृष्ण के रूप में पांच बार उनके जन्मांतर्गत पृश्रि आदि अन्य रूपों के गर्भ से यहां भगवान के प्राकट्य की बात कही गयी है )।आप ही पृश्रिगर्भ के नाम से प्रसिद्ध हैं।विद्वान लोग तीनों युगों में प्रगट होने के कारण आपको त्रियुग कहते हैं। आपकी कीर्ति बहुत पवित्र है, आप इन्द्रियों के प्रेरक और यज्ञस्वरूप हैं। आप हंस ( शुद्ध आत्मा ) कहलाते हैं।तीन नेत्रों वाले भगवान् शंकर और आप एक ही हैं। आप ही विभु तथा दामोदर हैं। बराह, अग्नि, बऋहद्भआनउ ( सूर्य ), वृषभ् ( धर्म ), गरुड़ध्वज, अनईकसआह ( शत्रु सेना का वेग सह सकनेवाले ) पुरुष ( अन्तर्यामी ), विशिष्ट, यज्ञ मूर्ति और उरउक्रम ( दामन ) आदि आपही के नाम हैं। आप सबसे श्रेष्ठ और उग्रसेनापति हैं। सत्य-स्वरूप, अन्नदाता तथा स्वामी कार्तिकेय भी आपही हैं। आप रण से स्वयं कभी विचलित न होकर शत्रुओं को पीछे हटानेवाले हैं। वैदिक संस्कारों से युक्त द्विज और  द्विजेत्तर मनुष्य भी आपही के स्वरूप हैं। आप ही कामनाओं की वर्षा करनेवाले वृष ( धर्म ) हैं। कृष्ण धर्म ( यज्ञस्वरूप ), वऋषदर्भ ( इन्द्र का दर्पण दलन करनेवाले ) और वृषाकपि ( हरि_हर ) भी आप ही हैं। आपही सिंधु ( समुद्र ), निर्गुण परमात्मा तथा सूर्य, चन्द्र एवं अग्निरूप त्रिविध तेज हैं; ऊपर, नीचे और मध्य_ ये तीन दिशाएं भी आप ही हैं। आपने अपने बैकुंठधाम से आकर इस पृथ्वी पर अवतार धारण किया है। आप सम्राट, विराट्, स्वराट् और देवराज इन्द्र हैं। यह संसार आपही से प्रकट हुआ है। आप सर्वत्र व्यापक, नित्य, सत्तारूढ़ और निराकार परमात्मा हैं। आप ही कृष्ण ( सबको अपनी ओर खींचने वाले ) और कृष्णवतर्मा  ( अग्नि ) हैं। आपही को लोग अभइष्ठसआधक, अश्विनीकुमारों के पिता, कपिल मुनि, वामोन, यज्ञ, ध्रुव, गरुड़ तथा यज्ञसेन कहते हैं। आपही जलनिधि समुद्र, ब्रह्मा, पवित्र धाम तथा धाम के ज्ञाता हैं। केशव ! विद्वान पुरुष आपको ही हिरण्यगर्भ तथा स्वधा, स्वाहा आदि नामों से पुकारते हैं ! कृष्ण ! आप ही इस जगत् के आदि कारण हैं। आप ही इसकी सृष्टि करते हैं और आपही में इसका प्रलय होता है। विश्वेष! यह संपूर्ण विश्व आपके ही अधीन है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले परमात्मने ! आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।'इस प्रकार धर्मराज ने जब सभा में भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति की तो उन्होंने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा युधिष्ठिर का अभिनन्दन के श कुछ किया।
तदनन्तर राजा ने दरबार में आये हुए प्रियजनों को विदा कर दिया। वे सब लोग उनकी आज्ञा से अपने_अपने घर चले गये। इसके बाद युधिष्ठिर ने भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव को सान्त्वना देते हुए कहा_'प्रिय बन्धुओं। गत महासमर में शत्रुओं ने नाना प्रकार के अस्त्र_शस्त्रों का प्रहार करके तुम्हारे शरीर को बहुत घायल कर दिया है। इससे तुम बहुत तक गये हों और विशेष कष्ट उठा रहे हैं; अतः अब जाकर प्रसन्नता के साथ आराम करो। विश्राम के नश्तर जब तुम्हारा चित्त स्वस्थ हो जायगा, तो फिर कल मैं तुम लोगों से मिलूंगा।' तत्पश्चात् राजा धृतराष्ट्र की आज्ञा से युधिष्ठिर ने दुर्योधन का महल भीमसेन को अर्पण किया। उसमें बहुत _सी अट्टालिएं शोभा दे रही थीं, वहां रत्नों का भण्डार भरा था और बहुत _सी दास_दासियां सेवा के लिये प्रस्तुत थीं। महाबाहु भीम उस महल में चले गये। दूर्योधन का राजमहल जैसा सजा हुआ था , वैसा ही दुमहाबाहु भीम उस महल में चले गये। दूर्योधन का राजमहल जैसा सजा हुआ था , वैसा ही दु:शासन का भी था। उसमें भी प्रसाद मालाएं एवं शोभा पा रही थीं। वह भवन सोने की बन्दनवारों से सजाया गया था, धन_धान्य और दास_दासियों से भरपूर था। राजा की आज्ञा से वह महाबाहु अर्जुन को मिला। दुर्मर्षण का महल तो दु:शासन से भी सुन्दर था। वह सोने और मणियों से सजा होने के कारण कुबेर के राजभवन को भी मात करता था। उसे धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने नकुल को दिया। दुर्मुख का स्वर्णमण्डित महल भी कम सुन्दर नहीं था, वह सहदेव को दिया गया। युयुत्सु,विदुर, संजय, सुधर्मा और धौम्य_ये लोग अपने_अपने पहले के के ही स्थानों में जाकर विराजमान हुए। भगवान् श्रीकृष्ण सात्यकि को साथ लेकर अर्जुन के महल में चले गये। इस प्रकार सब राजाओं ने अपने_अपने स्थान पर खान_पान करके बड़ी प्रसन्नता के साथ रात व्यतीत की और फिर सवेरे उठकर सब राजा युधिष्ठिर की सेवा में उपस्थित हो गये। जनमेजय ने पूछा_विप्रवर ! राजा युधिष्ठिर ने राज्य पाने के पश्चात् और जो_जो कार्य किये हैं, उन्हें बताइये। साथ ही त्रिभुवन गुरु भगवान् श्रीकृष्ण के चरित्रों का भी वर्णन कीजिये। वैशम्पायनजी ने कहा_राजन् ! कुन्तिनन्दन युधिष्ठिर ने राज्य प्राप्त करने के बाद सबसे पहले चारों वर्णों को योग्यता के अनुसार अपने_अपने कर्तव्य पर स्थिर