Wednesday, 4 November 2015

वनपर्व---कलि-धर्म एवं कल्कि अवतार

कलि-धर्म एवं कल्कि अवतार
यधिष्ठिर ने मार्कण्डेयजी से कहा---मुझे कलियुग के विषय में जानने का कौतूहल हो रहा है। कलि में संपूर्ण धर्मों का उच्छेद हो जायगा, उसके बाद क्या होगा ? कलियुग में लोगों के आहार-विहार का स्वरूप क्या होगा ? उनके पराक्रम कैसे होंगे ? लोगों की आयु क्या होगी ? पहनावे कैसे होंगे ? इन सब बातों को आप विस्तार के साथ बताइए। युधिष्ठिर के इस प्रकार पूछने पर मार्कण्डेयजी श्रीकृष्ण और पाण्डवों से पुनः कहने लगे---राजन् ! सुनो, सतयुग में धर्म अपने संपूर्ण रूप में प्रतिष्ठित होता है। उसमें छल-कपट या दंभ नहीं होता। उस समय धर्म रुपी वृक्ष के चारों चरण मौजूद रहते हैं। त्रेता युग में एक अंश में अधर्म अपना पैर जमा लेता है; इससे धर्म का एक पैर क्षीण हो जाता है और तीन ही पैरों पर वह स्थित रहता है। द्वापर में धर्म आधा ही रह जाता है, आधे में अधर्म आकर मिल जाता है। फिर तमोमय कलियुग के आने पर तीन अंशों से जगत् पर अधर्म का आक्रमण होता है, चौथाई अंश में ही धर्म रह जाता है। सतयुग के बाद ज्यों-ज्यों दूसरा युग आता है त्यों-ही-त्यों मनुष्य की आयु, बुद्धि, बल और तेज कम होने लगता है। युधिष्ठिर ! कलियुग में सभी वर्ग के लोग भीतर कपट रखकर धर्म का आचरण करेंगे। मनुष्य धर्म का जाल रचकर लोगों को अधर्म में फसायेंगे। अपने को पण्डित मानने वाले लोग सत्य का गला घोटेंगे। सत्य की हानि होने से उनकी आयु थोड़ी हो जायगी। आयु की कम के कारण वे पूर्ण विद्या का उपार्जन नहीं कर सकेंगे। विद्याहीन होने से अज्ञानी मनुष्यों को लोभ दबा लेगा। लोभ और क्रोध के वशीभूत हुए मूढ़ मनुष्य कामनाओं में आसक्त होंगे। इससे उनमें आपस में बैर बढ़ेगा, फिर वे एक-दूसरे के प्राण लेने की घात में लगे रहेंगे। सभी वर्ग के लोग आपस में संतानोत्पादन करके वर्णसंकर हो जायेंगे; इनका विभागकरना कठिन हो जायेगा। ये सभी सत्य और तप का परित्याग करके नीच काम करेंगे। कलियुग के अन्त में संसार की ऐसी ही दशा होगी। वस्त्रों में सनके बने हुए वस्त्र अच्छे समझे जायेंगे। उस समय पुरुषों के केवल स्त्रियों से मित्रता होगी। लोग मछली-मांस खायेंगे और बकरी-भेंड़ का दूध पियेंगे। गौओं का तो दर्शन दुर्लभ हो जायगा। लोग एक-दूसरे को लूटेंगे, मारेंगे। भगवान का कोई नाम नहीं लेगा। सभी नास्तिक और चोर होंगे। पशुओं के अभाव में खेती-बारी चौपट हो जायगी। सारा जगत् म्लेच्छवत् व्यवहार करेगा, सत्कर्म और यज्ञ आदि का कोई नाम भी न लेगा। समस्त विश्व आनन्दहीन, उत्सवशून्य हो जायगा। लोग प्रायः दीनों, असहायों का धन हर लेंगे।  लोग मान एवं अहंकार में चूर रहेंगे। लोगों को दया नहीं आवेगी। न तो कोई किसी से कन्या की याचना करेगा और न कोई कन्यादान ही करेंगे। कलियुग के वर-कन्या अपने-आप ही स्वयंवर कर लेंगे।अपने सगे-संबंधी ही धनका हरण करनेवाले हो जायेंगे। सब एक जाति के हो जायेंगे। भक्ष्याभक्ष्य का विचार छोड़कर सब लोग एक सा ही आहार करेंगे। स्त्री और पुरुष---सब स्वेच्छाचारी होंगे; वे एक-दूसरे के कार्य और विार को सहन नहीं कर सकेंगे। न कोई किसी का उपदेश सुनेगा न कोई किसी का गुरु होगा। सब अज्ञान में डूबे रहेंगे। उस समय मनुष्य की अधिक-से-अधिक आयु सोलह वर्ष की होगी। अपने पति से स्त्री और और अपनी पत्नी से पुरुष संतुष्ट न होंगे। दोनो ही अतृप्त रहकर परपुरुष और परस्त्री का सेवन करेंगे।