Monday, 11 December 2017

संजय का राजा धृतराष्ट्र को भीष्मजी के मुख से कही हुई श्रीकृष्ण की महिमा सुनाना

राजा धृतराष्ट्र ने पूछा___संजय ! पाण्डवों का ऐसा पराक्रम सुनकर मुझे बड़ा ही भय और विस्मय हो रहा है। सब ओर से मेरे पुत्रों का ही पराभव हो रहा है____यह सुनकर मुझे बड़ी चिन्ता होती है कि अब मेरे पक्ष की जीत कैसे होगी। निश्चय ही, विदुर के वाक्य मेरे हृदय को भष्म कर डालेंगे ! भीम अवश्य ही मेरे सब पुत्रों को मार डालेगा। मुझे ऐसा कोई वीर दिखायी नहीं देता, जो संग्रामभूमि में उनकी रक्षा कर सके। सूत ! मैं एक बार पूछता हूँ; ठीक_ठीक बताओ, पाण्डवों में ऐसी शक्ति कहाँ से आ गयी ? संजय ने कहा___राजन् ! आप सावधानी से सुनिये और सुनकर वैसा ही निश्चय कीजिये। इस समय जो कुछ हो रहा है, वह किसी भी मंत्र या माया के कारण नहीं है। बात यह है कि महाबली पाण्डवलोग सर्वदा धर्म में तत्पर रहते हैं और जहाँ धर्म होता है वहीं जय हुआ करती है। इसी से युद्घ में वे अवध्य हो रहे हैं और उन्हीं की जीत भी हो रही है। आपके पुत्र दुष्टचित्त, पापपरायण, निष्ठुर और कुकर्मी हैं; इसलिये वे युद्ध में नष्ट हो रहे हैं। इन्होंने नीच पुरुषों के समान पाण्डवों के प्रति अनेकों क्रूरताएँ की हैं। अब उन्हें उन निरन्तर किये हुए पापकर्मों का भयंकर फल प्राप्त होने का समय आया है। इसलिये पुत्रों के साथ अब आप भी उसे भोगिये। आपके सुहृद् विदुर, भीष्म, द्रोण और मैंने भी आपको बार_बार रोका; किन्तु आपने हमारी बात पर कुछ ध्यान ही नहीं दिया। जिस प्रकार मरणासन्न पुरुष को औषध और पथ्य अच्छे नहीं लगते, वैसे ही आपको अपने हित की बात अच्छी नहीं मालूम हुई। अब आप जो मुझे पाण्डवों की विजय का कारण पूछते हैं, सो मैं इस विषय में मैंने जैसा सुना है वह बताता हूँ। उस दिन अपने भाइयों को युद्ध में पराजित हुआ देख राजा दुर्योधन ने रात्रि समय भीष्मजी से पूछा, ‘ ‘दादाजी ! मैं समझता हूँ कि आप, द्रोणाचार्य, शल्य,  अश्त्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा, सुदक्षिण, भूरिश्रवा, विकर्ण और भगदत्त आदि महारथी तीनों लोकों के साथ संग्राम करने में समर्थ हैं। किन्तु आप सब मिलकर भी पाण्डवों के पराक्रम के सामने नहीं टिक पाते। यह देखकर मुझे बड़ा संदेह हो रहा है। कृपया बताइये, पाण्डवों में ऐसी क्या बात है जिसके कारण वे हमें क्षण_क्षण जीत रहे हैं ?’ भीष्मजी ने कहा___राजन् ! इन उदारकर्मा पाण्डवों की अवध्यता का एक कारण है; वह मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो। तीनों लोकों में ऐसा कोई भी पुरुष न तो है, न हुआ है और न होगा ही जो श्रीकृष्ण से सुरक्षित इन पाण्डवों को परास्त कर सके। इस विषय में पवित्रात्मा मुनियों ने एक इतिहास सुनाया है, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ। पूर्वकाल में गन्धमादन पर्वत पर समस्त देवता और मुनिगण पितामह ब्रह्माजी का सेवा में उपस्थित थे। उस समय उन सबके बीच में बैठे हुए ब्रह्माजीने आकाश में एक तेजोमय विमान देखा। तब उन्होंने ध्यान द्वारा सब रहस्य जानकर प्रसन्नचित्त से परमपुरुष परमेश्वर को प्रणाम किया। ब्रह्माजी को खड़े होते देख सब देवता और ऋषि भी हाथ जोड़े खड़े हो गये और वह अद्भुत प्रसंग देखने लगे। जगत्रष्टा ब्रह्मा ने बड़े विधि_विधान से भगवान् का पूजन किया और इस प्रकार स्तुति करने लगे___’प्रभो ! आप संपूर्ण विश्व को आच्छादित करनेवाले, विश्वस्वरूप और विश्व के स्वामी हैं। विश्व में सब ओर आपकी सेना है। यह विश्व आपका कार्य है। आप सबको अपने वश में रखने वाले हैं। इसलिये आपको विश्वेश्वर और वासुदेव कहते हैं। आप योगस्वरूप देवता हैं, मैं आपकी शरण में आया हूँ। विश्वरूप महादेव ! आपकी जय हो; लोकहित में लगे रहनेवाले परमेश्वर ! आपकी जय हो। