Thursday, 11 February 2016

वनपर्व---प्रहस्त, धूम्राक्ष और कुम्भकरण का वध

प्रहस्त, धूम्राक्ष और कुम्भकरण का वध

तदनन्तर युद्ध में भयानक पराक्रम दिखानेवाले प्रहस्त ने सहसा विभीषण के पास आकर गर्जना करते हुए उन्हे गदा से मारा। विभीषण ने एक महाशक्ति हाथ में ली और उसे अभिमंत्रित कर प्रहस्त के मस्तक के मस्तक पर दे मारा। उस शक्ति का वेग वज्र के समान था; उसका आघात लगते ही प्रहस्त का मस्तक कटकर गिर पड़ा और वह आँधी से उखाड़े हुए वृक्ष के समान धराशायी हो गया। उसको मरते देख धुम्राक्ष नामक राक्षस बड़े वेग से वानरों की ओर दौड़ा और अपने वाणों के प्रहार से सबको इधर-उधर भगाने लगा। यह देख पवननन्दन हनुमान ने धुम्राक्ष को उसके घोड़े, रथ और सारथीसहित मार डाला। उसके मरने से वानरों को कुछ तसल्ली हुई और वे अन्यान्य राक्षसों को मारने लगे। उनकी भयंकर मार पड़ने से सभी राक्षस जीवन से निराश हो गये। जो मरने से बचे, वे भय के मारे भागकर लंका में घुस गये। वहाँ जाकर सबने रावण को युद्ध का समाचार सुनाया। उनके मुख से सेना सहित प्रहस्त और धुम्राक्ष के वध का वृतान्त सुनकर रावण बड़ी देर तक शोकभरा उच्छवास लेता रहा; फिर सिंहासन से उठकर कहने लगा---'अब कुम्भकर्ण के पराक्रम दिखाने का समय आ गया है।' ऐसा सोचकर उसने ऊँची आवाजवाले नाना प्रकार के बाजे बजवाये और विशेष प्रयत्न करके घोर निद्रा में पड़े हुए कुम्भकर्ण को जगाया। फिर जब वह कुछ स्वच्छ और शान्त हुआ तो उससे रावण ने कहा, 'भैया कुम्भकर्ण ! तुम्हे पता नहीं, हमलोगों पर बड़ा भारी भय आ पहुँचा है। मैं राम की स्त्री सीता को हर लाया था, उसी को वापस लेने के लिये वह समुद्र पर पुल बाँधकर यहाँ आया हुआ है; उसके साथ वानरों की बहुत बड़ी सेना है। अबतक उसने प्रहस्त आदि हमारे कई आत्मिय व्यक्तियों को मार डाला है और राक्षसों का संहार मचा रखा है। तुम्हारे सिवा कोई ऐसा वीर नहीं है, जो उसे मार सके। तुम बलवानों में श्रेष्ठ हो, इसलिये कवच आदि से सुसज्जित हो युद्ध के लिये जाओ और राम आदि संपूर्ण क्षत्रियों का नाश करो। 'रावण की आज्ञा मानकर कुम्भकर्ण जब अपने अनुचरों सहित नगर से बाहर निकला तो उसकी दृष्टि सामने ही खड़ी हुई वानर सेना पर खड़ी हुई वानर सेना पर पड़ी, जो विजय के उल्लास से शोभा पा रही थी। फिर उसने जब भगवान् राम के दर्शन की इच्छा से उस सेना में इधर-उधर दृष्टि डाली तो उसे हाथ में धनुष लिये लक्ष्मण भी दिखायी पड़े। इतने में ही वानरों ने आकर कुम्भकरण को सब ओर से घेर लिया और बड़े-बड़े पेड़ उखाड़कर उसको मारने लगे। कुछ वानर नाना प्रकार के भयानक अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करने लगे। कुम्भकर्ण इससे जरा भी विचलित नहीं हुआ, वह हँसते-हँसते वानरों का भक्षण करने लगा। देखते-देखते बल, चण्डबल और बज्रबाहु नामक वानर उसके मुख के ग्रास बन गये। कुम्भकर्ण का यह दुःखदायी कर्म देखकर तार आदि वानर थर्रा उठे और बड़े जोर-जोर से चित्कार करने लगे। उनका क्रंदन सुनकर सुग्रीव वहाँ दौड़े आये और एक शाल का वृक्ष उखाड़कर उन्होंने कुम्भकर्ण के सिर पर दे मारा। वह शाल टूट गया, पर कुम्भकर्ण को पीड़ा न पहुँची। हाँ, उसके स्पर्श से वह सावधान अवश्य हो गया। फिर तो उसने विकट गर्जना की और सुग्रीव को बलपूर्वक पकड़कर अपनी दोनो भुजाओं में दाब लिया। लक्ष्मणजी यह सब देख रहे थे। जब वह राक्षस सुग्रीव को लेकर जाने लगा तो वे दौड़कर उसके सामने आ गये। उन्होंने कुम्भकर्ण को लक्ष्य करके एक बड़ा वेगशाली वाण मारा, वह उसके कवच को काटकर शरीर को छेदता हुआ रक्तरंजित हो जमीन में समा गया। छाती छिद जाने के कारण सुग्रीव को तो उसने छोड़ दिया और और अपने दो हाथों में एक बहुत बड़ी चट्टान लिये लक्ष्मण पर धावा किया; किन्तु सुमित्रानन्दन ने हस्तलाघव दिखाते हुए फिर से वाण मारकर उन चारों भुजाओं को भी काट दिया। तब उसने अपना शरीर बहुत बड़ा कर लिया; उसके अनेकों पैर, अनेकों सिर और अनेकों भुजाएँ हो गयीं। यह देख लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र प्रहार करके उस पर्वताकार राक्षस को चीर डाला। जैसे बिजली गिरने से वृक्ष धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार दिव्यास्त्र से आहत होकर वह महाबली राक्षस पृथ्वी पर गिर पड़ा। कुम्भकर्ण को प्राणहीन हो गिरते देख राक्षसलोग भय के मारे भाग गये। इस युद्ध में राक्षसों का ही अधिक संहार हुआ।

