Tuesday, 13 October 2015

वनपर्व---अर्जुन के द्वारा कालिकेय और पौलोमों के साथ युद्ध और स्वर्ग से विदाई का वर्णन

अर्जुन के द्वारा कालिकेय और पौलोमों के साथ युद्ध और स्वर्ग से विदाई का वर्णन        अर्जुन कहते हैं---लौटते समय मार्ग में मुझे एक दूसरा दिव्य नगर दिखाई दिया। वह बहुत ही विस्तृत और अग्नि एवं सूर्य के समान कान्तिवाला था। उसे इच्छानुसार चाहे जहाँ ले जाया जा सकता था। उसमें भी दैत्यलोग ही रहते थे। उस विचित्र नगर को देखकर मैने मातलि से पूछा, 'यह अद्भुत् स्थान क्या है ?' मातलि ने कहा, 'पुलोमा और कालिका नाम की दो दानवियाँ थीं। उन्होंने सहस्त्र दिव्य वर्ष तक बड़ी कठोर तपस्या की। तप के अन्त में जब ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उनसे वर माँगने को कहा तब उन्होंने माँगा कि हमारे पुत्रों को  थोड़ा सा भी कष्ट न हो, देवता राक्षस या नाग---कोई भी उन्हें मार न सके तथा उनके रहने के लिये अत्यन्त रमणीय, प्रकाशपूर्ण तथा आकाशचारी नगर हो। तब ब्रह्माजी ने कालिका के पुत्रों के लिये सब प्रकार के रत्नों से सुसज्जित, देवताओं के लिये भी अजेय , सब प्रकार के अभीष्ट भोगों से पूर्ण तथा रोग-शोक से रहित यह नगर तैयार किया। इसे महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर या राक्षस--- कोई भी नहीं जीत सकते। यह नगर आकाश में भी उड़ता रहता है। इसमें कालिका और पुलोमा के पुत्र ही रहते हैं। ये लोग सब प्रकार के उद्वेग और चिन्ता से दूर रहकर बड़े आनन्द से इसमें निवास करते हैं। कोई भी देवता इन्हें जीत नहीं सकता। ब्रह्माजी ने इनकी मृत्यु मनुष्य के हाथ रखी है, अतः तुम वज्र द्वारा इन दुर्जय और महाबली दैत्यों का अन्त कर दो।' तब मैने प्रसन्न होकर मातलि से कहा, 'अच्छा, तुम अभी मुझे इस नगर में ले चलो। जो दुष्ट देवराज से द्रोह करते हैं, उन्हें मैं अभी तहस-नहस कर डालूँगा।' मातलि तुरंत ही मुझे सुवर्णमय नगर के पास ले गया। मुझे देखकर वे दैत्य कवच धारणकर, रथों में सवार हो बड़े वेग से मेरे ऊपर टूट पड़े और अत्यन्त क्रोध में बैठकर मेरे ऊपर नालीक, नाराच, भाले, शक्ति, ऋष्टि और तोमरों से वार करने लगे। तब मैने अपनी अस्त्रविद्या के बल से भीषण वाणवर्षा कर उनकी शस्त्रवृष्टि को रोक दिया और उन सब को मोहित कर दिया, जिससे वे आपस में ही एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। उनकी इस मुग्धावस्था में ही मैने अनेकों चमचमाते हए वाण छोड़कर सैकड़ों के सिर काट डाले। जब उनका इस प्रकार नाश होने लगा तो वे अपने नगर में ही घुस गये और माया द्वारा उस पुरी के सहित आकाश में उड़ गये। तब दिव्यास्त्रों के द्वारा छोड़े हुए शरसमूह से मैने दैत्यों के सहित उस नगर को घेर लिया। मेरे छोड़े हुए लोहे के वाण सीधे पार निकल जाने वाले थे। उनसे टूट-टूटकर वह दैत्यों का नगर पृथ्वी पर गिर गया। फिर तो मुझसे युद्ध करने के लिये उनमें से साठ हजार रथी क्रोधित होकर मरे ऊपर चढ़ आये और मुझे चारों ओर से घेर लिया। किन्तु मैने पैने-पैने वाण छोड़कर उन सभी को नष्ट कर दिया। थोड़ी ही देर में समुद्र की लहरों के समान एक दूसरा दल चढ़ आया।तब मैने यह सोचकर कि मानवी युद्ध से इनपर विजय पाना कठिन है, धीरे-धीरे दिव्य अस्त्रों का प्रयोग आरम्भ कर दिया। किन्तु वे दैत्य रथी बड़े ही विचित्र योद्धा थे। वे मेरे दिव्य अस्त्रों को भी काटने लगे। तब मैने देवाधिदेव महादेवजी की शरण ली और उनका सुप्रसिद्ध पाशुपतास्त्र गाण्डीव धनुष पर चढ़ाया। फिर भगवान् त्रिनयन को मन-ही-मन प्रणाम कर उन दैत्यों का नाश करने के लिये उसे छोड़ दिया। उसकी प्रचण्ड मार से दैत्य बात-की-बात में नष्ट हो गये। राजन् ! इस प्रकार एक मुहूर्त में ही मैने उन दानवों का अन्त कर डाला।इस प्रकार उन दैत्यों को रौद्रास्त्र के प्रभाव से नष्ट हुआ देख मातलि को बड़ा ही हर्ष हुआ और उसने अत्यन्त प्रसन्न होकर हाथ जोड़कर कहा, 'यह आकाशचारी नगर देवता, दैत्य सभी के लिये अजेय था। किन्तु अपने पराक्रम और तपोबल से तुमने इसे चूर-चूर कर दिया।' उस युद्ध में विजय पाकर मैं बड़ा प्रसन्न हुआ। फिर सारथि मातलि मुझे रणभूमि से तुरंत ही इन्द्र के राजभवन में ले गया। वहाँ पहुँचकर मातलि ने सारा वृतांत ज्यों-का-त्यों सुना दिया। यह सब समाचार सुनकर महाराज इन्द्र बड़े प्रसन्न  हुए। और उन्होंने ये मधुर वचन कहे, 'पार्थ ! तुमने संग्राम में देवता और असुरों से भी बढ़कर काम किया है। मेरे शत्रुओं का संहार करके तुमने अपनी गुरुदक्षिणा चुका दी है। अब देवता, दानव, यक्ष,राक्षस, असुर, गन्धर्व तथा पक्षी और नाग---सभी के लिये तुम युद्ध में अजेय हो गये हो। अतः तुम्हारे बहुबल से जीती  हुई पृथ्वी पर धर्मराज युधिष्ठिर निष्कण्टक राज्य करेंगे।' फिर राजा इन्द्र ने मुझे शरीर की रक्षा करनेवाला यह दिव्य अभेद्य कवच और यह सोने की माला प्रदान की। साथ ही उन्होंने यह देवदत्त नाम का शंख भी दिया, जिसकी आवाज बहुत ऊँची है, और यह दिव्य किरीट तो स्वयं अपने हाथ से मेरे मस्तक