Saturday, 26 March 2022

कर्ण से पराजित और घायल होकर युधिष्ठिर का अपनी छावनी में विश्राम के लिये जाना

संजय कहते हैं_राजन् ! दूसरी ओर युधिष्ठिर को आते देख आपका पुत्र दुर्योधन क्रोध में भर गया। उसने अपनी आधी सेना साथ ले सहसा निकट जाकर सब ओर से घेर लिया और छिहत्तर क्षुरप्र मारकर उनको बींध डाला। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने भी क्रोध में भरकर आपके पुत्र को तुरंत ही तीस भल्ल मारे। यह देख उन्हें पकड़ने के लिये कौरव_पक्ष के योद्धा टूट पड़े। उस समय शत्रुओं के खोटे विचार जानकर महारथी नकुल, सहदेव तथा  एक अक्षौहिणी सेना के युधिष्ठिर के पास आ धमके। वहां पहुंचते ही सहदेव ने बड़ी फुर्ती के साथ दुर्योधन को बीस बाण मारे। इतने में कर्ण युधिष्ठिर की सेना का संहार करने लगा। उसके बाणों से पीड़ित होकर वह सेना सहसा भाग खड़ी हुई। तब राजा युधिष्ठिर को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने तेज किये हुए पचास बाणों से कर्ण को बींध डाला। तदनन्तर, उन दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। धर्मराज शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए भांति भांति के बाणों, भल्लों, शक्ति, ऋष्टि तथा मुहरों से आपकी सेना का संहार करने लगे। उस समय आपके योद्धाओं में हाहाकार मच गया। धर्मात्मा युधिष्ठिर जहां_जहां दृष्टि डालते थे, वहां के सैनिकों का सफाया हो जाता था।
यह देख कर्ण अत्यन्त कुपित होकर युधिष्ठिर पर नारायण, अर्धचंद्र तथा वत्सदंत आदि का प्रहार करने लगा। युधिष्ठिर ने भी तेज किते हुए बाणों से कर्ण को घायल कर डाला। फिर कर्ण ने हंसते_हंसते तेज किये हुए बाणों तथा तीन भल्लों से युधिष्ठिर की छाती छेद डाली। इससे धर्मराज को बड़ी पीड़ा हुई। वे रथ के पिछले भाग में बैठ गये और सारथि को वहां से चल देने की आज्ञा दी। उन्हें जाते देख दुर्योधनसहित सभी कौरव ‘इसे पकड़ो_पकड़ो’ कहकर चिल्लाते हुए उनके पीछे दौड़ पड़े। इतने ही में पांचाल योद्धाओं के साथ सत्रह सौ कैकयवीरों ने आकर कौरवों को आगे बढ़ने से रोक दिया। उस समय राजा युधिष्ठिर बाणों के प्रहार से बहुत घायल हो गये थे। वे नकुल तथा सहदेव के बीच में होकर धीरे_धीरे छावनी की ओर जा रहे थे, उनका होश ठिकाने नहीं था। ऐसी अवस्था में भी कर्ण ने दुर्योधन के हित की इच्छा से युधिष्ठिर का पीछा किया और उन्हें तीन तीखे बाणों से बींध डाला। युधिष्ठिर ने भी कर्ण की छाती में बाण मारकर बदला चुकाया। इसके बाद तीन बाणों से उसके सारथि को और चार से चारों घोड़ों को बींध डाला। फिर नकुल और सहदेव ने भी बड़े प्रयास के साथ कर्ण पर बाणों की वर्षा की। इसी प्रकार सूतपुत्र कर्ण ने भी तीखी धारवाले दो बल्लों से नकुल और सहदेव को घायल कर दिया।
फिर युधिष्ठिर के घोड़ों को मारकर एक भल्ल से उसके मस्तक के टोप को नीचे गिरा दिया। इसी तरह नकुल के भी घोड़ों को मौत के घाट उतारकर उसके रथ की ईषा और धनुष को भी काट डाला। रथ टूट जाने पर वे दोनों पाण्डुकुमार अत्यन्त घायल होकर सहदेव के रथ पर जा बैठे।
उन दोनों को रथहीन देख उनके मामा मद्रराज शल्य को बड़ी दया आयी। उन्होंने सूतपुत्र से कहा_’कर्ण ! तुम्हें तो आज अर्जुन से युद्ध करना है, फिर अत्यन्त क्रोध में भरकर धर्मराज से किसलिये लड़ रहे हो ? इन्हें मारने से तुम्हारा क्या फायदा होगा ? इधर देखो, अर्जुन रथियों की सेना का संहार कर रहे हैं। अपने बाणों की वर्षा से हमारी संपूर्ण सेना को काल का ग्रास बना रहे हैं। उधर, भीमसेन दुर्योधन को दबोचे हुए हैं।
हम लोगों के देखते_देखते वे उसे मार न डालें_इसके लिखते प्रयत्न करना चाहिए।
 इन माद्रीपुत्रों अथवा युधिष्ठिर को मारने से क्या लाभ ? दुर्योधन का प्राण संकट में पड़ा है उसे चलकर बचाओ। कर्ण ने शल्य की बात सुनी और देखा कि दुर्योधन भीमसेन के चंगुल में फंस चुका है, तो युधिष्ठिर और नकुल सहदेव को वहां ही छोड़कर आपके पुत्र को बचाने के सब दौड़ पड़ा।
उसके चले जाने के बाद युधिष्ठिर सहदेव के तेज चलने वाले घोड़ों द्वारा वहां से खिसक गये। राजा को अपनी पराजय के कारण बड़ी लज्जा हो रही थी। नकुल और सहदेव के साथ अपने घायल शरीर से छावनी पर पहुंच कर वे रथ से उतरे और एक सुन्दर पलंग पर लेट गये। उस समय उनके देह से बाण निकाल डाले गये फिर भी हृदय के घाव से उन्हें बड़ी पीड़ा होने लगी। उस समय उनके देह से बाण निकाल डाले गये तो भी हृदय के घाव से उन्हें बड़ी पीड़ा होने लगी। उन्होंने दोनों भाई माद्री के पुत्रों से कहा_’भीमसेन मेघ के समान गरज_गरजकर लड़ रहे हैं, तुम दोनों सहायता के लिये उनकी ही सेना में जाओ।‘ उनकी आज्ञा पाकर नकुल दूसरे रथ पर सवार हुआ। सहदेव के पास तो रथ था ही नहीं। दोनों भाई अपने शीघ्र गामी घोड़े हांककर भीमसेन की सेना में जा पहुंचे।