व्यापार में क्रय-विक्रय के समय लोभ के कारण सभी सबको ठगेंगे। क्रिया के तत्व को न जानकर भी उसे करने में प्रवृत होंगे। सभी स्वभावतः क्रूर और एक-दूसरे पर अभियोग लगानेवाले होंगे। लोग बगीचे और वृक्ष कटवा डालेंगे, इसके लिये उनके हृदय में तनिक भी पीड़ा न होगी। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर भी संदेह हो जायगा। प्रजा सर्वदा टैक्स के भारी भार से दबी रहेगी।समस्त लोक का व्यवहार विपरीत और उलट-पुलट हो जायगा। लोग हड्डी जुड़ी हुई दीवारों की पूजा करेंगे, देवमूर्तियों की नहीं। उस समय के द्विजातियों की सेवा नहीं करेंगे। महर्षियों के आश्रम, देवस्थान, धर्मसभा आदि सभी स्थानों की भूमि हड्डियों से जुड़ी हुई होगी। देवमन्दिर कहीं नहीं होंगे। यही सब युगान्त की पहचान है। जिस समय अधिकांश मनुष्य धर्महीन, माँसभोजी और शराब पीनेवाले होंगे, उसी समय इस युग का अन्त होगा। उस समय बिना समय के वर्षा होगी। शिष्य गुरुओं का अपमान करेंगे, सदा उनका अहित करेंगे। आचार्य धनहीन होंगे। उन्हें शिष्यों की फटकार सुननी होगी। धन के लालच से ही मित्र और सम्बन्धी अपने निकट रहेंगे। युगान्त आने पर समस्त प्राणियों का अभाव हो जायगा। सारी दिशाएँ प्रज्जवलित हो उठेंगी। तारों की चमक जाती रहेगी। नक्षत्र और ग्रहों की गति विपरीत हो जायगी। लोगों को व्याकुल करनेवाली प्रचण्ड आँधियाँ उठेंगी, महान् भय की सूचना देनेवाले उल्कापात अनेकों बार होंगे। एक सूर्य तो हैं ही, छः और उदय होंगे और सातों एक साथ तपेंगे। कड़कती हुई बिजली गिरेगी, सब दिशाओं में आग लगेगी। उदय और अस्त के समय सूर्य राहू से ग्रस्त दिखेगा। इन्द्र बिना समय की ही वर्षा करेगा। बोयी हुई खेती उगेगी ही नहीं। स्त्रियाँ कठोर स्वभाववाली और कटुभाषिणी होंगी। उन्हें रोना ही अधिक पसंद होगा। वे पति की आज्ञा में नहीं रहेंगी। पुत्र माता-पिता की हत्या करेगा। पत्नी अपने बेटे से मिलकर पति का वध कर डालेगी। अमावस्या के बिना ही सूर्यग्रहण लगेगा। पथिकों को माँगने पर भी कहीं अन्न, जल और ठहरने के लिये स्थान नहीं मिलेगा; वे सब ओर से कोरा जवाब पाकर निराश होकर रास्ते पर ही पड़े रहेंगे। कौए, हाथी, पशु-पक्षी और मृग आदि युगान्त के समय बड़ी कठोर वाणी बोलेंगे। मनुष्य मित्रों, सम्बन्धियों और अपने कुटुम्ब के लोगों को भी त्याग देंगे। स्वदेश त्यागकर परदेश का आश्रय लेंगे। सभी लोग 'हा तात !,  हा बेटा !' इस प्रकार दर्दभरी पुकार मचाते हुए भूमण्डल में भटकते फिरेंगे। युगान्त में संसार की यही अवस्था होगी। उस समय एक बार इस लोक का संहार होगा।इसके बाद कालान्तर में सत्ययुग का आरम्भ होगा, क्रमशः अच्छे कर्मों को करनेवाले शक्तिशाली होंगे। लोक के अभ्युदय के लिये पुनः दैव की अनुकूलता होगी। जब सूर्य, चन्द्रमा और वृहस्पति एक ही राशि मे---एक ही पुष्य नक्षत्र पर एकत्र होंगे, उस समय सत्ययुग का प्रारम्भ होगा।फिर तो मेघ समयपर पानी बरसायेंगे। नक्षत्रों में तेज आ जायगा। ग्रहों की गति अनुकूल हो जायगी। सबका मंगल होगा तथा सुभिक्ष और आरोग्य का विस्तार होगा। उस समय काल की प्ररणा से शम्भल नामक ग्राम के अन्तर्गत विष्णुयशा नामक गृहपति के घरमें एक बालक उत्पन्न होगा, उसका नाम होगा कल्कि विष्णुयशा। वह बालक बहुत ही बुद्धिमान, बलवान् और पराक्रमी होगा। मन के द्वारा चिन्तन करते ही इच्छानुसार उसके पास वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जायेंगे। वह दुष्टों का नाश करके सतयुग का प्रवर्तक बनेगा। धर्म के अनुसार विजय प्राप्त कर वह चक्रवर्ती राजा होगा और इस संपूर्ण जगत् को आनन्द प्रदान करेगा।