पर रखा। इसके बाद उनहोंने ये बहुत ही सुन्दर दिव्य वस्त्र और आभूषण भी मुझे प्रदान किये। इस प्रकार इन्द्र से सम्मानित होकर मैं वहाँ गन्धर्वकुमारों के साथ बड़े आनन्दपूर्वक रहा। वहाँ मेरे पाँच वर्ष बीते। एक दिन इन्द्र ने मुझसे कहा, 'अर्जुन ! अब तुम्हे यहाँ से जाना चाहिये। तुमहारे भाई तुम्हे याद कर रहे हैं।' इससे मैं यहाँ चला आया और आज इस गन्धमादन पर्वत के शिखर पर भाइयों सहित आपका दर्शन किया है। युधिष्ठिर बोले---यह हमारे लिये बड़े सौभाग्य की बात है कि तुमने देवराज इन्द्र को प्रसन्न किया है। अर्जुन ! अब मैं उन दिव्य अस्त्रों को देखना चाहता हूँ ; जिससे तुमने वैसे बलवान् निवातकवचों का वध किया है। युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर अर्जुन ने देवताओं के दिए हुए उन दिव्य अस्त्रों को दिखाने का विचार किया। पहले तो वे विधिपूर्वक स्नानकरके शुद्ध हुए, फिर अपने अंगों में परम कान्तिमान दिव्य कवच धारण कर लिया। एक हाथ में गाण्डीव धनुष और दूसरे हाथ में देवदत्त शंख ले लिया। इस प्रकार वीरोचित वेष से सुशोभित हो महाबाहु अर्जुन ने उन दिव्यास्त्रों को क्रमशः दिखाना आरम्भ किया। जिस समय उन अस्त्रों का प्रयग आरम्भ हुआ, पृथ्वी वृक्षों सहित काँप उठी, नदी और समुद्रों में उफान आ गया, पर्वत फटने लगे, वायु की गति रुक गयी, सूर्य की कान्ति फीकी पड़ गयी और जलती हुई आग भी बुझ गयी। तदनन्तर समस्त ब्रह्मर्षि, सिद्ध, महर्षि, संपूर्ण प्राणी, देवर्षि तथा स्वर्गवासी देवता---सब-के-सब वहाँ आकर उपस्थित हुए। लोकपितामह ब्रह्मा और भगवान् शंकर भी अपने गणों सहित वहाँ पधारे। फिर सब देवताओं ने नारदजी को अर्जुन के पास भेजा। वे आकर अर्जुन से बोले---'अर्जुन ! अर्जुन ! ठहरो, इस समय इन दिव्यास्त्रों का प्रयोग न करो। बिना किसी लक्ष्य के दिव्यास्त्रों का प्रयोग नहीं किया जाता। यदि कोई शत्रु लक्ष्य हो तो भी जबतक वह अपने ऊपर प्रहार करके कष्ट न पहुँचाये, तबतक उसपर भी दिव्यास्त्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिये। अन्यथा इनके व्यर्थ प्रयोग करने से महान् अनर्थ हो जाता है। यदि नियमानुसार तुम इनकी रक्षा करोगे तो ये शक्तिशाली और तुम्हे सुख देनेवाले होंगे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। । यदि तुम व्यर्थ प्रयोग से इनकी रक्षा नहीं की तो ये त्रिलोकी का नाश कर डालेंगे। युधिष्ठिर ! तुम भी इसको इस समय देखने का लोभ छोड़ो; युद्ध में शत्रुओं का मर्दन करते समय जब अर्जुन इन दिव्यास्त्रों का प्रयोग करें, तब देख लेना।' इस प्रकार जब नारदजी ने अर्जुन को दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने से रोक दिया, तब सब देवता तथा अन्य प्राणी, जो जहाँ से आये थे, वहाँ चले गये और पाण्डव भी द्रौपदी के साथ उस वन में प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे।
  

वनपर्व---अर्जुन द्वारा निवातकवचों के साथ अपने युद्ध का वर्णन

अर्जुन द्वारा निवातकवचों के साथ अपने युद्ध का वर्णन
अर्जुन ने कहा---राजन् ! मार्ग में जाते हुए भी जगह-जगह महर्षिगण मेरी स्तुति करते थे। अन्त में मैने अथाह और भयावह समुद्र के पास पहुँचकर देखा कि उसमें फेन से मिली हुई पहाड़ों के समान ऊँची-ऊँची लहरें उठ रही थीं। वे कभी इधर-उधर फैल जाती थी और कभी आपस में टकरा जाती थीं। सब ओर रत्नों से भरी हुईं हजारों नावें चल रही थीं तथा बड़े-बड़े मत्स्य, कछुए, तिमि, तिमिंगल और मकर पहाड़ में डूबे से जान पड़ते थे। इस प्रकार उस अत्यंत वेगशाली महासागर को देखकर उसके पास ही मैने दानवों से भरा हुआ उनका नगर देखा। वहाँ पहुँचकर मातलि ने अपना रथ उस नगर की ओर दौड़ाया। रथ की घरघराहट से दानवों के हृदय दहल गये। इसी समय मैंने भी बड़े आनन्द से धीरे-धीरे अपना देवदत्त नामक शंख बजाना आरम्भ कर दिया। उस शब्द ने आकाश से टकराकर प्रतिध्वनि पैदा कर दी। उसे सुनकर बहुत से बड़े-बड़े जीव भी भयभीत होकर इधर-उधर छिप गये। फिर अनेकों प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित सहस्त्रों निवातकवच दैत्य नगर से बाहर आये। उस शब्द ने आकाश से टकराकर प्रतिध्वनि पैदा कर दी। फिर अनेकों प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित सहस्त्रों निवातकवच दैत्य नगर से बाहर आये। उन्होंने हजारों प्रकार के भीषण स्वर और आकारवाले बाजे बजाने प्रारम्भ किये। इस प्रकार निवातकवचों के साथ मेरा भीषण संग्राम छिड़ गया। उसे देखने के लिये वहाँ अनेकों देवर्षि, दानवर्षि, महर्षि और सिद्धलोग आ गये। और मेरी ही विजय की आशा से मधुरवाणी द्वारा मेरी स्तुति करने लगे। दानवों ने मेरे ऊपर गदा, शक्ति और शूलों की अनवरत वर्षा आरम्भ कर दी और वे तड़ातड़ मेरे रथ के ऊपर गिरने लगे। तब मैने बहुतों को तो प्रत्येक के दस-दस वाण मारकर धराशायी कर दिया। इसी प्रकार अनेक छोटे- छोटे शस्त्रों से भी मैने सहस्त्रों असुरों को काट डाला। इधर घोड़ों के मार और रथ के प्रहार से भी अनेकों राक्षस कुचल गये और