Tuesday, 7 April 2026

व्यासजी और भगवान् श्रीकृष्ण की सलाह से महाराज युधिष्ठिर का हस्तिनापुर में आना

राजा युधिष्ठिर ने पूछा _'मुनिवर ! मैं राजाओं के और चारों वर्णों के धर्मों को विस्तार से सुनना चाहता हूं। कृपया बताइए कि आपत्ति के समय इन्हें किस नीति से काम लेना चाहिये। आपने प्रायश्चितों के विषय में मुझे जो कुछ सुनाया है, उससे मुझे बड़ा हर्ष हो रहा है। व्यासजी बोले_युधिष्ठिर ! यदि तुम धर्म का पूरा_पूरा रहस्य सुनना चाहते हो तो कुरुवृद्ध पितामह भीष्म के पास जाओ। वे गंगाजी के पुत्र सर्वज्ञ और सब प्रकार के धर्म का मर्म जाननेवाले हैं; इसलिये धर्म के विषय में तुम्हारे मन में जितनी शंकाएं हैं, उन सभी का समाधान कर देंगे। जिस धर्मशास्र को शुक्राचार्य और देवगुरु बृहस्पतिजी जानते हैं, उसी को कुरुश्रेष्ठ भीष्मजी ने शुक्राचार्य और च्वणजई से पूरे विवरण के साथ प्राप्त किया है। उन्होंने ब्रह्मचर्यव्रत की दीक्षा लेकर वशिष्ठजी से अंगोपांग सहित वेदों का अध्ययन किया है, ब्रह्माजी के ज्येष्ठ पुत्र परम तेजस्वी सनत्कुमारजी से आध्यात्म विद्या पायी है, मार्कण्डेयजी से पूर्णतया यतइधर्म सीखा है और परशुरामजी और इन्द्र से अस्त्र विद्या पायी है। मनुष्यों में उत्पन्न होकर भी मृत्यु को उन्होंने इच्छा के अधीन कर लिया है। पवित्र चरित्र ब्रह्मर्षि गण उनके सभासद थे। जब कभी ज्ञानयज्ञ होते थे तो उनमें ऐसी कोई बात नहीं होती थी, जिसे वे न जानते हों। वे धर्म और अर्थ का सूक्ष्म तत्व जानते हैं, वे ही तुम्हें धर्म का उपदेश देंगे। अब कुछ ही समय में वे प्राण छोड़नेवाले हैं। अतः तुम उनके प्राण परित्याग के पहले ही उनके पास पहुंच जाओ। युधिष्ठिर बोले_भगवन् ! मैंने तो अपने बंधु_बान्धवों का बड़ा भीषण और रोमांचकारी संहार किया है। मैं सब लोकों का अपराधी और पृथ्वी का सत्यानाश करनेवाला हूं। यही नहीं, वे सदा ही निष्कपट भाव से युद्ध करते रहे हैं, किन्तु मैंने छल से उनका संहार किया है। ऐसी स्थिति में मैं किस प्रकार उन्हें अपना मुंह दिखा सकता हूं ? वैशम्पायनजी कहते हैं_राजा युधिष्ठिर की यह बात सुनने पर यदुश्रेष्ठ हम श्रीकृष्ण ने चारों वर्णों के हित की कामना से उनसे कहा_'नृपश्रेष्ठ ! अब आप शोक को ही न पकड़े रहें। भगवान् व्यास जैसा कह रहे हैं, वैसा ही करें। ये अतुलित तेजस्वी आपके गुरु के समान हैं; इनकी आज्ञा मानकर आप ब्राह्मणों का, अपने सुहृद् हमलोगों का, द्रौपदी का और संपूर्ण लोकों का हित करें।' श्रीकृष्ण के इस प्रकार कहने पर महामना महाराज युधिष्ठिर सब लोकों के हित के लिये अपने आसन से उठे। वे वेद, उपनिषद्, मीमांसा और नीति आदि सभी शास्त्रों में पारंगत थे। इस समय अपना कर्तव्य निश्चय करके उन्हें बड़ी शान्ति मिली। उन्होंने महाराज धृतराष्ट्र को आगे किया और श्रीकृष्ण आदि सब बन्धु_बां्धवों