Monday, 2 November 2015

वनपर्व---मार्कण्डेय द्वारा बालमुकुन्द का दर्शन और उनकी महिमा का वर्णन

मार्कण्डेय द्वारा बालमुकुन्द का दर्शन और           उनकी महिमा का वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं---राजा युधिष्ठिर ! एक समय की बात है, जब मैं एकार्णव के जल में सावधानीपूर्वक बड़ी देर तक तैरता-तैरता बहुत दूर जाकर थक गया तो विश्राम देने लायक कोई भी सहारा न रहा। तब किसी समय उस अनन्त जलराशि में मैने बड़ा सुन्दर और विशाल वट का वृक्ष देखा। उसकी चौड़ी शाखा पर एक नयनाभिराम श्यामसुन्दर बालक बैठा था। उसका मुख कमल के समान कोमल और चन्द्रमा के समान नेत्रों को आनंद देनेवाला था तथा उसकी आँखें खिले हुए कमल के समान विशाल थीं। राजन् ! उसे देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। सोचने लगा---सारा संसार तो नष्ट हो गया, फिर यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है ? मैं भूत, भविष्य और वर्तमान---तीनों कालों को जानता हूँ, तो भी अपने तपबल से भली-भाँति ध्यान लगाने पर भी उस बालक को न जान सका। तब वह बालक बोला, मार्कण्डेय ! मैं जानता हूँ तुम बहुत थक गये हो और विश्राम लेने की इच्छा करते हो। अतः हे मुने ! तुमपर कृपा करके मै यह निवास दे रहा हूँ। ' उस बालक के ऐसा कहने पर मुझे दीर्घजीवन और मनुष्य शरीर पर बड़ा खेद हुआ। इतने में ही बालक ने अपना मुँह फैलाया और दैवयोग से मैं परवश की भाँति उसमें प्रवेश कर गया, सहसा उसके उदर में जा पड़ा। वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरों से भरी हुई ये पृथ्वी दिखाई दी। मैने उसमें गंगा, यमुना, चन्द्रभागा, सरस्वती, सिंधु, नर्मदा और कावेरी आदि नदियों को भी देखा तथा रत्नों और जलजन्तुओं से भरा समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा से शोभायमान आसमान तथा पृथ्वी पर अनेकों वन-उपवन भी देखे। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी चराचर जगत् मेरे देखने में आया था, सब उसबालक के उदरमें मुझे दीख पड़ा। मैं प्रतिदिन फलाहार करता और घूमता रहता। इस प्रकार सौ वर्ष तक विचरता रहा, किन्तु कभी उसके शरीर का अन्त न मिला। अन्त में मैने मन वाणी से उस वरदायक दिव्य बालक की ही शरण ली। बस, सहसा उसने अपना मुख खोला और मैं वायु के समान वेग से अकस्मात् उसके मुख से बाहर आ गया। देखा तो वह अमित तेजस्वी बालक पहले ही की भाँति सारे विश्व को अपने उदर में रखकर उसी वटवृक्ष की शाखा पर विराजमान है। मुझे देखकर उस महाकान्तिवाले पीताम्बरधारी बालक ने प्रसन्न होकर कुछ मुस्कराते हुए कहा, 'मार्कण्डेय ! मैं पूछता हूँ, तुमने मेरे इस शरीर में अबविश्राम तो कर लिया न ? तुम थके से जान पड़ते हो।' उस अतुलित तेजस्वी बालक के असीम प्रभाव को देखकर ममैने उसके लाल-लाल तलुओं और कोमल अंगुलियों से सुशोभित दोनो सुन्दर चरणों को मस्तक से छुआकर प्रणाम किया। फिरविनय से हाथ जोड़े प्रयत्नपूर्वक उसके पास जाकर उस कमलनयन भगवान के दर्शन किये और उनसे कहने लगा,'भगवन् ! मैने आपके शरीर के भीतर प्रवेश करके वहाँ समस्त चराचर जगत् देखा है। प्रभो ! बताइये तो, आप इस विराट विश्व को उदर में धारण कर यहाँ बालक वेष में क्यों विराजजमान हैं ? कबतक आप इस रुप में यहाँ रहेंगे ?'