Thursday, 18 December 2025

श्रीव्यासजी का राजा युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देना

श्री वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! नारदजी की बात सुनकर राजा युधिष्ठिर चुप हो गये। उस समय उन्हें शोकग्रस्त देखकर सब प्रकार के धर्म का रहस्य जाननेवाले महर्षि व्यास ने कहा, 'युधिष्ठिर ! राजाओं का धर्म प्रथाओं का पालन करना ही है। इसलिये तुम अपना पैतृक सिंहासन स्वीकार करो। वेदों ने तप को तो ब्राह्मणों का ही नित्य धर्म बताया है। क्षत्रिय तो सब प्रकार के धर।म की रक्षा करनेवाला ही है। जो मनुष्य विषयासक्त होकर धर्मविधि का उल्लंघन करता है, वह लोकमर्यादा का विघातक है, क्षत्रिय को बाहुबल से उसका दमन करना चाहिये। जो व्यक्ति मओहवश शास्त्र प्रमाण को न माने वह अपना सेवक हो, पुत्र हो, तपस्वी हैं अथवा कोई भी क्यों‌न हो , उस पापी का सब प्रकार से दमन करें और उसे नष्ट कर दे। जो राजा नष्ट होते हुए धर्म की रक्षा नहीं करता, वह धर्म का घात करनेवाला है। तुमने तो अनुयायियों सहित उन धर्म_घातियों का ही नाश किया है, इसलिये तुम तो अपने धर्म में ही स्थित हो ? राजा का तो यही धर्म है कि दुष्टों का वध करें, सुपात्रों को दान दें और प्रजा की रक्षा करें।' राजा युधिष्ठिर ने कहा_'तपोधन ! आप सभी धर्मो में शिरोमणि हैं। आपके लिये धर्म सर्वदा प्रत्यक्ष है। आपके वचनों में मुझे तनिक भी संदेह नहीं है; किन्तु भगवन्! इस राज्य के लिये मैंने अनेकों अवध्य पुरुषों का वध करा डाला है, मेरे लिये वे ही कर्म मुझे जला रहे हैं। व्यासजी बोले_राजन् ! उद्धत पुरुषों को दण्ड देना तो राजा का कर्तव्य ही है। इसी नियम के अनुसार तुमने कौरवों को मारा है। इसलिये अब तुम मन को शोकग्रस्त न करो। सदोष मालूम होने पर भी अपने धर्म का पालन करते हुए तुम्हें इस प्रकार की आत्मग्लानि तुम्हें शोभा नहीं देती। शास्त्रों में जो पाप कर्मों के प्रायश्चित बताये गये हैं, उन्हें भी शरीरधारी ही कर सकता है, शरीर छोड़ जाने पर तो वे भी नहीं किये जा सकते। अत: राजन् ! यदि तुम जीवित रहोगे तो अपने पाप का प्रायश्चित कर सकोगे। प्रायश्चित किये बिना ही यदि शरीर छूट गया तो तुम्हारे हाथ केवल पश्चाताप ही लगेगा। युधिष्ठिर ने कहा_दादाजी ! मैंने राज्य के लोभ से अपने पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ससुर, गुरु, पापा, दादा, अनेकों वीर, क्षत्रिय, सम्बन्धी, सुहृदं, समवयस्क, भांजे, जाति भाई और भिन्न-भिन्न देशों से आये हुए राजाओं का वध करा डाला है। उसका मुझे क्या दण्ड मिलेगा ? इस चिंता से मैं बार_बार जलता रहता हूं। जब मैं पृथ्वी को उन श्रीसम्पन्न नृपश्रेष्ठों से सूनी देखता हूं और इस भयानक जातिवाद तथा इसमें मारे गये सैकड़ों शत्रुपक्ष के वीरों और करोड़ों दूसरे लोगों को याद करता हूं तो मुझे बड़ा ही पश्चाताप होता है। आह ! आज तो अफवाएं अपने पुत्र, पति और भाइयों से शून्य हो गयी हैं, उनकी क्या दशा होगी ? वे उनका नाश करनेवाले हम पाण्डव और यादवों को कोस रही होगी और अत्यन्त दिन होकर पृथ्वी पर पछाड़ें का रही होगी। विप्रवर ! उन स्त्रियों का अपने मृत संबंधियों के प्रति जैसा प्रेम है उससे मुझे तो यही निश्चय होता है कि वे सब नि:संदेह प्राण त्याग देंगी। धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है, अतः: इस प्रकार हमें स्त्रीवाद का ही पाप लगेगा। अपने सुहृदों को मारकर हमने बड़ा भारी पाप किया है; इसलिये अब हमें सिर नीचा किये नरक में ही गिरना पड़ेगा। अतः: अब हम भीषण तपस्या करके अपने शरीर को त्याग देंगे। आपकी दृष्टि में तपस्या के योग्य कोई उत्तम तपोवन हो तो बताने की कृपा करें। व्यासजी ने कहा_राजन् ! तुम क्षत्रियों में अग्रगण्य हो। तुमने अपने धर्म के अनुसार ही इन क्षत्रियों को मारा है, इसलिये तुम शोक न करो। सदोष मालूम होने पर भी अपने धर्म का पालन करते हुए तुम्हें इस प्रकार की आत्मग्लानि शोभा नहीं देती। शास्त्रों में जो पापकर्म के प्रायश्चित बताये गये हैं, उन्हें भी शरीरधारी ही कर सकता है, शरीर छोड़ देने पर तो वे भी नहीं किये जा सकते। अतः राजन् ! यदि तुम जीवित रहोगे तो अपने पाप का प्रायश्चित कर सकोगे। प्रायश्चित्त किये बिना ही यदि शरीर छूट गया तो तुम्हारे हात पश्चाताप ही लगेगा। युधिष्ठिर ने कहा_दादाजी ! मैंने राज्य के लोभ में अपने पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ससुर, गुरु, मामा, दादा, अनेकों वीर, क्षत्रिय, सम्बन्धी, सुहृदं, समवयस्क, भानजे,जाति भाई और भिन्न_भिन्न देशों से आये हुए राजाओं का वध करा डाला है। उसका मुझे क्या दण्ड मिलेगा ? इस चिंता से मैं रात_दिन बार_बार जलता रहता हूं। जब मैं पृथ्वी को उन श्रीसम्पन्न नृपश्रेष्ठों से सूनी देखता हूं और इस भयानक जातिवाद तथा इसमें मारे गये सैकड़ों शत्रुपक्ष के वीरों और करोड़ों दूसरे लोगो को याद करता हूं तो मुझे बड़ा ही पश्चाताप होता है। आह ! आज जो अबलाएं अपने पुत्र पति और भाइयों से शून्य हो गयी हैं, उनकी क्या दशा होगी ? वे उनका नाश करनेवाले, हम पाण्डवों और और यादवों को कोस रही होंगी और अत्यंत दीन होकर पृथ्वी पर पछाड़ें का रही होंगी।विप्रवर ! उन स्त्रियों का अपने मृत संबंधियों के प्रति जैसा प्रेम है, उससे मुझे तो यही निश्चय होता है कि सब नि:संदेह प्राण त्याग देंगी। धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है, अतः इस प्रकार हमें स्त्रीवाद का ही पाप लगेगा। अपने सुहृदों को मारकर हमने बड़ा भारी पाप किया है; इसलिये अब हमें सिर नीचा किये हैंनरक में ही गिरना पड़ेगा। अतः अब हम भीषण तपस्या करके अपने शरीर को त्याग देंगे। आपकी दृष्टि में तपस्या के योग्य कोई उत्तम तपोवन हो तो बताने की कृपा करें।
व्यासजी ने कहा_राजन् ! तुम क्षत्रियों में अग्रगण्य हो। तुमने अपने धर्म के अनुसार ही इन क्षत्रियों को मारा है, इसलिये तुम शोक न करो। वे सब तो अपने अपराध से ही मारे गये हैं। तुम, भीम, अर्जुन या नकुल_सहदेव उन्हें मारनेवाले नहीं हो। इनका संहार तो काल ने किया है। उसका तो न कोई न कोई माता है, न पिता, वह किसी पर दया भी नहीं करता, वह तो प्रजा के कर्मों का साक्षीमात्र है। तुम्हारा युद्ध तो उसके लिये केवल निमित्तमात्र था। वह इसी प्रकार एक प्राणी से दूसरे की हत्या कराता रहता है। इस संसार कर्म के लिये वह एक भगवान् का ही स्वरूप है। इसके सिवा तुम्हें कौरवों के विनाशकारी कर्मों पर ध्यान देना चाहिये, जिनके कारण उन्हें काल के गाल में जाना पड़ा है। जिस प्रकार लोहार का बनाया हुआ यंत्र अपना काम करने में उसके अधीन रहता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् कालाधीन कर्म की प्रेरणा से प्रवृत हो रहा है। फिर भी तुम्हारे चित्त में जो इन सब को मरवाने से व्यर्थ संताप हो रहा है, उसके दोष से छूटने के लिये तुम प्रायश्चित कर लो। राजन् ! यह बात सुनी हो जाती है कि पूर्वकाल में राज्यलक्ष्मी के लिये ही देवता और असुरों में बारह हजार वर्षों तक युद्ध हुआ था। उसमें देवताओं ने दैत्यों का संहार करके स्वर्ग और पृथ्वी का आधिपत्य प्राप्त किया था। जो लोग धर्म का नाश करना चाहते हैं और अधर्म को फैलानेवाले हैं, उन्हें मार ही डालना चाहिये। इसी से देवताओं ने उस युद्ध में अट्ठासी हजार शालावृक नामक दैत्यों को भी मार डाला था। यदि एक पुरूष को मारकर कुटुंब के शेष व्यक्तियों को सुख मिले अथवा एक कुटुंब का सफाया करने से देश में शान्ति स्थापित हो तो उसे नष्ट करने में कोई दोष नहीं है। राजन् ! किसी समय अधर्म दिखाई देनेवाला कर्म ही धर्म है जाता है और धर्म दिखाई देनेवाला अधर्म बन जाता है। इस प्रकार बुद्धिमान पुरुष को धर्म और अधर्म का रहस्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिये। धर्मराज ! तुमने शास्त्र श्रवण किया है, इसलिये धर्माधर्म के विषय में अपनी बुद्धि स्थिर रखो। देखो ! पूर्वकाल में जो देवताओं का धर्म मार्ग था, उसी का तुमने भी अनुसरण किया है। तुम जैसे धर्मप्राण पुरुष कभी नरक का द्वार नहीं देखते। इसलिये तुम अपने भाइयों को और सुहृद_संबंधियों को धैर्य दो। जो पुरुष हृदय में पाप की भावना रखकर किसी कुकर्म में प्रवृत होता है और उसे करके भी किसी प्रकार लज्जित नहीं होता, उसी को पाप का भागी होना पड़ता है_ऐसा शास्त्र का कथन है। ऐसे पाप का न कोई प्रायश्चित है और न कभी नाश ही होता है। तुम्हारा हृदय तो शुद्ध करना पड़ा और अब इस कर्म को करके भी पश्चाताप कर रहे हो। इसके लिये अश्वमेध यज्ञ बड़ा अच्छा प्रायश्चित है। उसका अनुष्ठान करो तुम निष्पाप हो जाओगे।

इन्द्र ने भी मरुतों की सहायता से अपने शत्रुओं को परास्त करके एक के बाद एक_इस प्रकार सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे। इसी से वे 'शतक्रतु'  नाम से प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार स्वर्ग पर आधिपत्य प्राप्त करके उन्होंने पापों से छुटकारा पाया था। स्वर्ग में देवता और ऋषि भी उसकी उपासना करते हैं। तुमने भी इस वसुन्धरा को अपने पराक्रम से प्राप्त किया है और अपने बाहुबल से तुमने राजाओं को परास्त किया है। अब तुम मित्रों के साथ उनके देश और राजधानियों में जाकर उनके भाई, पुत्र और पौत्रों को अपने _अपने राज्य पर अभिषिक्त करो।भरतश्रेष्ठ ! इस तरह सारे राज्य में शान्ति स्थापित कर तुम असुरविजयी इन्द्र के समान अश्वमेध यज्ञ द्वारा भगवान् का यजन करो। राजन् ! इस युद्ध में जो क्षत्रिय मारे गये हैं, उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। वे तो काल की शक्ति से मोहित होकर अपने कुकर्मों के कारण मौत के मुख में पड़े हैं। उन्हें क्षात्रधर्म के पालन का पूरा फल प्राप्त हुआ है तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य मिला है। इसका पालन करते हुए तुम धर्म की रक्षा करो। मरने पर कल्याण करनेवाली यही चीज है।




Wednesday, 19 November 2025

श्रीकृष्ण का नारदजी द्वारा सृंजय के प्रति कहे हुए अनेकों राजाओं के दृष्टांत सुनाकर राजाओं के दृष्टांत सुनाकर राजा युधिष्ठिर को समझाना

वैशम्पायनजी बोले_राजन् ! व्यासजी का यह उपदेश सुनकर राजा युधिष्ठिर ने कुछ भी नहीं कहा। उन्हें चुप देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा, 'माधव ! धर्मराज युधिष्ठिर बन्धुओं के शोक से अत्यंत पीड़ित हैं; ये शोकसागर में डूबे जा रहे हैं। आप उन्हें ढ़ाढ़स बंधाइये।'अर्जुन के इस प्रकार कहने पर कमलनयन श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिर के पास जाकर बैठ गये। धर्मराज श्रीकृष्ण की बात टाल नहीं सकते थे; क्योंकि बचपन से ही श्रीकृष्ण के प्रति उनकी अर्जुन से भी बढ़कर प्रीति थी। तब श्री श्यामसुंदर ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें अपने वचनों से प्रसन्न करते हुए कहा_'राजन् ! अब आप शोक न करें। यह आपके शरीर को सुखायें देता है। जो लोग इस रणांगण में मारे गये हैं, उनका मिलना तो अब संभव है नहीं। जिस प्रकार जगने पर स्वप्न में प्राप्त होनेवाले सब लाभ व्यर्थ हो जाते हैं, उसी प्रकार इस महायुद्ध में जो क्षत्रिय मारे गये उन्हें तो तुम गए हुए ही समझो। उन सभी ने बड़े_बड़े वीरों के साथ लोहा लेकर अपने प्राण त्यागे हैं। शस्त्रों से मारे जाने के कारण वे सब स्वर्ग को ही गये हैं।  आप उनके लिये शोक न करें। वे सभी बड़े शूरवीर, क्षात्रधर्म में तत्पर रहनेवाले और वेद_वेदांगों के पारदर्शी थे। उन्होंने वीरों के योग्य उत्तम गति पायी है; इसलिये आप किसी प्रकार की चिंता न करें। इस विषय में मैं आपको एक प्राचीन प्रसंग सुनाता हूं। एक बार राजा सृंजय पुत्रशोक में डूबे हुए थे। उस समय उनसे श्री नारदजी ने कहा_'सृंजय !
 सुख_दु:ख से तो मैं, तुम और सारी प्रजा में से कोई भी छूटा हुआ नहीं है, इसलिये इसके लिये क्या शोक किया जाय। तुम अपने शोक को शान्त करो और मैं जो कहता हूं उसपर ध्यान दो।यह प्राचीन राजाओं का बड़ा मनोहर प्रसंग है। इसे सुनने से क्रूर ग्रहों का शमन होता है और आयु की वृद्धि होती है। राजन् ! हमलोग सुनते ही हैं कि राजा सुहोत्र मर गया।वह बड़ा ही अतिथि सेवी था। इन्द्र ने एक साल तक उसके राज्य में सुवर्ण की वर्षा की थी। उसके राज्यकाल में पृथ्वी का वसुमति नाम चरितार्थ हो गया था। नदियों में भी उस समय सुवर्ण ही बहता था। इन्द्र ने उनके कछुए, केकड़े, नाके, मगर और शिशुंकों को भी सोने का कर दिया था। राजा सुहोत्र ने उन सारे सुवर्ण को कउरउजआंगल देश में इकट्ठा कराया और एक भारी यज्ञ का आयोजन करके उसे ब्राह्मणों को दे दिया। सृंजय ! वह अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों में ही श्रेष्ठ था और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यवान था। किन्तु अन्त में वह मर भी गया; इसलिये तुम्हें अपने पुत्र का शोक नहीं करना चाहिये। 'सृंजय ! उशीनगर के पुत्र शिविर के मरने की बात भी हमने सुनी ही है। प्रजापति ब्रह्माजी भी राज्य का भार संभालने में उसके समान किसी दूसरे भूत या भावी राजा को नहीं समझते थे। तुम्हारे पुत्र तो न दक्षिणा देनेवाला और न यज्ञ करनेवाला। तुम्हारी तथा तुम्हारे पुत्र की अपेक्षा तो वह अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों बातों में बढ़ _चढ़कर था। किन्तु वह भी मर ही गया; इसलिये तुम अपने पुत्र के लिये शोक न करो। 'दुष्यन्त के पुत्र भरत ने हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ किये थे। वह भी तुमसे और तुम्हारे पुत्र से अर्थात् चारों बातों में बढ़ा_चढ़ा था। किन्तु वह भी काल के गाल में चला ही गया; इसलिये तुम अपने लड़कें के लिये शोक मत करो। 'सृंजय ! सुना जाता है कि दशरथनन्दन राम प्रजा को अपनी संतान के समान पालते थे। उनके राज्य में कोई भी स्त्री विधवा या अनाथा नहीं थी, मेघ समय पर वर्षा करते थे, समय पर अन्न पकता था और सर्वदा सुकाल रहता था। उस समय कोई जीव पानी में डूबकर नहीं मरता था, किसी को आग से कष्ट नहीं पहुंचता था और लोगों का भी कोई भय नहीं था। स्त्री और पुरुषों की सहस्त्रों वर्ष की आयु होती थी, विवाद तो स्त्रियों में भी नहीं होता था, पुरुषों की तो बात ही क्या ? प्रजा सर्वदा धर्म में तत्पर रहती थी और सब लोग संतुष्ट, पूर्णकाम, निर्भय, स्वेच्छाचार आचरण करनेवाले एवं सत्यवादी थे। जबतक उन्होंने राज्य किया, वृक्ष सर्वदा फल_फूलों से लदे रहे और गौएं दोहनी भरकर दूध देती रहीं। उन्होंने बड़ी_बड़ी दक्षिणाओंवाले दस अश्वमेध यज्ञ किये थे, जिनमें आने_जाने के लिये किसी को भी रोक_टोक नहीं थी। महाबाहु राम नित्यनवयौवनशाली, श्यामवर्ण, अरुणनयन, अजानुबाहु सुन्दर मुख वाले और सिंह के समान कंधों वाले थे। इसने राजा अंगार, मरीज, गय, अंग और ब्रहद्रथ को भी परास्त कर दिया था। सूर्यके उदय स्थान से लेकर अस्त होने के स्थान तक सारा देश राजा मान्धाता के अधिकार में ही था। हम सुनते हैं, राजा भगीरथ भी नहीं रहा। उसने यज्ञानुष्ठान करते समय सुवर्ण से लदी हुई दस लाख कन्याएं दक्षिणा में दान कर दी थी। उनमें में से प्रत्येक कन्याएं रथ में बैठी हुई थी, प्रत्येक रथ में चार_चार घोड़े थे और उसके पीछे सुवर्ण तथा कमल की मालाओं से विभूषित सौ_सौ हाथी थे, एक_एक घोड़े के पीछे हजार_हजार गौएं और प्रत्येक गौ के साथ एक_एक हजार भेड़ और बेकरियां थीं। तीनों लोकों में प्रवाहित होनेवाली गंगाजी उनकी पुत्री होकर प्रकट हुई थीं। इसी से वे भागीरथी कहलायीं। किन्तु देखो, वे भी मर ही गये। इसलिये अपने पुत्र के लिये तुम शोक मत करो। 'सृंजय ! सुना जाता है कि,  राजा दिलीप भी जीवित नहीं रहे। उसके महान् कर्मों का तो ब्राह्मण लोग अबतक बखान करते हैं। उन्होंने जब यज्ञानुष्ठान किया था तो इन्द्र आदि देवताओं ने प्रत्यक्ष होकर उसमें भाग लिया था। उनके यज्ञपात्र और यूप भी सोने के थे तथा उनके यज्ञोत्सव छ: हजार देवता और गंधर्वों ने सातों स्वरों के अनुसार नृत्य किया था। जिन लोगों ने उन सत्यवादी महात्मा दिलीप का दर्शन किया था वे भी स्वर्ग के अधिकारी हो गये थे। उनके ताजमहलों में वएदधवनइ, धनुष की प्रत्यंचा की टंकार और याचकों का कोलाहल_ये तीन शब्द कभी बन्द नहीं होते थे। किन्तु मृत्यु ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र के लिये शोक मत करो। 'युवनाश्व के पुत्र राजा मान्धाता भी मर ही गये। उनके पिता ने भूल से यज्ञ का अभिमन्त्रित जल पी लिया था। इसी से उन्होंने पिता के उदर से ही जन्म लिया। वे बड़े ही वैभवशाली और त्रिलोक विजयी थे। उनका रूप साक्षात् देवताओं के समान था। उन्हें राजा युवनाश्व की गोद में लेटा देखकर देवताओं में आपस में चर्चा होने लगी कि यह बालक किसका स्तनपान करेगा ? तब इन्द्र ने कहा 'मां धाता' ( मेरा दूध पायेगा )। ऐसा कहकर उन्होंने उसका नाम मान्धाता रख दिया। इसी समय इन्द्र के साथ से दूध की धारा निकलने लगी और उन्होंने उसे उस बालक के मुंह में छोड़ा। उसे पीने से वह एक ही दिन में सौ पर बढ़ गया और बारह दिन में ही बारह वर्ष का_सा जान पड़ने लगा। यह बालक बड़ा ही धर्मात्मा, शूरवीर और युद्ध में इन्द्र के समान पराक्रमी हुआ । इसने राजा अंगार, मरीज, गया, अंग और ब्रहद्रथ को भी परास्त कर दिया था। सूर्य के उदय स्थान से लेकर अस्त होने के स्थान से लेकर अस्त होने के स्थान से लेकर सारा देश राजा मान्धाता के अधिकार में ही था। उन्होंने सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ किये थे तथा दस योजना लम्बे और एक योजन ऊंचे सोने के मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को दान दिये थे। किन्तु आज उन परम तथापि मान्धाता का भी कहीं नाम निशान नहीं है। फिर तुम अपने पुत्र के लिये क्यों शोक करते हो ?'सृंजय ! नाभाग के पुत्र राजा अम्बरीष अब नहीं रहे हैं_यह बात भी सुनी ही जाती है। उन्होंने बड़ा भारी यज्ञ करके ब्राह्मणों का ऐसा सत्कार किया था कि वे उनकी सराहना करते हुए यही कहते थे कि 'ऐसा यज्ञ न तो पहले किसी ने किया है और न भविष्य मेही कोई करेगा ।' उस यज्ञ में जिन लाखों राजाओं ने सेवा कार्य किया था, वे सभी अश्वमेध यज्ञ का फल भोगने के लिये उत्तरायण मार्ग से हिरण्यगर्भलोक में गये थे; किन्तु कराल काल ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र का शोक त्याग दो।
'सृंजय ! अमूर्त्तरया के पुत्र गया गया की मृत्यु के विषय में भी हम सुनते ही हैं। एक बार यज्ञ में अग्निदेव उससे प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा। तब गय ने कहा कि 'अग्निदेव ! आपकी कृपा से मेरे पास अक्षय धन है, धर्म में श्रद्धा रहे और सत्य में मन का अनुराग हो।' इस प्रकार अग्निदेव की कृपा से उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो गये। उन्होंने हजार वर्षों तक पूर्णिमा, अमावस्या और चातुर्मास्य में अनेकों बार अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया और हजार वर्षों तक ही नित्यप्रति प्रातःकाल उठकर एक_एक लाख गौएं और सौ_सौ खच्चर ब्राह्मणों को दान किये। किन्तु अन्त में काल ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र का शोक त्याग दो। 'राजन् ! इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए राजा सगर अब इस संसार में नहीं हैं_यह हम सुनते ही हैं। इनके साठ हजार पुत्र थे, जो उनके पीछे_पीछे चलते थे। अपने बाहुबल से उन्होंने इस पृथ्वी पर एकछत्र राज्य स्थापित किया था और हजार अश्वमेध यज्ञ करके देवताओं को तृप्त किया था। उन यज्ञों में उन्होंने ब्राह्मणों को सोने के महल दान किये थे। उन्होंने समुद्र पर्यन्त सारी पृथ्वी खुदवा डाली थी तथा उनके नाम के अनुसार ही समुद्र का नाम 'सागर' पड़ा है। परन्तु अन्त में वे ही मर ही गये; इसलिये तुम अपने पुत्र के लिये शोक न करो। 'राजन् ! इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए राजा पृथु का देह भी आज नहीं है। महर्षियों ने महान् वन के बीच में इनका राज्याभिषेक किया था और यह सोचकर कि ये सब लोकों में धर्म की मर्यादा प्रतीत ( स्थापित ) करेंगे, उनका नाम 'पृथु' रखा था। उन्हें देखकर सभी प्रजा ने एक स्वर से कहा था कि हम इनसे प्रसन्न हैं। इस प्रकार प्रजा का रंजन करने के कारण ही वे 'राजा' कहलाये। जिस समय वे राज्य करते थे, पृथ्वी बिना जोते ही धान्य उत्पन्न करती थी, औषधियों के पुट_पुट में रस था और सभी गौएं दोहनी भरकर दूध देती थीं। मनुष्य निरोग, पूर्णकाम और निर्भय थे। वे इच्छानुसार खेतों या घरों में रहते थे। जिस समय राजा समुद्र के पास जाते थे उसका जल स्थिर हो जाता था और नदियां बहना बन्द कर देती थीं। मनुष्य निरोग पूर्णकाम और निर्भय थे। उन्होंने एक अश्वमेध महायज्ञ करके उसमें ब्राह्मणों को इक्कीस पर्वत दान किये थे। किन्तु अन्त में उन्हें भी काल का ग्रास बनना पड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र का शोक छोड़ दो।' इस प्रकार उपदेश देकर नारदजी ने पूछा 'राजन् ! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो ! क्या मेरी बातों पर तुमने कुछ भी ध्यान नहीं ? मैंने जो कुछ कहा है वह व्यर्थ ही नहीं है।'सृंजय ने कहा_महर्षै ! आपका उपदेश व्यर्थ नहीं हुआ है। आपका दर्शन करके मेरा सारा शोक दूर हो गया है। आपकी बातें सुनने की लालसा अभी शात नहीं हुईं हैं, अमृतपान के समान उसके लिये मेरी उत्कण्ठित बनी ही हुई है। फिर भी मेरी ऐसी इच्छा है कि एक बार आपकी कृपा से पुत्र के साथ मेरा समागम हो जाय। नारदजी बोले _राजन् ! महर्षि पर्वत ने तुम्हें सुवर्णकी नाम का पुत्र दिया था। वह तो अब नष्ट हो चुका। इसके स्थान पर मैं तुम्हें हजार वर्ष तक जीवित रहनेवाला हिरण्याक्ष नाम का दूसरा पुत्र देता हूं। श्रीकृष्ण की यह बात समाप्त होने पर नारदजी ने भी उनके कथन का अनुमोदन किया और राजा युधिष्ठिर को सुवर्णकी का सारा चरित्र सुनाकर कहा कि राजन् ! जब सृंजय ने अपने मृत पुत्र को जीवित करने के लिये बहुत आग्रह किया तो मैंने उसे संजीव कर दिया। इससे उसके माता-पिता को बहुत प्रसन्नता हुई।
कालांतर में पिता का स्वर्गवास होने पर सुवर्णकी ने ग्यारह सौ वर्ष तक पृथ्वी पर राज्य किया। इसके बाद वह स्वर्ग सिधारा। धर्मराज ! अब तुम भी अपने हृदय का संताप दूर कर दो एवं श्रीकृष्ण और व्यासजी के कथनानुसार अपने पैतृक राजसिंहासन पर बैठकर शासन का भार संभालो। यह सब करते हुए यदि तुम बड़े _बड़े यज्ञों का अनुष्ठान करोगे तो अपने अभीष्ट लोक प्राप्त कर लोगे।




