Thursday, 18 December 2025

श्रीव्यासजी का राजा युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देना

श्री वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! नारदजी की बात सुनकर राजा युधिष्ठिर चुप हो गये। उस समय उन्हें शोकग्रस्त देखकर सब प्रकार के धर्म का रहस्य जाननेवाले महर्षि व्यास ने कहा, 'युधिष्ठिर ! राजाओं का धर्म प्रथाओं का पालन करना ही है। इसलिये तुम अपना पैतृक सिंहासन स्वीकार करो। वेदों ने तप को तो ब्राह्मणों का ही नित्य धर्म बताया है। क्षत्रिय तो सब प्रकार के धर।म की रक्षा करनेवाला ही है। जो मनुष्य विषयासक्त होकर धर्मविधि का उल्लंघन करता है, वह लोकमर्यादा का विघातक है, क्षत्रिय को बाहुबल से उसका दमन करना चाहिये। जो व्यक्ति मओहवश शास्त्र प्रमाण को न माने वह अपना सेवक हो, पुत्र हो, तपस्वी हैं अथवा कोई भी क्यों‌न हो , उस पापी का सब प्रकार से दमन करें और उसे नष्ट कर दे। जो राजा नष्ट होते हुए धर्म की रक्षा नहीं करता, वह धर्म का घात करनेवाला है। तुमने तो अनुयायियों सहित उन धर्म_घातियों का ही नाश किया है, इसलिये तुम तो अपने धर्म में ही स्थित हो ? राजा का तो यही धर्म है कि दुष्टों का वध करें, सुपात्रों को दान दें और प्रजा की रक्षा करें।' राजा युधिष्ठिर ने कहा_'तपोधन ! आप सभी धर्मो में शिरोमणि हैं। आपके लिये धर्म सर्वदा प्रत्यक्ष है। आपके वचनों में मुझे तनिक भी संदेह नहीं है; किन्तु भगवन्! इस राज्य के लिये मैंने अनेकों अवध्य पुरुषों का वध करा डाला है, मेरे लिये वे ही कर्म मुझे जला रहे हैं। व्यासजी बोले_राजन् ! उद्धत पुरुषों को दण्ड देना तो राजा का कर्तव्य ही है। इसी नियम के अनुसार तुमने कौरवों को मारा है। इसलिये अब तुम मन को शोकग्रस्त न करो। सदोष मालूम होने पर भी अपने धर्म का पालन करते हुए तुम्हें इस प्रकार की आत्मग्लानि तुम्हें शोभा नहीं देती। शास्त्रों में जो पाप कर्मों के प्रायश्चित बताये गये हैं, उन्हें भी शरीरधारी ही कर सकता है, शरीर छोड़ जाने पर तो वे भी नहीं किये जा सकते। अत: राजन् ! यदि तुम जीवित रहोगे तो अपने पाप का प्रायश्चित कर सकोगे। प्रायश्चित किये बिना ही यदि शरीर छूट गया तो तुम्हारे हाथ केवल पश्चाताप ही लगेगा। युधिष्ठिर ने कहा_दादाजी ! मैंने राज्य के लोभ से अपने पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ससुर, गुरु, पापा, दादा, अनेकों वीर, क्षत्रिय, सम्बन्धी, सुहृदं, समवयस्क, भांजे, जाति भाई और भिन्न-भिन्न देशों से आये हुए राजाओं का वध करा डाला है। उसका मुझे क्या दण्ड मिलेगा ? इस चिंता से मैं बार_बार जलता रहता हूं। जब मैं पृथ्वी को उन श्रीसम्पन्न नृपश्रेष्ठों से सूनी देखता हूं और इस भयानक जातिवाद तथा इसमें मारे गये सैकड़ों शत्रुपक्ष के वीरों और करोड़ों दूसरे लोगों को याद करता हूं तो मुझे बड़ा ही पश्चाताप होता है। आह ! आज तो अफवाएं अपने पुत्र, पति और भाइयों से शून्य हो गयी हैं, उनकी क्या दशा होगी ? वे उनका नाश करनेवाले हम पाण्डव और यादवों को कोस रही होगी और अत्यन्त दिन होकर पृथ्वी पर पछाड़ें का रही होगी। विप्रवर ! उन स्त्रियों का अपने मृत संबंधियों के प्रति जैसा प्रेम है उससे मुझे तो यही निश्चय होता है कि वे सब नि:संदेह प्राण त्याग