मार्कण्डेय ! जिन धर्मों के आचरण से मनुष्य को कल्याण की प्राप्ति होती है, वे हैं---सत्य, दान, तप और अहिंसा। ज्ञानी स्वाध्याय करके शान्तचित्त एवं क्रोधशून्य होकर मुझे ही प्राप्त करते हैं। पापी, लोभी, कृपण, अनार्य और अजितेन्द्रिय मनुष्यों को मैं कभी नहीं मिल सकता। जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं अवतार धारण करता हूँ। हिंसा में प्रेम रखनेवाले दैत्य और दारुण राक्षस जब इस संसार में उत्पन्न होकर अत्याचार करते हैं और देवता भी उनका वध नहीं कर पाते, उस समय मैं पुण्यवानोंके घर अवतार लेकर सब अत्याचारियों का संहार करता हूँ। देवता, मनुष्य, नाग, राक्षस आदि प्राणियों तथा स्थावर भूतों को मैं अपनी माया से ही रचता हूँ ओर माया से ही उनका संहार करता हूँ। मैं सृष्टि रचना के समय अचिन्त्य स्वरूप धारण करता हूँ और मर्यादा की स्थापना तथा रक्षा के लिये मानव शरीर से अवतार लेता हूँ। सत्ययुग में मेरा वर्ण श्वेत, त्रेता में पीला, द्वापर में लाल और कलियुग में कृष्ण होता है। कलि में धर्म का एक ही भाग शेष रह जाता है और अधर्म के तीन भाग रहते हैं। जब जगत् का विनाशकाल उपस्थित होता है, तब महादारुण कालरूप होकर मैं अकेला ही स्थावर-जंगम संपूर्ण त्रिलोकी को नष्ट कर देता हूँ। मैं स्वायम्भू, सर्वव्यापक, अनन्त, इन्द्रियों का स्वामी और महान् पराक्रमी हूँ। यह जो सब भूतों का संहार करनेवाला और सबको उद्योगशील बनानेवाला निराकार कालचक्र है, इसका संचालनमैं ही करता हूँ। हे मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा मेरा स्वरूप है। मैं संपूर्ण प्राणियों के भीतर स्थित हूँ किन्तु मुझे कोई नहीं जानता। मैं शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाला विश्वात्मा नारायण हूँ। सहस्त्रयुग के अन्त में जो प्रलय होता है, उसमें उतने ही समय तक सब प्राणियों को मोहित करके जल में शयन करता हूँ। यद्यपि मैं बालक नहीं हूँ, फिर भी जबतक ब्रह्मा नहीं जागता तबतक बालक रूप धारण करके यहाँ रहता हूँ। विप्रवर ! इस प्रकार मैने तुमसे अपने स्वरूप का उपदेश किया है, जिसको जानना देवता और असुरों के लिये भी कठिन है। जबतक भगवान् ब्रह्मा का
  जागरण न हो, तबतक तुम श्रद्धा और विश्वासपूर्वक सुख से विचरते रहो। ब्रह्मा के जागने पर मैं उनसे एकीभूत होकर आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी की तथा अन्य चराचर भूतों की भी सृष्टि करूँगा। युधिष्ठिर ! यह कहकर वे परम अदभुत भगवान् बालमुुन्द अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार मैने सहस्त्रयुगी के अन्त में के अनत में यह आश्चर्यजनक प्रलय-लीला देखी थी। उस समय जिन परमात्मा का मुझे दर्शन हुआ था, ये तुम्हारे सम्बनधी श्रीकृष्ण वे ही हैं। इन्हीं के वरदान से मेरी स्मरण-शक्ति कभी क्षीण नहीं होती, आयु लम्बी हो गयी है और मृत्यु मेरे वश में रहती है। ये गोविन्द ही प्रजापतियों के भी पति हैं। पाण्डवों ! येमाधवही सबके माता-पिता हैं; तुम इन्हीं की शरण में जाओ। ये ही सबको शरण देनेवाले हैं। मार्कण्डेय मुनि के इस प्रकार कहने पर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी---सबने उठकर भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और भगवान् ने भी उनका आदर करे हुए आश्वासन दिया।

     