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले योगीश्वर ! आपकी जय हो। योग के आदि और अन्त ! आपकी जय हो। आपकी नाभि से लोककमल की उत्पत्ति हुई है, आपके नेत्र विशाल हैं, आप लोकेश्वरों के भी ईश्वर हैं; आपकी जय हो। भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी आपकी जय हो। आपका स्वरूप सौम्य है, मैं स्वायम्भू ब्रह्मा आपका पुत्र हूँ। आप असंख्य गुणों के आधार और सबको शरण देनेवाले हैं, आपकी जय हो। आपकी महिमा का पार पाना बहुत_ही कठिन है, आपकी जय हो। आप समस्त कल्याणप्रद गुणों से सम्पन्न, विश्वमूर्ति एवं निरामय हैं; आपकी जय हो ! आप महान् श्रीनगर और महावराह_रूप धारण करनेवाले हैं, सबके आदि कारण हैं, किरणें ही आपके केश हैं। प्रभो ! आपकी जय हो, जय हो। आप किरणों के धाम, दिशाओं के स्वामी, विश्व के आधार, अप्रमाद और अविनाशी हैं। व्यक्त और अव्यक्त___सब आपही का स्वरूप है, आपके रहने का स्थान असीम___अनन्त है। आप इन्द्रियों के नियन्ता हैं, आपके सभी कर्म शुभ_ही_शुभ हैं। आप धर्म का तत्व जाननेवाले और विजयप्रदाता हैं। आप संपूर्ण भूतों के आदि का कारण और लोकतत्व के स्वामी हैं। आप स्वाभावतः संसार की सृष्टि में प्रवृत्त रहते हैं, आप ही संपूर्ण भावनाओं के स्वामी परमेश्वर हैं। अमृत की उत्पत्ति के स्थान, सत्स्वरूप, मुक्तात्मा और विजय देनेवाले आप ही हैं। देव, आप ही प्रजापतियों के पति, पद्मनाभ और महाबली हैं। आत्मा और महावीर भी आप ही हैं। सत्वस्वरूप परमेश्वर ! आपकी जय हो। पृथ्वीदेवी आपके चरण हैं, दिशाएँ बाहु हैं और ध्युलोक मस्तक है। देवता शरीर और चन्द्रमा तथा सूर्य नेत्र हैं। तप और सत्य आपका बल है तथा धर्म और कर्म आपका स्वरूप है। अग्नि आपका तेज, वायु साँस और जल पसीना है। अश्विनीकुमार आपके कान और सरस्वतीदेवी आपकी जिह्वा हैं। वेद आपकी संस्कारनिष्ठा हैं। यह जगत् आपही के आधार पर टिका हुआ है। योग_योगीश्वर ! हम न तो आपकी संख्या जानते हैं, न परिमाण। आपके तेज, पराक्रम और बल का भी हमें पता नहीं है। देव ! हम तो आपके भजन में लगे रहते हैं। आपके नियमों का पालन करते हुए आपकी ही शरण में पड़े रहते हैं। विष्णो ! सदा आप परमेश्वर एवं महेश्वर का पूजन ही हमारा काम है। आपकी ही कृपा से हमने पृथ्वी पर ऋषि, देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, पिशाच, मनुष्य, मृग, पक्षी तथा कीड़े_मकोड़े आदि की सृष्टि की है। पद्मनाभ ! विशाललोचन ! दुःखहारी श्रीकृष्ण ! आप ही संपूर्ण प्राणियों के आश्रय और नेता हैं, आप ही संसार के गुरु हैं। आपकी कृपादृष्टि होने से ही सब देवता सदा सुखी रहते हैं। देव ! आपके ही प्रसाद से पृथ्वी सदा निर्भय रही है, इसलिये विशाललोचन ! आप पुनः पृथ्वी पर यदुवंश में अवतार लेकर उसकी कीर्ति बढ़ाइये। प्रभो ! धर्म की स्थापना, दैत्यों के वध और जगत् की रक्षा के लिये हमारी प्रार्थना अवश्य स्वीकार कीजिये। भगवन् ! आपका जो परम गुह्य स्वरूप है, उसका इस समय आपही की कृपा से हमने कीर्तन किया है। तब ज्ञानरूप श्रीभगवान् ने अत्यन्त मधुर और गम्भीर वाणी में कहा, ‘तात ! तुम्हारी जो इच्छा है, वह मुझे योगबल से मालूम हो गयी है; वह पूर्ण होगी।