किया। फिर हजारों स्नातक ब्राह्मणों में से प्रत्येक को पद उन्होंने एक_एक स्वर्णमुद्राएं दान दीं। इसके सिवा, जिनकी जीविका का भार उन्हीं के ऊपर था उन भृत्यों, शरणागतों तथा अतिथियों को इच्छानुसार वस्तुएं देकर संतुष्ट किया। गरीबों और सवाल करनेवालों की भी कामनाएं पूर्ण कईं। अपने पुरोहित धौम्य मुनि को उन्होंने हजारों गौएं, धन, सुवर्ण, चांदी तथा नाना प्रकार के वस्त्र दान किये। कृपाचार्य का गुरु की भांति पूजन किया और विदुरजी का पूज्य की भांति सम्मान किया। फिर अपने आश्रितों को खाने_पीने की वस्तुएं, नाना प्रकार के वस्त्र, शय्या और आसन देकर प्रसन्न किया। इसी प्रकार उन्होंने राजा धृतराष्ट्र और उनके पुत्र युयुत्सु का भी विशेष सत्कार किया। धृतराष्ट्र, गांधारी तथा विदुरजी की सेवा में अपना सारा राज्य ही निवेदन करके युधिष्ठिर बड़े निश्चिंत और सुखी हो गये।

Monday, 4 May 2026

महाराज युधिष्ठिर का अभिषेक, उनकी राजव्यवस्था तथा उनके द्वारा संबंधियों के श्राद्ध

वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! अब महाराज ककंयुधिष्ठिर रोष और संताप से मुक्त होकर पूर्व की ओर मुख करके सुवर्ण के सुंदर सिंहासन पर विराजमान हुए। उन्हीं की ओर मुख करके एक चमचमाते हुए सोने के सिंहासन पर सात्यकि और श्रीकृष्ण बैठे तथा महाराज के दोनों ओर दो मणिमय पीठों पर भीमसेन और अर्जुन सुशोभित हुए। एक ओर हाथीदांत के आसन पर नकुल और सहदेव के सहित माता कुन्ती बैठीं। इसी प्रकार कौरवों के पुरोहित सुधर्मा, विदुर, धौम्य और कुरुराज धृतराष्ट्र भी अलग_अलग सुंदर सिंहासन पर विराजमान हुए। जहां महाराज धृतराष्ट्र थे उधर ही युयुत्सु, सृंजय और गांधारी ने भी आसन लगाया। महाराज युधिष्ठिर ने सिंहासन पर बैठकर श्वेत पुष्प, अक्षत, भूमि, सुवर्ण, रजत और मणियों को स्पर्श किया। सिंहासन के पास मृत्तिका, सुवर्ण, तरह_तरह के रत्न, सवौंषध से युक्त अभिषेक के पात्र, जल से भरे हुए तांबे, चांदी और मिट्टी के बर्तन, पुष्प, राजा, धान, गोरष, शमी, पीपल और पलाश की समिधाएं, मधु, धृत, गूलर का स्त्रुवा और शंख_यह सब सामग्री एकत्रित की गयी।
फिर श्रीकृष्ण की आज्ञा से पुरोहित धौम्य ने पूर्व और उत्तर के कोण में नीचे स्थान कर शास्त्रोक्त विधि से वेदी बनायी। इसके बाद सर्वतओभद्र आसन पर महाराज युधिष्ठिर और द्रौपदी को बैठाकर उनसे वेद के मंत्रों द्वारा विधिपूर्वक हवन कराया।अब भगवान् श्रीकृष्ण को खड़े हुए और उन्होंने पांचजन्य शंख में जल भरकर धर्मराज का अभिषेक किया। फिर उन्हीं के कहने से राजर्षि धृतराष्ट्र तथा सब दरबारियों ने भी पांचजन्य के द्वारा ही उनको अभिषिक्त किया।अभिषेक होते ही नक्कारों और नीतियों का शब्द होने लगा। महाराज ने धर्मानुसार प्रजा की सब भेंटें स्वीकार कईं और उसे बहुत _से पुरस्कार देकर सम्मानित किया। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर उन्हें हजारों मुहरें दक्षिणा में दीं। ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर उन्हें 'मंगल हो' जय हो' ऐसा कहकर आशीर्वाद दिया। फिर उन्होंने महाराज की प्रशंसा करते हुए कहा, 'राजन् ! बड़े भाग्य की बात है आपको विजय प्राप्त हुई। आप अपने पराक्रम से धर्म की रक्षा करने में समर्थ हुए। यह प्रजा का सौभाग्य ही था कि आप, भीमसेन और अर्जुन और नकुल_सहदेव अबतक सकुशल रहे। अब आप शीघ्र ही भावी कार्यक्रम को अपने हाथ में लें। इसके बाद समागम सज्जनों ने धर्मराज युधिष्ठिर का सत्कार किया और उन्होंने अपने संबंधियों के सहयोग से उस विशाल साम्राज्य का भार अपने हाथों में ले लिया। प्रजा के अभिनन्दन का उत्तर देते हुए महाराज युधिष्ठिर ने कहा, 'महाराज धृतराष्ट्र मेरे पिता हैं। हमारे लिये ये इष्टदेव के समान हैं। जो लोग मेरा प्रिय करना चाहें, उन्हें इनकी आज्ञा में रहना चाहिये और इन्हें जो कुछ अच्छा लगे, वहीं करना चाहिये। मेरा भी प्रदान कर्तव्य सर्वदा सावधानी से इनकी सेवा करना ही है। यदि आपलोग मेरे ऊपर कोई कृपा करना चाहते हैं तो मैं यही भिक्षा मांगता हूं कि इनके प्रति पहले के ही समान सम्मान का भाव रखें। मेरे, आपके और सारी पृथ्वी के स्वामी ये ही हैं। ये सारा राष्ट्र और पाण्डवलोग इन्हीं के हैं। आप सब लोग मेरी यह मेरी यह प्रार्थना हृदय से स्वीकार करें। इसके बाद कुरुराज युधिष्ठिर ने सभी पुरवासी और देशवासियों को विदा किया तथा भीमसेन को युवराज बनाया। महामति विदुरजी को राजकाज संबंधी सलाह देने का, निश्चय करने का तथा संधि, विग्रह, प्रस्थान, स्थिति, आश्रय और द्वैधीभाव_ इन छ: बातों को निर्णय करने का अधिकार सौंपा। क्या काम करना है और क्या नहीं करना_ इसका विचार तथा आय_व्यय का निश्चय करने के कर्म पर उन्होंने सर्वगुण सम्पन्न वयोवृद्ध संजय को नियुक्त किया। सेना की गणना करना, उसे भोजन और वेतन देना तथा उसके काम की देखभाल करना उन्होंने नकुल के जिम्मे किया। शत्रु के देश पर चढ़ाई करने या दुष्टों