वैशम्पायनजी कहते हैं_युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो जाने पर वे भगवान् श्रीकृष्ण से हाथ जोड़कर बोले_भगवन् ! आपकी ही कृपा, नीति, बल बुद्धि और पराक्रम से मुझे अपने बाप_दादों का यह राज्य प्राप्त हुआ है।कमललोचन ! मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं। पवित्र अंत:कर्ण वाले ब्राह्मण आपकी अनेकों नामों द्वारा युति किया करते हैं। यह संपूर्ण विश्व आपकी लीला है, आपही से इसकी उत्पत्ति हुई है और डंडाआप ही इसके आत्मा हैं; आपको सादर नमस्कार है। आप सर्वत्र व्यापक विष्णु और विजयी होने से 'जिष्णु' कहलाते हैं। हरे ! आपही सच्चिदानंद स्वरूप श्रीकृष्ण, विकुण्ठधाम के अधिपति वैकुण्ठ और क्षर_अक्षर पुरुष से उत्तम पुरुषोत्तम हैं। आप पुराण पुरुष परमात्मा ने ही सात बार अदिति के गर्भ से अवतार लिया है। (आदित्य और वामन के रूप में दो बार साक्षात् अदिति के गर्भ से और और पृश्रिगर्भ, परशुराम, श्रीराम, बलराम और श्रीकृष्ण के रूप में पांच बार उनके जन्मांतर्गत पृश्रि आदि अन्य रूपों के गर्भ से यहां भगवान के प्राकट्य की बात कही गयी है )।आप ही पृश्रिगर्भ के नाम से प्रसिद्ध हैं।विद्वान लोग तीनों युगों में प्रगट होने के कारण आपको त्रियुग कहते हैं। आपकी कीर्ति बहुत पवित्र है, आप इन्द्रियों के प्रेरक और यज्ञस्वरूप हैं। आप हंस ( शुद्ध आत्मा ) कहलाते हैं।तीन नेत्रों वाले भगवान् शंकर और आप एक ही हैं। आप ही विभु तथा दामोदर हैं। बराह, अग्नि, बऋहद्भआनउ ( सूर्य ), वृषभ् ( धर्म ), गरुड़ध्वज, अनईकसआह ( शत्रु सेना का वेग सह सकनेवाले ) पुरुष ( अन्तर्यामी ), विशिष्ट, यज्ञ मूर्ति और उरउक्रम ( दामन ) आदि आपही के नाम हैं। आप सबसे श्रेष्ठ और उग्रसेनापति हैं। सत्य-स्वरूप, अन्नदाता तथा स्वामी कार्तिकेय भी आपही हैं। आप रण से स्वयं कभी विचलित न होकर शत्रुओं को पीछे हटानेवाले हैं। वैदिक संस्कारों से युक्त द्विज और द्विजेत्तर मनुष्य भी आपही के स्वरूप हैं। आप ही कामनाओं की वर्षा करनेवाले वृष ( धर्म ) हैं। कृष्ण धर्म ( यज्ञस्वरूप ), वऋषदर्भ ( इन्द्र का दर्पण दलन करनेवाले ) और वृषाकपि ( हरि_हर ) भी आप ही हैं। आपही सिंधु ( समुद्र ), निर्गुण परमात्मा तथा सूर्य, चन्द्र एवं अग्निरूप त्रिविध तेज हैं; ऊपर, नीचे और मध्य_ ये तीन दिशाएं भी आप ही हैं। आपने अपने बैकुंठधाम से आकर इस पृथ्वी पर अवतार धारण किया है। आप सम्राट, विराट्, स्वराट् और देवराज इन्द्र हैं। यह संसार आपही से प्रकट हुआ है। आप सर्वत्र व्यापक, नित्य, सत्तारूढ़ और निराकार परमात्मा हैं। आप ही कृष्ण ( सबको अपनी ओर खींचने वाले ) और कृष्णवतर्मा ( अग्नि ) हैं। आपही को लोग अभइष्ठसआधक, अश्विनीकुमारों के पिता, कपिल मुनि, वामोन, यज्ञ, ध्रुव, गरुड़ तथा यज्ञसेन कहते हैं। आपही जलनिधि समुद्र, ब्रह्मा, पवित्र धाम तथा धाम के ज्ञाता हैं। केशव ! विद्वान पुरुष आपको ही हिरण्यगर्भ तथा स्वधा, स्वाहा आदि नामों से पुकारते हैं ! कृष्ण ! आप ही इस जगत् के आदि कारण हैं। आप ही इसकी सृष्टि करते हैं और आपही में इसका प्रलय होता है। विश्वेष! यह संपूर्ण विश्व आपके ही अधीन है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले परमात्मने ! आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।'इस प्रकार धर्मराज ने जब सभा में भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति की तो उन्होंने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा युधिष्ठिर का अभिनन्दन के श कुछ किया।
