Saturday, 29 January 2022

अश्वत्थामा की प्रतिज्ञा, धृष्टद्युम्न और कर्ण का युद्ध, अश्वत्थामा के द्वारा धृष्टद्युम्न की और अर्जुन के द्वारा अश्वत्थामा की पराजय

संजय कहते हैं_महाराज ! तदनन्तर, दुर्योधन ने कर्ण के पास जाकर कहा_’राधानन्दन ! यह युद्ध खुला हुआ स्वर्ग का दरवाजा है, जो हमें स्वत: प्राप्त हो गया है। सौभाग्यशाली क्षत्रियों को ही ऐसा युद्ध मिला करता है। यदि तुमलोगों ने युद्ध में पाण्डवों को मारा तो धन_ धान्य से सम्पन्न पृथ्वी प्राप्त करोगे और यदि शत्रुओं के साथ से तुम्ही मारे गये तो वीर पुरुषों के प्राप्त होने योग्य _पुण्य_लोक पाओगे। दुर्योधन की बात सुनकर श्रेष्ठ क्षत्रियों ने हर्ष_ध्वनि की। फिर सब ओर बाजे बजने लगे। उस समय अश्वत्थामा ने वहां पहुंचकर आपके योद्धाओं को हर्षित करते हुए कहा_’आप सब लोगों ने तो देखा ही था मेरे पिता अस्त्र डालकर योग में स्थित हो गये थे, तो भी उन्हें धृष्टद्युम्न ने मारा। इसके कारण तो मुझे अमर्ष है ही, मित्र दुर्योधन का हित भी करना है। 
इसलिये क्षत्रियों ! मैं आपके समक्ष यह प्रतिज्ञा करता हूं धृष्टद्युम्न को मारे बिना अपना कवच नहीं उतारूंगा। यदि मेरी प्रतिज्ञा झूठी हो तो मुझे स्वर्ग न मिले। लड़ाई में अर्जुन या भीमसेन जो भी मेरा सामना करने आयेंगे, उन सबको कुचल डालूंगा_इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।अश्वत्थामा के ऐसा कहने पर कौरवों की सेना ने एक साथ होकर पाण्डवों पर धावा किया। साथ ही पाण्डवों का भी उसपर आक्रमण हुआ। दोनों दलों में घोर संग्राम होने लगा। मनुष्यों का भीषण संहार मचा; प्रलयकाल का दृश्य उपस्थित हो गया। उस समय पाण्डवों के पक्ष में युधिष्ठिर की और हमारे दल में कर्ण की प्रधानता थी। खूब जोर से मार_काट हुई। खून की धारा बह चली। संशप्तकों में अब थोड़े ही बच गये थे। इसलिये धृष्टद्युम्न तथा पाण्डव महारथियों ने सब राजाओं को साथ लेकर कर्ण पर ही धावा किया। किंतु कर्ण ने अकेले ही उन सबका बढ़ाव रोक दिया।
धृष्टद्युम्न ने कर्ण को एक बाण मारकर कहा_’अरे ! खड़ा रह, खड़ा रह, कहां भागा जाता है ?’ यह सुनकर कर्ण क्रोध में भर गया और धृष्टद्युम्न का धनुष काटकर उसने उसको नौ बाण मारे। धृष्टद्युम्न का कवच कट गया। इसके बाद उसने भी दूसरा धनुष लिया और कर्ण को सत्तर बाणों से घायल किया। अब तो कर्ण को बड़ा कोप हुआ, उसने धृष्टद्युम्न पर मृत्युदंड के समान भयंकर बाण का प्रहार किया। उस बाण को धृष्टद्युम्न की ओर आते देख सात्यकि ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए उसके साथ टुकड़े कर डाले। यह देख कर्ण ने बाणों की वर्षा करके सात्यकि को चारों ओर से घेर लिया और सात नाराचों से उसे बींध डाला। सात्यकि ने भी कर्ण का यही हाल किया। फिर उन दोनों में विचित्र प्रकार से घोर युद्ध हुआ, जिससे देखने और सुनने से भी भय होता था। इसी बीच में धृष्टद्युम्न पर अश्वत्थामा ने चढ़ाई की। उसने आते ही क्रोध में भरकर कहा_’ओ ब्रह्महत्यारे ! आज मैं तुझे मौत के मुंह में भेज दूंगा। अगर अर्जुन ने तेरी रक्षा नहीं की, यदि तू लड़ाई में डटा रहा गया और सामना छोड़कर भागा नहीं, तो आज तुझे तेरे पाप का। दण्ड अवश्य मिलेगा, तू कुशल से नहीं रह सकेगा ? उसके ऐसा कहने पर धृष्टद्युम्न बोला_’ तेरी बात का उत्तर मेरी यह तलवार ही देगी, जो तेरे पिता को संग्राम में मुंहतोड़ जवाब दे चुकी है।‘ यों कहकर सेनापति धृष्टद्युम्न ने अमर्ष में भरकर अश्वत्थामा को एक तीखे बाण से बींध डाला। इससे अश्वत्थामा को बड़ा क्रोध हुआ। उसने इतने बाणों की वर्षा की जिससे धृष्टद्युम्न के चारों ओर की दिशाएं ढ़क गयीं। इसी प्रकार धृष्टद्युम्न ने भी कर्ण के देखते_देखते द्रोणकुमार को अपने हाथों से आच्छादित कर दिया  उसका धनुष भी काट डाला। अश्वत्थामा ने वह धनुष फेंक दिया और दूसरा धनुष_बाण हाथ में लेकर उससे धृष्टद्युम्न के शक्ति, गदा, ध्वजा, घोड़े, सारथि तथा रथ को पलक मारते_मारते नष्ट कर दिया। तब धृष्टद्युम्न ने ढ़ाल और तलवार हाथ में ली, किन्तु महारथी अश्वत्थामा ने बल्लों से मारकर उनके भी टुकड़े_टुकड़े कर डाले। साथ ही उसने अनेक बाणों से धृष्टद्युम्न को बहुत घायल कर दिया। यह सब करने पर भी जब वह धृष्टद्युम्न का नाश न कर सका तो धनुष फेंककर धृष्टद्युम्न को पकड़ने के लिये दौड़ा। इसी बीच में श्रीकृष्ण की दृष्टि उधर गयी। उन्होंने अर्जुन से कहा_’पार्थ ! वह देखो, अश्वत्थामा धृष्टद्युम्न को मारने के लिये बड़ा भारी उद्योग कर रहा है। इसमें संदेह नहीं कि वह अश्वत्थामा का ग्रास बना ही चाहता है, इसलिये तुम इसे शीघ्र छुड़ाओ।,' ऐसा कहकर महाप्रतापी भगवान् श्रीकृष्ण ने, जहां अश्वत्थामा था उधर ही अपने घोड़े बढ़ाये। श्रीकृष्ण और अर्जुन को आते देख उसने धृष्टद्युम्न को मारने का विशेष उद्योग किया। अर्जुन ने जब देखा कि अश्वत्थामा द्रुपदकुमार को घसीट रहा है, तो उसके ऊपर बहुत से बाण मारे। गाण्डीव से छूटे हुए वे बाण, जैसे सांप अपनी बांबी में घुसते हैं, उसी प्रकार अश्वत्थामा के शरीर में धंस गये। उनसे पीड़ित होकर द्रोणपुत्र ने धृष्टद्युम्न  को तो छोड़ दिया और अपने रथ में बैठकर धनुष हाथ में ले अर्जुन को बींधना आरंभ कर दिया। इतने में सहदेव धृष्टद्युम्न को अपने रथ पर बिठाकर वहां से अन्यत्र हटा दिया। अर्जुन ने भी द्रोणकुमार को बाणों से बींधना आरंभ किया। इससे अश्वत्थामा का क्रोध बहुत बढ़ गया। उसने अर्जुन की भुजाओं तथा छाती में भी बाण मारे। तब अर्जुन ने अश्वत्थामा के ऊपर द्वितीय कालदण्ड के समान एक नाराच चलाया। वह उसके कंधे पर लगा। लगते ही अश्वत्थामा विह्वल होकर रथ की बैठक में बैठ गया। उस समय उसे बड़ी वेदना हुई। उसकी यह अवस्था देख सारथि बड़ी फुर्ती के साथ उसे रणांगण से बाहर ले गया। महाराज ! इस प्रकार धृष्टद्युम्न को संकट से मुक्त और अश्वत्थामा को पीड़ित देख पांचाल वीरों ने बड़े जोर से गर्जना की। हजारों दिव्य बाजे बज उठे। सबलोग सिंहनाद करने लगे। तदनन्तर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से बोले_’अब संशप्तकों की ओर चलिये, उनका संहार करना इस समय मेरे लिये प्रधान काम है।‘ उनकी बात सुनकर भगवान् हवा से बातें करनेवाले अपने रथ के द्वारा संशप्तकों की ओर चल दिये।

