Tuesday, 22 March 2016

वनपर्व---सब पाण्डवों का जीवित होना, महाराज युधिष्ठिर का वर पाना तथा पाण्डवों का अज्ञातवास के लिये सबसे विदा लेना

सब पाण्डवों का जीवित होना, महाराज युधिष्ठिर का वर पाना तथा पाण्डवों का अज्ञातवास के लिये सबसे विदा लेना


तब यक्ष के कहते ही सब पाण्डव खड़े हो गये तथा एक क्षण में ही उनकी सब भूख-प्यास जाती रही।युधिष्ठिर ने पूछा---भगवन् ! आप कौन देवश्रेष्ठ हैं ? आप यक्ष ही हैं, ऐसा तो मुझे मालूम नहीं होता आप वसुओं में से, रुद्रों मे से अथवा मरुतों में से तो कोई नहीं हैं ? अथवा स्वयं देवराज इन्द्र ही हैं ? मेरे ये भाई तो सौ-सौ, हजार-हजार वीरों से युद्ध करनेवाले हैं। ऐसा तो मैने कोई योद्धा नहीं देखा, जिसने इन सभी को रणभूमि में गिरा दिया हो। अब जीवित होने पर भी इनकी इन्द्रियाँ सुख की नींद सोकर उठे ुओं के समान स्वस्थ दिखायी देती है; सो आप हमारे कोई सुहृद हैं अथवा पिता हैं। यक्ष ने कहा---भरतश्रेष्ठ ! मैं तुम्हारा पिता धर्मराज हूँ। यश, सत्य, दम, शौच, मृदुता, लज्जा, अचंचलता, दान, तप और ब्रह्मचर्य---ये सब मेरे शरीर हैं तथा अहिंसा, समता, शान्ति, तप, शौच और अमत्सर---इन्हें तुम मेरा मार्ग समझो। तुम मुझे सदा ही प्रिय हो। यह बड़ी प्रसन्नता की बात है कि तुम्हारी शम, दम, उपरति, तितिक्षा और समाधान---इन पाँच साधनों पर प्रीति है तथा तुमने भूख-प्यास, शोक-मोह और जरा-मृत्यु---इन छः दोषों को जीत लिया है। इनमें पहले दो दोष आरम्भ से ही रहते हैं, बीच के दो तरुणावस्था आने पर होते हैं तथा अन्तिम दो दोष अनन्त समय पर आते हैं। मैं धर्म हूँ और तुम्हारा व्यवहार जानने की इच्छा से ही यहाँ आया हूँ। निष्पाप राजन् ! तुम्हारी समदृष्टि के कारण मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम अभीष्ट वर माँग लो; जो मेरे भक्त हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती। युधिष्ठिर ने कहा---भगवन् ! पहला वर तो मैं यही माँगता हूँ कि जिस ब्राह्मण के अरणीसहित मन्थन काष्ठ को मृग लेकर भाग गया है, उसके अग्निहोत्र का लोप हो। यक्ष ने कहा---राजन् ! उस ब्राह्ण के अरणिसहित मन्थन काष्ठ को तुम्हारी परीक्षा के लिये मैं ही मृगरूप से लेकर भाग गया था। वह मैं तुम्हे देता हूँ। तुम कोई दूसरा वर माँग लो। युधिष्ठिर बोले---हम बारह वर्ष तक वन में रहे, अब तेरहवाँ वर्ष लगा है; अतः ऐसा वर दीजिये कि हमें कोई पहचान सके। यह सुनकर भगवान् धर्म ने कहा---'मैने तुम्हे वर दिया। यद्यपि तुम पृथ्वी पर अपने इसी रूप से विचरोगे , तो भी तुम्हे कोई पहचान नहीं सकेगा। तथा तुममें से जो-जो जैसा-जैसा चाहेगा, वह वैसा-वैसा ही रूप धारण कर सकेगा। इसके सिवा तुम एक तीसरा वर भी माँग लो। राजन् ! तुम मेरे पुत्र हो और विदुर ने भी मेरे ही अंश से जन्म लिया है; अतः मेरी दृष्टि में तुम दोनो ही समान हो। युधिष्ठिर ने कहा--- युधिष्ठिर ने कहा---भगवन् ! आप सनातन देवाधिदेव हैं। आज साक्षात् आपके ही दर्शन हुए, इससे अब मेरे लिये क्या दुर्लभ है ? तो भी आप मुझे जो वर देंगे, वह मैं सिर आँखों पर लूँगा। मुझे ऐसा वर दीजिये कि मैं लोभ, मोह और क्रोध को जीत सकूँ तथा दान, तप और सत्य में सर्वदा मेरे मन की प्रवृति रहे। धर्मराज ने कहा---पाण्डुपुत्र ! इन गुणों से तो तुम स्वभाव से ही सम्पन्न हो, आगे भी तुम्हारे कथनानुसार तुममें ये सब धर्म बने रहेंगे। ऐसा कहकर भगवान् धर्म अन्तर्धान हो गये तथा सब पाण्डव साथ-साथ आश्रम में लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने उस तपस्वी ब्राह्मण को उसकी अरणी दे दी। जो लोग इस श्रेष्ठ आख्यान को ध्यान में रखेंगे उनके मन की अधर्म में, सुहद्विद्रोह में, दूसरों का धन हरने में, परस्त्रीगमन में अथवा कृपणता में कभी प्रवृति नहीं होगी। इस तरह धर्मराज की आज्ञा पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डवलोग अज्ञात रहने के लिये तेरहवें वर्ष में गुप्तरूप से रहे थे। वे सब बड़े नियम-व्रतादि का पालन करनेवाले थे। एक दिन वे अपने प्रेमी वनवासी तपस्वियों के साथ बैठे थे। उस समय अज्ञातवास के लिये आज्ञा लेने के लिये उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, 'मुनिगण ! हम बारह वर्ष तक तरह-तरह की कठिनाइयाँ सहते हुए वन में निवास करते हुए वन में निवास करते रहे हैं। अब हमारे अज्ञातवा का तेरहवाँ वर्ष शेष है। इसमें हम छिपकर रहेंगे। आप हमें इसके लिये आज्ञा देने की कृपा करें। दुरात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि ने हमारे पीछे गुप्तचर लगा दिये हैं तथा पुरवासी और स्वजनोंको सचेत कर दिया है कि यदि हमें कोई आश्रय देगा तो उसके साथ कड़ाई का व्यवहार किया जायगा। अतः अब हमको किसी दूसरे राष्ट्र में जाना होगा। अतः अाप हमें प्रसन्नता से अन्यत्र जाने की आज्ञा प्रदान करें।' तब समस्त वेदवत्ता मुनि और यतियों ने उन्हें आशीर्वाद दिये और उनसे फिर भी भेंट होने की आशा रखकर वे अपने-अपने आश्रमों को चले गये। फिर धौम्य के साथ पाँचों पाण्डव खड़े हुए और द्रौपदी के सहित वहाँ से चल दिये। एक कोस आकर वे दूसरे ही दिन अज्ञातवास आरम्भ करने के लिये आपस में सलाह करने के लिये बैठ गये।