Monday, 8 February 2016

वनपर्व---अंगद का रावण के पास जाकर राम का संदेश सुनाना और राक्षसों तथा वानरों का संग्राम

अंगद का रावण के पास जाकर राम का संदेश सुनाना और राक्षसों तथा वानरों का संग्राम
लंका के उस वन में अन्न और पानी का अधिक सुविधा था, फल और मूल प्रचुर मात्रा में प्राप्य थे; इसीलिये वहाँ सेना का पड़ाव पड़ा था और भगवान् राम सब ओर से उसकी रक्षा करते थे। इधर रावण भी लंका में शास्त्रोक्त प्रकार से युद्धसामग्री का संग्रह करने लगा। लंका की चहारदीवारी और नगरद्वार बहुत ही मजबूत थे; अतः स्वभाव से ही किसी आक्रमणकारी का वहाँ पहुँचना कठिन था। नगर के चारों ओर सात गहरी खाइयाँ थीं, जिसमें अगाध जल था और बहुत से मगर आदि जलजन्तु भरे रहते थे। इन खाइयों में खैर की कीलें गड़ी हुईं थीं, मजबूत किवाड़ लगे थे, गोलाबारी करनेवाली मशीनें फिट की गयीं थीं। इन सब कारणों से उनमें प्रवेश करना कठिन था। मूसल, बनैठी, पान, तोमर, तलवार, फरसे, मोम के मुद्गर और तोप आदि अस्त्र-शस्त्रों का भी विशेष संग्रह था। नगर के सभी दरवाों पर छिपकर बैठने के लिये बुर्ज बने हुए थे और घूम-फिरकर रक्षा करनेवाले रिसाले भी तैनात किये गये थे। इनमें अधिकांश पैदल और बहुत से हाथीसवार तथा घुड़सवार भी थे। इधर अंगदजी दूत बनकर लंका में गये। नगरद्वार पर पहुँचकर उन्होंने रावण के पास खबर भेजी और निडर होकर पुरी में प्रवेश किया।उस समय करोड़ों राक्षसों के बीच महाबली अंगद मेघमाला से घिरे हुए सूर्य की भाँति शोभा पा रहे थे। रावण के पास पहुँचकर उन्होंने कहा---"राक्षसराज ! कोसलदेश के राजा श्रीराचन्द्रजी ने तुमसे कहने के लिये जो संदेश भेजा है, उसे सुनो और उसके अनुसार कार्य करो। 'जो अपने मन को काबू में न रखकर अन्याय में लगा रहता है, ऐसे राजा को पाकर उसके अधीन रहनेवाले देश और नगर भी नष्ट हो जाते हैं।' सीता का लपूर्वक अपहरण करके अपराध तो अकेले तुमने किया है; परन्तु इसका दण्ड बेचारे निरपराध लोगों को भोगना पड़ेगा, तुम्हारे साथ वे भी मारे जायेंगे। तुमने बल और अहंकार से उन्मत्त होकर वनवासी ऋषियों की हत्या की, देवताओं का अपमान किया और राजर्षियों तथा रोती-बिलखती अबलाओं के भी प्राण लिये।इन सब अत्याचारों का फल अब प्राप्त होनेवाला है। मैं तुम्हें मंत्रियों सहित मार डालूँगा; साहस हो तो युद्ध करके पौरुष दिखाओ। निशाचर ! यद्यपि मैं मनुष्य हूँ, तो भी मेरे धनुष की शक्ति देखना। जनकनन्दिनी सीता को छोड़ दो, अन्यथा मेरे हाथ से कभी भी तुम्हारा छुटकारा होना असम्भव है। मैं अपने तीखे वाणों से इस भूमण्डल को राक्षसों से शून्य कर दूँगा।" श्रीराचन्द्रजी के दूत के मुख से ऐसी कठोर बात सुनकर रावण सहन न कर सका। वह क्रोध से अचेत हो गया। उसका इशारा पाकर चार राक्षस उठे और जिस प्रकार पक्षी सिंह को पकड़े, उसी तरह उन्होंने अंगद के चार अंगों को पकड़ लिया। अंगद उन चारों को लिये-दिये ही उछलकर महल की छत पर जा बैठे। उछलते समय उनके शरीर से छूटकर चारों राक्षस जमीन पर जा गिरे। उनकी छाती फट गयी और अधिक चोट लगने के कारण उन्हें बड़ी पीड़ा हुई। अंगद महल के कंगूरे पर चढ़ गये और वहाँ से कूदकर लंकापुरी को लाँघते हुए अपनी सेना के समीप आ पहुँचे। वहाँ श्रीरामचन्द्रजी से मिलकर उन्होंने सारी बातें बतायीं। राम ने अंगद की बड़ी प्रशंसा की, फिर वे विश्राम करने चले गये। तदनन्तर भगवान् राम ने वायु के समान वेगवाले वानरों की संपूर्ण सेना के द्वारा लंका पर एक साथ धावा बोल दिया और उसकी चहारदीवारी तुड़वा डाली। नगर के दक्षिण द्वार पर प्रवेश करना बड़ा कठिन था, किन्तु लक्ष्मण ने विभीषण और जाम्बवान् को आगे करके उसे भी धूल में मिला दिया। फिर युद्ध करने में कुशल वानर वीरों की सौ अरब सेना लेकर लंका के भीतर घुस गये। उस समय उनके साथ तीन करोड़ भालुओं की सेना भी थी। इधर रावण ने भी राक्षस वीरों को युद्ध का आदेश दिया। आज्ञा पाते ही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले भयंकर राक्षस लाख-लाख की टोली बनाकर आ पहुँचे और किलेबंदी करके अस्त्र-शस्त्रों की वाण-वर्षा द्वारा वानरों को भगाने और मान् पराक्रम का परिचय देने लगे।  इधर वानर भी खम्भों से मार-मारकर निशाचरों को गिराने लगे। दूसरी ओर भगवान् राम ने वाणों की वर्षा करके उनका संहार आरम्भ किया। एक ओर लक्ष्मण भी अपने सुदृढ़ वाणों से किले के भीतर रहनेवाले राक्षसों के प्राण लेने लगे। जब रावण को यह सब समाचार ज्ञात हुआ तो वह अमर्ष में भरकर पिशाचों और राक्षसों की भयावनी सेना साथ ले स्वयं भी युद्ध के लिये आ पहुँचा। वह दूसरे शुक्राचार्य के समान युद्धशास्त्र की कला में प्रवीण था। शुक्र की बतायी हुई रीति से उसने अपनी सेना का व्यूह रचाया और वानरों का संहार करने लगा। श्रीरामचन्द्रजी ने जब रावण को व्यूहाकार सेना के साथ लड़ने को उपस्थित देखा तो उन्होंने उसके मुकाबले में बृहस्पति की बतायी हुई रीति से अपनी सेना का व्यूह रचाया। फिर रावण के साथ भगवान् राम, इन्द्रजीत के साथ लक्ष्मण, विरूपाक्ष के साथ सुग्रीव, तुण्ड के साथ नल और पटुस से पनस का युद्ध होने लगा। जिसने जिसको अपने जोड़ का समझा, वह उसके साथ भिड़ गया। यह युद्ध यहाँ तक बढ़ा कि प्राचीन काल के देवासुर-संग्राम इसके सामने फीका पड़ गया।

