Monday, 4 May 2026

महाराज युधिष्ठिर का अभिषेक, उनकी राजव्यवस्था तथा उनके द्वारा संबंधियों के श्राद्ध

वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! अब महाराज ककंयुधिष्ठिर रोष और संताप से मुक्त होकर पूर्व की ओर मुख करके सुवर्ण के सुंदर सिंहासन पर विराजमान हुए। उन्हीं की ओर मुख करके एक चमचमाते हुए सोने के सिंहासन पर सात्यकि और श्रीकृष्ण बैठे तथा महाराज के दोनों ओर दो मणिमय पीठों पर भीमसेन और अर्जुन सुशोभित हुए। एक ओर हाथीदांत के आसन पर नकुल और सहदेव के सहित माता कुन्ती बैठीं। इसी प्रकार कौरवों के पुरोहित सुधर्मा, विदुर, धौम्य और कुरुराज धृतराष्ट्र भी अलग_अलग सुंदर सिंहासन पर विराजमान हुए। जहां महाराज धृतराष्ट्र थे उधर ही युयुत्सु, सृंजय और गांधारी ने भी आसन लगाया। महाराज युधिष्ठिर ने सिंहासन पर बैठकर श्वेत पुष्प, अक्षत, भूमि, सुवर्ण, रजत और मणियों को स्पर्श किया। सिंहासन के पास मृत्तिका, सुवर्ण, तरह_तरह के रत्न, सवौंषध से युक्त अभिषेक के पात्र, जल से भरे हुए तांबे, चांदी और मिट्टी के बर्तन, पुष्प, राजा, धान, गोरष, शमी, पीपल और पलाश की समिधाएं, मधु, धृत, गूलर का स्त्रुवा और शंख_यह सब सामग्री एकत्रित की गयी।
फिर श्रीकृष्ण की आज्ञा से पुरोहित धौम्य ने पूर्व और उत्तर के कोण में नीचे स्थान कर शास्त्रोक्त विधि से वेदी बनायी। इसके बाद सर्वतओभद्र आसन पर महाराज युधिष्ठिर और द्रौपदी को बैठाकर उनसे वेद के मंत्रों द्वारा विधिपूर्वक हवन कराया।अब भगवान् श्रीकृष्ण को खड़े हुए और उन्होंने पांचजन्य शंख में जल भरकर धर्मराज का अभिषेक किया। फिर उन्हीं के कहने से राजर्षि धृतराष्ट्र तथा सब दरबारियों ने भी पांचजन्य के द्वारा ही उनको अभिषिक्त किया।अभिषेक होते ही नक्कारों और नीतियों का शब्द होने लगा। महाराज ने धर्मानुसार प्रजा की सब भेंटें स्वीकार कईं और उसे बहुत _से पुरस्कार देकर सम्मानित किया। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर उन्हें हजारों मुहरें दक्षिणा में दीं। ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर उन्हें 'मंगल हो' जय हो' ऐसा कहकर आशीर्वाद दिया। फिर उन्होंने महाराज की प्रशंसा करते हुए कहा, 'राजन् ! बड़े भाग्य की बात है आपको विजय प्राप्त हुई। आप अपने पराक्रम से धर्म की रक्षा करने में समर्थ हुए। यह प्रजा का सौभाग्य ही था कि आप, भीमसेन और अर्जुन और नकुल_सहदेव अबतक सकुशल रहे। अब आप शीघ्र ही भावी कार्यक्रम को अपने हाथ में लें। इसके बाद समागम सज्जनों ने धर्मराज युधिष्ठिर का सत्कार किया और उन्होंने अपने संबंधियों के सहयोग से उस विशाल साम्राज्य का भार अपने हाथों में ले लिया। प्रजा के अभिनन्दन का उत्तर देते हुए महाराज युधिष्ठिर ने कहा, 'महाराज धृतराष्ट्र मेरे पिता हैं। हमारे लिये ये इष्टदेव के समान हैं। जो लोग मेरा प्रिय करना चाहें, उन्हें इनकी आज्ञा में रहना चाहिये और इन्हें जो कुछ अच्छा लगे, वहीं करना चाहिये। मेरा भी प्रदान कर्तव्य सर्वदा सावधानी से इनकी सेवा करना ही है। यदि आपलोग मेरे ऊपर कोई कृपा करना चाहते हैं तो मैं यही भिक्षा मांगता हूं कि इनके प्रति पहले के ही समान सम्मान का भाव रखें। मेरे, आपके और सारी पृथ्वी के स्वामी ये ही हैं। ये सारा राष्ट्र और पाण्डवलोग इन्हीं के हैं। आप सब लोग मेरी यह मेरी यह प्रार्थना हृदय से स्वीकार करें। इसके बाद कुरुराज युधिष्ठिर ने सभी पुरवासी और देशवासियों को विदा किया तथा भीमसेन को युवराज बनाया। महामति विदुरजी को राजकाज संबंधी सलाह देने का, निश्चय करने का तथा संधि, विग्रह, प्रस्थान, स्थिति, आश्रय और द्वैधीभाव_ इन छ: बातों को निर्णय करने का अधिकार सौंपा। क्या काम करना है और क्या नहीं करना_ इसका विचार तथा आय_व्यय का निश्चय करने के कर्म पर उन्होंने सर्वगुण सम्पन्न वयोवृद्ध संजय को नियुक्त किया। सेना की गणना करना, उसे भोजन और वेतन देना तथा उसके काम की देखभाल करना उन्होंने नकुल के जिम्मे किया। शत्रु के देश पर चढ़ाई करने या दुष्टों के दमन करने के काम पर अर्जुन की नियुक्ति की। ब्राह्मण और देवताओं के काम पर तथा पुरोहिती के दूसरे कामों पर महर्षि धौम्य नियुक्त हुए। सहदेव