‘ ऐसा कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये। यह देखकर देवता, गन्धर्व और ऋषियों को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने ब्रह्माजी से पूछा, ‘ भगवन् ! आपने जिनकी ऐसे श्रेष्ठ शब्दों में स्तुति की, वे कौन थे ? उनके विषय में हम कुछ सुनना चाहते हैं।‘ तब भगवान् ब्रह्मा ने,मधुर वाणी में कहा, “ये स्वयं परब्रह्म थे, जो समस्त भूतों के आत्मा, प्रभु और परमपदस्वरूप हैं। मैंने संसार के कल्याण के लिये उनसे प्रार्थना की है कि ‘ आपने जिन दैत्य, जानवरों और राक्षसों का संग्राम में वध किया था, वे इस समय मनुष्ययोनि में उत्पन्न हुए हैं; अत: आप उनके वध के लिये मनुष्य रूप में उत्पन्न होइये।‘ सो अब वे नर_नारायण दोनों ही मनुष्यलोक में जन्म लेंगे, किन्तु मूढ़ पुरुष इन्हें पहचान नहीं सकेंगे। वे शंख_चक्र_गदाधारी वासुदेव संपूर्ण लोकों के महेश्वर हैं। ये, मनुष्य हैं___ऐसा समझकर इनका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। ये ही परम गुह्य हैं, ये ही परम पद हैं, ये ही परमब्रह्म हैं, ये ही परम यश हैं और ये ही अक्षर, अव्यक्त एवं सनातन तेज हैं। ये ही पुरुष_नाम से प्रसिद्ध हैं तथा ये ही परम सुख और परम सत्य हैं। अतः अपने सुहृदों को अभय करनेवाले इन किरीट_कौस्तुभधारी श्रीहरि का जो तिरस्कार करेगा, वह भयंकर अंधकार में पड़ेगा।“ भीष्मजी कहते हैं___ देवता और ऋषियों से ऐसा कहकर श्रीब्रह्माजी उन्हें विदा कर अपने लोक को चले गये और वे सब स्वर्ग में चले गये। एक बार कुछ पवित्रात्मा मुनिगण श्रीकृष्ण के विषय में चर्चा कर रहे थे; उन्हीं के मुख से मैंने यह प्राचीन प्रसंग सुना था। यही बात मैंने जमदग्निनन्दन परशुराम, मतिमान् मार्कण्डेय और व्यास तथा नारदजी से भी सुनी है। यह सब जानकर हमारे लिये श्रीकृष्ण वन्दनीय और पूजनीय क्यों नहीं है। हमें तो अवश्य इनका पूजन करना चाहिये। मैंने और अनेकों वेदवेत्ता मुनियों ने भी तुम्हें बार_बार श्रीकृष्ण और पाण्डवों के संसार युद्ध ठाननेसेे रोका था; किन्तु मोहवश तुमने इसका कोई तत्व ही नहीं समझा। मैं तुम्हें कोई क्रूरकर्मा राक्षस ही समझता हूँ; क्योंकि तुम श्रीकृष्ण और अर्जुन से द्वेष करते हो। भला, इन साक्षात् नर और नारायण से कोई दूसरा मनुष्य कैसे द्वेष कर सकता है ? मैं तुमसे ठीक_ठीक कहता हूँ___ये सनातन, अविनाशी, सर्वलोकमय, नित्य, जगदीश्वर और अविकारी हैं। ये ही युद्ध करनेवाले हैं। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं जय है। श्रीकृष्ण पाण्डवों की रक्षा करते हैं, इसलिये उन्हीं की जय भी होगी। दुर्योधन ने पूछा___दादाजी ! इन वसुदेवपुत्र को संपूर्ण लोकों में महान् बताया जाता है। अतः मैं इनकी उत्पत्ति और स्थिति के विषय में जानना चाहता हूँ। भीष्मजी बोले___भरतश्रेष्ठ ! वासुदेवनन्दन निःसंदेह महान् हैं। ये सब देवताओं के भी देवता हैं। कमलनयन श्रीकृष्ण से  बड़ा और कोई भी नहीं है। मार्कण्डेयजी इनके विषय में बड़ी अद्भुत बातें कहते हैं। वे सर्वभूतमय और