Sunday, 7 February 2016

वनपर्व--वानरसेना का संगठन, सेतु का निर्माण, विभीषण का अभिषेक और लंका में सेना का प्रवेश-

वानरसेना का संगठन, सेतु का निर्माण, विभीषण का अभिषेक और लंका में सेना का प्रवेश
तदनन्तर वहाँ पर सुग्रीव की आज्ञा से बड़े-बड़े वानर वीर एकत्रित हने लगे। सर्वप्रथम वाली का ससुर सुषेण श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में उपस्थित हुआ, उसके बाद वेगवान् वानरों की दस अरब सेना थी। महाबलवान् गज और गवय एक-एक अरब सेना लेकर आये। गवाक्ष के साथ साठ अरब वानर थे। गन्धमादन पर्वत पर रहनेवाला गन्धमादन नाम से प्रसिद्ध वानर अपने साथ सौ अरब वानरों की फौज लेकर आया। महाबली पनस के साथ बावन करोड़ सेना थी। अत्यन्त पराक्रमी दधिमुख भी तेजस्वी वानरों की बहुत बड़ी सेना लेकर उपस्थित हुआ। जाम्बवान् के साथ भयानक पौरुष दिखानेवाले काले रीछों की सौ अरब सेना थी। ये तथा और भी बहुत से वानर सेनाओं के सरदार श्रीरामचन्द्रजी की सहायता के लिये वहाँ एकत्रित हुए। इन वानरों में से कितनों का ही शरीर पर्वत शिखर के समान ऊँचा था; कई भैंसों की तरह मोटे और काले थे; कितने ही शरद्-ऋतु के बादल जैसे सफेद थे; बहुों का मुख सिन्दूर के समान लाल था। वानरों की वह विशाल सेना भरे-पूरे महासागर के समान दिखायी पड़ती थी। सुग्रीव की आज्ञा से उस समय माल्यवान् पर्वत के पास ही सबका पड़ाव पड़ गया। इस प्रकार जब सब ओर से वानरों की फौज इकट्ठी हो गयी, तब सुग्रीव सहित भगवान् रम ने एक दिन अच्छी तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहूर्त में वहाँ से कूच कर दिया। उस समय सेना व्यूह के आकार में खड़ी की गयी थी। उस व्यूह के अग्रभाग में पवनन्दन हनुमान् थे और पिछले भाग की रक्षा लक्ष्मणजी कर रहे थे। इनके अतिरिक्त नल, नील, अंगद, क्राथ, मैन्द और द्विन्द भी रक्षा करते थे। इन सबके द्वारा सुरक्षित होकर वह फौज श्रीरामचन्द्रजी का कार्य सिद्ध करने के लिये आगे बढ़ रही थी। मार्ग में अनेकों जंगल तथा पहाड़ों पर पड़ाव डालती हुई वह लवणसमुद्र के पास जा पहुँची और उसके तटवर्ती वन में उसने डेरा डाल दिया।तदनन्तर भगवान् राम ने प्रधान-प्रधान वानरों के बीच सुग्रीव से समयोचित बात कही---'हमारी यह सेना बहुत बड़ी है और सामने अगाध महासागर है, जिसको पार करना बहुत ही कठिन है; ऐसी दशा में आपलोग उस पार जाने के लिये क्या उपाय ठीक समझते हैं ? इतनी सेना उतारने के लिये हमलोगों के पास नावें भी नहीं है। व्यापारियों के जहाज से पार जाया जा सकता है; पर हमारे जैसे लोग अपने स्वार्थ के लिये उन्हें हानि कैसे पहुँचा सकते हैं ? हमारी फौज दूर तक फैली हुई है, यदि इसकी रक्षा का उचित प्रबंध नहीं हुआ तो मौका पाकर शत्रु इसका नाश कर सकता है। हमारे विचार में तो यह आता है कि किसी उपाय से समुद्र की ही अराधना करें, यहाँ उपवासपूर्वक धरना दें; यही कोई मार्ग बतावेगा। उपासना करने पर भी यदि इसने मार्ग नहीं बताया तो अपने अग्नि के समान तेजस्वी अमोघ वाणों से इसे जलाकर सुखा डालूँगा। यों कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण सहित आचमन करके समुद्र के किनारे कुशासन बिछाकर लेट गये। तब नद और नदियों के स्वामी समुद्र ने जलचरों सहित प्रकट होकर स्वप्न में भगवान् राम को दर्शन दिया और मधुर वचनों में कहा---कौशल्यानन्दन ! मैं आपकी क्या सहायता करूँ ? श्रीरामचन्द्रजी ने कहा---'नदीश्वर ! मैं अपनी सेना के लिये मार्ग चाहता हूँ, जिससे जाकर रावण का वध कर सकूँ। यदि मेरे माँगने पर भी रास्ता न दोगे तो अभिमंत्रित किये हुए दिव्य वाणों से तुम्हे सुखा डालूँगा।' श्रीरामचन्द्रजी की बात सुनकर समुद्र को बड़ा कष्ट हुआ, उसने हाथ जोड़कर कहा---'भगवन् ! मैं आपका मुकाबला करना नहीं चाहता और आपके काम में विघ्न डालने की भी मेरी इच्छा नहीं है। पहले मेरी बात सुन लीजिये; फिर जो कुछ करना उचित हो, कीजिये। यदि आपका आज्ञा मानकर राह दे दूँगा तो दूसरे लोग भी धनुष का बल दिखाकर मुझे ऐसी आज्ञा दिया करेंगे। आपकी सेना में नल नाम का एक वानर है। वह विश्वकर्मा का पुत्र है; वह अपने हाथ से जो भी तृण, काष्ठ या पत्थर डालेगा, उसे मैं ऊपर रोके रहूँगा। इस प्रकार आपके लिये एक पुल तैयार हो जायगा। यों कहकर समुद्र अन्तर्धान हो गया। श्रीरामचन्द्रजी ने धरना छोड़ दिया और नल को बुलाकर कहा--'नल ! तुम समुद्र पर एक पुल बनाओ, मुझे मालूम हुआ है कि तुम इस कार्य में कुशल हो।' इस प्रकार नल को आज्ञा देकर भगवान् राम ने पुल तैयार कराया, जिसकी लम्बाई चार सौ कोस की और चौड़ाई चालीस कोस की थी। आज भी वह इस पृथ्वी पर 'नलसेतु' के नाम से प्रसिद्ध है। तदनन्तर वहाँ श्रीरामचन्द्रजी के पास राक्षसराज रावण का परम भाई धर्मात्मा विभीषण आया। उसके साथ चार मंत्री भी थे। भगवान् राम बड़े ही उदार हृदयवाले थे, उन्होंने विभीषण को स्वागतपूर्वक अपना लिया। सुग्रीव के मन में शंका हुई कि यह शत्रु का कोई जासूस न हो, परन्तु श्रीरामचन्द्रजी ने उसकी चेष्टा, व्यवहार तथा मनोभावों की परीक्षा करके उसे सत्य और शुद्ध पाया, इसीलिये उन्होंने बहुत प्रसन्न होकर उसका आदर किया। इतना ही नहीं, उन्होंने उसी क्षण विभीषण को राक्षसों के राजपद पर अभिषिक्त कर दिया, लक्ष्मण से उसकी मित्रता करा दी और स्वयं उसे अपना गुप्त सलाहकार बना लिया। फिर विभीषण की सम्मति लेकर सब लोग पुल की राह से चले और एक महीने में पुल के पार पहुँच गये। वहाँ लंका की सीमा पर फौज की छावनी पर गयी और वानर वीरों ने वहाँ के कई सुन्दर-सुन्दर बगीचों को तहस-नहस कर डाला। रावण के दो मंत्री थे, शुक और सारण। वे दोनो भेद लेने आये थे और वानरों के वेष में श्रीरामचन्द्रजी की सेना में मिल गये थे। विभीषण ने उन दोनो को पहचानकर पकड़ लिया। फिर वे जब अपने असली रूप में प्रकट हुए तो उन्हें राम की सेना दिखाकर छोड़ दिया। लंका के उपवन में सेना ठहरायी गयी और भगवान् राम ने अत्यन्त बुद्धिमान अंगद को दूत बनाकर रावण के पास भेजा।

Thursday, 4 February 2016

वनपर्व---सीता की खोज में वानरों का जाना तथा हनुमान् जी का श्रीरामचन्द्रजी से सीता का समाचार कहना