Sunday, 1 November 2015

वनपर्व---श्रीकृष्ण की महिमा और सहस्त्रयुग के अन्त में होनेवाले प्रलय का वर्णन

श्रीकृष्ण की महिमा और सहस्त्रयुग अन्त में होनेवाले प्रलय का वर्णन                       
                                                                                                                                           
                                                                                                                                                                                       
  1. युधिष्ठिर ने पुनः मुनिवर मार्कण्डेयजी से कहा, 'महामुने ! आपने हजार-हजार युगों के अन्तर से होनेवाले अनेकों महाप्रलय दखे हैं। मैं आपसे सारी सृष्टि के कारण से सम्बन्ध रखनेवाली कथा सुनना चाहता हूँ। मार्कण्डेयजी बोले---राजन् ! मैं स्वायम्भू ब्रह्मा को नमस्कार करके तुम्हे यह कथा सुनाता हूँ। ये जो हमलोगों के पास बैठे हुए पीताम्बरधारी जनार्दन ( श्रीकृष्ण ) हैं,ये ही इस संसार की सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। ये ही भगवान् समस्त भूतों के अन्तर्यामी और उनके रचयिता हैं। ये अन्तर्यामी रूप से सबको जानते हैं, इन्हें वेद भी नहीं जानते। संपूर्ण जगत् का प्रलय हो जाने के पश्चात् इन आदिभूत परमेश्वर से ही यह संपूर्ण आशचर्यमय जगत् इन्द्रजाल के समान पुनः उत्पन्न हो जाता है। चार हजार दिव्य वर्षों का एक सतयुग बताया गया है, उतने ही (चार) सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांश के होते हैं। इस प्रकार कुल अड़तालिस सौ दिव्य वर्ष सतयुग के हैं। तीन हजार दिव्य वर्षों का त्रेतायुग होता है, तथा तीन सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांश के होते हैं। इस प्रकार यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षों का होता है। द्वापर का मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही (दो) सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांश के हैं, अतः सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापर के हैं। कलियुग का मान है एक हजार दिव्य वर्ष। उसकी संध्या और संध्यांश के मान भी सौ-सौ दिव्य वर्ष हैं। इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षों का होता है। कलियुग के क्षीण हो जाने पर पुनः सतयुग का आरम्भ होता है। इस प्रकार बारह हजार दिवय वर्षों की एक चतुर्युगी होती है। एक हजार चतुर्युग बीतने पर ब्रह्मा का एक दिन होता है। यह सारा जगत् ब्रह्मा के दिनभर रहता है, दिन समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है। इसी को इस विश्व का प्रलय कहते हैं। सहस्त्रयुग की समाप्ति में जब थोड़ा सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुग के अन्तिंम भाग में प्रायः सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं। सभी अपने धर्म को छोड़कर अपने विचार और व्यवहार से विपरीत हो जाते हैं तो प्रलय का पूर्वरूप