Tuesday, 21 October 2025

श्रीव्यासजी का राजा युधिष्ठिर को कन्या मुनि का कहा हुआ धर्मोपदेश सुनाना

वैशम्पायनजी कहते हैं_जनमेजय ! पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र राजा युधिष्ठिर को अपने सम्बन्धितों के शोक से संतप्त होकर प्राण त्यागने के लिये तैयार देख श्रीव्यासजी उनका शोक दूर करने के लिये बोले_'युधिष्ठिर ! इस विषय में कन्या ब्राह्मण का कहा हुआ एक प्राचीन इतिहास है। उसपर ध्यान दो। एक बार विदेहराज जनक ने दु:ख और शोक से वशीभूत होकर महामति विप्रवर कन्या से पूछा था कि 'अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुष को कैसा वर्ताव करना चाहिये ? 'इसपर अश्मा ने कहा_'राजन् ! यह पुरुष कैसे जन्म लेता है उसके साथ ही सुख और दु:ख उसके पीछे लग जाते हैं। वे इसके ज्ञान को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे वायु बादलों को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसी से मनुष्य के हृदय में 'मैं कुलीन हूं, सिद्ध हूं, कोई साधारण मनुष्य नहीं हूं' ये तीन बातें घुस बैठती हैं। इसके नशे में भरकर वह अपने बाप_दादों से प्राप्त हुई पूंजी को लुटाकर कंगाल हो जाता है और फिर दूसरों के धन पर मन ले आता है। उसे मर्यादा का कोई ख्याल नहीं रहता। वह अनुचित उपायों से धन लुटाने लगता है। यह देखकर राजा लोग उसे दण्ड देते हैं।इसलिये मनुष्य के ऊपर सुख या दु:ख जो कुछ आ पड़े उसे सहना ही चाहिये, क्योंकि उसे दूर करने का कोई उपाय भी तो नहीं है। अप्रिय ओं का संयोग, प्रेमियों का वियोग, इष्ट, अनिष्ट और सुख_दु:ख_इनकी प्राप्ति प्रारब्धानुसार ही होती है। इसी प्रकार जन्म_मरण और हानि_लाभ भी दैवाधीन ही है। वैद्यों को भी रोगी होते देखा जाता है, बलवआन् भी कभी_कभी निर्बल हो जाते हैं तथा श्रीमान् भी कंगाल होते देखे गये हैं। यह काल का उलट_फेर बड़ा ही अद्भुत है। अच्छे कुल में जन्म, पुरुषार्थ, आरोग्य, रूप, सौभाग्य और ऐश्वर्य _ये सब प्रारब्ध से ही मिलते हैं।
जो कंगाल हैं और चाहते भी नहीं हैं, उनके तो की की पुत्र हो जाते हैं और जो सम्पन्न हैं, उन्हें एक भी नसीब नहीं होता है; विधाता की करनी बड़ी ही विचित्र है। लोग, अग्नि, जल, शस्त्र, भूख_प्यास, आपत्ति, विष, ज्वर, मृत्यु और ऊंची स्थिति से गिरना_ये सब जीव के जन्म के समय ही निश्चित हो जाते हैं। उसी नियम के अनुसार इसे इन स्थितियों में जाना पड़ता है। आजतक न तो कोई इनसे छूट सका और न अब छूट सकता है। इस काल के दबाव से सब जीवों का इष्ट और अनिष्ट पदार्थों के साथ सम्बध होता है। वायु, आकाश, अग्नि, चन्द्रमा, दिन, रात, नक्षत्र, नदी और पर्वतों को भी काल के सिवा और कौन बनाता और स्थिर रखता है ? सर्दी, गर्मी और वर्षा का चक्र भी काल के ही योग से चलता है। यही बात मनुष्यों के सुख_,दु:ख के विषय में भी है। राजन् ! जब मनुष्य पर मृत्यु या वृद्धावस्था की चढ़ाई होती है तो औषधि, मंत्र, होम और जप कोई भी उसे बचा नहीं सकते। जिस प्रकार समुद्र में दो लक्कड़ कभी मिलते कभी बिछुड़ी जाते हैं, इसी प्रकार यहां जीवों का समागम होता है। इस संसार में हमारे माता_पिता और सैकड़ों स्त्री_पुत्र हो चुके हैं। परंतु सोचो तो वास्तव में वे किसके हुए और हम अपने को किसका कहें ? इस जीव का न तो कोई संबंधी हुआ है और न होगा ही। रास्ते में चलते हुए बटोहियों के समान ही हमारा स्त्री, बंधु और सुहृदगण से समागम हो जाता है। अतः विवेकी पुरुष को अपने मन में इसी पर विचार करना चाहिये कि_मैं कहां हूं ? कहां जाऊंगा ? कौन हूं ? यहां किस कारण से आया हूं और किसलिये इसका शोक करूं ? यह संसार अनित्य है और चक्र के समान घूमता रहता है। इसमें माता_पिता, भाई और मित्रों का समागम रास्ते में मिले हुए बटोहियों के समान ही है। कल्याणकारी पुरुष को चाहिये कि शास्त्राज्ञा का उल्लंघन न करके उसमें श्रद्धा ज्ञरखे, पितरों का श्राद्ध और देवताओं का पूजन करें, यज्ञों का अनुष्ठान करें तथा धर्म , अर्थ और काम का सेवन करें। हाय ! यह सारा संसार अगाध काल समुद्र में डूबा हुआ है। उसमें जरा_मृत्यु जैसे विशाल ग्राहक भरे हुए हैं, किन्तु इसे कुछ होश ही नहीं है। वैद्य लोग भी बड़े कड़वे_कड़वे काढ़े और तरह_तरह के धृत पीते रहते हैं; तो भी; समुद्र जैसे अपने तट का उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार मृत्यु को वे भी पार नहीं कर पाते। जो रसायनों को जाननेवाले वैद्य तरह_तरह के रसायनिक द्रव्यों का सेवन करते रहते हैं, किन्तु उन्हें भी बुढ़ापे से जर्जर होते देखा जाता है।
इसी प्रकार तपस्वी, स्वाध्यायशील, दानी और बड़े_बड़े यज्ञ करनेवाले भी जरा और मृत्यु को पार नहीं कर सकते। जन्म लेनेवाले सभी जीवों के दिन_रात, मास_वर्ष और पक्ष एकबार बीतकर फिर कभी नहीं लौटते। मृत्यु का यह लम्बा रास्ता सभी जीवों को तय करना पड़ता है। अतः ऐसा कोई भी मरण वर्मा मनुष्य नहीं है, जिसे काल के वशीभूत होककर इसमें से निकलना न पड़े। इस मार्ग में स्त्री आदि के साथ जो समागम होता है, वह राहगीरों के समान कुछ ही क्षणों का है। इनमें से किसी के भी साथ मनुष्य का नित्य सहवास नहीं हो सकता। जब अपने शरीर के साथ भी मनुष्य का नित्य सहवास नहीं हो सकता। जब अपने शरीर के साथ ही बहुत दिनों तक सम्बन्ध नहीं रहता तो दूसरे सम्बन्धितों के साथ तो यह ही कैसे सकता है ? राजन् ! आज तुम्हारे बाप_दादे कहां गये ? अब न तो तुम ही उन्हें देखते हो और न वे ही तुम्हें देखते हैं। स्वर्ग और नरक तो मनुष्य इन नेत्रों से देख नहीं सकता। उन्हें देखने के लिये तो सत्पुरुष शास्त्र रूपी नेत्रों से ही काम लेते हैं। अतः तुम शास्त्र के अनुसार ही आचरण करो। मनुष्य को पहले ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। इसके बाद वह गृहस्थाश्रम स्वीकार करके पितर और देवताओं के ऋण से मुक्त होने के लिये संतानोत्पादन और यज्ञानुष्ठान करें। ऐसे सूक्ष्मदर्शी गृहस्थ को अपने हृदय का शोक त्यागकर इहलोक, स्वर्गलोक अथवा परमात्मा की अराधना करनी चाहिये। जो राजा शास्त्रानुसार धर्म का आचरण और द्रव्य संग्रह करता है उसका संपूर्ण चराचर लोक में सुयश फैल जाता है। व्यासजी कहते हैं_युधिष्ठिर ! अश्मा मुनि से इस प्रकार धर्म का रहस्य जानकर राजा जनक की बुद्धि शुद्ध हो गयी, उसका सब मनोरथ पूरा हो गया और वह वैक्सीन हो मुनि से आज्ञा लेकर अपने भवन को चला गया। इसी प्रका तुम भी शोक त्यागकर खड़े हो जाओ। मन को प्रसन्न करो और शास्त्र धर्म के अनुसार जीते हुए इस पृथ्वी के राज्य को भोगो।

Wednesday, 1 October 2025

व्यासजी का युधिष्ठिर से काल की महिमा कहना तथा युधिष्ठिर का अर्जुन के प्रति पुनः अपना शोक प्रकट करना