के दमन करने के काम पर अर्जुन की नियुक्ति की। ब्राह्मण और देवताओं के काम पर तथा पुरोहिती के दूसरे कामों पर महर्षि धौम्य नियुक्त हुए। सहदेव को अपने साथ रखा। उनको सब समय राजा की रक्षा का काम सौंपा गया। राजा ने जिन_जिन लोगों को जिस_जिस काम के योग्य समझा, उन सबको उसी_उसी कार्य पर नियुक्त किया। उन्होंने विदुर, संजय और युयुत्सु से कहा_'आप सब। लोग सदा सावथान रहकर प्रतिदिन मेरे इस वृद्ध पिता राजा धृतराष्ट्र की सेवा करें। इनका जो भी काम हो, उसे ठीक _ठीक पूरा करना चाहिये। इस नगर और प्रान्त में रहनेवाले लोगों के भी जो कुछ कार्य हैं, उन्हें इन्हीं महाराज की आज्ञा लेकर पूर्ण करना चाहिये।' वैशम्पायनजी कहते हैं_तदनन्तर राजा युधिष्ठिर ने युद्ध में मरे हुए अपने कुटुम्बियों के अलग_अलग श्राद्ध करवाये। धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों के श्राद्ध में अन्न, धन, गौएं तथा बहुमूल्य रत्न दान दिये स्वयं राजा युधिष्ठिर ने द्रौपदी को साथ लेकर द्रोण, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, घतोत्कच, विराट आदि मित्र राजाओं तथा द्रुपद एवं द्रौपदी कुमारों का श्राद्ध किया। प्रत्येक के उद्देश्य से उन्होंने हजारों ब्राह्मणों को अलग_अलग धन, रत्न, गौ एवं वस्त्र देकर संतुष्ट किया। इसके सिवा जिन राजाओं के कोई पुत्र आदि संबंधी जीवित नहीं थे, उनका भी श्राद्ध सम्पन्न किया।अपने हितैषी संबंधियों के उद्देश्य से उन्होंने अनेकों धर्मशाला एवं, प्राचीर तथा पोखरे बनवाये।  धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर तथा अन्य आदरणीय कौरवों की वे पहले की ही भांति सेवा करते और श्रेष्ठ भृत्यों का सम्मान भी किया करते थे। जिनके पति और पुत्र रणभूमि में मारे गये थे, कुरुवंश की संपूर्ण स्त्रियों को वे बड़े सम्मान के साथ रखते दयालु स्वभाव होने के कारण उनके भरण_पोषण का सदा ख्याल रखते थे।दीन_दु:खियों, अंधों तथा अनाथों के रहने के लिये घर बनवाने और उन्हें भोजन एवं वस्त्र की भी सहायता देते थे। सबके साथ कोमलता का वर्ताव करते हुए वे सबके ऊपर कृपा रखते थे।

Tuesday, 7 April 2026

व्यासजी और भगवान् श्रीकृष्ण की सलाह से महाराज युधिष्ठिर का हस्तिनापुर में आना

राजा युधिष्ठिर ने पूछा _'मुनिवर ! मैं राजाओं के और चारों वर्णों के धर्मों को विस्तार से सुनना चाहता हूं। कृपया बताइए कि आपत्ति के समय इन्हें किस नीति से काम लेना चाहिये। आपने प्रायश्चितों के विषय में मुझे जो कुछ सुनाया है, उससे मुझे बड़ा हर्ष हो रहा है। व्यासजी बोले_युधिष्ठिर ! यदि तुम धर्म का पूरा_पूरा रहस्य सुनना चाहते हो तो कुरुवृद्ध पितामह भीष्म के पास जाओ। वे गंगाजी के पुत्र सर्वज्ञ और सब प्रकार के धर्म का मर्म जाननेवाले हैं; इसलिये धर्म के विषय में तुम्हारे मन में जितनी शंकाएं हैं, उन सभी का समाधान कर देंगे। जिस धर्मशास्र को शुक्राचार्य और देवगुरु बृहस्पतिजी जानते हैं, उसी को कुरुश्रेष्ठ भीष्मजी ने शुक्राचार्य और च्वणजई से पूरे विवरण के साथ प्राप्त किया है। उन्होंने ब्रह्मचर्यव्रत की दीक्षा लेकर वशिष्ठजी से अंगोपांग सहित वेदों का अध्ययन किया है, ब्रह्माजी के ज्येष्ठ पुत्र परम तेजस्वी सनत्कुमारजी से आध्यात्म विद्या पायी है, मार्कण्डेयजी से पूर्णतया यतइधर्म सीखा है और परशुरामजी और इन्द्र से अस्त्र विद्या पायी है। मनुष्यों में उत्पन्न होकर भी मृत्यु को उन्होंने इच्छा के अधीन कर लिया है। पवित्र चरित्र ब्रह्मर्षि गण उनके सभासद थे। जब कभी ज्ञानयज्ञ होते थे तो उनमें ऐसी कोई बात नहीं होती थी, जिसे वे न जानते हों। वे धर्म और अर्थ का सूक्ष्म तत्व जानते हैं, वे ही तुम्हें धर्म का उपदेश देंगे। अब कुछ ही समय में वे प्राण छोड़नेवाले हैं। अतः तुम उनके प्राण परित्याग के पहले ही उनके पास पहुंच जाओ। युधिष्ठिर बोले_भगवन् ! मैंने तो अपने बंधु_बान्धवों का बड़ा भीषण और रोमांचकारी संहार किया है। मैं सब लोकों का अपराधी और पृथ्वी का सत्यानाश करनेवाला हूं। यही नहीं, वे सदा ही निष्कपट भाव से युद्ध करते रहे हैं, किन्तु मैंने छल से उनका संहार किया है। ऐसी स्थिति में मैं किस प्रकार उन्हें अपना मुंह दिखा सकता हूं ? वैशम्पायनजी कहते हैं_राजा युधिष्ठिर की यह बात सुनने पर यदुश्रेष्ठ हम श्रीकृष्ण ने चारों वर्णों के हित की कामना से उनसे कहा_'नृपश्रेष्ठ ! अब आप शोक को ही न पकड़े रहें। भगवान् व्यास जैसा कह रहे हैं, वैसा ही करें। ये अतुलित तेजस्वी आपके गुरु के समान हैं; इनकी आज्ञा मानकर आप ब्राह्मणों का, अपने सुहृद् हमलोगों का, द्रौपदी का और संपूर्ण लोकों का हित करें।' श्रीकृष्ण के इस प्रकार कहने पर महामना महाराज युधिष्ठिर सब लोकों के हित के लिये अपने आसन से उठे। वे वेद, उपनिषद्, मीमांसा और नीति आदि सभी शास्त्रों में पारंगत थे। इस समय अपना कर्तव्य निश्चय करके उन्हें बड़ी शान्ति मिली। उन्होंने महाराज धृतराष्ट्र