वैशम्पायनजी बोले_राजन् ! व्यासजी का यह उपदेश सुनकर राजा युधिष्ठिर ने कुछ भी नहीं कहा। उन्हें चुप देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा, 'माधव ! धर्मराज युधिष्ठिर बन्धुओं के शोक से अत्यंत पीड़ित हैं; ये शोकसागर में डूबे जा रहे हैं। आप उन्हें ढ़ाढ़स बंधाइये।'अर्जुन के इस प्रकार कहने पर कमलनयन श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिर के पास जाकर बैठ गये। धर्मराज श्रीकृष्ण की बात टाल नहीं सकते थे; क्योंकि बचपन से ही श्रीकृष्ण के प्रति उनकी अर्जुन से भी बढ़कर प्रीति थी। तब श्री श्यामसुंदर ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें अपने वचनों से प्रसन्न करते हुए कहा_'राजन् ! अब आप शोक न करें। यह आपके शरीर को सुखायें देता है। जो लोग इस रणांगण में मारे गये हैं, उनका मिलना तो अब संभव है नहीं। जिस प्रकार जगने पर स्वप्न में प्राप्त होनेवाले सब लाभ व्यर्थ हो जाते हैं, उसी प्रकार इस महायुद्ध में जो क्षत्रिय मारे गये उन्हें तो तुम गए हुए ही समझो। उन सभी ने बड़े_बड़े वीरों के साथ लोहा लेकर अपने प्राण त्यागे हैं। शस्त्रों से मारे जाने के कारण वे सब स्वर्ग को ही गये हैं। आप उनके लिये शोक न करें। वे सभी बड़े शूरवीर, क्षात्रधर्म में तत्पर रहनेवाले और वेद_वेदांगों के पारदर्शी थे। उन्होंने वीरों के योग्य उत्तम गति पायी है; इसलिये आप किसी प्रकार की चिंता न करें। इस विषय में मैं आपको एक प्राचीन प्रसंग सुनाता हूं। एक बार राजा सृंजय पुत्रशोक में डूबे हुए थे। उस समय उनसे श्री नारदजी ने कहा_'सृंजय !
सुख_दु:ख से तो मैं, तुम और सारी प्रजा में से कोई भी छूटा हुआ नहीं है, इसलिये इसके लिये क्या शोक किया जाय। तुम अपने शोक को शान्त करो और मैं जो कहता हूं उसपर ध्यान दो।यह प्राचीन राजाओं का बड़ा मनोहर प्रसंग है। इसे सुनने से क्रूर ग्रहों का शमन होता है और आयु की वृद्धि होती है। राजन् ! हमलोग सुनते ही हैं कि राजा सुहोत्र मर गया।वह बड़ा ही अतिथि सेवी था। इन्द्र ने एक साल तक उसके राज्य में सुवर्ण की वर्षा की थी। उसके राज्यकाल में पृथ्वी का वसुमति नाम चरितार्थ हो गया था। नदियों में भी उस समय सुवर्ण ही बहता था। इन्द्र ने उनके कछुए, केकड़े, नाके, मगर और शिशुंकों को भी सोने का कर दिया था। राजा सुहोत्र ने उन सारे सुवर्ण को कउरउजआंगल देश में इकट्ठा कराया और एक भारी यज्ञ का आयोजन करके उसे ब्राह्मणों को दे दिया। सृंजय ! वह अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों में ही श्रेष्ठ था और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यवान था। किन्तु अन्त में वह मर भी गया; इसलिये तुम्हें अपने पुत्र का शोक नहीं करना चाहिये। 'सृंजय ! उशीनगर के पुत्र शिविर के मरने की बात भी हमने सुनी ही है। प्रजापति ब्रह्माजी भी राज्य का भार संभालने में उसके समान किसी दूसरे भूत या भावी राजा को नहीं समझते थे। तुम्हारे पुत्र तो न दक्षिणा देनेवाला और न यज्ञ करनेवाला। तुम्हारी तथा तुम्हारे पुत्र की अपेक्षा तो वह अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों बातों में बढ़ _चढ़कर था। किन्तु वह भी मर ही गया; इसलिये तुम अपने पुत्र के लिये शोक न करो। 