के साथ हस्तिनापुर में आये। नगर में प्रवेश करते समय उन्होंने देवताओं का तथा हजारों ब्राह्मणों का पूजन किया। वे सफेद रंग के चौदह बैलों से जीते हुए एक नवीन रथ में सवार हुए। वह वस्त्र ऊनी वस्त्र और चमड़े से मंढ़ा हुआ था तथा श्वेत वर्ण का था। उस समय महापराक्रमी कुन्तिनन्दन भीम ने बैलों की बागडोर संभाली, अर्जुन ने कांतिमान् श्वेत छत्र लिया तथा माद्री नन्दन नकुल और सहदेव चंवर और पंखा डुलाने लगे। इस प्रकार जब पांचों भाई सज_धज के साथ रथ पर सवार हुए तो ऐसे मालूम होते ये पांचों भूत ही मूर्तिमान् होकर इ,कट्ठे हो गये हैं। महाराज युधिष्ठिर के पीछे एक रथ पर युयुत्सु चला। इन कौरव और पाण्डवों के बाद शैव्य और सुग्रीव नाम के घोड़ों से जीते हुए एक सुवर्णमय रथ पर चढ़कर सात्यकि के सहित भगवान् श्रीकृष्ण चल रहे थे। धर्मराज के आगे एक पालकी में उनके ज्येष्ठ पितव्य महाराज धृतराष्ट्र गांधारी के साथ जा रहे थे। इन सबके पीछे कुन्ती और द्रौपदी आदि कुरुकुल की स्त्रियां अपनी_अपनी योग्यता के अनुसार सवारियों पर चढ़कर चल रही थीं।
 इनकी देखभाल में विदुरजी थे, वे इनके पीछे चल रहे थे। उनके पीछे सब प्रकार से साज_बाज से सुसज्जित अनेकों रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदलों की पलटन थी। इस प्रकार सूत, मागध और वैतालिकों से स्तुति सुनते हुए महाराज युधिष्ठिर ने नगर में प्रवेश किया। उनकी यह सवारी संसार में अनुपम थी। जिस समय हस्तिनापुर में धर्मराज की सवारी निकली, वहां के नागरिकों ने सारे नगर और राजमार्गो को खूब सजाया था। सड़कों पर सफेद रंग के फूल बिखरे हुए थे, अनेकों ध्वजा पताकाएं लगायी गयी थीं और उन्हें अच्छी तरह से साफ करके धूप से सुगंधित किया गया था। राजमहल को सुगंधित द्रव्यों के चूरे से, तरह_तरह के पुष्पों से और पुष्पों से और पुष्पों की वन्दनवारों से छा दिया गया था। नगर के द्वार पर जल से भरे हुए नवीन कलश रखें हुए थे तथा जहां_तहां श्वेत _वर्ण के फूलों के गुच्छे लगाये गये थे। सब ओर से सउमनओहर स्तुति वाक्य सुनायी पड़ रहे थे। इस प्रकार अपने सुहृदों के साथ महाराज युधिष्ठिर ने खूब सजे_धजे हस्तिनापुर में प्रवेश किया। पाण्डवों के पुरप्रवेश के समय सहस्त्रों पुरवासी उन्हें देखने के लिये इकट्ठे हो गये। उस समय अनेकों पुरनारियां पांचों भाइयों की प्रशंसा कर रही थीं। वे लज्जावश धीरे_धीरे कहने लगी, 'पांचालकुमारी ! तुम धन्य हो, जो तुम्हें इस पुरुष श्रेष्ठों की सेवा का सुअवसर प्राप्त हुआ है। तुम्हारे सभी पुण्यकर्म और व्रत सफल हैं।' उनके ऐसे प्रशंसा वाक्यों से और आपस के प्रेम आलाप से उस समय सारा नगर गूंज रहा था। इस प्रकार महाराज युधिष्ठिर धीरे_धीरे राजमार्ग से निकलकर महल के द्वार पर आये। तब सब दरबारी, नगर निवासी और देश के लोग उनके सामने आये और प्रणाम करके तरह_ तरह की कानों को अच्छी लगनेवाली बातें कहने लगे। वे बोले, महाराज ! बड़े सौभाग्य की बात है कि आपने धर्म के बल के प्रभाव से पुनः अपना खोया हुआ राज्य पा लिया है। आप सौ वर्ष तक हमारे राजा रहें और धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करें। इस प्रकार राजद्वार पर मांगलिक वचनों से उनका सभी ने सत्कार किया तथा ब्राह्मणों ने भी आशीर्वाद दिये। उन सबको यथायोग्य स्वीकार कर महाराज रथ से उतरे और फिर राजभवन की ओर प्रवेश किया। महल के भीतरी भाग में जाकर उन्होंने कुलदेवताओं का दर्शन किया और रत्न, चन्दन तथा माला आदि से उनकी पूजा की। इसके बाद वे फिर महल के बाहर आये और वहां हाथों में मांगलिक द्रव्य लिये खड़े हुए ब्राह्मणों के दर्शन किये। तब महाराज ने गुरु धौम्य तथा महाराज धृतराष्ट्र को आगे रखकर उनकी पुष्प, मोदक, रत्न, सुवर्ण, गौ और वस्त्रादि से विधिवत् पूजा की।सेवक लोग ब्राह्मणों से यह पूछ_पूछकर कि आपकी क्या इच्छा है, उन्हें अभीष्ट पदार्थ देते थे। इसके बाद पुण्याहवाचन का घोष हुआ। उससे सारा आकाश गूंज उठा। वह सुहृदों के लिये आनन्ददायक, परम पवित्र और कानों को सुख देनेवाला था।  इसी समय सब ओर जय की घोषणा करते हुए शंख और दुंदुभियों का मनोरम शब्द होने लगा। इतने में ब्राह्मण के वेश में छिपे हुए राक्षस चार्वाक ने कहा, ' युधिष्ठिर ! इस समय मैं इन सब ब्राह्मणों की ओर से बोल रहा हूं। तुम्हें धिक्कार है । तुम बड़े दुष्ट राजा हो ! तुमने अपने बंधु_बान्धवों की हत्या की है। अपने गुरुजनों को मरवाकर तो अब तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है। इस प्रकार का जीवन किस काम का ?'उसकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर बड़े ही लज्जित और व्याकुल हुए। प्रतिवाद के रूप में उनके मुख से एक भी शब्द न निकला। उन्होंने कहा, 'विप्रगण ! मैं अत्यन्त विनीत होकर आपसे प्रार्थना कर रहा हूं। आप मुझपर प्रसन्न होइये और इस समय मेरे ऊपर बड़ी आपत्ति है, ऐसे समय आपका मुझे धिक्कारना उचित नहीं है। युधिष्ठिर की यह बात सुनकर सब ब्राह्मण बोल उठे, 'महाराज ! यह हमारी बात नहीं कह रहा है। हम तो आशीर्वाद देते हैं कि आपकी राजलक्ष्मी सदा बनी रहे।'फिर उन महात्माओं ने ज्ञानदृष्टि से उसे पहचान लिया और राजा युधिष्ठिर से कहा, 'यह दुर्योधन का मित्र चार्वाक नाम का राक्षस है। इस समय संन्यासी का वेश बनाकर उसका हित चाहता है। धर्मात्मन् ! हम तुमसे ऐसी कोई बात नहीं कहते। तुम्हारा और तुम्हारे भाइयों का कल्याण हो।' राजन् !उसके बाद उन सब ब्राह्मणों ने क्रोध में हुंकार करते हुए उस राक्षस को मार डाला। उनके तेज से वह भस्म होकर गिर गया। राजा ने उन सबकी पूजा की। वे उनका अभिनन्दन करते हुए वहां से विदा हुए। इससे महाराज युधिष्ठिर और उनके सम्बन्धियों को भी बड़ी प्रसन्नता हुई।