Sunday, 28 June 2026

युधिष्ठिर का भगवान् श्रीकृष्ण की आज्ञा से उनके साथ भीष्मजी के पास जाने का विचार

वैशम्पायनजी कहते हैं_इस प्रकार संपूर्ण नगर की प्रजा को संतुष्ट करके वे भगवान् श्रीकृष्ण के पास गये और हाथ जोड़कर खड़े हों गये।उन्होंने देखा भगवान् रत्नों तथा सुवर्ण से भूषित एक बड़े पलंग पर बैठे हुए हैं, उनकी श्यामसुंदर छबि नईलमएघ के समान सुशोभित हो रही है, शरीर से तेज बरस रहा है और उनके अंग_अंग में दिव्य आभूषण शोभा पा रहे हैं। उनका पीताम्बरी श्याम विग्रह स्वर्णजड़ित नीलम के समान जान पड़ता है। वक्ष:स्थल पर कौस्तुभ मणि चमक रही है।इस मनोहर झांकी की तीनों लोकों में कहीं भी उपमा नहीं है। दर्शन के पश्चात् भगवान् के निकट पहुंचकर राजा युधिष्ठिर मुस्कराते हुए बोले_'भगवन् ! आपही कईज्ञकऋपआ से हमने राज्य पाया है, आपही की दया से हम विजयी हुए और धर्म से भ्रष्ट नहीं होने पाये।'इस प्रकार राजा ने की बातें कहीं, पर भगवान् ने उनका कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वे उस समय ध्यानमग्न हो रहे थे। उनको इस स्थिति में देखकर युधिष्ठिर ने कहा_'भगवन् ! यह क्या, आप किसी का ध्यान कर रहे हैं ?यह तो बड़े आश्चर्य की बात है ! माधव ! आपके रोंगटे खड़े हो गये हैं, शरीर जरा भी हिलता नहीं, बुद्धि तथा मन स्थिर है। आपका यह विग्रह काट, दीवार और पत्थर की तरह निश्चेष्ट हो रहा है, हिल_डुल नहीं रहा है। जहां हवा नहीं है, उस स्थान में जैसे दीपक लौ कांपती नहीं, एकत्र जलती रहती है, उसी तरह आप स्थिर हैं, मानो पाषाण मूर्ति हों।यदि मैं सुनने का अधिकारी होऊं ओर यह मुझसे छिपाने की बात ज्ञान हो, तो आप मेरे संदेह को दूर कीजिये। मैं आपकी शरण में आकर बार-बार याचना करता हूं। पुरुषोत्तम ! आप ही इस जगत् को बनाने और बिगाड़नेवाले हैं, आप ही क्षर और अक्षर पुरुष हैं, आपका न आदिदि है न अंत। आप सबके आदि कारण हैं।मैं आपका शरणागत भक्त हूं और माता टेककर आपके चरणों में प्रणाम करता हूं; आप मुझे इस ज्ञान का रहस्य बता दीजिये।'युधिष्ठिर की प्रार्थना सुनकर मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों को अपन_अपने स्थान पर स्थापित करके भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए बोले_'भैया ! बाण_शैय्या पर पड़े हुए भीष्मजी मेरा ध्यान कर रहे हैं, इसलिये मेरा भी मन उनमें लग गया है।भगवती गंगा ने जिन्हें विधिवत् अपने गर्भ में धारण किया, जिन्होंने महर्षि वशिष्ठजी से शिक्षा पायी, जो संपूर्ण दिव्यास्त्रों तथा अंगों सहित चारों वेदों के ज्ञाता हैं संपूर्ण विद्याओं के आधार हैं, भूत, भविष्य और वर्तमान जिनकी दृष्टि के सामने है, उन धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भीष्मजी के पास इस समय मैं मन_ही_मन पहुंच गया था।श्रेष्ठ भीष्मजी के स्वर्गवासी हो जाने पर यह पृथ्वी अमावस्या के रात के समान श्रीहीन हो जायगी। इसलिये आप गंगा नन्दन भीष्मजी के पास चलकर उनके चरणों में प्रणाम कीजिये और आपके मन में जितने संदेह हैं, उन सबको उनसे पूछिये।कौरव वंश का भार संभालनेवाले भीष्मरूपी सूर्य जिस समय अस्त हो जायेंगे, उस समय सब प्रकार के ज्ञानों का प्रकाश नष्ट हो जायगा; इसलिये मैं आपको वहां चलने के लिये कहता हूं।भगवान् श्रीकृष्ण की यथार्थ बातें सुनकर युधिष्ठिर का गला भर आया, वे नेत्रों से आंसू बहाते हुए कहने लगे_माधव ! आप भीष्मजी का जैसा प्रभाव बतला रहे हैं, वह सब ठीक है, उनमें संदेह के लिये गुंजाइश नहीं है।मुझे भी उनका प्रभाव मालूम है। उनके महान् प्रभाव और सौभाग्य के विषय में मैंने की महात्मा ब्राह्मणों की बातें सुनी हैं। आप तो संपूर्ण जगत् के विधाता ही हैं; आप जो कुछ कहा रहे हैं, उसमें अन्यथा विचार करने की आवश्यकता नहीं है। भगवन् ! यदि आप मुझपर अनुग्रह करना चाहते हो तो आपको ही आगे करके हमलोग भीष्मजी के पास चलने का विचार करते हैं। सूर्य के उत्तरायण होते ही वे देवलोक में चले जायेंगे, इसलिये अब उन्हें भी आपका दर्शन मिलना ही चाहिये।' धर्मराज की बात सुनकर मधुसूदन ने पास ही बैठे हुए सात्यकि से कहा_'तुम रथ तैयार कराओ।' आज्ञा पाकर सात्यकि शिविर से बाहर निकले और दारुका से बोले_भगवान् श्रीकृष्ण का रथ जोतकर लाओ। सात्यकि के कथनानुसार दारुक ने रथ जोतकर तैयार किया। भगवान् के उस रथ में सब ओर होना जड़ा हुआ था, उसका भीतरी भाग नाना प्रकार की अद्भुत मणियों से सजाया गया था। सूर्य की किरणों के पड़ने से उसकी आभा अत्यन्त उद्दीप्त हो रही थी। उसमें शैब्य और सुग्रीव आदि घोड़े जुते हुए थे। इस प्रकार रथ तैयार करके दारुका भगवान् के पास गया और हाथ जोड़कर उसने उनको इस बात की इत्तिला की।

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