को अपने साथ रखा। उनको सब समय राजा की रक्षा का काम सौंपा गया। राजा ने जिन_जिन लोगों को जिस_जिस काम के योग्य समझा, उन सबको उसी_उसी कार्य पर नियुक्त किया। उन्होंने विदुर, संजय और युयुत्सु से कहा_'आप सब। लोग सदा सावथान रहकर प्रतिदिन मेरे इस वृद्ध पिता राजा धृतराष्ट्र की सेवा करें। इनका जो भी काम हो, उसे ठीक _ठीक पूरा करना चाहिये। इस नगर और प्रान्त में रहनेवाले लोगों के भी जो कुछ कार्य हैं, उन्हें इन्हीं महाराज की आज्ञा लेकर पूर्ण करना चाहिये।' वैशम्पायनजी कहते हैं_तदनन्तर राजा युधिष्ठिर ने युद्ध में मरे हुए अपने कुटुम्बियों के अलग_अलग श्राद्ध करवाये। धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों के श्राद्ध में अन्न, धन, गौएं तथा बहुमूल्य रत्न दान दिये स्वयं राजा युधिष्ठिर ने द्रौपदी को साथ लेकर द्रोण, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, घतोत्कच, विराट आदि मित्र राजाओं तथा द्रुपद एवं द्रौपदी कुमारों का श्राद्ध किया। प्रत्येक के उद्देश्य से उन्होंने हजारों ब्राह्मणों को अलग_अलग धन, रत्न, गौ एवं वस्त्र देकर संतुष्ट किया। इसके सिवा जिन राजाओं के कोई पुत्र आदि संबंधी जीवित नहीं थे, उनका भी श्राद्ध सम्पन्न किया।अपने हितैषी संबंधियों के उद्देश्य से उन्होंने अनेकों धर्मशाला एवं, प्राचीर तथा पोखरे बनवाये।  धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर तथा अन्य आदरणीय कौरवों की वे पहले की ही भांति सेवा करते और श्रेष्ठ भृत्यों का सम्मान भी किया करते थे। जिनके पति और पुत्र रणभूमि में मारे गये थे, कुरुवंश की संपूर्ण स्त्रियों को वे बड़े सम्मान के साथ रखते दयालु स्वभाव होने के कारण उनके भरण_पोषण का सदा ख्याल रखते थे।दीन_दु:खियों, अंधों तथा अनाथों के रहने के लिये घर बनवाने और उन्हें भोजन एवं वस्त्र की भी सहायता देते थे। सबके साथ कोमलता का वर्ताव करते हुए वे सबके ऊपर कृपा रखते थे।

Tuesday, 7 April 2026

व्यासजी और भगवान् श्रीकृष्ण की सलाह से महाराज युधिष्ठिर का हस्तिनापुर में आना

राजा युधिष्ठिर ने पूछा _'मुनिवर ! मैं राजाओं के और चारों वर्णों के धर्मों को विस्तार से सुनना चाहता हूं। कृपया बताइए कि आपत्ति के समय इन्हें किस नीति से काम लेना चाहिये। आपने प्रायश्चितों के विषय में मुझे जो कुछ सुनाया है, उससे मुझे बड़ा हर्ष हो रहा है। व्यासजी बोले_युधिष्ठिर ! यदि तुम धर्म का पूरा_पूरा रहस्य सुनना चाहते हो तो कुरुवृद्ध पितामह भीष्म के पास जाओ। वे गंगाजी के पुत्र सर्वज्ञ और सब प्रकार के धर्म का मर्म जाननेवाले हैं; इसलिये धर्म के विषय में तुम्हारे मन में जितनी शंकाएं हैं, उन सभी का समाधान कर देंगे। जिस धर्मशास्र को शुक्राचार्य और देवगुरु बृहस्पतिजी जानते हैं, उसी को कुरुश्रेष्ठ भीष्मजी ने शुक्राचार्य और च्वणजई से पूरे विवरण के साथ प्राप्त किया है। उन्होंने ब्रह्मचर्यव्रत की दीक्षा लेकर वशिष्ठजी से अंगोपांग सहित वेदों का अध्ययन किया है, ब्रह्माजी के ज्येष्ठ पुत्र परम तेजस्वी सनत्कुमारजी से आध्यात्म विद्या पायी है, मार्कण्डेयजी से पूर्णतया यतइधर्म सीखा है और परशुरामजी और इन्द्र से अस्त्र विद्या पायी है। मनुष्यों में उत्पन्न होकर भी मृत्यु को उन्होंने इच्छा के अधीन कर लिया है। पवित्र चरित्र ब्रह्मर्षि गण उनके सभासद थे। जब कभी ज्ञानयज्ञ होते थे तो उनमें ऐसी कोई बात नहीं होती थी, जिसे वे न जानते हों। वे धर्म और अर्थ का सूक्ष्म तत्व जानते हैं, वे ही तुम्हें धर्म का उपदेश देंगे। अब कुछ ही समय में वे प्राण छोड़नेवाले हैं। अतः तुम उनके प्राण परित्याग के पहले ही उनके पास पहुंच जाओ। युधिष्ठिर बोले_भगवन् ! मैंने तो अपने बंधु_बान्धवों का बड़ा भीषण और रोमांचकारी संहार किया है। मैं सब लोकों का अपराधी और पृथ्वी का सत्यानाश करनेवाला हूं। यही नहीं, वे सदा ही निष्कपट भाव से युद्ध करते रहे हैं, किन्तु मैंने छल से उनका संहार किया है। ऐसी स्थिति में मैं किस प्रकार उन्हें अपना मुंह दिखा सकता हूं ? वैशम्पायनजी कहते हैं_राजा युधिष्ठिर की यह बात सुनने पर यदुश्रेष्ठ हम श्रीकृष्ण ने चारों वर्णों के हित की कामना से उनसे