पुरुषोत्तम हैं। सृष्टि के आरम्भ में इन्होंने ही संपूर्ण देवता और ऋषियों को रचा था तथा ये ही सबकी उत्पत्ति और प्रलय के स्थान हैं। ये स्वयं धर्म रूप तथा धर्मज्ञ, वरदायक और संपूर्ण कामनाओं की पूर्ति करनेवाले हैं। ये ही कर्ता, कार्य, आदिदेव और स्वयंप्रभु हैं। भूत, भविष्यत् और वर्तमान की भी इन्होंने कल्पना की है तथा इन्होंने दोनों सन्ध्याओं, दिशाओं, आकाश और नियमों को रचा है। अधिक क्या, ये अविनाशी प्रभु ही संपूर्ण जगत् की रचना करनेवाले हैं। इन परम तेजस्वी प्रभु को केवल वास्तविक से ही जाना जा सकता है।  श्रीहरि ही वराह, नृसिंह और भगवान् त्रिविक्रम हैं। ये ही समस्त प्राणियों के माता_पिता हैं। इन श्रीनयनकमल भगवान् से बढ़कर कोई दूसरा तत्व न कभी था, न होगा ही। इन्होंने अपने मुख से ब्राह्मणों को, भुजाओं से क्षत्रियों को, जंघाओं से वैश्यों को और पैरों से शूद्रों को उत्पन्न किया है। ये ही संपूर्ण भूतों के आश्रय हैं। जो पुरुष पूर्णिमा और अमावस्या के दिन इनका पूजन करता है, वह परम पद प्राप्त करता है। ये परम तेजस्वरूप और समस्त लोकों के पितामह हैं। मुनिजन इन्हें हृषिकेश कहते हैं। ये ही सबके सच्चे आचार्य, पिता और गुरु हैं। जिस पर ये प्रसन्न हैं, उसने मानो सभी अक्षयलोक जीत लिये हैं। जो राजन् ! पूर्वकाल में ब्रह्मर्षि और देवताओं ने इनका जो ब्रह्मांड स्रोत कहा है, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ; सुनो___'नारदजी ने कहा है___ आप साध्यगण और देवताओं के भी देवाधिदेव हैं तथा सम्पूर्ण लोकों में विचरनेवाला और उनके अंतःकरण के साक्षी हैं। मार्कण्डेयजी ने कहा है___आप ही भूत, भविष्यफल और वर्तमान हैं तथा आप ही यज्ञों के यज्ञ और तपों के तप हैं। भृगुजी कहते हैं___ आप इन्द्र को भी स्थापित करनेवाले और देवताओं के परम देव हैं। देवल मुनि कहते हैं___अव्यक्त आपके शरीर से हुआ है, व्यक्त आपके मन में स्थित है और सब देवता भी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। अगस्त मुनि का कथन है___आपके सिर से स्वर्गलोक व्याप्त है और आपदाओं से पृथ्वी तथा आपके उदर में तीनों लोक हैं। आप सनातन पुरुष हैं। तपःशुद्ध महात्मालोग आपको ऐसे ही समझते हैं तथा आत्मतृप्त ऋषियों की दृष्टि में भी आप सर्वोत्कृष्ट सत्य हैं। मधुसूदन ! जो संपूर्ण धर्मों में अग्रगण्य और संग्राम से पीछे हटनेवाले नहीं है, उन उदारहृदय राजर्षियों के परमाश्रय भी आप ही हैं। योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ सनत्कुमारादि इसी प्रकार श्रीपुरुषोत्तम भगवान् का सदा पूजन और स्तवन करते हैं। राजन् ! इस तरह विस्तार और संक्षेप से मैंने तुम्हें श्रीकृष्ण का स्वरूप सुना दिया। अब तुम प्रसन्नचित्त से उनका भजन करो। संजय कहते है__महाराज ! भीष्मजी के मुख से यह पवित्र आख्यान सुनकर तुम्हारे पुत्र के हृदय मंगलमय श्रीकृष्ण और पाण्डवों के प्रति बड़ा आदरभाव हो गया। फिर उससे पितामह कहने लगे, ‘राजन् ! तुमने महात्मा श्रीकृष्ण की महिमा सुनी तथा अर्जुन का वास्तविक स्वरूप भी जान लिया। तुम्हें यह भी मालूम हो गया कि इन नर_नारायण ऋषियों ने किस उद्देश्य से अवतार लिया है। ये युद्ध में अजेय और अवध्य हैं तथा पाण्डवलोग भी युद्ध में किसी के द्वारा मारे नहीं जा सकते; क्योंकि श्रीकृष्ण पर इनका बड़ा सुदृढ़ अनुराग है।  इसलिये मेरा तो यही कहना है कि तुम्हें पाण्डवों के साथ सन्धि कर लेना चाहिये। ऐसा करके तुम आनन्द से अपने भाइयों के सहित राज्य भोगो। नहीं तो इन नर_नारायण भगवान् की अवज्ञा करके तुम जीवित नहीं रह सकोगे।‘ राजन् ! ऐसा कहकर आपके पितृव्य भीष्मजी मौन हो गये और दुर्योधन को विदा करके शैय्या पर लेट गये। दुर्योधन भी उन्हें प्रणाम करके अपने शिविर में चला आया और अपने शुभ्र_शय्या पर सो गया।