Saturday, 19 March 2016

वनपर्व---यक्ष युधिष्ठिर संवाद

यक्ष युधिष्ठिर संवाद

इधर महाराज युधिष्ठिर भीम को बहुत विलम्ब हुआ देखकर बड़े चिन्तित हुए। उनका चित्त शोकानल से संतप्त हो उठा और वे स्वयं ही जाने को खड़े हो गये। जलाशय के तट पर पहुँचकर उन्होंने देखा कि उनके चारों भाई मरे हुए पड़े हैं।उन्हें निष्चेष्ट पड़े देखकर महाराज युधिष्ठिर अ्यन्त खिन्न हो गये। शोकसमुद्र में डूबकर वे सोचने लगे---'इन वीरों को किसने मारा है ? इनके अंगों में कोई शस्त्रप्रहार का चिह्न भी नहीं है और यहाँ किसी के चरणचिह्न दिखायी भी नहीं देते। जिसने मेरे भाइयों को मारा है, मैं समझता हूँ वह कोई महान् प्राणी होगा। अच्छा, पहले मैं एकाग्रतापूर्वक इसके कारण का विचार करूँ अथवा जल पीने पर मुझे स्वयं ही इसका पता लग जायगा। ऐसा न हो कि हमलोगों से छिपे-छिपे कूटबुद्धि शकुनि के द्वारा दुर्योधन ने यह यह विषैला सरोवर बनवा दिया हो। किन्तु इसका जल विषैला भी नहीं जान पड़ता, क्योंकि मर जाने पर भी मेरे इन भाइयों के शरीर में कोई विकार नहीं जान पड़ता तथा इनके चेहरे का रंग भी खिला हुआ है। इनमें से प्रत्येक जल के प्रबल प्रवाह के समान महाबली हैं। इन पुरुषश्रेष्ठ का सामना भी साक्षात् यमराज के सिवा और कौन कर सकता है ?' यह सब सोचकर वे जल में उतरने को तैयार हुए। इसी समय उन्हें आकाशवाणी सुनायी दी। उसने कहा, 'मैं बगुला हूँ। मैने ही तुम्हारे भाइयों को मारा है। यदि तुम मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं दोगे तो पँचवें तुम भी इन्हीं के साथ सोओगे। हे तात ! साहस न करो। मेरा पहले ही से यह नियम है। तुम मेरे प्रश्नों का उत्तर दे दो। फिर जल पीना और ले भी जाना।' युधिष्ठिर ने कहा---यह काम पक्षी का तो हो नहीं सकता। अतः मैं आपसे पूछता हूँ कि आप रुद्र, वसु अथवा मरुत् आदि प्रधान देवताओं में से कौन हैं। यक्ष ने कहा---मैं करा जलचर पक्षी नहीं हूँ, मैं यक्ष हूँ। तुम्हारे ये महान् तेजस्वी भाई मैने ही मारे हैं।यक्ष की यह अमंगलमयी और कठोर वाणी सुनकर राजा युधिष्ठिर उसके पास जाकर खड़े हो गये। उन्होंने देखा कि एक विकट नेत्रोंवाला विशालकाय यक्ष वृक्ष के ऊपर बैठा है। वह बड़ा ही दुर्धर्ष, ताल के समान लम्बा, अग्नि के समान तेजस्वी और पर्वत के समान विशाल है; वही अपनी गम्भीर नादमयी वाणी से ललकार रहा है। फिर वह युधिष्ठिर से कहने लगा, 'राजन् ! तुम्हारे इन भाइयों को मैने बार-बार रोका था, फिर भी इन्होंने मूर्खता से जल ले जाना ही चाहा; इसी से मैने इन्हें मार डाला। यदि तुम्हें अपने प्राण बचाने हों तो यहाँ जल नहीं पीना चाहिये। यह स्थान पहले से ही मेरा है। मेरा यह नियम है कि पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, उसके बाद जल पीना और ले भी जाना।' युधिष्ठिर ने कहा---मैं आपके अधिकार की चीज को ले जाना नहीं चाहता। आप मुझसे प्रश्न कीजिये। कोई पुरुष स्वयं ही अपनी प्रशंसा करे, इस बात की सत्पुरुष बड़ाई नहीं करते। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार उनके उत्तर दूँगा। यक्ष ने पूछा---सूर्य को कौन उदित करता है ? उसे चारों ओर कौन चलते हैं ? उसे अस्त कौन करता है ? और वह किसमें प्रतिष्ठित है ? युधिष्ठिर बोले---ब्रह्म सूर्य को उदित करता है, देवता उसके चारों ओर चलते हैं। धर्म उसे अस्त करता है और वह सत्य में प्रतिष्ठित है। यक्ष ने पूछा---मनुष्य श्रोत्रिय किससे होता है ? महत् पद को किसके द्वारा प्राप्त करता है ? किसके द्वारा वह द्वीतीयमान् होता है ? और किससे बुद्धिमान् होता है ? युधिष्ठिर ने कहा--- श्रुति के द्वारा मनुष्य श्रोत्रिय होता है। तप से महत्पद प्राप्त करता है। धृति से द्वीतीयवान् होता है और वृद्ध पुरुषों की सेवा से बुद्धिमान् होता है। यक्ष ने पूछा--- ऐसा कौन सा पुरुष है जो इन्द्रियों के विषयों को अनुभव करते हुए, श्वास लेते हुए तथा बुद्धिमान्, लोक में सम्मानित और सब प्राणियों का माननीय होकर भी वास्तव में जीवित नहीं है। युधिष्ठिर ने कहा--- जो देवता, अतिथि, सेवक, माता-पिता और आत्मा---इन पाँचों का पोषण नहीं करता, वह श्वास लेने पर भी जीवित नहीं है। यक्ष ने पूछा--- पृथ्वी से भी भारी क्या है ? आकाश से भी ऊँचा क्या है ? वायु से भी तेज चलनेवाला क्या है ? और तिनकों से भी अधिक संख्या में क्या है ? युधिष्ठिर बोले-- माता भूमि से भी भारी (बढ़कर) है, पिता आकाश से भी ऊँचा है, मन वायु से भी तेज चलनेवाला है और चिन्ता तिनकों से भी बढ़कर है। यक्ष ने पूछा--- सो जाने पर पलक कौन नहीं मूँदता ? उत्पन्न होने पर चेष्टा कौन नहीं करता ? हृदय किसमें नहीं है ? और वेग से कौन बढ़ता है ? युधिष्ठिर ने कहा--- मछली सोने पर भी पलक नहीं मूँदती, अण्डा उत्पन्न होने पर भी चेष्टा नहीं करता। पत्थर में हृदय नहीं है और नदी वेग से बढ़ती है। यक्ष ने पूछा--- विदेश में जानेवाला का मित्र कौन है ? घर में रहनेवाला का मित्र कौन है ? युधिष्ठिर बोले--- साथ के यात्री विदेश में जाने के लिये मित्र हैं। वैद्य रोगी का मित्र है और दान मरनेवाले पुरुष का मित्र है। यक्ष ने पूछा--- समस्त प्राणियों का अतिथि कौन है ? सनातन धर्म क्या है ? अमृत क्या है ? और ये सारा जगत् क्या है ? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया---अग्नि समस्त प्राणियों का अतिथि है, गौ का दूध अमृत है, अविनाशी नित्य धर्म ही सनातन धर्म है और वायु यह सारा जगत् है। यक्ष ने पूछा--- अकेला कौन विचरता है ? एक बार उत्पन्न होकर पुनः कौन उत्पन्न होता है ? शीत की औषधि क्या है ? और महान् आवपन (क्षेत्र) क्या है ? युधिष्ठिर बोले-- सूर्य अकेला विचरता है, चन्द्रमा एक बार जन्म लेकर पुनः जन्म लेता है, अग्नि शीत की औषधि है और पृथ्वी बड़ा भारी आवपन है। यक्ष ने पूछा--- धर्म का मुख्य स्थान क्या है ? यश का मुख्य स्थान क्या है ? स्वर्ग का मुख्य स्थान क्या है ? और सुख का मुख्य स्थान क्या है ? युधिष्ठिर ने कहा--- धर्म का मुख्य स्थान दक्षता है, यश का मुख्य स्थान दान है, स्वर्ग का मुख्य स्थान सत्य है और सुख का मुख्य स्थान शील है। यक्ष ने पूछा--- मनुष्य का आत्मा क्या है ? उसका दैवकृत सखा कौन है ? उपजीवन ( जीने का सहारा ) क्या है ? और उसका परम आश्रय क्या है ? युधिष्ठिर बोले--- संतान मनुष्य की आत्मा है, स्त्री उसका दैवकृत सखा है, मेघ उपजीवन है और दान परम आश्रय है। यक्ष ने पूछा--- धन्यवाद के योग्य पुरुषों में उत्तम गुण क्या है ? धनों में उत्तम धन क्या है ? लाभों में प्रधान लाभ क्या है ? और सुखों में श्रेष्ठ सुख क्या है ? युधिष्ठिर बोले--- धन्य पुरुषों में दक्षता ही उत्तम गुण है, धनों में शास्त्रज्ञान प्रधान है, लाभों में आरोग्य प्रधान है और सुखों में संतोष श्रेष्ठ सुख है। यक्ष ने पूछा--- लोक में श्रेष्ठ धर्म क्या है ? नित्य फलवाला धर्म क्या है ? किसको वश में रखने से शोक नहीं होता ? और किनके साथ की हुई संधि नष्ट नहीं होती ? युधिष्ठिर बोले--- लोक में दया श्रेष्ठ धर्म है, वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है, मन को वश में रखने से शोक नहीं होता और सत्पुरुषों के साथ की हुई सन्धि नष्ट नहीं होती। यक्ष ने पूछा--- किस वस्तु को त्यागने से मनुष्य प्रिय होता है ? किसे त्यागने पर शोक नहीं करता ? किसे त्यागने पर वह अर्थवान् होता है ? और किसे त्यागकर सुखी होता है ? युधिष्ठिर बोले-- मान को त्यागने से मनुष्य प्रिय होता है, क्रोध को त्यागने पर शोक नहीं करता, काम को त्यागने पर वह अर्थवान् होता है और लोभ को त्यागकर सुखी होता है। यक्ष ने पूछा--- ब्राह्मण को किसलिये दान दिया जाता है ? नट और नर्तकों को क्यों दान देते हैं ? सेवकों को दान देने का क्या प्रयोजन है ? और राजा को क्यों दान दिया जाता है ? युधिष्ठिर ने कहा--- ब्राह्मण को धर्म के लिये दान दिया जाता है, नट-नर्तकों को यश के लिये दान ( इनाम ) देते हैं। सेवकों को भरण-पोषण के लिये दान ( वेतन ) दिया जाता है और राजा को भय के कारण दान ( कर ) देते हैं। यक्ष ने पूछा--- जगत् किस वस्तु से ढ़का हुआ है ? किसके कारण वह प्रकाशित नहीं होता ? मनुष्य मित्रों को किसलिये त्याग देता है ? और स्वर्ग में किस कारण से नहीं जाता ? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया--- जगत् अज्ञान से ढ़का हुआ है, तमोगुण के कारण वह प्रकाशित नहीं होता, लोभ के कारण मनुष्य मित्रों को त्याग देता है और आसक्ति के कारण स्वर्ग में नहीं जाता। यक्ष ने पूछा--- पुरुष किस प्रकार मरा हुआ कहा जाता है ? राष्ट्र किस प्रकार मरा हुआ कहलाता है ? श्राद्ध किस प्रकार मृत हो जाता है ? और यज्ञ कैसे मृत हो जाता है ? युधिष्ठिर बोले--- दरिद्र मनुष्य मरा हुआ है, बिना राजा का राज्य मरा हुआ है। श्रोत्रिय ब्राह्मण के बिना श्राद्ध मृत हो जाता है और बिना दक्षिणा का यज्ञ मरा हुआ है। यक्ष ने पूछा---दिशा क्या है ? जल क्या है ? अन्न क्या है ?  विष क्या है ? बताओ। युधिष्ठिर ने कहा--- सत्पुरुष दिशा है। आकाश जल है। गौ अन्न है ( क्योंकि गौ से दूध-घी और हव्य होता है, उससे हवन द्वारा वर्षा से अन्न होता है। और कामना विष है। यक्ष ने पूछा--- उत्तम क्षमा क्या है ? लज्जा किसे कहते हैं ? तप का लक्षण क्या है ? और दम क्या कहलाता है ? युधिष्ठिर ने कहा---द्वन्दों को सहना क्षमा है, न करनेवाले काम से दूर रहना लज्जा है, अपने धर्म में तप है और मन का दमन दम है। यक्ष ने पूछा--- राजन् ! ज्ञान किसे कहते हैं ? शम क्या कहलाता है ? दया किसका नाम है ? और आर्जव ( सरलता ) किसे कहते हैं ? युधिष्ठिर बोले---वास्तविक वस्तु को ठीक-ठीक जानना ज्ञान है, चित्त की शान्ति शम है, सबके सुख की इच्छा रखना दया है और समचित्त होना आर्जव ( सरलता ) है। यक्ष ने पूछा--- मनुष्यों का दुर्जय शत्रु कौन है ? अनन्त व्याधि क्या है ? साधु कौन माना जाता है ? और असाधु किसे कहते हैं ? युधिष्ठिर ने कहा--- क्रोध दुर्जय शत्रु है ; लोभ अनन्त व्याधि है; जो समस्त प्राणियों का हित करनेवाला हो, वह साधु है और निर्दय पुरुष असाधु है। यक्ष ने पूछा---राजन् ! मोह किसे कहते हैं ? मान क्या कहलाता है ? आलस्य किसे जानना चाहिये ? और शोक किसे कहते है ? युधिष्ठिर बोले--- धर्ममूढ़ता ही मोह है, आत्माभिमान ही मान है, धर्म न करना आलस्य है और अज्ञान शोक है। यक्ष ने पूछा--- ऋषियों ने स्थिरता किसे कहा है ? धैर्य क्या कहलाता है ? स्नान किसे कहते हैं ? और दान किसका नाम है ? युधिष्ठिर ने कहा---अपने धर्म में स्थिर रहना ही स्थिरता है, इन्द्रियनिग्रह धैर्य है, मानसिक मलों को छोड़ना स्नान है और प्राणियों की रक्षा करना दान है। यक्ष ने पूछा--- किस पुरुष को पण्डित समझना चाहिये ? नास्तिक कौन कहलाता है ? मूर्ख कौन है ? काम क्या है ? तथा मत्सर किसे कहते हैं। युधिष्ठिर ने कहा---धर्मज्ञ को पण्डित समझना चाहिये; मूर्ख नास्तिक कहलाता है और नास्तिक मूर्ख है, जो जन्म-मरण रूप संसार का कारण है; वह वासना काम है और हृदय का ताप मत्सर है। यक्ष ने पूछा--- अहंकार किसे कहते हैं ? दम्भ क्या कहलाता है ? जिसे परमदैव कहते हैं, वह क्या है ? और पैशुन्य किसका नाम है ? युधिष्ठिर बोले--- महान् अहंकार अज्ञान है, अपने को झूठमूठ बड़ा धर्मात्मा प्रसिद्ध करना दम्भ है, दान का फल दैव कहलाता है और दूसरों को दोष लगाना पैशुन्य ( चुगली ) है। यक्ष ने पूछा---धर्म, अर्थ और काम---ये परस्पर विरधी हैं। इन नित्य विरुद्धों का एक स्थान पर कैसे संयोग हो सकता है ? युधिष्ठिर ने कहा--- जब धर्म और भार्या परस्पर वशवर्ती हों तो धर्म, अर्थ और काम तीनों का संयोग हो सकता है। यक्ष ने पूछा--- भरतश्रेष्ठ ! अक्षय नरक किस मनुष्य को प्राप्त होता है ? युधिष्ठिर बोले--- जो मनुष्य भिक्षा माँगनेवाले को नहीं देता, वह अक्षय नरक प्राप्त करता है। यक्ष ने पूछा--- बताओ, मधुर वचन बोलनेवालों को क्या मिलता है ? सोच-विचारकर काम करनेवाला क्या पा लेता है ? जो बहुत-से मित्र बना लेता है, उसे क्या लाभ होता है ? और जो धर्मनिष्ठ है उसे क्या मिलता है ? युधिष्ठिर ने कहा--- मधुर वचन बोलनेवाला सबको प्रिय होता है; सोच-विचारकर काम करनेवालों को अधिकतर सफलता मिलती है; जो बहुत से मित्र बना लेता है वह सुख से रहता है और जो धर्मनिष्ठ है उसे सद्गति मिलती है। यक्ष ने पूछा--- सुखी कौन है ? आश्चर्य क्या है ? मार्ग क्या है ? और वार्ता क्या है ? मेरे इन चार प्रश्नों का उत्तर दो। युधिष्ठिर ने कहा---जिस पुरुष पर ऋण नहीं है और जो परदेश में नहीं है, वह दिन के पाँचवें या छठे भाग में भी अपने घर में कुछ साधारण भी बनाकर खा लें वही सुखी है। रोज-रोज प्राणी यमराज के घर जा रहे हैं; किन्तु जो बचे हुए हैं, वे सर्वदा जीते रहने की इच्छा करते हैं---इससे बढ़कर और क्या आश्चर्य होगा। तर्क की कहीं स्थिति नहीं है, श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, एक ही ऋषि नहीं है जिसका वचन प्रमाण माना जाय और धर्म का तत्व अत्यन्त गूढ़ है; अतः जिससे महापुरुष जाते रहे हैं वही मार्ग है। इस महमोह रूप कड़ाह में काल-भगवान् समस्त प्राणियों को मास और ऋतुरूप कलछी से उलट-पलटकर सूर्यरूप अग्नि और रात-दिन रू ईंधन के द्वारा राँध रहे हैं--यही वार्ता है। यक्ष ने पूछा--- तुमने मेरे सब प्रश्नों के ठीक-ठीक उत्तर दे दिये, अब तुम मनुष्य की भी व्याख्या कर दो और यह बताओ कि सबसे बड़ा धनी कौन है ? युधिष्ठिर बोले---जिस व्यक्ति के पुण्यकर्मों की कीर्ति का शब्द जहाँ तक स्वर्ग और भूमि को स्पर्श करता है, वहीं तक वह मनुष्य भी है। जिसकी दृष्टि में प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख और भूत-भविष्यत्---ये जोड़े समान हैं, वही सबसे धनी मनुष्य है। यक्ष ने कहा---राजन् ! जो सबसे धनी मनुष्य है, उसकी तुमने ठीक-ठीक व्याख्या कर दी; इसलिये अपने भाइयों में से जिस एक को तुम चाहो, वही जीवित हो सकता है। युधिष्ठिर बोले---यक्ष, यह जो श्यामवर्ण, अरुणनन, सुविशाल शालवृक्ष के समान ऊँचा और चौड़ी छातीवाला महाबाहु नकुल है, वही जीवत हो जाय। यक्ष ने कहा---राजन् ! जिसमें दस हजार हाथियों के समान बल है, उस भीम को छोड़कर तुम नकुल को क्यों जिलाना चाहते हो ? तथा जिसके बाहुबल का सभी पाण्डवों को पूरा भरोसा है उस अर्जुन को भी छोड़कर तुम्हे नकुल को जिला देने की इच्छा क्यों है ? युधिष्ठिर ने कहा--- यदि धर्म का नाश किया जाय तो वह नष्ट हुआ धर्म ही कर्ता को भी नष्ट कर देता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वही करा की भी रक्षा कर लेता है। इसी से मैं धर्म का त्याग नहीं करता, जिससे कि नष्ट होकर धर्म ही मेरा नाश न कर दे। मेरा ऐसा विचार है कि वस्तुतः सबके प्रति समान भाव रखना परम धर्म है। लोग मेरे विषय में समझते हैं कि राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं। मेरे पिता की कुन्ती और माद्री दो भार्याएँ थीं, वे दोनो ही पुत्रवती बनी रहें---ऐसा मेरा विचार है। मेरे लिये जैसी कुन्ती है, वैसी ही माद्री है; उन दोनो में कोई अन्तर नहीं है। मैं दोनो माताओं के प्रति समान भाव ही रखना चाहता हूँ, इसलिये नकुल ही जीवित हो। यक्ष ने कहा--- भरतश्रेष्ठ ! तुमने अर्थ और काम से भी समता का विशेष आदर किया है, इसलिये तुम्हारे सभी भाई जीवित हो जायँ।