तदनन्तर राजा ने दरबार में आये हुए प्रियजनों को विदा कर दिया। वे सब लोग उनकी आज्ञा से अपने_अपने घर चले गये। इसके बाद युधिष्ठिर ने भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव को सान्त्वना देते हुए कहा_'प्रिय बन्धुओं। गत महासमर में शत्रुओं ने नाना प्रकार के अस्त्र_शस्त्रों का प्रहार करके तुम्हारे शरीर को बहुत घायल कर दिया है। इससे तुम बहुत तक गये हों और विशेष कष्ट उठा रहे हैं; अतः अब जाकर प्रसन्नता के साथ आराम करो। विश्राम के नश्तर जब तुम्हारा चित्त स्वस्थ हो जायगा, तो फिर कल मैं तुम लोगों से मिलूंगा।' तत्पश्चात् राजा धृतराष्ट्र की आज्ञा से युधिष्ठिर ने दुर्योधन का महल भीमसेन को अर्पण किया। उसमें बहुत _सी अट्टालिएं शोभा दे रही थीं, वहां रत्नों का भण्डार भरा था और बहुत _सी दास_दासियां सेवा के लिये प्रस्तुत थीं। महाबाहु भीम उस महल में चले गये। दूर्योधन का राजमहल जैसा सजा हुआ था , वैसा ही दुमहाबाहु भीम उस महल में चले गये। दूर्योधन का राजमहल जैसा सजा हुआ था , वैसा ही दु:शासन का भी था। उसमें भी प्रसाद मालाएं एवं शोभा पा रही थीं। वह भवन सोने की बन्दनवारों से सजाया गया था, धन_धान्य और दास_दासियों से भरपूर था। राजा की आज्ञा से वह महाबाहु अर्जुन को मिला। दुर्मर्षण का महल तो दु:शासन से भी सुन्दर था। वह सोने और मणियों से सजा होने के कारण कुबेर के राजभवन को भी मात करता था। उसे धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने नकुल को दिया। दुर्मुख का स्वर्णमण्डित महल भी कम सुन्दर नहीं था, वह सहदेव को दिया गया। युयुत्सु,विदुर, संजय, सुधर्मा और धौम्य_ये लोग अपने_अपने पहले के के ही स्थानों में जाकर विराजमान हुए। भगवान् श्रीकृष्ण सात्यकि को साथ लेकर अर्जुन के महल में चले गये। इस प्रकार सब राजाओं ने अपने_अपने स्थान पर खान_पान करके बड़ी प्रसन्नता के साथ रात व्यतीत की और फिर सवेरे उठकर सब राजा युधिष्ठिर की सेवा में उपस्थित हो गये। जनमेजय ने पूछा_विप्रवर ! राजा युधिष्ठिर ने राज्य पाने के पश्चात् और जो_जो कार्य किये हैं, उन्हें बताइये। साथ ही त्रिभुवन गुरु भगवान् श्रीकृष्ण के चरित्रों का भी वर्णन कीजिये। वैशम्पायनजी ने कहा_राजन् ! कुन्तिनन्दन युधिष्ठिर ने राज्य प्राप्त करने के बाद सबसे पहले चारों वर्णों को योग्यता के अनुसार अपने_अपने कर्तव्य पर स्थिर किया। फिर हजारों स्नातक ब्राह्मणों में से प्रत्येक को पद उन्होंने एक_एक स्वर्णमुद्राएं दान दीं। इसके सिवा, जिनकी जीविका का भार उन्हीं के ऊपर था उन भृत्यों, शरणागतों तथा अतिथियों को इच्छानुसार वस्तुएं देकर संतुष्ट किया। गरीबों और सवाल करनेवालों की भी कामनाएं पूर्ण कईं। अपने पुरोहित धौम्य मुनि को उन्होंने हजारों गौएं, धन, सुवर्ण, चांदी तथा नाना प्रकार के वस्त्र दान किये। कृपाचार्य का गुरु की भांति पूजन किया और विदुरजी का पूज्य की भांति सम्मान किया। फिर अपने आश्रितों को खाने_पीने की वस्तुएं, नाना प्रकार के वस्त्र, शय्या और आसन देकर प्रसन्न किया। इसी प्रकार उन्होंने राजा धृतराष्ट्र और उनके पुत्र युयुत्सु का भी विशेष सत्कार किया। धृतराष्ट्र, गांधारी तथा विदुरजी की सेवा में अपना सारा राज्य ही निवेदन करके युधिष्ठिर बड़े निश्चिंत और सुखी हो गये।