Wednesday, 12 January 2022

अर्जुन द्वारा संशप्तकों का संहार तथा अश्वत्थामा की पराजय

संजय कहते हैं_एक ओर तो यह भयंकर संग्राम चल रहा था और दूसरी ओर अर्जुन संशप्तक सेना का विनाश कर रहे थे। शत्रुओं को जीतकर भगवान् श्रीकृष्ण से कहा_’जनार्दन ! ये संशप्तक तो अब युद्ध में मेरे बाणों की चोट न सह सकने के कारण झुंड_के_झुंड भागे जा रहे हैं। दूसरी ओर सृंजयों की बहुत बड़ी सेना भी विदीर्ण हो रही है। उधर कर्ण बड़े आराम से राजाओं की सेना में विचर रहा है, देखिये न, उसकी पताका दिखाई देती है। आप तो जानते ही हैं, कर्ण कितना पराक्रमी और बलवान है। दूसरे कोई महारथी उसे युद्ध में नहीं जीत सकते। यह हमारी सेना को खदेड़ रहा है, इसलिये अब उधर ही चलिये। यहां की लड़ाई बन्द करके महारथी कर्ण के पास चलना चाहिते। मेरी तो यही राय है, आगे आपकी जैसी इच्छा।‘ यह सुनकर भगवान् हंसते हुए बोले_’पाण्डुनन्दन ! अब तुम शीघ्र ही कौरवों का नाश करो’ ऐसा कहकर गोविन्द ने घोड़ों को हांक दिया। वे हंस के समान सफेद रंगवाले घोड़े श्रीकृष्ण और अर्जुन को लिए हुए आपकी विशाल सेना में घुस गये। उनके पहुंचते ही आपकी सेना चारों ओर भागने लगी। अर्जुन को अपनी सेना के भीतर विचरते देख दुर्योधन ने संशप्तकों को पुनः उनसे लड़ने की आज्ञा दी। संशप्तक योद्धा एक हजार रथ, तीन सौ हाथी, चौदह हजार घोड़े तथा दो लाख पैदल सेना लेकर अर्जुन पर आ चढ़े। वे अपनी बाणवर्षा से अर्जुन को आच्छादित करते हुए उन्हें घेरकर खड़े हो गये। अब अर्जुन ने पाश हाथ में लिये यमराज की भांति अपना भयंकर रूप प्रकट किया। वे संशप्तकों का संहार करने लगे। उस समय उनकी झांकी देखने ही योग्य थी। उन्होंने बिजली के समान चमकीले बाणों से वहां के समूचे आकाश को ढ़क दिया, तनिक भी खाली नहीं रखा। उनके धनुष की प्रत्यंचा की आवाज सुनकर ऐसा जान पड़ता मानो पृथ्वी, आकाश, दिशाएं, समुद्र तथा पर्वत_ये सब_के_सब फटे जा रहे हैं। थोड़ी ही देर में अर्जुन ने दस हजार योद्धाओं का सफाया कर डाला। फिर वे बड़ी फुर्ती के साथ उन आततायी शत्रुओं के हथियारसहित हाथ, भुजाएं, जंघा और मस्तक काटने लगे। इस प्रकार अर्जुन संशप्तकों की चतुरंगिणी सेना का नाश कर ही रहे थे कि सुदक्षिण का छोटा भाई वहां पहुंचकर उनके ऊपर बाणों की बौछार करने लगा। उस समय अर्जुन ने दो अर्धचंद्राकार बाणों से उसकी परिचय के समान मोटी भुजाएं काट डालीं तथा क्षुर से मारकर उसके पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मस्तक को भी धर से अलग कर दिया। वह लोहूलुहान होकर जमीन पर गिर गया। उसके गिरते ही बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ गया। लड़नेवाले योद्धाओं की नाना प्रकार से दुर्दशा होने लगी। अर्जुन ने एक_एक बाण से काम्बोजों, यवनों तथा शकों के घोड़ों का संहार करने लगा, वे कम्बोज आदि स्वयं भी खून से लथपथ हो गये। उनके रुधिर से सारी रणभूमि लाल हो गयी।
रथी, सारथि, घुड़सवार, हाथीसवार और महावत सब मारे गये। इस प्रकार वहां भयानक नरसंहार हुआ। तदनन्तर, अश्वत्थामा अर्जुन का सामना करने के लिये चढ़ आया। उस समय वह क्रोध में भरे हुए काल के समान जान पड़ता था। रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण पर दृष्टि पड़ते ही उसने भयंकर अस्त्र-शस्त्र की वृष्टि आरंभ कर दी। अश्वत्थामा के छोड़े हुए बाण चारों ओर से आकर श्रीकृष्ण और अर्जुन पर पड़ने लगे। वे दोनों रथ पर बैठे_ही_बैठे ढ़क गये। प्रतापी अश्वत्थामा ने उन दोनों को निश्चेष्ट कर दिया,  उनसे कुछ भी करते नहीं बनता था। उनकी यह अवस्था देख समस्त चराचर जगत् में हाहाकार मच गया। संग्राम में श्रीकृष्ण और अर्जुन को आच्छादित करते समय अश्वत्थामा ने जो पराक्रम दिखाया, वैसा इसके पहले मैंने कभी नहीं देखा था। उस समय द्रोणपुत्र की ओर देखकर अर्जुन को बड़ा भारी मोह_सा हो गया। उन्हें यह विश्वास_सा होने लगा कि अश्वत्थामा ने मेरा पराक्रम हर लिया है।
यह देख श्रीकृष्ण ने प्रेममिश्रित क्रोध के साथ कहा_’पार्थ ! तुम्हारे विषय में आज मैं बड़ी अद्भुत बात देख रहा हूं। आज द्रोणकुमार तुमसे बहुत बढ़_चढ़कर पराक्रम दिखा रहा है। अब तुममें पहले जैसी वीरता है या नहीं ? तुम्हारी दोनों भुजाओं में बल का अभाव तो नहीं हो गया है ? हाथ में गाण्डीव है न ? यह सब इसलिये पूछता हूं कि आज द्रोणकुमार तुमसे बढ़ता दिखाती देता है। ‘मेरे गुरु का पुत्र है' यह सोचकर उसकी उपेक्षा न करो। यह उपेक्षा करने का समय नहीं है।‘
श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर अर्जुन ने चौदह भल्ल हाथ में लिये और उनसे अश्वत्थामा के धनुष, ध्वजा, छत्र, पताका, रथ, शक्ति और गदा को नष्ट कर डाला। फिर ‘वत्सदन्त’ नामक बाणों से उसके गले की हंसली में इतने जोर से प्रहार किया कि उसे मूर्छा आ गयी। वह ध्वजा का डंडा थामकर बैठ गया। उसे बेहोश देखकर सारथि अर्जुन से उसकी रक्षा करने के लिये रणभूमि से बाहर हटा लें गया। इस प्रकार अर्जुन ने संशप्तकों का, भीम ने कौरव_योद्धाओं का तथा कर्ण ने पांचालों का एक ही क्षण में विनाश कर डाला। बड़े_बड़े वीरों का संहार करनेवाले उस भयंकर संग्राम में असंख्यों धड़ उठ_उठकर दौड़ रहे थे।

Wednesday, 29 December 2021

कृपाचार्य के द्वारा शिखण्डी की पराजय, सुकेतु का वध, धृष्टद्युम्न के द्वारा कृतवर्मा और दुर्योधन का परास्त होना तथा कर्ण द्वारा पांचाल आदि महारथियों का संहार