Monday, 14 March 2016

वनपर्व---ब्राह्मण की अरणी लाने के लिये पाण्डवों का मृग के पीछे जाना तथा भीमसेनादि चारों भाइयों का एक सरोवर पर निर्जीव होकर गिरना

ब्राह्मण की अरणी लाने के लिये पाण्डवों का मृग के पीछे जाना तथा भीमसेनादि चारों भाइयों का एक सरोवर पर निर्जीव होकर गिरना

जयद्रथ द्वारा द्रौपदी के हरे जाने से अत्यन्त दुःखी होकर राजा युधिष्ठिर काम्यक वन छोड़कर भाइयों सहित पुनः द्वैतवन में ही आ गये। वहाँ सुस्वादु फल-मूलादि की प्रचुरता थी तथा तरह-तरह के वृक्षों के कारण वह बड़ा रमणीय जान पड़ता था। वहाँ वे मिताहारी होकर फलाहार करते हुए द्रौपदी के सहित रहने लगे। उस वन में एक ब्राह्मण के अरणी सहित मन्थन काष्ठ से एक हरिण सींग खुलजाने लगा। दैवयोग से वह काष्ठ उसके सींग में फँस गया। मृग कुछ बड़े डील-डौल का था। वह उसे लिये हुए उछलता-कूदता दूसरे आश्रम में पहुँच गया। यह देखकर वह ब्राह्मण अग्निहोत्र की रक्षा के लिये घबराकर जल्दी से पाण्डवों के पास गया। उसने भाइयों के साथ बैठे हुए महाराज युधिष्ठिर के पास आकर कहा, राजन् ! मैने अरणी के सहित अपना मन्थन काष्ठ पेड़ पर टाँग दिया था। उसमें एक मृग अपना सिर खुजलाने लगा, इससे वह उसके सिंग में फँस गया। वह विशाल मृग चौकड़ी भरता हुआ उसे लेकर भाग गया। सो आप उसके खुरों का चिह्न देखते हुए उसे पकड़िए और उसका मन्थनकाष्ठ ला दीजिये, जिससे मेरे अग्निहोत्र का लोप न हो।' उसकी बात सुनकर महाराज युधिष्ठिर को बहुत दुःख हुआ और वे भाइयोंसहित धनुष लेकर मृग के पीछे चले। सब भाइयों ने उसे बींधने का बहुत प्रयत्न किया। किन्तु वे सफल न हो सके तथा देखते-देखते वह उनकी आँखों से ओझल हो गया। उसे न देखकर वे हतोत्साह हो गये और उन्हें बहुत दुःख हुआ। घूमते-घूमते वे गहन वन में एक वट-वृक्ष के पास पहुँचे और भूख-प्यास से शिथिल होकर उसकी शीतल छाया में बैठ गये। तब धर्मराज ने नकुल से कहा, 'भैया ! तुम्हारे ये सब भाई प्यासे और थके हुए हैं। यहाँ पास ही कहीं जल या जलाशय के पास उत्पन्न होनेवाले वृक्ष हों तो देखो।' नकुल 'जो आज्ञा' कहकर वृक्ष पर चढ़ गये और इधर-उधर देखकर कहने लगे---'राजन् ! मुझे जल के पास लगनेवाले बहुत से वृक्ष दिखायी दे रहे हैं तथा सारसों का शब्द भी सुनायी देता है। इसलिये यहाँ अवश्य पानी होगा।' तब सत्यनिष्ठ युधिष्ठिर ने कहा, 'तो सौम्य ! तुम शीघ्र ही जाओ और तरकसों में पानी भर लाओ।' बड़े भाई की आज्ञा होने पर नकुल 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर बड़ी तेजी से चले और जल्दी ही जलाशय के पास पहुँच गये। वहाँ सारसों से घिरा हुआ बड़ा निर्मल जल देखकर वे ज्योंही पीने के लिये झुके कि उन्हें यह आकाशवाणी सुनायी दी, 'तात नकुल ! साहस न करो, पहले ही से मेरा एक नियम है। मेरे प्रश्नों का उत्तर दो। उसके बाद जल पीना और ले जाना।' किन्तु नकुल को बड़ी प्यास लगी हुई थी। उन्होंने उस वाणी की कोई परवा नहीं की। किन्तु ज्योंहि वह शीतल जल पीया कि उसे पीते ही वे भूमि पर गिर पड़े। नकुल को देर हुई देख कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने वीर सहदेव से कहा, 'सहदेव ! तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता भाई नकुल को गये बहुत देर हो गयी है। अतः तुम जाकर उन्हें लिवा लाओ और जल भी लेते आओ।' सहदेव भी 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर उसी दिशा में चले। वहाँ उन्होंने भाई नकुल को मृत अवस्था में पृथ्वी पर पड़े देखा। उन्हें भाई के लिये बड़ा शोक हुआ, किन्तु इधर प्यास भी पीड़ित कर रही थी। वे पानी की ओर चली। इसी समय आकाशवाणी ने कहा, 'तात सहदेव !  साहस न करो। पहले ही से मेरा एक नियम है। मेरे प्रश्नों का उत्तर दो। उसके बाद जल पीना और ले जाना।' सहदेव को बड़े जोर की प्यास लगी हुई थी। उन्होंने उस वाणी की कोई परवा नहीं की। किन्तु ज्यों ही उन्होंने वह शीतल जल पीया कि उसे पीते ही वे भूमि पर गिर गये। अब धर्मराज ने अर्जुन से कहा, 'शत्रुदमन अर्जुन ! तुम्हारे भाई नकुल-सहदेव गे हुए हैं। तुम उन्हें लिवा लाओ और जल भी ले आओ। भैया !  सब दुःखियों के तुम ही सहारे हो।' तब अर्जुन ने धनुष-वाण उठाया और तलवार म्यान से बाहर निकाली। इस प्रकार वे सरोवर पर पहुँचे।  किन्तु वहाँ उन्होंने देखा कि जल लेने के लिये आये हुए उनके दोनो भाई मरे पड़े हैं। इससे पुरुषसिंह पार्थ को बड़ा दुःख हुआ और वे धनुष चढ़ाकर उस वन में सब ओर देखने लगे। परन्तु उन्हें वहाँ कोई भी प्राणी दिखायी नहीं दिया। तब प्याससे शिथिल होने के कारण वे जल की ओर चले। इसी समय उन्हें यह आकाशवाणी सुनाई दी---'कुन्तीनन्दन ! तुम पानी की ओर क्यों जाते हो ? तुम जबर्दस्ती यह पानी नहीं पी सकोगे। यदि तुम मेरे पूछे हुए प्रश्नों का उत्तर दोगे तो ही जल पी सकोगे और ले भी जा सकोगे। ' इस प्रकार रोके जाने पर अर्जुन ने कहा, 'जरा प्रकट होकर रोको। फिर तो मेरे वाणों से विन्द्ध होकर ऐसा कहने का साहस ही नहीं कर सकोगे।'  ऐसा कहकर अर्जुन ने शब्दवेध का कौशल दिखाते हुए सारी दिशाओं को अभिमन्त्रित वाणों से वयाप्त कर दिया। तब यक्ष ने कहा, 'अर्जुन ! इस वृथा उद्योग से क्या होना है ? तुम मेरे प्रश्नों का उत्तर देकर जल पी सकते हो। यदि बिना उत्तर दिये पीओगे तो पीते ही मर जाओगे।' यक्ष के ऐसा कहने पर सव्यसाची अर्जुन ने उसकी कोई परवा नहीं की और वे जल पीते ही गिर गये। अब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा, 'भरतनन्दन ! नकुल, सहदेव और अर्जुन जल लाने के लिये बड़ी देर के गये हुए हैं, अभी तक नहीं लौटे। तुम उन्हें लिवा लाओ और जल भी ले आओ।' भीमसेन 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर उस स्थान पर आये, जहाँ कि उनके सब भाई मारे गये थे। उन्हें देखकर भीम को बड़ा दुःख हुआ।  इधर प्यास भी उन्हें बेतरह सता रही थी। उन्होंने समझा 'यह काम यक्ष-राक्षसों का है और आज मुझे उनसे अवश्य युद्ध करना पड़ेगा, इसलिये पहले पानी पी लूँ।' यह सोचकर वे प्यास से व्याकुल होकर जल की ओर चले। इतने में ही यक्ष बोल उठा, 'भैया भीमसेन ! साहस न करो। पहले ही से मेरा एक नियम है। मेरे प्रश्नों का उत्तर देकर तुम जल पी सकते हो और ले जा भी सकते हो।' अतुलित तजस्वी यक्ष के ऐसा कहने पर भी भीम ने उसके प्रश्नों का उत्तर दिये बिना ही जल पीया औरपीते ही वे भूमि पर गिर गये।