कितने ही मैदान छोड़कर भाग गये। कुछ निवातकवच स्पर्धा से वाणों की वर्षा करके मेरी गति को रोकने लगे। तब मैने ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित करके हजारों छोटे-छोटे वाण छोड़कर उनका सफाया कर दिया। उस समय दैत्यों के छिन्न-भिन्न शरीरों से उसी प्रकार रक्त का प्रवाह चलने लगा, जैसे वर्षा ऋतु में पर्वत की चोटियों से जल की धाराएँ बहने लगती हैं। राजन् ! फिर सब ओर पर्वत के समान बड़ी-बड़ी चट्टानों की वर्षा आरम्भ हुई। उसने तो मुझजे बहुत ही खिन्न कर दिया। तब मैने इन्द्रास्त्र के द्वारा अनेकों वज्र के-से वेग वाले वाण छोड़कर उन्हें चूर-चूर कर दिया। इस प्रकार पत्थरों की वर्षा बन्द हुईं तो मोटी-मोटी जल की धाराएँ गिरने लगीं। इन्द्र ने मुझे विशोषण नाम का एक दप्तिशाली दिव्य अस्त्र दिया था। उसे छोड़ने से वह सार जल सूख गया। इसके पश्चात् दानवों ने माया द्वारा अग्नि और वायु छोड़े। तब तुरन्त ही मैने जलास्त्र से अग्नि को शान्त किया और शैलास्त्र द्वारा वायु को रोक दिया। इतने में ही एक-एक करके वे सब दानव अदृश्य हो गये और इस अन्तर्धानी माया से कोई भी दानव मेरे नेत्रों के सामने न रहा। इस प्रकार अदृश्य रहकर ही वे मेरे ऊपर शस्त्र चलाने लगे तथा मैं भी अदृयास्त्र के द्वारा उनसे युद्ध करने लगा। इस युक्ति से गाण्डीव धनुष द्वारा छोड़े हुए वाण जहाँ-जहाँ वे दैत्य थे, वहीं जाकर उनके सिर काट डालते थे। जब मैं इस प्रकाार युद्ध-क्षेत्र में उनका संहार करने लगा तो वे अपनी माया को समेटकर नगर में घुस गये। वहाँ दैत्यों की इतनी लाशें पड़ी थीं कि घोड़ों के लिये एक के बाद दूसरा पैर रखना कठिन था। इसलिये घोड़े पृथ्वी से उठकर आकाश में स्थित हो गये। किन्तु निवातकवचों ने अदृश्य रूप से पत्थरों की वर्षा करते हुए आकाश को भी आच्छादित कर दिया। पत्थरों से ढ़क जाने और घोड़ों की गति रुक जाने से मैं बड़ा तंग आ गया। तब मातलि ने मुझे डरा हुआ देखकर कहा, 'अर्जुन ! 'अर्जुन ! डरो मत, वज्रास्त का प्रयोग करो।' राजन् ! मातलि का यह वचन सुन मैने देवराज का प्रिय अस्त्र वज्र छोड़ा और एक अविचल स्थान पर बैठकर गाण्डीव को अभिमन्त्रित कर  मैने लोहे के बने हुए वज्र के समान पैने वाण छोड़े। अब वज्रतुल्य वाणों के वेग से आहत होकर वे पर्वत के समान विशालकाय दैत्य एक-दूसरे से लिपट-लिपट कर पृथ्वी पर लुढ़कने लगे। सबसे बढ़कर आश्चर्य की बात यह हुई कि इतना संग्राम होने पर भी रथ, मातलि या घोड़ों को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुँची। फिर मातलि ने हँसकर मुझसे कहा, 'अर्जुन ! तुममें जैसा पराक्रम देखा जाता है, वैसा तो देवताओं में भी नहीं है। इस प्रकार निवातकवचों का अंत हो गया और मैं मातलि के साथ उस नगर में गया। मेरे रथ का घोष सुनकर दैत्यों की स्त्रियाँ बहुत डरीं और भागने लगीं। वह नगर अमरावती से भी बढ़-चढ़कर था। ऐसा अद्भुत नगर देखकर मैने मातलि से पूछा, 'ऐसे सुन्दर नगर में देवतालग क्यों नहीं रहते ? मुझे तो यह इन्द्रपुरी से भी बढ़कर जान पड़ता है।' मातलि ने कहा, "पहले यह नगर हमारे देवराज इन्द्र का ही था; किन्तु फिर निवातकवचों ने देवताओं को यहाँ से भगा दिया। कहते हैं, पूर्वकाल में महान् तपस्या करके दानवों ने भगवान् ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे अपने रहने के लिये यह स्थान और युद्धमें देवताओं से अभय माँगा। तब इन्द्र ने ब्रह्माजी से यह प्रार्थना की कि 'भगवन् ! हमारे हित के लिये आप ही इनका संहार कीजिये।' तब ब्रह्माजी ने कहा, 'इन्द्र ! इस विषय में विधाता का विधान ऐसा ही है कि दूसरे शरीर द्वारा तुम ही इनका नाश करोगे।' इसी से इनका वध करने के लिये इन्द्र ने तुम्हे अपने अस्त्र दिेए हैं। तुमने जिन असुरों का संहार किया है, उन्हे देवता नहीं मार सकते थे।" इस प्रकार उन दानवों का नाश करके उस नगरमें शान्ति स्थापित करके मैं मातलि के साथ फिर देवलोक में चला गया।

Sunday, 11 October 2015

वनपर्व---अर्जुन द्वारा स्वर्गलोक में अपनी अस्त्रशिक्षा और युद्ध की तैयारी का कथन

अर्जुन द्वारा स्वर्गलोक में अपनी अस्त्रशिक्षा और युद्ध की तैयारी का कथन
अर्जुन ने कहा---राजन् ! फिर दिव्य घोड़ों से जुते हुए इन्द्र के दिव्य और मायामय रथ को लेकर मातलि मेरे पास आया और मुझसे बोला, 'देवराज इन्द्र आपसे मिलना चाहते हैं।' यह सुनकर मैने पर्वतराज हिमालय की प्रदक्षिणा की और उनकी आज्ञा लेकर उस श्रेष्ठ रथ में सवार हुआ। तब अश्वविद्या में निष्णात मातलि ने उन मन और वायु के समान वेगवान् घोड़ों को हाँका। तब मातलि ने देखा कि रथ के हिलने पर भी मैं स्थिर रहता हूँ तो उसने बड़े आश्चर्य में पड़कर कहा, 'आज मुझे यह बड़ी विचित्र बात दिखायी दे रही है। रथ के घोड़े चलने पर मैने देवराज को हिलते हुए देखा है किन्तु तुम बिलकुल स्थिर दिखायी देते हो। तुम्हारी यह बात तो मुझे इन्द्र से भी बढ़कर जान पड़ती है।' ऐसा कहते-कहते मातली रथ को आकाश में ऊँचा ले गया और मुझे देवताओं के भवन तथा विमान