संजय कहते हैं_राजन् ! इस प्रकार कौरव_सेना को अर्जुन की मार से पीड़ित होती देख कृतवर्मा, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, उलूक, शकुनि, दुर्योधन तथा उसके भाइयों ने आकर बताया। उस समय कुछ देर तक वहां घोर संग्राम हुआ, कृपाचार्य ने बाणों की इतनी बौछार की कि टिड्डियों के समान उन बाणों से सृंजयों की सारी सेना आच्छादित हो गयी। यह देख शिखण्डी बड़े क्रोध में भरकर उनका सामना करने के लिये गया और उनके ऊपर चारों ओर  से बाणवर्षा करने लगा। किन्तु कृपाचार्य अस्त्रविद्या के महान् पण्डित थे। उन्होंने शिखण्डी की वाणवर्षा शान्त करके उसे दस बाणों से बिंध डाला। फिर तीखे बाणों के प्रहार से उसके सारथि और घोड़ों को भी यमलोक पठा दिया। तब शिखण्डी सहसा उस रथ से कूद पड़ा और हाथों में ढ़ाल_तलवार लेकर कृपाचार्य पर झपटा। उसे अपने ऊपर आक्रमण करते देख कृपाचार्य ने अनेकों बाण मारकर ढ़क दिया। शिखण्डी ने भी बारंबार तलवार घुमाकर कृपाचार्य के बाणों को काट डाला।
तब कृपाचार्य ने अपने बाणों से शीघ्रतापूर्वक शिखण्डी की ढाल काट दी। अब वह सिर्फ तलवार लेकर ही उनकी ओर दौड़ा। कृपाचार्य अपने बाणों से उसे बार_बार पीड़ा देने लगे। उसकी यह अवस्था देखकर चित्रकेतु_नन्दन सुकेतु तुरंत वहां आ पहुंचा और बाबा कृपाचार्य पर बाणों की झड़ी लगाने लगा। शिखण्डी ने देखा कि ब्राह्मण_देवता अब सुकेतु के साथ उलझे हुए हैं, तो वह मौका पाकर तुरंत भाग निकला। तदनन्तर सुकेतु ने कृपाचार्य को पहले नौ बाणों से बींधकर फिर तिहत्तर तीरों से घायल किया। इसके बाद उनके बाणसहित धनुष को काटकर सारथि के मर्मस्थानों में भी घाव किया।
यह देख कृपाचार्य ने तीस बाणों से सुकेतु के संपूर्ण मर्मस्थानों में चोट पहुंचायी। इससे सुकेतु का सारा शरीर कांप उठा, वह बहुत व्याकुल हो गया। उसी अवस्था में कृपाचार्य ने एक क्षुरप्र मारकर उसके मस्तक को काट गिराया। सुकेतु के मारे जाने पर उसके अग्रगामी सैनिक भयभीत हो सब दिशाओं में भाग गये। दूसरी ओर धृष्टद्युम्न और कृतवर्मा लड़ रहे थे। धृष्टद्युम्न ने क्रोध में भरकर कृतवर्मा की छाती में नौ बाण मारे तथा उसके ऊपर सायकों की भयंकर बौछार की।
कृतवर्मा ने भी हजारों बाण मारकर उस शस्त्र वर्षा को शान्त कर दिया, यह देख धृष्टद्युम्न ने कृतवर्मा के निकट पहुंच कर उसे आगे बढ़ने से रोक दिया और तुरंत ही उसके सारथि को भी तीखे भाले से मारकर यमलोक का अतिथि बनाया।इस प्रकार महाबली धृष्टद्युम्न ने अपने बलवान शत्रु को जीतकर साधकों की वर्षा से कौरव_सेना का बढ़ाव रोक दिया। तब आपके सैनिक सिंहनाद करके धृष्टद्युम्न पर टूट पड़े, फिर घमासान युद्ध होने लगा। उस दिन अर्जुन संशप्तकों में, भीमसेन कौरवों में और कर्ण पांचालों में घुसकर क्षत्रियों का संहार कर रहे थे। एक ओर दुर्योधन नकुल_सहदेव से भिड़ा हुआ था। उसने क्रोध में भरकर नौ बाणों से नकुल को और चार सायकों से उसके घोड़ों को बींध डाला।
फिर एक क्षुराकार बाण से उसने सहदेव की सुवर्ण भरी ध्वजा काट दी। नकुल ने भी कुपित होकर आपके पुत्र को इक्कीस बाण मारे तथा सहदेव ने पांच बाणों से उसे घायल किया। अब तो आपका पुत्र क्रोध से आग-बबूला हो गया, उसने उन दोनों भाइयों की छाती में पांच_पांच बाण मारे। फिर दो भल्लों से उन दोनों के धनुष काट डाले। इसके बाद उन्हें इक्कीस बाणों से घायल किया। धनुष काट जाने पर उन दोनों भाइयों ने पुनः दूसरे धनुष लेकर दुर्योधन पर बड़ी भारी बाणवर्षा आरंभ कर दी। दुर्योधन भी बाणों की झड़ी लगाकर उन दोनों को रोकने लगा। उस समय उसके धनुष से निकलते हुऐ बात संपूर्ण दिशा को ढ़कयते दिखाती दे रहे थे। आकाश आच्छान्न होकर बाणमय हो रहा था।नकुल_सहदेव को उसका रूप प्रलयशीघ्रतालीन बादल के समान दिखायी देता था। ठीक उसी समय पाण्डव_सेनापति धृष्टद्युम्न वहां आ पहुंचा और नकुल_सहदेव को पीछे करके ही अपने बाणों से दुर्योधन की प्रगति रोकने लगा।
आपके पुत्र ने हंसकर धृष्टद्युम्न को पहले पच्चीस बाण मारे, फिर पैंसठ बाण मारकर सिंहनाद किया। तत्पश्चात् उसने एक तीखे क्षुरप्र से धृष्टद्युम्न के बाणसहित धनुष और दास्ताने काट दिये। तब आपके पुत्र ने धृष्टद्युम्न पर पंद्रह बाण छोड़े। वे बाण उसके कवच को छेदते हुए पृथ्वी में समा गये। इससे दुर्योधन को बहुत क्रोध हुआ।
उसने एक भल्ल मारकर धृष्टद्युम्न का धनुष काट डाला। फिर बड़ी शीघ्रता के साथ उसकी भृगुटियों में दस बाण मारे। धृष्टद्युम्न को भी अपना कटा हुआ धनुष और सोलह भल्ल अपने हाथ में लिये।
उसमें से पांच भल्लों के द्वारा उसने दुर्योधन के घोड़ों और सारथि को मार डाला, एक से उसका धनुष काट दिया और सामग्रियों सहित रथ, क्षत्र, ध्वजा, शक्ति, गदा और खड्ग आदि को नष्ट कर डाला। राजा दुर्योधन रथहीन हो गया, उसके कवच और आयुध आदि नष्ट हो गये।
यह देख उसके भाई उसकी रक्षा में आ पहुंचे। दण्डधारी नाम का राजा उसे अपने रथ में बिठाकर उसे रणभूमि से बाहर ले गया।
 तदनन्तर कर्ण ने धृष्टद्युम्न पर धावा कर दिया। उन दोनों में महान् युद्ध छिड़ गया। उस समय पाण्डवों का या हमारे पक्ष का कोई भी योद्धा पीछे पैर नहीं हटाया था। पांचाल देश के लड़ाकू वीर विजय की अभिलाषा से बड़ी फुर्ती के साथ कर्ण पर टूट पड़े। उन्हें इस प्रकार विजय के लिये प्रयत्न करते देख कर्ण उनके अग्रगामी वीरों को बाणों से मारने लगा। उसने व्याघ्रकेतु, सुशर्मा, चित्र, उग्रायुध, जय तथा सिंहसेन को अपने बाणों का निशाना बनाया। उपर्युक्त वीरों ने भी रथों से कर्ण को घेर लिया। कर्ण बड़ा प्रतापी था, उसने अपने साथ युद्ध करते हुए इन आठों वीरों को आठ तीखे बाणों से मारकर खूब घायल कर दिया। फिर की हजार योद्धाओं का सफाया कर डाला। तत्पश्चात् जिष्णु, देवापि, भद्र, दण्ड, चित्र, चित्रायुध, हरि, सिंहकेतू, रोचमान्, शलभ को तथा चेदिदेशीय महारथियों को मौत के घाट उतारा। इस युद्ध में कर्ण ने जैसा पराक्रम किया, वैसा न तो भीष्म ने, न द्रोण ने और न दूसरे योद्धाओं ने ही कभी किया था। उसने हाथी, घोड़े, रथ और पैदल_ इन सबका महान् संहार किया। कर्ण का वह पराक्रम देख मेरे मन में ऐसा विश्वास होने लगा कि अब एक भी पांचाल योद्धा जीवित नहीं बचेगा। उस महासंग्राम में कर्ण को पांचाल सेना का संहार करते देख राजा युधिष्ठिर बड़े क्रोध में भरकर उसकी ओर दौड़े। साथ ही द्रौपदी के पुत्र, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सैकड़ों वीरों ने पहुंचकर कर्ण को चारों ओर से घेर लिया। शिखण्डी, सहदेव, नकुल, जनमेजय, सात्यकि तथा बहुत से प्रभद्रक योद्धा धृष्टद्युम्न के आगे होकर कर्ण पर अस्त्र-शस्त्रों की वृष्टि करने लगे। जैसे गरुड़ अकेला होकर भी बहुत_से सर्पों को दबोच लेता है, उसी प्रकार कर्ण अकेला ही चेदि, पांचाल और पाण्डववीरों पर प्रहार कर रहा था। जब कर्ण पाण्डवों से उलझा हुआ था उसी समय भीमसेन रण में सब ओर विचार अपने यमदण्ड के समान वाणों से वाहीक, वसातीय, मद्र तथा सिंधुदेशीय योद्धाओं का संहार कर रहे थे । भीम के बाणों से मारे गये रथियों, घुड़सवारों, सारथियों, पैदल योद्धाओं तथा हाथी_घोड़ों की लाशों से जमीन पट गयी थी। सारी सेना भीमसेन  के भय से उत्साह खो बैठी थी। किसी से कुछ करते नहीं बनता था। सब पर दैत्य जा रहा था।
कर्ण पाण्डव सेना को भगा रहा था और भीम कौरव वाहिनी को खदेड़ रहे थे_ इस प्रकार रणभूमि में विचरते हुए उन दोनों वीरों की अद्भुत शोभा हो रही थी।