सीता की खोज में वानरों का जाना तथा हनुमान् जी का श्रीरामचन्द्रजी से सीता का समाचार कहना
श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ माल्यवान् पर्वत पर रहते थे; सुग्रीव ने उनकी रक्षा का पूरा प्रबंध कर दिया था। एक दिन भगवान् राम लक्ष्मण से बोले---'सुमित्रानन्दन ! जरा किष्किन्धा में जाकर पता तो लगाओ सुग्रीव क्या कर रहा है। मैं तो समझता हूँ वह अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन करना नहीं जानता; अपनी मंदबुद्धि के कारण उपकारी का भी अनादर कर रहा है। यदि वह सीता के लिये कुछ उद्योग न करता हो, विषय-भोग में ही आसक्त हो तो उसे भी तुम बाली के मार्ग पर ही पहुँचा देना। यदि हमारे कार्य के लिये कुछ चेष्टा कर रहा हो तो उसे साथ लेकर शीघ्र ही यहाँ लौट आना, विलम्ब न करना।' भगवान् राम के ऐसा कहने पर बड़े भाई की आज्ञा माननेवाले वीरवर लक्ष्मणजी प्रत्यंचा चढ़ाया हुआ धनुष लेकर किष्किन्धा की ओर चल दिये। नगरद्वार पर पहुँचकर वे बेरोक-टोक भीतर घुस गये। वानरराज सुग्रीव लक्ष्ण को कुपित जानकर स्त्री को साथ ले बहुत ही विनीतभाव से उनकी आगवानी में आये। उन्होंने उनका पूजन एवं सत्कार किया, इससे लक्ष्मणजी प्रसन्न हुए और नि्भय होकर श्रीरामचन्द्जी का संदेश सुनाने लगे। सब सुन लेने पर सुग्रीव ने हाथ जोड़कर कहा---'लक्ष्मण ! मेरी बुद्धि खोटी नहीं है, मैं कृतध्न और निर्दयी भी नहीं हूँ। सीता की खोज के लिये जो यत्न मैने किया है, उसे ध्यान देकर सुनिये। सब दिशाओं में सुशिक्षित वानर पठाये गये हैं; उनके लौटने का समय भी नियत कर दिया गया है। कई भी एक महीने से अधिक समय नहीं लगा सकता। उन्हें यह आज्ञा दी गयी है कि वे इस पृथ्वी पर घूम-घूमकर प्रत्येक पहाड़, जंगल, समुद्र, गाँव, नगर और घर में सीता की खोज करें। पाँच रात में उनके लौटने का समय पूरा हो जायगा, उसके बाद आप श्रीरामचन्द्रजी के साथ बहुत ही प्रिय समाचार सुनेंगे। सुग्रीव की बात सुनकर लक्ष्मणजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना क्रोध त्याग दिया और इस प्रबंध के लिये सुग्रीव की बड़ी प्रशंसा की। फिर वे उन्हें साथ लेकर श्रीरामचन्द्रजी के पास गये और सुग्रीव ने जो कुछ प्रबंध किया था, उसे उनसे निवेदन किया। समय पूरा होते-होते तीन दिशाओं में खोज करके हजारों वानर आ पहुँचे। केवल दक्षिण दिशा में गये वानर अभी तक नहीं लौटे थे। आये हुए वानरों ने बताया कि 'बहुत ढ़ूँढ़ने पर भी हमें रावण और सीता का पता नहीं लगा।' फिर दो मास व्यतीत होने पर कुछ वानर बड़ी शीघ्रता से सुग्रीव के पास आये और कहने लगे---'वानरराज ! वाली तथा आपने जिस महान् मधुवन की रक्षा की है, वह आज उजाड़ हो रहा है। आपने जिन-जिन को दक्षिण भेजा था, वे पवननन्दन हनुमान्, वालीकुमार अंगद तथा और भी बहुत से वानर मधुवन का स्वेच्छानुसार उपभोग कर रहे हैं।' उनकी धृष्टता का समाचार सुनकर सुग्रीव समझ गये कि उन्होंने अपना काम पूरा कर लिया है। क्योंकि ऐसी चेष्टा वे ही भृत्य कर सकते हैं, जो स्वामी का कार्य सिद्ध करके आये हों। ऐसा सोचकर बुद्धिमान सुग्रीव ने श्रीरामचन्द्रजी के पास जाकर यह समाचार कह सुनाया। श्रीरामचन्द्रजी ने भी यही अनुमान किया कि उन वानरों ने अवश्य ही सीता का दर्शन किया होगा। तदनन्तर हनुमान् आदि वानर वीर मधुवन में विश्राम करने के पश्चात् सुग्रीव से मिलने के लिये राम-लक्ष्मण के निकट आये। उनमें से हनुमान् की चाल-ढ़ाल और मुख की प्रसन्नता देखकर श्रीरामचन्द्रजी को यह विश्वास हो गया कि इसने ही सीता का दर्शन किया है। हनुमान् आदि ने वहाँ आकर श्रीराम, सुग्रीव तथा लक्ष्मण को प्रणाम किया। फिर राम के पूछने पर हनुमान् ने कहा---"रामजी ! मैं आपको बहुत प्रिय समाचार सुनाता हूँ; मैने जानकीजी का दर्शन किया है। पहले हम सब लोग यहाँ से दक्षिण दिशा में जाकर पर्वत, वन