'दुष्यन्त के पुत्र भरत ने हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ किये थे। वह भी तुमसे और तुम्हारे पुत्र से अर्थात् चारों बातों में बढ़ा_चढ़ा था। किन्तु वह भी काल के गाल में चला ही गया; इसलिये तुम अपने लड़कें के लिये शोक मत करो। 'सृंजय ! सुना जाता है कि दशरथनन्दन राम प्रजा को अपनी संतान के समान पालते थे। उनके राज्य में कोई भी स्त्री विधवा या अनाथा नहीं थी, मेघ समय पर वर्षा करते थे, समय पर अन्न पकता था और सर्वदा सुकाल रहता था। उस समय कोई जीव पानी में डूबकर नहीं मरता था, किसी को आग से कष्ट नहीं पहुंचता था और लोगों का भी कोई भय नहीं था। स्त्री और पुरुषों की सहस्त्रों वर्ष की आयु होती थी, विवाद तो स्त्रियों में भी नहीं होता था, पुरुषों की तो बात ही क्या ? प्रजा सर्वदा धर्म में तत्पर रहती थी और सब लोग संतुष्ट, पूर्णकाम, निर्भय, स्वेच्छाचार आचरण करनेवाले एवं सत्यवादी थे। जबतक उन्होंने राज्य किया, वृक्ष सर्वदा फल_फूलों से लदे रहे और गौएं दोहनी भरकर दूध देती रहीं। उन्होंने बड़ी_बड़ी दक्षिणाओंवाले दस अश्वमेध यज्ञ किये थे, जिनमें आने_जाने के लिये किसी को भी रोक_टोक नहीं थी। महाबाहु राम नित्यनवयौवनशाली, श्यामवर्ण, अरुणनयन, अजानुबाहु सुन्दर मुख वाले और सिंह के समान कंधों वाले थे। इसने राजा अंगार, मरीज, गय, अंग और ब्रहद्रथ को भी परास्त कर दिया था। सूर्यके उदय स्थान से लेकर अस्त होने के स्थान तक सारा देश राजा मान्धाता के अधिकार में ही था। हम सुनते हैं, राजा भगीरथ भी नहीं रहा। उसने यज्ञानुष्ठान करते समय सुवर्ण से लदी हुई दस लाख कन्याएं दक्षिणा में दान कर दी थी। उनमें में से प्रत्येक कन्याएं रथ में बैठी हुई थी, प्रत्येक रथ में चार_चार घोड़े थे और उसके पीछे सुवर्ण तथा कमल की मालाओं से विभूषित सौ_सौ हाथी थे, एक_एक घोड़े के पीछे हजार_हजार गौएं और प्रत्येक गौ के साथ एक_एक हजार भेड़ और बेकरियां थीं। तीनों लोकों में प्रवाहित होनेवाली गंगाजी उनकी पुत्री होकर प्रकट हुई थीं। इसी से वे भागीरथी कहलायीं। किन्तु देखो, वे भी मर ही गये। इसलिये अपने पुत्र के लिये तुम शोक मत करो। 'सृंजय ! सुना जाता है कि, राजा दिलीप भी जीवित नहीं रहे। उसके महान् कर्मों का तो ब्राह्मण लोग अबतक बखान करते हैं। उन्होंने जब यज्ञानुष्ठान किया था तो इन्द्र आदि देवताओं ने प्रत्यक्ष होकर उसमें भाग लिया था। उनके यज्ञपात्र और यूप भी सोने के थे तथा उनके यज्ञोत्सव छ: हजार देवता और गंधर्वों ने सातों स्वरों के अनुसार नृत्य किया था। जिन लोगों ने उन सत्यवादी महात्मा दिलीप का दर्शन किया था वे भी स्वर्ग के अधिकारी हो गये थे। उनके ताजमहलों में वएदधवनइ, धनुष की प्रत्यंचा की टंकार और याचकों का कोलाहल_ये तीन शब्द कभी बन्द नहीं होते थे। किन्तु मृत्यु ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र के लिये शोक मत करो। 