दिखाने लगा। कुछ और आगे बढ़ने पर उसने मुझे देवताओं के नन्दनादि वन और उपवन दिखाये। उससे आगे इन्द्र की अमरावतीपुरी दिखायी दी। उसमें सूर्य का तापनहीं होता और न शीत, उष्ण या श्रम ही होता है। वहाँ वृद्धावस्था का भी कष्ट नहीं है और न कहीं शोक, दीनता या दुर्बलता ही दिखायी देते हैं। वहाँ के बहुत से निवासी विमानों में बैठकर आकाश में विचर रहे थे। इस प्रकार देखता-देखता जब मैं आगे बढ़ा तो मुझे वसु, रुद्र, साध्य,पवन, आदित्य और अश्विनीकुमारों के दर्शन हुए। मैने उन सभी की पूजा की और उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया कि 'तुम्हे बल, वीर्य, यश, तेज अस्त्र और युद्ध में विजय प्राप्त हो।' इसके पश्चात् मैने देवता और गन्धर्वों से पूजित अमरावतीपुरी में प्रवेश किया और देवराज इन्द्र के पास पहुँचकर उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। तब दानियों में श्रेष्ठ इन्द्र ने मुझे बैठने के लिये मुझे अपना आधा सिंहासन दिया। वहाँ मैं अस्त्रविद्या प्राप्त करता हुआ परम प्रवीण देवता और गन्धर्वों के साथ रहने लगा। रहते-रहते विश्र्वावसु के पुत्र चित्रसेन से मेरी मित्रता हो गयी। उसने मुझे संपूर्ण गान्धर्वशास्त्र की शिक्षा दी। वहाँ इन्द्रभवन में रहकर मैने तरह-तरह के गान और वाद्य सुने तथा अप्सराओं को नृत्य करते देखा। किन्तु इन सब बातों का आसार समझकर मैंने अस्त्रविद्या में ही विशेष मनोनिवेष किया। मेरी ऐसी प्रवृति देखकर देवराज भी मुझपर प्रसन्न रहे और स्वर्ग में रहते हुए मेरा समय आनंद से बीतने लगा। मुझमें सभी का बहुत विश्वास था तथा अस्त्रविद्या में भी मैं काफी निपुण हो गया था। एक दिन इन्द्र ने मुझसे कहा, 'वत्स ! अब तुम्हें युद्ध में देवता भी परास्त नहीं कर सकते, फिर तो मर्त्यलोक में रहनेवाले बेचारे मनुष्यों की तो बात ही क्या है ? तुम युद्ध में अतुलित, अजेय और अनुपम होगे। अस्त्रयुद्ध में तुम्हारा सामना कर सके, ऐसा कोई वीर नहीं होगा। तुम सर्वदा सावधान रहते हो, व्यवहारकुशल हो, सत्यवादी हो, जितेन्द्रिय हो और शूरवीर हो। तुमने पंद्रह अस्त्र प्राप्त किये हैं और तुम उसका प्रयोग, उपसंहार, आवृति, प्रायश्चित और प्रतिघात--- इन पाँच विधियों को भी अच्छी तरह जानते हो। अतः शत्रुदमन ! अब गुरुदक्षिणा देने का समय आ गया है। निवातकवच नाम के दानव मेरे शत्रु हैं। वे समुद्र के भीतर दुर्गम स्थान में रहते हैं। वे तीन करोड़ बताये जाते हैं और उन सभी के रूप, बल और प्रभाव समान ही हैं। तुम उन्हे मार डालो, बस तुम्हारी गुरुदक्षिणा पूरी हो जायगी।' ऐसा कहकर इन्द्र ने मुझे अपना अत्यन्त प्रभापूर्ण दिव्य रथ दिया। उसे मातलि चलाता था और मेरे सिर पर यह अत्यन्त प्रकाशमय मुकुट पहनाया। एक अभेद्य और सुन्दर कवच पहनाकर मरे गाण्डीव धनुष पर एक अटूट प्रत्न्चा चढ़ा दी। इस प्रकार जब मुझे सब प्रकार की युद्ध सामग्री से सुसज्जित कर दिया तो मैं उस रथ पर चढ़कर दैत्यों के साथ युद्ध करने के लिये चल दिया। तब उस रथ की घरघराहट सुन मुझे देवराज समझ सब देवता चौकन्ने होकर मेरे पास आये। फिर वहाँ देखकर उन्होंने मुझसे पूछा, 'अर्जुन ! तुम क्या करने की तैयारी में हो ?' तब मैने उन्हें सब बात बताकर कहा ,'मैंनिवातकवचों का वध करने के लिये जा रहा हूँ; अतः आप मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिये, जिससे मेरा मंगल हो।' तब उन्होंने प्रसन्न होकर मुझसे कहा, 'इस रथ में बैठकर इन्द्र ने शम्बर, नमुचि, बल, वृत्र और नरक आदि हजारों दैत्यों को जीता है; अतः कुन्तीनन्दन !इसके द्वारा तुम भी निवातकवचों को युद्ध में परास्त करोगे।'

Tuesday, 6 October 2015

वनपर्व---अर्जुन की प्रवासकथा---किरात का प्रसंग और लोकपालों से अस्त्र प्राप्त करना

अर्जुन की प्रवासकथा---किरात का प्रसंग और लोकपालों से अस्त्र प्राप्त करना
महावीर अर्जुन इन्द्र के रथ में बैठे हुए अकस्मात् उस पर्वत पर उतरे। उन्होंने रथ से उतरकर पहले मुनिवर धौम्य के और फिर महाराज युधिष्ठिर के और भीमसेन के चरणों में प्रणाम किया। इसके पश्चात् नकुल और सहदेव ने उनका अभिवादन किया। फिर कृष्णा से मिलकर और उसे धीरज बँधाकर वे विनयपूर्वक बड़े भाई युधिष्ठिर के पास आकर खड़े हो गये। अतुलित प्रभवशाली अर्जुन से मिलकर पाण्डवों को बड़ा हर्ष हुआ। तथा अर्जुन को भी उन्हें देखकर अपार आनन्द हुआ। पाण्डवोंने इन्द्र के रथ के पास जाकर उसकी परिक्रमा की और इन्द्र के सारथी मातलि का इन्द्र के समान ही सत्कार किया और उससे सब प्रकार देवताओं का कुशल-क्षेम पूछा। मातलि ने भी, पिता जैसे पुत्र को उपदेश करता है उसी प्रकार,पाण्डवों को उपदेश करके उनका अभिवादन किया और फिर उस अमित प्रभावशाली रथ में बैठकर देवराज इन्द्र के पास चला गया। मातलि के चले जाने पर अर्जुन ने देवराज के दिए हुए अत्यंत सुन्दर और बहुमूल्य आभूषण द्रौपदी को दे दिए। फिर सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी पाण्डव और विद्वानों के बीच में बैठकर वे यथावत् सब बातें