Friday, 11 March 2016

वनपर्व---इन्द्र को कवच-कुण्डल देकर कर्ण का अमोघ शक्ति प्राप्त करना

इन्द्र को कवच-कुण्डल देकर कर्ण का अमोघ शक्ति प्राप्त करना

एक दिन देवराज इन्द्र ब्राह्मण का रूप धारण कर कर्ण के पास आये और 'भिक्षां देहि' ऐसा कहा। इसपर कर्ण ने कहा, 'पधारिये, आपका स्वागत है। कहिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? ब्राह्मण ने कहा--आपके जो ये जन्म के साथ उत्पन्न हुए कवच और कुण्डल हैं, ये ही उतारकर हमें दे दीजिये। कर्ण ने कहा---विप्रवर ! मेरे साथ उत्पन्न हुए ये कवच और कुण्डल अमृतमय हैं। इनके कारण तीनों लोकों में मुझे कोई नहीं मार सकता। इसलिये इन्हें मैं अपने से विलग करना नहीं चाहता। इसलिये आप मुझसे विस्तृत और शत्रुहीन पृथ्वी का राज्य ले लीजिये, इन कवच और कुण्डलों को देकर तो मैं शत्रुओं का शिकार बन जाऊँगा। जब ऐसा कहनेपर भी इन्द्र ने दूसरा वर नहीं माँगा तो कर्ण ने हँसकर कहा, 'देवराज ! मैं आपको पहले ही पहचान गया हूँ। मैं आपको कोई वस्तु दूँ और उसके बदले में मुझे कुछ भी न मिले, यह उचित नहीं है। आप साक्षात् देवराज हैं; आपको भी मुझे कोई वर देना चाहिये। आप अनेकों अन्य जीवों के स्वामी और उनकी रचना करनेवाले हैं। देवेश्वर ! यदि मैं आपको कवच और कुण्डल दे दूँगा तो शत्रुओं का वध्य हो जाऊँगा और आपकी भी हँसी होगी। इसलिये कोई बदला देकर आप भले ही ये दिव्य कवच-कुण्डल ले जाइये; और किसी प्रकार मैं इन्हे दे नहीं सकता।' इन्द्र ने कहा---मैं तुम्हारे पास आनेवाला हूँ, यह बात सूर्य को मालूम हो गयी थी; निःसंदेह उन्होंने तुम्हे भी सब बातें बता दी होगी। सो, कोई बात नहीं; तुम जैसा चाहते हो, वैसा ही सही। तुम एक वज्र को छोड़कर मुझसे कोई भी चीज माँग सकते हो। कर्ण बोले---इन्द्रदेव ! आप इन कवच और कुण्डलों के बदले में मुझे अमोघ शक्ति दे दीजिये, जो संग्राम में अनेकों शत्रुओं का संहार कर देनेवाली है।तब शक्ति के विषय में थोड़ी देर विचार करके इन्द्र ने कहा, 'तुम मुझे अपने शरीर के साथ उत्पन्न हुए कवच और कुण्डल दे दो और मुझसे मेरी शक्ति ले लो। किन्तु इसके साथ एक शर्त है। वह यह कि मेरे हाथ से छूटने पर यह शक्ति अवश्य ही सैकड़ों शत्रुओं का संहार करती है और फिर मेरे ही हाथ में लौट आतूी है; सो ह जब तुम्हारे हाथ से छूटेगी तो जो गरज-गरजकर तुम्हें अत्यन्त संतप्त कर रहा होगा, ऐसे एक ही प्रबल शत्रु को मारकर फिर मेरे ही हाथ में आ जायगी।' कर्ण ने कहा---देवराज ! मैं भी केवल एक ही ऐसे शत्रु को मारना चाहता हूँ, जो घनघोर युद्ध में गरज-गरजकर मुझे संतप्त कर रहा हो और जिससे मुझे भय उत्पन्न हो गया हो। इन्द्र बोले---तुम युद्ध में एक गरजते हुए एक प्रबल शत्रु को मारोगे तो सही; किन्तु जिसे तुम मारना चाहते हो उसकी रक्षा तो भगवान् श्रीकृष्ण करते हैं, जिन्हें वेदज्ञ पुरुष अजित, वराहॆ और अचिन्त्य नारायण कहते हैं। कर्ण ने कहा---भगवन् ! भले ही ऐसी बात हो; तथापि आप मुझे एक वीर का नाश करनेवाली अमोघ शक्ति दीजिये, जिसे कि मैं अपने को संतप्त करनेवाले शत्रु का संहार कर सकूँ। इन्द्र बोले--- एक बात और है। यदि दूसरे शस्त्रों के रहते हुए और प्राणान्त संकट उपस्थित होने से पहले तुम प्रमादवश इस अमोघ शक्ति को छोड़ दोगे तो यह तुम्हारे ही ऊपर पड़ेगी। कर्ण ने कहा--- इन्द् ! आपके कथनानुसार मैं आपकी इस शक्ति को बड़े भारी संकट में ही पड़ने पर छोड़ूँगा, यह मैं सच-सच कहता हूँ। तब उस प्रज्जवलित शक्ति को लेकर कर्ण एक पैने शस्त्र से अपने समस्त अंगों को छीलकर अपने कवच उतारने लगे। उन्हें शस्त्र से अपना शरीर काटते और बार-बार मुस्कराते हुए देखकर देवतालोग दुंदुभियाँ बजाने लगे और दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। इस प्रकार अपने शरीर को उधेड़कर उन्होंने यवह खून से भीगा हुआ दिव्य कवच इन्द्र को दे दिया और दोनों कुण्डलों को भी कानों से काटकर उन्हें सौंप दिया। इस दुष्कर कर्म के कारण ही वे कर्ण कहलाये। इस प्रकार कर्ण को ठगकर और उन्हें संसार में यशस्वी बनाकर इन्द्र ने निश्चय किया कि अब पाण्डवों का काम सिद्ध हो गया। इसे पश्चात् वे हँसते-हँसते देवलोक को चले गये। जब धृतराष्ट्र के पुत्रों को कर्ण के ठगे जाने का समाचार मालूम हुआ तो वे बड़े ही दुःखी हुए और उनका सारा गर्व ढ़ीला पड़ गया तथा वनवासी पाण्डवों ने कर्ण को ऐसी परिस्थिति में पड़ा सुना तो वे बड़े प्रसन्न हुए।
 

Wednesday, 9 March 2016

वनपर्व---सूर्य द्वारा कुन्ती के गर्भ से कर्ण का जन्म और अधिरथ के यहाँ उसका पालन तथा विद्याध्ययन

सूर्य द्वारा कुन्ती के गर्भ से कर्ण का जन्म और अधिरथ के यहाँ उसका पालन तथा विद्याध्ययन