को आगे किया और श्रीकृष्ण आदि सब बन्धु_बां्धवों के साथ हस्तिनापुर में आये। नगर में प्रवेश करते समय उन्होंने देवताओं का तथा हजारों ब्राह्मणों का पूजन किया। वे सफेद रंग के चौदह बैलों से जीते हुए एक नवीन रथ में सवार हुए। वह वस्त्र ऊनी वस्त्र और चमड़े से मंढ़ा हुआ था तथा श्वेत वर्ण का था। उस समय महापराक्रमी कुन्तिनन्दन भीम ने बैलों की बागडोर संभाली, अर्जुन ने कांतिमान् श्वेत छत्र लिया तथा माद्री नन्दन नकुल और सहदेव चंवर और पंखा डुलाने लगे। इस प्रकार जब पांचों भाई सज_धज के साथ रथ पर सवार हुए तो ऐसे मालूम होते ये पांचों भूत ही मूर्तिमान् होकर इ,कट्ठे हो गये हैं। महाराज युधिष्ठिर के पीछे एक रथ पर युयुत्सु चला। इन कौरव और पाण्डवों के बाद शैव्य और सुग्रीव नाम के घोड़ों से जीते हुए एक सुवर्णमय रथ पर चढ़कर सात्यकि के सहित भगवान् श्रीकृष्ण चल रहे थे। धर्मराज के आगे एक पालकी में उनके ज्येष्ठ पितव्य महाराज धृतराष्ट्र गांधारी के साथ जा रहे थे। इन सबके पीछे कुन्ती और द्रौपदी आदि कुरुकुल की स्त्रियां अपनी_अपनी योग्यता के अनुसार सवारियों पर चढ़कर चल रही थीं।
 इनकी देखभाल में विदुरजी थे, वे इनके पीछे चल रहे थे। उनके पीछे सब प्रकार से साज_बाज से सुसज्जित अनेकों रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदलों की पलटन थी। इस प्रकार सूत, मागध और वैतालिकों से स्तुति सुनते हुए महाराज युधिष्ठिर ने नगर में प्रवेश किया। उनकी यह सवारी संसार में अनुपम थी। जिस समय हस्तिनापुर में धर्मराज की सवारी निकली, वहां के नागरिकों ने सारे नगर और राजमार्गो को खूब सजाया था। सड़कों पर सफेद रंग के फूल बिखरे हुए थे, अनेकों ध्वजा पताकाएं लगायी गयी थीं और उन्हें अच्छी तरह से साफ करके धूप से सुगंधित किया गया था। राजमहल को सुगंधित द्रव्यों के चूरे से, तरह_तरह के पुष्पों से और पुष्पों से और पुष्पों की वन्दनवारों से छा दिया गया था। नगर के द्वार पर जल से भरे हुए नवीन कलश रखें हुए थे तथा जहां_तहां श्वेत _वर्ण के फूलों के गुच्छे लगाये गये थे। सब ओर से सउमनओहर स्तुति वाक्य सुनायी पड़ रहे थे। इस प्रकार अपने सुहृदों के साथ महाराज युधिष्ठिर ने खूब सजे_धजे हस्तिनापुर में प्रवेश किया। पाण्डवों के पुरप्रवेश के समय सहस्त्रों पुरवासी उन्हें देखने के लिये इकट्ठे हो गये। उस समय अनेकों पुरनारियां पांचों भाइयों की प्रशंसा कर रही थीं। वे लज्जावश धीरे_धीरे कहने लगी, 'पांचालकुमारी ! तुम धन्य हो, जो तुम्हें इस पुरुष श्रेष्ठों की सेवा का सुअवसर प्राप्त हुआ है। तुम्हारे सभी पुण्यकर्म और व्रत सफल हैं।' उनके ऐसे प्रशंसा वाक्यों से और आपस के प्रेम आलाप से उस समय सारा नगर गूंज रहा था। इस प्रकार महाराज युधिष्ठिर धीरे_धीरे राजमार्ग से निकलकर महल के द्वार पर आये। तब सब दरबारी, नगर निवासी और देश के लोग उनके सामने आये और प्रणाम करके तरह_ तरह की कानों को अच्छी लगनेवाली बातें कहने लगे। वे बोले, महाराज ! बड़े सौभाग्य की बात है कि आपने धर्म के बल के प्रभाव से पुनः अपना खोया हुआ राज्य पा लिया है। आप सौ वर्ष तक हमारे राजा रहें और धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करें। इस प्रकार राजद्वार पर मांगलिक वचनों से उनका सभी ने सत्कार किया तथा ब्राह्मणों ने भी आशीर्वाद दिये। उन सबको यथायोग्य स्वीकार कर महाराज रथ से उतरे और फिर राजभवन की ओर प्रवेश किया। महल के भीतरी भाग में जाकर उन्होंने कुलदेवताओं का दर्शन किया और रत्न, चन्दन तथा माला आदि से उनकी पूजा की। इसके बाद वे फिर महल के बाहर आये और वहां हाथों में मांगलिक द्रव्य लिये खड़े हुए ब्राह्मणों के दर्शन किये। तब महाराज ने गुरु धौम्य तथा महाराज धृतराष्ट्र को आगे रखकर उनकी पुष्प, मोदक, रत्न, सुवर्ण, गौ और वस्त्रादि से विधिवत् पूजा की।सेवक लोग ब्राह्मणों से यह पूछ_पूछकर कि आपकी क्या इच्छा है, उन्हें अभीष्ट पदार्थ देते थे। इसके बाद पुण्याहवाचन का घोष हुआ। उससे सारा आकाश गूंज उठा। वह सुहृदों के लिये आनन्ददायक, परम पवित्र और कानों को सुख देनेवाला था।  इसी समय सब ओर जय की घोषणा करते हुए शंख और दुंदुभियों का मनोरम शब्द होने लगा। इतने में ब्राह्मण के वेश में छिपे हुए राक्षस चार्वाक ने कहा, ' युधिष्ठिर ! इस समय मैं इन सब ब्राह्मणों की ओर से बोल रहा हूं। तुम्हें धिक्कार है । तुम बड़े दुष्ट राजा हो ! तुमने अपने बंधु_बान्धवों की हत्या की है। अपने गुरुजनों को मरवाकर तो अब तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है। इस प्रकार का जीवन किस काम का ?'उसकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर बड़े ही लज्जित और व्याकुल हुए। प्रतिवाद के रूप में उनके मुख से एक भी शब्द न निकला। उन्होंने कहा, 'विप्रगण ! मैं अत्यन्त विनीत होकर आपसे प्रार्थना कर रहा हूं। आप मुझपर प्रसन्न होइये और इस समय मेरे ऊपर बड़ी आपत्ति है, ऐसे समय आपका मुझे धिक्कारना उचित नहीं है। युधिष्ठिर की यह बात सुनकर सब ब्राह्मण बोल उठे, 'महाराज ! यह हमारी बात नहीं कह रहा है। हम तो आशीर्वाद देते हैं कि आपकी राजलक्ष्मी सदा बनी रहे।'