वैशम्पायनजी कहते हैं_राजमहर्षि व्यास की बात सुनकर राजा युधिष्ठिर ने कहा, 'भगवन् ! इस पृथ्वी के राज्य और तरह_तरह के भोगों से मेरे मन को प्रसन्नता नहीं है, मुझे तो यह शोक खाये जा रहा है। जिनके पति और पुत्र नष्ट हो गये हैं, ऐसी इन अफवाहों का विलाप सुनकर मुझे तनिक भी चैन नहीं है। राजा युधिष्ठिर के इस प्रकार कहने पर वेदपारंगत श्रीव्यासजी ने कहा_'राजन् ! जो लोग मरू गये हैं वे तो अब किसी भी कर्म या यज्ञादि से मिल नहीं सकते और न कोई ऐसा पुरुष ही है जो उन्हें लाकर दे दे। बुद्धि या शास्त्राध्ययन के द्वारा असमय ही किसी विशेष वस्तु को पा लेना मनुष्य के वश की बात नहीं है। कभी_कभी तो मूर्ख मनुष्य को भी उत्तम वस्तु की प्राप्ति हो जाती है। वास्तव में कार्य की सिद्धि में काल ही की प्रधानता है। शिल्प, मंत्र और औषधियां भी दुर्भाग्य के समय फल नहीं देतीं। समय की अनुकूलता होने पर जब सौभाग्य का उदय होता है तो वे ही सफलता और बुद्धि की निमित्त बन जाती है। समय आने पर ही मेघ जल बरसाते हैं, बिना समय के वृक्षों में फल_फूल भी नहीं लगते तथा जबतक अनुकूल समय नहीं आता तब तक पक्षी, सर्प, हाथी और हरिणों में कामोन्माद नहीं आता, स्त्रियां गर्भ धारण नहीं करतीं, जाड़ा, गर्मी और वर्षा ऋतुएं नहीं आतीं। किसी का जन्म या मरण नहीं होता, बालक बोलना आरम्भ नहीं करता, मनुष्य पर यौवन नहीं आता और बोया हुआ बीज अंकुरित नहीं होता। इसी प्रकार सूर्य के उदय और अस्त, चन्द्रमा के वृद्धि और ह्रास तथा समुद्र के उतार_चढ़ाव भी बिना अनुकूल समय आये नहीं होते। राजन् ! इस विषय में राजा सएनजइत् ने जो कुछ कहा था वह प्राचीन उपदेश मैं तुम्हें सुनाता हूं। 'राजा ने कहा था_'यह दु:सह कालचक्र सभी मनुष्यों पर अपना प्रभाव डालता है। पृथ्वी के सभी पदार्थ समय आने पर जीर्ण होकर नष्ट हो जाते हैं। धन, स्त्री, पुत्र अथवा पिता के नष्ट हो जाने पर पुरुष 'हाय ! कैसा दु:ख है' ऐसा सौचकर ही फिर उस दु:ख की निवृत्ति का उपाय करता है। किन्तु तुम मूर्ख बनकर शोक क्यों करते हो ? जो शोकरूप ही थे उनके लिये शोक क्या करना। तुम्हारे दु:ख मानने से तो दु:खों की और भय मानने से भयों की वृद्धि ही होगी। न तो यह शरीर मेरा है और सारी पृथ्वी ही मेरी है। यह जैसी मेरी है वैसे ही और सबकी भी है। ऐसी दृष्टि रखने से जीव कभी मोह में नहीं फंसता। शोक के हजारों स्थान हैं और हर्ष के भी सैकड़ों अवसर हैं। किन्तु उनका प्रभाव रोज_रोज मूर्खों पर ही पड़ता है, विद्वानों पर नहीं। संसार में तो केवल दु:ख ही है, सुख तो है ही नहीं; इसलिये लोगों को दु:ख की ही उपलब्धि होती है। यहां सुख के पीछे दु:ख और दु:ख के पीछे सुख लगा ही रहता है। सुख का अन्त तो दु:ख में ही होता है।। कभी_कभी दु:ख से भी सुख की प्राप्ति हो जाती है; इसलिये जिसे नित्य सुख की इच्छा हो वह सुख_दुख दोनों को ही त्याग दे। सुख या दु:ख अथवा प्रिय और अप्रिय जो कुछ प्राप्त हो उसे हृदय में अवसाद न लाकर प्रसन्नता से ग्रहण करें। भाई ! अपने स्त्री और पुत्रों के प्रति  अनुकूल आचरण में थोड़ी सी भी कभी कर दो, फिर तुम्हें मालूम हो जायगा कि कौन किस हेतु से किसका किस प्रकार संबंधी है।" युधिष्ठिर ! यह सुख_दुख के मर्म को जाननेवाले परम धर्मज्ञ महामति सएनजइत् का कथन है। जिस पुरुष को जो दु:ख सता रहा है उससे कभी शान्ति मिलनेवाली नहीं है। दु:खों का अन्त कभी नहीं आता। एक के पीछे दूसरा दु:ख पैदा होता ही रहता है। सुख_दु:ख, उत्पत्ति_नाश, लाभ_हानि और जीवन_मरण_ये क्रमशः आते ही रहते हैं। अतः धीर पुरुषों को इनके कारण हर्ष या शोक नहीं करना चाहिये।
राजाओं का योग तो युद्ध की दीक्षा लेना, युद्ध करना, दण्ड नीति का ठीक_ठीक व्यवहार करना तथा यज्ञ में दक्षिणा और धनवान देना ही है। इन्हीं से उनकी शुद्धि होती है। जो राजा बुद्धिमानी से न्यायपूर्वक राज्य शासन करता है, अहंकार त्यागकर यज्ञानुष्ठान करता है, सब प्रथाओं को धर्म के अनुसार चलाता है, युद्ध में विजय पाकर राज्य की रक्षा करता है, सओमयआग करते हुए प्रजा का पालन करता है, युक्तिपूर्वक दण्ड विधान करता है, वेद_शास्त्रों का अच्छी तरह अभ्यास करता है और चारों वर्णों को अपने _अपने धर्म में स्थित रखता है, वह शुद्ध चित्त होकर अन्त में स्वर्गसुख भोगता है तथा स्वर्गस्थ हो जाने पर भी जिसके आचरण की पुरवासी, देशवासी और मंत्री लोग प्रशंसा करते हैं, उसी राजा को श्रेष्ठ समझना चाहिये।' व्यासजी के इस प्रकार कहने पर युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा_'भैया ! तुम जो समझते हो धन से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है तथा निर्धन को स्वर्गसुख और अर्थ की भी प्राप्ति नहीं हो सकती_यह ठीक नहीं है।अनेकों मुनियों ने तपस्या में लगे रहकर ही सनातन लोकों को प्राप्त किया है। जो धर्मप्राण पुरुष ब्रह्मचर्य आश्रम में रहकर वेदाध्ययन द्वारा ऋषियों की सम्प्रदाय परंपरा की रक्षा करते रहते हैं दे देवगण उन्हें ही 'ब्राह्मण' कहते हैं। जो लोग स्वाध्यायनिष्ठ, ज्ञाननिष्ठ या धर्मनिष्ठ हैं उन्हीं को तुम ऋषि समझो। वानप्रस्थों के कहने से तो हमें यह बात मालूम हुई है कि राज्य के सब काम भी ज्ञाननिष्ठों के ही हाथ में रखे। अज, पृश्रि, सिकत अरुण और केतु नाम के ऋषिगणों ने तो स्वाध्याय के द्वारा ही स्वर्ग प्राप्त कर लिया था। दान, अध्ययन, यज्ञ और निग्रह_ये सभी कर्म बहुत कठिन है। इन वेदोक्त कर्मों का आश्रय लेकर लोग दक्षिणायन मार्ग से स्वर्गलोक में जाते हैं; किन्तु जो नियम के अनुसार उत्तर मार्ग पर दृष्टि रखता है, उसे योगियों को प्राप्त होनेवाले सनातन लोकों की उपलब्धि होती है। प्राचीन काल के विद्वान् इन दोनों में से उत्तर मार्ग की ही प्रशंसा करते हैं। वास्तव में संतोष ही सबसे बड़ा स्वर्ग है, संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। संतोष से बढ़कर कोई चीज नहीं है। जिन पुरुषों ने क्रोध और हर्ष को अच्छी तरह वश में कर लिया है, उन्हीं को वह उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। 
इस प्रसंग में राजा ययाति की कही हुई यह कथा प्रसिद्ध है, जिसपर ध्यान देने से पुरुष कछुआ जैसे अपने अंगों को सिकोड़ लेता है उसी प्रकार
अपनी सब वासनाओं को समेट लेता है। 'राजा ययाति ने कहा था_'जब वह पुरुष किसी से नहीं डरता और इससे भी किसी को भय नहीं रहता तथा इसे किसी वस्तु की इच्छा या किसी से द्वेष नहीं रहता, उस समय वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। जब यह कर्म, मन और वाणी से सभी जीवों के प्रति दुर्भावना का त्याग कर देता है तो इसे ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है। जिसके मान और मोह दब गये हैं और जिसने बहुत पुरुषों का संग करना छोड़ दिया है, उस आत्मज्ञ महात्मा के लिये मोक्ष सुलभ हो जाता है।' 'अर्जुन ! मैं तो साफ देखता हूं कि मनुष्य धन के पीछे पड़ा हुआ है और उसके द्वारा त्याज्य कर्मों का छूटना बड़ा ही कठिन है। साधु या भी उसके लिये दुर्लभ ही है। शोक और भय से रहित होने पर भी जो पुरुष सदाचार से डिगा हुआ है, उसे धन की थोड़ी _सी तृष्णा भी हो तो वह दूसरे से ऐसा वैर ठान लेता है कि उसे पाप किमी कोई परवा नहीं होती। ब्रह्मा ने तो यज्ञ के लिये ही धन उत्पन्न किया है और यज्ञ की रक्षा के लिये ही मनुष्य की रचना की है। इसलिये सारे धन का उपयोग यज्ञ के लिये ही करना चाहिये। उसे भोग में लगाना अच्छा नहीं है। इसी से लोगों का विचार है कि कि धन कभी किसी एक का नहीं है। अतः श्रद्धावान पुरुष को उसे दान और यज्ञ में लगाते रहना चाहिये। जो धन मिले उसे दान में ही लगा दें, भोगों में न लगावें। दान देने में भी दो भूलें हुआ करती हैं। उनपर ध्यान रखना चाहिए। एक तो कुपात्र के पास धन पहुंच जाना और दूसरे सुपात्र को न मिलना। 'अर्जुन ! इस युद्ध में बालक अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्र, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, द्रुपद, वृषसेन, धृष्टकेतू तथा भिन्न-भिन्न देशों के अनेकों नृपतिगण काम आ गये हैं। इस सारे बन्धुवध की जड़ में ही हूं। हाय ! मैं बड़ा ही राज्यों और क्रूर हूं। मैंने अपने कुटुंब का भी मूलोच्छेद करा डाला। इसी से मेरा शोक जरा भी दूर नहीं होता, मैं अत्यंत आतुर हो रहा हूं। मैं कैसा मूर्ख और गुरुद्रोही हूं ? भला, यह राज्य कितने दिन टिकनेवाला है; इसी के लोभ में पड़कर मैंने अपने दादा भीष्मजी को भी मरवा डाला। अरे ! उन्होंने तो हमें पाल_पोसकर बच्चे से बड़ा किया था। गुरुवार द्रोणाचार्य को मेरी सत्यवादिता में विश्वास था, इसीलिये उन्होंने मुझसे अपने पुत्र के वध के विषय में पूछा था। किन्तु मैंने हाथी की आड़ लेकर झूठ बोल दिया। ऐसा भारी पाप करके भला, मेरी किस लोक में गति होगी ? हाय मुझसे बड़ा और कौन पापी होगा ? मैंने तो अपने बड़े भाई कर्ण को भी मरवा डाला। इस राज्य के लोभ से ही मैंने बालक अभिमन्यु को कौरवों की सेवा में झोंक दिया। तबसे तो तुम्हारी और मेरी आंखें ही नहीं उठतीं। बेचारी द्रौपदी के पांचों पुत्र मारे गये। उनका शोक भी मुझे बाराबर सालता रहता है। अब तो तुम मुझे प्रायोपवेश के लिये ही बैठा समझो। मैं यहीं बैठे_बैठे अपना शरीर सुखा डालूंगा। इस गंगा तट पर ही मैं अपने रातों को नष्ट कर दूंगा। आप सब लोग मुझे इस प्रायश्चित की आज्ञा दीजिये।

Monday, 8 September 2025

महर्षि व्यास का शंख_लिखित और राजा हयग्रीव के दृष्टांत देकर युधिष्ठिर को प्रजापालन के लिये उत्साहित करना

वैशम्पायनजी कहते हैं_ जनमेजय ! अर्जुन के इस प्रकार समझाने पर कुन्तिनन्दन युधिष्ठिर ने कोई उत्तर नहीं दिया। तब महर्षि व्यास कहने लगे_'सौम्य ! अर्जुन का कथन बहुत ठीक है। गृहस्थ_धर्म बहुत उत्तम है और शास्त्रों में उसका वर्णन किया गया है। धर्मज्ञ ! तुम शास्त्रानुसार स्वधर्म का ही आचरण करो। तुम्हारे लिये घर छोड़कर वन में जाने का विधान नहीं है। देखो, देवता, पितर, अतिथि और सेवक इन सबका निर्वाह गृहस्थ के द्वारा ही होता है। अतः तुम इन सबका पालन करो। पक्षु_पक्षी और समस्त प्राणियों का पेट भी गृहस्थों के कारण भरता है, इसलिये गृहस्थ ही सबसे श्रेष्ठ है।  तुम्हें वेद का पूरा ज्ञान है और तुमने तपस्या भी बहुत बड़ी की है। इसलिये अपने इस पैतृक राज्य का भार उठाने में तुम सब प्रकार से समर्थ हो। राजन् ! तप, यज्ञ, विद्या, भिक्षा, इन्द्रियों का संयम, ध्यान, एकान्तसेवन, संतोष और शास्त्रज्ञान_ ये सब बातें तो ब्राह्मणों को सिद्धि देनेवाली है।
क्षत्रियों के धर्म यद्यपि तुम जानते ही हो तो भी मैं उन्हें सुनाता हूं_यज्ञ, विद्याभ्यास, शत्रुओं पर चढ़ाई करना, राज्यलक्ष्मी की प्राप्ति से कभी संतुष्ट न होना, दण्ड देना, दबदबा रखना, प्रजा का पालन करना, समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त करना, तप, सदाचार, द्रव्योपार्जन और सुपात्र को दान देना_क्षत्रिय के ये सब कर्म उसे इहलोक और परलोक दोनों में ही सफलता देनेवाले हैं।इनमें भी दण्ड धारण करना उसका सबसे प्रधान धर्म है। इसके लिये उसमें सर्वदा बल रहना चाहिये; क्योंकि दण्ड विधान बल के द्वारा ही हो सकता है। राजन् क्षत्रियों को तो इन्हीं धर्मों के द्वारा सिद्धि प्राप्त हो सकती है। हमने सुना है कि राजर्षि सुध्युम्न ने दण्डधारण के द्वारा ही परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी। इस विषय में यह प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है; तुम ध्यान देकर सुनो। 'शंख और लिखित नामक दो भाई थे। वे बड़े ही तपस्वी थे। बाहुदा नदी के तीर पर उनके अलग_अलग आश्रम थे, जो बड़े ही रमणीय और  सर्वदा फल_पुष्पादि से लदे रहते थे। एक बार लिखित शंख के आश्रम पर आये। दैववश उस समय शंख बाहर गये हुए थे। लिखित ने भाई की अनुपस्थिति में वहां के बहुत _से पके फल तोड़ लिये और वे उन्हें वहीं बैठकर खाने लगे। इतने में ही शंख वहां आ गये। उन्होंने लिखित को फल खाते देकर कहा, 'भैया ! तुम्हें ये फल कहां से मिले।' इसपर लिखित ने बड़े भाई के पास जाकर उनसे हंसते_हंसते कहा, ये तो मैंने इस सामनेवाले वृक्ष से ही थोड़े हैं।' इसपर शंख ने कहा, 'तुमने मुझसे बिना पूछे स्वयं ही फल तोड़कर तो चोरी की है, इसलिये तुम राछजा के पास जाओ और उसे अपना सब कर्म सुनाकर कहो कि 'राजन् ! बिना दिये दूसरे की चीज लेकर मैंने चोरी का अपराध किया है, इसलिये यह सब जानकर आप अपना धर्मपालन कीजिये और तुरन्त ही मुझे वह दण्ड दीजिये जो चोर को दिया जाता है। 'तब भाई की आज्ञा सिर पर धारण कर लिखित राजा सुध्युम्न के पास गये और उनसे बोले, 'राजन् ! मैंने बिना आज्ञा लिये अपने बड़े भाई के फल खा लिये हैं, इसलिये आप मुझे दण्ड दीजिये।' 'सुद्युम्न ने कहा, 'विप्रवर ! यदि आप दण्ड देने में राजा को प्रमाण मानते हैं तो क्षमा करने का भी उसको अधिकार है ही। अतः: मैं आपको क्षमा करता हूं। इसके सिवा मेरे योग्य कोई सेवा हो तो उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये। मैं उसे पालन करने का प्रयत्न करुंगा।' 'परन्तु राजा के बहुत प्रार्थना करने पर भी लिखित ने दण्ड के लिये ही आग्रह किया। उसके सिवा और किसी प्रकार की बात उन्होंने स्वीकार नहीं की। तब राजा ने चोरी का दण्ड देते हुए उनके दोनों हाथ कटवा दिये। इस प्रकार दण्ड पाकर वे शंख के पास आये और अत्यन्त दिन होकर उनसे प्रार्थना की कि ' मुझे दण्ड प्राप्त हो गया है,  अब आप मुझ मन्दमति को क्षमा करें।' 'शंख ने कहा, 'भैया ! मैं तुमपर कुपित नहीं हूं। तुम तो धर्म को जाननेवाले हैं। तुम्हें धर्म का उल्लंघन हो गया था। उसी का तुम्हें दण्ड मिला है। अब तुम शीघ्र ही बाहुदा नदी के तट पर जाकर विधिवत् देवता और पितरों का तर्पण करो। भविष्य में कभी अधर्म में मन मत ले आना। 'शंख की बात सुनकर लिखित ने बाहुदा के पुनीत एवं में स्नान किया और फिर वेज्योंही तर्पण करने के लिये तैयार हुए कि उनकी भुजाओं में से कमल के समान दो हाथ प्रकट हो गये। इससे उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने भाई को जाकर वे हाथ दिखाये। शंख ने कहा, 'भाई ! तुम शंका न करो। मैंने अपने तप के प्रभाव से ये हाथ उत्पन्न किये हैं।' इसपर लिखित ने पूछा, 'विप्रवर ! यदि आपके पास तप का ऐसा प्रभाव है तो आपने पहले ही मेरी शुद्धि क्यों नहीं कर दी ?' शंख बोले, 'यह ठीक है; परन्तु तुम्हें दण्ड देने का अधिकार मुझे नहीं है; यह तो राजा का ही काम है। इससे राजा की भी शुद्धि हुई है और पितरों सहित तुम भी पवित्र हो गये हो।' इसी प्रकार प्रणेताओं के पुत्र दक्ष ने भी उत्तम सिद्धि प्राप्त की थी। प्रथाओं का पालन करना_यही क्षत्रियों का मुख्य धर्म है। इसलिये राजन् ! आप शोक त्यागियों। अपने भाई अर्जुन की हितकारिणी बात पर ध्यान दीजिये। क्षत्रियों का प्रधान कर्तव्य तो दण्ड धारण करना ही है, मूंड़ मुड़ाना उनका काम नहीं है‌।'तात ! वन में रहते समय तुम्हारे धीर_वीर भाइयों ने जो मनोरथ किये थे उन्हें अब सफल होने दो। तुम नहुष पुत्र ययाति के समान पृथ्वी का पालन करो। अपने भाइयों के साथ धर्म अर्थ और काम का भोग करो। पीछे प्रसन्नता से वन में चले जाना। पहले अतिथियों, पितरों और देवताओं के ऋण से उऋण हो लो, इसके बाद यह सब करना। अभी तो सर्वमेध और अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करो। यदि तुम अपने भाइयों के साथ बड़ी_बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञ करोगे तो तुम्हें अतुलित यश प्राप्त होगा।  'राजन् ! मैं तुमसे जो बात कहता हूं उसपर ध्यान दो वैसा करने से तुम अपने धर्म से नहीं गिरोगे। देखो, जो राजा कर का छठा भाग लेकर भी राष्ट्र की रक्षा नहीं करता वह अपनी प्रजा के चतुर्थांश पाप का भागी बनता है। यदि राजा धर्मशास्त्र का उल्लंघन करता है तो पतित हो जाता है और यदि उसका अनुसरण करता है तो निर्भय हो रहता है। यदि काम क्रोध छोड़कर वह पिता के समान सारी प्रजा के प्रति समदृष्टि रखें तो इस शास्त्रोक्त बुद्धि का आश्रय लेने से उसे किसी प्रकार पाप का संसर्ग नहीं होता । 
शत्रुओं को अपने तेज और बुद्धि के बल से काबू में रखना चाहिये। पापियों के साथ कभी मेल नहीं करना चाहिये तथा अपने राज्य में पुण्यकर्मों का अनुष्ठान कराना चाहिये। शूरवीर, श्रेष्ठ, सत्कर्म करनेवाले विद्वान्, वेदपाठी, ब्राह्मण और धनवानों की विशेष रक्षा करनी चाहिये। जो बहुश्रुत हैं उन्हें धर्म कृत्यों में नियुक्त करना चाहिये तथा एक व्यक्ति में, चाहे वह कैसा भी गुणवान् हो कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। जो राजा प्रजा की रक्षा नहीं करता, वइनयहईन है, मानी है, मान्य पुरुषों का सत्कार नहीं करता और गुणों में भी दोष दृष्टि करता है, वह पापी हो जाता है और लोक में उसे दुर्दांत ( क्रूर ) कहा जाता है। की बार प्रजा लोग जो राजा की ओर से सुरक्षित न होने के कारण अनावृष्टि आदि दैविक आपत्तियों से नष्ट हो जाते हैं तथा चोरों के उपद्रवादी से दु:ख पाते हैं, उसमें राजा ही दोष का भागी होता है। किन्तु पूरे_पूरे विचार और नीति के साथ सब प्रकार प्रयत्न करने पर भी यदि सफलता न मिले तो उस अवस्था में राजा को पाप नहीं होता। ' राजन् ! इस विषय में मैं तुम्हें हयग्रीव का प्रसंग सुनाया हूं। वह बड़ा शूरवीर और पवित्र कर्म करनेवाला था। उसने संग्राम में अपने शत्रुओं को परास्त कर दिया था। परन्तु पीछे ना:सहाय हो जाने पर शत्रुओं ने उसे हराकर मार डाला। वह शत्रुओं का निग्रह और प्रजा का पालन करने में बड़ा ही कुशल था। इससे उसे बड़ी कीर्ति भी मिली थी। उसने विचारपूर्वक न्याय के अनुसार अपने राज्य का पालन किया, अहंकार को पास नहीं आने दिया और अनेकों यज्ञों का अनुष्ठान किया। इस प्रकार संपूर्ण लोकों को अपने सुयश से व्याप्त करके वह महात्मा स्वर्ग में सुख भोग रहा है। उसने यज्ञादि के अनुष्ठान से दैवी और दण्ड नीति से मानुष सिद्धि प्राप्त की थी तथा धर्मशास्त्र के अनुसार प्रजा का पालन किया था। वह बड़ा विद्वान, त्यागी, श्रद्धालु और कृतज्ञ था। इस लोक में उसने अनेकों पुण्यकर्म किये और फिर देह त्यागकर उन पुण्यलोकों को प्राप्त किया जो बड़े _बड़े मेधावी, विद्वान, माननीय और प्रयागराज तीर्थस्थानों में शरीर छोड़नेवालों को मिलते हैं।'