उन ब्राह्मणदेवता के चले जाने पर चे जाने पर मंत्रों के बलाबल के विषय में विचार करने लगी। उसने सोचा, 'उन महात्माजी ने मुझे कैसे मंत्र दिये हैं, मैं शीघ्र ही इनकी शक्ति की परीक्षा करूँगी।' एक दिन वह महल पर खड़ी हुई उदय होते हुए सूर्य  की ओर देख रही थी। उस समय उसकी दृष्टि दिव्य हो गयी और उसे दिव्यरूप कवच-कुण्डलधारी सूर्यनारायण के दर्शन होने लगे। उसी समय उसे मन में ब्राह्मण के दिये हुए मंत्रों की पीक्षा का कौतूहल हुआ। उसने विधिवत् आचमन और प्राणायाम करके सूर्यदेव का आह्वान किया। इससे तुरंत ही वे उसके पास आ गये। उनका शरीर मधु के समान पिंगलवर्ण था, भुजाएँ विशाल थीं, ग्रीवा शंख के समान थी, मुख पर मुस्कान की रेखा थी , भुजाओं पर बाजूबंद और सिर पर मुकुट था तथा तेज से सारा शरीर देदीप्यमान था। वे अपनी योगशक्ति से दो रूप धारण कर एक से संसार को प्रकाशित करते रहे और दूसरे से पृथा के पास आ गये। उन्होंने बड़ी मधुर वाणी से कुन्ती से कहा, 'भद्रे ! तेरे मंत्र की शक्ति से मैं बलात् से तेरे अधीन हो गया हूँ; बता मैं क्या करूँ ? अब तू जो चाहेगी, वही मैं करूँगा।' कुन्ती ने कहा---भगवन् ! आप जहाँ से आये हैं, वहीं पधार जाइये; मैने तो कौतूहल से ही आपका आह्वान किया था, इसके लिये आप मुझे क्षमा करें। सूर्य बोले--तन्वि ! तू मुझसे जाने को कहती है तो मैं चला तो जाऊँगा, परन्तु देवता का आह्वान करके उसे बिना कोई प्रयोजन सिद्ध किये लौटा देना न्यायानुकूल नहीं है। सुन्दरी ! तेरी ऐसी इच्छा थी कि 'सूर्य से मेरे पुत्र हो, वह लोक में अतुलित पराक्रमी हो और कवच तथा कुण्डल धारण किये हुए हो।' अतः तू मुझे अपना शरीर समर्पित कर दे; इससे तेरे, जैसा मेरा संकल्प था, वैसा ही पुत्र उत्पन्न होगा। कुन्ती बोली---रश्मिमालिन् ! आप अपने विमान पर बैठकर पधारिये। अभी मैं कन्या हूँ, इसलिेये ऐसा अपराध करना मेरे लिये बड़े दुःख की बात होगी। मेरे माता-पिता और जो दूसरे गुरुजन हैं, उन्हें ही इस शरीर को दान करने का अधिकार है। मैं धर्म का लोप नहीं करूँगी। लोक में स्त्रियों के सदाचार की पूजा होती है और वह सदाचार अपने शरीर को अनाचार से सुरक्षित रखना ही है। मैने मूर्खता से मन्त्र के बल की परीक्षा करने के लिये ही आपका आह्वान किया था, सो भगवन् ! मुझे बालिका जानकर यह अपराध क्षमा करें। सूर्य ने कहा---भीरु ! तू बालिका है, इसलिये मैं तेरी खुशामद कर रहा हूँ; किसी दूसरी स्त्री की मैं विनय नहीं करता। कुन्ती ! तू मुझे अपना शरीर दान कर दे, इससे तुझे शान्ति मिलेगी। कुन्ती बोली---देव ! मेरे माता, पिता तथा अन्य सम्बन्धी अभी जीवित हैं। उनके रहते हुए तो यह सनातन विधि का लोप ननहीं होना चाहिये। यदि आपके साथ मेरा यह शास्त्रविधि से विपरीत समागम हुआ तो मेरे कारण संसार में इस कुल की कीर्ति नष्ट हो जायगी। और यदि आप इसे धर्म मानते हैं तो अपने बन्धुजनों के दान न करने करने पर भी मैं आपकी इच्छा पूर्ण कर सकती हूँ। किन्तु आपको दुष्कर आत्मदान न करने पर भी मैं आपकी इच्छा पूर्ण कर सकती हूँ। किन्तु आपको दुष्कर आत्मदान करने पर भी मैं सती ही रहूँ; क्योंकि संसार में प्राणियों के धर्म, यश, कीर्ति और आयु आपही के ऊपर अवलम्बित है। सूर्य ने कहा---सुन्दरी ! ऐसा करने से तेरा आचरण अधर्ममय नहीं माना जायगा। भला, लोकों के हित की दृष्टिसे मैं भी अधर्म का आचरण कैसे कर सकता हूँ ? कुन्ती बोली---भगवन् ! यदि ऐसी बात है तो मुझसे आप जो पुत्र उत्पन्न करें वह जन्म से ही उत्तम कवच और कुण्डल पहने हुए हो तो मेरे साथ आपका समागम हो सकता है। किन्तु वह बालक पराक्रम, रूप, सत्व, ओज और धर्म से उत्पन्न होना चाहिये।  सूर्य ने कहा---राजकन्ये ! मेरी माता अदिति से मुझे जो कुण्डल और उत्तम कवच मिले हैं, वे ही मैं उस बालक को दूँगा। कुन्ती बोली---रश्मिमलिन् ! आप जैसा कह रहे हैं, यदि वैसा ही पुत्र मुझसे हो तो मैं बड़े प्रेम से आपके साथ सहवास करूँगी। तब भगवान् भास्कर ने अपने तेज से उसे मोहित कर दिया और योगशक्ति से उसे भीतर प्रवेश करके गर्भ स्थापित किया, उसके कन्यात्व को दूषित नहीं किया।  गर्भाधान हो जाने पर वह फिर सचेत हो गयी। इस प्रकार आकाश में जैसे चन्द्रमा उदित होता है , वैसे ही माघ शुक्ला प्रतिपदा के दिन पृथा के गर्भ स्थापित हुआ। उसके अन्तःपुर में रहनेवाली एक धाय के सिवा और किसी स्त्री को इसका पता नहीं चला। सुन्दरी पृथा ने यथासमय एक देवता के समान कान्तिमान् बालक उत्पन्न किया तथा सूर्यदेव की कृपा से वह कन्या ही बनी रही। वह बालक अपने पिता के समान ही शरीर पर कवच और कानों में सुवर्ण के उज्जवल कुण्डल पहने हुए था तथा उसके नेत्र सिंह के समान और कन्धे बैल के-से थे। पृथा ने धात्री से सलाह करके एक पिटारी मँगायी। उसमें अच्छी तरह से कपड़े बिछाये और ऊपर चारों ओर मोम चुपड़ दिया। फिर उसी में उस नवजात शिशु को लिटाकर ऊपर से ढ़क्कन लगाकर नदी में छोड़ दिया। उस समय कुन्ती ने रो-रोकर ये शब्द कहे, 'बेटा ! नभचर, स्थलचर और जलचर जीव तथा दिव्य प्राणी तेरा मंगल करें। तेरा मार्ग मंगलमय हो। शत्रु से तुझे कोई विघ्न न हो। जल में, जल के स्वामी वरुण तेरी रक्षा करें, आकाश में सर्वगामी पवन तेरा रक्षक हों तथा तेरे पिता सूर्यदेव सर्वत्र तेरी रक्षा करें। तू कभी विदेश में भी मिलेगा तो इन कवच और कुण्डलों से मैं तुझे पहचान लूँगी।' पृथा ने इसी प्रकार करुणापूर्वक बह विलाप किया और फिर अत्यन्त व्याकुल होकर धात्री के साथ राजमहल में लौट आयी। वह पिटारी तैरती-तैरती अश्र्वनदी से चर्मण्वती ( चम्बल ) नदी में गयी और उससे यमुना में पहुँच गयी। फिर वह यमुना में बहती-बहती गंगाजी में चली गयी और जहाँ अधिरथ सूत रहता था, उस चम्पापुरी में आ गयी। इस समय राजा धृतराष्ट्र का मित्र अधिरथ अपनी स्त्री के साथ गंगातट पर आया। राजन् ! उसकी स्त्री राधा संसार में अनुपम रूपवती थी, किन्तु उसके कोई पुत्र नहीं हुआ था। इसलिये वह पुत्रप्राप्ति के लिये विशेष रूप से यत्न करती रहती थी। दैवयोग से उसकी दृष्टि गंगाजी में बहती हुई पिटारी पर पड़ी। जब वह गंगाजी की तरंगों से टकराकर किनारे पर लग गयी तो उसने कुतूहलवश अधिरथ से कहकर उसे जल से बाहर निकलवाया। जब उसे औजारों से खुलवाया तो उसमें एक तरुण सूर्य के समान तेजस्वी बालक दिखायी दिया। वह सोने का कवच पहने हुए था तथा उसका मुख उज्जवल कुण्डलों की कान्ति से दिप रहा था। उस बालक को देखकर अधिरथ और उसकी स्त्री के नेत्र विस्मय से खिल उठे। अधिरथ ने उसे गोद में लेकर अपनी स्त्री से कहा, 'प्रिये ! मैने जबसे जन्म लिया है तबसे आज ही ऐसा विचित्र बालक देखा है। मैं तो ऐसा समझता हूँ यह कोई देवताओं का बालक हमारे पास आया है। मैं पुत्रहीन था, इसलिये अवश्य देवताओं ने ही मुझे यह पुत्र दिया है।' ऐसा कहकर उसने वह बालक राधा को दे दिया। राधा ने उस दिव्यरूप शिशु को विधिवत् ग्रहण किया और उसका नियमानुसार पालन करने लगी। इस प्रकार वह पराक्रमी बालक बड़ा होने लगा। उस बालक को वसुवर्म ( सोने का कवच ) और सुवर्णमय कुण्डल पहने देखकर ब्राह्मणों ने उसका नाम वसुषेण रखा। इस तरह वह अतुलित पराक्रमी बालक सूतपुत्र कहलाया और 'वृष' नाम से विख्यात हुआ। दिव्यकवचधारी होने से पृथा ने भी दूतों द्वारा मालूम करा लिया उसका श्रेष्ठ पुत्र अंगदेश में एक सूत के घर पल रहा है। अधिरथ ने जब देखा कि अब वह बड़ा हो गया है तो उसे वि्द्योपार्जन के लिये हस्तिनापुर भेज दिया। वहाँ वह द्रोणाचार्य के पास रहकर अ्त्रविद्या सीखने लगा। उसने द्रोण, कृप और परशुरामजी से चारों प्रकार के अस्त्रों का संचालन सीखा और इस प्रकार महान् धनुर्धर होक संपूर्ण लोकों में प्रसिद्ध हो गया। वह दुर्योधन से मेल करके सर्वदा पाण्डवों का अप्रिय करने में तत्पर रहता था और सदा ही अर्जुन से युद्ध करने की टोह में रहता था। राजन् ! निःसंदेह यही सूर्यदेव की गुप्त बात थी कि कर्ण का जन्म सूर्य द्वारा कुन्ती के उदर से हुआ था और पालन सूत परिवार में। कर्ण को कवच-कुण्डलयुक्त देखकर महाराज युधिष्ठिर उसे युद्ध में अवध्य ( अजेय ) समझते थे, और इसी से उन्हें चिन्ता रहती थी। महाराज ! कर्ण मध्याह्न के समय जल में खड़े होकर हाथ जोड़कर सूर्य की स्तुति किया करते थे।

