Saturday, 28 February 2026

प्रायश्चित योग्य कर्म, अन्न की अशुद्धि और दान के अनधिकारी के विषय में स्वआम्भउव मनु का प्रसंग

व्यासजी बोले_इस विषय में एक पुरातन इतिहास प्रसिद्ध है। एक बार बहुत _से तपस्वी ऋषि एकत्रित होकर स्वामम्भुव मनु के पास गये और उनसे धर्म का स्वरूप पूछते हुए बोले, दान, अध्ययन, तप, कार्य और अकार्य इनका क्या स्वरूप है ? उनके इस प्रकार पूछने पर मनुजी ने कहा_मैं संक्षेप और विस्तार से धर्म का विस्तार स्वरूप बताता हूं, आप ध्यान देकर सुनें।
 शास्त्र में जिन पापों के प्रायश्चित का उल्लेख नहीं है, उनकी निवृति के लिये मंत्र_जप, होम और उपवास करें, आत्मज्ञान प्राप्त करें, पवित्र नदियों में स्नान करें और जहां प्रायश्चित करनेवाले लोग रहते हैं उन स्थानों में रहे। इन पुण्यकर्मों से, ब्रह्मगिरी आदि पवित्र पर्वतों पर रहने से, सुवर्ण भक्षण करने से, जिनमें रत्न हैं उन नदियों या सरोवरों में स्नान करने से, देवस्थानों में जाने से और घृतपान करने से अवश्य ही मनुष्य की तत्काल शुद्धि हो जाती है। मनुष्य को कभी गर्व नहीं करना चाहिये और यदि दीर्घायु की इच्छा हो तो तप्त कृच्छ्रव्रत की विधि से तीन दिन तक गर्म दूध, घृत और जल का सेवन करना चाहिये। बिना दी हुई वस्तु को न लेना, दान, अध्ययन और तप में तत्पर रहना, अहिंसा, सत्य, अक्रोध और यज्ञ_ये सब धर्म के लक्षण हैं। एक ही क्रिया देश और काल के भेद से धर्म या अधर्म है जाती है। चोरी करना, झूठ बोलना, हिंसा करना आदि अधर्म की अवस्थाविशेष में धर्म माने जाते हैं। विवेकी लोग जानते हैं कि धर्म और अधर्म, ये दोनों ही देश-काल के विचार से अधर्म और धर्म दोनों हो सकते हैं। लोक और वेद में धर्म के दो भेद हैं_प्रवृतिधर्म और निवृति धर्म। इनमें निवृति धर्म का फल मोक्षरूप अमरत्व है और प्रवृति धर्म का जन्म_मरण है। अशुभ कर्म से अशुभ फल मिलता है और शुभ कर्म से शुभ। फलों की शुभाशुभता के कारण ही इन दो प्रकार के कर्मों को शुभ या अशुभ कहते हैं। यदि जानबुझकर कोई अशुभ कर्म हो जाय तो उसके लिये शास्त्र ने प्रायश्चित का विधान किया है। राजा यदि दण्डनीय पुरुष को दण्ड न दे दो उसे उसकी शुद्धि के लिये एक दिन_रात का उपवास करना चाहिये और यदि पुरोहित राजा को धर्मोपदेश न करें तो उसकी शुद्धि तीन दिन उपवास करने से होती है। किन्तु जो पुरुष अपनी जाति, आश्रम या कुल के दर्म को त्याग देते हैं, उनकी शुद्धि किसी प्रायश्चित से नहीं हो सकती। यदि धर्म निर्णय में कोई विवाद हो तो वेद और धर्मशास्त्र को जाननेवाले दस या तीन ब्राह्मणों को बुलाकर उनसे उसका निर्णय करावें और वे जैसा कहें वैसा करें। अब अन्न के विषय में विचार करते हैं। प्रेत के निमित्त बनाया हुआ अन्न, सूतिका का अन्न दस दिन से पूर्व नहीं खाना चाहिये, इसी प्रकार ब्याई हुई गौ का दूध भी दस दिन तक न पीवे।  