Sunday, 20 September 2020

विन्द_अनुविन्द और चित्रसेन का चित्रक का वध, अश्त्थामा और भीमसेन का भयंकर युद्ध

तदनन्तर श्रुतकर्मा ने क्रोध में भरकर पचास बाणों से राजा चित्रसेन को घायल किया। अभिसारनरेश चित्रसेन ने भी नौ बाणों से श्रुतकर्मा को बींधकर पाँच सायकों से उसके सारथि को भी पीड़ित किया। तब श्रुतकर्मा ने चित्रसेन के मर्मस्थान में तीखे नाराच से वार किया। उसकी गहरी चोट लगने से वीरवर चित्रसेन को मूर्छा आ गयी। थोड़ी देर में जब होश हुआ तो उसने एक भल्ल मारकर श्रुतकर्मा का धनुष काट दिया और फिर सात बाणों से उसे भी बींध डाला। श्रुतकर्मा को पुनः क्रोध आ गया, उसने शत्रु के धनुष के दो टुकड़े कर डाले और तीन सौ बाण मारकर उसे खूब घायल किया। फिर एक तेज किये हुए भाले से चित्रसेन का मस्तक काट गिराया। अभिसारनरेश चित्रसेन मारा गया_ यह देखकर उसके सैनिक श्रुतकर्मा पर टूट पड़े। परंतु उसने अपने सायकों की मार से उन सबको पीछे हटा दिया। दूसरी ओर प्रतिविन्ध्य ने चित्र को पाँच बाणों से घायल करके तीन सायकों से उसके सारथि को बींध दिया और एक बाण मारकर उसकी ध्वजा काट डाली। तब चित्र ने उसकी बाँहों और छाती में नौ भल्ल मारे। यह देख प्रतिविन्ध्य ने उसका धनुष काट दिया और पचीस बाणों से उसे भी घायल किया। फिर चित्र ने भी प्रतिविन्ध्य पर एक भयंकर शक्ति का प्रहार किया, किन्तु उसने उस शक्ति  को हँसते हँसते काट दिया। तब उसने प्रतिविन्ध्य पर गदा चलायी। उस गदा ने प्रतिविन्ध्य के घोड़े और सारथि को मौत के घाट उतार  उसके रथ को भी चकनाचूर कर दिया।
प्रतिविन्ध्य पहले से ही कूदकर पृथ्वी पर आ गया था, उसने चित्र पर शक्ति का प्रहार किया। शक्ति को अपने ऊपर आते देख चित्र ने उसे हाथ से पकड़ लिया और तुरत प्रतिविन्ध्य पर ही चलाया। वह शक्ति प्रतिविन्ध्य की दाहिनी भुजा पर चोट करती हुई भूमि पर जा पड़ी। इससे प्रतिविन्ध्य को बड़ा क्रोध हुआ, उसने चित्र को मार डालने की इच्छा से तोमर का प्रहार किया। वह तोमर उसकी छाती और कवच को छेदता हुआ जमीन में घुस गया तथा राजा चित्र अपनी बाँहें फैलाकर भूमि पर ढ़ह पड़ा। चित्र को मारा गया देख आपके सैनिकों ने प्रतिविन्ध्य पर बड़े वेग से धावा किया, परन्तु उसने अपने सायकसमूहों की वर्षा करके उन सबको पीछे भगा दिया। उस समय, जबकि कौरव_सेना के समस्त योद्धा भागे जा रहे थे, केवल अश्त्थामा ही महाबली भीमसेन का सामना करने के लिये आगे बढ़ा। फि उन दोनों में घोर संग्राम होने लगा। अश्त्थामा ने पहले एक बाण मारकर भीमसेन को बींध दिया। फिर नब्बे बाणों से उसके मर्मस्थानों में आघात किया। 
तब भीमसेन ने भी एक हजार बाणों से द्रोणपुत्र को आच्छादित करके सिंह के समान गर्जना की। किन्तु अश्त्थामा ने अपने सायकों से भीमसेन के बाणों से द्रोणपुत्र को आच्छादित करके सिंह के समान गर्जना की। किन्तु अश्त्थामा ने अपने सायकों से भीमसेन के बाणों को रोक दिया और मुस्कराते हुए उसने भीम के ललाट में एक नाराच मारा। यह देख भीम ने भी तीन नाराचों से अश्त्थामा के ललाट को बींध डाला। तब द्रोणकुमार ने सौ बाण मारकर को पीड़ित किया, किन्तु इससे भीम तनिक भी विचलित नहीं हुए। इसी प्रकार भीम ने भी अश्त्थामा को तेज भीमसेन किये हुए सौ बाण मारे, परन्तु वह डिग न सका। अब उसने बड़े_बड़े अस्त्रों का प्रयोग आरम्भ किया और भीमसेन अपने असेत्रों से उनका नाश करने लगे। इस तरह उन दोनों में भयंकर अस्त्रयुद्ध छिड़ गया। उस समय भीमसेन और अश्त्थामा के छोड़े हुए बाण आपस में टकराकर आपकी सेना के चारों ओर संपूर्ण दिशा में प्रकाश फैला रहे थे। सायकों से आच्छादित हुआ आकाश बड़ा भयंकर दिखायी देता था। बाणों के टकराने से आग पैदा होकर दोनों सेनाओं को दग्ध कर रही थी। उन दोनों वीरों का अद्भुत एवं अचिंत्य पराक्रम देख सिद्ध और चारणों के समुदायों को बड़ा विस्मय हो रहा था।
देवता, सिद्ध तथा बड़े_बड़े ऋषि उन दोनों को शाबाशी दे रहे थे।  वे दोनों महारथी मेघ के समान जान पड़ते थे; वे बाणरूपी जल को धारण किये शस्त्ररूपी बिजली की चमक से प्रकाशित हो रहे थे और बाणों की बौछार से एक_दूसरे को ढ़के देते थे। दोनों ने दोनों की ध्वजा काटकर सारथि और घोड़ों को बींध डाला, फिर एक_दूसरे को बाणों से घायल करने लगे। बड़े वेग से किये हुए परस्पर के आघात से जब वे अत्यन्त घायल हो गये तो अपने_अपने रथ के पिछले भाग में गिर पड़े। अश्त्थामा का सारथि उसे मूर्छित जानकर रणभूमि से दूर हटा ले गया। भीम के सारथि ने भी उन्हें अचेत जानकर ऐसा ही किया।

कर्णपर्व _ कर्ण के सेनापतित्व में युद्ध का आरम्भ और भीम के द्वारा क्षेमधूर्ति का वध

नारायणं नमस्कृतयं नरं चैव नरोत्तम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके नित्यसखा नरस्वरूप नर_रत्न अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता महर्षि वेदव्यास को नमस्कार करके आसुरी शक्तियों पर विजय_प्राप्तिपूर्वक अंतःकरण को शुद्ध करनेवाले महाभारत ग्रंथ का पाठ करना चाहिषे।
वैशम्पायनजी कहते हैं_ राजन् ! द्रोणाचार्य के मारे जाने से दुर्योधन आदि राजा बहुत घबरा गये, शोक से उनका उत्साह नष्ट हो गया। वे द्रोण के लिये अत्यन्त अनुताप करते हुए अश्त्थामा के पास जाकर बैठे और कुछ देर तक शास्त्रीय युक्तियों से उसे आश्वासन देते रहे; फिर प्रदोष के समय अपने_अपने शिविर में चले गये। कर्ण, दुःशासन और शकुनि ने दुर्योधन के ही शिविर में वह रात व्यतीत की।
सोते समय वे चारों ही पाण्डवों को दिये हुए क्लेशों पर विचारकरते रहे। पाण्डवों को जूए में जो कष्ट भोगने पड़े थे तथा द्रौपदी को जो भरी सभा में घसीटकर लाया गया था_ वे सब बातें याद करके उन्हें बड़ा पश्चाताप हुआ, उनका चित्त बहुत अशांत हो गया।
तत्पश्चात् जब सबेरा हुआ तो सबने शास्त्रीय विधि के अनुसार अपना_अपना नित्यकर्म पूरा किया; फिर भाग्य पर भरोसा करके धैर्यधारणपूर्वक उन्होंने सेना को तैयार होने की आज्ञा दी और युद्ध के लिये निकल पड़े। दुर्योधन ने कर्ण को सेनापति के पद पर अभिषेक किया और दही, घी, अक्षत, स्वर्णमुद्रा, गौ, सोना तथा बहुमूल्य वस्त्रों द्वारा उत्तम ब्राह्मणों की पूजा करके उनके आशीर्वाद प्राप्त किये। फिर सूत, मागध तथा वंदीजनों ने जयजयकार किया। इसी प्रकार पाण्डव भी प्रातःकृत्य समाप्त कर युद्ध का निश्चय कर शिविर से बाहर निकले।
धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! अब तुम मुझे यह बताओ कि कर्ण ने सेनापति होने के बाद कौन सा कार्य किया ।
संजय ने कहा_महाराज ! कर्ण की सम्मति जानकर दुर्योधन ने रणभेरी बजवायी और सेना को तैयार हो जाने की आज्ञा दी। उस समय बड़े-बड़े गजराजों, रथों, कवच बाँधनेवाल़े मनुष्यों तथा घोड़ों का कोलाहल बढ़ने लगा। कितने ही योद्धा उतावले हो_होकर एक_दूसरे को पुकारने लगे।
इन सबकी मिली हुई ऊँची आवाज से आसमान गूँज उठा। इसी समय सेनापति कर्ण एक दमकते हुए रथ पर बैठा दिखायी पड़ा। उसके रथ पर श्वेत पताका फहरा रही थी। घोड़े भी सफ़ेद थे। ध्वजा में सर्प का चिह्न बना हुआ था। रथ के भीतर सैकड़ों तरकस, गदा, कवच, शतध्नी किंकिणी, शक्ति, शूल, तोमर और धनुष रखे हुए थे। कर्ण ने शंख बजाया और उसकी आवाज सुनते ही योद्धा उतावले होकर दौड़े। इस प्रकार कौरवों की बहुत बड़ी सेना को उसने शिविर से बाहर निकाला तथा पाण्डवों जीतने की इच्छा से उसका मगर के आकार का एक व्यूह बनाकर रणभूमि को कूच किया।
उस मकर_व्यूह के मुख के स्थान में स्वयं कर्ण उपस्थित हुआ। दोनों नेत्रों की जगह शूरवीर शकुनि और उलूक खड़े हुए। मस्तक_भाग में अश्त्थामा तथा कण्ठदेश में दुर्योधन के सभी भाई थे। व्यूह के मध्यभाग में बहुत बड़ी सेना से घिरा हुआ महाराज दुर्योधन था। बायें चरण के स्थान में कृतवर्मा खड़ा हुआ था, उसके साथ रणोन्मत्त ग्वालों की नारायणी सेना थी।
दहिेने चरण की जगह कृपाचार्य थे, उनके साथ महान् धनुर्धर त्रिगर्तों और दक्षिणात्यों की सेना थी। वाम चरण के पिछले भाग में मद्रदेशीय योद्धाओं को साथ लेकर राजा शल्य खड़े हुए। दाहिने चरण के पीछे राजा सुषेण था, उसके साथ एक हजार रथियों और तीन सौ हाथियों की सेना थी। व्यूह की पूँछ के स्थान में अपनी बहुत बड़ी सेना से घिरे हुए दोनों भाई चित्र और चित्रसेन थे।
इस प्रकार व्यूह बनाकर कर्ण ने जब रणांगण की ओर कूच किया तो धर्मराज युधिष्ठिर ने अर्जुन को देखकर कहा_पार्थ ! देखो तो सही, कर्ण ने कौरवसेना की किस तरह मोर्चेबन्दी की है और महारथी वीर कैसे इसकी रक्षा कर रहे हैं।
धृतराष्ट्र की महासेना में जितने बड़े _बड़े  वीर थे, वे सब प्रायः मारे जा चुके हैं; अब थोड़े ही रह गये हैं। अतः मैं तो इसे तिनके के समान समझता हूँ। इस सेना में सूतपुत्र कर्ण ही एक महान् धनुर्धर वीर हैं, जिसे देवता भी नहीं जीत सकते। महाबाहो । अब इस कर्ण को मार डालने से तुम्हारी विजय होगी और मेरे हृदय का काँटा भी निकल जायगा। इसलिये तुम अपनी इच्छानुसार अपनी सेना की व्यूहरचना करो।‘
भाई की बात सुनकर अर्जुन ने शत्रुओं के मुकाबले में अपनी सेना का अर्धचन्द्राकार व्यूह बनाया। उसके वाम भाग में भीमसेन, दाहिने भाग में धृष्टधुम्न तथा मध्य में राजा युधिष्ठिर और अर्जुन खड़े हुए। नकुल और सहदेव_ये दोनों युधिष्ठिर के पीछे थे। पांचालदेशीय युधामन्यु और उत्तमौजा अर्जुन के पहियों की रक्षा करने लगे।
शेष वीरों में से जिन्हें व्यूह में जहाँ स्थान मिला, वे वहीं खूब उत्साह के साथ डट हये। इस प्रकार कौरव तथा पाण्डवों ने व्यूह बनाकर फिर युद्ध में मन लगाया। दोनों दलों में ऊँची आवाज करनेवाले बाजे बज उठे। विजयाभिलाषी शूरवीरों का सिंहनाद सुनायी देने लगा। महान् धनुर्धर कर्ण को व्यूह के मुहाने पर कवच धारण किये उपस्थित देख कौरव योद्धा द्रोणाचार्य के वियोग का दुःख भूल गये। तदनन्तर कर्ण तथा अर्जुन आमने_सामने आकर खड़े हुए और दोनों एक_दूसरे को देखते ही क्रोध में भर गये। उनके सैनिक भी उछलते_कूदते हुए परस्पर जा भिड़े। 
फिर तो भयानक युद्ध छिड़ गया; हाथी, घोड़े और रथों के सवार तथा पैदल योद्धा एक_दूसरे पर प्रहार करने लगे। वे अर्धचन्द्र, भल्ल, क्षुरप्र, तलवार, पट्टिश और फरसों से अपने प्रतिपक्षियों के मस्तक काटने लगे। मरे हुए वीर हाथी, घोड़ों तथा रथों से गिर_गिरकर धराशायी होने लगे। सैनिकों के हाथ, पैर और हथियार सभी चलने लगे; उनके द्वारा वहाँ महान् संहार आरम्भ हो गया। इस प्रकार जब सेना का विध्वंश हो रहा था, उसी समय भीमसेन आदि पाण्डव हमलोगों पर चढ़ आये। भीमसेन हाथी पर बैठे हुए थे। उन्हें दूर से ही आते देख राजा क्षेममूर्ति ने, जो स्वयं भी हाथी पर सवार था, युद्ध के लिये ललकारा और उनपर धावा कर दिया। पहले उन दोनों के हाथियों में ही युद्ध आरम्भ हुआ। जब हाथी लड़ते_लड़ते आपस में सट गये तो वे दोनों वीर तोमरों से एक_दूसरे पर जोरदार प्रहार करने लगे।
फिर धनुष उठाकर दोनों ने दोनो को बींधना आरंभ किया। थोड़ी ही देर में उन्होंने एक_दूसरे का धनुष काटकर सिंहनाद किया और परस्पर शक्ति एवं तोमरों की झड़ी लगा दी। इसी बीच में क्षेममूर्ति ने बड़े लेग से एक तोमर का प्रहार कर भीमसेन की छाती छेद डाली, फिर गरजते हुए उसने छः तोमर और मारे। भीमसेन ने भी धनुष उठाया और बाणों की वर्षा से शत्रु के हाथी को बहुत पीड़ित किया; इससे वह भाग चला, रोकने से भी नहीं रुका। क्षेममूर्ति ने किसी तरह हाथी को काबू में किया। क्षेममूर्ति नेक्रोध में भरकर भीमसेन को बाणों से बींध डाला। साथ ही उसके हाथी के भी मर्मस्थानों में चोट पहुँचायी। हाथी उस आघात को न सह सका। वह प्राण त्यागकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। भीमसेन उसके गिरने से पहले ही कूदकर जमीन पर आ गये और अपनी गदा की प्रहार से शत्रु के हाथी को भी उन्होंने मार गिराया। क्षेमधूर्ति भी हाथी से कूदकर नीचे आ गया और तलवार उठाकर भीमसेन की ओर दौड़ा। यह देख भीम ने उसपर गदा से चोट की। उसके आघात से क्षेममूर्ति के प्राण_पखेरू उड़ गये और वह तलवार के साथ ही हाथी के पास गिर पड़ा। महाराज ! क्षेममूर्ति कुलूत देश का यशस्वी राजा था, उसे मारा गया देख आपकी सेना व्यथित होकर रणभूमि से भागने लगी।