Monday, 28 February 2022

दोनों पक्ष के योद्धाओं का द्वंदयुद्ध तथा भीमसेन का पराक्रम

धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! पांडवों और पांचालों की मार खाने से हमारी सेना दु:खी होकर भागने लगी, उस समय कौरवों ने क्या किया ?
संजय ने कहा_महाराज ! उस समय महाबाहु भीमसेन पर कर्ण की दृष्टि पड़ी। उन्हें देखते ही उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गयीं और वह उनपर चढ़ आया। उसने भीमसेन के डर से भागती हुई आपकी सेना को बड़ी कोशिश करके रोका और उसे व्यवस्थापूर्वक खड़ी करके पाण्डवों की ओर बढ़ा। यह देख पाण्डवों के महारथी भीमसेन, सात्यकि, शिखण्डी, जन्मेजय, धृष्टद्युम्न तथा प्रभद्रक आदि  क्रोध में भरकर आपकी सेना का संहार करने के लिये उसपर चारों ओर से टूट पड़े। उस युद्ध में शिखण्डी ने कर्ण का सामना किया और धृष्टद्युम्न ने बहुत बड़ी सेना से घिरे हुए दु:शासन का मुकाबला किया। नकुल ने वृषसेन पर और युधिष्ठिर ने चित्रसेन पर धावा किया। सहदेव उलूक से भिड़ गया। सात्यकि का सहदेव पर और द्रौपदी के पुत्रों का कौरवों पर आक्रमण हुआ। अर्जुन का सामना महारथी अश्वत्थामा ने किया। कृपाचार्य का युधामन्यु से और कृतवर्मा का उत्तमौजा से युद्ध हुआ। भीमसेन ने अकेले ही समस्त कौरवों तथा उनकी सेनाओं का वेग रोका। महाराज ! शिखण्डी ने रणभूमि में निर्भय विचरते हुए कर्ण को अपने बाणों का निशाना बनाया और उसे आगे बढ़ने से रोक दिया। बाधा पाकर रोष के मारे कर्ण के ओंठ फड़कने लगे। उसने शिखण्डी की दोनों भौंहों के बीच तीन बाण मारे। उनसे अत्यन्त आहत होकर शिखण्डी ने भी कर्ण को तेज किये हुए नब्बे बाण मारे। तब महारथी कर्ण ने तीन बाणों से शिखण्डी के सारथि और घोड़ों को मार डाला। इससे शिखण्डी को बड़ा क्रोध हुआ। उसने अपने रथ से कूदकर कर्ण के ऊपर शक्ति का प्रहार किया। कर्ण ने तीन बाणों से उस शक्ति के टुकड़े_टुकड़े कर डाले और नौ तीखे बाण मारकर उसे भी बींध डाला। शिखण्डी के शरीर में बहुत घाव हो गये थे; इसलिये वह कर्ण के धनुष से छूटे हुए बाणों का वार बचाता हुआ तुरंत भाग निकला। अब कर्ण पाण्डव सैनिकों को अपने बाणों से गिराने लगा। दूसरी ओर आपके पुत्र दु:शासन ने धृष्टद्युम्न को बहुत पीड़ित किया। तब धृष्टद्युम्न ने दु:शासन की छाती में तीन बाण मारे। फिर दु:शासन ने भी एक तीखे भल्ल से धृष्टद्युम्न की बायीं भुजा को बींध डाला, इससे धृष्टद्युम्न क्रोध में भर गया और एक तीखा क्षुरप्र मारकर दु:शासन का धनुष काट दिया। यह देख पांचाल योद्धा उच्च स्वर से गर्जना करने लगे। अब आपके पुत्र ने दूसरा धनुष हाथ में लिया और हंसते हंसते बाणों की झड़ी लगाकर धृष्टद्युम्न को चारों ओर से घेर लिया। तदनन्तर पांचालदेशीय सैनिकों ने भी अपने सेनापति को बचाने के लिये आपके पुत्र पर घेरा डाल दिया। फिर तो आपके योद्धाओं का शत्रुओं के साथ घोर संग्राम होने लगा। इसी बीच अपने पिता के पास खड़े हुए वृषसेन ने नकुल को पहले पांच और फिर आठ बाण मारे तब शूरवीर