कहा_'नृपश्रेष्ठ ! अब आप शोक को ही न पकड़े रहें। भगवान् व्यास जैसा कह रहे हैं, वैसा ही करें। ये अतुलित तेजस्वी आपके गुरु के समान हैं; इनकी आज्ञा मानकर आप ब्राह्मणों का, अपने सुहृद् हमलोगों का, द्रौपदी का और संपूर्ण लोकों का हित करें।' श्रीकृष्ण के इस प्रकार कहने पर महामना महाराज युधिष्ठिर सब लोकों के हित के लिये अपने आसन से उठे। वे वेद, उपनिषद्, मीमांसा और नीति आदि सभी शास्त्रों में पारंगत थे। इस समय अपना कर्तव्य निश्चय करके उन्हें बड़ी शान्ति मिली। उन्होंने महाराज धृतराष्ट्र को आगे किया और श्रीकृष्ण आदि सब बन्धु_बां्धवों के साथ हस्तिनापुर में आये। नगर में प्रवेश करते समय उन्होंने देवताओं का तथा हजारों ब्राह्मणों का पूजन किया। वे सफेद रंग के चौदह बैलों से जीते हुए एक नवीन रथ में सवार हुए। वह वस्त्र ऊनी वस्त्र और चमड़े से मंढ़ा हुआ था तथा श्वेत वर्ण का था। उस समय महापराक्रमी कुन्तिनन्दन भीम ने बैलों की बागडोर संभाली, अर्जुन ने कांतिमान् श्वेत छत्र लिया तथा माद्री नन्दन नकुल और सहदेव चंवर और पंखा डुलाने लगे। इस प्रकार जब पांचों भाई सज_धज के साथ रथ पर सवार हुए तो ऐसे मालूम होते ये पांचों भूत ही मूर्तिमान् होकर इ,कट्ठे हो गये हैं। महाराज युधिष्ठिर के पीछे एक रथ पर युयुत्सु चला। इन कौरव और पाण्डवों के बाद शैव्य और सुग्रीव नाम के घोड़ों से जीते हुए एक सुवर्णमय रथ पर चढ़कर सात्यकि के सहित भगवान् श्रीकृष्ण चल रहे थे। धर्मराज के आगे एक पालकी में उनके ज्येष्ठ पितव्य महाराज धृतराष्ट्र गांधारी के साथ जा रहे थे। इन सबके पीछे कुन्ती और द्रौपदी आदि कुरुकुल की स्त्रियां अपनी_अपनी योग्यता के अनुसार सवारियों पर चढ़कर चल रही थीं।
 इनकी देखभाल में विदुरजी थे, वे इनके पीछे चल रहे थे। उनके पीछे सब प्रकार से साज_बाज से सुसज्जित अनेकों रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदलों की पलटन थी। इस प्रकार सूत, मागध और वैतालिकों से स्तुति सुनते हुए महाराज युधिष्ठिर ने नगर में प्रवेश किया। उनकी यह सवारी संसार में अनुपम थी। जिस समय हस्तिनापुर में धर्मराज की सवारी निकली, वहां के नागरिकों ने सारे नगर और राजमार्गो को खूब सजाया था। सड़कों पर सफेद रंग के फूल बिखरे हुए थे, अनेकों ध्वजा पताकाएं लगायी गयी थीं और उन्हें अच्छी तरह से साफ करके धूप से सुगंधित किया गया था। राजमहल को सुगंधित द्रव्यों के चूरे से, तरह_तरह के पुष्पों से और पुष्पों से और पुष्पों की वन्दनवारों से छा दिया गया था। नगर के द्वार पर जल से भरे हुए नवीन कलश रखें हुए थे तथा जहां_तहां श्वेत _वर्ण के फूलों के गुच्छे लगाये गये थे। सब ओर से सउमनओहर स्तुति वाक्य सुनायी पड़ रहे थे। इस प्रकार अपने सुहृदों के साथ महाराज युधिष्ठिर ने खूब सजे_धजे हस्तिनापुर में प्रवेश किया। पाण्डवों के पुरप्रवेश के समय सहस्त्रों पुरवासी उन्हें देखने के लिये इकट्ठे हो गये। उस समय अनेकों पुरनारियां पांचों भाइयों की प्रशंसा कर रही थीं। वे लज्जावश धीरे_धीरे कहने लगी, 'पांचालकुमारी ! तुम धन्य हो, जो तुम्हें इस पुरुष श्रेष्ठों की सेवा का सुअवसर प्राप्त हुआ है। तुम्हारे सभी पुण्यकर्म और व्रत सफल हैं।' उनके ऐसे प्रशंसा वाक्यों से और आपस के प्रेम आलाप से उस समय सारा नगर गूंज रहा था। इस प्रकार महाराज युधिष्ठिर धीरे_धीरे राजमार्ग से निकलकर महल के द्वार पर आये। तब सब दरबारी, नगर निवासी और देश के लोग उनके सामने आये और प्रणाम करके तरह_ तरह की कानों को अच्छी लगनेवाली बातें कहने लगे। वे बोले, महाराज ! बड़े सौभाग्य की बात है कि आपने धर्म के बल के प्रभाव से पुनः अपना खोया हुआ राज्य पा लिया है। आप सौ वर्ष तक हमारे राजा रहें और धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करें। इस प्रकार राजद्वार पर मांगलिक वचनों से उनका सभी ने सत्कार किया तथा ब्राह्मणों ने भी आशीर्वाद दिये। उन सबको यथायोग्य स्वीकार कर महाराज रथ से उतरे और फिर राजभवन की ओर प्रवेश किया। महल के भीतरी भाग में जाकर उन्होंने कुलदेवताओं का दर्शन किया और रत्न, चन्दन तथा माला आदि से उनकी पूजा की। इसके बाद वे फिर महल के बाहर आये और वहां हाथों में मांगलिक द्रव्य लिये खड़े हुए ब्राह्मणों के दर्शन किये। तब महाराज ने गुरु धौम्य तथा महाराज धृतराष्ट्र को आगे रखकर उनकी पुष्प, मोदक, रत्न, सुवर्ण, गौ और वस्त्रादि से विधिवत् पूजा की।