और गुफाओं में ढ़ूँढ़ते-ढ़ूँढ़ते थक गये थे। इतने में एक बहुत बड़ी गुफा दिखायी पड़ी, वह अनेकों योजन लम्बी-चौड़ी थी; भीतर कुछ दूर तक अँधेरा था, घने जंगल थे और उसमें बहुत से जानवर रहते थे। बहुत दूर तक मार्ग तय करने के बाद सूर्य का प्रकाश देखने में आया। वहाँ एक बहुत सुन्दर दिव्य भवन बना हुआ था, वह मय दानव का निवासस्थान बताया जाता है। उसमें प्रभावती नाम की एक तपस्विनी तप कर रही थी। उसने हमलोगों को नाना प्रकार के भोजन दिये, जिन्हें खाने से हमारी थकावट दूर हो गयी, शरीर में बल आ गया। फिर प्रभावती के बताये हुए मार्ग से हमलोग ज्योंही गुफा से बाहर निकले त्योंही देखते हैं कि हम लवणसमुद्र के निकट पहुँच गये हैं और सह्य, मलय तथा दुर्दुर नामक पर्वत हमारे सामने हैं। फिर हम सब लोग मलय पर्वत पर चढ़ गये। वहाँ से जब समुद्र पर दृष्टि पड़ी तो हृदय विषाद से भर गया। हम जीवन से निराश हो गये। भयंकर जल-तंतुओं से भरा हुआ यह सैकड़ों योजन विस्तृत महासागर कैसे पार किया जायगा, यह सोचकर हमें बड़ा दुःख हुआ। अन्त में अनशन करके प्राण त्याग देने का निश्चय करके हमलोग वहाँ बैठ गये। आपस में बातचीत होने लगी; बीच में जटायु का प्रसंग छिड़ गया। उसे सुनकर एक पर्वतशिखर के समान विशालकाय घोररूपधारी भयंकर पक्षी हमारे सामने प्रकट हुआ; देखने से जान पड़ता था मानो दूसरे गरुड़ हों। उसने हमलोगों के पास आकर पूछा---'कौन जटायु की बात कर रहा है ? मैं उसका बड़ा भाई हूँ, मेरा नाम सम्पाति है; मुझे अपने भाई को देखे बहुत दिन हो गये हैं, अतः उसके सम्बन्ध में मैं जानना चाहता हूँ।' तब हमने जटायु की मृत्यु और और आपके संकट का समाचार संक्षेप से सुना दिया। यह अप्रिय समाचार सुनकर उसे बड़ा कष्ट हुआ और फिर पूछने लगा---'राम कौन हैं ? सीता कैसे हरी गयी ? और जटायु की मृत्यु किस प्रकार हुई ?' इसके उत्तर में हमने आपका परिचय, सीताहरण, जटायुमरण और संकटों का आना तथा अपने अनशन का कारण---यह सबकुछ विस्तार से बताया। यह सुनकर उसने हमलोगों को उपवास करने से रोककर कहा---'रावण को मैं जानता हूँ' उसकी महापुरी लंका भी मेरी देखी हुई है; वह समुद्र के उस पर त्रिकूट गिरि की कन्दरा में बसी है। विदहकुमारी सीता वहीं होगी; इसमें तनिक भी विचार करने की आवश्यकता नहीं है।'  "उसकी बात सुनकर हमलोग तुरंत उठे और समुद्र पार करने के विषय में सलाह करने लगे। जब कोई भी उसे लाँघने का साहस कर सका, तब मैं अपने पिता वायु के स्वरूप में प्रवेश करके सौ योजन विस्तृत समुद्र लाँघ गया। समुद्र के जल में एक राक्षसी थी, जाते समय उसे भी मार डाला। लंका में पहुँचकर रावण के अंतःपुर में मैने पतिव्रता सीता का दर्शन किया। वे आपके दर्शन की लालसा में बराबर तप और उपवास करती रहती हैं। उनके पास एकान्त में जाकर कहा---'देवी ! मैं श्रीरामचन्द्रजी का दूत एक वानर हूँ, आपके दर्शन के लिये आकाशमार्ग से यहाँ आया हूँ। दोनो राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण कुशल से हैं, वानरराज सुग्रीव इस मय उनके रक्षक हैं, उन सबने आपका कुशल समाचार पूछा है। अब थोड़े ही दिनों में वानरों की सेना साथ लेकर आपके स्वामी यहाँ पधारनेवाले हैं। आप मेरी बातों पर विश्वास करें, मैं राक्षस नहीं हूँ।' सीता थोड़ी देरतक विचार करके बोली---'अविन्ध्य के कथनानुसार मैं समझती हूँ तुम 'हनुमान' हो।ऐसा कहकर उसने अपनी पहचान के लिये यह एक मणि दी तथा विश्वास दिलाने के लिये एक कथा भी सुनायी; जब आप चित्रकूट पर्वत पर रहते थे, उस समय आपने एक कौए के ऊपर सींक का वाण मारा था। यही उस कथा का मुख्य विषय है। इस प्रकार सीता का संदेश अपने हृदय में धारण करके मैने लंकापुरी जलायी और फिर आपकी सेवा में चला आया।" यह प्रिय समाचार सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने हनुमान् की बड़ी प्रशंसा की।