Saturday, 27 June 2020

व्यासजी के द्वारा अर्जुन के प्रति भगवान् शंकर की महिमा का वर्णन

धृतराष्ट्र ने पूछा__संजय ! धृष्टधुम्न के द्वारा अतिरथी वीर द्रोणाचार्य के मारे जाने पर मेरे पुत्रों तथा पाण्डवों ने आगे कौन सा कार्य किया ?  संजय ने कहा___महाराज ! उस दिन का युद्ध समाप्त हो जाने पर महर्षि वेदव्यासजी स्वेच्छा से घूमते हुए अकस्मात् अर्जुन के पास आ गये। उन्हें देखकर अर्जुन ने पूछा___’महर्षे ! जब मैं अपने बाणों से शत्रुसेना का संहार कर रहा था, उस समय देखा कि एक अग्नि के समान तेजस्वी महत्रिशूल मेरे आगे चल रहे हैं। वे ही मेरे शत्रुओं का नाश करते थे, किन्तु लोग समझते थे मैं कर रहा हूँ। मैं तो केवल उनके पीछे_पीछे चलता था। भगवन् ! बताइये, वे महापुरुष कौन थे ? 
उनके हाथ में त्रिशूल था, वे सूर्य के समान तेजस्वी थे, अपने पैरों से पृथ्वी का स्पर्श नहीं करते थे । त्रिशूल का प्रहार करते हुए भी वे उसे हाथ से कभी नहीं छोड़ते थे। उनके तेज से उस एक ही त्रिशूल से हजारों नये_नये त्रिशूल प्रकट हो जाते।‘
व्यासजी बोले___अर्जुन ! तुमने भगवान् शंकर का दर्शन किया है । वे तेजोमय अन्तर्यामी प्रभु संपूर्ण जगत् के ईश्वर हैं। सबके शासक तथा वरदाता हैं। तुम उन भगवान् भुवनेश्वर की शरण में जाओ। वे महान् देव हैं, उनका हृदय विशाल है। सर्वत्र व्यापक होते हुए भी वे जटाधारी त्रिनेत्ररूप धारण करते हैं। उनकी ‘रुद्र’ संज्ञा है। उनकी भुजाएँ बडी हैं। उनके मस्तक पर शिखा तथा शरीर पर वल्कल वस्त्र शोभा देता है। वे सबके संहारक होकर भी निर्विकार हैं। किसी से पराजित न होनेवाले और सबको सुख देनेवाले हैं। सबके साक्षी, जगत् की उत्पत्ति के कारण, जगत् के सहारे, विश्व के आत्मा, विश्वविधाता और विश्वरूप हैं। वे ही प्रभु कर्मों के अधिष्ठाता__कर्मों का फल देनेवाले हैं। सबका कल्याण करनेवाले और स्वायम्भू हैं। संपूर्ण भूतों के स्वामी तथा भूत, भविष्य और वर्तमान के कारण भी वे ही हैं। वे ही योग हैं, वे ही योगेश्वर हैं। वे ही सर्व हैं और वे ही सर्वलोकेश्वर। सबसे श्रेष्ठ, सारे जगत् से श्रेष्ठ, श्रेष्ठतम परमेठी भी वे ही हैं। वे ही तीनों लोकों के त्रष्टा और त्रिभुवन के अधिष्ठानभूत विशुद्ध परमात्मा हैं। भगवान् भव भयानक होकर भी चन्द्रमा को मुकुटरूप से धारण करते हैं। वे सनातन परमेश्वर संपूर्ण वागीश्वरों के भी ईश्वर हैं। वे अजेय हैं; जन्म_मृत्यु और जरा आदि विकार उन्हें छू भी नहीं सकते। वे ज्ञानरूप, ज्ञानगम्य तथा ज्ञान में सर्वश्रेष्ठ हैं। भक्तों पर कृपा करके उन्हें मनोवांछित वर दिया करते हैं। भगवान् शंकर के दिव्य पार्षद नाना प्रकार के रूपों में दिखायी देते हैं। वे सब महादेवजी की सदा ही पूजा किया करते हैं। तात् ! वे साक्षात् भगवान् शंकर ही वह तेजस्वी पुरुष हैं, जो कृपा करके तुम्हारे आगे_आगे चला करते हैं उस घोर रोमांचकारी संग्राम में अश्त्थामा, कृपाचार्य और कर्ण जैसे महान् धनुर्धर जिस सेना की रक्षा करते हैं, वे नाना रूपधारी भगवान् महेश्वर के सिवा दूसरा कौन नष्ट कर सकता है ? और जब वे ही आगे आकर खड़े हो जायँ, तो उनके सामने ठहरने का भी कौन साहस कर सकता है ? तीनों लोकों में कोई ऐसा प्राणी नहीं है, जो उनकी बराबरी कर सके। संग्राम में भगवान् शंकर के कुपित होने पर उनकी गंध से भी शत्रु बेहोश होकर काँपने लगते हैं और अधमरे होकर गिर जाते हैं। जो भक्त मनुष्य सदा अनन्यभाव से उमानाथ भगवान् शिव की उपासना करते हैं, वे इस लोक में सुख पाकर अन्त में परमपद को प्राप्त होते हैं। कुन्तीनन्दन ! तुम भी नीचे लिखे अनुसार उन शान्तस्वरूप भगवान् शंकर को सदा नमस्कार किया करो। ‘जो नीलकण्ठ, सूक्ष्मस्वरूप और अत्यन्त तेजस्वी हैं। संसार_समुद्र से तारनेवाले सुन्दर तीर्थ हैं, सूर्यस्वरूप हैं। देवताओं के भी देवता, अनन्त रूपधारी, हजारों नेत्रोंवाले और कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं, परम शान्त और सबके पालक हैं, उन भगवान् भूतनाथ को सदा प्रणाम है।‘
उनके हजारों मस्तक, हजारों नेत्र, हजारों भुजाएँ और हजारों चरण हैं। कुन्तीनन्दन ! तुम उन वरदायक भुवनेश्वर भगवान् शिव की शरण में जाओ।  वे निर्विकार भाव से प्रजा का पालन करते हैं, उनके मस्तक पर जटाजूट सुशोभित होता है। वे धर्मस्वरूप और धर्म के स्वामी हैं। कोटि कोटि ब्रह्माण्डों को धारण करने के कारण उनका उदर और शरीर विशाल है। वे व्याघ्रचर्म ओढा करते हैं। ब्राह्मणों पर कृपा रखनेवाले और ब्राह्मणों के प्रिय हैं।‘जिनके हाथ में त्रिशूल, ढाल_तलवार और पिनाक आदि अस्त्र शोभा पाते हैं, उन शरणागतवत्सल भगवान शिव की शरण में जाता हूँ।‘ इस प्रकार उनकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। जो देवताओं के स्वामी और कुबेर के सखा हैं, उन भगवान् शिव को प्रणाम है। जो सुन्दर व्रत का पालन करते और सुन्दर धनुष धारण करते हैं, जो धनुर्वेद के आचार्य हैं, उन उग्र आयुधवाले देवश्रेष्ठ भगवान् रुद्र को नमस्कार है।
जिनके अनेकों रूप हैं, अनेकों धनुष हैं, जो स्थानु एवं तपस्वी हैं, उन भगवान् रुद्र को नमस्कार है। जो गणपति, वाक्पति, यग्यपति तथा जल और देवताओं के पति हैं, जिनका वर्ण, पीत और मस्तक के बाल सुवर्ण के समान कान्तिमान हैं, उन भगवान् शंकर को नमस्कार है। अब मैं महादेवजी के दिव्य कर्मों को अपने ग्यान और बुद्धि के अनुसार बता रहा हूँ। यदि वे कुपित हो जायँ तो देवता, गन्धर्व, असुर और राक्षस पाताल में छिप जाने पर भी चैन से नहीं रहने पाते।
एक समय की बात है, दक्ष ने भगवान् शंकर की अवहेलना की; इससे उनके यज्ञ में महान् उपद्रव खडा हो गया। जब उन्हें उनका भाग अर्पण किया गया, तभी दक्ष का यज्ञ पूर्ण हो पाया। 
पूर्वकाल की बात है, तीन बलवान असुरों ने आकाश में अपने नगर बना रखे थे। वे नगर विमान के रूप में आकाश में विचरा करते थे। उन तीन नगरों में एक लोहे का, दूसरा चाँदी का और तीसरा सोने का बना था। जो सोने का बना था उसका स्वामी था कमलाक्ष। चाँदी के बने हुए पुर में तारकाक्ष रहता था तथा लोहे के नगर में विद्युन्माली का निवास था। इन्द्रने उन पुरों का भेदन करने के लिये अपने सभी अस्त्रों का प्रयोग किया, पर वे कृतकार्य न हो सके तब इन्द्रादि सभी देवता दुःखी होकर भगवान् शंकर की शरण में गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने कहा___’भगवन् ! इन त्रिपुरनिवासी दैत्यों को ब्रह्माजी ने वरदान दे रखा है, उसके घमण्ड में फूलकर ये भयंकर दैत्य तीनों लोकों को कष्ट पहुँचा रहे हैं। महादेव ! आपके सिवा दूसरा कोई उसका नाश करने में समर्थ नहीं है, आप ही इन देवद्रोहियों का वध कीजिये। ‘देवताओं के ऐसा कहने पर भगवान् शंकर ने उनका हितसाधन करने के लिये ‘तथास्तु’ कहा और गन्धमादन तथा विन्ध्याचल_इन दो पर्वतों को अपनी रथ का ध्वजा बनाया। समुद्र और वनों के सहित संपूर्ण पृथ्वी ही रथ हुई। नागराज शेष को रथ की धुरी के स्थान पर रखा गया। चन्द्रमा और सूर्य_ये दोनों पहिये बने।