सुनाने लगे। अर्जुन ने संक्षेप में अपने स्वर्ग के प्रवासकाल की बहुत सी बातें सुनायीं। फिर उस रात को उन्होंने आनन्दपूर्वक नकुल और सहदेव के साथ शयन किया। रात्रि बीत जाने पर प्रातःकाल के समय वे भाइयों के सहित धर्मराज के पास गये और उन्हें प्रणाम किया। इसी समय देवराज इन्द्र अपने सुवर्णजटित रथ से आकर उस पर्वत पर उतरे। जब पाण्डवों ने उन्हें उतरते देखा तो वे उनके पास आये और उनका विधिवत् पूजन किया। परम तेजस्वी अर्जुन ने भी देवराज को प्रणाम किया और सेवक के समान उनके पास खड़े हो गये। इस समय उदारचित्त धर्मराज का हृदय हर्ष से उमड़ रहा था। उनसे देवरज इन्द्र ने कहा, 'पाण्डुपुत्र ! तुम प्रसन्न रहो, तुम ही इस पृथ्वी का शासन करोगे। तुम काम्यक वन को लौट जाओ। अर्जुन ने बड़ी सावधानी से मुझसे सब शस्त्र प्राप्त कर लिये हैं। अब इसे त्रिलोकी भी नहीं जीत सकती। कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से ऐसा कह वे फिर स्वर्ग को लौट गये।इन्द्र के चले जाने पर धर्मराज ने गद्गद् कण्ठ होकर अर्जुन से पूछा---"भैया ! तुम्हें इन्द्र के दर्शन किस प्रकार हुए ? भगवान् शंकर से तुम्हारा कैसे समागम हुआ ? तुमने किस प्रकार सारी शस्त्रविद्या प्राप्त की ? और कैसे श्रीमहादेवीजी की अराधना की ? भगवान् इन्द्र कहते थे कि 'अर्जुन ने मेरा प्रिय किया है।' सो तुमने उनका क्या काम किया था ? ये सबबातें मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ।यह सुनकर अर्जुन ने कहा--- महाराज ! जिस प्रकार मुझे इन्द्र और भगवान् शंकर के दर्शन हुए वह सुनिये। आपने मुझे जिस विद्या का उपदेश दिया था, उसे सीखकर आपकी आज्ञा से मैं तप करने के लिये वन में गया। काम्यक वन से चलकर मैं भृगुतुंग पर्वत पर जाकर तप करना आरंभ किया, किन्तु वहाँ केवल मैं एक रात ही रहा। इसके पश्चात् मैं हिमालय पर जाकर तप करने लगा। मैने एक महीने तक केवल कंद और फल का आहार किया, दूसरा महीना जल पीकर बिताया और तीसरे महीने निराहार रहा। यह सब होने पर भी विचित्र बात यह हुई कि मेरे प्राण नहीं छूटे।पाँचवें महीने का एक दिन बीतने पर एक सूअर इधर-उधर घूमता हुआ मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। उसके पीछे-पीछे एक किरातवेषधारी पुरुष आया। वह धनुष-वाण और तलवार धारण किये हुए था तथा उसके पीछे-पीछे कई स्त्रियाँ चल रही थीं। तब मैने धनुष लेकर उसपर वाण चढ़ाया और इस रोमांचकारी सूअर को बिंध दिया।उसी समय उस भील ने अपना प्रबल धनुष खींचकर वाण छोड़ा जिससे कि मेरा मन दहल सा गया। राजन् ! फिर उसने मुझसे कहा---'यह सूअर तो पहले मेरा निशाना बन चुका था, फिर तुमने आखेट के नियम को छोड़कर उसपर वार क्यों किया ? अच्छा,तुम सावधान हो जाओ;  मैं अपने पैने वाणों से अभी तुम्हारे गर्व को चूर किये देता हूँ।' ऐसा कहकर उस विशालकाय भील ने पर्वत के समान निश्छल खड़े हुए मुझको वाणों से आच्छादित कर दिया तथा मैने भी भीषण वाणवर्षा करके उसे ढ़क दिया। उस समय उसके सैकड़ों सहस्त्रों रूप प्रकट होने लगे और मैं उन सभी पर वाण-वर्षा करने लगा। फिर वे सारे रूप मुझे एक हुए दिखायी दिये, तो मैने उसे भी बींध दिया।जब इतनी वाण-वर्षा करने पर भी मैं उसे युद्ध में परास्त न कर सका तो मैने वायव्यास्त्र छोड़ा। किन्तु वह भी उसका वध न कर सका। इस प्रकार वायव्यास्त्र को कुण्ठित हुआ देखकर मुझे बड़ा ही विस्मय हुआ। फिर भी मैने बारी-बारी से उसपर स्थूणाकर्ण, वारुणास्त्र,शरवर्षास्त्र, शालभास्त्र और अश्मवर्षास्त्र भी छोड़े। किन्तु वह भील उन सभी अस्त्रों को निगल गया। उससे निकलते हुए प्रज्जवलित वाणों से  वह सब ओर से ढ़क गया। परन्तु उस महातेजस्वी भील ने उसे भी एक क्षण में ही शान्त कर दिया।उसके व्यर्थ हो जाने पर मुझे बड़ा ही भय हुआ। फिर मैने अपने धनुष और दोनो अक्षय तरकस लेकर उसपर प्रहार किया। किन्तु वह उन्हें भी निगल गया। इस प्रकार जब सभी अस्त्र नष्ट हो गये और मेरे सभी आयुधों को वह निगल गया तो मेरा और उसका बाहुयुद्ध होने लगा। मैं ममुक्का-मुक्की और हाथापाई करने पर भी उस पुरुष की बराबरी न कर सका और अचेत होकर पृथ्वी पर गिर गया। फिर मेरे देखते-देखते वह हँसकर उन स्त्रियों सहित वहाँ अन्तर्धान हो गया। इससे मैं भौचचक्का सा रह गया। यह सब लीला करके वे देवाधिदेव महादेव उस किरातवेष को छोड़कर अपने दिव्यरूप से प्रकट हुए। उनके कण्ठ में सर्प पड़े हुए थे, हाथ में पिनाक धनुष था और साथ में देवी पार्वती थीं। मैं पूर्ववत् ही युद्ध के लिये तैयार खड़ा था। ककिन्तु उन्होंने मेरे सम्मुख आकर कहा कि 'मैं तुमपर प्रसन्न हूँ।' यह कहकर उन्होंने ममेरे छीने हुए धनुष और अक्षय बाणोंवाले दोनों तरकस लौटा दिये और कहा, 'हे वीर ! इन्हें धारण कर लो। मैं तुमपर प्रसन्न हूँ; बताओ, तुम्हारा क्या काम करूँ ? तुम्हारे मन में जो बात हो, वह कह दो। अमरत्व को छोड़कर तुम्हारी सब कामना मैं पूर्ण कर दूँगा।' मेरे मन में अस्त्र ही समाये हुए थे, इसलिये मैने हाथ जोड़कर उन्हें मन से प्रणाम करते