Tuesday, 19 September 2017

सांयमनिपुत्र और कुछ धृतराष्ट्रपुत्रों का वध तथा घतोत्कच और भगदत्त का युद्ध

संजय ने कहा___राजन् ! रात बीतने पर चौथे दिन प्रातःकाल ही भीष्मजी बड़े क्रोध में भरकर सारी सेना के सहित शत्रुओं के सामने आये। उस समय द्रोणाचार्य, दुर्योधन, बाह्लीक, दुर्मर्षण, चित्रसेन, जयद्रथ और अनेकों दूसरे राजालोग उनके साथ_साथ चल रहे थे। भीष्मजी ने  सीधे अर्जुन पर ही निशाना किया तथा उनके साथ द्रोणाचार्यादि सभी वीर एवं कृपाचार्य, शल्य, विविंशति, दुर्योधन और भूरिश्रवा भी उन्हीं पर टूट पड़े। यह देखते ही सर्वशस्त्रज्ञ अभिमन्यु उनके सामने आया। उसने सब महारथियों के सब अस्त्र_शस्त्र काट डाले और रणांगण में शत्रुओं के खून की नदी बहा दी। भीष्मजी ने अभिमन्यु को छोड़कर अर्जुन पर आक्रमण किया। किन्तु किरीटी ने मुसकराकर अपने गाण्डीव धनुष द्वारा छोड़े हुए बाणों से उनके शस्त्रसमूह को  नष्ट कर दिया और उन पर बड़ी फुर्ती से बाण बरसाना आरम्भ किया। तब भीष्मजी ने अपने बाणों से अर्जुन के शस्त्रों को नष्ट कर दिया। इस प्रकार कुरु और संजयवीरों ने भीष्म और अर्जुन का वह अद्भुत द्वन्दयुद्ध देखा। इधर अभिमन्यु को द्रोणपुत्र अश्त्थामा,भूरिश्रवा , शल्य  चित्रसेन और सांयमनि के पुत्र ने घेर लिया। उन पाँच पुरुषसिंहों के साथ अकेला युद्ध करता हुआ अभिमन्यु ऐसा जान पड़ता था मानो कोई शेर का बच्चा पाँच हाथियों से लड़ रहा हो। निशाना लगाने की सफाई, शूरवीरता, पराक्रम और फुर्ती  में  कोई भी वीर अभिमन्यु की बराबरी नहीं कर सकता था। राजन् ! जब आपके पुत्रों ने देखा कि सेना बड़ी तंग आ गयी है तो उन्होंने अभिमन्यु को चारों ओर से घेर लिया। परंतु अपने तेज और बल के कारण अभिमन्यु ने तनिक भी हिम्मत नहीं हारी। वह निर्भय होकर कौरवों की सेना के सामने आकर डट गया। उसने एक बाण से अश्त्थामा को और पाँच से शल्य को घायल कर आठ बाणों द्वारा सांयमनि के पुत्र की ध्वजा काट दी। फिर भूरिश्रवा की छोड़ी हुई एक सर्प के समान प्रचण्ड शक्ति को अपनी ओर आती देख उसे भी एक पैने बाण से काट डाला। इस समय शल्य बड़े वेग से बाण_बर्षा कर रहे थे। अभिमन्यु ने उसे रोककर उनके चारों घोड़े मार डाले। इस प्रकार भूरिश्रवा, शल्य, अश्त्थामा, सांयमनि और शल___इनमें से कोई भी अभिमन्यु के आगे नहीं टिक सका। अब दुर्योधन की आज्ञा से त्रिगर्त, मद्र और केकय देश के पचास हजार वीरों ने अर्जुन और अभिमन्यु को घेर लिया। यह देखकर पांचालराजकुमार धृष्टधुम्न अपनी सेना लेकर बड़े क्रोध से मद्र और केकय देश के वीरों पर टूट पड़ा। उसने दस बाणों से दस मद्रदेशीय वीरों को, एक से कृतवर्मा के पृष्ठरक्षक को और एक से कौरव के पुत्र दमन को मार डाला। इतने में ही सांयमनि के पुत्र ने दस बाणों से धृष्टधुम्न को और दस से उसके सारथि को बींध दिया। तब धृष्टधुम्न ने अत्यन्त पीड़ित होकर एक पैने बाण से सांयमनि पुत्र की धनुष काट डाला और पच्चीस बाण छोड़कर उसके घोड़ों को और रथ के इधर_उधर रहनेवाले सारथियों को मार गिराया। सांयमनिपुत्र तलवार लेकर रथ से कूद पड़ा और बड़ी तेजी से पैदल ही रथ में बैठे हुए अपने शत्रु के पास पहुँचा। यह देखकर धृष्टधुम्न ने क्रोध में भरकर गदा के प्रहार से उसका सिर फोड़ दिया। गदा की चोट से ज्योंही वह पृथ्वी में गिरा कि उसके हाथ से वह तलवार और ढ़ाल भी छूटकर दूर जा पड़ी।  