एलपत्र के पुत्र को और पुष्पदन्त को जुए की कीलें बनाया। मलयाचल का जुआ बनाया गया। तक्षक नाग ने जुआ बाँधने की रस्सी का काम किया। मलयाचल का जुआ बनाया गया। भगवान् शंकर ने संपूर्ण प्राणियों को घोड़ों की बागडोर में सम्मिलित किया। चारों वेद रथ के चार घोडे बनाये गये। उपवेद लगाम बने। गायत्री और सावित्री का पगहा बना। ॐकार चाबुक हुआ और ब्रह्माजी सारथि। मन्दराचल को गाण्डीव धनुष का रूपदिया गया और वासुकि नाग से उसकी प्रत्यंचा का काम लिया गया। भगवान् विष्णु हुए उत्तम बाण और अग्निदेव को उसका फल बनाया गया। बिजली उसबाण की धार हुई। मेरु को प्रधान ध्वजा बनाया गया। इस प्रकार सर्वदेवमय दिव्य रथ तैयार कर भगवान् शंकर उसपर आरूढ हुए। उस समय संपूर्ण देवता उनकी स्तुति करने लगे। भगवान् शंकर उस रथ में एक हजार वर्ष तक रहे। जब तीनों पुर आकाश में एकत्रित हुए, तो उन्होंने तीन गाँठ तथा तीन फलवाले बाण से उन तीनों पुरों को भेद डाला। दानव उनकी ओर आँख उठाकर देख भी न सके। कालाग्नि के समान बाण से जिस समय वे तीनों लोकों को भष्म कर रहे थे, उस समय पार्वती देवी भी देखने के लिये वहाँ आयीं। उनकी गोदी में एक बालक था,  जिसके सिर में पाँच शिखाएँ थीं। पार्वती ने देवताओं से पूछा__’यह कौन है ?’ इस प्रश्न से इन्द्र के हृदय में असूया की आग जल उठी और उन्होंने उस बालक पर वज्र का प्रहार करना चाहा; किन्तु उस बालक ने हँसकर उन्हें स्तंभित कर दिया। उसकी वज्रसहित उठी हुई बाँह ज्यों_की_त्यों रह गयी। अपनी वैसी ही बाँह लिये इन्द्र देवताओं के साथ ब्रह्माजी की शरण में गये तथा उनको प्रणाम करके बोले, ‘भगवन् ! पार्वतीजी की गोद में एक अपूर्व बालक था, हमने उसे नहीं पहचाना। उसने बिना युद्ध किये खेल ही में हमलोगों को जीत लिया। अतः आप पूछते हैं कि वह कौन था ? उनकी बात सुनकर ब्रह्माजी ने उस अमित तेजस्वी बालक का ध्यान किया और सारा रहस्य जानकर देवताओं से कहा_’उस बालक के रूप में चराचर जगत् के स्वामी भगवान् शंकर थे, उनसे श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है। इसीलिये अब तुम मेरे साथ चलकर उन्हीं की शरण लो।‘ उस समय ब्रह्माजी ने उन्हें ही सब देवताओं में श्रेष्ठ जानकर प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की_‘भगवन् ! तुमही यज्ञ हो, तुमही इस विश्व के सहारे हो और तुमही सबको शरण देनेवाले हो। सबको उत्पन्न करनेवाले महादेव तुमही हो। परमधाम या परमपद तुम्हारा ही स्वरूप है। तुमने इस संपूर्ण चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है। भूत और भविष्य के स्वामी जगदीश्वर ! ये इन्द्र तुम्हारे कोप से पीडित हैं,इनपर कृपा करो। ब्रह्माजी की बात सुनकर महेश्वर प्रसन्न हो गये, देवताओं के कृपा करने के लिये वे ठठाकर हँस पड़े। फिर तो देवताओं ने पार्वतीसहित महादेवजी को प्रसन्न किया। शिव के कोप से जो इन्द्र की बाँह सुन्न हो गयी थी, वह ठीक हो गयी। वे भगवान् शंकर ही रुद्र, शिव, अग्नि, सर्वज्ञ, इन्द्र, वायु और अश्विनीकुमार हैं।
वे ही बिजली और मेघ हैं। सूर्य, चन्द्रमा, वरुण, काल, म़ृत्यु, यम, रात, दिवस, मास,पक्ष, सन्ध्या, धाता, विधाता,विश्वात्मा और विश्वकर्मा भी वे ही हैं। वे निराकार होकर भी संपूर्ण देवताओं का आकार धारण करते हैं। सब देवता उनकी स्तुति करते रहते हैं। वे एक, अनेक, सौ, हजार और लाख हैं। वेदज्ञ ब्राह्मण उनके दो शरीर बताते हैं_ शिव और घोर। ये दोनों अलग_अलग हैं। इन दोनों के भी कई भेद हो जाते हैं। उनका घोर शरीर अग्नि और सूर्य आदि के रूप में प्रकट हैं तथा सौम्य शरीर जल, नक्षत्र एवं चन्द्रमा के रूप में। वेद, वेदांग, उपनिषद, पुराण तथा अध्यात्मशास्त्रों में जो परम रहस्य है, वह भगवान् महेश्वर ही हैं। अर्जुन ! यह है महादेवजी की महिमा। इतनी ही नहीं, वह अत्यन्त महान् तथा अनन्त हैं। मैं एक हजार वर्ष तक कहता रहूँ, तो भी उनके गुणों का पार नहीं पा सकता। जो लोग सब प्रकार की ग्रह_बाधाओं से पीडित हैं और सब प्रकार के पापों में डूबे हुए हैं, वे भी यदि उनकी शरण में आ जायँ तो वे प्रसन्न होकर उन्हें पाप_ताप से मुक्त कर देते हैं तथा आयु, आरोग्य,ऐश्वर्य धन एवं प्रचुर भोग सामग्री प्रदान करते हैं। कुपित होने पर वे सबका संहार कर डालते हैं। महाभूतों के ईश्वर होने के कारण उन्हें महेश्वर कहते हैं। वेदों में भी इनकी शतरुद्रिय और अनन्तरुद्रियनाम की उपासना बतायी गयी है। भगवान् शंकर दिव्य और मानव सभी भोगों के स्वामी हैं। संपूर्ण विश्व को व्याप्त करने के कारण वे ही विभु और प्रभु हैं। शिवलिंग की पूजा करने से भगवान् शिव बहुत प्रसन्न होते हैं।
यद्यपि उनके सब ओर नेत्र हैं, तथापि एक विलक्षण अग्निमय नेत्र अलग भी है, जो सदा प्रज्जवलित रहता है। वे सब लोकों में व्याप्त होने के कारण सर्व कहलाते हैं। वे सबके कर्मों में सब प्रकार के अर्थ सिद्ध करते हैं। तथा संपूर्ण मनुष्यों का कल्याण चाहते हैं, इसलिये इन्हें शिव कहते हैं। महान् विश्व का पालन करने से महादेव, स्थिति के हेतु होने से स्थानु और सबके उद्भव होने के कारण भव कहलाते हैं। वे सबके कर्मों में सब प्रकार का अर्थ सिद्ध करते हैं। तथा संपूर्ण मनुष्यों का कल्याण चाहते हैं, इसलिये उन्हें शिव कहते हैं। महान् विश्व का पालन करने से महादेव, स्थिति का हेतु होने से स्थानु और सबके उद्भव होने के कारण भव कहलाते हैं। कपि नाम है श्रेष्ठ का और वृष धर्म का वाचक है; वे धर्म और श्रेष्ठ दोनो हैं, इसलिये उन्हें वृषाकपि कहते हैं। उन्होंने अपने दो नेत्रों को बन्दकर बलात् ललाट में तीसरा नेत्र उत्पन्न किया, इसलिये वे त्रिनेत्र कहे जाते हैं।
अर्जुन ! जो तुम्हारे शत्रुओं का संहार करते हुए देखे गये थे, वे पिनाकधारी महादेवजी ही हैं। जयद्रथवध की प्रतिज्ञा करने पर श्रीकृष्ण ने स्वप्न में गिरिराज हिमालय के शिखर पर तुम्हें जिनका दर्शन कराया था,  वे ही भगवान् शंकर यहाँ तुम्हारे आगे_आगे चलते हैं जिन्होंने ही वे अस्त्र दिये, जिनसे तुमने दानवों का संहार किया है।
यह भगवान् शिव का शतरुद्रिय उपाख्यान तुम्हें सुनाया गया है। यह धन, यश  और आयु की वृद्धि करनेवाला है, परम पवित्र तथा वेद के समान है। भगवान् शंकर का यह चरित्क संग्राम में विजय दिलानेवाला है। इस शतरुद्रिय उपाख्यान को जो सदा पढता और सुनता है तथा जो भगवान् शंकर का भक्त है, वह मनुष्य सभी उत्तम कामनाओं को प्राप्त करता है। अर्जुन ! जाओ, युद्ध करो, तुम्हारी पराजय नहीं हो सकती; क्योंकि तुम्हारे मंत्री, रक्षक और पार्शवर्ती भगवान् श्रीकृष्ण हैं।
संजय कहते हैं_महाराज !  पराशरनन्दन व्यासजी अर्जुन से यह कहकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये।वेदों के स्वाध्याय से जो फल मिलता है, वही इस पर्व के पाठ और श्रवण से भी मिलता है। इनमें वीर क्षत्रियों के महान् यश  का वर्णन किया गया है। जो नित्य इसे पढता और सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। इसके पाठ से ब्राह्मणों को यज्ञ का फल मिलता है, क्षत्रियों को संग्राम में सुयश की प्राप्ति होती है तथा शेष दो वर्णों को भी पुत्र_पौत्र आदि आदि अभीष्ट वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं।
द्रोणपर्व समाप्त