Saturday, 16 August 2025

महर्षि देवस्थान और अर्जुन का राजा युधिष्ठिर को समझाना

वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! युधिष्ठिर की बात पूरी होने पर वहां बैठे देवस्थान नाम के एक तपस्वी ने ये युक्तियुक्त वचन कहने आरम्भ किये, 'अज्ञातशत्रो ! आपने धर्मानुसार ये सारी पृथ्वी जीती है। इसे आपको व्यर्थ ही नहीं त्याग देना चाहिये। राजन् ! ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ और सन्यास_ये चारों आश्रम ब्रह्म को प्राप्त करने की चार सीढ़ियां हैं और इनका वेद में प्रतिपादन किया गया है। अतः: आपको इन्हें क्रम से ही पार करना चाहिये। आप अभी बड़ी_बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञ कीजिये। स्वाध्याय यज्ञ तो ऋषिलोग किया करते हैं और कोई_कोई ज्ञानयज्ञ भी करते हैं । गृहस्थ तो यज्ञ के लिये ही संपूर्ण धन का संचय करते हैं। वे यदि अपने शरीर अथवा किसी अयोग्य कार्य के लिये उसका दुरुपयोग करते हैं तो भ्रूणहत्या_जैसे दोष के भागी बनते हैं। ब्रह्मा ने यज्ञ के लिये ही धन की रचना की है और यज्ञ के लिये ही पुरुष को उसका रक्षक नियुक्त किया है। अतः यज्ञ के लिये सारा धन खर्च कर देना चाहिये। उसके बाद शीघ्र ही कामना की सिद्धि हो जाती है। राजन् ! अविक्षित के पुत्र राजा मरीच ने बड़ी धूमधाम से इन्द्र का यजन किया था। उनके यज्ञ में लक्ष्मी देवी स्वयं पधारी थीं और उनके सभी यज्ञपात्र सुवर्ण के थे। राजा हरिश्चन्द्र का‌नाम भी आपने सुना ही होगा। उन्होंने भी बड़ा धन खर्च करके इन्द्र का यजन किया था, उससे वे पुण्यों के भागी हुए और शोकरहित हो गये। इसलिये सारा धन यज्ञ में ही लगा देना चाहिये। "राजन् ! मनुष्य के मन में संतोष होना स्वर्ग से भी बढ़कर है। संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। संतोष से बढ़कर संसार में कोई बात नहीं है। उसकी ठीक_ठीक स्थिति तभी होती है जब मनुष्य कछुआ जैसे अपने अंगों को सिकोड़ लेता है, उसी प्रकार अपनी सब कामनाओं को सब ओर से समेट लेता है। उस समय तुरंत ही आत्मज्योति:स्वरूप परमात्मा अपने अंत:कर्ण में ही प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है। जब मनुष्य किसी से भी भय नहीं मानता तो उससे भी किसी को कोई डर नहीं रहता। वह काम और द्वेष को जीत लेता है तथा आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है। 'कोई लोग तो शान्ति की प्रशंसा करते हैं और कोई उद्योग के गुण गाते हैं। कोई इनमें से प्रत्येक को ही अच्छा बताते हैं और कोई एक साथ ही दोनों को। कोई यज्ञ को ही अच्छा बताते हैं और कोई एक साथ ही दोनों को। कोई यज्ञ को ही अच्छा बताते हैं, कोई संन्यास को और कोई दान को। कोई सबकुछ छोड़कर चुपचाप भगवान् के ध्यान में मग्न रहते हैं और कोई राज्य पाकर प
राजा का पालन करते रहना ही अच्छा समझते हैं। किन्तु इन सब बातों पर विचार करके बुद्धिमानों ने तो यही निश्चय किया है कि किसी से द्रोह न करना, सत्य भाषण देना, दान देना, सबपर दया रखना, इन्द्रियों का दमन करना, अपनी ही स्त्री से पुत्रोंत्पति करना तथा मृदुता, लज्जा और अचंचलता_ये ही रवाना धर्म हैं तथा ऐसा ही स्वायंभुव मनु ने भी कहा है। राजन् ! आप भी प्रयत्न पूर्वक इसी धर्म का पालन करें। भूपति का यह धर्म है कि इन्द्रियों को सर्वदा अपने अधीन रखें, प्रिय और अप्रिय में समान रहे, यज्ञानुष्ठान से जो बचे उसी अन्न का सेवन करें, शास्त्र के रहस्य को जाने, दुष्टों का दमन करता रहे, साधुओं की रक्षा करें, प्रजा को धर्म मार्ग पर ले जाकर उसके साथ धर्मानुसार व्यवहार करें और अन्त में पुत्र को राज्यलक्ष्मी सौंपकर वन में चला जाय। वहां भी वन के फल_मूलादि से निर्वाह करता हुआ आलस्य त्यागकर शास्त्रोक्त कर्मों का ही विधिपूर्वक आचरण करें। जो राजा इस प्रकार वर्ताव करता है, वहीं धर्म को जाननेवाला है। उसके इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं। इस प्रकार जो धर्म का अनुसरण करते थे, सत्य, दान और तप में लगे रहते थे, दया आदि गुणों से सम्पन्न थे, काम क्रोधादि दोषों से दूर रहते थे, सर्वदा प्रजापालन में तत्पर रहते थे, उत्तम धर्मों का आचरण करते थे और गौ एवं ब्राह्मणों की रक्षा के लिये युद्ध ठानते थे, ऐसे अनेकों राजा उत्तम गति को प्राप्त हो चुके हैं। इसी प्रकार रुद्र, वसु, आदित्य, साध्य और अनेकों राजर्षियों ने भी इसी धर्म का आश्रय लिया था तथा निरंतर सावधान रहकर अपने पवित्र कर्मों का आचरण करने से स्वर्ग प्राप्त किया था।' वैशम्पायनजी कहते हैं_जनमेजय ! इस प्रकार जब देवस्थान मुनि का भाषण समाप्त हुआ तो अर्जुन ने अपने बड़े भाई युधिष्ठिर से, जो अभी तक बहुत उदास थे, फिर कहा, 'राजन् ! आप धर्मज्ञ हैं, आपने क्षत्रिय_धर्म के अनुसार ही यह दुर्लभ राज्य प्राप्त किया है। फिर आप इतने दु:खी क्यों हैं ? महाराज ! आप क्षात्रधर्म का विचार कीजिये। क्षत्रिय के लिये तो धर्मयुद्ध में मर जाना अनेकों यज्ञों से भी बढ़कर है। तप और त्याग तो ब्राह्मणों केज्ञधम हैं। दूसरे के धन से अपना निर्वाह करना यह क्षत्रिय का धर्म नहीं है। आप तो सब धर्मों को जानते हैं, धर्मात्मा हैं, बुद्धिमान हैं, कार्यकुशल हैं और संसार में आगे_पीछे की सब बातों पर दृष्टि रखनेवाले हैं तथा अपने क्षात्रधर्म के अनुसार शत्रुओं को परास्त करके यह निष्कंटक राज्य प्राप्त किया है। अतः अब मन को वश में रखकर आप यज्ञ_ दानादि का अनुष्ठान कीजिये। देखिये, इन्द्र कश्यप ब्राह्मण का पुत्र था, परन्तु अपने कर्म से वह क्षत्रिय हो गया था। लोक में उसके इस कर्म को प्रशंसनीय ही माना गया है। अतः जो कुछ हो चुका है, उसके लिये आप शोक न करें। वे सब वीर तो क्षात्रधर्म के अनुसार शस्त्रों से मारे जाकर परम गति को ही प्राप्त हुए हैं।

Thursday, 31 July 2025

युधिष्ठिर द्वारा भीम को फटकार और मुनिवृति की प्रशंसा तथा अर्जुन का राजा जनक के दृष्टांत से उन्हें समझाना

वैशम्पायनजी कहते हैं_भीमसें की बात सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले_"भीम ! असंतोष, प्रमाद, मद, राग, अशांति, बल, मोह, अभिमान तथा उद्वेग_इन प्रबल पापों ने तुम्हारे मन को वशीभूत कर लिया है; इसीलिये तुम्हें राज्य की इच्छा होती है। भाई ! भोगों की आसक्ति छोड़ो और बन्धन मुक्त होकर शान्त और सुखी हो जाओ।आग कितनी ही धधकती क्यों न हो; उसमें ईंधन न डाला जाय तो अपने_आप शान्त हो जाती है।
इसी प्रकार तुम भी अपना आहार कम करके पेट की आग शान्त करो, यह आजकल बहुत बढ़ गयी है। पहले अपने पेट को जीतो; फिर ऐसा समझा जायगा इस जीती हुई पृथ्वी के द्वारा तुमने कल्याण पर विजय पायी है। भीम सेन ! तुम मनुष्यों के काम भोग तथा ऐश्वर्य की प्रशंसा करते हो; किन्तु जो भोगों से रहित और तुम्हारी अपेक्षा बहुत दुर्बल है, वे ऋषि_मुनि ही सर्वोच्च पद को प्राप्त करते हैं। जो लोग पत्ते चबाते हैं, पत्थर पर पीसकर या दंतों से चबाकर ही खाते हैं; अथवा पानी और हवा पीकर ही रह जाते हैं, उन तपस्वियों ने ही नरक पर विजय पायी है। ( वहां तुम्हारे_जैसे वीरों की वीरता नहीं काम देती। ) एक ओर सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन करनेवाला राजा है और दूसरी ओर पत्थर और सोने को एक समझनेवाला मुनि। इन दोनों में मुनि ही कृतार्थ है राजा नहीं। अपने मनोरथ के पीछे बड़े_बड़े कार्यों का आरम्भ न करो। आशा तथा ममता ने रखो। इससे तुम्हें इहलोक और परलोक में भी शोकरहित स्थान प्राप्त होगा। जिन्होंने भोगों की आसक्ति छोड़ दी है, वे कभी शोक नहीं करते। फिर भी तुम क्यों भोगों की चिंता कर रहे ? यदि संपूर्ण भोगों का परित्याग कर दो तो मिथ्यावादी से छूट जाओगे। परलोक के दो मार्ग प्रसिद्ध हैं_पितृयान और देवयान। सकाम यज्ञ करनेवाले पितृयान से जाते हैं और मोक्ष के अधिकारी देवयान से। महर्षि गन तप, ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय के बल पर ऐसे राज्य में पहुंच जाते हैं, जहां मृत्यु का प्रवेश नहीं है। राजा जनक समस्त द्वन्दों से रहित और जीवनमुक्त पुरुष थे, उन्हें मोक्षरूप आत्मा का साक्षात्कार हो गया था। पूर्वकाल में जो उन्होंने उद्गार प्रकट किया था, उसे लोग इस प्रकार बताते हैं _'दूसरों की दृष्टि में मेरे पास अनन्त धन है, परन्तु मेरा उसमें कुछ भी नहीं है। सारी मिथिला जल जाय तो भी मेरा कुछ नहीं जलेगा।' जो स्वयं द्रष्टा रूप से रहकर इस दृश्य_प्रपंच को देखता है, वहीं आंखवाला और वही बुद्धिमान हैं। अज्ञात तत्वों का ज्ञान एवं सभ्यक् बोध ( निश्चय ) करानेवाली वृत्ति को बुद्धि कहते हैं। जब मनुष्य भिन्न_भिन्न प्राणियों को एक ही परमात्मा में स्थित देखता है तथा उसु से सबका विस्तार हुआ मानता है, उस समय वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। बुद्धिमान और तपस्वी ही उत्तम गति को प्राप्त होते हैं। जो जड़ और अज्ञानी हैं, जिनमें शुद्ध बुद्धि तथा तप का अभाव है, ऐसे लोगों की वहां पहुंच नहीं होती। वास्तव में सबकुछ बुद्धि में ही स्थित है।' यों कहकर राजा युधिष्ठिर चुप हो गये, तब अर्जुन ने फिर कहा 'महाराज ! जानकर लोग राजा जनक और उनकी स्त्री का संवादरूप  एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। राजा जनक ने राज वे यह परित्याग करके भीख मांगने का निश्चय किया था; उस समय उनकी रानी ने दु:खी होकर जो कुछ कहा था, वही आपको सुना रहा हूं।' 'कहते हैं, एक दिन राजा जनक पर मूढ़ता सवार हुई। वे धन, संतान, स्त्री, नाना प्रकार के रत्न तथा अग्निहोत्र का भी त्याग करके भिक्षुक के तरह मुट्ठीभर भुना हुआ जौ खाकर रहने लगे। स्वामी को इस अवस्था में देखकर रानी को बड़ा रंज हुआ, वे एकान्त में उनके पास जाकर बोलीं_'राजन् ! आपको भिक्षुक की भांति मुट्ठीभर भुना हुआ जौ खाकर रहना उचित नहीं है। आपकी यह प्रतिज्ञा और चेष्टा सब राजधर्म के विरुद्ध है। यह महान् राज्य छोड़कर यदि आप थोड़े_से अन्न में संतोष मानते हैं तो इतने से अतिथि, देवता, ऋषि और पितरों का भरण_पोषण कैसे किया जा सकता है ? मैं तो समझती हूं, आपका यह परिश्रम व्यर्थ है। आपने कर्मों को को त्यागा है; इसलिये देवता, अतिथि और पितरों ने भी आपका परित्याग कर दिया है। आपके रहते ही आपकी माता आज से पुत्रहीना हुई और यह अभागिनि कौसल्या भी पतिहीना।भला, कहिये तो,_ ये नाना प्रकार के वस्त्र तथा आभूषण छोड़कर आप किसलिये संन्यासी हो रहे हैं ? क्यों निष्क्रिय जीवन व्यतीत करते हैं ? आप संपूर्ण भूतों के लिये प्याऊ के समान थे, सभी आपके यहां अपनी प्यास बुझाने आते थे। इसी तरह एक समय था, जब आप फलों से भरे हुए वृक्ष की भांति सब जीवों की भूख मिटयि करते थे; किन्तु अब मुट्ठीभर अन्न के लिये स्वयं ही दूसरों के सामने हाथ फैलायेंगे ! जब सबकुछ छोड़कर भी आप मुट्ठीभर जौं के लिये दूसरों की पकऋपआ चाहते हैं, तो इस त्याग में और राज करने में अंतर ही क्या रहा ? दोनों एक_से ही तो हैं, फिर क्यों कष्ट उठा रहे है ? मुट्ठीभर जौं की आवश्यकता बनी ही रह गयी तो सर्वत्याग की प्रतिज्ञा कहां रही ? 'महाराज ! यदि मुझपर आपकी कृपा हो तो इस पृथ्वी का पालन कीजिये और राजमहल, शय्या, सवारी, वस्त्र तथा आभूषणों को उपयोग में लाइये। जो बराबर दूसरों से दान देता है तथा जो निरंतर स्वयं ही दान करता रहता है, उन दोनों में क्या अन्तर है ? उनमें कौन_सा श्रेष्ठ है ? इसे आप समझिये। संसार में साधु_संतों को अन्न देनेवाले राजा की आवश्यकता है; यदि दान करनेवाला राजा ने रहे तो मोक्ष चाहनेवाले महात्माओं का जीवन_निर्वाह कैसे हो ? अन्न से ही प्राण की पुष्टि होती है, इसलिये अन्न देनेवाला प्राणदाता होता है। गृहस्थ आश्रम से अलग होकर भी त्यागी लोग गृहस्थों के सहारे ही जीवन धारण करते हैं। जो आसक्ति रहित और सब प्रकार के बंधन से मुक्त है, शत्रु और मित्र में समान भाव रखता है, वह किसी भी आश्रम में रहकर मुक्त ही है। बहुत _से लोग तो दिन लेने या पेट पालने के लिये मूंड़ मूड़ाकर गेड़ुए वस्त्र पहनकर घर से निकल जाते हैं, वे नाना प्रकार के बंधनों से बंधे होने के कारण भोगों की ही खोज में डोलते _फिरते हैं। हृदय का राग आदि दोष न दूर हुआ तो गेरुआ वस्त्र धारण करना विडम्बना मात्र है।
मेरा तो विश्वास है कि धर्म का ढोंग रचने वाले मथमुंडे अपनी जीविका चलाने के लिये ही ऐसा करते हैं। जो हो, आप तो साधु_महात्माओं का पालन_पोषण  करते हुए जितेन्द्रिय होकर पुण्यलोकों पर अधिकार प्राप्त कीजिये। जो प्रतिदिन गुरु के लिये समिधा लाता है अथवा निरंतर बहुत_सी दक्षिणाओं वाले यज्ञ करता रहता है, उससे बढ़कर धर्मपरायण कौन होगा ?'
"( इस तरह रानी के समझाने से जनक ने संन्यास का विचार छोड़ दिया।) राजा जनक संसार में तत्ववेत्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं, किंतु उन्हें भी मोह हो गया था। उन्हीं की भांति आप भी मोह में न पड़िये। यदि हमलोग हमेशा दान और तप में तत्पर रहकर अपने धर्म का अनुसरण करेंगे, दया आदि गुणों से सम्पन्न रहेंगे, काम क्रोधादि दोषों को त्याग देंगे तथा अच्छी तरह से दान देते हुए प्रजापालन में लगे रहेंगे तो गुरु और वृद्धजन की सेवा करते हुए हम अपने अभीष्ट लोक प्राप्त कर लेंगे। इसी प्रकार ब्राह्मण सेवी और सत्यभाषी होकर देवता, अतिथि और समस्त प्राणियों की सेवा करते रहने में भी हमें अपना इष्ट स्थान प्राप्त हो जायगा। " राजा युधिष्ठिर ने कहा_भैया ! मैं धर्म का प्रतिपादन करनेवाले और पर तथा अपर ब्रह्म का निरुपण करनेवाले दोनों प्रकार के शास्त्र को जानता हूं तथा मुझे कर्मानुष्ठान और कर्म त्याग दोनों का प्रतिपादन करनेवाले वेद_वाक्यों का भी ज्ञान है। इसके सिवा परस्पर विरुद्ध अर्थ का प्रतिपादन करनेवाले वाक्यों का भी मैंने युक्तिपूर्वक विचार किया है और उन वाक्यों का जो तात्पर्य है, उसे भी मैं विधिवत् जानता हूं। तुम तो केवल शस्त्रविद्या के ही जानकार हो और वीरों का धर्म पालन करते हो। शास्त्र के यथार्थ मर्म को तुम किसी प्रकार नहीं समझ सकते। जो लोग शास्त्र के सूक्ष्म रहस्य को जानते हैं और धर्म का निश्चय करने में कुशल हैं तुम्हारी तरह तो वे भी मुझे उपदेश नहीं दे सकते। तथापि भ्रातृस्नेहवशवश तुमने जो कुछ कहा है वह न्यायसंगत और उचित ही है, उससे अधिक न्यायसंगत और उचित ही है, उससे मुझे भी तुम्हारे प्रति प्रसन्नता ही हुई है। युद्ध के धर्मों में और संग्राम करने की कुशलता में तो तुम्हारे समान तो तीनों लोकों में भी कोई नहीं है। परन्तु जिन महानुभावों की बुद्धि परमार्थ में लगी हुई है, उनका विचार है कि तप और त्याग दोनों ही परस्पर एक_दूसरे से श्रेष्ठ हैं। अर्जुन ! तुम जो ऐसा समझते हो कि धन से बढ़कर कोई चीज ही नहीं है, सो ठीक नहीं है; वास्तव में धन का कोई महत्व नहीं है, यह बात जिस तरह से समझ में आ जाय वहीं तुम्हें बता रहा हूं। इस लोक में तप और स्वाध्याय में लगे हुए भी अनेकों धर्मनिष्ठ पुरुष दिखायी देते हैं। वे तपस्वी ऋषि ही हैं, जो अन्त में सनातन लोकों को प्राप्त करते हैं‌। अनेकों ऐसे भी अजातशत्रु धैर्यवान वनवासी हैं, जो वन में रहकर स्वाध्याय करते हुए स्वर्गलोक प्राप्त कर लेते हैं। कोई भद्रपुरुष इन्द्रियों को उनके शिष्यों से रोककर अविवेकजनित अज्ञान के मार्ग से छूटकर देवयान मार्ग के वाला त्यागियों का लोक प्राप्त कर लेते हैं और कोई तेजोमय दक्षिण मार्ग से पुण्यलोकों को प्राप्त होते हैं। किन्तु मोक्षमार्गी पुरुषों की गति तो अनिवर्चनीय है। अतः योग ही सब साधनों में धान माना गया है। पर उसका स्वरूप जानना बहुत कठिन है। विद्वान लोग सार_असार वस्तु का विवेक करने की इच्छा से निरंतर शात्र का विचार करते रहते हैं और वे अपने स्वरूप में स्थित हुए यहीं मुक्त हो जाते हैं। वह आत्मतत्व अत्यंत सूक्ष्म है, नेत्र से उसे देखा नहीं जा सकता और वाणी से कहा नहीं जा सकता। जो बड़े युक्तिकुशल विद्वान हैं, वे भी इस आत्मतत्व के विषय में चक्कर में पड़ जाते हैं, साधारण जीवों की तो बात ही क्या है ? इसी प्रकार बड़े _बड़े बुद्धिमान, श्रोत्रिय और शास्त्रज्ञों के लिये भी यह अत्यंत दुर्विज्ञेय है। किन्तु अर्जुन ! तत्वज्ञलोग तो तप, ज्ञान और त्याग से  उस निय महान् सुख को प्राप्त कर लेते हैं।

Thursday, 3 July 2025

अर्जुन द्वारा दण्ड नीति का समर्थन और भीम का युधिष्ठिर को राज्य की ओर आकृष्ट करने का प्रयास