आरम्भ हो जाता है। पृथ्वी पर म्लेच्छों का राज हो जाता है। महान् पापी और असत्यवादी लोग राजा होते हैं। सभी अपन-अपने धर्म त्यागकर दूसरे वर्णों के कर्म करने लगते हैं। सबकी आयु, बल, वीर्य और पराक्रम घट जाता है। मनुष्य नाटे कद के होने लगते हैं; उनकी बातचीत में सत्य का अंश बहुत कम होता है। उस समय की स्त्रियाँ भी नाटे कदवाली होती हैं। उनमें शील और सदाचार नहीं रह जाता। गाँव-गाँव में अन्न बिकनें लगता है, गुरु विद्या बेचने लगते हैं, स्त्रियाँ वेश्यावृति करने लगती हैं, गौएँ बहुत कम दूध देती हैं। वृक्षों में फल-फूल बहुत कम लगते हैं। उनपर अच्छे पक्षियों के बदले अक्सर कौए ही बसेरा लेते हैं। ब्राह्मणलोग लोभवश सभी से दक्षिणा लेते हैं, भिक्षा माँगने के बहाने दसों दिशाओं में घूम-घूमकर चोरी करते हैं। गृहस्थ भी अपने ऊपर टैक्स का भार बढ़ जाने से इधर-उधर चोरी करते फिरते हैं। जिनसे शरीर में माँस औौर रक्त बढ़े उन लौकिक कार्यों को ही करते हैं---दुर्बल होने के भय से व्रत और तपस्या का नाम तक नहीं लेते। उस समय न तो समयपर वर्षा होती है और न बोये हुए बीज ही ठीक से जमते हैं। लोक बनावटी नाप-तौल से व्यापार करते हैं तथा वयापारी बड़े कपटी होते हैं।  राजन् ! कोई  पुरुष विश्वास कर धरोहर की रीति से उनके यहाँं धन रखते हैं तो पापी निर्लज्ज उनकी धन को हड़प जाने का  प्रत्न करते हैं और उनसे कह देते हैं कि 'हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी  नहीं है।'  स्त्रियाँ पति को धोखा देकर व्यभिचार करती हैं। वीर पुरुषों की स्त्रियाँ भी अपने स्वामी का परित्याग करके दूसरों का आाश्रय लेती हैं।.इसी प्रकारजब सहस्त्र युग पूरे होने को आतते हैं तो बहुत वर्षों तक वृष्टि बन्द हो जाती है, इससे थोड़ी शकतिवाले प्राणी भूख से व्याकुल होकर मर जाते हैं।  इसके बाद सत सूर्यों का बहुत प्रचंड तेज बढ़ता है; वे सातों सूर्य नदी औरर समुद्र आदि में जो पानी होता है, उसे भी सोख लेते हैं। उस समय जो भी तृण ,काष्ठ अथवा सूखे-गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भष्मीभूत दिखायी देते है।  इसके बाद संवर्तक नाम की प्रलयकालीन अग्नि वायु के साथ संपूर्ण लोक में फैल जाती है। पृथ्वी का भेदन कर वह रसातल में पहुँच जाती है।  इससे देवता, दानव और यक्षों को महान् भय पैदा हो जाता है। वह नागलोक को जलाकर इस पृथ्वी के नीचे जो कुछ भी है, उस सब को क्षणभर में नष्ट कर देती है। इसके बाद अशुभकारी वायु और अग्नि देवता, असुर, गंधर्व, यक्ष, सर्प राक्षस आदि से युक्त समस्त विश्व को ही जलाकर भष्म कर डालते हैं। फिर आकाश  में मेघों की घनघोर घटा घिर जाती है, बिजली कौंधने लगती है और भयंकर गर्जना होती है। उस समय इतनी वर्षा होती है कि भयानक अग्नि शान्त हो जाती है। ये मेघ बारह वर्ष तक वर्षा करते रहते हैं। इससे समुद्र मर्यादा छोड़ देते हैं, पर्वत फट जाते हैं और पृथ्वी जल में डूब जाती है। तत्पश्चात् पवन के वेग से आपस में ही टकराकर ये मेघ नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद ब्रह्माजी उस प्रचंड पवन को पीकर उस एकार्णव के जल में शयन करते हैं। उस समय देवता, असुर, यक्ष, राक्षस तथा अन्य चराचर जीवों का नाश हो जाता है। केवल मैं ही उस एकार्णव में उठती हुई लहरों के थपेड़े खाता हुआ इधर-उधर भटकता फिरता हूँ।