हुए कहा---'भगवन् ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे तो देवताओं के दिव्य अस्त्र पाने और उनका प्रयोग जानने की ही इच्छा है---यही मेरा अभीष्ट वर है। तब भगवान् त्रिलोचन ने कहा, 'अच्छा, मैं तुम्हे यह वर देता हूँ; अब शीघ्र ही तुम्हें मेरा पाशुपतास्त्र प्राप्त होगा।' ऐसा कहकर उन्होंने अपना महान् पाशुपतास्त्र मुझे दे दिया, और फिर कहा, ' तुम इस अस्त्र का मनुष्यों पर कभी प्रयोग न करना क्योंकि यदि इसे अल्पवीर्य प्राणियों पर छोड़ा जायगा तो यह त्रिलोकी को भष्म कर देगा। अतः  जब तुम्हे अत्यंत पीड़ा हो, तभी  इसका प्रयोग करना।' इस प्रकार भगवान शंकर के प्रसन्न  होने से वह समस्त  अस्त्रों को रोक देनेवाला और स्वयं किसी से न रुकनेवाला दिव्य-अस्त्र मूर्तिमान होकर मेरे पास आ गया। फिर भगवान की आज्ञा होने से मैं वहाँ बैठ गया और मेरे देखते-देखते वो अन्तर्धान हो गये। महाराज ! श्रीमहादेवजी की कृपा से वह रात मैने आनन्दपूर्वक बितायी। दूसरे दिन जब दिन ढ़लने लगा तो उस हिमालय की तलैटी में दिव्य, नवीन और सुगंधित पुष्पों की वर्षा होने लगी, सब ओर दिव्य वाद्यों की ध्वनि होने लगी तथा देवराज इन्द्र की स्तुतियाँ सुनाई देने लगीं। थोड़ी देर में श्रेष्ठ घोड़ों से जुते हुए एक अत्यंत सुसज्जित रथ में देवराज इन्द्र इन्द्राणी सहित वहाँ पधारे। उनके साथ और भी सभी देवता आये थे। इतने में ही मुझे महान् ऐश्वर्य-सम्पन्न श्रीकुबेेरजी दिखायी दिये। फिर मेरी दृष्टि दक्षिण दिशा में विराजमान यमपर और पूर्व दिशा में स्थित इन्द्र तथा पश्चिम में विराजमान महाराज वरुण पर पड़ी। उन सबने मुझे धैर्य बँधाकर कहा, 'सव्यसाचिन् ! देखो, हम सब लोकपाल यहाँ उपस्थित हैं। ततुम्हे देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये ही महादेवजी के दर्शन हुए थे। तुम हम सबसे अस्त्र ग्रहण करो।' जब मैं अस्त्र ले चुका तो उन्होंने मुझे जाने की आज्ञा दी और वे स्वयं अपने-अपने लोकों को चले गये। देवराज इन्द्र ने भी अपने तेजोमय रथ पर चढ़कर मुझसे कहा, 'अर्जुन ! तुम्हे स्वर्ग में आना होगा। मेरी आज्ञा से मातलि तुम्हे स्वर्ग में पहुँचा देगा।

वनपर्व---धौम्य का युधिष्ठिर को नाना स्थान दिखलाना और अर्जुन का गन्धमादन पर लौट कर आना

धौम्य का युधिष्ठिर को नाना स्थान दिखलाना और अर्जुन का गन्धमादन पर लौट कर आना
सूर्योदय होने पर मुनिवर धौम्य अपने नित्य-क्रिया से निवृत होकर राजर्षि अर्ष्टिषेण के साथ पाण्डवों की ओर चले। पाण्डवों ने उन दोनो के चरणों में प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर अभिवादन किया। फिर धौम्य ने महाराज का हाथ पकड़कर पूर्व दिशा की ओर संकेत करके कहा, 'महाराज ! यह जो समुद्रपर्यन्त पृृथ्वी पर फैला हुआ महापर्वत दिखाई दे रहा है, इसका  नाम मन्दराचल है। देखिये, इसकी कैसी शोभा हो रही है ! अहा ! पर्वतमाला और हरी-भरी वनावली से यह दिशा और रमणीय जान पड़ती है। यह दिशा इन्द्र और का कुबेर का निवासस्थान कही जाती है। सर्वधर्मज्ञ मुनिजन,प्रजाजन, सिद्ध, साध्य और देवतालोग इसी दिशा में उदित होते हुए भी सूर्य का पूजन करते हैं।  समस्त प्राणियों के प्रभु परम धर्मज्ञ यमराज इस दक्षिण दिशा में रहते हैं जो मरनेवाले प्राणियों का गन्तव्य स्थान है। यह पवित्र और अद्भुत दिखाई देनेवाली संयमनीपुरी है। यही प्रेतराज यम का निवासस्थान है। इधर पश्चिम की ओर जो पर्वत दिखाई देता है उसे अस्ताचल कहते हैं। महाराज वरुण इस पर्वत और महासमुद्र में रहकर प्राणियों की रक्षा करते हैं। यह सामने उत्तर दिशा को आलोकित करता हुआ परम प्रतापी मेरु पर्वत खड़ा हुआ है। इसी के ऊपर ब्रह्माजी की सभा है और इसी पर वे स्थावर जंगम की स्थापना करते हुए निवास करते हैं। इसी पर्वत के ऊपर वशिष्ठादि सप्तर्षियों के उदय अस्त होते रहते हैं। तुम तनिक मेरु पर्वत के इस पवित्र शिखर का दर्शन करो। अनादिनिधन श्रीनारायण  का स्थान इससे भी परे चमक रहा है। यह सर्वतेजोमय एवं परम पवित्र है, देवता भी उसका दर्शन नहीं कर सकते। अग्नि और सूर्य उस स्थान को प्रकाशित नहीं कर सकते, वह तो स्वयं अपने प्रकाश से ही प्रकाशित है।  उसका दर्शन देवता और दानवों को भी दुर्लभ है। उस स्थान पर श्रीहरि विराजते हैं। यह परमेश्वर स्थान ध्रुव, अक्षय और अविनाशी है; तुम इसे प्रणाम करो। देखो ! सूर्य, चन्द्रमा और समस्त तारागण अपनी मर्यादा में रहकर सर्वदा इस पर्वतराज मेरु की ही प्रदक्षिणा करते हैं। इसकी प्रदक्षिणा करते हुए ही नक्षत्रों के सहित चन्द्रमा पर्वसन्धियों का समय आने पर महीनों का विभाग करते हैं। महातेजस्वी सूर्य वर्षा, वायु और तापरूप सुख के साधनों से प्राणियों का पोषण करते हैं। हे भारत ! भगवान् सूर्य ही सम्त जीव की आयु और कर्मों का विभाग करके दिन, रात, कला, काष्ठा आदि काल के अवयवों की रचना करते हैं।  पाण्डव उत्तम व्रतों का पालन करते हुए उस पर्वत पर ही निवास करने लगे। अर्जुन अस्त्रविद्या सीखने इन्द्र के पास गये थे। वे पाँच वर्ष तक वहाँ रहकर सभी विद्याएँ प्राप्त कर गन्धमादन पर्वत पर लौट आये।