Monday, 22 November 2021

अर्जुन द्वारा संशप्तकों का संहार

संजय कहते हैं_महाराज ! जिस समय क्षत्रियों का संहार करनेवाला वह भयानक युद्ध चल रहा था, उसी समय दूसरी ओर बड़े जोर_जोर से गाण्डीव धनुष की टंकार सुनाई देती थी। वहां अर्जुन संशप्तकों का तथा नारायणी सेना का संहार कर रहे थे। महारथी सुशर्मा ने अर्जुन पर बाणों की बौछार की तथा संशप्तकों ने भी उन्हें अपने तीरों का निशाना बनाया। तत्पश्चात् सुशर्मा ने अर्जुन को दस बाणों से बींधकर श्रीकृष्ण की दाहिनी भुजा में भी तीन बाण मारे। फिर एक भल्ल मारकर उसने अर्जुन की ध्वजा छेद डाली। ध्वजा पर आघात लगते ही उसके ऊपर बैठे विशाल वानर ने बड़े जोर से गर्जना करके सबको भयभीत कर दिया। उसका भयंकर नाद सुनकर आपकी सेना थर्रा उठी। डर के मारे कोई हिल_डुल तक न सका। थोड़ी देर में जब उसे होश आया तो सब_के_सब अर्जुन पर बाणों की बौछार करने लगे। फिर सबने मिलकर अर्जुन के विशाल रथ को घेर लिया। यद्यपि उनपर तीखे बाणों की मार पड़ रही थी, तो भी वे रथ पकड़कर जोर_जोर से चिल्लाने लगे। किन्हीं ने घोड़ों को पकड़ा, किन्हीं ने पहियों को। कुछ लोगों ने रथ की ईषा पकड़ने का उद्योग किया। इस प्रकार हजारों योद्धा रथ को जबरदस्ती पकड़कर सिंहनाद करने लगे। कुछ लोगों ने भगवान् श्रीकृष्ण की दोनों बाहें पकड़ लीं; कई योद्धाओं ने रथ पर चढ़कर अर्जुन को भी पकड़ लिया। श्रीकृष्ण ने अपनी बांहे झटककर उन लोगों को जमीन पर गिरा दिया तथा अर्जुन ने भी अपने अपने रथ पर चढ़े हुए कितने ही पैदलों को धक्के देकर नीचे गिराया। फिर आसपास खड़े हुए संशप्तक योद्धाओं को निकट से युद्ध करने में उपयोगी बाण मारकर ढ़क दिया। तदनन्तर अर्जुन ने देवदत्त तथा श्रीकृष्ण ने पांचजन्य नामक शंख बजाया। शंखों की आवाज सुनकर संशप्तकों की सेना भय से सिहर उठी। फिर अर्जुन ने नागास्त्र का प्रयोग करके उन सबके पैर बांध दिये। पैर बांध जाने से निश्चेष्ट होकर वे पत्थर के पुतले जैसे दिखायी देने लगे। उसी अवस्था में अर्जुन ने उनका संहार आरंभ किया। जब मार पड़ने लगी तो उन्होंने रथ छोड़ दिया और अपने समस्त अस्त्र-शस्त्रों को अर्जुन पर छोड़ने का प्रयास किया; परंतु पैर बंधे होने के कारण वे हिल भी न सके। अर्जुन उनका वध करने लगे। इसी समय सुशर्मा गारुड़ास्त्र का प्रयोग किया। उससे बहुत से गरुड़ प्रकट हो_होकर सर्पों को खाने लगे। उन गरुड़ों को देख सर्पगण लापता हो गये। इस प्रकार नागपाश से छुटकारा पाने हुए योद्धा अर्जुन के रथ पर सायकों तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगे। तब बाणों की बौछार से उनकी अस्त्र वर्षा का निवारण करके योद्धाओं का संहार आरंभ किया। इतने में सुवर्णा ने अर्जुन की छाती में तीन बाण मारे। इससे अर्जुन को गहरी चोट लगी और वे व्यथित होकर रथ के पिछले भाग में बैठ गये। थोड़ी ही देर में जब उन्हें चेत हुआ, फिर तो उन्होंने तुरंत ही ऐन्द्रेयास्त्र को प्रकट किया। उससे हजारों बाण निकल_निकलकर चारों दिशाओं में छा गये और आपकी सेना तथा घोड़े_हाथियों का विनाश करने लगे। इस प्रकार सेना का संहार होता देख संशप्तकों तथा नारायणी सेना के ग्वालों को बड़ा भय हुआ।
उस समय वहां एक भी पुरुष ऐसा नहीं था, जो अर्जुन का सामना कर सके। सब वीरों के देखते_देखते आपकी सेना कट रही थी। वह स्वयं निश्चेष्ट हो गयी थी, उससे पराक्रम करते नहीं बनता था। यह सब मेरी आंखों देखी घटना है। अर्जुन ने वहां दस हजार योद्धाओं को मार डाला था। संशप्तकों में से जो शेष बच गये थे उन्होंने मर जाने या विजय पाने का निश्चय करके फिर से अर्जुन को घेर लिया। फिर तो वहां अर्जुन के साथ आपके सैनिकों का बड़ा भारी संग्राम हुआ।