सेवक लोग ब्राह्मणों से यह पूछ_पूछकर कि आपकी क्या इच्छा है, उन्हें अभीष्ट पदार्थ देते थे। इसके बाद पुण्याहवाचन का घोष हुआ। उससे सारा आकाश गूंज उठा। वह सुहृदों के लिये आनन्ददायक, परम पवित्र और कानों को सुख देनेवाला था।  इसी समय सब ओर जय की घोषणा करते हुए शंख और दुंदुभियों का मनोरम शब्द होने लगा। इतने में ब्राह्मण के वेश में छिपे हुए राक्षस चार्वाक ने कहा, ' युधिष्ठिर ! इस समय मैं इन सब ब्राह्मणों की ओर से बोल रहा हूं। तुम्हें धिक्कार है । तुम बड़े दुष्ट राजा हो ! तुमने अपने बंधु_बान्धवों की हत्या की है। अपने गुरुजनों को मरवाकर तो अब तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है। इस प्रकार का जीवन किस काम का ?'उसकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर बड़े ही लज्जित और व्याकुल हुए। प्रतिवाद के रूप में उनके मुख से एक भी शब्द न निकला। उन्होंने कहा, 'विप्रगण ! मैं अत्यन्त विनीत होकर आपसे प्रार्थना कर रहा हूं। आप मुझपर प्रसन्न होइये और इस समय मेरे ऊपर बड़ी आपत्ति है, ऐसे समय आपका मुझे धिक्कारना उचित नहीं है। युधिष्ठिर की यह बात सुनकर सब ब्राह्मण बोल उठे, 'महाराज ! यह हमारी बात नहीं कह रहा है। हम तो आशीर्वाद देते हैं कि आपकी राजलक्ष्मी सदा बनी रहे।'फिर उन महात्माओं ने ज्ञानदृष्टि से उसे पहचान लिया और राजा युधिष्ठिर से कहा, 'यह दुर्योधन का मित्र चार्वाक नाम का राक्षस है। इस समय संन्यासी का वेश बनाकर उसका हित चाहता है। धर्मात्मन् ! हम तुमसे ऐसी कोई बात नहीं कहते। तुम्हारा और तुम्हारे भाइयों का कल्याण हो।' राजन् !उसके बाद उन सब ब्राह्मणों ने क्रोध में हुंकार करते हुए उस राक्षस को मार डाला। उनके तेज से वह भस्म होकर गिर गया। राजा ने उन सबकी पूजा की। वे उनका अभिनन्दन करते हुए वहां से विदा हुए। इससे महाराज युधिष्ठिर और उनके सम्बन्धियों को भी बड़ी प्रसन्नता हुई। 


Saturday, 28 February 2026

प्रायश्चित योग्य कर्म, अन्न की अशुद्धि और दान के अनधिकारी के विषय में स्वआम्भउव मनु का प्रसंग

व्यासजी बोले_इस विषय में एक पुरातन इतिहास प्रसिद्ध है। एक बार बहुत _से तपस्वी ऋषि एकत्रित होकर स्वामम्भुव मनु के पास गये और उनसे धर्म का स्वरूप पूछते हुए बोले, दान, अध्ययन, तप, कार्य और अकार्य इनका क्या स्वरूप है ? उनके इस प्रकार पूछने पर मनुजी ने कहा_मैं संक्षेप और विस्तार से धर्म का विस्तार स्वरूप बताता हूं, आप ध्यान देकर सुनें।
 शास्त्र में जिन पापों के प्रायश्चित का उल्लेख नहीं है, उनकी निवृति के लिये मंत्र_जप, होम और उपवास करें, आत्मज्ञान प्राप्त करें, पवित्र नदियों में स्नान करें और जहां प्रायश्चित करनेवाले लोग रहते हैं उन स्थानों में रहे। इन पुण्यकर्मों से, ब्रह्मगिरी आदि पवित्र पर्वतों पर रहने से, सुवर्ण भक्षण करने से, जिनमें रत्न हैं उन नदियों या सरोवरों में स्नान करने से, देवस्थानों में जाने से और घृतपान करने से अवश्य ही मनुष्य की तत्काल शुद्धि हो जाती है। मनुष्य को कभी गर्व नहीं करना चाहिये और यदि दीर्घायु की इच्छा हो तो तप्त कृच्छ्रव्रत की विधि से तीन दिन तक गर्म दूध, घृत और जल का सेवन करना चाहिये। बिना दी हुई वस्तु को न लेना, दान, अध्ययन और तप में तत्पर रहना, अहिंसा, सत्य, अक्रोध और यज्ञ_ये सब धर्म के लक्षण हैं। एक ही क्रिया देश और काल के भेद से धर्म या अधर्म है जाती है। चोरी करना, झूठ बोलना, हिंसा करना आदि अधर्म की अवस्थाविशेष में धर्म माने जाते हैं। विवेकी लोग जानते हैं कि धर्म और अधर्म, ये दोनों ही देश-काल के विचार से अधर्म और धर्म दोनों हो सकते हैं। लोक और वेद में धर्म के दो भेद हैं_प्रवृतिधर्म और निवृति धर्म। इनमें निवृति धर्म का फल मोक्षरूप अमरत्व है और प्रवृति धर्म का जन्म_मरण है। अशुभ कर्म से अशुभ फल मिलता है और शुभ कर्म से शुभ। फलों की शुभाशुभता के कारण ही इन दो प्रकार के कर्मों को शुभ या अशुभ कहते हैं। यदि जानबुझकर कोई अशुभ कर्म हो