वनपर्व---भीमसेन के हाथ से यक्ष और राक्षसों का वध तथा कुबेर द्वारा शान्तिस्थापन

भीमसेन के हाथ से यक्ष और राक्षसों का वध तथा कुबेर द्वारा शान्तिस्थापन
एक दिन भीमसेन उस पर्वत पर आनंद से एकांत में बैठे थे। उस समय द्रौपदी ने उनसे कहा, 'महाबाहो ! यदि समस्त राक्षस आपके बाहुबल से पीड़ित होकर इस पर्वत को छोड़कर भाग जायँ तो कैसा रहे ? फिर तो आपके सुहृदों को इस पर्वत का विचित्र पुष्पावलिमण्डित मंगलमय शिखर सब प्रकार के भय और मोह से रहित दिखाई देगा। भीमसेन ! मेरे मन में बहुत दिनों से यह बात आ रही है।' द्रौपदी की बात सुनकर भीमसेन ने सुवर्ण की पीठवाला धनुष, तलवार और तरकस उठा लिये और वे हाथ में गदा लेकर बेखटके गन्धमादन पर आगे बढ़ने लगे। यह देखकर द्रौपदी का उल्लास उत्तरोत्तर बढ़ने लगा। पवनपुत्र भीमसेन पर ग्लानि, भय, कायरता और मत्सरता का प्रभाव तो किसी समय नहीं होता था। उस पर्वत की चोटी पर जाकर वे वहाँ से कुबेर के महल को देखने लगे। वह सुवर्ण और स्फटिक के भवनों से सुशोभित था। उसके चारों ओर सोने का परकोटा बना हुआ था। उसमें सब प्रकार के रत्न जगमगा रहे थे और तरह-तरह के उद्यान उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। इस प्रकार राक्षसराज कुबेर के रत्नजटित और पुष्पमालामण्डित प्रासाद को देखकर उन्होंने अपने शत्रुओं के रोंगटे खड़े कर देनेवाला शंख बजाया तथा अपने धनुष की प्रत्ंचा और तालियों का भीषण शब्द करके सबको मोहित कर दिया। उस शब्द से यक्ष, राक्षस और गन्धर्वों के रोंगटे खड़े हो गये और वे गदा, परिघ, तलवार, त्रिशूल, शक्ति और फरसा लेकर भीमसेन की ओर दौड़े। फिर तो उनके साथ भीमसेन का युद्ध होने लगा। भीसेन ने अपने प्रबल वेगवाले भाले से उनके चलाये हुए त्रिशूल, शक्ति और फरसे आदि सभी शस्त्रों को काट डाला। उनके हाथों से छूटे हुए आयुधों से कटे हुए यक्ष और राक्षसों के शरीर और सिर सब ओर दिखायी देने लगे। इस प्रकार अंग-भंग होने से यक्षलोग भीमसेन से बहुत डर गये, उनके हाथ से सारे अस्त्र-शस्त्र गिर गये और वे भयंकर चीत्कार करने लगे। अंत में प्रचंड धनुर्धर भीमसेन से डरकर वे अपने अस्त्र-शस्त्र फेंककर दक्षिण-दिशा की ओर भागे। उधर कुबेर का एक मित्र मणिमान् नाम का राक्षस रहता था। उसने यक्ष-राक्षसों को देखकर मुस्कराकर कहा, 'अरे ! तुम अनेकों को अकेले आदमी ने परास्त कर दिया ! अब तुम कुबेर के पास जाकर क्या कहोगे ? उन सबसे ऐसा कहकर वह राक्षस शक्ति, त्रिशूल और गदा लेकर भीमसेन पर टूट पड़ा। भीमसेन ने भी उसे अपनी ओर आते देखकर उसे अपने वत्सदन्त नामक तीन वाणों से उसकी पसलियों पर प्रहार किया। इससे मणिमान् अत्यंत क्रोध में भर गया और उसने अपनी भारी गदा उठाकर भीमसेनके ऊपर छोड़ी। परन्तु भीमसेन गदायुद्ध की चालों में खूब दक्ष थे, अतः उन्होंने उसके उस प्रहार को व्यर्थ कर दिया। इसी समय उस राक्षस ने सोने की मूठवाली एक फौलाद की शक्ति छोड़ी। यह भीषण शक्ति भीमसेन के दाहिने हाथ को घायल करके अग्नि की लपटें निकालती हुई पृथ्वी पर गिर गयीं। उस शक्ति के लगने से अतुलित पराक्रमी भीमसेन की आँखें क्रोध से घूमने लगीं और उन्होंने अपनी सुवर्ण के पत्र से मढ़ी हुई गदा उठा ली। वे आकाश में उछलकर उस गदा को घुमाते हुए उसकी ओर दौड़े और संग्रामभूमि में भयंकर गर्जना करते हुए उसे मणिमान् के ऊपर फेंका।  वह गदा वायु के समान बड़े वेग से उस राक्षस का संहार करके पृथ्वी पर गिर गयी। मणिमान् को मरकर पृथ्वी पर गिरते देख जो राक्षस मरने से बचे थे, वे भयंकर आर्तनाद करके पूर्व की ओर भाग गये। इस समय पर्वत की गुफाओं को अनेक प्रकार के शब्दों से गूँजते देखकर अजातशत्रु युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, धौम्य, द्रौपदी, विद्वान और सब सुहृदगण भीमसेन को न देखकर उदास हो गये। फिर द्रौपदी को अर्ष्टिषेण मुनि को सौंपकर वे सब वीर अस्त्र-शस्त्र लेकर एक साथ पर्वत पर चढ़ने लगे। पहाड़ की चोटी पर पहुँचकर उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली तो देखा कि एक ओर भीमसेन खड़े हैं और वहीं उनके मारे हुए अनेकों विशालकय राक्षस पृथ्वी पर पड़े हैं। भीमसेन को देखकर सब भाई उनसे गले मिले और फिर वहीं बैठ गये। महाराज युधिष्ठिर ने कुबेर के महल और मरे हुए राक्षसों की ओर देखकर भीमसेन से कहा, 'भैया भीम ! तुमने यह पाप साहस या मोहवश ही किया है; तुम मुनियों का सा जीवन व्यतीत कर रहे हो, इस प्रकार व्यर्थ हत्या करना तुम्हे शोभा नहीं देता। देखो, यदि तुम मेरी प्रसन्नता करना चाहते हो तो फिर कभी ऐसा न करना। खड्ग और धनुष सुशोभित थे और वे कुबेर को देख रहे थे। कुबेरजी ने धर्मराज से कहा, 'आप समस्त प्राणियों का हितकरने में तत्पर रहते हैं---यह बात सब जीव जानते हैं। इसलिये आप भाइयों के सहित बेखटके इस पर्वत पर रहिये। देखिये, भीमसेन के ऊपर आप क्रोध न करें; क्योंकि राक्षस इधर भीमसेन के आक्रमण से बचे हुए कुछ राक्षस बड़ी तेजी