'युवनाश्व के पुत्र राजा मान्धाता भी मर ही गये। उनके पिता ने भूल से यज्ञ का अभिमन्त्रित जल पी लिया था। इसी से उन्होंने पिता के उदर से ही जन्म लिया। वे बड़े ही वैभवशाली और त्रिलोक विजयी थे। उनका रूप साक्षात् देवताओं के समान था। उन्हें राजा युवनाश्व की गोद में लेटा देखकर देवताओं में आपस में चर्चा होने लगी कि यह बालक किसका स्तनपान करेगा ? तब इन्द्र ने कहा 'मां धाता' ( मेरा दूध पायेगा )। ऐसा कहकर उन्होंने उसका नाम मान्धाता रख दिया। इसी समय इन्द्र के साथ से दूध की धारा निकलने लगी और उन्होंने उसे उस बालक के मुंह में छोड़ा। उसे पीने से वह एक ही दिन में सौ पर बढ़ गया और बारह दिन में ही बारह वर्ष का_सा जान पड़ने लगा। यह बालक बड़ा ही धर्मात्मा, शूरवीर और युद्ध में इन्द्र के समान पराक्रमी हुआ । इसने राजा अंगार, मरीज, गया, अंग और ब्रहद्रथ को भी परास्त कर दिया था। सूर्य के उदय स्थान से लेकर अस्त होने के स्थान से लेकर अस्त होने के स्थान से लेकर सारा देश राजा मान्धाता के अधिकार में ही था। उन्होंने सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ किये थे तथा दस योजना लम्बे और एक योजन ऊंचे सोने के मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को दान दिये थे। किन्तु आज उन परम तथापि मान्धाता का भी कहीं नाम निशान नहीं है। फिर तुम अपने पुत्र के लिये क्यों शोक करते हो ?'सृंजय ! नाभाग के पुत्र राजा अम्बरीष अब नहीं रहे हैं_यह बात भी सुनी ही जाती है। उन्होंने बड़ा भारी यज्ञ करके ब्राह्मणों का ऐसा सत्कार किया था कि वे उनकी सराहना करते हुए यही कहते थे कि 'ऐसा यज्ञ न तो पहले किसी ने किया है और न भविष्य मेही कोई करेगा ।' उस यज्ञ में जिन लाखों राजाओं ने सेवा कार्य किया था, वे सभी अश्वमेध यज्ञ का फल भोगने के लिये उत्तरायण मार्ग से हिरण्यगर्भलोक में गये थे; किन्तु कराल काल ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र का शोक त्याग दो।
'सृंजय ! अमूर्त्तरया के पुत्र गया गया की मृत्यु के विषय में भी हम सुनते ही हैं। एक बार यज्ञ में अग्निदेव उससे प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा। तब गय ने कहा कि 'अग्निदेव ! आपकी कृपा से मेरे पास अक्षय धन है, धर्म में श्रद्धा रहे और सत्य में मन का अनुराग हो।' इस प्रकार अग्निदेव की कृपा से उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो गये। उन्होंने हजार वर्षों तक पूर्णिमा, अमावस्या और चातुर्मास्य में अनेकों बार अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया और हजार वर्षों तक ही नित्यप्रति प्रातःकाल उठकर एक_एक लाख गौएं और सौ_सौ खच्चर ब्राह्मणों को दान किये। किन्तु अन्त में काल ने उन्हें भी नहीं छोड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र का शोक त्याग दो। 