Sunday, 24 May 2020

अश्त्थामा द्वारा आग्नेयास्त्र का प्रयोग और व्यासजी का उसे श्रीकृष्ण और अर्जुन की महिमा सुनाना

संजय कहते हैं___ महाराज !  अर्जुन ने देखा कि मेरी सेना भाग रही है, तो द्रोणपुत्र को जीतने की इच्छा से स्वयं आगे बढ़कर उसे रोका। फिर वे सोमक तथा मत्स्य राजाओं के साथ कौरवों की ओर लौटे। अर्जुन ने अश्त्थामा के पास पहुँचकर कहा___’तुम्हारे अन्दर जितनी शक्ति, जितना विज्ञान, जितनी वीरता और जितना पराक्रम हो, कौरवों पर जितना प्रेम और हमलोगों से जितना द्वेष हो, वह सब आज हमारे पर ही दिखा लो। धृष्टधुम्न का या श्रीकृष्ण सहित मेरा सामना करने आ जाओ; तुम आजकल बहुत उदण्ड हो गये हो, आज मैं तुम्हारा सारा घमण्ड दूर कर दूँगा।
राजन् ! अश्त्थामा ने चेदिदेश के युवराज, कुरुवंशी बृहच्क्षत्र और सुदर्शन को मार डाला तथा धृष्टधुम्न, सात्यकि एवं भीमसेन को भी पराजित कर दिया था___ इन कई कारणों से विवश होकर अर्जुन ने आचार्यपुत्र से ये अप्रियवचन कहे थे। उनके तीखे और मर्मभेदी वचनों को सुनकर अश्त्थामा श्रीकृष्ण तथा अर्जुन पर कुपित हो उठा; वह सावधान होकर रथ पर बैठा और आचमन करके उसने आग्नेयास्त्र उठाया। फिर उसे मंत्रों से अभिमन्त्रित करके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष जितने भी शत्रु थे, उन सबको नष्ट करने के उद्देश्य से छोड़ा। वह बाण धूमरहित अग्नि के समान देदीप्यमान हो रहा था। उसके छूटते ही आकाश से बाणों की घनघोर वृष्टि होने लगी। चारों ओर फैली हुई आग की लपट अर्जुन पर ही आ पड़ी। उस समय राक्षस और पिशाच एकत्रित होकर गर्जना करने लगे। हवा गरम हो गयी। सूर्य का तेज फीका पड़ गया और बादलों से रक्त की वर्षा होने लगी। तीनों लोक संतप्त हो उठे। उस अस्त्र के तेज से जलाशयों के गरम हो जाने के कारण उनके भीतर रहनेवाले जीव जलने तथा छटपटाने लगे। दिशाओं, विदिशाओं, आकाश और पृथ्वी___ सब ओर से बाणवर्षा हो रही थी। वज्र के समान वेगवाले उन बाणों के प्रहार से शत्रु दग्ध होकर आग से जलाये हुए वृक्षों की भाँति गिर रहे थे। बड़े_ बड़े हाथी चारों ओर चिघ्घाड़ते हुए झुलस_ झुलसकर धराशायी हो रहे थे। महाप्रलय के समय संवर्तक नामवाली आग जैसे संपूर्ण प्राणियों को जलाकर खाक कर डालती है, उसी प्रकार पाण्डवों की सेना उस आग्नेयास्त्र से दग्ध हो रही थी। यह देख आपके पुत्र विजय की उमंग से उल्लसित हो सिंहनाद करने लगे। हजारों प्रकार के बाजे बजाये जाने लगे। उस समय इतना घोर अंधकार छा रहा था कि अर्जुन और उनकी एक अक्षौहिणी सेना को कोई देख नहीं पाता था। अश्त्थामा ने अमर्ष में भरकर उस समय जैसे अस्त्र का प्रहार किया था, वैसा हमने पहले न कभी देखा था और न सुना ही था। तदनन्तर अर्जुन ने अश्त्थामा के संपूर्ण अस्त्रों का नाश करने के लिये ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। फिर तो क्षणभर में ही सारा अन्धकार नष्ट हो गया। ठंडी_ठंडी हवा चलने लगी, समस्त दिशाएँ प्रकाशित हो गयीं। उजाला होने पर वहाँ एक अद्भुत बात दिखायी दी। पाण्डवों की एक अक्षौहिणी सेना उस अस्त्र के तेज से इस प्रकार दग्ध हो गयी थी उसका नामोनिशान तक मिट गया था, परन्तु श्रीकृष्ण और अर्जुन के शरीर पर आँचतक नहीं आयी थी। ज्वाला से मुक्त होकर पताका, ध्वजा, घोड़े तथा आयुधों से सुशोभित अर्जुन का रथ वहाँ शोभा पाने लगा। उसे देख आपके पुत्रों को बड़ा भय हुआ, परंतु पाण्डवों के हर्ष की सीमा न रही। वे शंख और भेरी बजाने लगे। श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी शंखनाद किया।
उन दोनों महापुरुषों को आग्नेयास्त्र से मुक्त देख अश्त्थामा दुःखी और हक्का_ बक्का_सा होकर थोड़ी देर सोचता रहा कि ‘यह क्या बात हुई' ? फिर अपने हाथ का धनुष फेंककर वह रथ से कूद पड़ा और ‘धिक्कार है ! धिक्कार है ! ! यह सब कुछ झूठा है !’ ऐसा कहता हुआ वह रणभूमि से भाग चला। इतने में ही उसे व्यासजी खड़े दिखायी दिये। उन्हें सामने पाकर उसे प्रणाम किया और अत्यन्त दीन की भाँति गद्गद् कण्ठ से कहा___’भगवन् ! इसे माया कहें या दैव की इच्छा ? मेरी समझ में नहीं आता___ यह सब क्या हो रहा है । यह अस्त्र झूठा कैसे हुआ ? मुझसे कौन सी गलती हो गयी है ? अथवा यह संसार के किसी उलटफेर की सूचना है, जिससे श्रीकृष्ण और अर्जुन जीवित बच गये हैं ? मेरे चलाये हुए इस अस्त्र को असुर, गन्धर्व, पिशाच, राक्षस, सर्प, यक्ष तथा,मनुष्य किसी प्रकार अन्यथा नहीं कर सकते थे; तो भी यह केवल एक अक्षौहिणी सेना को ही जलाकर शान्त हो गया। श्रीकृष्ण और अर्जुन भी तो मरणधर्मा मनुष्य ही हैं, इन दोनों का वध क्यों नहीं हुआ ? आप मेरे प्रश्न का ठीक_ठीक उत्तर दीजिये, मैं यह सब सुनना चाहता हूँ।‘ व्यासजी बोले___तू जिसके सम्बन्ध में आश्चर्य के साथ प्रश्न कर रहा है, वह बड़ा महत्वपूर्ण विषय है। अपने मन को एकाग्र करके सुन। एक समय की बात है, हमारे पूर्वजों के भी पूर्वज विश्वविधाता भगवान् नारायण ने विशेष कार्यवश धर्म के पुत्र में अवतार लिया था। उन्होंने हिमालय पर्वत पर रहकर बड़ी कठिन तपस्या की। छाछठ हजार वर्ष तक केवल वायु का आहार करके अपने  शरीर को सुखा डाला।
इसके बाद भी उन्होंने इससे दूने वर्षों तक पुनः भारी तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर भगवान् शंकर ने उन्हें दर्शन दिया। विश्वेश्वर की झाँकी करके नारायण ऋषि आनन्दमग्न हो गये, उनको प्रणाम करके वे बड़े भक्तिभाव से भगवान् की स्तुति करने लगे___’आदिदेव ! जिन्होंने पृथ्वी में आपके पुरातन सर्ग की रक्षा की थी तथा जो इस विश्व की भी रक्षा करते हैं, वे संपूर्ण प्राणियों की सृष्टि करनेवाले प्रजापति भी आपसे ही प्रगट हुए हैं। देवता, असुर, नाग, राक्षस, पिशाच, मनुष्य, पक्षी, गन्धर्व तथा यक्ष आदि विभिन्न प्राणियों के जो समुदाय हैं, इन सबकी उत्पत्ति आपसे ही हुई है। इन्द्र, यम, वरुण और कुबेर का पद, पितरों का लोक तथा विश्वकर्मा की सुन्दर शिल्पकला आदि का अविर्भाव भी आपसे ही हुआ है। शब्द और आकाश, स्पर्श और वायु, रूप और तेज,  रस और जल तथा गन्ध और पृथ्वी की आप ही से उत्पत्ति हुई है। काल, ब्रह्मा, वेद, ब्राह्मण तथा यह संपूर्ण चराचर जगत् आपसे ही प्रगट हुआ है।
जैसे जल से उत्पन्न होनेवाले जीव उससे भिन्न दिखायी देते हैं परन्तु नष्ट होने पर उस जल के साथ एकीभूत हो जाते हैं, उसी प्रकार यह समस्त विश्व आपसे ही प्रगट होकर आपमें ही लीन हो जाता है। इस तरह जो भी आपको संपूर्ण भूतों की उत्पत्ति और प्रलयकाल का अधिष्ठान जनाते हैं, वे विद्वान पुरुष आपके सामुज्य को प्राप्त होते है। जिनका स्वरूप मन बुद्धि के चिन्तन का विषय नहीं होता, वे पिनाकधारी भगवान् नीलकण्ठ नारायण ऋषि के इस प्रकार स्तुति करने पर उन्हें वरदान देते हुए बोले___’नारायण ! मेरी कृपा से किसी प्रकार के शस्त्र, वज्र, अग्नि, वायु, गीले या सूखे पदार्थ और स्थावर या जंगम प्राणी के द्वारा भी कोई तुम्हें चोट नहीं पहुँचा सकता। समरभूमि में पहुँचने पर तुम मुझसे भी अधिक बलिष्ठ हो जाओगे।‘ इस प्रकार श्रीकृष्ण ने पहले ही भगवान् शंकर से अनेकों वरदान पा लिये हैं। वे ही भगवान् नारायण माया से इस संसार को मोहित करते हुए इनके रूप में विचर रहे हैं नारायण के ही तप से महामुनि नर प्रकट हुए, अर्जुन को उन्हीं का अवतार समझ। इनका स्वरूप भी नारायण के समान ही है। ये दोनों ऋषि संसार को धर्ममर्यादा में रखने के लिये प्रत्येक युग में अवतार लेते हैं।
 अश्त्थामा ! तूने भी पूर्वजन्म में भगवान् शंकर को प्रसन्न करने के लिये कठोर  नियमों का पालन करते हुए अपने शरीर को दुर्बल कर डाला था, इससे प्रसन्न होकर भगवान् ने  तुम्हें बहुत से मनोवांछित वरदान दिये थे। जो मनुष्य भगवान् शंकर के सर्वमय स्वरूप को जानकर लिंगरूप में उनकी पूजा करता है, उसे सनातन शास्त्रज्ञान तथा आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जो शिवलिंग को सर्वमान्य जानकर उसका अर्चन करता हैं, उसपर भगवान शंकर की बड़ी कृपा होती है।
वेदव्यास की ये बातें सुनकर अश्त्थामा ने मन_ही_मन शंकरजी को प्रणाम किया और श्रीकृष्ण में उसकी महत्वबुद्धि हो गयी। उसने रोमांचित शरीर से महर्षि व्यास को प्रणाम किया और सेना की ओर देखकर उसे छावनी में लौटने की आज्ञा दी। तदनन्तर कौरव और पाण्डव दोनों पक्ष की सेनाएँ अपने_अपने  शिविर को चल दीं। इस प्रकार वेदों के पारगामी आचार्य द्रोण पाँच दिनों तक पाण्डवसेना का संहार करके ब्रह्ममलोक में चले गये।

Friday, 22 May 2020

नारायणास्त्र का प्रभाव देख युधिष्ठिर का विषाद तथा भगवान् कृष्ण के बताये हुए उपाय से उसका निवारण; अश्त्थामा के साथ धृष्टधुम्न, सात्यकि तथा भीमसेन का घोर युद्ध