Sunday, 14 November 2021

भीमसेन के द्वारा धृतराष्ट्र के पुत्रों तथा कौरव योद्धाओं का भीषण संहार

धृतराष्ट्र बोले_संजय ! भीमसेन ने जो कर्ण को रथ की बैठक में गिरा दिया_यह तो उन्होंने बड़ा दुष्कर काम किया। उसी के भरोसे दुर्योधन मुझसे बार_बार कहा करता था कि’अकेले कर्ण ही पाण्डवों और सृंजयों को युद्ध में मार डालेगा।‘ अब भीम के हाथों कर्ण को पराजित देख मेरे पुत्र दुर्योधन ने क्या किया ? संजय ने कहा_महाराज ! उस महासंग्राम में कर्ण को युद्ध से विमुख होते देख दुर्योधन ने अपने भाइयों से कहा_’तुमलोग शीघ्र जाकर कर्ण की रक्षा करो। वह भीमसेन के भय के कारण अगाध संकट_समुद्र में डूब रहा है।‘ राजा की आज्ञा पाकर वे क्रोध में भर गये और जिस प्रकार पतंगे आग की ओर दौड़ते हैं, उसी प्रकार भीमसेन को मार डालने की इच्छा से उनपर टूट पड़े। श्रुतर्वा, दुर्धर, क्राथ, विवित्सु, विकट, सम निषंगी, नन्द, उपनन्द, दुष्प्रधर्ष, सुबाहु, वातवेग, सुवर्चा, धनुर्गाह, दुर्मुद, जलसन्ध, शल और सह_ ये लोग रथियों से घिरे हुए दौड़े और भीमसेन को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये। फिर तो उन्होंने नाना प्रकार के बाणों की झड़ी लगा दी। महाबली भीमसेन उनके प्रहारों से पीड़ित हो रहे थे, तो भी  आपके पुत्रों के पांच सौ रथों की धज्जियां उड़ा दीं और पचास रथियों को यमलोक भेज दिया।। तदनन्तर क्रोध में भरे हुए भीम ने एक भल्ल मारकर विवित्सु के मस्तक को धड़ से अलग कर दिया। उसकी मृत्यु होते  सभी भाई भीम पर टूट पड़े। तब उन्होंने दो भल्लों से आपके दो पुत्र विकट और सह के प्राण ले लिये। लगे हाथ भीमसेन ने तेज किये हुए नाराच से मारकर क्राथ को भी यमलोक भेज दिया। महाराज ! इस प्रकार जब आपके वीर धनुर्धर पुत्र मारे जाने लगे तो रणभूमि में बड़े जोर का हाहाकार  मचा। उनकी सेना का संहार करके भीम ने नन्द और उपनन्द को भी मौत के घाट उतारा। अब तो आपके पुत्र भय से घबरा उठे।
वे भीम को प्रलयकालीन यमराज के समान भयंकर जानकर वहां से भाग गये। आपके इतने पुत्र मारे गये_यह देख कर्ण का मन बहुत उदास हो गया। उसकी आज्ञा से मद्रराज ने पुनः घोड़े बढ़ाये। वे घोड़े बड़े वेग से आकर भीमसेन के रथ से भिड़ गये।  फिर तो एक_दूसरे का वध चाहनेवाले कर्ण और भीमसेन में बालि_सुग्रीव की भांति भयंकर युद्ध होने लगा। कर्ण ने अपने सुदृढ़ धनुष को कानतक खींचकर तीन बाणों से भीमसेन को बींध दिया। उन्होंने भी एक भयंकर बाण हाथ में लेकर उसे कर्ण पर चलाया।
उस बाण ने कर्ण का कवच फाड़कर उसके शरीर को छेद दिया। उस प्रचंड प्रहार से कर्ण को बड़ी व्यथा हुई, वह व्याकुल होकर कांपने लगा। तदनन्तर रोष और अमर्ष में भरकर उसने  भीमसेन को पच्चीस बाण मारे। फिर अनेकों साधकों का प्रहार करके एक बाण से उनकी ध्वजा काट डाली। इसके बाद एक भल्ल से मारकर उनके सारथि को भी मौत के घाट उतार दिया। लगे हाथ धनुष भी काट डाला; फिर एक ही मुहूर्त में हंसते_हंसते उसने भीमसेन को रथहीन कर दिया। रथ के टूटते ही महाबाहु भीमसेन गदा हाथ में लिये हंसते_हंसते कूद पड़े। फिर वेग से उछलकर वे आपकी सेना में घुस गये और गदा मार_मारकर समस्त सैनिकों का संहार करने लगे। पैदल होते हुए भी उन्होंने अपनी गदा में सात सौ हाथियों को उनके सवारों, ध्वजाओं एवं अस्त्र-शस्त्रों सहित नष्ट कर डाला। इसके बाद शकुनि के अत्यन्त बलवान बावन हाथियों को मार गिराया तथा एक सौ से अधिक रथों और सैकड़ों सैनिकों का संहार कर डाला।
ऊपर से सूर्यदेव तपा रहे और सामने भीमसेन संताप दे रहे थे; इससे समस्त योद्धा भीम के डर से मैदान छोड़कर भाग निकले। इतने में ही दूसरी ओर से  पांच सौ रथियों ने आकर भीम पर चारों ओर से बाणवर्षा आरंभ कर दी। परन्तु भीम ने उन सबको गदा से मारकर यमलोक पठा दिया।
साथ ही उनकी ध्वजा_पताका और आयुधों के भी टुकड़े_टुकड़े कर डाले। तत्पश्चात् शकुनि के भेजे हुए तीन हजार घुड़सवारों ने हाथों में शक्ति, श्रष्टि और प्रकाश लेकर भीमसेन पर हमला किया। भीमसेन ने बड़े वेग से आगे बढ़कर उनका मुकाबला किया और तरह_तरह के पैंतरे बदलते हुए उन्होंने उन सबको गदा से मार डाला।
इसके बाद भीमसेन दूसरे रथ पर सवार हुए और क्रोध में भरकर कर्ण का सामना करने के लिये पहुंच गये। उस समय कर्ण और युधिष्ठिर में युद्ध चल रहा था। कर्ण ने अपने बाणों से युधिष्ठिर को आच्छादित कर दिया और उनके सारथि को भी मार गिराया। सारथि के न होने से घोड़े भाग चले। उनके रथ को पलायन करते देख महारथी कर्ण बाणों की बौछार करते हुए उनका पीछा करने लगा। कर्ण को धर्मराज का पीछा का पीछा करते देख भीमसेन क्रोध से जल गये। उन्होंने अपने बाणों से पृथ्वी और आकाश को चारों ओर से ढ़क दिया। इसके बाद कर्ण पर भी भीषण बाणवर्षा की। कर्ण लौट पड़ा। उसने भी सब ओर से तीखे बाणवर्षा करके भीम को आच्छादित कर दिया। कर्ण और भीम दोनों ही धनुर्धरों में श्रेष्ठ थे। उस समय एक_दूसरे पर विचित्र_विचित्र बाणों का प्रहार करते हुए उन दोनों ने अन्तरिक्ष में बाणों का जाल_सा बुन दिया। यद्यपि उस वक्त मध्याह्न का सूर्य तप रहा था, तो भी उन दोनों के सायक_समूहों से रुक जाने के कारण उसकी प्रखर प्रभा नीचे नहीं आने पाती थी। 
 उस समय शकुनि, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, कर्ण और कृपाचार्य_ये पांच वीर पाण्डव_सेना से लोहा ले रहे थे। उनको डटे हुए देख भागने वाले  कौरव_योद्धा भी पीछे लौट पड़े। फिर तो दोनों पक्ष की सेनाएं एक_दूसरे से गुंथ गयीं।
उस दुपहरी में जैसा भयंकर युद्ध हुआ, वैसा मैंने न तो न कभी देखा था और न सुना ही था। एक ओर के सैनिकों का झुंड दूसरी ओर के झुंड से जा भिड़ा। भीषण मारकाट मच गयी।
छूटते हुए बाणसमूहों की आवाजें बहुत दूर तक सुनाई देने लगीं। उस समय महान् सुयश चाहनेवाले दोनों पक्ष के योद्धाओं की सिंहगर्जना एक क्षण के लिये भी बंद नहीं होती थी। दोनों दल में इतना भयानक युद्ध हुआ कि खून की नदियां बह चलीं। कितने ही क्षत्रिय उनमें डूबकर यमलोक पहुंच जाते थे। सब ओर मांसभोजी जन्तुओं का चित्कार हो रहा था। कौए, गीध और वक आदि पक्षी मंडरा रहे थे। उस भयंकर संग्राम में कौरव सेना बहुत कष्ट पाने लगी। उस समय उनकी दशा समुद्र में टूटी हुई नौका के समान हो रही थी।

Friday, 22 October 2021

कर्ण और युधिष्ठिर का संग्राम, कर्ण की मूर्छा, कर्ण द्वारा युधिष्ठिर का पराभव तथा भीम के द्वारा कर्ण का परास्त होना