'राजन् ! इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए राजा सगर अब इस संसार में नहीं हैं_यह हम सुनते ही हैं। इनके साठ हजार पुत्र थे, जो उनके पीछे_पीछे चलते थे। अपने बाहुबल से उन्होंने इस पृथ्वी पर एकछत्र राज्य स्थापित किया था और हजार अश्वमेध यज्ञ करके देवताओं को तृप्त किया था। उन यज्ञों में उन्होंने ब्राह्मणों को सोने के महल दान किये थे। उन्होंने समुद्र पर्यन्त सारी पृथ्वी खुदवा डाली थी तथा उनके नाम के अनुसार ही समुद्र का नाम 'सागर' पड़ा है। परन्तु अन्त में वे ही मर ही गये; इसलिये तुम अपने पुत्र के लिये शोक न करो। 'राजन् ! इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए राजा पृथु का देह भी आज नहीं है। महर्षियों ने महान् वन के बीच में इनका राज्याभिषेक किया था और यह सोचकर कि ये सब लोकों में धर्म की मर्यादा प्रतीत ( स्थापित ) करेंगे, उनका नाम 'पृथु' रखा था। उन्हें देखकर सभी प्रजा ने एक स्वर से कहा था कि हम इनसे प्रसन्न हैं। इस प्रकार प्रजा का रंजन करने के कारण ही वे 'राजा' कहलाये। जिस समय वे राज्य करते थे, पृथ्वी बिना जोते ही धान्य उत्पन्न करती थी, औषधियों के पुट_पुट में रस था और सभी गौएं दोहनी भरकर दूध देती थीं। मनुष्य निरोग, पूर्णकाम और निर्भय थे। वे इच्छानुसार खेतों या घरों में रहते थे। जिस समय राजा समुद्र के पास जाते थे उसका जल स्थिर हो जाता था और नदियां बहना बन्द कर देती थीं। मनुष्य निरोग पूर्णकाम और निर्भय थे। उन्होंने एक अश्वमेध महायज्ञ करके उसमें ब्राह्मणों को इक्कीस पर्वत दान किये थे। किन्तु अन्त में उन्हें भी काल का ग्रास बनना पड़ा, इसलिये तुम अपने पुत्र का शोक छोड़ दो।' इस प्रकार उपदेश देकर नारदजी ने पूछा 'राजन् ! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो ! क्या मेरी बातों पर तुमने कुछ भी ध्यान नहीं ? मैंने जो कुछ कहा है वह व्यर्थ ही नहीं है।'सृंजय ने कहा_महर्षै ! आपका उपदेश व्यर्थ नहीं हुआ है। आपका दर्शन करके मेरा सारा शोक दूर हो गया है। आपकी बातें सुनने की लालसा अभी शात नहीं हुईं हैं, अमृतपान के समान उसके लिये मेरी उत्कण्ठित बनी ही हुई है। फिर भी मेरी ऐसी इच्छा है कि एक बार आपकी कृपा से पुत्र के साथ मेरा समागम हो जाय। नारदजी बोले _राजन् ! महर्षि पर्वत ने तुम्हें सुवर्णकी नाम का पुत्र दिया था। वह तो अब नष्ट हो चुका। इसके स्थान पर मैं तुम्हें हजार वर्ष तक जीवित रहनेवाला हिरण्याक्ष नाम का दूसरा पुत्र देता हूं। श्रीकृष्ण की यह बात समाप्त होने पर नारदजी ने भी उनके कथन का अनुमोदन किया और राजा युधिष्ठिर को सुवर्णकी का सारा चरित्र सुनाकर कहा कि राजन् ! जब सृंजय ने अपने मृत पुत्र को जीवित करने के लिये बहुत आग्रह किया तो मैंने उसे संजीव कर दिया। इससे उसके माता-पिता को बहुत प्रसन्नता हुई।
कालांतर में पिता का स्वर्गवास होने पर सुवर्णकी ने ग्यारह सौ वर्ष तक पृथ्वी पर राज्य किया। इसके बाद वह स्वर्ग सिधारा। धर्मराज ! अब तुम भी अपने हृदय का संताप दूर कर दो एवं श्रीकृष्ण और व्यासजी के कथनानुसार अपने पैतृक राजसिंहासन पर बैठकर शासन का भार संभालो। यह सब करते हुए यदि तुम बड़े _बड़े यज्ञों का अनुष्ठान करोगे तो अपने अभीष्ट लोक प्राप्त कर लोगे।
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