वैशम्पायनजी कहते हैं_ द्रुपदकुमारी की बातें सुनकर राजा युधिष्ठिर की आज्ञा ले अर्जुन फिर कहने लगे_"राजन् ! दण्ड ही समस्त प्रथाओं का शासन और उनकी रक्षा करता है, सबके सो जाने पर दण्ड जागता रहता है, इसलिये विद्वानों ने दण्ड को राजा का धर्म बताया है। दण्ड से ही धर्म, अर्थ और काम की रक्षा होती है; इसलिये दण्ड त्रिवर्ग कहलाता है। दण्ड ही धन और धान्य की रखवाली करता है, इसलिये आप दण्ड धारण कीजिये। संसार की ओर देखिये_ कितने ही पापी दण्ड के भय से पाप नहीं करते, दण्ड से ही सारी व्यवस्था ठीक _ठीक चलती है। बहुत_से मनुष्य दण्ड के डर से ही एक_दूसरे का सर्वनाश नहीं करते। यदि दण्ड सबकी रक्षा न करता तो संसार के प्राणी घोर अन्धकार में डूब जाते। यह उच्छृंखल मनुष्यों का दमन करता और दुष्टों को दण्ड देता है। इसलिये विद्वान पुरुष इसे 'दण्ड कहते हैं। यदि ब्राह्मण अपराध करें तो उसे वाणी से अपमानित करना ही उसका दण्ड है, क्षत्रिय को भोजन मात्र के लिये वेतन देकरयंक्ष सेवा लेना उसका दण्ड है; वैश्य का दण्ड उससे जुर्माना वसूल करना है; किन्तु शूद्र के लिये सेवा के अतिरिक्त दूसरा कोई दण्ड नहीं है, उससे दण्ड के रूप में काम ही लिया जाता है। मनुष्यों को प्रमाद से बचाने और और उनके धन की रक्षा के लिये जो एक मर्यादा बांधी गयी है, उसी को दण्ड कहते हैं। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वाणप्रस्थ और संन्यासी _ये सब दण्ड के भय से अपने_अपने मार्ग पर स्थित रहते हैं। बिना भय के न कोई यज्ञ करता है, न दान देता है और न प्रतिज्ञा_पालन पर ही दृढ़ रहना चाहता है। "रुद्र, कार्तिकेय, इन्द्र, अग्नि, वरुण, यम, काल, वायु, मृत्यु, कुबेर, रवि, बसु, साध्य तथा विश्वेदेव_ ये सभी देवता दण्ड देनेवाले हैं; अतः: इनके प्रताप के सामने माथा टेककर ब लोग इन्हें प्रणाम करते हैं, सभी इनकी पूजा करते हैं। मैं संसार में क्षकिसी को ऐसा नहीं देखता, जो अहिंसा से जीविका चलाता है; क्योंकि प्रत्येक क्रिया में कुछ_न_कुछ हिंसा का संबंध हो ही जाता है। ) जो विधाता का विधान है, उसमें विद्वान पुरुष को मोह नहीं होता। महाराज ! जिस जाति में आपका जन्म हुआ है, उसी के अनुसार आपको वर्ताव करना चाहिये। पानी में बहुतेरे जीव हैं, पृथ्वी पर तथा वृक्ष के फलों में भी बहुत _से कीड़े होते हैं; कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जो इनकी हिंसा से सर्वथा बचा रहता हो। परंतु इसे जीवन_निर्वाह के सिवा और क्या कहां जा सकता है ? कितने ऐसे सूक्ष्म कीटाणु होते हैं, जिनका अनुमान से ही पता लगता है । मनुष्यों के पलक गिरने मात्र से उनके कंधे टूट जाते हैं। अतः ऐसे जीवों की हिंसा से कहां तक बचाव हो सकता है ?"
"जबसे जगत् में दण्ड नीति का प्रचार हुआ है, तबसे संपूर्ण प्राणियों के सभी कार्य सुचारु रूप से होने लगे हैं। संसार में भले_बुरे का विचार करनेवाला दण्ड यदि न होता तो सब जगह अंधेर मचा रहता, किसी को कुछ भी सूझ न पड़ता। जो धर्म की मर्यादा नष्ट करके वेदों की निंदा करनेवाले नास्तिक मनुष्य हैं, वे भी डंडे पड़ने पर जल्दी राह पर आ जाते हैं। दुनिया में सर्वथा शुद्ध मनुष्य मिलना कठिन है, सब दण्ड से विवश होकर ही ठीक रास्ते पर रहते हैं। दण्ड के भय से ही लोगों की मर्यादा _पालन में प्रवृति होती है। चारों वर्णों के लोग आनन्द से रहें, सबमें अच्छी नीति का वर्ताव हो और पृथ्वी पर धर्म तथा अर्थ की रक्षा रहे _इस उद्देश्य से ही विधाता ने दण्ड का विधान किया है। यदि पक्षी तथा हिंसक जीव दण्ड से डरते न होते तो वे पशुओं, मनुष्यों तथा यज्ञ के लिये रखें हुए हविष्यों को भी खा जाते। चारों ओर धर्म-कर्म ओं का लोप हो जाता और सारी मर्यादाएं टूट जातीं। इतना ही नहीं, जिनमें विधिपूर्वक बड़ी_बड़ी दक्षिणाए़ दी जाती हैं, वे संवत्सर यज्ञ भी बेखटके नहीं होने पाते। आश्रम_धर्म का ठीक_ठीक पालन नहीं होता और कोई भी विद्या नहीं पढ़ पाता। डंडे पड़ने का डर न होता तो रथों में जुते हुए ऊंट, बैल, घोड़े, खच्चर तथा गदहे उन्हें खींचते ही नहीं। सेवक अपने स्वामी का तथा बालक माता_पिता का कहना नहीं मानते और युवती स्त्री अपने सती धर्म पर स्थिर नहीं रहती। दण्ड पर ही सारी प्रजा टिकी हुई है, दण्ड से ही भय होता है, मनुष्यों का इहलोक और परलोक दण्ड पर ही प्रतिष्ठित है जहां दण्ड देने का सुंदर विधान है, वहां छल, पाप और ठगी नहीं देखने में आती। इसमें संदेह नहीं कि मनुष्य के सब कार्य धन के अधीन है, परन्तु धन दण्ड के अधीन है। देखिये, दण्ड की कितनी महिमा है। "लोक_यात्रा का निर्वाह करने के लिये धर्म का प्रतिपादन किया गया है। कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसमें सब_के_सब गुण ही हों अथवा जो सर्वथा गुणों से वंचित ही हो। प्रत्येक कार्य में अच्छाई और बुराई दोनों ही देखने में आती है। इन सब बातों का विचार करके आप भी प्राचीन धर्म का पालन कीजिये। यज्ञ कीजिये, दान दीजिये तथा प्रजा एवं मित्रों की रक्षा कीजिये।" अर्जुन की बात समाप्त होने पर भीमसेन कहने लगे_"राजन् ! आप सब धर्मों के ज्ञाता हैं, आपसे कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है। मैंने की बार निश्चय किया कि 'न बोलूं, न बोलूं, मगर अधिक दु:ख होने के कारण बोलना ही पड़ता है। आपका यह अत्यन्त मोह देखकर हमलोग विकल और निर्बल हो रहे हैं। आप संसार की गति और अगति दोनों जानते हैं, भविष्य और वर्तमान में भी आपसे कुछ छिपा नहीं है। ऐसी स्थिति में भी आपको राज्य के प्रति आकृष्ट करने का जो कारण है, उसे बता रहा हूं; ध्यान देकर सुनें।
मनुष्य की दो प्रकार की व्याधियां होती हैं; एक शारीरिक और दूसरी मानसिक। इन दोनो की उत्पत्ति अन्योनाश्रित है। एक के बिना दूसरी का होना संभव नहीं है। कभी शारीरिक व्याधि से मानसिक व्याधि होती है, कभी मानसिक व्याधि से शारीरिक व्याधि। जो मनुष्य बीते हुए शारीरिक अथवा मानसिक दु:ख के लिये शोक करता है, वह एक दु:ख से दूसरे दु:ख को प्राप्त होता है। उसे दोनों प्रकार के अनर्थों से कभी छुटकारा नहीं मिलता। "इसलिये जैसे भीष्म और द्रोण के साथ आपका युद्ध हुआ था, उसी प्रकार अपने मन के साथ भी आपको लड़ना चाहिये। उसका समय अब आ गया है। इस युद्ध में न बाणों का काम है, न मित्र और बन्धुओं की सहायता का। अकेले आपको लड़ना है। मन को जीते बिना आपकी क्या दशा होगी, मैं कह नहीं सकता। हां, उसे जीतकर आप अवश्य कृतार्थ हो जायेंगे। प्राणियों के आवागमन का विचार कर अपनी बुद्धि को स्थिर कीजिये और बाप_दादों का राज्य चलाइये। सौभाग्य की बात है कि पापी दुर्योधन सेवकों सहित मारा गया; अब आप अश्वमेध यज्ञ करके विधिपूर्वक दक्षिणा दीजिये। हम सब लोग आपके दास हैं।








Wednesday, 25 June 2025

युधिष्ठिर को नकुल, सहदेव तथा द्रौपदी को समझाना

अर्जुन का बात समाप्त होने पर नकुल ने भी उन्हीं का अनुमोदन करते हुए राजा युधिष्ठिर सेश् कहा_'राजन् ! विशाखनृप नामक क्षेत्र में संपूर्ण 
देवताओं द्वारा की हुई अग्नि स्थापना के चिह्न मौजूद हैं; इससे आपको समझना चाहिए कि देवता भी वैदिक कर्मों और उनके फलों में विश्वास करते हैं। जो वेदों की आज्ञा के विरुद्ध चलते हैं; उन्हें तो महान् नास्तिक मानना चाहिए। वैदिक कर्मों का परित्याग करके कोई भी स्वर्ग में नहीं जा सकता है। वेदवेत्ता विद्वान कहते हैं _यह गृहस्थाश्रम सब आश्रमों में श्रेष्ठ है। श्रोत्रिय ब्राह्मणों की राय भी सुन लीजिये _'जो धर्मपूर्वक उपार्जन किये हुये धन का यज्ञादि कर्मों में उपयोग करता है, वह शुद्ध आत्मा मनुष्य ही त्यागी है।'जिनका कोई घर_बार नहीं, जो इधर_उधर विचरते और मौन रहकर वृक्ष के नीचे सो रहते हैं, जो कभी रसोई नहीं बनाते और मन तथा इन्द्रियों को वश में रखते हैं, ऐसे त्यागियों को भिक्षु ( संन्यासी ) कहते हैं। जो ब्राह्मण क्रोध और हर्ष नहीं करता, किसी की चुगली नहीं करता तथा प्रतिदिन वेदों का स्वाध्याय करता है, वह त्यागी कहलाता है। एक दिन महर्षियों ने चारों आश्रमों को विवेक के तराजू पर तौला; तीन आश्रम एक ओर थे और अकेला गृहस्थाश्रम दूसरी ओर। किन्तु वह विचार से उन तीनों की अपेक्षा महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। तब से उन्होंने निश्चय किया कि यही मुनियों का मार्ग है, यही लोक वेत्ताओं की गति है। जो ऐसी भावना रखता है, वह भी त्यागी है। घर छोड़कर जंगल में चले जाने से कोई त्यागी नहीं होता। जंगल में जाकर भी जिसके हृदय में कामना जाग्रति होती है, उसके गले में यमराज मौत का फंदा डाल देते हैं; शम, दम, धैर्य, सत्य शौच, सरलता, यज्ञ धारणा तथा धर्म_इन सबका ही निरंतर पालन ऋषियों के लिये बताया गया है। पितरों, देवताओं और अतिथियों का पोषण तो गृहस्थाश्रम में ही होता है। केवल इसी आश्रम में धर्म, अर्थ और काम _ये तीन पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। यहां रहकर वेदविहित विधि का पालन करने वाले त्यागी का कभी विनाश नहीं होता_वह पारलौकिक उन्नति से कभी वंचित नहीं होता। कुछ ऋषि सद्ग्रंथों का स्वाध्यायरूप यज्ञ करनेवाले होते हैं, कुछ ज्ञानयज्ञ में तत्पर रहते हैं और कुछ लोग मन में ही ध्यानरूप महान् यज्ञ का विस्तार करते हैं। चित्त को एकाग्र करनारूप जो साधन_मार्ग है, उसका आश्रय देनेवाला द्विज ब्रह्मभूत हो जाता है, देवता भी उसके दर्शन के लिए उत्सुक रहते हैं। जिसपर कुटुम्ब का भार हो, उस राजा के लिये गृह_त्याग का विधान नहीं देखने में आता। उसे तो राजसूय, अश्वमेध, सर्वमेध या और कोई शास्त्रीय यज्ञ करके उसमें धन का दान करना चाहिए। राजा के प्रमाद से लुटेरे प्रबल होकर प्रजा को लूटने लगते हैं, उस अवस्था में यदि राजा ने प्रजा को शरण नहीं दी तो उसे कलियुग का मूर्तिमान स्वरूप ही समझना चाहिए। जो दान नहीं देते, शरणागतों की रक्षा नहीं करते, वे राजा पाप के भागी होते हैं; उन्हें दु:ख_ही_दु:ख भोगना पड़ता है, सुख तो कभी नसीब नहीं होता। भीतर और बाहर जो कुछ भी मन को फंसानेवाली चीजें हैं उन्हें छोड़ने से मनुष्य त्यागी बनता है, सिर्फ घर छोड़ देने से त्याग की सिद्धि नहीं होती। जो शास्त्रीय विधान में सदा लगा रहता है, उसकी कभी हानि नहीं होती। महाराज ! पूर्ववर्ती राजाओं ने जिसका सेवन किया है, उस स्वधर्म में स्थित रहकर शत्रुओं पर विजय पाने के पश्चात् भला, आपके सिवा दूसरा कौन शोक करेगा ?' तदनन्तर सहदेव ने कहा_'भारत ! केवल बाहर के पदार्थों का त्याग करने से सिद्धि नहीं मिलती।
शरीर से सम्बन्ध रखने वाली वस्तुओं को छोड़ देने से भी सिद्धि मिलती है कि नहीं, इसमें संदेह है। टफबाहरी पदार्थों का त्याग करके दैहिक सुख_भोगों में आसक्त रहनेवाले को जिस धर्म अथवा सुख की प्राप्ति होती है, वह हमारे हितैषी मित्रों को मिले। दो अक्षरों का 'मम' ( यह मेरा है_ऐसा भाव ) मृत्यु है और तीन अक्षरों का 'न मम' ( यह मेरा नहीं है_ऐसा भाव ) अमृत सनातन ब्रह्म है। महाराज ! यदि जीव नित्य है, इसका अविनाशी होना निश्चित है, तो प्राणियों का शरीर_मात्र वध करने मात्र से वास्तव में उनकी हिंसा नहीं होगी। इसके विपरीत यदि शरीर के साथ ही जीव की उत्पत्ति या उसके नष्ट होने के साथ ही जीव का भी नाश माना जाय, तब तो सारा वैदिक कर्म मार्ग ही व्यर्थ सिद्ध होगा। इसलिये  विज्ञ पुरुष को एकांत में रहने का विचार छोड़कर पूर्वपुरुषों ने जिस मार्ग का सेवन किया है, उसी का आश्रय लेना चाहिए। राजन् ! वन में रहकर वहां के फल_फूलों से जीविका चलाता हुआ भी जो द्रव्यों में ममता रखता है, वह मौत के मुंह में हैं। प्राणियों का बाह्य स्वरूप कुछ और होता है और आन्तरिक स्वरूप कुछ और ; आप उसपर गौर कीजिये। जो सबके भीतर विराजमान आत्मा को देखते हैं, वे ही महान् भय से छुटकारा पाते हैं। आप मेरे पिता, माता, भाई तथा गुरु_ सब कुछ हैं। मैं आर्त हूं इसलिये दु:ख में न जाने क्या_क्या प्रलाप कर गया हूं; आप उसे क्षमा करें। मैंने झूठा_सच्चा जो भी कहा है, वह आपके चरणों में भक्ति होने के कारण ही कहा है।' वैशम्पायनजी कहते हैं_इस प्रकार अपने भाइयों के मुख से वेद के सिद्धांतों को सुनकर भी जब युधिष्ठिर चुप ही रह गये तो धर्म को जाननेवाले द्रौपदी उनकी ओर देखकर उन्हें मधुर वचनों से समझाती हुई कहने लगी_"महाराज ! आपके ये भाई आपका संकल्प सुनकर सूख गये हैं, पपीहे की तरह रट लगा रहे हैं। फिर भी आप अपनी बातों से इन्हें प्रसन्न नहीं करते। क्यों ? ये सदा आपके लिये दु:ख_ही_दु:ख उठाते आये हैं ? अब तो इन्हें उचित बातें सुनाकर आनंदित कीजिये। आपको याद होगा, जब द्वैतवन में ये सभी भाई आपके साथ सर्दी _गर्मी और आंधी पानी का कष्ट भोग रहे थे। उन दिनों आपने इन्हें धैर्य देते हुए कहा था_'बन्धुओं ! हमलोग युद्ध में दुर्योधन को मारकर इस संपूर्ण पृथ्वी का राज भोगेंगे। उस समय बड़े _बड़े यज्ञ करके पर्याप्त दान_दक्षिणा बांटते रहने से तुम्हारा वनवास का यह दु:ख सुख के रूप में परिणत हो जायगा।' धर्मराज ! यदि यही करना था, तो उस समय आपने वैसी बातें क्यों कहीं ? जब स्वयं उपर्युक्त बातें कहकर हौसला बढ़ाया, तो अब क्यों आप हमलोगों का दिल तोड़ रहे हैं ? आपको दण्ड आदि के द्वारा इस पृथ्वी का पालन करना चाहिये; क्योंकि दण्ड न देनेवाले क्षत्रिय की शोभा नहीं होती, दण्ड न देनेवाला राजा इस पृथ्वी का उपभोग नहीं कर सकता तथा उसकी प्रजा को भी सुख नहीं मिलता। राजाओं का परम धर्म तो यही है कि दुष्टों को दण्ड दें, सत्पुरुषों का पालन करें और युद्ध में कभी पीछे पीठ न दिखावे। 'जो अवसर देखकर क्षमा भी करता है और क्रोध भी, दान देता और कर लेता है, शत्रुओं को भय दिखाता र शरणागतों को निर्भय बनाता है तथा दुष्टों को दण्ड देता और दिनों पर अनुग्रह करता है, वह राजा धर्मात्मा कहलाता है। आपको यह पृथ्वी न तो शास्त्र सुनाने से मिली है, न दान में; न किसी को समझा_बुझाकर इसे हड़प लिया है, न यज्ञ में प्राप्त किया है और न भीख मांगकर ही पाया है। आपने तो शत्रुओं की प्रबल सेना का संहार करके इसपर विजय पायी है, इसलिये आप इस पृथ्वी का उपभोग कीजिये। महाराज! अनेकों देशों में एक संपूर्ण जम्मूद्वीप पर आपने कर लगाया; जम्मूद्वीप के समान ही जो मेरुगिरि के पश्चिम क्रौंचद्वीप है, उसपर अधिकार जमाया, मेरी से पूर्व दिशा में क्रौंचद्वीप के समान ही जो शाकद्वीप है, उसपर भी कर लगाया तथा मेरी से उत्तर ओर जो शाकद्वीप के समान ही भद्राद्वीप है, उसके उपर भी शासन किया है। इनके अतिरिक्त जो भी बहुत _से देशों के आश्रय भूत द्वीप और अन्तर्द्वीप हैं, समुद्र लांघकर उनपर भी आपने अधिकार प्राप्त किया। भाइयों की सहायता से ऐसे अनुपम पराक्रम करके द्विजातियों द्वारा सम्मानित होकर भी आप प्रसन्न क्यों नहीं होते ? मेरे अनुरोध से आप इन भाइयों का अभिनन्दन कीजिये। "महाराज ! मेरी सास कभी झूठ नहीं बोलीं, वे सर्वज्ञ हैं और सबकुछ उनकी दृष्टि के सामने है उन्होंने मुझसे कहा था 'पांचालकुमारी ! राजा युधिष्ठिर बड़े पराक्रमी हैं, ये हजारों राजाओं का संहार करके तुम्हें बड़े सुख से रखेंगे।' किन्तु आज आपका मोह देखकर उनकी बात भी व्यर।था होती दिखाई देती है। जब जेठा भाई उन्मत्त हो जाता है, तो छोटे भाई भी उसी का अनुसरन करने लगते हैं। आपके उन्माद से सब पाण्डव भी उन्मत्त हो गये हैं। जो उन्नमत्तता का काम करता है, उसका कभी भला नहीं होता; उन्नमआर्ग से चलनेवाले की तो दवा करानी चाहिये। मैं ही संसार की समस्त स्त्रियों में नीच हूं, जो बेटों के मारे जाने पर भी जीवित रहना चाहती हूं। ये सब लोग समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं, फिर भी आप मानते नहीं। मैं सच कहती हूं, आप संपूर्ण पृथ्वी का राज्य छोड़कर अपने लिये स्वयं विपत्ति बुला रहे हैं। महाराज ! आप मान्धाता और अम्बरीष के समान तेजस्वी हैं; संपूर्ण प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करते हुए, पर्वत, वन तथा द्वीपों सहित इस पृथ्वी का शासन कीजिये। उदास न होइये। नाना प्रकार के यज्ञ करके ब्राह्मणों को दान दीजिये।"

Saturday, 24 May 2025

युधिष्ठिर का वनवासी, मुनि एवं संन्यासी होने का विचार तथा भीम और अर्जुन द्वारा उसका विरोध