संजय कहते हैं_महाराज ! कर्ण ने उस सेना को चीरकर धर्मराज पर धावा किया। उस समय शत्रुओं ने उसपर नाना प्रकार के हजारों अस्त्र-शस्त्र चलाते, किन्तु उसने उन सबके टुकड़े_टुकड़े कर डाले। इतना  ही नहीं अपने भयंकर बाणों से उसने शत्रुओं को घायल भी कर डाला। उनके मस्तकों, भुजाओं तथा जंघाओं को काट गिराया।
कर्ण के बाणों से मारे जाकर बहुत_से शत्रु धराशायी हो गये। बहुतों के अंग भंग हो गये, अतः वे युद्ध छोड़कर भाग चले। रणभूमि में शत्रुपक्ष के लाखों योद्धाओं की लाशें बिछ गयीं।
उस समय कर्ण प्राणियों का अन्त करने वाले यमराज के समान क्रोध में भरा हुआ था। पांडव और पांचाल सैनिकों ने उसे रोका अवश्य, किन्तु उन सबको रौंदकर वह युधिष्ठिर के पास आ धमका। तदनन्तर कर्ण को अपने पास ही  देख युधिष्ठिर की आंखें क्रोध से लाल हो गयीं, उन्होंने उससे कहा_’सूतपुत्र ! तू युद्ध में सदा अर्जुन से लाग_डांट रखता है और दुर्योधन  की हां_में_हां मिलाकर हमलोगों को कष्ट पहुंचाया करता है।
आज तुझमें जो बल और पराक्रम हो वह सब दिखा, अपना महान् पुरुषार्थ प्रकट कर।‘ यह कहकर युधिष्ठिर ने कर्ण को दस बाणों से बींध डाला। सूतपुत्र कर्ण ने भी हंसते हंसते उन्हें दस बाणों से घायल करके तुरंत बदला चुकाया। 
तब युधिष्ठिर ने पर्वतों को भी विदीर्ण करने वाला यमदण्ड के समान भयंकर बाण धनुष पर चढ़ाया और सूतपुत्र का वध करने की इच्छा से उसे छोड़ दिया। वह वेगपूर्वक छोड़ा हुआ बाण बिजली के समान कड़ककर महारथी कर्ण की बायीं कोख में धंस  उसकी चोट से कर्ण को मूर्छा आ गयी।
उसका सारा शरीर शिथिल हो गया, धनुष हाथ से छूटकर रथ पर जा गिरा। मानो प्राण निकल गये हों, ऐसा निश्चेष्ट और अचेत होकर कर्ण शल्य के सामने ही गिर पड़ा। राजा युधिष्ठिर ने अर्जुन का हित करने की इच्छा से कर्ण पर तुरंत प्रहार नहीं किया। कर्ण को इस अवस्था में देखकर कौरव सेना में हाहाकार मच गया। थोड़ी ही देर में जब कर्ण की मूर्छा दूर हुई तो उसने विजय नामक अपना महान् धनुष तानकर तेज किये हुए बाणों से युधिष्ठिर की प्रगति रोक दी।  उस समय दो पांचाल राजकुमार युधिष्ठिर के पहियों की रक्षा कर रहे थे, उनके नाम थे चन्द्रदेव तथा दण्डाधार।
कर्ण ने उन दोनों को छुरे के समान आकारवाले दो बाणों से मार डाला। यह देख युधिष्ठिर ने कर्ण को पुनः तीस बाणों से घायल कर दिया। साथ ही सुषेण और सत्यसेन को भी तीन_तीन बाण मारे। फिर नब्बे बाणों से शल्य को और तिहत्तर से सूतपुत्र को बींध डाला तथा उसकी रक्षा करने वाले योद्धाओं को भी तीन_तीन बाणों से घायल किया। तब कर्ण ने हंसकर अपना धनुष टंकारा और एक भल्ल तथा साठ बाणों से युधिष्ठिर को आहत करके जोर से गर्जना की। फिर तो पाण्डव_पक्ष के योद्धा बड़े अमर्ष में भरकर दौड़े और युधिष्ठिर की रक्षा के लिये कर्ण को बाणों से पीड़ित करने लगे। सात्यकि, चेकितान, युयुत्सु, पाण्ड्य, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदी के पुत्र, प्रभद्रक, नकुल_सहदेव, भीमसेन, धृष्टकेतू तथा करूष, मत्स्य, केकय, काशी और कोसल देश के योद्धा_ये सब_के_सब बाणों का प्रहार करने लगे।
पांचालदेशीय जन्मेजय भी उसी साधकों से बींधने लगा। पाण्डववीर सब ओर से कर्ण पर बाराहकर्ण, नारायण, नालीक, बाण, वत्सदन्त, विपाट तथा क्षुरप्र आदि नाना प्रकार के अस्त्र_शस्त्रों की वर्षा करने लगे। यह देखकर कर्ण ने ब्रह्मास्त्र प्रकट किया, उसके बाणों से संपूर्ण दिशाएं आच्छादित हो गयीं। शराग्नि की लपट में झुलसकर पाण्डववीर भस्म होने लगे। 
तदनन्तर कर्ण ने हंसकर युधिष्ठिर का धनुष काट दिया, फिर पलक मारते ही उसने तेज किये हुए नब्बे बाणों से उनका कवच छिन्न_भिन्न कर दिया। कवच कट जाने पर बाणों की मार से वे लोहूलुहान हो गये और क्रोध में भरकर उन्होंने कर्ण के रथ पर फौलाद की बनी हुई शक्ति छोड़ी किन्तु कर्ण ने सात बाण मारकर उसके टुकड़े_टुकड़े कर दिये। इसके बाद युधिष्ठिर ने कर्ण की भुजा, ललाट और मस्तक में चार तोमरों का प्रहार करके हर्षनाद किया। कर्ण के शरीर से खून की धारा बहने लगी। उसने एक भल्ल से युधिष्ठिर की ध्वजा काट डाली और तीन से उन्हें भी आहत किया। फिर तरकस काटकर रथ के भी टुकड़े_टुकड़े कर डाले। इस प्रकार पराजित होकर राजा युधिष्ठिर एक दूसरे रथ पर बैठे और रणभूमि से भाग चले। कर्ण ने पीछा करके युधिष्ठिर के कंधे पर हाथ रखा और उन्हें बलपूर्वक पकड़ लेना चाहा; इतने में ही कुन्ती के दिये हुए वचन का स्मरण हो  इधर शल्य भी बोल उठे_’कर्ण ! महाराज युधिष्ठिर को हाथ न लगाओ, मुझे भय है कि कहीं पकड़ते ही ये तुम्हें मारकर भस्म न कर डाले।‘ यह सुनकर कर्ण हंस पड़ा और पाण्डु नन्दन युधिष्ठिर का उपहास करते हुए कहने लगा_’युधिष्ठिर ! जिसका उच्चकुल में जन्म हुआ़ है, जो क्षत्रिय धर्म में स्थित है, वह भयभीत होकर प्राण बचाने के लिये युद्ध छोड़कर कैसे भाग सकता है ? मेरा तो ऐसा विश्वास है, तुम क्षत्रिय धर्म के पालन में निपुण नहीं हो सकते; क्योंकि सदा ब्राह्मणोचित स्वाध्याय और यज्ञों में ही लगे रहते हो। कुन्तीनन्दन ! आज से लड़ाई में न आना, शूरवीरों का सामना न करना तथा उनके लिये मुंह से अप्रिय बातें भी न निकालना। इतने बड़े समर में तो कभी जाने का नाम न लेना। यदि युद्ध में हम जैसे लोगों से कुछ कड़वी बात कहोगे तो  उसका यही अथवा उससे भी कठोर फल मिलेगा ! राजन् ! अपनी छावनी में जाओ अथवा श्रीकृष्ण और अर्जुन जहां हैं, वहां ही चले जाओ।‘ ऐसा कहकर कर्ण ने युधिष्ठिर को छोड़ दिया और पांडवसेना का संहार करने लगा। राजा युधिष्ठिर बहुत लज्जित होकर तुरंत वहां से हट गये और श्रुतकीर्ति के रथ पर बैठकर कर्ण का पराक्रम देखने लगे। अपनी सेना को खदेड़ी जाती हुई देख धर्मराज ने योद्धाओं से कुपित होकर कहा_’अरे ! क्यों चुप बैठे हो, मारो इन कोरवों को।‘
राजा की आज्ञा पाते ही । आदि पाण्डव_महारथी आपके पुत्रों पर टूट पड़े। उस समय रथ, हाथी और घोड़ों पर सवार हुए योद्धाओं तथा शस्त्रों का भयंकर शब्द होने लगा और उठो, मारो, आगे बढ़ो, दबोच लो_इस प्रकार कहते हुए वे आपस में मारकाट करने लगे। उन आक्रमणकारियों के प्रचण्ड वेग को सहन करने की अपने में शक्ति न देखकर आपके पुत्रों की विशाल सेना भागने लगी। यह देख दुर्योधन ने अपने योद्धाओं को सब ओर से रोकने का प्रयास किया, परन्तु वह पुकारता ही रह गया, सेना पीछे न लौटी। कर्ण की भी दृष्टि उधर पड़ी, उसने कौरव सैनिकों को मालिकों के साथ भागते हुए देख महाराज शल्य से कहा_’अब तुम भीम के रथ के पास चलो।‘ शल्य ने अपने घोड़ों को भीम की ओर बढ़ाया।
कर्ण को आते देख भीमसेन क्रोध में भर गये। उन्होंने सूतपुत्र को मार डालने का विचार करके वीरवर सात्यकि तथा धृष्टद्युम्न से कहा_’अब तुमलोग महाराज युधिष्ठिर की रक्षा करो। अभी मेरे देखते_देखते उन्हें बहुत बड़े संकट से किसी तरह छुटकारा मिला है। दुरात्मा कर्ण ने दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिये मेरे सामने ही उनकी समस्त युद्ध_सामग्री को तहस_नहस कर डाला है। इससे मुझे बड़ा दु:ख हुआ है; अब मैं उसका बदला चुकाऊंगा। आज घोर संग्राम करके या तो मैं ही कर्ण को मार डालूंगा या वहीं मेरा वध करेगा_यह मैं सच्ची बात बता रहा हूं। राजा को मैं तुम्हें धरोहर के रूप में देता हूं; उनकी रक्षा के लिय ये सब प्रकार से यत्न करना।
यों कहकर महाबाहु भीमसेन अपने महान् सिंहनाद से संपूर्ण दिशाएओं को प्रतिध्वनित करते हुए कर्ण की ओर बढ़े। उन्हें चढ़कर आते देख कर्ण ने क्रोध में भरकर उनकी छाती में नाराच का प्रहार किया। इस प्रकार सूतपुत्र के हाथों घायल होकर भीम ने उसे बाणों से ढक दिया और तेज किये हुए नौ बाण मारकर उसको घायल कर तब कर्ण ने भीम के धनुष के दो टुकड़े कर दिये। भीम ने दूसरा धनुष उठाया और कर्ण के मर्मस्थानों को बींधकर बड़ी जोर से गर्जना की। फिर सूतपुत्र का वध करने के लिये उन्होंने पर्वतों को भी विदीर्ण करनेवाला एक बाण चढ़ाया और उसे उसकी ओर छोड़ दिया। उस वज्र के समान वेगशाली बाण ने सूतपुत्र के शरीर को छेद डाला। सेनापति कर्ण रथ की बैठक में गिर पड़ा। उसे मूर्छित देखकर मद्रराज शल्य कर्ण को रणभूमि से दूर हटा लें गये। इस प्रकार कर्ण को परास्त करके भीमसेन ने कौरव सेना को मार भगाया।

Saturday, 25 September 2021

कौरव_व्यूहनिर्माण, कर्ण और शल्य की बातचीत, अर्जुन द्वारा संशप्तकों का, कर्ण द्वारा पांचालों का तथा भीम द्वारा भानुसेन का संहार के और सात्यकि से वृषसेन की पराजय