देंगी। धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है, अतः: इस प्रकार हमें स्त्रीवाद का ही पाप लगेगा। अपने सुहृदों को मारकर हमने बड़ा भारी पाप किया है; इसलिये अब हमें सिर नीचा किये नरक में ही गिरना पड़ेगा। अतः: अब हम भीषण तपस्या करके अपने शरीर को त्याग देंगे। आपकी दृष्टि में तपस्या के योग्य कोई उत्तम तपोवन हो तो बताने की कृपा करें। व्यासजी ने कहा_राजन् ! तुम क्षत्रियों में अग्रगण्य हो। तुमने अपने धर्म के अनुसार ही इन क्षत्रियों को मारा है, इसलिये तुम शोक न करो। सदोष मालूम होने पर भी अपने धर्म का पालन करते हुए तुम्हें इस प्रकार की आत्मग्लानि शोभा नहीं देती। शास्त्रों में जो पापकर्म के प्रायश्चित बताये गये हैं, उन्हें भी शरीरधारी ही कर सकता है, शरीर छोड़ देने पर तो वे भी नहीं किये जा सकते। अतः राजन् ! यदि तुम जीवित रहोगे तो अपने पाप का प्रायश्चित कर सकोगे। प्रायश्चित्त किये बिना ही यदि शरीर छूट गया तो तुम्हारे हात पश्चाताप ही लगेगा। युधिष्ठिर ने कहा_दादाजी ! मैंने राज्य के लोभ में अपने पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ससुर, गुरु, मामा, दादा, अनेकों वीर, क्षत्रिय, सम्बन्धी, सुहृदं, समवयस्क, भानजे,जाति भाई और भिन्न_भिन्न देशों से आये हुए राजाओं का वध करा डाला है। उसका मुझे क्या दण्ड मिलेगा ? इस चिंता से मैं रात_दिन बार_बार जलता रहता हूं। जब मैं पृथ्वी को उन श्रीसम्पन्न नृपश्रेष्ठों से सूनी देखता हूं और इस भयानक जातिवाद तथा इसमें मारे गये सैकड़ों शत्रुपक्ष के वीरों और करोड़ों दूसरे लोगो को याद करता हूं तो मुझे बड़ा ही पश्चाताप होता है। आह ! आज जो अबलाएं अपने पुत्र पति और भाइयों से शून्य हो गयी हैं, उनकी क्या दशा होगी ? वे उनका नाश करनेवाले, हम पाण्डवों और और यादवों को कोस रही होंगी और अत्यंत दीन होकर पृथ्वी पर पछाड़ें का रही होंगी।विप्रवर ! उन स्त्रियों का अपने मृत संबंधियों के प्रति जैसा प्रेम है, उससे मुझे तो यही निश्चय होता है कि सब नि:संदेह प्राण त्याग देंगी। धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है, अतः इस प्रकार हमें स्त्रीवाद का ही पाप लगेगा। अपने सुहृदों को मारकर हमने बड़ा भारी पाप किया है; इसलिये अब हमें सिर नीचा किये हैंनरक में ही गिरना पड़ेगा। अतः अब हम भीषण तपस्या करके अपने शरीर को त्याग देंगे। आपकी दृष्टि में तपस्या के योग्य कोई उत्तम तपोवन हो तो बताने की कृपा करें।
व्यासजी ने कहा_राजन् ! तुम क्षत्रियों में अग्रगण्य हो। तुमने अपने धर्म के अनुसार ही इन क्षत्रियों को मारा है, इसलिये तुम शोक न करो। वे सब तो अपने अपराध से ही मारे गये हैं। तुम, भीम, अर्जुन या नकुल_सहदेव उन्हें मारनेवाले नहीं हो। इनका संहार तो काल ने किया है। उसका तो न कोई न कोई माता है, न पिता, वह किसी पर दया भी नहीं करता, वह तो प्रजा के कर्मों का साक्षीमात्र है। तुम्हारा युद्ध तो उसके लिये केवल निमित्तमात्र था। वह इसी प्रकार एक प्राणी से दूसरे की हत्या कराता रहता है। इस संसार कर्म के लिये वह एक भगवान् का ही स्वरूप है। इसके सिवा तुम्हें कौरवों के विनाशकारी कर्मों पर ध्यान देना चाहिये, जिनके कारण उन्हें काल के गाल में जाना पड़ा है। जिस प्रकार लोहार का बनाया हुआ यंत्र अपना काम