जाय तो उसके लिये शास्त्र ने प्रायश्चित का विधान किया है। राजा यदि दण्डनीय पुरुष को दण्ड न दे दो उसे उसकी शुद्धि के लिये एक दिन_रात का उपवास करना चाहिये और यदि पुरोहित राजा को धर्मोपदेश न करें तो उसकी शुद्धि तीन दिन उपवास करने से होती है। किन्तु जो पुरुष अपनी जाति, आश्रम या कुल के दर्म को त्याग देते हैं, उनकी शुद्धि किसी प्रायश्चित से नहीं हो सकती। यदि धर्म निर्णय में कोई विवाद हो तो वेद और धर्मशास्त्र को जाननेवाले दस या तीन ब्राह्मणों को बुलाकर उनसे उसका निर्णय करावें और वे जैसा कहें वैसा करें। अब अन्न के विषय में विचार करते हैं। प्रेत के निमित्त बनाया हुआ अन्न, सूतिका का अन्न दस दिन से पूर्व नहीं खाना चाहिये, इसी प्रकार ब्याई हुई गौ का दूध भी दस दिन तक न पीवे।  राजा का अन्न तेज को नष्ट करता है, शूद्र का अन्न ब्राह्मतेज का नाशक है तथा सुधार और पति या पुत्रहीना स्त्री का अन्न आयु का क्षय करता है। ब्याजखोर का अन्न विष्ठा के समान है और वेश्या का वीर्य के समान। कायर, यज्ञविक्रेता, बढ़ई, मोची, व्यभिचारिणी स्त्री, धोबी, वैद्य और चौकीदार इन सबका अन्न भी खाने योग्य नहीं है। जिन्हें समाज या गांव ने दोषी ठहराया हो, जो नर्तकी के द्वारा अपनी जीविका चलाते हैं और जिन्होंने अपने बड़े भाई के अविवाहित रहते अपना विवाह कर लिया है, उनका तथा वन्दिजन और जुआरियों का भी अन्न अखाद्य है। जो बातें हाथ से लाया गया हो, जो बासी हो, जिसपर मद्य के छींटें पड़ गये हों, जो जूठा हो और जिसे कुटुम्ब से छिपाकर अपनेलिए रखा है वह अन्न खाने योग्य नहीं होता।  इसी प्रकार जो पदार्थ आटे, ईख, शाक या दूध को बिगाड़कर बनाये गये हों वे भी नहीं खाने चाहिये। सत्तू, जो की कीलें और दही में मिले हुए सत्तू ये अधिक देर हो जाने पर खाने योग्य नहीं रहते। खीर, खिचड़ी और मालपुए यदि देवता के उद्देश्य से न बनायें जायं तो नहीं खाने चाहिये, गृहस्थ पुरुष देवता, ऋषि, अतिथि, पितर और कुलदेवताओं को नैवेद्य समर्पण करने के बाद ही भोजन कर सकता है। उसे घर में संन्यासी के समान अनासक्त_भाव से रहना चाहिये। जो अपनी अनुकुल स्त्री के साथ इस प्रकार घर में रहता है, वह धर्म का पूरा फल प्राप्त कर लेता है। धर्मात्मा पुरुष को चाहिये कि यश और लोभ से, भय के कारण अथवा अपना उपकार करनेवाले को दान न दे। जो नाचने_गानेवाले, हंसी_मजाक करनेवाले ( भांड़ ) आदि, उन्मत्त, उन्मत, चोर, निंदा करनेवाले, गूंगे, तेजोहीन, अंगहीन, बौने, दुष्ट, कुलहीन या संस्कार शून्य हैं, उन्हें भी दान न दें।जिसने वेदाध्ययन न किया हो उस ब्राह्मण को दान देना उचित नहीं है। ऐसा करने से दान देनेवाले और दान लेनेवाले दोनों को ही हानि होती है।जिस प्रकार खैर की लकड़ी या पत्थर की शिला का आश्रय लेकर समुद्र पार करनेवाला व्यक्ति बीच में ही डूब जाता है, उसी प्रकार ऐसे दाता और गृहीता दोनों ही नरक में डूबते हैं।
 जिस प्रकार लकड़ी गीली हने पर अग्नि प्रज्जवलित नहीं होती, उसी प्रकार जिस दिन लेनेवाले में तप, स्वाध्याय और सदाचार का अभाव होता है वह अच्छा नहीं जान पड़ता। जिस प्रकार मनुष्य की खोपड़ी में भरा हुआ जल और कुत्ते की खाल में भरा हुआ दूध आपके आश्रय के दोष से अपवित्र हो जाते हैं, उसी प्रकार दुराचारी के संसर्ग के शास्त्राभ्यास दूषित हो जाता है। जो ब्राह्मण वेदहीन और अशात्रज्ञ होते हुए भी संतोषी और दूसरे के गुणों में दोष न देखनेवाला है, उसे दया करके ही दान देना चाहिये। उन्हें देना शिष्टों का आचार है अथवा ऐसा करने से पुण्य होता है_यह समझकर उसे कुछ नहीं दिया जा सकता, क्योंकि जैसे लकड़ी का हाथी और चाम का हरिण, ये नाममात्र के ही होते हैं, उसी प्रकार बिना पढ़ा हुआ ब्राह्मण भी केवल नाम का ही होता है। जिस प्रकार जलहीन कुआं और राख में किया हुआ हवन व्यर्थ होता है, उसी प्रकार मूर्ख को दिया हुआ दान भी निष्फल होता है। दान लेनेवाला मूर्ख तो दाता का शत्रु है, वह उसका धन हरण करता है और देवता एवं पितरों के हव्य_कव्य का नाश करता है। उसे दान लेनेवाला पुण्य लोकों को प्राप्त नहीं कर सकता। युधिष्ठिर ! तुमने जो पूछा था उसके अनुसार मैंने संक्षेप में स्वामम्भुव मनु का यह पूरा प्रसंग सुना दिया। यह महत्वशाली प्रसंग सभी कल्याणकामियों को सुनना चाहिये।