Friday, 4 March 2016

वनपर्व---कर्ण की जन्म कथा---कुन्ती की ब्राह्मणसेवा और वरप्राप्ति

कर्ण की जन्म कथा---कुन्ती की 
ब्राह्मणसेवा और वरप्राप्ति

पुरानी बात है, एक बार राजा कुन्तिभोज के पास एक महान् तेजस्वी ब्राह्मण आया। उसका शरीर बहुत ऊँचा था तथा मूँछ-दाढ़ी और सिर के बाल बढ़े हुए थे। वह बड़ा ही दर्शनीय और भव्यमूर्ति था तथा हाथ में दण्ड लिये हुए था। उसका शरीर तेजसे दमक रहा था और मधु के समान पिंगलवर्ण था, वाणी मधुर थी तथा तप और स्वाध्याय ही उसके आभूषण थे। उन ब्राह्मणदेवता ने राजा से कहा, 'राजन् ! मैं आपके घर भिक्षा माँगने के लिये आया हूँ। किन्तु आपको या आपके सेवकों को मेरा कोई अपराध नहीं करनाहोगा। यदि आपकी रुचि हो तो इस प्रकार मैं आपके यहाँ रहूँगा और इच्छानुसार आता-जाता रहूँगा।'तब राजा कुन्तिभोज ने प्रेमपूर्वक उनसे कहा, 'महामते ! मेरी पृथा नाम की एक कन्या है। वह बडी सुशीला, सदाचारिणी, संयमशीला और भक्तिमति है। वही पूजा और सत्कारपू्र्वक आपकी सेवा किया करेगी। उसके शील-सदाचार से आपको अवश्य संतोष होगा।' ऐसा कहकर राजा ने विधिवत् उनका सत्कार किया और विशालनयना पृथा के पास जाकर कहा, 'बेटी ! ये महाभाग हमारे यहाँ ठहरना चाहते हैं और मैने तुझपर पूरा भरोसा रखकर इनकी बात स्वीकार कर ली है। अतः किसी भी प्रकार मेरी बात को झूठी मत होने देना। ये जो कुछ माँगे, वही चीज बिना अनखाये देती रहना। इस नगर में अथवा अन्तःपुर में ऐसा कोई पुरुष नहीं जान पड़ता, जो तुझसे असंतुष्ट हो। तू वृष्णिवंश में उत्पन्न हुई शूरसेन की लाडिली कन्या है। तूझे बचपन में ही प्रीतिपूर्वक राजा शूरसेन ने मुझे दत्तक रूप से दे दिया था। तू वसुदेवजी की बहिन है ऱ मेरी संतानों में सर्वश्रेष्ठ है। राजा शूरसेन ने ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि 'अपनी प्रथम संतान मैं आपको दूँगा।' उस प्रतिज्ञा के अनुसार ही उनके देने से तू मेरी पुत्री हुई। सो बेटी ! यदि तू दर्प, दम्भ और अभिमान को छोड़कर इन वरदायक ब्राह्मणदेवता की सेवा करोगी तो अवश्य कल्याण प्राप्त करोगी।' इसपर कुन्ती ने कहा---राजन् ! आपकी प्रतिज्ञा के अनुसार मैं बहुत सावधान रहकर इनकी सेवा करूँगी। कुन्ती के ऐसा कहने पर राजा कुन्तिभोज ने उसे बार-बार हृदय से लगाया और उसे उत्साहित करते हुए उसका सारा कर्तव्य समझा दिया। राजा ने कहा, 'ठीक है, कल्याणी ! तुझे निःशंक होकर ऐसा ही करना चाहिये।' उससे ऐसा कहकर परम यशस्वी कुन्तिभोज ने उन ब्राह्मणदेवता को वह कन्या सौंप दी और उनसे कहा 'ब्रह्मण् ! मेरी यह कन्या छोटी आयु की है और बहुत सुख में पली है। यदि इससे कोई अपराध हो जाय तो उसपर ध्यान न दें। इसके पश्चात् राजा ने उन्हें प्रसन्न होकर हंस और चन्द्रमा के समान श्वेत प्रासाद में रखा। वहाँ अग्निशाला में उनके लिये एक तेजस्वी आसन बिछाया गया तथा उसी प्रकार पूरी-पूरी उदारता से उन्हें भोजनादि की समस्त वस्तुएँ भी समर्पित की गयीं। राजपुत्री पृथा भी आलस्य और अभिमान को एक ओर रखकर उनकी परिचर्या में दत्तचित्त होकर लग गयी। उसका आचरण बड़ा सराहनीय था। उसने शुद्ध मन से सेवा करके उन तपस्वी ब्राह्मण को पूर्णता प्रसन्न कर लिया। उनके झिड़कने, बुरा-भला कहने तथा अप्रिय भाषण करे पर भी पृथा उनको अप्रिय लगनेवाला काम नहीं करती थी। उनका व्यवहार बड़ा अटपटा था। कभी वे अनियमित समय पर आते, कभी आते ही नहीं और कभी ऐसा भोजन माँगते, जिसका मिलना अत्यन्त कठिन होता। किन्तु पृथा उनके सब काम इसप्रकार कर देती मानो उसने पहले से ही उनकी तैयारी कर रखी हो। वह शिष्य, पुत्र और बहिन के समान उनकी सेवा में तत्पर रहती थी। उसके शील-स्वभाव और संयम से उन्हें बड़ा संतोष हुआ और वे उसके कल्याण के लिये पूरा प्रयत्न करने लगे। राजन् ! कुन्तिभोज सायंकाल और सबेरे दोनो समय पृथा से पूछा करते थे कि बेटी ! वे तुम्हारी सेवा से प्रसन्न है न ? यशस्विनी पृथा उन्हें यही उत्तर देती थी कि वे खूब प्रसन्न हैं। इससे उदारचित्त कुन्तिभोज को बड़ी प्रसन्नता होती थी। इस प्रकार एक वर्ष पूरा हो जाने पर जब उन विप्रवर को पृथा का कोई दोष दिखाई नहीं दिया तो वे बड़े प्रसन्न हुए और उससे कहे, 'कल्याणी ! तेरी सेवा से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तू मुझसे ऐसे वर माँग ले , जो इस लोक में मनुष्यों के लिये दुर्लभ है।' तब कुन्ती ने कहा, 'विप्रवर ! आप वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ हैं। आप और पिताजी मुझपर प्रसन्न हैं, मेरे सब काम तो इसी से सफल हो गये। अब मुझे वरों की कोई आवश्यकता नहीं है।' ब्राह्मण ने कहा--'भद्रे ! यदि तू कोई वर नहीं माँगती तो देवताओं का आह्वान करने के लिये मुझसे यह मंत्र ग्रहण कर ले। इस मंत्र से तू जिस देवता का आह्वान करेगी, वही तेरे अधीन हो जायगा। उसकी इच्छा हो अथवा न हो, इस मंत्र के प्रभाव से वह शान्त होकर सेवक के समान तेरे आगे विनीत हो जायगा। उनके ऐसा कहने पर पृथा शाप के भय से दूसरी बार उन्हें मना न कर सकी। तब उन्होंने उसे अथर्ववेद-शिरोभाग में आये मंत्रों का उपदेश दिया। पृथा को मंत्रदान करके उन्होंने कुन्तिभोज से कहा, 'राजन् ! 'मैं यहाँ बड़े सुख से रहा। तुम्हारी कन्या ने मुझे सब प्रकार संतुष्ट रखा। अब मैं जाऊँगा।' ऐसा कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये।