संजय कहते हैं_महाराज ! तदनन्तर कर्ण ने पाण्डवों का अनुपम व्यूह देखा, जो शत्रुसेना का आक्रमण सहने में सर्वथा समर्थ था। धृष्टद्युम्न उस व्यूह की रक्षा कर रहा था। उसे देखते हुए कर्ण सिंह के समान गर्जना करते हुए आगे बढ़ा।
अपनी युद्ध चातुरी का परिचय देते हुए उसने पाण्डवों के मुकाबले में कौरव_सेना की व्यूह रचना की और पाण्डव सैनिकों का संहार करते हुए कर्ण ने राजा युधिष्ठिर को अपने दाहिने भाग में कर दिया। धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! राधानन्दन कर्ण ने पाण्डवों तथा धृष्टद्युम्न आदि महान् धनुर्धरों का सामना करने के लिये कैसा व्यूह बनाया था ?  व्यूह के दोनों बगल में तथा आस_पास कौन_कौन वीर खड़े थे ? पाण्डवों ने मेरे पुत्रों के मुकाबले कैसा व्यूह रचा था ? फिर दोनों सेनाओं का अत्यन्त दारुण युद्ध कैसे आरंभ हुआ ? उस समय अर्जुन कहां थे, जो कर्ण ने युधिष्ठिर पर चढ़ाई कर दी। यदि अर्जुन निकट होते तो युधिष्ठिर के पास कौन फटकने पाता ?
संजय ने कहा_महाराज ! आपकी सेना का व्यूह निर्माण जिस तरह हुआ था उसे सुनिये।
कृपाचार्य मगधदेश के योद्धा और कृतवर्मा_ये व्यूह के दाहिने पार्श्व में मौजूद थे। इनके पक्षपोषक थे महाराज शकुनि और उनका पुत्र उलूक। ये दोनों चमचमाते भाले लिये हुए गांधारदेशीय घुड़सवारों  तथा पर्वतीय योद्धाओं के साथ आपकी सेना का संरक्षण कर रहे थे। इसी तरह संग्राम में कुशल चौबीस हजार संशप्तक व्यूह के व्यूह के वामपक्ष की रक्षा में खड़े थे। इनके पक्षपोषक थे काम्बोज, शक और यवन। ये लोग रथ, घोड़े और पैंथरों की सेना से युक्त थे।,बीच में कर्ण था जो सेना के मुहाने की रक्षा कर रहा था। कर्ण के पुत्र कर्ण की रक्षा में खड़े थे; और पीली आंखों वाला दु:शासन हाथी पर सवार हो अनेकों सेनाओं से घिरा हुआ व्यूह के पृष्ठभाग में खड़ा था। उसके पीछे था स्वयं राजा दुर्योधन, जिसकी रक्षा के लिये उसके महाबली भाई मद्र और केकयवीरों की सेना लेकर उपस्थित थे। अश्वत्थामा, कौरवों के प्रधान महारथी, मतवाले गजराज और शूरवीर म्लेच्छ_ये दुर्योधन की रथ_सेना के पीछे चल रहे थे। इस प्रकार अनेक घुड़सवारों, रथों और हजारे हुए हाथियों से भरा हुआ वह व्यूह देवता और असुरों के व्यूह के समान शोभा पा रहा था।
तत्पश्चात् सेना के मुहाने पर कर्ण को उपस्थित देख राजा युधिष्ठिर धनंजय से कहने लगे_’अर्जुन ! देखो तो सही, संग्राम में कर्ण ने कितना विशाल व्यूह बना रखा है ? पक्ष और प्रपेक्षों से युक्त यह शत्रुसेना कैसी सुशोभित हो रही है ! इसे देखकर हमें ऐसी नीति  बर्तनी चाहिते, जिससे शत्रुओं की यह महासेना हमलोगों को परास्त न कर सके।‘
राजा के ऐसा कहने पर अर्जुन ने हाथ जोड़कर कहा_’आपने जैसी आज्ञा की है, वैसा ही किया जायगा।‘ युधिष्ठिर बोले_’तुम कर्ण के साथ, भीमसेन दुर्योधन के साथ, नकुल वृषसेन के साथ और सहदेव शकुनि के साथ युद्ध करें।
शतानीक का दु:शासन से, सात्यकि का कृतवर्मा से, धृष्टद्युम्न का अश्वत्थामा से तथा मेरा कृपाचार्य से युद्ध होगा। द्रौपदी के सभी पुत्र शिखण्डी को साथ लेकर धृतराष्ट्र के अन्य पुत्रों के साथ युद्ध करें। इस प्रकार हमारे पक्ष के प्रधान_प्रधान वीर शत्रुओं के वीरों का संहार करें। धर्मराज के ऐसा कहने पर धनंजय ने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और सैनिकों को वैसा ही करने का आदेश देकर वे स्वयं सेना के मुहाने पर चले। महारथी अर्जुन को आते देख शल्य ने रणोन्मत कर्ण से पुनः इस प्रकार कहा_’कर्ण ! तुम जिन्हें बारंबार पूछते थे, वे कुन्ती नन्दन अर्जुन आ पहुंचे। उनके रथ का तुमुलनाद सुनाई दे रहा था। इधर यह अपशकुन होने लगा। वह देखो, रोंगटे खड़े कर देनेवाला अत्यंत भयंकर कबन्धाकार केतु नामक ग्रह सूर्यमंडल को घेरकर खड़ा है। तुम्हारी ध्वजा हिल रही है, घोड़े थर_थर कांपते हैं। मुझे तो इन अपशकुनों से ऐसा जान पड़ता है कि आज सैकड़ों और हजारों राजा मरकर रणभूमि में शयन करेंगे। जिनके हाथों में शंख, चक्र, गंदा और शार्ंगधनुष शोभा पाते हैं तथा वक्ष:स्थल में कौस्तुभ मणि देदिप्यमान रहती है, वे भगवान् श्रीकृष्ण हवा से बातें करने वाले सफेद घोड़ों को हांकते हुए इधर ही आ रहे हैं। यह देखो, गाण्डीव धनुष की टंकार होने लगी। अर्जुन के छोड़े हुए तीखे बाण शत्रुओं के प्राण ले रहे हैं। 
युद्ध में डटे हुए वीर राजाओं के मस्तकों से रणभूमि पटती जा रही है। जरा अपनी सेना की ओर तो दृष्टि डालो जो अर्जुन की मार से अत्यन्त व्याकुल हो रही है ! ये पाण्डववीर दौड़-दौड़कर तुम्हारे पक्ष के राजाओं का संहार करते हैं और हाथी, घोड़े, रथी तथा पैदल के समूह का नाश कर रहे हैं। यह देखो, अब महाबली अर्जुन संशप्तकों की ललकार सुनकर उधर ही बढ़ गये हैं और उन सभी शत्रुओं का संहार कर रहे हैं। महाराज शल्य की ऐसी बातें सुनकर कर्ण ने क्रोध से भरकर कहा_’शल्य ! तुम भी देख लो संशप्तक वीरों ने क्रोध में भरकर अर्जुन को चारों ओर धावा किया है।  अब उनका यहीं खात्मा समझो, वे रण समुद्र में डूब चुके हैं। शल्य ने कहा_अरे ! जो दोनों भुजाओं से पृथ्वी को उठा ले, क्रोध आने पर संपूर्ण प्रजा को भष्म करने की शक्ति रखता हो और देवताओं को स्वर्ग से नीचे गिरा सके, वहीं अर्जुन पर विजय पा सकता है। बेचारे संशप्तकों में इतनी ताकत कहां है ? धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! जब सेनाओं की मोर्चाबंदी हो गयी, उसके बाद अर्जुन ने संशप्तकों पर और कर्ण ने पाण्डवों पर कैसे धावा किया_इसका वर्णन विस्तार के साथ करो। संजय ने कहा_महाराज ! उस समय शत्रुसेना को व्यूहाकार में खड़े देख अर्जुन ने भी उसके मुकाबले में व्यूह निर्माण किया।
व्यूह के मुहाने पर धृष्टद्युम्न खड़ा था, जो सेना की शोभा बढ़ा रहा था। वह मूर्तिमान काल के समान दिखायी पड़ता था। द्रौपदी के पुत्र चारों ओर से उसकी रक्षा कर रहे थे। तदनन्तर व्यूह बना जाने पर अर्जुन संशप्तकों को देखकर क्रोध में भर गये और गांडीव धनुष टंकारते हुए उनकी ओर दौड़े। संशप्तक भी  युद्ध करते रहने का निश्चय करके मन में विजय की अभिलाषा लेकर अर्जुन का वध करने के लिये उनपर टूट पड़े तथा उनको सब ओर से पीड़ित करने लगे। हमने अर्जुन का निवातकवचों के साथ जैसा भयंकर युद्ध सुना है, संशप्तकों के साथ छिड़ा हुआ वह तुमुल संग्राम वैसा ही भयानक था। अर्जुन ने शत्रुओं के धनुष_बाण, तलवार, चक्र, बरसे, हथियारों सहित ऊपर उठी हुई भुजाएं तथा नाना प्रकार के अस्त्र_शस्त्र काट डाले और हजारों वीरों के मस्तकों को धड़ से अलग कर दिया।