Wednesday, 4 February 2026

पाप और उनके प्रायश्चित्तों का वर्णन

युधिष्ठिर ने पूछा_पितामह ! कृपा करके यह बताइएये कि किन कर्मों को करने से मनुष्य प्रायश्चित का भागी बनता है और ऐसी स्थिति में क्या करने से वह पापयुक्त होता है ? व्यासजी ने कहा_ जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्मों का आचरण न करके निषिद्ध कर्म कर बैठता है, उसे ऐसा विपरीत आचरण करने से प्रायश्चित्त कर भागी बनना पड़ता है। जो ब्रह्मचारी सूर्योदय या सूर्यास्त के समय होता रहे अथवा जिस पुरुष के वस्त्र या दांत काले हो, उन्हें प्रायश्चित करना चाहिये। इसके सिवा बड़े भाई के अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई, ब्राह्मण का वध करनेवाला, निन्दा, छोटी कन्या का विवाह हो जाने के बाद उसकी बड़ी बहिन से विवाह करनेवाला, बड़ी बहिन के अविवाहित रहते हुए उसकी छोटी बहिन से विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी,, द्विज की हत्या करनेवाला, सुपात्र को दान न देनेवाला, मांस बेचने वाला, आग लगानेवाला और स्त्री वध करनेवाला, दूसरों का घर जलानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरु का अपमान तथा सदाचार की मर्यादा का उल्लंघन करनेवाला_ये सभी पापी माने जाते हैं, इन्हें प्रायश्चित करना चाहिए। इनके सिवा, जो लोक और वेद से विरुद्ध दूसरे न करने योग्य कर्म हैं, उन्हें भी बताता हूं, तुम एकाग्रचित्त से सुनो। अपने धर्म को त्यागना, दूसरे के धर्म का आचरण करना, यज्ञ करने के अनाधिकारी से यज्ञ कराना, अभक्ष्य भक्षण करना, शरणागत को त्यागना, माता_पिता और भरण_पोषण के अधिकारी सेवक आदि का भरण_पोषण न करना, दूध_दही आदि रसों को बेचना, पशु_पक्षियों को मारना, ब्राह्मणों को दक्षिणा न देना और ब्राह्मणों का धन छीन लेना_धर्मतत्व को जाननेवालों ने ये सभी कर्मन करने योग्य बताये हैं।राजन् ! जो पुरुष पिता के साथ झगड़ा करता है, गुरु स्त्री के साथ समागम करता है और ऋतुकाल होने पर अपनी स्त्री के साथ सहवास नहीं करता, वह धर्म का त्याग करनेवाला है। राजन् ! जो पुरुष पिता के साथ झगड़ा करता है, गुरु स्त्री के साथ समागम करता है और ऋतुकाल होने पर अपनी स्त्री के साथ सहवास नहीं करता, वह धर्म का त्याग करनेवाला है। इस प्रकार संक्षेप में विस्तार से ऊपर जो कर्म कहे गये हैं, इनमें से किन्हीं को करने पर और किन्हीं को न करने पर मनुष्य प्रायश्चित का भागी होता है। अब जिन_जिन कारणों से इन कर्मोंको करने पर भी मनुष्य को पाप नहीं लगता वह सुनो। यदि युद्धस्थल में कोई वेद_वेदान्तों का पारगामी ब्राह्मण भी हाथ में हथियार लेकर मारने के लिये आवे तो उसका वध करने से ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता।राजन् ! इस विषय में वेद का मंत्र भी है। मैं तुमसे वही बात कह रहा हूं जो वेद_वाक्य के अनुसार धर्म यानी गयी है। यदि कोई पुरुष अपने धर्म में डिगे हुए आततायी ब्राह्मण को मार डाले तो इससे भी वह ब्रह्महत्यारा नहीं होता। अनजान में अथवा प्राण संकट के समय भी यदि मदिरा पान कर लें तो बाद में धर्मात्माओं की आज्ञा के अनुसार उसका पुनः संस्कार होना चाहिये। इसी प्रकार अन्य सब अभक्ष्य लक्षणों के विषय में भी समझना चाहिये। यदि कभी ऐसी कोई भूल हो जाय तो प्रायश्चित से ही उसकी शुद्धि होती है।
चोरी सर्वथा निषिद्ध ही है, किन्तु आपत्ति के समय यदि गुरु के लिये चोरी की जाय तो उसमें दोष नहीं है। यदि चोरी करने में किसी प्रकार की कामना न हो, उससे प्राप्त हुई वस्तु को स्वयं न भोगा जाय तथा आपत्काल में ब्राह्मण के सिवा किसी अन्य का धन ले लिया जाय तो भी चोरी का पाप नहीं लगता। अपने या किसी दूसरे के प्राणों की रक्षा के लिये, गुरु के लिये, एकान्त में स्त्री के साथ अथवा विवाह के प्रसंग में झूठ बोलने से भी पाप नहीं होता। यदि किसी कारण से स्वप्न में वीर्य स्खलित हो जाय तो इससे ब्रह्मचारी का व्रत भंग नहीं होता, किन्तु इसके लिये उसे प्रज्जवलित अग्नि में घृत की आहुतियां छोड़कर प्रायश्चित करना चाहिये। यदि बड़ा भाई पतित हो जाय या संन्यास ले ले तो छोटे भाई को विवाह करने में दोष नहीं है।  