नकुल ने भी हंसते_हंसते एक तीखे नारायण से वृषसेन की छाती छेद डाली। इस चोट से वृषसेन बहुत घायल हो गया। फिर तो वे दोनों वीर हजारों बाणों की बौछार से एक_दूसरे को ढ़कने लगे। इतने में ही कौरव_सेना में भगदड़ पड़ गयी। कर्ण पीछे लौटकर उसे रोकने लगा। उसके लौट जाने पर नकुल ने कौरवों पर चढ़ाई की। कर्णपुत्र वृषसेन भी नकुल का सामना करना छोड़ अपने पिता के पहियों की ही रक्षा में लग गया। इसी प्रकार क्रोध से भरे हुए उलूक को संग्राम में सहदेव ने रोका, उसने उलूक के चारों घोड़ों को मारकर उसके सारथि को भी यमलोक भेज दिया। उलूक रथ से कूदकर भागा और तुरंत त्रिगर्तों की सेना में जा घुसा।
एक ओर सात्यकि और शकुनि में लड़ाई हो रही थी। सात्यकि ने तेज किये हुए बीस बाणों से शकुनि को घायल कर दिया और एक भल्ल मारकर उसकी ध्वजा भी काट डाली। इससे शकुनि को बड़ा कोप हुआ; उसने सात्यकि का कवच काटकर उसकी ध्वजा के भी टुकड़े_टुकड़े कर दिये। सात्यकि ने शकुनि को पुनः तीन बाणों से घायल किया। तीन ही बाण उसके सारथि को भी मारे। इसके बाद अनेकों बाण मारकर उसने शकुनि के घोड़ों को यमलोक भेज दिया। फिर तो शकुनि सहसा रथ से कूद पड़ा और उलूक के रथ पर बैठकर वहां से चम्पत हो गया। अब सात्यकि आपकी सेना पर बाण बरसाने लगा। उसकी बाणो की चोट से आहत हो आपके सैनिक चारों ओर भागने लगे। बहुतेरे अपने प्राण खोकर रणभूमि में ही गिर गये। दूसरी ओर, आपके पुत्र दुर्योधन ने भीमसेन को रोका। किन्तु भीम ने तुरंत ही उसके घोड़ों और सारथि को मार डाला। फिर रथ ध्वजा की धज्जियां उड़ा दीं। इससे पाण्डव पक्ष के योद्धा बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकार परास्त होकर दुर्योधन भीम के सामने से भाग गया।
इधर युधामन्यु ने कृपाचार्य को घायल करके तुरंत ही उनका धनुष भी काट दिया। तब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ आचार्य कृप ने दूसरा धनुष हाथ में ले बाण मारकर युधामन्यु के रथ की ध्वजा, सारथि और छत्र को नीचे गिरा दिया। तब तो महारथी युधामन्यु स्वयं ही रथ हांकता हुआ भाग गया।
इसी प्रकार एक ओर उत्तमौजा ने बाणों की झड़ी लगाकर कृतवर्मा को ढ़क लिया। फिर उन दोनों में अत्यन्त भयानक युद्ध छिड़ गया। कृतवर्मा ने उत्तमौजा की छाती में चोट की, वह मूर्छित होकर रथ की बैठक में बैठ गया। उसकी यह अवस्था देख सारथि उसे रणभूमि से हटा ले गया।
तदनन्तर, कौरवों की सारी सेना भीमसेन पर टूट पड़ी। दु:शासन तथा शकुनि हाथियों की बहुत बड़ी सेना से भीमसेन को घेरकर उनपर बाण मारना आरम्भ किया। हाथियों की सेना देखते ही भीमसेन के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हुए हाथियों का का संहार आरंभ किया। अपने बाणों से हाथियों के हजारों जत्थों का सफाया कर डाला। उस समय बिजली की गड़गड़ाहट के समान भीम के धनुष की टंकार सुनकर हाथी मल_मूत्र त्यागते हुए बड़े वेग से भाग रहे थे। महाराज ! भीमसेन का वह पराक्रम संपूर्ण प्राणियों का संहार करने वाले रुद्र के समान जान पड़ता था।