युधिष्ठिर ने कहा_'अर्जुन ! थोड़ी देर तक मन को एकाग्र करके मेरी बात सुनो और उसपर विचार करो; फिर तुम भी मेरे कथन का अनुमोदन करोगे। क्या तुम्हारे कहने से मैं उस मार्ग पर न चलूं, जिसपर श्रेष्ठ पुरुष सदा ही चलते आये हैं ? नहीं, मुझसे यह न होगा ; मैं तो सांसारिक सुखों पर लात मारकर अवश्य उसी मार्ग पर चलूंगा और वन में फल_मूल खाकर कठोर तपस्या करूंगा। सवेरे तथा सायंकाल में स्नान करके विधिवत् अग्नि में आहुति डालूंगा और शरीर पर मृगछाला तथा बल्कि वस्त्र धारण कर मस्तक पर जटा रखूंगा। सर्दी_गर्मी, हवा तथा भूख_प्यास का कष्ट सहन करूंगा और शास्त्रोक्त विधि से तप करके अपने शरीर को सुखा डालूंगा। एकान्त में रहकर तत्व का विचार करूंगा और कच्चा_पक्का_जैसा भी फल मिल जायगा, उसी को खाकर जीवन_निर्वाह करूंगा। इस प्रकार वनवासी मुनियों के कठोर_से_कठोर नियमों का पालन करके इस शरीर की आयु समाप्त होने की बाट देखता रहूंगा। अथवा मुनिवृति से रहता हुआ मस्तक मुड़ा लूंगा और एक_एक दिन एक_एक वृक्ष से भिक्षा मांगकर देह को दुर्बल कर डालूंगा। प्रिय और अप्रिय का विचार छोड़कर पेड़ के नीचे ही निवास करूंगा। किसी के लिये न शोक करूंगा न हर्ष । निंदा तथा स्तुति को समान समझूंगा। आशा और ममता को धो बहाकर निर्द्वन्द हो जाउंगा। कभी किसी भी वस्तु का संग्रह न करूंगा। आत्मा में ही रमण करता हुआ सदा प्रसन्न रहूंगा। दूसरों से कोई भी बात नहीं करूंगा तथा अंधों, गूंगों और बहरों की तरह विचरता रहूंगा। चर और अचर रूप में जो चार प्रकार के जीव हैं, उनमें से किसी की भी हिंसा नहीं करूंगा। सब प्राणियों पर मेरी समान वृद्धि होगी, न तो किसी की हंसी उड़ाऊंगा, न किसी को देखकर भौंहें टेढ़ी करूंगा। चेहरे पर सदा प्रसन्नता छायी रहेगी, सब इन्द्रियों को पूर्णरूप से वश में रखूंगा। कोई भी राह पकड़कर आगे बढ़ता रहूंगा, किसी से रास्ता नहीं पूछूंगा। किसी खास देश या दिशा में जाने की इच्छा न रखूंगा। यात्रा का कोई विशेष उद्देश्य न होगा; न आगे की उत्सुकता होगी न पीछे फिरकर देखूंगा।
चित्त में कोई भी विकार नहीं रहेगा, अन्तरात्मा पर दृष्टि रखूंगा और देहाभिमान से रहित हो जाऊंगा। भिक्षा थोड़ी मिली या स्वादहीन _इसका विचार नहीं करूंगा। एक घर से भिक्षा न मिली तो दूसरे घर से मांगूंगा, वहां भी न मिलने पर तीसरे घर से। इस प्रकार न मिलने की दशा में सात घरों तक मांगूंगा, आंठवएं पर नहीं जाऊंगा।जब घरों में धुआं निकलना बन्द हो गया हो, अंगारे बुझ गये हों, सब लोग खा_पी चुके हों, परोसी हुई थाली का इधर_उधर ले जाने का काम समाप्त हो गया हो, भिखमंगे भिक्षा लेकर लौट गये हों, ऐसे समय में मैं एक ही समय भिक्षा के लिये जाया करूंगा। सब ओर से स्नेह का बंधन तोड़कर पृथ्वी पर विचरता रहूंगा। न जीवन से राग होगा न मृत्यु से द्वेष। यदि एक मनुष्य मेरी एक बांह बंसुले से काटता है और दूसरा दूसरी बांह पर चंदन चढ़ाता है तो मैं उन दोनों पर समान भाव ही रखूंगा। न एक का मंगल चाहूंगा न दूसरे का अमंगल। केवल शरीर निर्वाह के लिये पलकों के खोलने _मीचने तथा खाने_पीने आदि का कार्य करूंगा, परन्तु इसमें भी आसक्ति नहीं रखूंगा। संपूर्ण इन्द्रियों के व्यापारों से उपरत होकर मन के संकल्प को अपने अधीन रखूंगा। बुद्धि के मल का परिमार्जन करके सब प्रकार की आसक्तियों से मुक्त रहूंगा। इस प्रकार वीतराग होकर विचरने से मुझे अक्षय शान्ति मिलेगी। इस संसार में जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और वेदनाओं के आक्रमण होता ही रहता है; जिसके कारण यहां का जीवन कभी स्वस्थ नहीं रहता। इस अपार_सा संसार का तो त्यागने में ही सुख है।आज बहुत दिनों बाद मुझे विशुद्ध विवेकरूपी अमृत प्राप्त हुआ है; इसके द्वारा मैं अक्षय, अविकारी एवं सनातन स्थान को प्राप्त करना चाहता हूं। अतः उपर्युक्त धारणा के द्वारा निरंतर विचरता हुआ मैं जन्म, मृत्यु, व्याधि और वेदनाओं से भरे हुए इस शरीर का अन्त करके निर्भय पद को प्राप्त हो जाऊंगा।
यह सुनकर भीमसेन बोले_राजन् ! जब आपने राजधर्म की निंदा करके आलस्यपूर्ण जीवन करने का ही निश्चय कर रखा था तो बेचारे कौरवों का नाश कराने से क्या लाभ था ? आपका यह विचार यदि पहले ही मालूम हो गया होता तो हमलोग न हथियार उठाते, न किसी का वध करते। आपकी ही तरह शरीर त्यागने का संकल्प लेकर हम भी भीख ही मांगते। ऐसा करने से राजाओं के साथ यह भयंकर संग्राम तो नहीं होता। बुद्धिमान पुरुषों ने क्षत्रियों का यह धर।म बताया है कि ये राज्य पर अधिकार जमावें और यदि उसमें कुछ लोग बाधा उपस्थित करें तो उन्हें मार डालें। दुष्ट कौरव भी हमारे लिये राज्य_प्राप्ति में बाधक थे, इसीलिये हमने उनका वध किया है, अब आप धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का उपभोग कीजिये। अन्यथा हमलोगों का सारा प्रयत्न व्यर्थ हो जायगा; जैसे कोई मनुष्य मन में किसी तरह की आशा रखकर बहुत बड़ी मंजिल तय कर लें और वहां पहुंचकने पर उसे निराश होकर लौटना पड़े, यही दशा हमलोगों की भी होगी। आप जिस संन्यास की बात सोचते हैं, उसका यह समय नहीं है। जिनकी विचारदृष्टि सूक्ष्म है, वे बुद्धिमान पुरुष ऐसे अवसर पर त्याग की प्रशंसा नहीं करते, वे तो इसे स्वधर्म का उल्लंघन समझते हैं। जो पुत्र _पौत्र के पालन में असमर्थ हो, देवता, ऋषि और पितरों का तर्पण न कर सके और अतिथियों को भोजन देने की शक्ति न रखता हो, ऐसा मनुष्य जंगलों में जाकर मौज से अकेला जीवन व्यतीत कर सकता है।आप जैसे शक्तिशाली पुरुषों का यह काम नहीं है। राजा को तो कर्म करना ही चाहिये; जो कर्मों को छोड़ बैठता है उसे कभी सिद्धि नहीं मिलती। 
तत्पश्चात् अर्जुन ने कहा_महाराज ! इसी विषय में एक बार तपस्वियों के साथ इन्द्र का संवाद हुआ था, वह प्राचीन इतिहास में आपको सुनाता हूं। एक समय की बात है, कुछ कुलीन ब्राह्मण बालक_जो अभी बहुत नादान थे, जिन्हें मूंछ तक नहीं आयी थी_घर_बार छोड़कर जंगल में चले आये, संन्यासी बन गये। इसी को धर्म मानकर वे प्रसन्न थे। भाई_बन्धु और मां_बाप की सेवा से मुंह मोड़कर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने लगे। एक दिन उनपर इन्द्र देव की कृपा हुई। वे सुवर्णमय पक्षी का रूप धारण करके उनके पास गये और उन्हें सुनाकर कहने लगे_'यज्ञशिष्ठ अन्न भोजन करनेवाले महात्माओं ने जो कर्म किया है; वह दूसरे मनुष्यों से होना कठिन है। उनका यह कर्म बड़ा पवित्र और जीवन बहुत उत्तम है। उनका मनोरथ सफल हुआ और वे धर्मात्मा पुरुष उत्तम गति को प्राप्त हुए हैं।' ऋषियों ने कहा_वाह ! यह पक्षी यज्ञशइष्ठ अन्न भोजन करनेवालों की प्रशंसा करता है, यह तो हमलोगों की ही प्रशंसा हुई; क्योंकि हमलोग ही यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करते हैं। पक्षी ने कहा_अरे ! मैं तुम्हारी प्रशंसा नहीं करता। तुम तो जूठा खानेवाले और मूर्ख हो, पाप_पंक में फंसे हुए हो। यज्ञशिष्ट अन्न खानेवाले तो दूसरे ही होते हैं। ऋषियों ने कहा_पक्षी ! यह बड़ा कल्याणकारी साधन है_ऐसा समझकर ही हम इस मार्गं का अवलम्ब किये बैठे हैं। अब तुम्हारी बात सुनकर तुमपर हमारी श्रद्धा हुई है, अतः: जो अत्यन्त कल्याण करनेवाला साधन हो, वहीं हमें बताओ। पक्षी ने कहा_यदि तुम्हारा मुझपर विश्वास है तो मैं यथार्थ बात बताता हूं, सुनो। चौपायों में गौ, धातुओं में सोना, शब्दों में प्रणव आदि मंत्र और मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। ब्राह्मण के लिये जातकर्म आदि संस्कार शास्त्रविहित है; ब्राह्मण जबतक जीवित रहे, समय_समय पर उसका संस्कार होता रहना चाहिये। मरने के पश्चात् भी उसका श्मशान भूमि में अन्त्येष्टि_संस्कार तथा घर पर श्राद्ध आदि वेद_विधि के अनुसार होना उचित है। वेदोक्त यज्ञ_यागादि कर्म ही उसके लिये स्वर्ग में पहुंचाने वाले उत्तम मार्ग हैं। वैदिक कर्म ही सिद्धि का क्षेत्र है सभी प्राणी इसकी इच्छा रखते हैं। जहां इन कर्मों का विधिवत् संपादन होता है, वह गृहस्थ_आश्रम ही सबसे बड़ा आश्रम है। जो कर्म की निंदा करते हैं, उन्हें कुमार्गगामी समझना चाहिये। उन्हें बड़ा पाप लगता है। देव यज्ञ, पितृ यज्ञ और ब्रह्मयज्ञ_ ये ही तीन सनातन मार्ग हैं। जो मूर्ख इनका परित्याग कर और किसी मार्ग से चलते हैं, वे वेदविरुद्ध पथ का आश्रय लेनेवाले हैं। हवन के द्वारा देवताओं को, स्वाध्याय के द्वारा ऋषियों को और श्राद्ध द्वारा पितरों को तृप्त करना_यह सनातन धर्म है; इसका पालन करते हुए गुरुजनों की सेवा करना ही कठोर तप है। इस दुष्कर तपस्या को करके ही देवताओं ने बहुत बड़ी विभूति पायी है। जिनकी किसी के प्रति इर्ष्या नहीं है, जो सब प्रकार के द्वन्दों से रहित हैं, ऐसे ब्राह्मण इसी को तप मानते हैं। संसार में व्रत को ही तप कहते हैं, किन्तु वह इसकी अपेक्षा मध्यम श्रेणी का है। जो यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करते हैं, उन्हें अविनाशी पद की प्राप्ति होती है। देवताओं, पितरों, अतिथियों तथा परिवार के अन्य लोगों को अन्न देकर जो स्वयं सबसे पीछे खाते हैं, वे ही यज्ञशिष्ट भोजन करनेवाले कहे गये हैं। अपने धर्म पर आरूढ़ होकर सुन्दर व्रत का पालन और सत्य_भाषण करते हुए वे इस जगत् के गुरु समझे जाते हैं।

Thursday, 1 May 2025

युधिष्ठिर का घर छोड़कर वन में जाने का विचार और अर्जुन द्वारा इसका विरोध

नारदजी ने कहा_राजन् ! एकबार कर्ण की जरासंध के साथ भी मुठभेड़ हुई थी, उसमें परास्त होकर जरासंध ने कर्ण को अपना मित्र बना लिया और उसे चम्पा नगरी उपहार में दे दी। पहले कर्ण केवल अंगदेश का राजा था, किन्तु इसके बाद वह दुर्योधन की अनुमति से चम्पा ( चम्पारण ) में भी राज्य करने लगा। इसी प्रकार एक समय इन्द्र ने आपकी भलाई करने के लिये कर्ण से कवच और कुण्डलों की भीख मांगी थी। ये कवच और कुण्डल दिव्य थे तथा कर्ण के देह के साथ उत्पन्न हुए थे, तो भी उसने इन्द्र को ये दोनों वस्तुएं दान कर दीं। इसीलिए अर्जुन श्रीकृष्ण के सामने उसे मारने में सफल हो सके। एक तो उसे अग्निहोत्री ब्राह्मण तथा महात्मा परशुराम ने शाप दे दिया था, दूसरे उसने स्वयं भी कुन्ती कुन्ती को वरदान दिया था कि मैं तुम्हारे चार पुत्रों को नहीं मारूंगा। इसके सिवा महारथियों की गणना करते समय भीष्म ने कर्ण को 'अर्धरथी' कहकर अपमानित किया था, इसके बाद शल्य ने भी उसका तेज नष्ट कर दिया और भगवान् कृष्ण ने नीति से काम लिया। इतनी बातें तो कर्ण के विपरीत हुईं और अर्जुन को रुद्र, यम, वरुण, कुबेर, द्रोण तथा कृपाचार्य से दिव्यास्त्र प्राप्त हुए थे, जिनका उपयोग करके उन्होंने कर्ण का वध किया है। फिर भी वह युद्ध में मारा गया है, इसलिये शोक के योग्य नहीं है।वैशम्पायनजी कहते हैं_इतना कहकर देवर्षि नारद चुप हो गये और राजा युधिष्ठिर शोकमग्न हो चिंता में डूब गये। उनकी यह अवस्था देखकर कुन्ती शोक से विह्वल हो उठी और मधुर वाणी से अर्थभरे वचन कहने लगी_'बेटा ! कर्ण के लिये शोक न करो। चिंता छोड़ो और मेरी बात सुनो । मैंने और भगवान् सूर्य ने कर्ण को यह जताने की कोशिश की थी कि युधिष्ठिर आदि तुम्हारे भाई हैं। एक हितैषी सुहृद् को जो कुछ कहना चाहिये, सूर्यदेव ने वह सब कहां। उन्होंने उसे स्वप्न में तथा मेरे सामने बहुत समझाया। परन्तु हमलोग अपने प्रयत्न में सफल न हो सके। वह मौत के वशीभूत होकर बदला लेने को तैयार था, इसलिये मैंने भी उसकी उपेक्षा कर दी।' माता की बात सुनकर धर्मराज के नेत्रों में आंसू भर आये। वे शोक से व्याकुल होकर कहने लगे।'मां ! तुमने यह रहस्यमयी बात छिपा रखी थी, इसीलिये आज मुझे कष्ट भोगना पड़ता है।' फिर उन्होंने दु:खी होकर संसार की सब स्त्रियों को शाप दे दिया _'आज से कोई भी स्त्री गुप्त बात छिपाकर न रख सकेगी।' इसके बाद वे मरे हुए पुत्र_पौत्र, संबंधी तथा सुहृदों को याद करके बहुत विकल हो गये और अर्जुन की ओर देखकर कहने लगे_'अर्जुन ! यदि हमलोग वृष्णिवंशी तथा अंधकवंशी क्षत्रियों के नगरों में जाकर भिक्षा से अपना जीवन_निर्वाह कर लेते तो आज अपने कुटुंब को निर्वंश करके हमें यह दुर्गति नहीं भोगनी पड़ती। क्षत्रिय के आचार और उसके बल, पौरुष तथा अमर्ष को भी धिक्कार है, जिनके कारण हम इस विपत्ति में पड़ गये। क्षमा, दम, शौच, वैराग्य, मात्सर्य का अभाव, अहिंसा और सत्य बोलना _ये वनवासियों के धर्म ही श्रेष्ठ हैं। किन्तु हमलोग तो लोभ और मोह के कारण राज्य पाने की इच्छा से दम्भ और मान का आश्रय ले इस दुर्दशा में फंसे गये हैं। इस समय तीनों लोकों का राज्य देकर भी कोई हमें प्रसन्न नहीं कर सकता ! हाय ! हमने इस पृथ्वी पर अधिकार पाने के लिये अवध्य राजाओं की भी हत्या की और अब अपने बन्धु_बांधवों के बिना हम अर्ध भ्रष्ट की भांति जीवन व्यतीत कर रहे हैं। ओह ! जिन बांधवों का हमने वध किया है उन्हें तो सारी पृथ्वी, सुवर्ण के ढेर और बहुत _सेज्ञगाय घोड़े आदि की प्राप्ति होने पर भी हमें नहीं मारना चाहिये था; किन्तु हमने उन्हें मार ही डाला। यह शोक हमें चैन लेने नहीं देता।
धनंजय ! सुना है मनुष्य का किया हुआ पाप शुभ कर्मों के आचरण से, दूसरों को कहकर सुनाने से, पश्चाताप से तथा दान, तप, त्याग, तीर्थयात्रा एवं श्रुति स्मृतियों का पाठ करने से भी नष्ट होता है। श्रुति ने कहा है कि त्यागी पुरुष को जन्म_मरण की प्राप्ति नहीं होती_वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। इसके अनुसार योग मार्ग को प्राप्त करके जब बुद्धि स्थिर हो जाती है, उस समय मनुष्य परमआत्वभआव को प्राप्त हो जाता है। यह सोचकर मैं भी शीत_उष्ण आदि द्वन्दधर्मओं से रहित हो मुनिवृति से रहकर ज्ञानोपार्जन करना चाहता हूं। इसलिये मैंने सारा संग्रह, संपूर्ण राज्य तथा सुख_भोग आदि को त्याग देने का निश्चय किया है। अब मैं ममता और शोक से रहित हो सब प्रकार के बंधनों से छूटकर कहीं जंगल में चला जाऊंगा, मुझे राज्य अथवा भोगों से कोई मतलब नहीं है। यह कहकर जब धर्मराज चुप हो गये तो अर्जुन यह कहकर जब धर्मराज चुप हो गये तो अर्जुन बोले_'महाराज ! यह बहुत अफसोस की बात है और हददर्जे की कायरता है, जो आप अलौकिक पराक्रम करके प्राप्त की हुई इस उत्तम राज्यलक्ष्मी को ठुकरा देने के लिये उद्यत हुए हैं। यदि त्याग ही देना था तो क्रोध में आकर इसी के लिये तमाम राजाओं की हत्या क्यों करायी ? अपने समृद्धिशाली राज्य का परित्याग करके जब हाथ में खप्पर लेकर घर_घर भीख मांगते फिरेंगे, उस समय संसार क्या कहेगा ?बोले_'महाराज ! यह बहुत अफसोस की बात है और हददर्जे की कायरता है, जो आप अलौकिक पराक्रम करके प्राप्त की हुई इस उत्तम राज्यलक्ष्मी को ठुकरा देने के लिये उद्यत हुए हैं। यदि त्याग ही देना था तो क्रोध में आकर इसी के लिये तमाम राजाओं की हत्या क्यों करायी ? अपने समृद्धिशाली राज्य का परित्याग करके जब हाथ में खप्पर लेकर घर_घर भीख मांगते फिरेंगे, उस समय संसार क्या कहेगा ? क्या कारण है कि सब प्रकार के शुभ कर्मों का अनुष्ठान छोड़कर अशुभ एवं अकिंचन बनकर आप गंवार मनुष्यों की तरह भिक्षा मांगना पसंद करते हैं। इस उत्तम राजवंश में जन्म लेकर संपूर्ण पृथ्वी को अपने अधीन करके अब आप धर्म और अर्थ का परित्याग कर वन की ओर जा रहे हैं ! यह मूर्खता नहीं तो क्या है ? जब आप ही हवन एवं यज्ञ_यागादि कर्मों को त्याग देंगे तो दूसरे असाधु पुरुष आपका ही आदर्श सामने रखकर यज्ञों का उच्छेद कर डालेंगे। उस दशा में इसका सब पाप आपको लगेगा। सर्वस्व त्यागकर अकिंचन हो जाना, दूसरे दिन के लिये संग्रह न करके प्रतिदिन मांगकर खाना _यह मुनियों का धर्म है, राजाओं का नहीं; राजधर्म का पालन तो धन से ही होता है। महाराज ! धन से धर्म भी होता है, लौकिक कामनाएं भी पूर्ण होती हैं और स्वर्ग का साधनभूत यज्ञ भी सम्पन्न होता है; यही नहीं, धन के बिना तो संसार की जीविका ही नहीं चल सकती। जिसके पास धन होता है उसी के पास बहुत _से मित्र  तथा बन्धु_बान्धव होते हैं वहीं मर्द समझा जाता है और वही पण्डित माना जाता है। निर्धन मनुष्य जब धन चाहता है तो उसे उसकी प्राप्ति कठिन हो जाती है; मगर धनवान का धन बढ़ता रहता है। जैसे जंगल में एक हाथी के पीछे बहुत _से हाथी चले आते हैं, उसी प्रकार धन ही धन को खींच लाता है। धन से धर्म का पालन, कामना की पूर्ति, स्वर्ग की प्राप्ति, आनन्द तथा शास्त्रों का अभ्यास _ये सब कुछ सम्भव है। धन से वंश की मर्यादा बढ़ती है और धन से धर्म की भी वृद्धि होती है, निर्धन को  न तो इस लोक में सुख है न परलोक में ! क्योंकि धन के बिना मनुष्य धार्मिक कृत्यों का विधिवत् अनुष्ठान नहीं कर सकता। जिनके पास धन की कमी है, गऔओं और सेवकों का अभाव है, जिसके यहां अतिथियों का आना_जाना नहीं होता, वही मनुष्य दुर्बल है। केवल शरीर की दुर्बलता से कोई दुर्बल नहीं कहा जाता। राजा को हर तरह से धन संग्रह करना चाहिये और उसके द्वारा यत्नपूर्वक यज्ञादि का अनुष्ठान भी करते रहना चाहिये। यही सनातन काल से वेदों की भी आज्ञा है धन से ही मनुष्य यज्ञ करते और कराते हैं, पढ़ने _पढ़ाने का कार्य भी धन से ही सम्पन्न होता है। राजा लोग दूसरों को युद्ध में जीतकर जो उनका तन ले आते हैं, उसी से वे सम्पूर्ण शुभकर्मों का अनुष्ठान करते हैं। किसी भी राजा के पास हम ऐसा धन नहीं देखते, जो दूसरों के यहां से न आया हो। प्राचीनकाल में जो राजर्षि हो गये हैं और इस समय स्वर्ग में निवास करते हैं, उन्होंने भी राजधर्म की ऐसी ही व्याख्या की है। राजन् ! पहले यह पृथ्वी राजा दिलीप के अधिकार में थी; फिर क्रमश: इसपर नृग, नहुष, अम्बरीष और मान्धाता का अधिपत्य हुआ। वहीं आज आपके अधीन हुई है। अतः उन्हीं राजाओं की भांति आपके लिये भी, जिसमें सब कुछ दक्षिणा के रूप में दान कर दिया जाता है वैसे सर्वस्वदक्षिण नामक द्रव्यमान यज्ञ करने का समय प्राप्त हुआ है। जिनका राजा दक्षिणायुक्त अश्वमेध यज्ञ करता है, वे सभी प्रजाएं उस यज्ञ के अन्त में अवभऋथ_स्नान करके पवित्र होती है। अतः आप समस्त प्राणियों के कल्याणार्थ यज्ञ कीजिये। क्षत्रियों के लिये यही सनातन मार्ग है, यही अभ्युदय का पथ है।'





Thursday, 17 April 2025

शान्ति पर्व ____शोकाकुल युधिष्ठिर को शान्त्वना देते हुए देवर्षि नारद का उन्हें कर्ण का पूर्वचरित्र सुनाना