से दौड़कर कुबेर के पास आये और चीख-चीखकर उनसे कहने लगे, 'यक्षराज ! आज संग्रामभूमि में एक अकेले मनुष्य ने क्रोधवश नाम के राक्षसों को मार डाला है। हम जैसे-तैसे उसके हाथ से बचकर आपके पास आये हैं। आपका सखा मणिमान् भी मारा जा चुका है। यह सब काण्ड एक मनुष्य ने ही कर डाला है। अब जो करना चाहे कीजिये।' समाचार पाकर समस्त यक्ष और राक्षसों के स्वामी कुबेरजी बड़े ही कुपित हुए, उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे बोले, 'यह सब कैसे हुआ ?' फिर यह दूसरा अपराध भी भीमसेन का ही सुनकर उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने आज्ञा दी कि हमारा पर्वतशिखर के समान ऊँचा रथ सजा लाओ। रथ तैयार हो जाने पर महाराज कुबेर उसपर चढ़कर चले। जब वे गन्धमादन पहुँचे तो यक्ष राक्षसों से घिरे हुए कुबेर को देखकर पाण्डवों को रोमांच हो आया। महाराज पाण्डु के धनुष-वाणधारी महारथी पुत्रों को देखकर कुबेरजी भी बड़े प्रसन्न हुए। वे उनसे देवताओं काएक कार्य कराना चाहते थे, इसलिये उन्हें देखकर वे हृदय में बहुत ही संतुष्ट ही हुए। कुबेरजी के जो सेवक पीछे रह गये थे, वे पक्षियों के समान सीधे ही उस पर्वत पर पहुँच गये तथा यक्षराज को पाण्डवों पर प्रसन्न देखकर उनका मन-मुटाव भी दूर हो गया। धर्म के रहस्य को जाननेवाले युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव ने कुबेर को प्रणाम किया और अपन को उनका अपराधी सा माना। अतः वे सब यक्षराज को घेरकर हाथ जोड़कर खड़े हो गये। इस समय भीमसेन के हाथ में पाश तो अपने काल से ही मरे हैं, आपका भाई तो उसमें निमित्त-मात्र है। राजन् ! एक बार कुशस्थली नाम के स्थान में देवताओं की मंत्रणा हुई थी। उसमें मुझे भी बुलाया गया था। तब मैं तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित अत्यंत भयंकर तीन सौ महापद्म यक्षों के साथ वहाँ गया था। मार्ग में मुझे मुनिवर अगस्त्यजी मिले। वे यमुनाजी के तट पर बड़ी कठोर तपस्या कर रहे थे। उस समय मेरा मित्र राक्षसराज मणिमान् मेरे साथ ही था। उसने मूर्खता, अज्ञान, गर्व और मोह के अधीन होकर ऊपर से उन महर्षि के ऊपर थूक दिया। तब मुनिवर ने कोप करके मुझसे कहा, 'कुबेर ! देखो, तुम्हारे इस सखा ने मुझे कुछ न समझकर मेरा तिरस्कार किया है; इसलिए यह अपनी सेना के सहित केवल एक ही मनुष्य के हाथ से मारा जायगा। तुम्हे भी अपने इन सेनानियों के कारण दुःखी होना पड़ेगा और फिर उस मनुष्य के दर्शन करने पर ही तुम्हारा दुःख दूर होगा।' इसप्रकार महर्षियों में श्रेष्ठ अगस्त्यजी ने मुझे यह शाप दिया था। उस शाप से आज आपके भाई ने हमें मुक्त किया है। राजन् ! लौकिक व्यवहार में धैर्य, कुशलता, देश-काल और पराक्रम--- इन पाँच साधनों की बड़ी आवश्यकता है। सतयुग में लोग धैर्यवान् अपने-अपने कर्मों में कुशल और पराक्रमी होते थे। जो धैर्यवान्, देशकाल का ज्ञान रखनेवाला और सब प्रकार की धर्मविधि में निपुण होता है, वह बहुत समय तक पृथ्वी का शासन करता है। जो क्रोध के आवेश में अपने पतन पर दृष्टि नहीं डालता और जिसके मन बुद्धि पाप में ही रच-बस रहे हैं, वह तो केवल पाप का ही अनुकरण करता है। तथा कर्मों का विभाग न जानने के कारण वह इस लोक और परलोक में नाश को प्राप्त होता है। यह भीमसेन भी धर्म को नहीं जानता, गर्वीला है; इसकी बुद्धि बालकों के समान है, सहन करना तो यह जानता ही नहीं और इसे किसी प्रकार का भय भी नहीं है। इसलिये आप फिर राजर्षि अर्ष्टिषेण के आश्रम में जाकर इसे समझाइये। यह कृष्णपक्ष आप उसी आश्रम में व्यतीत कीजिये। मेरी आज्ञा से अलकापुरी में रहनेवाले समस्त यक्ष, गन्धर्व किन्नर और पर्वतवासी आपकी देखभाल रखेंगे। भीमसेन साहस करके यहाँ आ गया है, सो आप समझाकर इसे ऐसा करने से रोक दीजिये। इससे छोटा आपका भाई अर्जुन तो व्यवहारविषय में निपुण है और सब प्रकार की धर्ममर्यादा को भी जानता है। इसी से लोक में जितनी भी स्वर्गीय विभूतियाँ हैं, वो सब उसे प्राप्त है। इसके सिवा उसमें दम, दान, बल, बुद्धि, लज्जा, धैर्य और तेज---ये सबगुण भी हैं ही। कुबेर के ये वचन सुनकर पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। भीमसेन ने भी शक्ति, गदा, खड्ग और धनुष को पीठ पर बाँधकर उन्हें प्रणाम किया। कुबेरजी ने भीमसेन से कहा, तुम शत्रुओं का मान भंग करनेवाले और सुहृदों की सुख की वृद्धि करनेवाले होओ।' फिर धर्मराज से बोले, 'अब अर्जुन अस्त्रविद्या में निपुण हो गया है, देवराज इन्द्र ने भी उसे घर जाने की आज्ञा दे दी है; इसलिये अब वह शीघ्र ही यहाँ आवेगा।' इस प्रकार उत्म कर्म करनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर को उपदेश देकर वे अपने स्थान को चले गये। भीमसेन के हाथ से जो राक्षस  मारे गये थे, उनके शव कुबेरजी की आज्ञा से पहाड़ के नीचे लुढ़का दिये गये। इस प्रकार युद्ध में मरे जाने से उन्हें मतिमान् अगस्त्यजी का जो श्राप था, उसका भी अन्त हो गया। पाण्डवों ने वह रात बड़े आनन्द से कुबेरजी के महल में ही बितायी।