संजय कहते हैं___राजन् ! तदनन्तर अश्त्थामा ने दुर्योधन से पुनः अपनी प्रतिज्ञा कह सुनायी___’धर्म का चोला पहने हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने युद्ध करते हुए आचार्य से कपटपूर्ण बात कहकर उन्हें शस्त्र त्यागने के लिये बाध्य किया है; इसलिये आज उनके देखते_देखते उनकी सेना को मार भगाऊँगा और धृष्टधुम्न को मार भी डालूँगा। यह मेरी सच्ची प्रतिज्ञा है; अतः तुम सेना को लौटाकर ले चलो।‘ उसकी बात सुनकर आपके पुत्र ने सेना को पीछे लौटाया और भय को त्यागकर बड़े जोर से सिंहनाद किया। फिर कौरवों और पाण्डवों में युद्ध आरम्भ हुआ। हजारों शंख और भेरियाँ बज उठीं। इसी समय अश्त्थामा ने पाण्डवों तथा पांचालों की सेना को लक्ष्य करके नारायणास्त्र का प्रयोग किया था। उससे हजारों बाण निकलकर आकाश में छा गये, उन सबके अग्रभाग प्रज्वलित हो रहे थे। उनके अंतरिक्ष और दिशाएँ आच्छादित हो गयीं। फिर लोहे के गोले, चतुश्रच्क, द्विचक्र, शतध्नी, गदा और जिसके चारों ओर छुरे लगे हुए थे, ऐसे सूर्यमण्डलाकार चक्र प्रकट हुए। इस प्रकार नाना प्रकार के शस्त्रों से आकाश को व्याप्त देख पाण्डव, पांचाल और सृंजय घबरा उठे। पाण्डव महारथी ज्यों_ ज्यों युद्ध करते, त्यों_त्यों उस अस्त्र का जोर बढ़ता जाता था। उससे पाण्डवसेना भस्म होने लगी। यह संहार देख धर्मराज को बड़ा भय हुआ। उन्होंने देखा___ मेरी सेना अचेत सी होकर भाग रही है और अर्जुन उदासीन भाव से चुपचाप खड़े है, तो सब योद्धाओं से कहा___’ धृष्टधुम्न ! पाचालों की सेना के साथ तुम भाग जाओ। सात्यके ! तुम भी वृष्णि और अंधकों के साथ चल दो। अब धर्मात्मा श्रीकृष्ण से जो कुछ हो सकेगा, करेंगे। ये सारे जगत् के कल्याण का उपदेश देते हैं, तो अपना क्यों नहीं करेंगे ? मैं संपूर्ण सैनिकों से कह रहा हूँ, कोई भी युद्ध न करो। भाइयों को साथ लेकर मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा। अर्जुन की मेरे प्रति जो कामना है, वह शीघ्र ही पूरी हो जानी चााहिये; क्योंकि सदा ही अपना कल्याण करनेवाले आचार्य का मैंने वध करवाया ! अतः उनके लिये मैं भी बन्धुओंसहित मर जाऊँगा।‘ जब युधिष्ठिर इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों भुजाएँ उठाकर सबको रोका और इस प्रकार कहा___’योद्धाओं ! अपने हथियार शीघ्र ही नीचे डाल दो और सवारियों से उतर जाओ; नारायणास्त्र की शान्ति का यही उपाय बताया गया है। भूमि पर खड़े हुए निहत्थे लोगों को यह अस्त्र नहीं मारेगा। इसके विपरीत , ज्यों_ ही_ ज्यों योद्धा इस अस्त्र के सामने युद्ध करेंगे त्यों_ही_त्यों कौरव अधिक बलवान् होते जायँगे। जो इस अस्त्र की सामना करने के लिये मन में विचार भी करेंगे, वे रसातल में चले जायँ तो भी यह अस्त्र मारे बिना नहीं छोड़ेगा।‘ भगवान् कृष्ण की बातें सुनकर सभी योद्धाओं ने हाथ से और मन से भी शस्त्र त्याग देने का विचार कर लिया। सबको अस्त्र त्यागने के लिये उद्यत देख भीमसेन ने कहा___ वीरों ! कोई भी अस्त्र न फेंकना। मैं अपने बाणों से अश्त्थामा के अस्त्रों का वारण करूँगा। इस भारी गदा से उसके अस्त्रों का नाश करके मैं उसके ऊपर भी काल की भाँति प्रहार करूँगा। यदि इस नारायणास्त्र का मुकाबला करने के लिये अब तक कोई योद्धा समर्थ नहीं हुआ, तो आज कौरव_ पाण्डवों के देखते_देखते मैं इसका सामना करूँगा। अर्जुन ! अर्जुन तुम अपने गाण्डीव को नीचे न डाल देना; नहीं तो चन्द्रमा की भाँति तुम्हें भी कल॑क लग जायगा, जो तुम्हारी शक्ति को नष्ट कर देगा। अर्जुन बोले___ भैया ! नारायणास्त्र, गौ और ब्राह्मणों के सामने नीचे डाल देने का  मेरा व्रत है।
अर्जुन के ऐसा कहने पर भीमसेन अकेले ही मेघ के समान गर्जना करते हुए अश्त्थामा के सामने गये और उसपर बाणसमूहों की वर्षा  करने लगे। अश्त्थामा ने भी उनसे हँसकर बात की और उनपर नारायणास्त्र से अभिमन्त्रित बाणों की झड़ी लगा दी। महाराज ! भीमसेन जब उस अस्त्र के सामने बाण मारने लगे, उस समय जैसे हवा का सहारा पाकर आग प्रज्वलित हो उठती है उसी प्रकार उस अस्त्र का वेग बढ़ने लगा। उसे बढ़ते देख भीम के सिवा पाण्डव सेना के सभी सैनिक भयभीत हो गये। सबलोग अपने दिव्य अस्त्रों को नीचे डालकर रथ, हाथी और घोड़े आदि वाहनों से उतर गये। अब वे महाबली अस्त्र सब ओर से हटकर भीम के मस्तक पर आ पड़ा। उससे अच्छऻदित होकर भीमसेन अदृश्य हो गये। इससे सभी प्राणी और विशेषतः पाण्डवलोग हाहाकार मचाने लगे। भीमसेन के साथ ही उनके रथ, घोड़े और सारथि भी अश्त्थामा के अस्त्र से आच्छादित हो आग के भीतर आ पड़े। जैसे प्रलयकाल में संवर्तक अग्नि संपूर्ण चराचर जगत् को भस्म करके परमात्मा के मुख में प्रवेश कर जाती है, उसी प्रकार उस अस्त्र ने भीमसेन को दग्ध करने के लिये उन्हें चारों ओर से घेर लिया। उसका तेज भीमसेन के भीतर प्रविष्ट हो गया। यह देख अर्जुन और श्रीकृष्ण दोनों वीर तुरंत ही रथ ले कूद पड़े और भीम की ओर दौड़े। वहाँ पहुँचकर दोनों उस अस्त्र की आग में घुस गये, किन्तु अस्त्र त्याग देने के कारण वह आग इन्हें जला न सकी। नारायणास्त्र की शान्ति के लिये दोनों ही भीमसेन को तथा उनके संपूर्ण अस्त्र_ शस्त्रों को जोर लगाकर खींचने लगे। उनके खींचने पर भीमसेन और जोर से गर्जना करने लगे; इससे वह भयंकर अस्त्र और भी उग्ररूप धारण करने लगा। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने भीम से कहा___’पाण्डुनन्दन ! यह क्या बात है ? मना करने पर भी तुम युद्ध बन्द क्यों नहीं करते ? यदि इस  युद्ध से ही कौरव जीते जा सकते तो हम तथा ये सभी राजा युद्ध ही करते। यहाँ हठ से काम नहीं चलेगा। तुम्हारे पक्ष के सभी योद्धा रथ से उतर चुके हैं, तुम भी शीघ्र उतर जाओ।‘ यह कहकर श्रीकृष्ण ने उन्हें रथ से नीचे खींच लिया। नाचे उतरकर ज्योंही अपना अस्त्र धरती पर डाला, ज्योंही नारायणास्त्र शान्त हो गया।
इस प्रकार उस दुःसह तेज के शान्त हो जाने पर संपूर्ण दिशाएँ साफ हो गयीं, ठण्डी हवा चलने लगी तथा पशु_पक्षियों का कोलाहल बन्द हो गया। हाथी और घोड़े आदि वाहन भी सुखी हो गये। पाण्डवों की जो सेना मरने से बच गयी थी, वह अब आपके पुत्रों का नाश करने के लिये पुनः हर्ष से भर गयी। उस समय दुर्योधन ने द्रोणपुत्र से कहा___’अश्त्थामन् ! एक बार फिर इस अस्त्र का प्रयोग करो; देखो, वह पांचालों की सेना विजय की इच्छा से पुनः संग्रामभूमि में आकर डट गयी है।‘ आपके पुत्र पर ऐसा कहने पर अश्त्थामा दीनतापूर्ण उच्छ्वास् लेकर बोला____’राजन् ! इस अस्त्र का दुबारा प्रयोग नहीं हो सकता है। दुबारा  प्रयोग करने पर यह अपने ही ऊपर आकर पड़ता है। श्रीकृष्ण ने इसे शान्त करने का उपाय बता दिया, नहीं तो आज संपूर्ण शत्रुओं का वध ही हो जाता।‘ दुर्योधन ने कहा___’भाई ! तुम तो संपूर्ण अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ हो;  यदि इस अस्त्र का दो बार प्रयोग नहीं हो सकता तो अन्य अस्त्रों से ही इनका संहार करो; क्योंकि ये सभी गुरुदेव द्रोण के हत्यारे हैं। तुम्हारे पास बहुत से दिव्यास्त्र हैं; यदि मारना चाहो तो क्रोध में भरे हुए इन्द्र भी तुमसे बचाकर नहीं जा सकते।‘ पिता की मृत्यु याद आ जाने से अश्त्थामा पुनः क्रोध में भरकर धृष्टधुम्न की ओर दौड़ा। निकट पहुँचकर उसने पहले बीस और फिर पाँच बाणों से उसे घायल किया। धृष्टधुम्न ने भी चौंसठ बाण मारकर अश्त्थामा को बींध डाला तथा बीस बाणों से सारथि को और चार से चारों घोड़ों को घायल कर दिया। धृष्टधुम्न अश्त्थामा को बारम्बार बींधकर पृथ्वी को कंपायमान करके गरजने लगा।
 अश्त्थामा ने भी कुपित हो धृष्टधुम्न को दस बाण मारे, फिर उसकी ध्वजा और धनुष काट दिये। इसके बाद अन्य बहुत से सायकों द्वारा धृष्टधुम्न को पीड़ित कर दिया और घोड़ों तथा सारथि को मारकर उसे रथहीन कर दिया। तत्पश्चात् उसके सैनिकों को भी मार भगाया। यह देखकर सात्यकि अपने रथ को अश्त्थामा के पास ले गया। वहाँ पहुँचकर उसने अश्त्थामा को पहले आठ, फिर बीस बाणों से बींध दिया। इसके बाद सारथि तथा घोड़ों को घायल किया। फिर उसके धनुष और ध्वजा को काटकर रथ को तोड़ डाला। तदनन्तर उसकी  छाती में तीस बाण मारे। उस समय दुर्योधन ने बीस, कृपाचार्य ने तीन, कृतवर्मा ने दस, कर्ण ने पचास, दुःशासन ने सौ तथा वृषसेन ने सात बाण मारकर सात्यकि को घायल किया। तब सात्यकि ने एक ही क्षण में उन सभी महारथियों को रथहीन करके रणभूमि से भगा दिया। इतने में अश्त्थामा दूसरे रथ पर सवार होकर आया और सैकड़ों सायकों की वृष्टि करता हुआ सात्यकि को रोकने लगा। सात्यकि ने जब उसे आते देखा, तो पुनः उसके रथ के टुकड़े करके उसे मार भगाया। सात्यकि का वह पराक्रम देख पाण्डव बारम्बार शंख बजाने और सिंहनाद करने लगे। इस प्रकार द्रोणपुत्र को रथहीन करके सात्यकि ने बृषकेतु के तीन हजार महारथियों का, कृपाचार्य के पन्द्रह हजार हाथियों का तथा शकुनि के पचास हजार घोड़ों का संहार कर डाला। यह कहकर अश्त्थामा ने सात्यकि पर एक बहुत तीखा बाण मारा। उसने सात्यकि का कवच छेदकर उसे अत्यन्त चोट पहुँचायी। कवच छिन्न_भिन्न हो गया, उसके हाथ से धनुष और बाण गिर गये, खून से लथपथ हो वह रथ के पिछले भाग में जा बैठा। यह देख सारथि उसे अश्त्थामा के सामने से अन्यत्र हटा ले गया। तदनन्तर अर्जुन, भीमसेन, बृहच्क्षत्र, चेदिराजकुमार, सुदर्शन___ ये पाँच महारथी आ पहुँचे और सबने चारों ओर से अश्त्थामा को घेर लिया। उन्होंने बीस पद दूर रहकर अश्त्थामा को पाँच_पाँच बाण मारे। अश्त्थामा ने भी एक ही साथ पच्चीस बाण मारकर उनके सब बाणों को काट दिया। इसके बाद उसने बृहच्क्षत्र को सात, सुदर्शन को तीन, अर्जुन को एक और भीमसेन को  छः बाणों से बींध डाला। तब चेदिदेशिय युवराज ने बीस, अर्जुन ने आठ और अन्य सब लोगों ने तीन तीन बाणों से अश्त्थामा को घायल कर दिया। इसके बाद अश्त्थामा ने अर्जुन को छः, श्रीकृष्ण को दस, भीमसेन को पाँच, चेदियुवराज को चार और सुदर्शन तथा बृहच्क्षत्र को दो_ दो बाण मारे। फिर भीमसेन ने सारथि को छः बाणों से. घायल कर दो बाणों से उनकी ध्वजा और धनुष काट डाले। तत्पश्चात् अपने सायकों की वर्षा से अर्जुन को बींधकर उसने सिंह के समान गर्जना की। फिर तीन बाणों से उसने रथ के पास ही खड़े हुए सुदर्शन की दोनों भुजाएँ और मस्तक उड़ा दिये, शक्ति से पौरव बृहच्क्षत्र को मार डाला तथा अग्नि के समान तेजस्वी बाणों से चेदिदेश के युवराज को सारथि और घोड़ोंसहित यमलोक भेज दिया। यह देखकर भीमसेन के क्रोध की सीमा न रही, उन्होंने सैकड़ों तीखे बाणों से अश्त्थामा को ढक दिया। परन्तु अश्त्थामा ने अपने सायकों से उनकी बाणवर्षा का नाश कर दिया और क्रोध में भरकर उन्हें भी घायल किया। तब भीमसेन ने यमदण्ड के समान भयंकर दस नाराच चलाये, वे अश्त्थामा के गले का हँसली छेदकर भीतर घुस गये। इस चोट से अत्यन्त पीड़ित हो उसने आँखें बन्द कर लीं और ध्वजा का सहारा लेकर बैठ गया। थोड़ी देर में जब होश हुआ, तो उसने भीमसेन को सौ बाण मारे। इस प्रकार दोनों ही वर्षाकाल के मेघ के समान एक दूसरे पर बाणों की वर्षा करने लगे।
महाराज ! उस युद्ध में हमलोगों को भीमसेन के अद्भुत पराक्रम, अद्भुत बल, अद्भुत वीरता, अद्भुत प्रभाव तथा अद्भुत पराक्रम का परिचय मिला। उन्होंने द्रोणपुत्र का वध करने की इच्छा से बाणों की बड़ी भयंकर वृष्टि की। इधर अश्त्थामा भी बड़ा भारी अस्त्रवेत्ता था, उसने अस्त्रों का माया से उनकी बाणवर्षा रोक दी और उनका धनुष काट डाला; फिर क्रोध में भरकर अनेकों बाणों से उन्हें घायल किया। धनुष कट जाने पर भीम ने भयंकर रथशक्ति हाथ में ली और उसे बड़े वेग से घुमाकर अश्त्थामा के रथ पर चलाया; किन्तु उसने तेज बाण मारकर उसके टुकड़े_ टुकड़े कर डाले। इसी बीच में भीमसेन ने एक सुदृढ़ धनुष हाथ में लिया और बहुत_ से बाणों का प्रहार कर अश्त्थामा को बींध डाला। तब अश्त्थामा ने एक बाण मारकर भीमसेन के सारथि का ललाट चीर दिया, उस प्रहार से सारथि मूर्छित हो गया। उसके हाथ से घोड़ों की बागडोर छूट गयी। सारथि के बेहोश होते ही भीमसेन के घोड़े सब धनुर्धारियों के देखते_ देखते भाग चले। विजयी अश्त्थामा हर्ष में भरकर शंख बजाने लगा और पांचालयोद्धा तथा भीमसेन भयभीत होकर इधर_ उधर भाग निकले।