नारायणं नमस्यकृत्यं नरं चैव नरोत्तम। देवीं सरस्वतीं व्यासं तो जयमुदीरयेत्।।
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके नित्यसखा नरस्वरूप नररत्न अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करने वाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता महर्षि वेदव्यास को नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियों पर विजयप्राप्तिपूर्वक अंत:करण को शुद्ध करनेवाले महाभारत ग्रंथ का पाठ करना चाहिये।
वैशम्पायनजी कहते हैं_अपने समस्त सुहृदों को जलांजलि देने के पश्चात् पाण्डव, विदुर, धृतराष्ट्र तथा भरतवंश की संपूर्ण स्त्रियां आत्मशुद्धि के लिये एक मास तक नगर से बाहर गंगा तट पर टिकी रहीं। उस समय धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर के पास बहुत से सिद्ध, महात्मा तथा ब्रह्मर्षि पधारे। इनमें द्वैपायन व्यास, नारद, देवल, देवस्थान, कण्व तथा इन सबके शिष्य भी थे। इनके अतिरिक्त भी अनेक वेदवेत्ता ब्राह्मण, गृहस्थ एवं स्नातक पधारे थे। राजा युधिष्ठिर ने उन सब महर्षियों का विधिवत् पूजन किया। इसके बाद वे उनके दिये हुए बहुमूल्य आसनों पर विराजमान हुए। समयोचित पूजा स्वीकार करके वे ऋषि _महर्षि गंगा के पावन तट पर शोक से व्याकुल हुए महाराज युधिष्ठिर को धैर्य बंधाने लगे।
सबसे पहले नारदजी ने व्यास आदि मुनियों से वार्तालाप करके राजा युधिष्ठिर के प्रति इस प्रकार कहा_'राजन् ! आपने अपने बाहुबल तथा भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से इस संपूर्ण पृथ्वी पर धर्मपूर्वक विजय पायी है। सौभाग्य की बात है कि आप इस भयंकर संग्राम में जीते_जागते बच गये। अब क्षत्रिय धर्म के पालन में तत्पर रहते हुए आप प्रसन्न तो हैं न ? इस राज्यलक्ष्मी को पाकर आपको कोई शोक तो नहीं सताता ?युधिष्ठिर ने कहा_मुनिवर ! भगवान् श्रीकृष्ण के आश्रय, ब्राह्मणों की कृपा तथा भीम और अर्जुन के बल से मैंने संपूर्ण पृथ्वी पर विजय तो पा ली; परन्तु मेरे हृदय में प्रतिदिन यह एक महान् दु:ख बना रहता है कि मैंने लओभवश अपने कुल का संहार करा दिया।सुभद्राकुमार अभिमन्यु और द्रौपदी के प्यारे पुत्रों को मरवाकर अब यह विजय भी पराजय_सी ही जान पड़ती है। द्रौपदी सदा हमलोगों का प्रिय तथा हित करने में लगी रहती है, इस बेचारी के पुत्र और भाई सब मारे गये, जब इसकी ओर देखता हूं तो मुझे बहुत कष्ट होता है। नारदजी ! यह सब दु:ख तो था ही, एक दूसरी बात और बता रहा हूं, मेरी माता कुन्ती कुन्ती ने कर्ण के जन्म का रहस्य छिपाकर मुझे और भी दु:ख में डाल दिया है। जिनमें दस हजार हाथियों का बल था, संसार में जिनकी समानता करनेवाला कोई भी महारथी नहीं था, जो बुद्धिमान, दाता, दयालु और व्रत का पालन करनेवाले थे, जिनमें शौर्य का पूरा अभिमान था, जो फुर्ती से अस्त्र चलानेवाले तथा विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले थे, जिनका पराक्रम अद्भुत था, उन विद्वान् कर्ण को माता कुन्ती ने ही गउप्तररूप से जन्म दिया था, वे हमलोगों के भाई थे। जलदान करते समय कुन्ती ने यह रहस्य बताया कि वे भगवान् सूर्य के अंश से उत्पन्न हुए थे। पूर्वकाल की बात है जब कुन्ती के गर्भ से सर्वगुण संपन्न कर्ण का प्रादुर्भाव हुआ, उस समय माता ने इन्हें पेंटी में रखकर गंगा की धारा में बहा दिया था। जिन्हें सारा संसार राधा का पुत्र समझता था, वे कुन्ती के ज्येष्ठ पुत्र और हमलोगों के सहोदर भाई थे। मैंने अनजान में राज्य के लोभ से अपने भाइयों को मरवा डाला_यह स्मरण करके मेरे बदन में आग_सी लग जाती है। हम पांचों में से कोई भी उन्हें अपने भाइ के रूप में नहीं जानता था, किन्तु वे हमलोगों को जानते थे। सुना है मेरी माता कुन्ती हमलोगों से सन्धि कराने के लिये उनके पास गयी थीं; इन्होंने बताया 'बेटा ! तुम राधा के नहीं, मेरे पुत्र हो।' किन्तु कर्ण ने इनकी अभिलाषा नहीं पूरी की_वे सन्धि के लिये नहीं सहमत हुए। उन्होंने यही उत्तर दिया_'मां ! मैं राजा दुर्योधन को छोड़ने में असमर्थ हूं। यदि तुम्हारी बात मानकर युधिष्ठिर से सन्धि कर लेता हूं तो नीच, नृशंस और कृतध्न समझा जाऊंगा। लोग यही कहेंगे कि कर्ण अर्जुन से डर गया। इसलिये समर में श्रीकृष्ण सहित अर्जुन को जीत लेने के पश्चात् मैं युधिष्ठिर से सन्धि करूंगा।' यह सुनकर कुन्ती ने कहा, 'अच्छी बात है;तुम अर्जुन से युद्ध करो, किन्तु शेष चार भाइयों को अभयदान दे दो।' इतना कहकर माता कांपने लगीं, इनकी यह अवस्था देख बुद्धिमान कर्ण ने कहा_'देवि ! तुम्हारे चार पुत्र मेरे चंगुल में फंसे जायेंगे, तो भी उन्हें जान से नहीं मारूंगा। यदि मैं मारा गया तो अर्जुन रहेंगे, अर्जुन मरे तो मैं रहूंगा; इस प्रकार तो तुम्हारे पांच पुत्र तो हर हालत में जीवित रहेंगे।' कुन्ती बोलीं _'बेटा ! अपने भाइयों का कल्याण करना।' फिर ये घर चली आयीं। इस रहस्य को न तो कुन्ती ने प्रकट किया, न कर्ण ने; इसलिये भाई के हाथ से सहोदर भाई का वध हुआ _अर्जुन ने वीरवर कर्ण को मार डाला। इससे मेरे हृदय को बड़ी व्यथा हो रही है। कर्ण और अर्जुन की सहायता पाकर तो मैं इन्द्र को भी जीत सकता था। धृतराष्ट्र के दुरात्मा पुत्र जब सभा में द्रौपदी को क्लेश दे रहे थे और कर्ण की कठोर बातें सुनायी देतीं थीं, उस समय मुझे सहसा रोष चढ़ आता था, किंतु कर्ण के चरणों पर दृष्टि जाते ही शान्त हो जाता था। मुझे कर्ण के दोनों पैर माता कुन्ती के चरणों जैसे ही मालूम होते थे। किन्तु बहुत सोचने पर भी मैं इसका कारण नहीं जान पाता था। भगवन् ! कर्ण के पहिये को पृथ्वी क्यों निगल गयी मेरे भाई को ऐसा श्राप क्यों प्राप्त हुआ ? यह मुझे बताइये। मैं आपसे ये सभी बातें ठीक_ठीक सुनना चाहता हूं, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं, भूत_भविष्य की सारी बातें जानते हैं। वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! युधिष्ठिर के इस प्रकार पूछने पर नारद मुनि कर्ण को जिस तरह शाप प्राप्त हुआ था, वह सारी कथा कहने लगे_'भारत ! यह देवताओं की गुप्त बात है, किन्तु मैं तुम्हें बता रहा हूं। एक समय सब देवताओं ने विचार किया कि कौन सा ऐसा उपाय हो, जिससे भूमण्डल का सारा क्षत्रिय_समाज शस्त्रों के आघात से पवित्र होकर स्वर्ग सिधारे। यह सोचकर उन्होंने सूर्य द्वारा कुमारी कुन्ती के गर्भ से एक तेजस्वी बालक उत्पन्न कराया। वहीं कर्ण हुआ। उसने आचार्य द्रोण से धनुर्वेद का अभ्यास किया। वह बचपन से ही भीमसेन का बल, अर्जुन की अस्त्र चलाने में फुर्ती, आपकी बुद्धि, नकुल_सहदेव की विनय तथा श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन की मित्रता देखकर जला करता था आपके ऊपर प्रजा का अनुराग जानकर वह चिन्ता से दग्ध होता रहता था। इसलिये उसने बाल्यकाल में ही राजा दुर्योधन से मित्रता कर ली।' 'धनंजय का धनुर्विद्या में अधिक पराक्रम देखकर एक दिन कर्ण ने द्रोणाचार्य से एकांत में कहा_'गुरुदेव ! मैं ब्रह्मास्त्र को छोड़ने और लौटाने की विद्या जानता हूं।' कर्ण की अर्जुन के साथ जजों लाग_डांट थी, उसे द्रोणाचार्य जानते थे; उसकी दुष्टता से भी वे अपरिचित नहीं थे। इसीलिए उसकी प्रार्थना सुनकर उन्होंने कहा_'कर्ण ! शास्त्रोक्त विधि के अनुसार ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय ही ब्रह्मास्त्र सीखने का अधिकारी है, दूसरा नहीं।' उनके ऐसा कहने पर कर्ण ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनका सम्मान किया। फिर उनकी आज्ञा लेकर वह सहसा वहां से चल दिया। जाते_जाते महेंन्द्र पर्वत पर पहुंचा और परशुरामजी के निकट जा भृगुवंशी ब्राह्मण के रूप में अपना परिचय दे उसने गुरु बुद्धि से उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया और शिष्यभाव से उनकी शरण में गया। परशुरामजी ने भी गोत्र आदि पूछकर उसे शिष्य के रूप में स्वीकार किया और कहा 'वत्स ! तुम्हारा स्वागत है, तुम प्रसन्नतापूर्वक यहां रहो।' "कर्ण महेंन्द्र पर्वत पर रहकर अभ्यास करने लगा। उस समय वहां उसे गन्धर्व, राक्षस, यक्ष तथा देवताओं से मिलने का अवसर प्राप्त होते रहता था। इसलिये उन सके साथ उसका बड़ा प्रेम हो गया। एक दिन की बात है, वह आश्रम के पास ही समुद्र के किनारे _किनारे टहल रहा था। अकेला था तथा हाथों में तलवार तथा धनुष लिये हुए था। उसी समय एक वेदपाठी की गौ उधर आ निकली। मुनि अग्निहोत्र में लगे हुए थे। कर्ण ने अनजान में उसे कोई हिंसक जीव समझकर मार डाला। जब मालूम हुआ तो उसने अपने अज्ञानवश किये हुए अपराध को ब्राह्मण को जाकर कह सुनाया। ब्राह्मण देवता को प्रसन्न करने के लिये कर्ण बोला_'भगवन् ! मैंने नजआन में आपकी यह गाय मार डाली है; इसलिये आप मुझपर कृपा करके यह अपराध क्षमा कर दीजिये।' "ब्राह्मण बिगड़ उठा और उसको डांटता हुआ बोला_'दुराचारी ! तू मार डालने योग्य है; ले, इस पाप का फल भोग ! अन्त समय में पृथ्वी तेरे रथ के पहिये को निगल जायगी; उस समय तू घबराया होगा उसी अवस्था में, शत्रु तेरा मस्तक काट डालेगा।' यह शाप सुनकर कर्ण ने बहुत _सी गौएं, धन तथा रत्न दे ब्राह्मण को प्रसन्न करने की चेष्टा की। तब उसने फिर कहा_'सारा संसार मिलकर भी मेरी बात झूठी नहीं कर सकता।' उसके ऐसा कहने पर कर्ण को बड़ा भय हुआ। दीनता से उसका मुंह नीचे की ओर झुक गया। फिर मन_ही_मन इस दुर्घटना को याद करता हुआ वह परशुरामजी के पास लौट आया। "कर्ण की भुजाओं का बल, गुरु के प्रति उसका प्रेम, इन्द्रियसंयम तथा सेवाभाव को देखकर परशुरामजी उसपर बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने प्रयोग और उपसंहार सहित संपूर्ण ब्रह्मास्त्र विद्या उसे विधिपूर्वक सिखा दी। तदनन्तर एक दिन परशुरामजी कर्ण के साथ अपने आश्रम के पास ही घूम रहे थे। उपवास करने के कारण उनका शरीर दुर्बल हो गया था, अतः थकावट आ जाने से उन्हें नींद सताने लगी। कर्ण के ऊपर उनका पूर्ण विश्वास और स्नेह था, इसीलिये उसकी गोद में सिर रखकर सो गये। इतने में लार, मज्छआ, मांस और रक्त का आहार करनेवाला एक भयंकर कीड़ा, जो बड़ा तीखा डंक मारता था, कर्ण के पास आया और उसकी जांघ पर चढ़ गया। जांघ में घाव करके वह उसका रक्तपान करने लगा। इस प्रकार कीड़े के काटने से उसे व्यथा होती रही; किन्तु उसने धैर्यपूर्वक उसे सहन किया और गुरु के जाग उठने के डर से कीड़े को नहीं हटाया, बल्कि उसकी ओर से उपेक्षा कर दी। "कर्ण के देह से निकले हुए रक्त की धारा से जब परशुरामजी का शरीर भींगने लगा तो वे सहसा जाग उठे और शंकित होकर बोले_'अरे ! तू तो अशुद्ध हो गया ! यह क्या कर रहा है ? भय छोड़कर ठीक _ठीक बता।' तब कर्ण ने उन्हें कीड़े के काटने की बात बता दी। ज्योंहि उन्होंने उस कीट की ओर दृष्टिपात किया, उसके प्राण _पखेरू उड़ गये; यह एक अद्भुत घटना हुई। इतने में एक भयंकर राक्षस आकाश में खड़ा दिखाई दिया। वह दोनों हाथ जोड़कर परशुरामजी से बोला_'मुनिवर ! आपने मुझे इस नरक के कष्ट से छुटकारा दिला दिया, यह मेरा बड़ा प्रिय कार्य हुआ । मैं आपको प्रणाम करता हूं और अब जहां से आया था वहीं जा रहा हूं।' परशुरामजी ने पूछा 'अरे ! तू कौन है और कैसे इस नरक में पड़ा था ?' उसने उत्तर दिया _'तात !  सतयुग की बात है, मैं दंश नामक असुर था। एक दिन मैंने भऋगउमउनइ की प्राण प्यारे पत्नी का बलपूर्वक अपहरण किया; इस क्रोध में आकर महर्षि ने यह शाप दिया _'पापी ! तू कीड़ा होकर नरक में पड़ेगा।' तब मैंने उनसे प्रार्थना की 'ब्रह्मण् ! इस शाप का अन्त भी होना चाहिएये।' उन्होंने कहा 'मेरे वंश में उत्पन्न हुए परशुराम की दृष्टि पड़ने से इस शाप का अन्त होगा।' इस प्रकार मैं इस दुर्दशा को प्राप्त हुआ था और आज आपका समागम होने से मेरा इस पाप योनि से उद्धार हुआ है।' यह कहकर वह महान् असुर परशुरामजी को प्रणाम करके चला गया। "अब परशुरामजी ने क्रोध में भरकर कर्ण से कहा_'मूर्ख ! तूने इस कीड़े के काटने की जो भयंकर पीड़ा बर्दाश्त की है, इसे ब्राह्मण कभी नहीं सह सकता। तेरा धैर्य तो क्षत्रिय के समान जान पड़ता है। सच_सच बता, तू कौन है ?' उनका प्रश्न सुनकर कर्ण शाप के भय से उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा करता हुआ बोला_'ब्रह्मण् !मैं ब्राह्मण और क्षत्रिय से भिन्न सूत जाति में उत्पन्न हुआ हूं। लोग मुझे राधा का पुत्र कर्ण कहते हैं। ब्रह्मास्त्र के लोभ से मैंने झूठा परिचय दिया था, मुझपर कृपा कीजिये। विद्या प्रदान करनेवाला गुरु नि:संदेह पिता के समान ही है, इसीलिये आपके निकट अपना भार्गव_गोत्र बतलाया था।' "यह कहकर कर्ण दीनभाव से हाथ जोड़कर उनके सामने पृथ्वी पर पड़ गया और थर_थर कांपने लगा। यह देख परशुरामजी ने हंसते हुए_से कहा_'मूर्ख ! तूने ब्रह्मास्त्र के लोभ से झूठ बोलकर मेरे साथ कपट किया है, इसलिये जब संग्राम में तू अपने समान योद्धा से युद्ध करेगा तो तेरी मृत्यु निकट आ जायगी, उस समय तुझे मेरे दिये हुए ब्रह्मास्त्र का स्मरण नहीं रहेगा। अब तू यहां से चला जा, मिथ्यावादी के लिये यहां स्थान नहीं है। परन्तु मेरे आशीर्वाद से युद्ध में कोई भी क्षत्रिय तरी समानता नहीं कर सकेगा।' परशुरामजी के ऐसा कहने पर कर्ण उन्हें प्रणाम करके वहां से लौट आया और दुर्योधन से बोला_मैं ब्रह्मास्त्र सीख आया।"





Monday, 24 March 2025

सब स्त्रियों का अपने सम्बन्धियों जलांजलि देना तथा कुन्ती के मुख से कर्ण के जन्म का रहस्य खुलने पर भाइयों के सहित राजा युधिष्ठिर का शोकाकुल होना

सब स्त्रियों का अपने सम्बन्धियों जलांजलि देना तथा कुन्ती के मुख से कर्ण के जन्म का रहस्य खुलने पर भाइयों के सहित राजा युधिष्ठिर का शोकाकुल होना


वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! सबलोग साधुजन सेवित पुण्यतोया भागीरथी नदी के तट पर पहुंचे। वहां उन्होंने अपने आभूषण और दुपट्टे उतार दिये। फिर कुरुकुल की स्त्रियों ने अत्यंत दु:खित होकर रोते_रोते अपने पुत्र और पतियों को जलांजलि दी तथा धर्मविधि को जाननेवाले पुरुषों ने भी अपने सुहृदों को जलदान किया। जिस समय वे वीर पत्नियां जलदान कर रही थीं, शोकाकुला कुन्ती नू रोते_रोते धीमे स्वर में कहा, 'पुत्रों ! जिसे अर्जुन ने संग्राम में परास्त किया है, जो वीरों के सभी लक्षणों से सम्पन्न था, जिसे तुम राधा की कोख से उत्पन्न हुआ सूतपुत्र मानते हो, जिसने दुर्योधन की सारी सेना का नियंत्रण किया था, पराक्रम में जिसके समान प‌थ्वी में कोई भी राजा नहीं था और जो दिव्य कवच एवं कुण्डल धारण किये था, वह सूर्य के समान तेजस्वी कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था। भगवान् सूर्य के द्वारा मेरे उदर से उत्पन्न हुआ था। उसके लिये तुम जलांजलि दो।' माता के ये अप्रिय वचन सुनकर सभी पाण्डव कर्ण के लिये शोकाकुल होकर बड़े उदास हो गये। फिर राजा युधिष्ठिर ने लम्बी _लम्बी सांसें लेते हुए राजा से पूछा, 'माताजी ! कर्ण तो साक्षात् समुद्र के समान गम्भीर थे, उनकी वाणवर्षा के सामने अर्जुन के समान और कोई वीर टिक नहीं सकता था, उन्होंने किस प्रकार देवपुत्र होकर आपके गर्भ से जन्म लिया था ! वैसे कोई आग को कपड़े से ढ़ांप ले, उसी प्रकार आपने इस बात को अबतक कैसे छिपा रखा था ? हम जैसे अर्जुन के बाहुबल का भरोसा रखते, उसी प्रकार कौरवों को तो उन्हीं के बल का भरोसा था। ओह ! इस रहस्य को छिपाकर तो आपने हमारा सत्यनाश ही कर दिया। आज कर्ण की मृत्यु से हम सब भाइयों को बड़ा दु:ख हो रहा है।  अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्र, पांचालवीर और कौरवों के मारे जाने से मुझे जितना दु:ख है, उससे सऔगउनआ कर्ण की मृत्यु से हो रहा है। अब तो मुझे कर्ण किसी शोक है, उससे मैं ऐसे जल रहा हूं, मानो किसी ने आग लगा दी हो। यदि हमें यह बात मालूम होती तो हमारे लिये पृथ्वी की तो क्या, स्वर्ग की भी कोई वस्तु अप्राप्य नहीं रहती। फिर तो यह कुरुकुल को उच्छेद करनेवाला भीषण संग्राम भी न होता।'
इस प्रकार तरह_तरह से अत्यंत विलाप करके धर्मराज युधिष्ठिर ने रोते _रोते कर्ण को जलांजलि दी। उस समय वहां सहसा सभी स्त्रियां रो पड़ीं। इसके बाद कुरुराज युधिष्ठिर ने भ्रातृप्रेमवश कर्ण की सब स्त्रियों को वहां बुलवाया और उनको साथ लेकर शास्त्रविधि से कर्ण का प्रेतकर्म किया। फिर वे कहने लगे, 'मैं बड़ा पापी हूं, मैंने न जानने के कारण ही अपने बड़े भाई का वध करा दिया। अतः उनकी पत्नियों के हृदय मेरे प्रति कोई छिपा हुआ द्वेष हो तो वह दूर हो जाना चाहिये।' ऐसा कहकर वे विकल चित्त से गंगाजी से बाहर निकले और अपने सब भाइयों के सहित तट पर आये।