फिर उन महात्माओं ने ज्ञानदृष्टि से उसे पहचान लिया और राजा युधिष्ठिर से कहा, 'यह दुर्योधन का मित्र चार्वाक नाम का राक्षस है। इस समय संन्यासी का वेश बनाकर उसका हित चाहता है। धर्मात्मन् ! हम तुमसे ऐसी कोई बात नहीं कहते। तुम्हारा और तुम्हारे भाइयों का कल्याण हो।' राजन् !उसके बाद उन सब ब्राह्मणों ने क्रोध में हुंकार करते हुए उस राक्षस को मार डाला। उनके तेज से वह भस्म होकर गिर गया। राजा ने उन सबकी पूजा की। वे उनका अभिनन्दन करते हुए वहां से विदा हुए। इससे महाराज युधिष्ठिर और उनके सम्बन्धियों को भी बड़ी प्रसन्नता हुई। 


Saturday, 28 February 2026

प्रायश्चित योग्य कर्म, अन्न की अशुद्धि और दान के अनधिकारी के विषय में स्वआम्भउव मनु का प्रसंग

व्यासजी बोले_इस विषय में एक पुरातन इतिहास प्रसिद्ध है। एक बार बहुत _से तपस्वी ऋषि एकत्रित होकर स्वामम्भुव मनु के पास गये और उनसे धर्म का स्वरूप पूछते हुए बोले, दान, अध्ययन, तप, कार्य और अकार्य इनका क्या स्वरूप है ? उनके इस प्रकार पूछने पर मनुजी ने कहा_मैं संक्षेप और विस्तार से धर्म का विस्तार स्वरूप बताता हूं, आप ध्यान देकर सुनें।
 शास्त्र में जिन पापों के प्रायश्चित का उल्लेख नहीं है, उनकी निवृति के लिये मंत्र_जप, होम और उपवास करें, आत्मज्ञान प्राप्त करें, पवित्र नदियों में स्नान करें और जहां प्रायश्चित करनेवाले लोग रहते हैं उन स्थानों में रहे। इन पुण्यकर्मों से, ब्रह्मगिरी आदि पवित्र पर्वतों पर रहने से, सुवर्ण भक्षण करने से, जिनमें रत्न हैं उन नदियों या सरोवरों में स्नान करने से, देवस्थानों में जाने से और घृतपान करने से अवश्य ही मनुष्य की तत्काल शुद्धि हो जाती है। मनुष्य को कभी गर्व नहीं करना चाहिये और यदि दीर्घायु की इच्छा हो तो तप्त कृच्छ्रव्रत की विधि से तीन दिन तक गर्म दूध, घृत और जल का सेवन करना चाहिये। बिना दी हुई वस्तु को न लेना, दान, अध्ययन और तप में तत्पर रहना, अहिंसा, सत्य, अक्रोध और यज्ञ_ये सब धर्म के लक्षण हैं। एक ही क्रिया देश और काल के भेद से धर्म या अधर्म है जाती है। चोरी करना, झूठ बोलना, हिंसा करना आदि अधर्म की अवस्थाविशेष में धर्म माने जाते हैं। विवेकी लोग जानते हैं कि धर्म और अधर्म, ये दोनों ही देश-काल के विचार से अधर्म और धर्म दोनों हो सकते हैं। लोक और वेद में धर्म के दो भेद हैं_प्रवृतिधर्म और निवृति धर्म। इनमें निवृति धर्म का फल मोक्षरूप अमरत्व है और प्रवृति धर्म का जन्म_मरण है। अशुभ कर्म से अशुभ फल मिलता है और शुभ कर्म से शुभ। फलों की शुभाशुभता के कारण ही इन दो प्रकार के कर्मों को शुभ या अशुभ कहते हैं। यदि जानबुझकर कोई अशुभ कर्म हो जाय तो उसके लिये शास्त्र ने प्रायश्चित का विधान किया है। राजा यदि दण्डनीय पुरुष को दण्ड न दे दो उसे उसकी शुद्धि के लिये एक दिन_रात का उपवास करना चाहिये और यदि पुरोहित राजा को धर्मोपदेश न करें तो उसकी शुद्धि तीन दिन उपवास करने से होती है। किन्तु जो पुरुष अपनी जाति, आश्रम या कुल के दर्म को त्याग देते हैं, उनकी शुद्धि किसी प्रायश्चित से नहीं हो सकती। यदि धर्म निर्णय में कोई विवाद हो तो वेद और धर्मशास्त्र को जाननेवाले दस या तीन ब्राह्मणों को बुलाकर उनसे उसका निर्णय करावें और वे जैसा कहें वैसा करें। अब अन्न के विषय में विचार करते हैं। प्रेत के निमित्त बनाया हुआ अन्न, सूतिका का अन्न दस दिन से पूर्व नहीं खाना चाहिये, इसी प्रकार ब्याई हुई गौ का दूध भी दस दिन तक न पीवे।  राजा का अन्न तेज को नष्ट करता है, शूद्र का अन्न ब्राह्मतेज का नाशक है तथा सुधार और पति या पुत्रहीना स्त्री का अन्न आयु का क्षय करता है। ब्याजखोर का अन्न विष्ठा के समान है और वेश्या का वीर्य के समान। कायर, यज्ञविक्रेता, बढ़ई, मोची, व्यभिचारिणी स्त्री, धोबी, वैद्य और चौकीदार इन सबका अन्न भी खाने योग्य नहीं है। जिन्हें समाज या गांव ने दोषी ठहराया हो, जो नर्तकी के द्वारा अपनी जीविका चलाते हैं और जिन्होंने अपने बड़े भाई के अविवाहित रहते अपना विवाह कर लिया है, उनका तथा वन्दिजन और जुआरियों का भी अन्न अखाद्य है। जो बातें हाथ से लाया गया हो, जो बासी हो, जिसपर मद्य के छींटें पड़ गये हों, जो जूठा हो और जिसे कुटुम्ब से छिपाकर अपनेलिए रखा है वह अन्न खाने योग्य नहीं होता।  