करने में उसके अधीन रहता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् कालाधीन कर्म की प्रेरणा से प्रवृत हो रहा है। फिर भी तुम्हारे चित्त में जो इन सब को मरवाने से व्यर्थ संताप हो रहा है, उसके दोष से छूटने के लिये तुम प्रायश्चित कर लो। राजन् ! यह बात सुनी हो जाती है कि पूर्वकाल में राज्यलक्ष्मी के लिये ही देवता और असुरों में बारह हजार वर्षों तक युद्ध हुआ था। उसमें देवताओं ने दैत्यों का संहार करके स्वर्ग और पृथ्वी का आधिपत्य प्राप्त किया था। जो लोग धर्म का नाश करना चाहते हैं और अधर्म को फैलानेवाले हैं, उन्हें मार ही डालना चाहिये। इसी से देवताओं ने उस युद्ध में अट्ठासी हजार शालावृक नामक दैत्यों को भी मार डाला था। यदि एक पुरूष को मारकर कुटुंब के शेष व्यक्तियों को सुख मिले अथवा एक कुटुंब का सफाया करने से देश में शान्ति स्थापित हो तो उसे नष्ट करने में कोई दोष नहीं है। राजन् ! किसी समय अधर्म दिखाई देनेवाला कर्म ही धर्म है जाता है और धर्म दिखाई देनेवाला अधर्म बन जाता है। इस प्रकार बुद्धिमान पुरुष को धर्म और अधर्म का रहस्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिये। धर्मराज ! तुमने शास्त्र श्रवण किया है, इसलिये धर्माधर्म के विषय में अपनी बुद्धि स्थिर रखो। देखो ! पूर्वकाल में जो देवताओं का धर्म मार्ग था, उसी का तुमने भी अनुसरण किया है। तुम जैसे धर्मप्राण पुरुष कभी नरक का द्वार नहीं देखते। इसलिये तुम अपने भाइयों को और सुहृद_संबंधियों को धैर्य दो। जो पुरुष हृदय में पाप की भावना रखकर किसी कुकर्म में प्रवृत होता है और उसे करके भी किसी प्रकार लज्जित नहीं होता, उसी को पाप का भागी होना पड़ता है_ऐसा शास्त्र का कथन है। ऐसे पाप का न कोई प्रायश्चित है और न कभी नाश ही होता है। तुम्हारा हृदय तो शुद्ध करना पड़ा और अब इस कर्म को करके भी पश्चाताप कर रहे हो। इसके लिये अश्वमेध यज्ञ बड़ा अच्छा प्रायश्चित है। उसका अनुष्ठान करो तुम निष्पाप हो जाओगे।

इन्द्र ने भी मरुतों की सहायता से अपने शत्रुओं को परास्त करके एक के बाद एक_इस प्रकार सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे। इसी से वे 'शतक्रतु'  नाम से प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार स्वर्ग पर आधिपत्य प्राप्त करके उन्होंने पापों से छुटकारा पाया था। स्वर्ग में देवता और ऋषि भी उसकी उपासना करते हैं। तुमने भी इस वसुन्धरा को अपने पराक्रम से प्राप्त किया है और अपने बाहुबल से तुमने राजाओं को परास्त किया है। अब तुम मित्रों के साथ उनके देश और राजधानियों में जाकर उनके भाई, पुत्र और पौत्रों को अपने _अपने राज्य पर अभिषिक्त करो।भरतश्रेष्ठ ! इस तरह सारे राज्य में शान्ति स्थापित कर तुम असुरविजयी इन्द्र के समान अश्वमेध यज्ञ द्वारा भगवान् का यजन करो। राजन् ! इस युद्ध में जो क्षत्रिय मारे गये हैं, उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। वे तो काल की शक्ति से मोहित होकर अपने कुकर्मों के कारण मौत के मुख में पड़े हैं। उन्हें क्षात्रधर्म के पालन का पूरा फल प्राप्त हुआ है तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य मिला है। इसका पालन करते हुए तुम धर्म की रक्षा करो। मरने पर कल्याण करनेवाली यही चीज है।