इस प्रकार उस महारथी राजकुमार के मारे जाने से आपकी सेना में बड़ा हाहाकार होने लगा। तब सांयमनि ने अपने पुत्र को मरा हुआ देखा तो वह अत्यन्त क्रोध में भरकर धृष्टधुम्न की ओर चला। वे दोनों वीर आमने_सामने आकर रणांगण में भिड़ गये तथा कौरव पाण्डव तथा समस्त राजालोग उनका युद्ध देखने लगे। सांयमनि ने क्रोध में भरकर धृष्टधुम्न को तीन बाण मारे तथा दूसरी ओर से शल्य ने भी उस पर प्रहार किया। शल्य के नौ बाण लगने से धृष्टधुम्न को बड़ी व्यथा हुई, तब उसने क्रोध में भरकर फौलाद के बाणों से मद्रराज की नाक में दम कर दिया। कुछ देर तक उन दोनों महारथियों का युद्ध समानरूप से चलता रहा; उनमें किसी की भी न्यूनाधिकता मालूम नहीं हुई। इतने में ही महाराज शल्य ने एक पैने बाण से धृष्टधुम्न का धनुष काट डाला तथा उसे बाणों से आच्छादित कर दिया यह देखकर अभिमन्यु बड़े क्रोध में भरकर मद्रराज के रथ की ओर दौड़ा तथा बड़े तीखे बाणों से उन्हें बींधने लगा। तब दुर्योधन, विकर्ण, दुःशासन, विविंशति, दुर्घर्ष, दुःसह, चित्रसेन, दुर्मुख, सत्यव्रत और पुरुमित्र___ये सब योद्धा मद्रराज की रक्षा करने लगे। किन्तु भीमसेन, धृष्टधुम्न, द्रौपदी के पाँच पुत्र, अभिमन्यु और नकुल_सहदेव ने इन्हें रोक लिया। ये सब वीर बड़े उत्साह से आपस में युद्ध करने लगे। इन दोनों पक्षों के दस_दस रथियों का भयंकर युद्ध आरम्भ होने पर उसे आपके और पाण्डवों के पक्ष के दूसरे रथी दर्शकों की तरह देखने लगे। दुर्योधन ने अत्यन्त क्रोध में भरकर चार तीखे बाणों से धृष्टधुम्न को बींध दिया तथा दुर्मर्षण ने बीस, चित्रसेन ने पाँच, दुर्मुख ने नौ, दुःसह ने सात, विविंशति ने पाँच और दुःशासन ने तीन बाण छोड़कर उसे घायल किया। तब धृष्टधुम्न ने भी अपने हाथ की सफाई दिखाते हुए उन में से प्रत्येक को पचीस_पचीस बाण मारे तथा अभिमन्यु ने दस_दस बाणों से सत्यव्रत और पुरुमित्र को बींध दिया। नकुल और सहदेव ने अचरज सा दिखाते हुए अपने मामा शल्य पर तीखे_तीखे बाण चलाये। तब शल्य मे भी अपने भानजों पर अनेकों बाण छोड़े, किन्तु माद्रीकुमार नकुल और सहदेव बाणों से बिलकुल ढक जाने पर भी अपने स्थान से नहीं डिगे। भीमसेन ने जब दुर्योधन को अपने सामने देखा तो सारे झगड़े का अंत कर देने के लिये एक गदा उठायी। भीमसेन को गदा धारण किये देख आपके सब पुत्र डरकर भाग गये। तब दुर्योधन ने क्रोध में भरकर मगधराज को उसकी दस हजार गजारोही सेना के सहित आगे करके भीमसेन पर धावा किया। बस, भीमसेन रथ से खरीदकर अपनी गदा से हाथियों को कुचलते हुए रणक्षेत्र में विचरने लगे। उस समय भीमसेन की दिल को दहला देनेवाली दहाड़  सुनकर सब हाथी सुन्न_से हो गये। तब द्रौपदी के पुत्र, अभिमन्यु, नकुल, सहदेव और धृष्टधुम्न___ये पाण्डवपक्ष के वीर भीमसेन की पीछे से रक्षा करते हुए अपने पैने बाणों से मागधी सेना के