इसी प्रकार जो पदार्थ आटे, ईख, शाक या दूध को बिगाड़कर बनाये गये हों वे भी नहीं खाने चाहिये। सत्तू, जो की कीलें और दही में मिले हुए सत्तू ये अधिक देर हो जाने पर खाने योग्य नहीं रहते। खीर, खिचड़ी और मालपुए यदि देवता के उद्देश्य से न बनायें जायं तो नहीं खाने चाहिये, गृहस्थ पुरुष देवता, ऋषि, अतिथि, पितर और कुलदेवताओं को नैवेद्य समर्पण करने के बाद ही भोजन कर सकता है। उसे घर में संन्यासी के समान अनासक्त_भाव से रहना चाहिये। जो अपनी अनुकुल स्त्री के साथ इस प्रकार घर में रहता है, वह धर्म का पूरा फल प्राप्त कर लेता है। धर्मात्मा पुरुष को चाहिये कि यश और लोभ से, भय के कारण अथवा अपना उपकार करनेवाले को दान न दे। जो नाचने_गानेवाले, हंसी_मजाक करनेवाले ( भांड़ ) आदि, उन्मत्त, उन्मत, चोर, निंदा करनेवाले, गूंगे, तेजोहीन, अंगहीन, बौने, दुष्ट, कुलहीन या संस्कार शून्य हैं, उन्हें भी दान न दें।जिसने वेदाध्ययन न किया हो उस ब्राह्मण को दान देना उचित नहीं है। ऐसा करने से दान देनेवाले और दान लेनेवाले दोनों को ही हानि होती है।जिस प्रकार खैर की लकड़ी या पत्थर की शिला का आश्रय लेकर समुद्र पार करनेवाला व्यक्ति बीच में ही डूब जाता है, उसी प्रकार ऐसे दाता और गृहीता दोनों ही नरक में डूबते हैं।
 जिस प्रकार लकड़ी गीली हने पर अग्नि प्रज्जवलित नहीं होती, उसी प्रकार जिस दिन लेनेवाले में तप, स्वाध्याय और सदाचार का अभाव होता है वह अच्छा नहीं जान पड़ता। जिस प्रकार मनुष्य की खोपड़ी में भरा हुआ जल और कुत्ते की खाल में भरा हुआ दूध आपके आश्रय के दोष से अपवित्र हो जाते हैं, उसी प्रकार दुराचारी के संसर्ग के शास्त्राभ्यास दूषित हो जाता है। जो ब्राह्मण वेदहीन और अशात्रज्ञ होते हुए भी संतोषी और दूसरे के गुणों में दोष न देखनेवाला है, उसे दया करके ही दान देना चाहिये। उन्हें देना शिष्टों का आचार है अथवा ऐसा करने से पुण्य होता है_यह समझकर उसे कुछ नहीं दिया जा सकता, क्योंकि जैसे लकड़ी का हाथी और चाम का हरिण, ये नाममात्र के ही होते हैं, उसी प्रकार बिना पढ़ा हुआ ब्राह्मण भी केवल नाम का ही होता है। जिस प्रकार जलहीन कुआं और राख में किया हुआ हवन व्यर्थ होता है, उसी प्रकार मूर्ख को दिया हुआ दान भी निष्फल होता है। दान लेनेवाला मूर्ख तो दाता का शत्रु है, वह उसका धन हरण करता है और देवता एवं पितरों के हव्य_कव्य का नाश करता है। उसे दान लेनेवाला पुण्य लोकों को प्राप्त नहीं कर सकता। युधिष्ठिर ! तुमने जो पूछा था उसके अनुसार मैंने संक्षेप में स्वामम्भुव मनु का यह पूरा प्रसंग सुना दिया। यह महत्वशाली प्रसंग सभी कल्याणकामियों को सुनना चाहिये।

Wednesday, 4 February 2026

पाप और उनके प्रायश्चित्तों का वर्णन

युधिष्ठिर ने पूछा_पितामह ! कृपा करके यह बताइएये कि किन कर्मों को करने से मनुष्य प्रायश्चित का भागी बनता है और ऐसी स्थिति में क्या करने से वह पापयुक्त होता है ? व्यासजी ने कहा_ जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्मों का आचरण न करके निषिद्ध कर्म कर बैठता है, उसे ऐसा विपरीत आचरण करने से प्रायश्चित्त कर भागी बनना पड़ता है। जो ब्रह्मचारी सूर्योदय या सूर्यास्त के समय होता रहे अथवा जिस पुरुष के वस्त्र या दांत काले हो, उन्हें प्रायश्चित करना चाहिये। इसके सिवा बड़े भाई के अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई, ब्राह्मण का वध करनेवाला, निन्दा, छोटी कन्या का विवाह हो जाने के बाद उसकी बड़ी बहिन से विवाह करनेवाला, बड़ी बहिन के अविवाहित रहते हुए उसकी छोटी बहिन से विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी,, द्विज की हत्या करनेवाला, सुपात्र को दान न देनेवाला, मांस बेचने वाला, आग लगानेवाला और स्त्री वध करनेवाला, दूसरों का घर जलानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरु का अपमान तथा सदाचार की मर्यादा का उल्लंघन करनेवाला_ये सभी पापी माने जाते हैं, इन्हें प्रायश्चित करना चाहिए। इनके सिवा, जो लोक और वेद से विरुद्ध दूसरे न करने योग्य कर्म हैं, उन्हें भी बताता हूं, तुम एकाग्रचित्त से सुनो। अपने धर्म को त्यागना, दूसरे के धर्म का आचरण करना, यज्ञ करने के अनाधिकारी से यज्ञ कराना, अभक्ष्य भक्षण करना, शरणागत को त्यागना, माता_पिता और भरण_पोषण के अधिकारी सेवक आदि का भरण_पोषण न करना, दूध_दही आदि रसों को बेचना, पशु_पक्षियों को मारना, ब्राह्मणों को दक्षिणा न देना और ब्राह्मणों का धन छीन लेना_धर्मतत्व को जाननेवालों ने ये सभी कर्मन करने योग्य बताये हैं।राजन् ! जो पुरुष पिता के साथ झगड़ा करता है, गुरु स्त्री के साथ समागम करता है और ऋतुकाल होने पर अपनी स्त्री के साथ सहवास नहीं करता, वह धर्म का त्याग करनेवाला है। राजन् ! जो पुरुष पिता के साथ झगड़ा करता है, गुरु स्त्री के साथ समागम करता है और ऋतुकाल होने पर अपनी स्त्री के साथ सहवास नहीं करता, वह धर्म का त्याग करनेवाला है। इस प्रकार संक्षेप में विस्तार से ऊपर जो कर्म कहे गये हैं, इनमें से किन्हीं को करने पर और किन्हीं को न करने पर मनुष्य प्रायश्चित का भागी होता है। अब जिन_जिन कारणों से इन कर्मोंको करने पर भी मनुष्य को पाप नहीं लगता वह सुनो। यदि युद्धस्थल में कोई वेद_वेदान्तों का पारगामी ब्राह्मण भी हाथ में हथियार लेकर मारने के लिये आवे तो उसका वध करने से ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता।राजन् ! इस विषय में वेद का मंत्र भी है। मैं तुमसे वही बात कह रहा हूं जो वेद_वाक्य के अनुसार धर्म यानी गयी है। यदि कोई पुरुष अपने धर्म में डिगे हुए आततायी ब्राह्मण को मार डाले तो इससे भी वह ब्रह्महत्यारा नहीं होता। अनजान में अथवा प्राण संकट के समय भी यदि मदिरा पान कर लें तो बाद में धर्मात्माओं की आज्ञा के अनुसार उसका पुनः संस्कार होना चाहिये। इसी प्रकार अन्य सब अभक्ष्य लक्षणों के विषय में भी समझना चाहिये। यदि कभी ऐसी कोई भूल हो जाय तो प्रायश्चित से ही उसकी शुद्धि होती है।