वनपर्व---त्रिजटा का स्वप्न, रावण का प्रलोभन और सीता का सतीत्व

त्रिजटा का स्वप्न, रावण का प्रलोभन और सीता का सतीत्व
काम के वशीभूत हुए रावण ने सीता को लंका में में जाकर एक सुन्दर भवन में ठहराया। वह भवन नन्दनवन के समान मनोहर उद्यान के भीतर अशोकवाटिका के निकट बना हुआ था। सीता तपस्विनीवेष में वहाँ ही रहती और प्रायः तप उपवास किया करती थी। निरन्तर अपने स्वामी श्रीरामचन्द्रजी का चिन्तन करते-करते वह दुबली हो गयी और बड़े कष्ट से दिन व्यतीत कर रही थी। रावण ने सीता की रक्षा के लिये  कुछ राक्षसी स्त्रियों को नियुक्त कर रखा था, उनकी आकृति बड़ी भयानक थी। कोई फरसा लिये हुए थी और कोई तलवार। किसी के हथ में त्रिशूल था तो कसी के हाथ में मुदगर। कोई जलती हुई लुआठी ही लिये रहती थी। वे सब-के-सब सीता को सब ओर से घेरकर बड़ी सावधानी के साथ रात-दिन उसकी रक्षा करती थीं। वे बड़े विकट वेष बनाकर कठोर स्वर में सीता को धमकाती हुई आपस में कहती थीं---'आओ हम सब मिलकर इसे काट डालें औरतिल के समान टुकड़े-टुकड़े करके बाँटकर खा जायँ।' उनकी बातें सुनकर एक दिन सीता ने कहा---'बहिनों ! तुमलोग मुझे जल्दी खा जाओ। अब इस जीवन के लिये तनिक भी लोभ नहीं है। मैं अपने स्वामी भगवान् राम के बिना जीना ही नहीं चाहती। प्राणप्यारे के विोग में निराहार ही रहकर अपना शरीर सुखा डालूँगी, किन्तु उनके सिवा दूसरे पुरुष का सेवन नहीं करूँगी। इस बात को सत्य जानो और इसके बाद जो कुछ करना हो, करो।' सीता की बात सुनकर वे भयंकर शब्द करनेवाली राक्षसियाँ रावण को सूचना देने के लिये चली गयीं। उनके चले जाने पर एक त्रिजटा नाम की राक्षसी वहाँ रह गयी। वह धर्म को जाननेवाली और प्रिय वचन बोलनेवाली थी। उसने सीता को शान्त्वना देते हुए कहा---"सखी ! मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ। मुझपर विश्वास करो और अपने हृदय से भय को निकाल दो। यहाँ एक श्रेष्ठ राक्षस रहता है, जिसका नाम है अविन्ध्य। वहवृद्ध होने के साथ ही बड़ा बुद्धिमान है और सदा श्रीरामचन्द्रजी के हित चिन्तन में लगा रहता है। उसने तुमसे कहने के लिये यह संदेश भेजा है---'तुम्हारे स्वामी महाबली राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ कुशल-पूर्वक हैं। वे इन्द्र के समान तेजस्वी वानरराज सुग्रीव के साथ मित्रता करके तुम्हे छुड़ाने का उद्योग कर रहे हैं। अब रावण से भी तुम्हे भय नहीं मानना चाहिये; क्योंकि नलकूबर ने जो उसे शाप दे रखा है, उसी से तुम सुरक्षित रहोगी। एक बार रावण ने नलकूबर की स्त्री रम्भा का स्पर्श किया था इसी से उसे शाप हुआ। अब वह अजितेन्द्रिय राक्षस किसी भी परस्त्री को विवश करके उसपर बलात्कार नहीं कर सकता। तुम्हारे स्वामी श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण को साथ लेकर शीघ्र ही यहाँ आनेवाले हैं। उस समय सुग्रीव उनकी रक्षा में रहेंगे। भगवान् राम अवश्य ही तुम्हे यहाँ से छुड़ा ले जायेंगे।' मैने भी अनिष्ट की सूचना देनेवाले घोर स्वप्न देखे हैं, जिनसे रावण का विनाशकाल निकट जान पड़ता है। सपने में देखा है कि रावण का सिर मूँड़ दिया गया है,उसके सारे शरीरमें तेल लगा है और वह कीचड़ में डूब रहा है। यह भी देखने में आया कि गदहों से जुते रथ पर खड़ा होकर वह बारम्बार नाच रहा है। उसके साथ ही ये कुम्भकर्ण आदि भी मूँड़ मुड़ाये लाल चन्दन लगाये लाल-लाल फूलों की माला पहने नंगे होकर दक्षिण दिशा को जा रहे हैं। केवल विभिषण ही श्वेत क्षत्र धारण किये सफेद पगड़ी पहने श्वेत पुष्प और चन्दन से चर्चित हो श्वेत पर्वत के ऊपर खड़े दिखायी पड़े हैं। विभिषण के चार मंत्री भी उनके साथ उन्हीं के वेष में देखे गये हैं; अतः ये लोग उस आनेवाले महान् भय से मुक्त हो जायेंगे। स्वप्न में यह भी देखा कि भगवान् राम के वाणों से समुद्र सहित संपूर्ण पृथ्वी आच्छादित हो गयी है; अतः यह निश्चय है कि तुम्हारे पतिदेव का सुयश समस्त भूमण्डल में फैल जायगा। सीते ! अब तुम शीघ्र ही अपने पति और देवर से मिलकर प्रसन्न होगी।" त्रिजटा की ये बातें सुनकर सीता के मन में बड़ी आशा बँध गयी कि पुनः पतिदेव से भेंट होगी। उसकी बात समाप्त होते ही सभी राक्षसियाँ सीता के पास आकर उसे घेरकर बैठ गयीं। वह एक शिला पर बैठीहुई पति की याद में रो रही थी। इतने ही में रावण ने आकर उसे देखा और कामवाण से पीड़ित होकर उसके पास आ गया। सीता उसे देखते ही भसभीत हो गयी। रावण कहने लगा---'सीते ! आजतक तुमने जो अपने पति पर अनुग्रह दिखाया, यह बहुत हुआ; अब मुझपर कृपा करो। मैं तुम्हे अपनी सब स्त्रियों में ऊँचा आसन देकर पटरानी बनाना चाहता हूँ। देवता, गन्धर्व, दानव और दैत्य---इन सबकी कन्याएँ मेरी पत्नी के रूप में यहाँ विद्यमान हैं। चौदह करोड़ पिशाच, अट्ठाईस करोड़ राक्षस और इनके तिगुने यक्ष मेरी आज्ञा का पालन करते हैं। मेरे भाई कुबेर की तरह मेरी सेवा में भी अप्सराएँ रहती हैं। मेरे यहाँ भी इन्द्र के समान दिव्य भोग प्राप्त होते हैं। यहाँ रहने से तुम्हारा वनवास का दुःख दूर हो जायगा; इसलिये सुन्दरी ! तुम मन्दोदरी के समान मेरी पत्नी हो जाओ।' रावण के ऐसा कहने पर सीता ने दूसरी ओर मुँह फेर लिया, उसके आँखों से आँसुओं की झरी लग गयी। तृण की ओट करके काँपती हुई बोली---'राक्षसराज ! तुमने अनेकों बार ऐसी बातें मेरे सामने कही हैं; इनसे मुझे बड़ा कष्ट पहुँचा है तो भी मुझ अभागिनी को ये सभी बातें सुननी पड़ी हैं। तुम मेरी ओर से अपना मन हटा लो। मैं परायी स्त्री हूँ,पतिव्रता हूँ; तुम किसी तरह मुझे नहीं पा सकते।' यह कहकर सीता आँचल से अपना मुँह ढ़ँककर फूट-फूटकर रोने लगी। उसका कोरा उत्तर पाकर रावण वहाँ से अन्तर्धान हो गया और शोक से दुबली हुई सीता राक्षसियों से घिरी वहीं रहे लगी। उस समय त्रिजटा ही उसकी सेवा किया करती थी।