गजारोही वीरों को सिर काटने लगे। यह देखकर मगधराज ने अपने ऐरावत के समान विशालकाय हाथी को अभिमन्यु के रथ की तरफ किया। किन्तु वीर अभिमन्यु  ने एक ही बाण में उस हाथी का काम तमाम कर दिया और एक ही बाण से वाहनहीन मगधराज का सिर उड़ा दिया। भीमसेन भी उस गजारोही सेना में घूम_घूमकर हाथियों को मारने लगे। उस समय हमने भीमसेन के एक_एक प्रहार से ही हाथियों को लोटपोट होते देखा था। क्रोधातुर भीमसेन की चोट खाकर वे हाथी भय से इधर_उधर भागकर आपकी ही सेना को रौंदे डालते थे। उस समय अपनी गदा को सब ओर घुमाते हुए भीमसेन ऐसे जान पड़ते थे, मानो साक्षात् शंकर ही रणांगण में नृत्य कर रहे हों। इसी समय हजारों रथियों सहित आपके पुत्र नन्दक ने अत्यन्त कुपित होकर भीमसेन पर आक्रमण किया।
उसने भीमसेन पर छः बाण छोड़े तथा दूसरी ओर दुर्योधन ने नौ बाणों से उसके वक्ष_स्थल पर वार किया। तब महाबाहु भीम अपने रथ पर  चढ़ गये और अपने सारथि विशोक से बोले, ‘देखो, ये महारथी धृतराष्ट्रपुत्र मेरे प्राणों के ग्राहक होकर आये हैं, सो मैं तुम्हारे सामने ही इनका सफाया कर दूँगा। इसलिये तुम सावधानी से मेरे घोड़ों को इनके सामने ले चलो।‘ सारथि से ऐसा कहकर उन्होंने तीन बाण नन्दक की छाती में मारे। इधर दुर्योधन ने भी साठ बाणों से भीमसेन को और तीन से उनके सारथि को घायल कर दिया। फिर तीन पैने बाण छोड़कर उसने हँसते_हँसते उनका धनुष भी काट डाला। तब भीमसेन ने एक दूसरा दिव्य धनुष लिया और उस पर एक तीखा बाण चढ़ाया और उससे दुर्योधन का धनुष काट डाला। दुर्योधन ने भी तुरंत ही एक दूसरा धनुष लिया और उससे एक भयंकर बाण छोड़कर भी भीमसेन की छाती पर चोट की। उस बाण से व्यथित होकर भीमसेन रथ के पिछले भाग में बैठ गये और उन्हें मूर्छा हो गयी। भीमसेन को मूर्छित देखकर अभिमन्यु आदि पाण्डवपक्ष के महारथी असहिष्णु हो उठे और दुर्योधन केे सिर पर पैने_पैने शस्त्रों की भीषण वर्षा करने लगे। इतने में ही भीमसेन को चेत हो गया। उन्होंने दुर्योधन पर पहले तीन और फिर पाँच बाण छोड़े। इसके बाद पच्चीस बाण राजा शल्य को मारे। उनसे घायल होकर मद्रराज मैदान छोड़कर चले गये। तब आपके चौदह पुत्र सेनापति, सुषेण, जलसन्ध, उग्र, भीमरथ, भीम, बीरबाहु, अलोलुप, दुर्मुख, दुष्प्रधर्ष, विवित्सु, विकट और सम भीमसेन के ऊपर चढ़ आये। उनके नेत्र क्रोध से लाल हो रहे थे। उन्होंने एक साथ ही बहुत से बाण छोड़कर भीमसेन को घायल कर दिया। आपके पुत्रों को अपने सामने देखकर महाबली भीमसेन उन पर इस प्रकार टूट पड़े, जैसे भेड़िया. पशुओं पर टूटता है, फिर उन्होंने गरुड़ के समान लपककर एक पैने बाण से सेनापति का सिर काट डाला, तीन बाणों से जलसंध को घायल करके यमपुर भेज दिया, सुषेण को मारकर मृत्यु के हवाले कर दिया, उसका मुकुट और कुण्डलों से विभूषित सिर काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया तथा सत्तर बाणों से वीरबाहु को उसके घोड़े, ध्वजा और सारथि के सहित धराशायी कर दिया। इसी तरह उन्होंने भीम, भीमरथ और सुलोचन को भी सेनानियों के देखते_देखते यमराज के घर भेज दिया। भीमसेन का ऐसा प्रबल पराक्रम देखकर आपके शेष पुत्र डर के मारे इधर_उधर भाग गये। तब भीष्मजी ने सब सैनिकों से कहा, ‘देखो, यह भीमसेन धृतराष्ट्र के महारथी पुत्रों को मारे डालता है। अरे ! इसे फौरन पकड़ लो, देरी मत करो।‘ भीष्मजी का ऐसा आदेश पाकर कौरवपक्ष के सभी सैनिक क्रोध में भरकर महाबली भीमसेन के ऊपर टूट पड़े। उनमें से भगदत्त अपने मदोन्मत्त हाथी पर चढ़े हुए सहसा भीमसेन के पास पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही उन्होंने बाणों की वर्षा करके भीमसेन को बिलकुल ढक दिया। अभिमन्यु आदि वीर यह सब नहीं देख सके। उन्होंने भी बाण बरसाकर भगदत्त को चारों ओर से आच्छादित कर दिया और उनके हाथी को घायल कर डाला।