चोरी सर्वथा निषिद्ध ही है, किन्तु आपत्ति के समय यदि गुरु के लिये चोरी की जाय तो उसमें दोष नहीं है। यदि चोरी करने में किसी प्रकार की कामना न हो, उससे प्राप्त हुई वस्तु को स्वयं न भोगा जाय तथा आपत्काल में ब्राह्मण के सिवा किसी अन्य का धन ले लिया जाय तो भी चोरी का पाप नहीं लगता। अपने या किसी दूसरे के प्राणों की रक्षा के लिये, गुरु के लिये, एकान्त में स्त्री के साथ अथवा विवाह के प्रसंग में झूठ बोलने से भी पाप नहीं होता। यदि किसी कारण से स्वप्न में वीर्य स्खलित हो जाय तो इससे ब्रह्मचारी का व्रत भंग नहीं होता, किन्तु इसके लिये उसे प्रज्जवलित अग्नि में घृत की आहुतियां छोड़कर प्रायश्चित करना चाहिये। यदि बड़ा भाई पतित हो जाय या संन्यास ले ले तो छोटे भाई को विवाह करने में दोष नहीं है।  अज्ञानवश किसी आपात्र ब्राह्मण को दान देने से तथा योग्य ब्राह्मण का सत्कार न करने से भी कोई दोष नहीं है। व्यभिचारिणी स्त्री का तिरस्कार करने में भी कोई दोष नहीं है। ऐसा करने से तो उसकी शुद्धि ही होती है और उसका भरण_पोषण करनेवाले को कोई दोष भी नहीं लगता। जो सेवक कामकाज करने में असमर्थ हैं, उसे त्यागने में दोष नहीं है तथा गऔओं के लिये वन में आग लगाने में भी दोष नहीं माना जाता। राजन् ! ये सब तो मैंने वे कर्म बताये जिन्हें करने से कोई दोष नहीं होता। अब मैं विस्तारपूर्वक प्रायश्चित्तों का वर्णन करता हूं। राजन् ! कृच्छ्र_चान्द्रायणादि तप, अग्निहोत्र आदि कर्म और दान के द्वारा मनुष्य तभी अपने पाप से छूट सकता है, जब वह फिर पाप में प्रवृत न हो। यदि किसी ने ब्रह्महत्या की हो तो वह भिक्षा मांगकर एक समय भोजन करें, अपना सब काम स्वयं ही करें, हाथ में खप्पर और आंग्लांग ( खाट का पाया रखें, नित्य ब्रह्मचर्य व्रत रखें, भिक्षा मांगने के समय सर्वदा खड़ा रहे, किसी से ईर्ष्या न करें, पृथ्वी पर शयन करें और लोक में अपने कर्म को प्रकट करें। इस प्रकार बारह वर्ष तक करने से उसकी शुद्धि हो जाती है। अथवा अपनी इच्छा से किसी शस्त्रधारी विद्वान का निशाना बन जाय या जलती हुई आग में गिरे अथवा नीचे सिर किये किसी भी वेद का पाठ करते हुए तीन बार सौ_सो योजन की यात्रा करें या किसी वेदज्ञ ब्राह्मण को अपना सर्वस्व समर्पण कर दे, अथवा जिनसे जीवन भर निर्वाह हो सके इतना धन या सब सामान से भरा हुआ घर ब्राह्मण को दान करे । इस प्रकार गौ और ब्राह्मणों की रक्षा करनेवाले पुरुषों की ब्रह्महत्या से मुक्ति हो सकती है। यदि कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार भोजन करने से तीन वर्षों में एक_एक मांस में भोजनक्रम का परिवर्तन करते हुए अत्यन्त तीव्र कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार अन्न ग्रहण करें तो एक वर्ष में ब्रह्महत्या से छुटकारा हो सकता है।' तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना मांगे जो मिल जाय वह का लेना तथा तीन दिन उपवास करना_इस प्रकार बारह दिन का कृ्च्छ्रव्रत होता है। इसी क्रम से छः वर्ष तक रहने से ब्रह्महत्या छूट सकती है। यही क्रम यदि तीन_तीन दिन में परिवर्तित न होकर एक एक सप्ताह में और विषम मासों में आठ_आठ दिन बदलते हुए एक एक मास के कृ्च्छ्रव्रत के नुसार चले तो तीन वर्षों में शुद्धि हो जायगी और यदि एक मास अयाचित भोजन तथा एक मास उपवास _इस प्रकार चार_चार मांस के कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार चले तो एक ही वर्ष में ब्रह्महत्या का पाप छूट जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार यदि उपवास ही किया जाय तो और भी जल्दी शुद्धि हो सकती है। इसके सिवा अश्वमेध यज्ञ से भी नि:संदेह यह पाप छूट सकता है। श्रुति का कथन है कि जो इस प्रकार के लोग अवभृथ (यज्ञान्त ) स्नान करते हैं वे सभी सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं। जो पुरुष ब्राह्मण के लिये युद्ध में प्राण दे देता है, वह भी ब्रह्महत्या से छूट जाता है। ब्रह्महत्यारा होने पर भी जो सुपात्र ब्राह्मणों को एक लाख गौएं दान देता है उसके तो सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य दूध देनेवाली पच्चीस हजार कपिला गौएं सुपात्रों को दान करता है, वह भी सब पापों से छूट जाता है। मरने के समय दरिद्र और सत्पुरुषों को बछड़े वाले एक हजार दुधारू गौएं देने से भी मनुष्य इस पाप से मुक्त हो सकता है।