Sunday, 12 April 2020

अर्जुन के द्वारा युधिष्ठिर को उलाहना, भीम का क्रोध, धृष्टधुम्न का द्रोण के विषय में आक्षेप और सात्यकि के साथ उसका विवाद

संजय कहते हैं___ महाराज ! नारायणास्त्र के प्रकट होते ही मेघसहित पवन के झकोरे उठने लगे। बिना बादलों के ही गर्जना होने लगी, पृथ्वी डोल उठी, समुद्र में तूफान आ गया और पर्वतों के शिखर टूट_टूटकर गिरने लगे। उस घोर अस्त्र को देखकर देवता, दानव और गन्धर्वों पर भारी आतंक छा गया; समस्त राजालोग भय से थर्रा उठे।
धृतराष्ट्र ने पूछा___ संजय ! उस समय पाण्डवों ने धृष्टधुम्न की रक्षा के लिये क्या विचार किया ? 
संजय ने कहा___ कौरव_सेना का तुमुल_नाद सुनकर युधिष्ठिर अर्जुन से बोले___’धनंजय ! धृष्टधुम्न के द्वारा आचार्य द्रोण के मारे जाने पर कौरव बहुत उदास हो विजय की आशा छोड़ चुके थे और अपनी_ अपनी जान बचाने के लिये भागे जा रहे थे। अब देखते हैं कि पुनः उनकी सेना लौटी आ रही है; किसने उसे लौटाने है, इसके विषय में तुम्हें कुछ पता है तो बताओ। ऐसा जान पड़ता है, द्रोण के मारे जाने से कौरवों का पक्ष लेकर साक्षात् इन्द्र युद्ध करने आ रहे हैं। उनका भैरवनाद सुनकर हमारे रथी घबराये हुए हैं, सबके रोंगटे खड़े हो गये हैं। यह कौन महारथी है, जो सेना को युद्ध के लिये लौटा रहा है ?’ अर्जुन बोले___ जिस वीर ने जन्म लेते ही उच्चैःश्रवा के समान हींसना  आरम्भ किया था, जिसे सुनकर यह पृथ्वी हिल उठी और तीनों लोक थर्राने लगे थे, उस आवाज को सुनकर किसी अदृश्य रहनेवाले प्राणी ने जिसका नाम ‘अश्त्थामा’ रख दिया था वही शूरवीर अश्त्थामा है; वही सिंहनाद कर रहा है। धृष्टधुम्न ने उस समय अनाथ के समान जिसके केश पकड़कर मार डाला था, यह उन्हीं का पक्ष लेकर उसके क्रूर कर्म का बदला लेने के लिये आया है। आपने भी राज्य के लोभ से झूठ बोलकर गुरु को धोखा दिया। धर्म को जानते हुए भी यह महान् काम किया ! अतः अन्यायपूर्वक बाली के वध करने के कारण श्रीरामचन्द्रजी को जैसे अपयश मिला, उसी प्रकार आपके विषय में भी झूठ बोलकर गुरु को मरवा डालने का कलंक तीनों लोकों में फैल जायगा। आचार्य ने यह समझा था कि ‘ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर सब धर्मों के ज्ञाता हैं, मेरे शिष्य हैं; ये कभी झूठ नहीं बोलेंगे।‘ इसी भरोसे उन्होंने आपका विश्वास कर लिया।।परन्तु आपने सत्य की आड़ लेकर सरासर झूठ कहा।
‘ हाथी मरा था’  इसलिये अश्त्थामा का मरने बता दिया। फिर वे हथियार डालकर अचेत हो गये; उस समय उन्हें कितनी व्याकुलता हुई थी, सो आपने देखी ही थी। पुत्र के स्नेह से शोकमग्न होकर जो रण से विमुख हो चुके थे, ऐसे गुरु को आपने सनातन धर्म की अवहेलना करके शस्त्र से मरवा डाला। अश्त्थामा पिता की मृत्यु से कुपित है, धृष्टधुम्न को वह आज काल का ग्रास बनाना चाहता.  व है। निहत्थे गुरु को अधर्म से मरवाकर अब आप अपने मंत्रियों के साथ अश्त्थामा का सामना करने जाइये, शक्ति हो तो धृष्टधुम्न की रक्षा कीजिये। मैं तो समझता हूँ, हम सबलोग मिलकर भी धृष्टधुम्न को नहीं बचा सकते। मैं बार_ बार मना करता रहा तो भी शिष्य होकर इसने गुरु की हत्या कर डाली। इसकी वजह यह है कि अब हमलोगों की आयु का अधिक अंश बीत गया है; थोड़ा ही शेष रह गया है; इसी से हमारा मस्तिष्क खराब हो गया, हमने यह महान् पाप कर डाला। जो सदा पिता की भाँति हमलोगों पर स्नेह करते थे, धर्मदृष्टि से भी जो हमारे पिता ही थे, उन गुरुदेव को  इस क्षणभंगुर राज्य के कारण हमने मरवा दिया। धृतराष्ट्र ने भीष्म और द्रोण को पुत्रों के साथ ही सारा राज्य सौंप दिया था। वे सदा उनकी सेवा में लगे रहते थे। निरंतर सत्कार किया करते थे। तो भी आचार्य मुझे ही अपने पुत्र से भी बढ़कर मानते थे। ओह ! मैंने बहुत बड़ा और भयंकर पाप किया, जो राज्य_सुख के लोभ में पड़कर गुरु की हत्या करायी। मेरे गुरुदेव को यह विश्वास था कि अर्जुन मेरे लिये पिता, भाई, स्त्री, पुत्र और प्राणों का भी त्याग कर सकता है। किन्तु मैं कितना राज्य का लोभी निकला ! वे मारे जा रहे थे और मैं चुपचाप देखता रहा। एक तो वे ब्राह्मण, दूसरे वृद्ध और तीसरे आचार्य थे ;  इस पर भी उन्होंने अपना शस्त्र नीचे डाल दिया था और महान् मुनिवृत्ति से बैठे हुए थे। इस अवस्था में राज्य के लिये उनकी हत्या कराकर अब मैं जीने की अपेक्षा मर जाना ही अच्छा समझता हूँ।
संजय कहते हैं ___ महाराज ! अर्जुन की बात सुनकर वहाँ जितने महारथी बैठे थे सब चुप रह गये; किसी ने बुरा या भला कुछ नहीं कहा। तब महाबाहु भीमसेन क्रोध में भरकर बोले___’ पार्थ ! वनवासी मुनि अथवा उत्तम व्रत का पालन करनेवाले ब्राह्मण की भाँति तुम भी धर्म  बैठे हो ! जो संकट में अपनी तथा दूसरों की रक्षा करता है, संग्राम में शत्रुओं को क्षति पहुँचाना जिसकी जीविका है, जो स्त्रियों और  सत्पुरुषों पर क्षमाभाव रखता है, वह क्षत्रिय शीघ्र ही  धर्म, यश तथा लक्ष्मी को प्राप्त करता है।
क्षत्रियों के संपूर्ण सद्गुणों से युक्त होते हुए आज मूर्खों की_ सी बातें करना तुम्हारा शोभा नहीं देता। तात ! तुम्हारा मन धर्म में लगा हुआ है, तुम्हारे भीतर दया है__ यह बहुत अच्छी बात है। किन्तु धर्म में प्रवृत्त रहने पर भी तुम्हारा राज्य अधर्मपूर्वक छीन लिया गया, शत्रुओं ने द्रौपदी को सभा में लाकर उसका केश खींचा और हम सबलोग वल्कल वस्त्र धारण कर तेरह वर्ष के लिये वन में निकाल दिये गये। क्या हमारे साथ यही वर्ताव उचित था  ये सब बातें सहन करने योग्य नहीं थीं, फिर भी हमने सब लीं। हमने जो कुछ किया है वह क्षत्रियधर्म में स्थित रहकर ही किया है। शत्रुओं के उस अधर्म को याद कर आज  मैं तुम्हारी सहायता से उन्हें उनके सहायकोंसहित मार डालूँगा। मैं क्रोध में भरकर इस पृथ्वी को विदीर्ण कर सकता हूँ। पर्वतों को तोड़_ फोड़कर बिखेर सकता हूँ। अपनी भारी गदा की चोट से बड़े_ बड़े पर्वतीय वृक्षों को तोड़ डालूँगा। इन्द्र आदि देवता, राक्षस, असुर, नाग और मनुष्य भी यदि एक ही साथ लड़ने आ जायँ तो उन्हें बाणों से मारकर भगा दूँगा। अपने भाई के ऐसे पराक्रम को जानते हुए भी तुम्हें अश्त्थामा से भय नहीं करना चाहिये। अथवा तुम सब भाइयों के साथ यहीं खड़े रहो, मैं अकेला ही गदा हाथ में लेकर शत्रुओं को परास्त करूँगा।