किन्तु भगदत्त के हाँकने पर भी वह हाथी उन महारथियों के ऊपर ऐसे वेग से दौड़ा, मानो काल से प्रेरित यमराज ही हो। उसके उस भीषण रूप को देखकर सब महारथियों का साहस ठण्डा पड़ गया और उन्हें वह असह्य सा जान पड़ा। इसी समय भगदत्त ने क्रोध में भरकर एक बाण भीमसेन की छाती में मारा। उससे घायल होकर भीमसेन की छाती में मारा। उससे घायल होकर भीमसेन अचेत_से हो गये और अपने रथ के ध्वजा के झंडे का सहारा लेकर बैठ गये। यह देखकर महाप्रतापी भगदत्त बड़े जोर से सिंहनाद करने लगे। भीमसेन को ऐसी स्थिति में देखकर घतोत्कच को बड़ा क्रोध हुआ और वह वहीं अन्तर्धान हो गया। फिर उसने ऐसी भीषण माया फैलायी, जिसे देखकर कच्चे_पक्के लोगों का तो हृदय बैठ गया। आधे ही क्षण में वह बड़ा भयंकर रूप धारण किये अपनी ही माया से रचे हुए एरावत हाथी पर चढ़कर प्रकट हुआ।  उसने भगदत्त को उसके हाथी सहित मार डालने के विचार से उनपर अपना हाथी छोड़ दिया। वह चतुर्दन्त गजराज भगदत्त के हाथी को बहुत पीड़ित करने लगा, जिससे कि वह अत्यन्त आतुर होकर वज्रपात के समान बड़े जोर से चिघ्घाड़ने लगा। उसका यह भीषण नाद सुनकर भीष्मजी ने आचार्य द्रोण और राजा दुर्योधन से कहा, ‘ इस समय महान् धनुर्धर राजा भगदत्त हिडिम्बा के पुत्र घतोत्कच से युद्ध करते_करते बड़ी आपत्ति में फँस गये हैं। इसी से पाण्डवों की हर्षध्वनि और अत्यन्त डरते हुए हाथी का रोदन शब्द सुनाई दे रहा है। इसलिए चलो, हम सब राजा भगदत्त की रक्षा करने के लिये चलें। यदि उनकी रक्षा न की गयी तो वे बहुत जल्दी प्राण त्याग देंगे। देखो, वहाँ बड़ा ही भीषण और रोमांचकारी संग्राम हो रहा है। अतः वीरों ! शीघ्रता करो। आओ, देरी मत करो।‘ भीष्मजी की बात सुनकर सभी वीर भगदत्त की रक्षा के लिये भीष्म और द्रोण के नेतृत्व में चले। उस सेना को देखकर प्रतापी घतोत्कच बिजली की कड़क के समान बड़े जोर से गरजा। उसकी यह गर्जना सुनकर भीष्मजी ने द्रोणाचार्य से कहा, ‘तुझे इस समय दुरात्मा घतोत्कच के साथ संग्राम करना अच्छा नहीं जान पड़ता; क्योंकि वह बड़ा बल_वीर्य सम्पन्न है और इसे अन्य वीरों से सहायता भी मिल रही है। इस समय तो वज्रधर इन्द्र भी इसे नहीं जीत सकेगा। अतः अब पाण्डवों के साथ युद्ध करना ठीक नहीं होगा; बस आज यहीं युद्ध बंद करने का घोषणा कर दी जाय। अब शत्रुओं को साथ हमारा कल संग्राम होगा।‘ कौरवों घतोत्कच को आतंक से घबराये हुए थे ही। इसलिये भीष्मजी का बात सुनकर उन्होंने युक्तिपूर्वक युद्ध बंद करने की घोषणा कर दी। सायंकाल हो रहा था। आज कौरवलोग पाण्डवों से पराजित होने के कारण लज्जित होकर अपने डेरे पर लौटे। पाण्डवलोग तो भीमसेन और घतोत्कच को आगे करके प्रसन्नता से शंखध्वनि के साथ सिंहनाद करते हुए अपने शिविर पर आये; किन्तु भाइयों का वध होने के कारण राजा दुर्योधन बहुत ही चिन्तित और शोकाकुल हो रहा था।