राजा का अन्न तेज को नष्ट करता है, शूद्र का अन्न ब्राह्मतेज का नाशक है तथा सुधार और पति या पुत्रहीना स्त्री का अन्न आयु का क्षय करता है। ब्याजखोर का अन्न विष्ठा के समान है और वेश्या का वीर्य के समान। कायर, यज्ञविक्रेता, बढ़ई, मोची, व्यभिचारिणी स्त्री, धोबी, वैद्य और चौकीदार इन सबका अन्न भी खाने योग्य नहीं है। जिन्हें समाज या गांव ने दोषी ठहराया हो, जो नर्तकी के द्वारा अपनी जीविका चलाते हैं और जिन्होंने अपने बड़े भाई के अविवाहित रहते अपना विवाह कर लिया है, उनका तथा वन्दिजन और जुआरियों का भी अन्न अखाद्य है। जो बातें हाथ से लाया गया हो, जो बासी हो, जिसपर मद्य के छींटें पड़ गये हों, जो जूठा हो और जिसे कुटुम्ब से छिपाकर अपनेलिए रखा है वह अन्न खाने योग्य नहीं होता।  इसी प्रकार जो पदार्थ आटे, ईख, शाक या दूध को बिगाड़कर बनाये गये हों वे भी नहीं खाने चाहिये। सत्तू, जो की कीलें और दही में मिले हुए सत्तू ये अधिक देर हो जाने पर खाने योग्य नहीं रहते। खीर, खिचड़ी और मालपुए यदि देवता के उद्देश्य से न बनायें जायं तो नहीं खाने चाहिये, गृहस्थ पुरुष देवता, ऋषि, अतिथि, पितर और कुलदेवताओं को नैवेद्य समर्पण करने के बाद ही भोजन कर सकता है। उसे घर में संन्यासी के समान अनासक्त_भाव से रहना चाहिये। जो अपनी अनुकुल स्त्री के साथ इस प्रकार घर में रहता है, वह धर्म का पूरा फल प्राप्त कर लेता है। धर्मात्मा पुरुष को चाहिये कि यश और लोभ से, भय के कारण अथवा अपना उपकार करनेवाले को दान न दे। जो नाचने_गानेवाले, हंसी_मजाक करनेवाले ( भांड़ ) आदि, उन्मत्त, उन्मत, चोर, निंदा करनेवाले, गूंगे, तेजोहीन, अंगहीन, बौने, दुष्ट, कुलहीन या संस्कार शून्य हैं, उन्हें भी दान न दें।जिसने वेदाध्ययन न किया हो उस ब्राह्मण को दान देना उचित नहीं है। ऐसा करने से दान देनेवाले और दान लेनेवाले दोनों को ही हानि होती है।जिस प्रकार खैर की लकड़ी या पत्थर की शिला का आश्रय लेकर समुद्र पार करनेवाला व्यक्ति बीच में ही डूब जाता है, उसी प्रकार ऐसे दाता और गृहीता दोनों ही नरक में डूबते हैं।
 जिस प्रकार लकड़ी गीली हने पर अग्नि प्रज्जवलित नहीं होती, उसी प्रकार जिस दिन लेनेवाले में तप, स्वाध्याय और सदाचार का अभाव होता है वह अच्छा नहीं जान पड़ता। जिस प्रकार मनुष्य की खोपड़ी में भरा हुआ जल और कुत्ते की खाल में भरा हुआ दूध आपके आश्रय के दोष से अपवित्र हो जाते हैं, उसी प्रकार दुराचारी के संसर्ग के शास्त्राभ्यास दूषित हो जाता है। जो ब्राह्मण वेदहीन और अशात्रज्ञ होते हुए भी संतोषी और दूसरे के गुणों में दोष न देखनेवाला है, उसे दया करके ही दान देना चाहिये। उन्हें देना शिष्टों का आचार है अथवा ऐसा करने से पुण्य होता है_यह समझकर उसे कुछ नहीं दिया जा सकता, क्योंकि जैसे लकड़ी का हाथी और चाम का हरिण, ये नाममात्र के ही होते हैं, उसी प्रकार बिना पढ़ा हुआ ब्राह्मण भी केवल नाम का ही होता है। जिस प्रकार जलहीन कुआं और राख में किया हुआ हवन व्यर्थ होता है, उसी प्रकार मूर्ख को दिया हुआ दान भी निष्फल होता है। दान लेनेवाला मूर्ख तो दाता का शत्रु है, वह उसका धन हरण करता है और देवता एवं पितरों के हव्य_कव्य का नाश करता है। उसे दान लेनेवाला पुण्य लोकों को प्राप्त नहीं कर सकता। युधिष्ठिर ! तुमने जो पूछा था उसके अनुसार मैंने संक्षेप में स्वामम्भुव मनु का यह पूरा प्रसंग सुना दिया। यह महत्वशाली प्रसंग सभी कल्याणकामियों को सुनना चाहिये।

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