Thursday, 3 March 2016

वनपर्व---स्वप्न में ब्राह्मणवेषधारी सूर्यदेव की कर्ण को चेतावनी

स्वप्न में ब्राह्मणवेषधारी सूर्यदेव की कर्ण को चेतावनी

जब पाण्डवों के बारह वर्ष बीत गये और तेरहवाँ वर्ष आरम्भ हुआ तो पाण्डवों के हितैषी इन्द्र कर्ण से उनके कवच और कुण्डल माँगने को तैयार हुए। जब सूर्यदेव को इन्द्र का ऐसा विचार मालूम हुआ तो वे कर्ण के पास आये। सत्यवादी वीरवर कर्ण अत्यन्त निश्चिन्त होकर एक सुन्दर बिछौनेवाली बहुमूल्य सेज पर सोये हुए थे। सूर्यदेव पुत्रस्नेहवश अत्यन्त दयार्द्र होकर वेदवेत्ता ब्राह्मण के रूप में स्वप्नावस्था में उनके सामने आये और उनके हित के लिये समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे, 'सत्यवादियों में श्रेष्ठ महाबाहु कर्ण ! मैं स्नेहवश तुम्हारे परम हित की बात कहता हूँ, उसपर ध्यान दो। देखो, पाण्डवों का हित करने की इच्छा से देवराज इन्द्र ब्राह्मण के रूप में तुम्हारे पास कवच और कुण्डल माँगने के लिये आयेंगे। वे तुम्हारे स्वभाव को जानते हैं तथा सारे संसार को भी तुम्हारे इस नियम का पता है कि किसी सत्पुरुष के माँगने पर तुम उसकी अभीष्ट वस्तु दे देते हो और स्वयं कभी किसी से कुछ नहीं माँगते। किन्तु यदि तुम अपने जन्म के साथ ही उत्पन्न हुए इन कवच और कुण्डल को दे दोगे तो तुम्हारी आयु क्षीण हो जायगी और तुम्हारे ऊपर मृत्यु का अधिकार हो जायगा। तुम सच मानो, जबतक तुम्हारे पास ये कवच और कुण्डल रहेंगे, तुम्हे युद्ध में कोई भी शत्रु नहीं मार सकता। ये रत्नमय कवच-कुण्डल अमृत से उत्पन्न हुए हैं; इसलिये यदि तुम्हे प्राण प्यारे हैं तो इनकी अवश्य रक्षा करनी चाहिये।' कर्ण ने पूछा---भगवन् ! आप मेरे प्रति अत्यन्त स्नेह दिखाते हुए मुझे उपदेश कर रहे हैं। यदि इच्छा हो तो बताइये इस ब्राह्मण वेश में आप कौन हैं ? ब्राह्मण ने कहा---हे तात ! मैं सूर्य हूँ; मैं स्नेहवश ही तुम्हे ऐसी सम्मति दे रहा हूँ। तुम मेरी बात मानकर ऐसा ही करो। इसी में तुम्हारा विशेष कल्याण है। कर्ण बोले---जब स्वयं भगवान् भास्कर ही मुझे मेरे हित की इच्छा से उपदेश कर रहे हैं तो मेरा परम कल्याण तो निश्चित ही है; किन्तु आप मेरी यह प्रार्थना सुनने की कृपा करें। आप वरदायक देव हैं, आपको प्रसन्न रखते हुए मैं प्रेमपूर्वक यह निवेदन करता हूँ कि यदि आप मुझे प्यार करते हैं तो इस व्रत से मुझे विचलित न करें। सूर्यदेव ! संसार में मेरे इस व्रत को सभी लोग जानते हैं कि मैं श्रेष्ठ माँगनेवालों के माँगने पर अपने प्राण भी अवश्य दान कर सकता हूँ। यदि देवश्रेष्ठ इन्द्र पाण्डवों के हित के लिये ब्राह्मण का वेष धारण कर मरे पास भिक्षा माँगने के लिये आयेंगे तो मैं उन्हें ये दिव्य वच और कुण्डल अवश्य दे दूँगा। इससे तीनों लोकों में जो मेरा नाम हो रहा है, उसे बट्टा नहीं लगेगा। मेरे जैसे लोगों को यश की ही रक्षा करनी चाहिये, प्राणों की नहीं। संसार में यशश्वी होकर ही मरना चाहिये। सूर्य ने कहा---कर्ण ! तुम देवताओं की गुप्त बातें नहीं जान सकते। इसलिये इसमें जो रहस्य है, वह मैं तुम्हें नहीं बताना चाहता; समय आने पर तुम्हे वह स्वयं ही मालूम हो जायगा। किन्तु मैं तुमसे फिर भी कहता हूँ कि तुम माँगने पर भी इन्द्र को अपने कुण्डल मत देना, क्योंकि इन कुण्डलों से युक्त रहने पर तो अर्जुन और उसका सखा इन्द्र भी तुम्हें युद्ध में परास्त करने में समर्थ नहीं है। इसलिये यदि तुम अर्जुन को जीतना चाहते हो तो ये दिव्य कुण्डल इन्द्र को कदापि मत देना। कर्ण ने कहा---सूर्यदेव ! आपके प्रति जैसी मेरी भक्ति है, वह आप जानते ही हैं; तथा यह बात भी आपसे छिपी नहीं है कि मेरे लिये अदेय कुछ भी नहीं है। भगवन् ! आपके प्रति मेरा जैसा अनुराग है वैसा प्रेम तो स्त्री, पुत्र, शरीर और सुहृदों के प्रति भी नहीं है। इसमें भी संदेह नहीं कि महानुभावों का अपने भक्तों पर अनुराग रहा ही करता है। अतः इस नाते से आप जो मेरे हित की बात कर रहे हैं, उसके लिये मैं आपको सिर झुकाता हूँ और आपको प्रसन्न रखते हुए बार-बार यही प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरा अपराध क्षमा करें और मेरे इस वरत का अनुमोदन करें, जिससे कि याचना करने पर मैं इन्द्र को अपने प्राण भी दान कर सकूँ। सूर्य बोले---अच्छा, यदि तुम अपने ये दिव्य कवच और कुण्डल दो ही तो अपनी विजय के लिये उनसे यह प्रार्थना करना कि 'देवराज ! आप मुझे अपनी शत्रुओं का संहा करनेवाली अमोघ शक्ति दीजिये, तब मैं आपको कवच और कुण्डल दूँगा।' महाबाहो इन्द्र की वह शक्ति बड़ी प्रबल है। जबतक वह सैकड़ों हजारों शत्रुओं का संहार नहीं कर लेती तबतक छोड़नेवाले के हाथ में लौटकर नहीं आती। ऐा कहकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये। दूसरे दिन जप समाप्त करने के अनन्तर कर्ण ने ये सब बातें सूर्यनारायण से कहीं। उन्हें सुनकर भगवान् भास्कर ने मुस्कुराकर कहा, 'यह कोरा स्वप्न ही नहीं है, सब सच्ची घटना है।' तब कर्ण ने उन बातों को ठीक समझकर शक्ति पाने की इच्छा से इन्द्र की प्रतीक्षा करने लगे।