अज्ञानवश किसी आपात्र ब्राह्मण को दान देने से तथा योग्य ब्राह्मण का सत्कार न करने से भी कोई दोष नहीं है। व्यभिचारिणी स्त्री का तिरस्कार करने में भी कोई दोष नहीं है। ऐसा करने से तो उसकी शुद्धि ही होती है और उसका भरण_पोषण करनेवाले को कोई दोष भी नहीं लगता। जो सेवक कामकाज करने में असमर्थ हैं, उसे त्यागने में दोष नहीं है तथा गऔओं के लिये वन में आग लगाने में भी दोष नहीं माना जाता। राजन् ! ये सब तो मैंने वे कर्म बताये जिन्हें करने से कोई दोष नहीं होता। अब मैं विस्तारपूर्वक प्रायश्चित्तों का वर्णन करता हूं। राजन् ! कृच्छ्र_चान्द्रायणादि तप, अग्निहोत्र आदि कर्म और दान के द्वारा मनुष्य तभी अपने पाप से छूट सकता है, जब वह फिर पाप में प्रवृत न हो। यदि किसी ने ब्रह्महत्या की हो तो वह भिक्षा मांगकर एक समय भोजन करें, अपना सब काम स्वयं ही करें, हाथ में खप्पर और आंग्लांग ( खाट का पाया रखें, नित्य ब्रह्मचर्य व्रत रखें, भिक्षा मांगने के समय सर्वदा खड़ा रहे, किसी से ईर्ष्या न करें, पृथ्वी पर शयन करें और लोक में अपने कर्म को प्रकट करें। इस प्रकार बारह वर्ष तक करने से उसकी शुद्धि हो जाती है। अथवा अपनी इच्छा से किसी शस्त्रधारी विद्वान का निशाना बन जाय या जलती हुई आग में गिरे अथवा नीचे सिर किये किसी भी वेद का पाठ करते हुए तीन बार सौ_सो योजन की यात्रा करें या किसी वेदज्ञ ब्राह्मण को अपना सर्वस्व समर्पण कर दे, अथवा जिनसे जीवन भर निर्वाह हो सके इतना धन या सब सामान से भरा हुआ घर ब्राह्मण को दान करे । इस प्रकार गौ और ब्राह्मणों की रक्षा करनेवाले पुरुषों की ब्रह्महत्या से मुक्ति हो सकती है। यदि कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार भोजन करने से तीन वर्षों में एक_एक मांस में भोजनक्रम का परिवर्तन करते हुए अत्यन्त तीव्र कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार अन्न ग्रहण करें तो एक वर्ष में ब्रह्महत्या से छुटकारा हो सकता है।' तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना मांगे जो मिल जाय वह का लेना तथा तीन दिन उपवास करना_इस प्रकार बारह दिन का कृ्च्छ्रव्रत होता है। इसी क्रम से छः वर्ष तक रहने से ब्रह्महत्या छूट सकती है। यही क्रम यदि तीन_तीन दिन में परिवर्तित न होकर एक एक सप्ताह में और विषम मासों में आठ_आठ दिन बदलते हुए एक एक मास के कृ्च्छ्रव्रत के नुसार चले तो तीन वर्षों में शुद्धि हो जायगी और यदि एक मास अयाचित भोजन तथा एक मास उपवास _इस प्रकार चार_चार मांस के कृ्च्छ्रव्रत के अनुसार चले तो एक ही वर्ष में ब्रह्महत्या का पाप छूट जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार यदि उपवास ही किया जाय तो और भी जल्दी शुद्धि हो सकती है। इसके सिवा अश्वमेध यज्ञ से भी नि:संदेह यह पाप छूट सकता है। श्रुति का कथन है कि जो इस प्रकार के लोग अवभृथ (यज्ञान्त ) स्नान करते हैं वे सभी सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं। जो पुरुष ब्राह्मण के लिये युद्ध में प्राण दे देता है, वह भी ब्रह्महत्या से छूट जाता है। ब्रह्महत्यारा होने पर भी जो सुपात्र ब्राह्मणों को एक लाख गौएं दान देता है उसके तो सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य दूध देनेवाली पच्चीस हजार कपिला गौएं सुपात्रों को दान करता है, वह भी सब पापों से छूट जाता है। मरने के समय दरिद्र और सत्पुरुषों को बछड़े वाले एक हजार दुधारू गौएं देने से भी मनुष्य इस पाप से मुक्त हो सकता है।जो राजा सुपात्र ब्राह्मणों को कम्बोज देश में उत्पन्न हुए सौ घोड़े दान करता है, वह भी ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाता है। जो व्यक्ति किसी एक पुरुष को उसका मनोरथ पूर्ण होने योग्य दान देता है और फिर किसी के आगे उसकी जिक्र नहीं करता वह भी पापयुक्त हो जाता है। जलहीन देश में पर्वत से गिरकर और अग्नि में प्रवेश करके अथवा महआप्रस्थआन की विधि से हिमालय में गलकर प्राण दे देने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। यदि किसी ब्राह्मण ने मद्यपान किया है तो वृहस्पतिवार भाग करने से उसकी शुद्धि हो जाती है। एकबार मद्य पीने पर जो निष्कपट भाव से भूमिदान करता है और फिर कभी शराब नहीं छूता वह भी शुद्ध हो जाता है। जो पुरुष गुरुपत्नी के साथ समागम करता है वह या तो जलती हुई लोहे की शिला पर पड़ जाय या अपनी मूत्रएन्द्रइय को काटकर ऊपर की ओर देखता हुआ दूर तक चला जाय।