‘ भीमसेन के ऐसा कहने पर धृष्टधुम्न बोला___’अर्जुन ! वेदों को पढ़ना और पढ़ाना, यज्ञ करना और कराना तथा दान देना और प्रतिग्रह स्वीकार करना____ ये ही छ: कर्म ब्राह्मणों के लिये प्रसिद्ध हैं। इनमें से किस कर्म का पालन द्रोणाचार्य करते थे ? अपने धर्म से भ्रष्ट होकर उन्होंने क्षत्रिय धर्म स्वीकार किया था। ऐसी अवस्था में यदि मैंने उनका वध किया तो तुम मेरी निंदा क्यों करते हो ? जो ब्राह्मण कहलाकर भी दूसरों के प्रति माया का प्रयोग करता है उसे यदि कोई माया से ही मार डाले तो इसमें अनुचित क्या है ? तुम जानते हो, मेरी उत्पत्ति इसी काम के लिये हुई थी; फिर भी मुझे गुरुहत्यारा क्यों कहते हो ? जो क्रोध के पराभूत हो ब्रह्मास्त्र न जाननेवालों को भी ब्रह्मास्त्र से नष्ट करता है, वह सभी तरह के उपायों से क्यों न मार डाला जाय ? उन्होंने दूसरों के नहीं; मेरे ही भाइयों का संहार किया था; अतः उसके बदले उनका मस्तक काट लेने पर भी मेरा क्रोध शान्त नहीं हुआ है। राजा भगदत्त तुम्हारे पिता के मित्र थे; उन्हें मारकर जैसे तुमने अधर्म नहीं किया, उसी प्रकार मैंने भी धर्म से ही शत्रु का वध किया है।  जब तुम अपने पितामह को भी युद्ध में मारकर धर्म का पालन समझते हो तो मैंने जो शत्रु का संहार किया, उसे अधर्म क्यों मानते हो ? बहिन द्रौपदी और उसके पुत्रों का खयाल करके ही मैं तुम्हारी कठोर बातें सहे लेता हूँ, इसमें और कोई कारण नहीं है। अर्जुन ! न तो तुम्हारे भाई असत्यवादी हैं और न मैं पापी। द्रोणाचार्य अपने ही अपराध के कारण मारे गये हैं; अतः चलकर युद्ध करो।‘
धृतराष्ट्र बोले___ संजय ! जिन महात्मा ने अंगोंसहित संपूर्ण वेद का अध्ययन किया था, जिनमें साक्षात् धनुर्वेद प्रतिष्ठित था, उन आचार्य द्रोण की वह नीच, नृशंस एवं गुरुघाती धृष्टधुम्न निंदा करता रहा और किसी क्षत्रिय ने उसपर क्रोध किया ? धिक्कार है इस क्षत्रियपन को ! बताओ, वह अनुचित बात सुनकर पाण्डव तथा दूसरे धनुर्धर राजाओं ने धृष्टधुम्न से क्या कहा ?
 संजय ने कहा___महाराज ! उस समय अर्जुन ने द्रुपदकुमार की ओर तिरछी नजर से देखा और आँसू बहाते हुए उच्छ्वास लेकर कहा___’ धिक्कार है ! धिक्कार ! !’ उस समय युधिष्ठिर, भीमसेन, नकुल_ सहदेव तथा श्रीकृष्ण आदि सबलोग संकोचवश चुप हो गये। केवल सात्यकि से नहीं रहा गया, वह बोल उठा___’अरे ! क्या यहाँ कोई भी मनुष्य नहीं है, जो अमंगलमयी बात करनेवाले इस पापी नराधम को शीघ्र ही मार डाले ? ओ नीच ! श्रेष्ठ पुरुषों की मण्डली में बैठकर ऐसी ओछी बातें करते तुझे लज्जा नहीं आती ? तेरी जीभ के सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते ? तेरा मस्तक क्यों नहीं फट जाता ? ०गुरु की निंदा करते समय तू रसातल में क्यों नहीं चला जाता ? स्वयं ऐसा नीच कर्म करके उलटे गुरु पर ही दोषारोपण करता है ? तुझे तो मार ही डालना चाहिये। क्षणभर भी तेरे जीवित रहने से संसार का कोई लाभ नहीं है ! नराधम ! तेरे सिवा दूसरा कौन ऐसा श्रेष्ठ मनुष्य है, जो धर्मात्मा गुरु का केश पकड़कर उसका वध करने को तैयार होगा ? तूने बीती तथा आगे होने वाली अपनी सात_ सात पीढ़ियों को नरक में डूबो दिया। अब यदि पुनः मेरे समीप ऐसी बात मुँह से निकालेगा तो वज्र के समान गदा मारकर तेरा सिर उड़ा दूँगा। तू हत्यारा है, तुझे ब्रह्महत्या का पाप लगा है; इसीलिये लोग तुझे देखकर प्रायश्चित के लिये सूर्यनारायण का दर्शन करते हैं। खड़ा रह, मेरी गदा की एक चोट सह ले; मैं भी तेरी गदा की अनेक चोटें सहूँगा।‘
इस प्रकार जब सात्यकि ने द्रुपदकुमार का तिरस्कार किया, तो उसने भी क्रोध में भरकर उसकी मखौल उड़ाते हुए बोला___’ सुन ली, सुन ली तेरी बात; और इसके लिये तुझे क्षमा भी करता हूँ। तेरे जैसे नीच लोगों का सत्पुरुषों पर आक्षेप करने का स्वभाव ही होता है। यद्यपि संसार में  क्षमा की बड़ी प्रशंसा की जाती है, तथापि पापी के प्रति क्षमा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह क्षमा करनेवालों को पराजित समझता है। तू सिर से पैर तक दुराचारी, नीच और पापी है; स्वयं निंदा के योग्य होकर भी दूसरों की निंदा करना चाहता है।
भूरिश्रवा का हाथ कट गया था, वह प्राणान्त अनशन लेकर बैठा था; उस समय तूने सबके मना करने पर भी जो उसका मस्तक काट लिया, इससे बढ़कर पाप और क्या हो सकता है ? जो स्वयं ऐसा काम करे, वह दूसरों को क्या कहेगा ? तू बड़ा धर्मात्मा पुरुष था तो जब भूरिश्रवा तुझे लात मारकर जमीन पर पटककर काटने लगा, उस समय ही तूने क्यों न उसका वध किया ? स्वयं पापी होकर मुझसे क्यों कठोर बातें कह रहा है ? अब चुप रह, फिर कोई ऐसी बात मुँह से न निकालना; नहीं तो बाणों से मारकर अभी तुझे यमलोक भेज दूँगा। चुपचाप युद्ध कर, कौरवों के साथ ही प्रेतलोक में जाने का उपाय कर।‘ धृष्टधुम्न के ऐसे कठोर वचन सुनकर सात्यकि क्रोध से काँप उठा, उसकी आँखें लाल हो गयीं, हाथ में गदा ले उछलकर वह द्रुपदकुमार के पास जा पहुँचा और बोला___’ अब मैं कोई कड़ी बात न कहकर केवल तुझे मार डालूँगा; क्योंकि तू इसी के योग्य है।‘ इस प्रकार महाबली सात्यकि को धृष्टधुम्न पर सहसा टूटते देख भगवान् श्रीकृष्ण के इशारे से भीमसेन अपने रथ से कूद पड़े और अपनी दोनों बाँहों से सात्यकि को रोका, पर वह बलपूर्वक आगे बढ़ गया। उस समय उसके शरीर से पसीने छूट रहे थे। भीमसेन ने दौड़कर छठे कदम पर सात्यकि को पकड़ा और अपने दोनो पैर जमाकर खड़े हो किसी प्रकार उसे काबू में किया। इतने में ही सहदेव भी अपने रथ से कूदकर आ पहुँचा और बोला____’ नरश्रेष्ठ ! अन्धक, वृष्णि तथा पांचालों से बढ़कर हमारा कोई मित्र नहीं है। तुमलोग जैसे हमारे मित्र हो, वैसे हम भी तुम्हारे हैं। तुम तो सब धर्मों के ज्ञाता हो, मित्रधर्म का खयाल करके अपने क्रोध को रोको। तुम धृष्टधुम्न के अपराध को क्षमा करो और धृष्टधुम्न तुम्हारे।‘  जब सहदेव सात्यकि को शान्त कर रहे थे, उस समय धृष्टधुम्न ने हँसकर कहा___’भीमसेन ! छोड़ दो, छोड़ दो सात्यकि को। यह युद्ध के घमण्ड में मतवाला हो रहा है। अभी तीखे बाणों से इसका सारा क्रोध उतार देता हूँ और इसकी जीवन_ लीला भी समाप्त किये डालता हूँ।‘
उसकी बात सुनकर सात्यकि साँप के समान फुँफकारता हुआ भीमसेन की भुजाओं से छूटने का उद्योग करने लगा। दोनों वीर अपनी_ अपनी जगह पर साँप के समान गरज रहे थे। यह देख भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन तुरंत ही बीच में आ पड़े और बड़े यत्न से उन्होंने उन दोनों को शान्त किया। इस प्रकार क्रोध ले आँखें लाल किये उन दोनों,धनुर्धर वीरों को आपस में लड़ने से रोककर पाण्डवपक्ष के क्षत्रिय योद्धा शत्रुओं का सामना करने के लिये आ डटे।

कौरवों का भयभीत होकर भागना, पिता की मृत्यु सुनकर अश्त्थामा का कोप और उसके द्वारा नारायणास्त्र का प्रयोग