स्त्री पर्व समाप्त



Wednesday, 19 March 2025

राजा धृतराष्ट्र और युधिष्ठिर की बातचीत तथा मरे हुए योद्धाओं का दाहकर्म

श्रीकृष्ण कहने लगे_गान्धारी ! उठो, उठो, मन में शोक मत करो। इन कौरवों का संहार तो तुम्हारे ही अपराध से हुआ है। तुम अपने दुष्ट पुत्र को भी बड़ा साधु समझती थी। जो बड़ा ही निष्ठुर, व।अर्थ और वैर बांधनेवाला और बड़े _बूढ़ों की आज्ञा का भी उल्लंघन करनेवाला था, उसी दुर्योधन को तुमने सिर पर चढ़ाकर रखा था। फिर अपने किये हुए अपराध को तुम मेरे माथे क्यों मढ़ती हो? वैशम्पायनजी कहते हैं_श्रीकृष्ण के ये अप्रिय वचन सुनकर गांधारी चुप रह गयी। फिर धर्म को जाननेवाले राजर्षि धृतराष्ट्र ने अपने अज्ञान जनित मोह को दबाकर धर्मराज युधिष्ठिर से पूछा, 'युधिष्ठिर ! इस युद्ध में जो सेना मारी गयी है, उसके परिमाण का तुम्हें पता हो तोहमें बताओ। युधिष्ठिर ने कहा_महाराज ! इस युद्ध में एक अरब छाछठ करोड़, बीस हजार वीर मारे गये हैं। इनके सिवा चौदह हजार योद्धा अज्ञात हैं और दस हजार एक सौ पैंसठ वीरों का पता नहीं है। धृतराष्ट्र ने पूछा_महाबाहो ! मैं तुम्हें सर्वज्ञ मानता हूं, इसलिये यह तो बताओ, उन सबकी क्या गति हुई है ? युधिष्ठिर बोले_ महाराज !  जिन सच्चे वीरों ने इस युद्ध अग्नि में अपने शरीरों को हर्षपूर्वक होता है, वे तो इनके समान ही पुण्य लोक को प्राप्त हुए हैं; जो यह सोचकर कि 'एक दिन मरना तो है ही, इसलिये लड़कर ही मर जाओ' हर्षहीन हृदय से लड़ते-लड़ते मारे गये हैं, वे गन्धर्वों के साथ जा मिले हैं और जो संग्रामभूमि में रहते हुए भी प्राणों की भिक्षा मांगते या युद्ध से भागते हुए शस्त्रों द्वारा मारे गये हैं, वे यक्षों के लोक में गये हैं। किन्तु जिन महापुरुषों को शत्रुओं ने गिरा दिया था, जिनके पास युद्ध करने का कोई साधन भी नहीं रहा था, जो शस्त्रहीन हो गये थे और बहुत लज्जित होकर भी जिन्होंने शत्रुओं के सामने पीठ नहीं दिखायी_इस प्रकार क्षात्रधर्म का पालन करते हुए जो तीखे शस्त्रों से छिन्न-भिन्न हो गये थे, वे तो ब्रह्मलोक को ही गये हैं _इस विषय में मुझे तनिक भी संदेह नहीं है। इसके सिवा जो लोग किसी भी प्रकार इस युद्धभूमि के भीतर मार दिये गये हैं, वे उत्तर कुरु देश में जन्म लेंगे। धृतराष्ट्र ने पूछा_बेटा ! तुम्हें ऐसा कौन सा ज्ञानबल प्राप्त है, जिससे इन बातों को तुम सिद्धों के समान देख रहे हो ? यदि मेरे सुनने योग्य हो तो मुझे बताओ।
युधिष्ठिर बोले_पिछले दिनों में आपकी आज्ञा से वन में विचरते समय जब मैं तीर्थयात्रा कर रहा था, उस समय मुझे देवर्षि लौमशजी के दर्शन हुए थे। उन्हीं से मुझे यह अनुस्मृति प्राप्त हुई थी और उससे भी पहले ज्ञानयोग के प्रभाव से मुझे दिव्यदृष्टि प्राप्त हो गयी थी। धृतराष्ट्र ने कहा_युधिष्ठिर ! यहां जो अनेकों अनाथ और सनाथ योद्धा मरे पड़े हैं, क्या उनके शरीरों को तुम विधिवत् दाह करा दोगे ? इनमें अनेकों ऐसे होंगे जो न तो अग्निहोत्री रहे होंगे और न उनका संस्कार करनेवाला ही कोई होगा। भैया ! यहां तो बहुतों के अन्त्येष्टि कर्म करने हैं, हम किस_किसका करें ? राजा धृतराष्ट्र के ऐसा कहने पर कुन्तिनन्दन युधिष्ठिर ने कौरवों के पुरोहित सुधर्मा और अपने पुरोहित धौम्य को तथा संजय, विदुर, युयुत्सु इन्द्र सेन आदि सेवक और सब सारथियों को आज्ञा दी कि 'आपलोग विधिपूर्वक इन सभी के प्रेतकर्म कराइये, जिससे कोई भी शरीर अनाथ की तरह नष्ट न हो।' धर्मराज की आज्ञा पाते ही सबलोग चन्दन, अगर, काष्ठ, घी, तेल सुगन्धित द्रव्य और रेशमी वस्त्र आदि सब सामान जुटाने में लगे गये। उन्होंने टूटे_फूटे रथ और तरह_तरह के शस्त्रोंके ढ़ेर लगा दिये। फिर बड़ी तत्परता से चिताएं तैयार कर उनपर मुख्य_मुख्य राजाओं के शव रखकर शास्त्रोक्त विधि से उनका दाहकर्म कराया। राजा दुर्योधन, उसके निन्यानवे भाई, राजा शल्य, शल, भूरिश्रवा, जयद्रथ, अभिमन्यु, दु:शासन के पुत्र, लक्ष्मण, धृष्टकेतू, बऋहन्त, सोमदत्त, सैकड़ों सृंजयवीर, राजा क्षेमधन्वा, विराट, द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र, शकुनि, अचल, वृषक, भगदत्त, कर्ण, कर्ण के पुत्र, केकयराज, त्रिगर्तराज, घतोत्कच, अलंबउष और जरासंध_इन सबका तथा और भी हजारों राजाओं का उन्होंने धृत की धाराओं में प्रज्जवलित हुई अग्नि में दाह कराया किन्हीं_किन्हीं के लिये श्राद्धकर्म भी कराये गये, किन्हीं के लिये सामान कराया गया और किन्हीं के लिये उनके सम्बन्धियों को बहुत शोक भी हुआ। उस रात्रि में सामगान की ध्वनि और स्त्रियों के रुदन से सभी जीवों को बड़ा कष्ट हुआ। इसके बाद वहां अनेकों देशों से आये हुए जो अनाथ लोग मारे गये थे, उन सबकी हजारों ढेरियां कराकर उन्हें धीमी भीगी हुई लकड़ियों से जलवा दिया। इस प्रकार सब राजाओं का दाहकर्म करके कुराज युधिष्ठिर महाराज धृतराष्ट्र को लेकर गंगाजी की ओर चले।

Thursday, 6 March 2025

गान्धारी का अन्य मरे हुए वीरों को देखकर विलाप करना और श्रीकृष्ण को शाप देना

गान्धारी ने फिर कहा_श्रीकृष्ण ! देखो, वह अनेकों महारथियों को धराशायी करके खून में लथपथ हुआ कर्ण रणांगन में पड़ा हुआ है। वह बड़ा ही असहनशील, महान् क्रोधी , प्रचंड धनुर्धर और बड़ा बली था। किन्तु आज अर्जुन के हाथ से मारा जाकर वह पृथ्वी पर सोया हुआ है।
मेरे महारथी पुत्र भी पाण्डवों के भय से इसे ही आगे करके युद्ध करते थे। धर्मराज युधिष्ठिर इससे सदा ही घबराये रहते थे, इसकी ओर से चिंतित रहने के कारण तेरह वर्ष तक उन्हें सुख से नींद नहीं आयी। यह प्रलयकालीन अग्नि के समान तेजस्वी और हिमाचल के समान निश्छल था और यही दुर्योधन का प्रधान अवलम्ब था।
किन्तु देखो, आज यह वायु द्वारा उखाड़े हुए वृक्ष के समान पृथ्वी पर पड़ा है। इसकी पत्नी वृषसेन की माता प।द्वीप पर पड़ी है और तरह_तरह से विलाप करती बड़ा ही करुणक्रन्दन कर रही है। हाय ! बड़े खेद की बात है। महाबाहु कर्ण को रणभूमि में अचेत पड़ा देखकर सुषेण की माता अत्यन्त आतुर होकर मूर्छित हो गयी है। देखो, कुछ होश होने पर उठकर वह पृथ्वी पर गिर गयी है और पुत्र के वध से अत्यन्त आतुर होकर बड़ा ही विलाप कर रही है। इधर देखो, यह भीमसेन का मारा हुआ अवन्तइनरएश पड़ा है। उसकी रानियां भी चारों ओर से घेरकर उसकी सार_संभाल में लगी हुई हैं। श्रीकृष्ण ! महाराज प्रतीप के पुत्र बाह्लीक बड़े साहसी और धनुर्धर थे। वे भी भाले की चोट से मरकर रणभूमि में सोये हुए हैं। मर जाने पर भी इनके मुख की कान्ति फीकी नहीं पड़ी है। उधर, राजा जयद्रथ पड़ा हुआ है। इसे तो अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये ग्यारह अक्षौहिणी सेना को पार करके मारा था। इसकी अनुरागी नि पत्नियां चारों ओर से इसकी संभाल कर रही हैं।
जनार्दन ! जिस समय वह वन में द्रौपदी को हरकर ले गया था, पाण्डव लोग तो इसे तभी मार डालते; उस समय केवल दु:शला की ओर देखकर ही उन्होंने इसे छोड़ दिया था। हाय ! एक बार फिर उन्होंने दु:शला का मान क्यों नहीं रखा ? देखो, बताओ, मेरी बच्ची दु:खी होकर कैसा विलाप कर रही है। कृष्ण! बताओ मेरे लिये इससे बढ़कर दु:ख क्या होगा कि मेरी अल्पवयस्का पुत्री विधवा हो गयी और बहुओं के पति मारे गये। हाय ! तनिक मेरी दु:शला की ओर तो देखो। पति का सिर न मिलने के कारण वह शोक और भय से रहित_सी होकर उसे इधर_उधर ढ़ूंढ़ती फिर रही है। इधर ये नकुल के मामा राजा शल्य मरे पड़े हैं। इन्हें धर्म को जानने वाले स्वयं धर्मराज ने ही संग्राम में मारा था। इनकी तुम्हारे साथ सदा से स्पर्धा रहती थी। युद्धस्थल में कर्ण का सामर्थ्य करते समय वे पाण्डवों को विजय दिलाने के लिये उसका तेज क्षीण करते रहे थे। देखो, इन्हें चारों ओर से इनकी रानियों ने घेर रखा है। उधर वे पर्वतीय रजा भगदत्त हाथी का अंकुश लिये पृथ्वी पर मरे पड़े हैं। इनके साथ अर्जुन का बड़ा ही प्रचंड, रोमांचकारी और भीषण युद्ध हुआ था। एक बार तो इनके युद्धकौशल को देखकर अर्जुन भी दंग रह गया था, किन्तु अंत में ये उसी के हाथ से मारे गये। देखो, जिनके समान बल और पराक्रम में संसार भर में कोई नहीं था, वे ही भीषण कर्म करनेवाले भीष्मजी इधर शरशैय्या पर शयन कर रहे हैं। केशव ! इस प्रतापी नरसूर्य ने शत्रुओं को अपने शस्त्रों के ताप से झुलसा डाला था। हाय ! आज यह अस्त होना चाहता है। आज वीरोचित शरशैय्या पर पड़े हुए इन अखंड ब्रह्मचारी भीष्मजी के दर्शन तो करो। ये आजतक अपने व्रत से नहीं डिगे। भगवान् स्वामी कार्तिकेय जैसे सरकण्डों के समूह पर सुशोभित हुए और उसी प्रकार ये कर्णिक, नालिक और नाराच जाति के बाणों की सेज बिछाकर सोये हुए हैं। अर्जुन ने इनके सिर के नीचे तीन बाण मारकर इन्हें बिना ही रूई का तकिया दिया है। अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ये अखंड ब्रह्मचारी रहे, जिससे इन्हें बड़ी भारी कीर्ति मिली। युद्ध में इनकी बराबरी करनेवाला
कोई नहीं था। ये बड़े ही धर्मात्मा और सर्वज्ञ हैं तथा मनुष्य होने पर भी तत्वज्ञान के प्रभाव से देवताओं के समान प्राण धारण किये हुए हैं।
आज जब भीष्मजी भी बाणों के लक्ष्य बनकर रणक्षेत्र में पड़े हुए हैं तो मुझे यही निश्चय होता है कि वास्तव में न कोई युद्धकुशल है, न पराक्रमी है और न विद्वान हैं। विधाता जिसे जीवन में सफलता दे देता है, उसी को लोग श्रेष्ठ कहने लगते हैं। माधव ! जब ये देवतुल्य भीष्मजी स्वर्ग को सिधार जायेंगे तो कुरुकुल के लोग धर्म के विषय में अपना संदेह किससे पूछेंगे ? इधर देखो, ये कौरवों के माननीय आचार्य द्रोण पड़े हुए हैं। चार प्रकार के अस्त्रों का ज्ञान जैसा इन्द्र को है, वैसा या तो परशुरामजी को है या आचार्य द्रोण को था। जिनकी कृपा से अर्जुन ने अनेकों दुष्कर कार्य किये, वे ही द्रोण आज मरे पड़े हैं; इनकी शस्त्रविद्या भी इन्हें नहीं बचा सकी ! इनके जिन वन्दनईय चरणों का सैकड़ों शिष्य पूजन किया करते थे, देखो ! आज उन्हीं को गीदड़ खींच रहे हैं। इनके मरण की व्यथा से कृपा अचेत_सी हो गयी है और अत्यन्त दीन_सी होकर इनके पास बैठी है। देखो तो सही, उसके बाल बिखरे हुए हैं और वह मुख नीचा किये फूट_फूटकर रो रही है। इनके शिष्यों ने चिता में अग्नि स्थापित करके उसे सब ओर से प्रज्जवलित कर दिया है और उसपर आचार्य के शव को रखकर वे सामान करते हुए रो रहे हैं। देखो, अब वे कृपी को आगे रखकर चिंता की प्रदक्षिणा करके गंगाजी की ओर जा रहे हैं।माधव ! पास ही पड़े हुए इस भूरिश्रवा को तो देखो। इसकी पत्नियां मरे हुए अपने पति को घेरे खड़ी हैं और तरह_तरह से शोक कर रही हैं। शोक के वेग ने इन्हें बहुत ही कृश कर दिया है और ये आर्त स्वर से विलाप करती बार_बार पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर जाती हैं इनकी ऐसी दयनीय दशा देखकर चित्त में बड़ा ही दु:ख होता है। देखो, यह कह रही हैं_'सात्यकि का यह काम बड़ा ही अधर्म पूर्ण और अकीर्तिकर हुआ है।' एक स्त्री ने पति की भुजा को गोद में रख लिया है। वह दीनतापूर्वक विलाप करती हुई कह रही है_'यह वह हाथ है जिसने अनेकों शूरवीरों का संहार किया था, अपने मित्रों को अभयदान दिया था और सहस्त्रों गौएं दान की थीं। जिस समय दूसरे के साथ संग्राम करने में लगे होने से तुम असावधान थे, उस समय श्रीकृष्ण के समीप ही अर्जुन ने इसे काट डाला था।' इस प्रकार अर्जुन की निंदा करके वह सुन्दरी चुप हो गयी है। उसके साथ ही उसकी दूसरी सौतें भी शोक में डूबी हुई हैं। यह सहदेव का मारा हुआ गांधार राज महावली शकुनि है। आज यह भी लड़ाई के मैदान में सोया हुआ है। यह बड़ा ही मायावी था। इसे सैकड़ों _हजारो़ प्रकार के रूप बनाने आते थे। किन्तु आज पाण्डवों के प्रताप से इसकी सारी माया भस्म हो गयी है। इस कपटी ने ध्यूतसभा में अपनी माया के प्रभाव से ही युधिष्ठिर का सारा साम्राज्य जीत लिया था, किन्तु आज वह अपना जीवन भी हार बैठा ! कृष्ण ! देखो, यह दुर्धर्ष वीर कम्बोजकुमार पड़ा है। यह कम्बोजदेश के गलीचों पर सोने योग्य था, किन्तु आज मौत के मुख में पड़कर धूलि की शैय्या पर सो रहा है ! देखो, यह कलिंगराज पड़ा है। उसके पास ही मगधदेश का राजा जयत्सेन है। उसकी स्त्रियां उसे चारों ओर से घेरकर अत्यन्त विह्वल होकर रो रही हैं। इधर कोसलनरेश राजकुमार वऋहद्वल को भी उसकी स्त्रियों ने घेर रखा है और वे फूट_फूटकर रो रही हैं। देखो, वे धृष्टद्युम्न के वीर पुत्र पड़े हैं और उधर आचार्य ही के गिराये हुए पांचालराज द्रुपद सोये हुए हैं। ये बूढ़े पांचालराज की द:खाना स्त्रियां और बहुएं उनका अग्निसंस्कार कर बायीं ओर से प्रदक्षिणा करके जा रही हैं। देखो, इधर द्रोण के मारे हुए चेदिराज धृष्टकेतू को उसकी स्त्रियां ले जा रही हैं। वह बड़ा ही शूरवीर और महारथी था। हजारों शत्रुओं का संहार करने के बाद ही यह मारा गया है। इसकी सुन्दर भार्याएं इसे गोद में लेकर विलाप कर रही हैं । उधर द्रोण ही का बींधा हुआ इसका पुत्र पड़ा है। मेरे पुत्र दुर्योधन के लड़के वीरवर लक्ष्मण ने भी इसी तरह अपने पिता का अनुगमन किया है। देखो, ये अवन्तिराज विन्द और अनुविन्द मरे पड़े हैं। ये इस समय भी अपने हाथों में धनुष _बाण और खड्ग पकड़े हुए हैं। कृष्ण ! पांचों पाण्डव और तुम तो अवश्य हो। इसी से द्रोण, भीष्म, कर्ण, कृप, दुर्योधन, अश्वत्थामा, जयद्रथ, सोमदत्त, विकर।ण और कृतवर्मा _जैसे वीरों की मार से बच गये हों। माधव ! निश्चय ही विधाता के लिये कोई काम कर डालना विशेष कठिन नहीं है। देखो न, क्षत्रियों ने ही इन शूरवीर क्षत्रियों का बात_की_बात में संहार कर डाला। मेरे पुत्रों का नाश तो उसी दिन हो चुका था, जब तुम अपने संधि के प्रयत्न में असफल होने पर उपलव्य की ओर लौटे थे। महामति भीष्म और विदुरजी ने मुझे उसी समय कहा दिया था कि अब अपने पुत्रों की मोह_ममता छोड़ दो। उनकी वह दृष्टि मिथ्या कैसे हो सकती थी। आज इसी से इतनी जल्दी मेरे पुत्र भस्मीभूत हो गये। वैशम्पायनजी कहते हैं_जन्मेजय ! श्रीकृष्ण से इतना कहकर गांधारी शोक से अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। दु:ख की अधिकता से उसकी विचारशक्ति नष्ट हो गयी और उसका धैर्यशक्ति नष्ट हो गयी।और उसका धैर्य टूट गया। जब उसे चेत हुआ तो पुत्रशोक की प्रबलता से उसके अंग_अंग क्रोध से भर गये और श्रीकृष्ण पर दोषदृष्टि करके वह कहने लगी, 'कृष्ण ! पाण्डव और कौरव आपस की फूट के कारण ही नष्ट हुए हैं। किन्तु तुमने समर्थ होते हुए भी इनकी उपेक्षा क्यों कर दी । तुम्हारे पास अनेकों सेवक थे और बड़ी भारी सेना थी। तुम दोनों ही को दबा सकते थे और अपने वाक्कौशल से उन्हें समझा भी सकते थे।
किन्तु तुमने अपनी इच्छा से ही इस कौरवों के संहार की उपेक्षा कर दी थी। सो अब तुम उसका फल भोगो। मैंने पति की सेवा करके जो तप संचय किया है, उसी के प्रभाव से मैं तुम्हें शाप देती हूं_'तुमने कौरव और पाण्डव दोनों भाइयों के आपस में प्रहार करते समय उनकी उपेक्षा कर दी थी। इसलिये तुम भी अपने बन्धु _बांधवों का वध करोगे। आज से छत्तीसवें वर्ष तुम भी बन्धु_बान्धव, मंत्री और पुत्रों के नाश हो जाने पर  एक साधारण कारण से अनाथ की तरह मारे जाओगे। आज जैसे ये भरत_वंश की स्त्रियां विलाप कर रही हैं, उसी प्रकार तुम्हारे कुटुम्ब की स्त्रियां भी अपने बन्धु_बान्धवों के मारे जाने पर सिर पकड़कर रोवेगी।' गान्धारी के ये कठोर वचन सुनकर महामना श्रीकृष्ण ने कुछ मुस्कराते हुए कहा, ' मैं तो जानता था कि यह बात इसी प्रकार होनी है। 
तुमने जो कुछ होना था, उसी के लिये शाप दिया है। इसमें संदेह नहीं, वृष्णिवंशियों का नाश दैवी कोप से ही होगा। इसका नाश करने में भी मेरे सिवा और कोई समर्थ नहीं है। मनुष्य तो क्या, देवता या असुर भी इनका संहार नहीं कर सकते। इसलिये ये यदुवंशी आपस के कलह से ही नष्ट होंगे।'
श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर पाण्डवों को बड़ा भय हुआ। वे अत्यंत व्याकुल हो गये और उन्हें अपने जीवन की आशा भी नहीं रही।