वनपर्व---भगवान् राम का सुग्रीव से मैत्री और वाली का वध

भगवान् राम का सुग्रीव से मैत्री और वाली का वध
समय वर्षा काल का आरम्भ था; अतः श्रीरामचन्द्रजी ने माल्यवान् पर्वत पर ही रहकर वर्षा के चार महीने व्यतीत किये। उन दिनों सुग्रीव ने भली-भाँति उनका तदनन्तर सीताहरण के दुःख से व्याकुल श्रीरामचन्द्रजी पम्पा सरोवर पर आये। उसके जल में स्नान करके दोन भाई रिष्यमूक पर्वत पर बढ़ने लगे। उस समय पर्वत की चोटी पर उन्हें पाँच वानर दिखायी पड़े। सुग्रीव ने जब दोनो को आते देखा तो उन्होंने अपने बुद्धिमान मंत्री हनुमान को उने पास भेजा। हनुमान् से बातचीत हो जाने पर दोनो उनके साथ सुग्रीव के पास गये। श्रीरामचन्द्रजी ने सुग्रीव के साथ मैत्री की और उनसे अपना कार्य निवेदन किया। उनकी बात सुनकर वानरों ने उन्हें वह दिव्य वस्त्र दिखलाया, जिसे हरण के समय सीता से आकाश के नीचे डाल दिया था। उसे पाकर राम को और भी निश्चय हो गया कि सीता को रावण ही ले गया है। उस समय श्रीरामचन्द्रजी ने सुग्रीव को समस्त भूमण्डल के वानरों के राजपद पर अभिषिक्त कर दिया। साथ ही उन्होंने यह प्रतीज्ञा की कि 'मैं युद्ध में वाली को मार डालूँगा।' तब सुग्रीव ने भी सीता को ढ़ूँढ़ लाने की प्रतिज्ञा की। इस प्रकार प्रतिज्ञा कर दोनो ने एक दूसरे को विश्वास दिलाया, फिर सब मिलकर युद्ध की इच्छा से  किष्किन्धा को चले। वहाँ पहुँचकर सुग्रीव ने बड़े जोर से गर्जना की। वाली को यह सहन नहीं हो सका; उसे युद्ध के लिये निकलते देख उसकी स्त्री तारा ने उसे रोकते हुए कहा---'नाथ ! आज सुग्रीव जिस प्रकार सिंहनाद कर रहा है, इससे मालूम होता है कि इस समय उसका बल बढ़ा हुआ है; उसे कोई बलवान् सहायक मिल गया है। अतः आप घर से न निकलें।' वाली ने कहा, 'तुम संपूर्ण प्राणियों की आवाज से ही उनके विषय में सबकुछ जान लेती हो; सोचकर बताओ तो सही, सुग्रीव को किसने सहारा दिया है ?' तारा क्षणभर विचार करने के बाद बोली---'राजा दशरथ के पुत्र महाबली राम की स्त्री सीता को किसी ने हर लिया है; उसकी खोज के लिये उन्होंने सुग्रीव से मित्रता जोड़ी है। दोनो ने ही एक-दूसरे के शत्रु को शत्रु और मित्र को मित्र मान लिया है। श्रीरामचन्द्रजी धनुर्धर वीर हैं। उनके छोटे भाई सुमित्राकुमार लक्ष्मण हैं, उन्हें भी कोई युद्ध में नहीं जीत सकता। इनके सिवा मैन्द, दि्विद, हनुमान और जाम्बवान्---ये चार सुग्रीव के मंत्री हैं; ये लोग भी बड़े बलवान् हैं। अतः इस समय श्रीरामचन्द्रजी के बल का सहारा लेने के कारण सुग्रीव तुम्हे मार डालने में समर्थ है।' तारा ने यदयपि उसके हित की बात कही थी, तो भी उसने उसके ऊपर आक्षेप किया और किष्किन्धा-गुफा के द्वार से बाहर निकल आया। सुग्रीव माल्यवान् पर्वत के पास खड़ा था, वहाँ पहुँचकर वाली ने उससे कहा---'अरे ! तू अपनी जान बचाता फिरता था, पहले अनेकों बार तुझे युद्ध में जीतकर मैने भाई जानकर जीवित छोड़ दिया था। आज फिर मरने के लिये क्या जल्दी आ पड़ी ?' उसकी बात सुनकर सुग्रीव भगवान् राम को सूचित करते हुए हतुभरे वचन बोले---'भैया ! तुमने मेरा राज्य ले लिया, स्त्री छीन ली; अब मैं किसे आसरे जीवित रहूँ। यही सोचकर मरने चला आया हूँ।' इस प्रकार बहुत सी बातें कहकर वाली और सुग्रीव दोनो एक दूसरे से गुथ गये। उस युद्ध में साल और ताड़ के वृक्ष तथा पत्थर की चट्टानें---यही उनके अस्त्र-शस्त्र थे। दोनों-दोनों पर प्रहार करते, दोनो जमीन पर गिर जाते और फिर दोनं ही उठकर विचित्र ढ़ंग से पैतरे बदलते तथा मुक्के और घूसों से मारते थे। नख और दाँतों से दोनो के शरीर लोहू-लुहान हो रहे थे। पतानहीं चलता था कि कौन वाली है और कौन सुग्रीव। तब हनुमान् जी ने सुग्रीव की पहचान के लिये उनके गले में एक माला डाल दी। चिह्न के द्वारा सुग्रीव को पहचानकर भगवान् राम ने अपना महान् धनुष खींचकर चढ़ाया और वाली को लक्ष्य करके वाण छोड़ दिया। वह वाण वाली के छाती में जाकर लगा। वाली ने एक बार अपने सामने खड़े हुए लक्ष्मण सहित भगवान् राम को देखा और उनके इस कार्य की निन्दा करता हुआ मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ा। वाली की मृत्यु के पश्चात् सुग्रीव ने किष्किन्धा के राज्य और तारा पर अपना अधिकार जमा लिया। उस स्वागत-सत्कार किया।