संजय कहते हैं___ महाराज ! आचार्य द्रोण के मारे जाने के बाद कौरवों को बड़ा शोक हुआ। उनकी आँखों से आँसू बह चले। लड़ने का सारा उत्साह जाता रहा। वे आर्तस्वर से विलाप करते हुए आपके पुत्र को घेरकर बैठ गये। दुर्योधन से अब वहाँ खड़ा नहीं रहा गया, वह भागकर अन्यत्र चला गया। आपके सैनिक भूख_प्यास से विकल थे। वे ऐसे उदास दिखायी देते थे, मानो लू की लपट में झुलस गये हों। द्रोण की मृत्यु से सब पर भय छा गया था, इसलिये सब भाग गये। दुःशासन भी आचार्य की मृत्यु सुनकर घबरा गया था,  अतः वह भी हाथियों की सेना लेकर भाग निकला। बचे हुए संशप्तकों को साथ ले सुशर्मा भी पलायन कर गया। कोई हाथी पर चढ़कर भागा तो कोई रथ पर। कुछ लोग घोड़े को रणभूमि में ही छोड़कर भाग खड़े हुए। कोई पिता को जल्दी भागने को कहते थे, कोई भाइयों से। कोई मामा और मित्रों को उत्तेजित करते हुए भाग रहे थे। इस प्रकार जब आपकी सेना भयभीत एवं अशक्त होकर भागी जा रही थी, उस समय अश्त्थामा ने दुर्योधन के पास जाकर पूछा___भारत ! तुम्हारी यह सेना त्रस्त होकर भाग क्यों रहे  ? पहले की भाँति तुम्हारा मन आज स्वस्थ नहीं दिखायी देता। कर्ण आदि भी यहाँ नहीं ठहर पाते। और दिन भी भयानक युद्ध हुए हैं, पर सेना की ऐसी दशा कभी नहीं हुई। बताओ तो, किस महारथी की मृत्यु हुई है जिससे तुम्हारी सेना इस अवस्था को पहुँच गयी ?’
 द्रोणपुत्र का यह  प्रश्न सुनकर भी दुर्योधन उस घोर अप्रिय समाचार को मुँह से नहीं निकाल सका। केवल उसकी ओर देखकर आँसू बहाता रहा। इसके बाद उसने कृपाचार्य से कहा___’ आप ही सेना के भागने का कारण बता दीजिये।‘  तब कृपाचार्य बारम्बार विषादमग्न होकर अश्त्थामा से द्रोण को मारे जाने का समाचार सुनाने लगे। उन्होंने कहा___’तात ! हमलोग आचार्य द्रोण को आगे रखकर पांचाल राजाओं से संग्राम कर रहे थे। उस युद्ध में जब बहुत_ से कौरवयोद्धा मारे गये तो तुम्हारे पिता ने कुपित होकर ब्रह्मास्त्र प्रकट किया और भल्ल नामक बाणों से हजारों शत्रुओं का सफाया कर डाला। उस समय काल की प्रेरणा से पाण्डव, केकय, मत्स्य और विशेषतः पांचाल वीरों में से जो भी द्रोण के रथ के सामने आये, वे सब नष्ट हो गये। फिर तो पांचाल योद्धा भाग खड़े हुए। उनका बल और पराक्रम धूल में मिल गया। वे उत्साह खो बैठे और अचेत_ से हो गये। उन्हें द्रोण के बाणों से पीड़ित देख पाण्डवों की विजय चाहनेवाले श्रीकृष्ण ने कहा____’ये आचार्य द्रोण मनुष्यों से कभी नहीं जीते जा सकते; औरों की तो हार ही क्या है, इन्द्र भी इन्हें परास्त नहीं कर सकते। मेरा ऐसा विश्वास है कि अश्त्थामा के मारे जाने पर ये लड़ाई नहीं कर सकते; इसलिये कोई जाकर अश्त्थामा की मृत्यु की झूठी खबर सुना दे।‘  यह बात और सबने तो मान ली, केवल अर्जुन को पसंद नहीं आई। युधिष्ठिर ने भी बड़ी कठिनाई से इसे स्वीकार किया। भीमसेन ने लजाते_ लजाते तुम्हारे पिता के सामने जाकर कहा___’अश्त्थामा मारा गया;’ पर उन्होंने इस पर विश्वास नहीं किया। इसी बीच में भीमसेन ने मालवा के राजा इन्द्रवर्मा के अश्त्थामा नामक हाथी को मार डाला। इसे युधिष्ठिर ने भी देखा। द्रोण ने सच्ची बात का पता लगाने के लिये राजा युधिष्ठिर से पूछा___’ अश्त्थामा मारा गया या नहीं ?’ मिथ्या भाषण में कितना दोष है, यह जानते हुए भी युधिष्ठिर ने कह दिया ‘ अश्त्थामा मारा गया। परन्तु हाथी।‘  अन्तिम वाक्य उन्होंने धीरे से कहा, जिसे तुम्हारे पिता सुन न सके। अब उन्हें तुम्हारे मरने का विश्वास हो गया। वे संताप से पीड़ित हो गये। अब युद्ध में पहले_ का सा उत्साह न रहा। उन्होंने दिव्यास्त्रों का परित्याग कर दिया और समाधि लगाकर बैठ गये। उस समय धृष्टधुम्न ने पास जाकर बायें हाथ ले उनके केश पकड़ लिये और उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। सब योद्धा पुकार_ पुकारकर कर रहे थे___’ न मारो, न मारो ।‘ अर्जुन तो रथ से उतरकर उसके पीछे दौड़ पड़े और बाँह उठाकर बारम्बार कहने लगे___’ आचार्य को जीवित ही उठा लाओ, मारो मत।‘ इस प्रकार सब लोग मना करते ही रह गये, परन्तु उस नृशंस ने तुम्हारे पिता को मार ही डाला। उसके मारे जाने,पर हमारा उत्साह भी जाता रहा, इसलिये भाग रहे हैं।‘ धृतराष्ट्र ने पूछा___ संजय ! आचार्य द्रोण को वारुण, आग्नेय, ब्राह्म, ऐन्द्र और नारायण_ अस्त्र का भी ज्ञान था; वे धर्म में स्थित रहनेवाले थे; तो भी धृष्टधुम्न ने उन्हें अधर्मपूर्वक मार डाला। वे शस्त्रविद्या में परशुराम की और युद्ध में इन्द्र की समानता रखते थे। उनका पराक्रम कीर्तवीर्य के समान और बुद्धि बृहस्पति के तुल्य थी। वे पर्वत के समान स्थिर और अग्नि के समान तेजस्वी थे। गम्भीरता में समुद्र को भी मात करते थे। ऐसे धर्मिष्ठ पिता को धृष्टधुम्न के द्वारा अधर्मपूर्वक मारा गया सुनकर अश्त्थामा ने क्या कहा?
 संजय कहते हैं____ पापी धृष्टधुम्न ने मेरे पिता को छल से मार डाला है___ यह सुनकर अश्त्थामा पहले तो रो पड़ा, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे; मगर फिर वह रोष से भर गया, उसका सारा शरीर क्रोध से तमतमा उठा। बारम्बार आँखों से आँसू पोंछता हुआ वह दुर्योधन से बोला___’राजन् ! मेरे पिता ने हथियार डाल दिया था तो भी उन नीचों ने उन्हें मरवा डाला। इन धर्मध्वजियों का किया हुआ पाप आज मुझे मालूम हो गया। युधिष्ठिर ने जो भी नीचतापूर्ण क्रूर कर्म किया है, उसे भी सुन लिया। मेरे पिता रण में मृत्यु को प्राप्त होकर अवश्य ही वीरों के लोक में गये हैं; अतः उनके लिये मुझे शोक नहीं करना है। किन्तु धर्म में प्रवृत्त रहने पर भी जो उनका केश पकड़ा गया___ यही मेरे मर्मस्थानों को छेदे डालता है। मुझ जैसे पुत्र के जीवित रहते भी उन्हें यह दिन देखना पड़ा। दुरात्मा धृष्टधुम्न ने मेरा अपमान करके जो यह महान् पाप किया  है, इसका भयंकर परिणाम उसे जल्दी ही भोगना पड़ेगा। युधिष्ठिर भी कितना झूठा है ! उसने बहुत बड़ा अन्याय करके छल से मेरे पिता का हथियार डलवा दिया है। अतः आज यह पृथ्वी उस धर्मराज कहलानेवाले का रक्तपान करेगी। आज मैं अपने सत्य तथा निष्ठापूर्त कर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ कि संपूर्ण पांचालों का संहार किये बिना मैं कदापि जीवित नहीं रहूँगा। हर तरह के उपायों से पांचालों के नाश का प्रयत्न करूँगा। कोमल या कठोर कर्म करके भी पापी धृष्टधुम्न का नाश कर डालूँगा। पांचालों का सर्वनाश किये बिना मैं शान्ति नहीं पा सकूँगा। संसार के लोग पुत्र की चाह इसीलिये करते हैं कि वह इहलोक तथा परलोक में महान् भय से पिता की रक्षा करेगा। परंतु मैं जीवित ही हूँ और मेरे पिता की पुत्रहीन की_सी दुर्दशा हुई है। धिक्कार है मेरे दिव्य अस्त्रों को, धिक्कार है मेरी इन भुजाओं और पराक्रम को, जो कि मेरे जैसे पुत्र को पाकर भी मेरे पिता का केश खींचा गया। अब मैं ऐसा काम करूँगा, जिससे परलोकवासी पिता के ऋण से उऋिण हो जाऊँ। श्रेष्ठ पुरुष को अपनी प्रशंसा कभी नहीं  करनी चाहिये; तथापि अपने पिता वध मुझसे सहा नहीं जाता, इसलिये अपना पौरुष कहकर सुनाता हूँ। आज श्रीकृष्ण और पाण्डव मेरा पराक्रम देखें, उनकी संपूर्ण सेना को मिट्टी में मिलाकर प्रलय का दृश्य उपस्थित कर दूँगा। रथ में बैठकर संग्रामभूमि में पहुँचने पर आज मुझे देवता, गंधर्व, असुर नाग और राक्षस भी नहीं जीत सकते। संसार में मुझसे या अर्जुन से बढ़कर दूसरा कोई अस्त्रवेत्ता नहीं है। मैं एक ऐसा अस्त्र जानता हूँ जिसे न श्रीकृष्ण जानते हैं, न अर्जुन। भीमसेन, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, धृष्टधुम्न, शिखण्डी और सात्यकि को भी उसका ज्ञान नहीं है।
पूर्वकाल की बात है, मेरे पिता ने भगवान् नारायण को नमस्कार करके उनकी विधिवत् पूजा की थी। भगवान् ने उनका पूजन स्वीकार किया और वर माँगने को कहा। पिता ने उनसे सर्वोत्तम नारायणास्त्र की याचना की। तब भगवान् बोले___मैं यह अस्त्र तुम्हें देता हूँ, अब युद्ध में तुम्हारा मुकाबला करनेवाला कोई नहीं रह जायगा। किन्तु ब्राह्मण ! इसका सहसा प्रयोग नहीं करना चाहिये; क्योंकि यह अस्त्र शत्रु का नाश किये बिना नहीं लौटता। अवध्य का भी वध कर डालता है। इसको शान्त करने के उपाय ये हैं___ शत्रु अपना रथ छोड़कर उतर जाय, हथियार नीचे डाल दे और हाथ जोड़कर इसकी शरण में चला जाय। और किसी उपाय से इसका निवारण नहीं होता।‘ यह कहकर उन्होंने अस्त्र दिया और मेरे पिता उसे ग्रहण करके मुझे भी सिखा दिया था। भगवान् ने अस्त्र देते समय यह भी कहा था कि ‘ तुम इस अस्त्र से अनेकों प्रकार के दिव्यास्त्रों का नाश कर सकोगे और संग्राम में बड़े तेजस्वी दिखायी दोगे।‘ ऐसा कहकर भगवान् अन्तर्धान गये। यह नारायणास्त्र मुझे अपने पिता से मिला है। इसके द्वारा युद्ध में मैं पाण्डव, पांचाल, मत्स्य और केकयों को मार भगाऊँगा। पाण्डवों को अपमानित करके न अपने संपूर्ण शत्रुओं का विध्वंस कर डालूँगा। ब्राह्मण और गुरु से द्रोह करनेवाले पांचालकुलकलंक धृष्टधुम्न को भी आज नहीं छोड़ूँगा।‘ अश्त्थामा की बात सुनकर कौरवों की भागती हुई सेना लौट पड़ी। सभी महारथियों ने बड़े_ बड़े शंख बजाने शुरु किये। भेेेेरी बज उठी, हजारों नगाड़े पीटे जाने लगे। उन बाजों की तुमुल ध्वनि से आकाश और पृथ्वी गूँज उठी। मेघ की गम्भीरता गर्जना के समान उस तुमुल नाद को सुनकर पाण्डव महारथी एकत्र हो परामर्श करने लगे। इसी बीच अश्त्थामा ने दिव्य नारायणास्त्र को प्रकट किया।