उन्होंने पहले पूर्व दिशा में खड़े हुए शत्रुओं का वध करके फिर उत्तर दिशा वालों का संहार किया। इसके बाद दक्षिण और पश्चिम के सैनिकों का सफाया किया। जैसे प्रलयकाल में रुद्र समस्त प्राणियों का संहार करते हैं, उसी प्रकार क्रोध में भरे हुए अर्जुन ने शत्रुओं की सेना का विनाश कर डाला। इसी समय पांचाल, चेदि और सृंजय देश के वीरों का आपके सैनिकों के साथ अत्यंत दारुण संग्राम छिड़ा। कृपाचार्य, कृतवर्मा और शकुनि कोसल, काशी, मत्स्य, करुष, केअर तथा शूरसेनदेशीय शूरवीरों के साथ युद्ध करने लगे।
उस युद्ध में असंख्य वीरों का विनाश हो रहा था। 
दूसरी ओर दुर्योधन अपने भाइयों को साथ लिये मद्रदेशीय महारथियों तथा प्रधान_प्रधान  कौरववीरों से सुरक्षित रहकर पाण्डव, पांचाल एवं चेदिदेशीय योद्धाओं एवं सात्यकि से लड़ते हुए कर्ण की रक्षा कर रहा था। उस समय कर्ण ने तीखे बाणों से पाण्डवों की विशाल सेना का महान् संहार किया और बड़े-बड़े रथियों को रौंदते हुए उसने युधिष्ठिर को अधिक पीड़ा पहुंचायी। हजारों शत्रुओं के प्राण लिये। इसके बाद बाणों की झड़ी लगाकर  उसने प्रभद्रकों के सतहत्तर श्रेष्ठ वीरों का सफाया कर दिया। फिर पच्चीस बाणों से पच्चीस पांचाल वीरों का वध कर डाला तथा सैकड़ों और हजारों चेदिदेशीय योद्धाओं को सायकों के निशाने बनाकर यमलोक पहुंचाया। इस समय झुंड_के_झुंड पांचाल रथियों ने आकर कर्ण को चारों ओर से घेर लिया। तब कर्ण ने पांच दु:सह बाण छोड़कर भानुदेव, चित्रसेन, सेनाबिन्दु, तपन तथा शूरसेन_इन पांच पांचालों को मार डाला। इन शूरवीरों के मारे जाने पर पांचाल_सेना में हाहाकार मच गया। पांचालों के दस रथियों ने कर्ण को घेर लिया। यह देख उसने अपने बाणों से उन्हें तुरंत मार गिराया। उस समय कर्ण के पहियों की रक्षा करनेवाले उसके दुर्जय पुत्र सुषेण और सत्यसेन प्राणों का मोह छोड़कर युद्ध कर रहे थे। कर्ण का ज्येष्ठ पुत्र वृषसेन स्वयं उसके पीछे रहकर पृष्ठभाग की रक्षा करता था। तदनन्तर धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदी के पांचों पुत्र, भीमसेन, जनमेजय, शिखण्डी, प्रधान_प्रधान प्रभद्रक, चेदि, के केकय, पांचाल तथा मत्स्यदेशीय वीर और नकुल_सहदेव_ये कवच आदि से सुसज्जित हो कर्ण को मार डालने की इच्छा से उनकी ओर दौड़े। पास आते ही उन्होंने कर्ण पर बाणों की झड़ी लगा दी। कर्ण के पुत्रों तथा आपके पक्ष के अन्य योद्धाओं ने उस समय उन वीरों को आगे बढ़ने से रोका। सुषेण ने भल्ल मारकर भीमसेन का धनुष काट डाला और सात नारायणों से उनके हृदय में घाव करके बड़े जोर से गर्जना की तब तो भीमसेन ने दूसरा धनुष हाथ में लिया और उसकी प्रत्यंचा चढ़ाकर सुषेण का धनुष काट दिया।
साथ ही क्रोध में भरकर उन्होंने उसको दस बाणों से बींध डाला। इतना ही नहीं, भीम ने कर्ण पर भी सत्तर तीखे बाणों का प्रहार किया और दस बाणों से उसके पुत्र भानुसेन को घोड़े तथा सारथि आदि सहित यमलोक भेज दिया। तत्पश्चात् भीम ने आपकी सेना को पीड़ित करना आरंभ किया। उन्होंने कृपाचार्य और कृतवर्मा के धनुष काटकर उन दोनों को खूब घायल किया। दु:शासन को तीन और शकुनि को छ: बाणों से बींधकर उलूक और पतत्रि दोनों को रथहीन कर डाला। उसके बाद सुषेण से यह कहकर कि ‘ले, अब तुझे भी मारे डालता हूं’ उन्होंने एक सहायक को अपने हाथ में लिया; किन्तु कर्ण ने उसके भी टुकड़े_टुकड़े कर दिये और भीमसेन को मार डालने की इच्छा से उसने उसपर तिहत्तर बाणों का प्रहार किया। इधर सुषेण ने अपना धनुष लेकर नकुल की दोनों भुजाओं तथा छाती में पांच बाण मारे। तब नकुल ने बीस बाणों से सुषेण को घायल किया और भीषण सिंहनाद करके कर्ण को भी भयभीत कर डाला। यह देख सुषेण के क्रोध की सीमा न रही, उसने नकुल को साठ तथा सहदेव को सात बाणों से घायल कर दिया।
दूसरी ओर सात्यकि और वृषसेन में युद्ध छिड़ा हुआ था सात्यकि ने तीन बाणों से वृषसेन के सारथि को मारकर एक भाले से उसका धनुष काट दिया। फ़िर सात भल्लों से उसके घोड़ों का काम तमाम कर एक बाण से ध्वजा काट दी और तीन साधकों से वृषसेन की छाती में घाव किया।
उस प्रहार से वृषसेन का सारा शरीर सुन्न हो गया। एक क्षण तक बेहोश रहने के बाद वह उठा और हाथ में ढ़ोल तलवार ले सात्यकि को मार डालने की इच्छा से उसकी ओर झपटा। वृषसेन अभी कूदकर आ ही रहा था सात्यकि ने दस बाणों से उसकी ढ़ाल_तलवार के टुकड़े_टुकड़े कर दिये।
इसी समय उधर दु:शासन की दृष्टि पड़ी; उसने वृषसेन को रथ और शस्त्र से हीन देख तुरंत ही अपने रथ पर बिठा लिया और दूर ले जाकर उसे दूसरे रथ पर  इसके बाद महारथी वृषसेन ने वहां आकर द्रौपदी के  पुत्रों को तिहत्तर, सात्यकि को पांच, भीमसेन को चौंसठ, सहदेव को पांच, नकुल को तीस, शतानीक को सात, शिखंडी को दस, धर्मराज को सौ तथा अन्य वीरों को भी अनेकों बाणों से पीड़ित किया। तत्पश्चात् वह पुनः कर्ण के पृष्ठभाग की रक्षा करने लगा। सात्यकि के नये बने हुए लोहे के नौ बाणों से दु:शासन के सारथि, घोड़े, तथा रथ को नष्ट करके उसके ललाट में तीन बाण मारे। तब दु:शासन दूसरे रथ पर सवार हो कर्ण के उत्साह एवं बल को बढ़ाता हुआ पाण्डवों के साथ युद्ध करने लगा। तदनन्तर, कर्ण को धृष्टद्युम्न ने दस, द्रौपदी के पुत्रों ने तिहत्तर, सात्यकि ने सात, भीमसेन ने चौंसठ, सहदेव ने सात, नकुल ने तीस, शतानीक ने सात, शिखण्डी ने दस, धर्मराज ने सौ तथा अन्य वीरों ने भी बहुत से बाण मारे। सबलोगों ने सूतपुत्र को भली-भांति पीड़ित किया। तब कर्ण ने उनमें से प्रत्येक को दस_दस बाणों से बींध डाला। उनके घोड़े, सारथि और रथ जब कर्ण के बाणों से आच्छादित हो गये तो उन्होंने विवश होकर कर्ण को आगे बढ़ने के लिये मार्ग दे दिया। अपने बाणों की बौछार से उन महान् धनुर्धरों का मानमर्दन करता हुआ कर्ण हाथियों की सेना में बेरोक_टोक घुस गया। फिर चेदिवीरों के तीस रथियों का सफाया करके उसने राजा युधिष्ठिर पर धावा किया। उस समय , सात्यकि तथा पाण्डवलोग राजा को सब ओर से घेरकर उनकी रक्षा करने लगे। इसी प्रकार आपके पक्ष वाले शूरवीर योद्धा भी डटकर कर्ण की रक्षा करने लगे। उस समय युधिष्ठिर आदि पाण्डव और कर्ण आदि निर्भय होकर युद्ध में लग गये।