इसके सिवा, अपना शरीर त्याग देने से भी वह इस पाप से मुक्त छूट सकता है। अथवा जो महाव्रत का ( एक महीने तक जल भी न पीने के नियम का ) पालन करता है, ब्राह्मणों को अपना सर्वस्व दे देता है या गुरु के लिये युद्ध में प्राण होम देता है वह भी इस पाप से मुक्त हो जाता है।
झूठ बोलकर आजीविका चलानेवाला अथवा गुरु का अपमान करनेवाला पुरुष गुरुजी को मनचाही वस्तु देकर प्रसन्न कर लेने से उसे पाप से छूट जाता है। जिसका ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित हो गया हो, उसे ब्रह्महत्या के लिये बताया हुआ प्रायश्चित करना चाहिए। अथवा छः महीने तक शरीर पर गौ का चमड़ा ओढ़ने से वह उस पाप से छूट सकता है। यदि कोई मनुष्य किसी का धन चुरा ले तो किसी_न_किसी उपाय से उसे उतना ही धन लौटा लेने से वह उस पाप से मुक्त हो सकता है। बड़े भाई के अविवाहित रहते विवाह करनेवाला छोटा भाई और उसका बड़ा भाई दोनों संयमपूर्वक बारह दिन का कृ्च्छ्रव्रत करने से पवित्र हो जाते हैं। इसके सिवा, यदि वह छोटा भाई बड़े भाई के कर लेने पर अपनी विवाहिता स्त्री के साथ फिर फिर विवाह संस्कार करा लें तो क्त दोष निवृत हो जाता है और ऐसा करने से स्त्री को भी कोई दोष नहीं होता। यदि अपनी स्त्री के प्रति किसी पाप आचरण की शंका हो तो पुन: रजस्वला हो स्नान करने तक उसका समागम न करें। भस्म से जैसे बर्तन साफ हो जाते हैं, उसी प्रकार रजशुद्धि से स्त्री शुद्ध हो जाती है।पशु_पक्षियों के वध करनेवाला तथा तरह_तरह के बहुत _से पेड़ों को काटनेवाला पुरुष तीन दिन तक वायु भक्षण करें और लोगों के सामने अपना कुकर्म प्रकट कर दे। इससे वह शुद्ध हो जाता है।
जो पुरुष किसी प्रकार की हिंसा नहीं करता, राग_द्वेष एवं मान-अपमान से शून्य है, विशेष भाषण नहीं करता और मिताहार करते हुए पवित्र और एकान्त देश में रहकर गायत्री का जप करता है, वह सब पापों से मुक्त है जाता है। अन्य सब प्रकार के पापों की मुक्ति के लिये भी, ब्राह्मणों ने धर्माधर्म के निर्णय में प्रमाणभूत शास्त्रों के कथन से यही विधि निश्चित की है। जो मनुष्य दिन में आकाश की ओर दृष्टि रखता है, रात्रि में खुले मैदान में सोता है, तीन बार दिन में और तीन बार रात्रि में वस्त्रों सहित जल में घुसकर स्नान करता है और इस व्रत का पालन करते समय स्त्री, शूद्र और पतित से बात नहीं करता वह अज्ञानवश किये हुए सब पापों से मुक्त हो जाता है। मनुष्य को अपने किये हुए शुभ या अशुभ कर्म का फल मरने के बाद भोगना पड़ता है। इसमें जिसकी अधिकता होती है, उसी का फल उसे मिलता है। इसलिये दान, तप और शुभ कर्मों के द्वारा पुण्य की ही वृद्धि करनी चाहिये, जिससे वह पाप को दबाकर स्वयं बढ़ सके। सर्वदा शुभ कर्मों का आचरण करें, पापकर्म से दूर रहें और सुपात्र को धन दान करें ऐसा करने से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
राजन् ! इसी प्रकार विवेकी पुरुष के लिये लक्ष्य और अभक्ष्य, वाच्य और अवाच्य तथा जानबूझकर और बिना जाने हुए पापों के भी प्रायश्चित बताये गये हैं। जो पाप जानबूझकर किया जाता है वह बड़ा होता है और अनजापंन में शिक्षा हुआ पाप छोटा माना जाता है। ऊपर कहीं हुई विधि से पाप निवृति हो सकती है। जो आस्तिक और श्रद्धालु है उसी के लिये यह विधि कहीं गयी है। नास्तिक, अश्रद्धा दु और दम्भ एवं द्वेषप्रधान पुरुषों के लिये इसका कोई उपयोग नहीं है। जो पुरुष मरकर सुख भोगना चाहता है, उसे श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण एवं धर्म का सेवन करना चाहिये। राजन् ! तुमने अपने प्राणों की रक्षा के लिये अथवा स्वधर।म के पालन के लिये ही इनका वध किया है; इसलिये तुम तो इतने ही कारण से इस पाप से सर्वथा मुक्त हो जाओगे। फिर भी यदि तुम्हें कुछ पश्चाताप है तो प्रायश्चित करो। इस प्रकार अनार्य पुरुषों की तरह रोष में भरकर अपना नाश मत करो।