जो राजा सुपात्र ब्राह्मणों को कम्बोज देश में उत्पन्न हुए सौ घोड़े दान करता है, वह भी ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाता है। जो व्यक्ति किसी एक पुरुष को उसका मनोरथ पूर्ण होने योग्य दान देता है और फिर किसी के आगे उसकी जिक्र नहीं करता वह भी पापयुक्त हो जाता है। जलहीन देश में पर्वत से गिरकर और अग्नि में प्रवेश करके अथवा महआप्रस्थआन की विधि से हिमालय में गलकर प्राण दे देने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। यदि किसी ब्राह्मण ने मद्यपान किया है तो वृहस्पतिवार भाग करने से उसकी शुद्धि हो जाती है। एकबार मद्य पीने पर जो निष्कपट भाव से भूमिदान करता है और फिर कभी शराब नहीं छूता वह भी शुद्ध हो जाता है। जो पुरुष गुरुपत्नी के साथ समागम करता है वह या तो जलती हुई लोहे की शिला पर पड़ जाय या अपनी मूत्रएन्द्रइय को काटकर ऊपर की ओर देखता हुआ दूर तक चला जाय।इसके सिवा, अपना शरीर त्याग देने से भी वह इस पाप से मुक्त छूट सकता है। अथवा जो महाव्रत का ( एक महीने तक जल भी न पीने के नियम का ) पालन करता है, ब्राह्मणों को अपना सर्वस्व दे देता है या गुरु के लिये युद्ध में प्राण होम देता है वह भी इस पाप से मुक्त हो जाता है।
झूठ बोलकर आजीविका चलानेवाला अथवा गुरु का अपमान करनेवाला पुरुष गुरुजी को मनचाही वस्तु देकर प्रसन्न कर लेने से उसे पाप से छूट जाता है। जिसका ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित हो गया हो, उसे ब्रह्महत्या के लिये बताया हुआ प्रायश्चित करना चाहिए। अथवा छः महीने तक शरीर पर गौ का चमड़ा ओढ़ने से वह उस पाप से छूट सकता है। यदि कोई मनुष्य किसी का धन चुरा ले तो किसी_न_किसी उपाय से उसे उतना ही धन लौटा लेने से वह उस पाप से मुक्त हो सकता है। बड़े भाई के अविवाहित रहते विवाह करनेवाला छोटा भाई और उसका बड़ा भाई दोनों संयमपूर्वक बारह दिन का कृ्च्छ्रव्रत करने से पवित्र हो जाते हैं। इसके सिवा, यदि वह छोटा भाई बड़े भाई के कर लेने पर अपनी विवाहिता स्त्री के साथ फिर फिर विवाह संस्कार करा लें तो क्त दोष निवृत हो जाता है और ऐसा करने से स्त्री को भी कोई दोष नहीं होता। यदि अपनी स्त्री के प्रति किसी पाप आचरण की शंका हो तो पुन: रजस्वला हो स्नान करने तक उसका समागम न करें। भस्म से जैसे बर्तन साफ हो जाते हैं, उसी प्रकार रजशुद्धि से स्त्री शुद्ध हो जाती है।पशु_पक्षियों के वध करनेवाला तथा तरह_तरह के बहुत _से पेड़ों को काटनेवाला पुरुष तीन दिन तक वायु भक्षण करें और लोगों के सामने अपना कुकर्म प्रकट कर दे। इससे वह शुद्ध हो जाता है।
जो पुरुष किसी प्रकार की हिंसा नहीं करता, राग_द्वेष एवं मान-अपमान से शून्य है, विशेष भाषण नहीं करता और मिताहार करते हुए पवित्र और एकान्त देश में रहकर गायत्री का जप करता है, वह सब पापों से मुक्त है जाता है। अन्य सब प्रकार के पापों की मुक्ति के लिये भी, ब्राह्मणों ने धर्माधर्म के निर्णय में प्रमाणभूत शास्त्रों के कथन से यही विधि निश्चित की है। जो मनुष्य दिन में आकाश की ओर दृष्टि रखता है, रात्रि में खुले मैदान में सोता है, तीन बार दिन में और तीन बार रात्रि में वस्त्रों सहित जल में घुसकर स्नान करता है और इस व्रत का पालन करते समय स्त्री, शूद्र और पतित से बात नहीं करता वह अज्ञानवश किये हुए सब पापों से मुक्त हो जाता है। मनुष्य को अपने किये हुए शुभ या अशुभ कर्म का फल मरने के बाद भोगना पड़ता है। इसमें जिसकी अधिकता होती है, उसी का फल उसे मिलता है। इसलिये दान, तप और शुभ कर्मों के द्वारा पुण्य की ही वृद्धि करनी चाहिये, जिससे वह पाप को दबाकर स्वयं बढ़ सके। सर्वदा शुभ कर्मों का आचरण करें, पापकर्म से दूर रहें और सुपात्र को धन दान करें ऐसा करने से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
राजन् ! इसी प्रकार विवेकी पुरुष के लिये लक्ष्य और अभक्ष्य, वाच्य और अवाच्य तथा जानबूझकर और बिना जाने हुए पापों के भी प्रायश्चित बताये गये हैं। जो पाप जानबूझकर किया जाता है वह बड़ा होता है और अनजापंन में शिक्षा हुआ पाप छोटा माना जाता है। ऊपर कहीं हुई विधि से पाप निवृति हो सकती है। जो आस्तिक और श्रद्धालु है उसी के लिये यह विधि कहीं गयी है। नास्तिक, अश्रद्धा दु और दम्भ एवं द्वेषप्रधान पुरुषों के लिये इसका कोई उपयोग नहीं है। जो पुरुष मरकर सुख भोगना चाहता है, उसे श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण एवं धर्म का सेवन करना चाहिये। राजन् ! तुमने अपने प्राणों की रक्षा के लिये अथवा स्वधर।म के पालन के लिये ही इनका वध किया है; इसलिये तुम तो इतने ही कारण से इस पाप से सर्वथा मुक्त हो जाओगे। फिर भी यदि तुम्हें कुछ पश्चाताप है तो प्रायश्चित करो। इस प्रकार अनार्य पुरुषों की तरह रोष में भरकर अपना नाश मत करो।