Thursday, 10 February 2022

भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन से कौरवों के आक्रमण तथा भीम के पराक्रम का वर्णन

संजय कहते हैं_महाराज ! चलते समय राह में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युधिष्ठिर को दिखाते हुए कहा_’पाण्डुनन्दन ! ये हैं तुम्हारे भाई युधिष्ठिर। देखो, इन्हें मारने के लिये अत्यन्त बलवान और महान् धनुर्धर कौरव_योद्धा बड़ी तेजी के साथ इनका पीछा कर रहे हैं। साथ ही इनकी रक्षा के लिये पांचालदेशीय वीर भी उनके पीछे-पीछे आ रहे हैं। यह राजा दुर्योधन भी रथियों की सेना से गिरकर राजा युधिष्ठिर पर धावा कर रहा है। इसका भी उद्देश्य यही है कि युधिष्ठिर को मार डाले। इस कार्य में इसके भाई भी साथ दे रहे हैं। ये हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल_सभी इन्हें पकड़ने के लिये जा रहे हैं।अब देखो, सात्यकि और भीम ने पहुंचकर यद्यपि इन्हें बीच में ही रोक दिया है, तो भी ये संख्या में अधिक होने के कारण राजा की ओर बढ़े ही चले जाते हैं। शत्रु को संताप देने वाले राजा युधिष्ठिर भी यद्यपि बड़े बलवान हैं, युद्ध की कला में निपुण हैं, उनका हाथ भी फुर्ती से चलता है, तथापि कर्ण ने उन्हें रण से विमुख कर दिया है। धृतराष्ट्र के पुत्र शूरवीर हैं, उनकी सहायता मिल जाने पर कर्ण अवश्य ही हमारे महाराज को कष्ट पहुंचा सकता है। इनके तथा और भी बहुत से शूरवीरों के साथ ये युद्ध कर रहे थे। उन सब महारथियों ने मिलकर उन्हें परास्त किया है। राजा युधिष्ठिर उपवास करने के कारण बहुत दुर्बल हो गये हैं। ये अधिकतर ब्राह्मबल ( क्षमा ) में ही स्थित रहते हैं; क्षात्रबल ( निष्ठुरता ) में नहीं; जबसे कर्ण के साथ इनकी भिड़ंत हुई है; तबसे ये बड़े संकट में पड़ गये हैं। कर्ण धृतराष्ट्र के महारथी पुत्रों से यह कह रहा है कि ‘तुमलोग पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर को मार डालो।‘
पार्थ ! ये सभी महारथी स्थूणाकर्ण, इन्द्रजाल तथा पाशुपत नामक अस्त्र-शस्त्रों से राजा को आच्छादित कर रहे हैं। वे आतुर हो गये हैं, इस समय उन्हें विशेष सेवा की आवश्यकता है। अब शीघ्रता करने का समय है_यह जानकर  पांचाल तथा पाण्डव वीर बड़ी तेजी से उनके पीछे दौड़ते हैं। उन्हें यह आशा और विश्वास है कि यदि महाराज युधिष्ठिर पाताल में भी डूबते होंगे तो हम उन्हें बलपूर्वक निकाल लायेंगे। वह देखो, अब कर्ण अत्यन्त क्रोध में भरकर पांचालों की ओर दौड़ रहा है। उसके रथ की ध्वजा धृष्टद्युम्न के रथ की ओर जाती दिखायी दे रही है। पार्थ ! इस समय मैं तुम्हें एक परम प्रिय समाचार सुना रहा हूं कि राजा युधिष्ठिर जीवित हैं। उधर वे महाबाहु भीमसेन हैं, जो सृंजयों की वाहिनी तथा सात्यकि के साथ लौटकर अपनी सेना के मुहाने पर खड़े हैं। पांचाल योद्धा तथा भीमसेन अपने तेज बाणों से अब कौरवों पर प्रहार कर रहे हैं। देखो, कौरव_सेना भाग चली। सैनिकों के गांवों से खून की धारा जारी है। उनकी बड़ी दयनीय दशा दिखाती देती है। अब देखो, भीमसेन शत्रुओं की सेना को खदेड़ने लगे। उनकी वजह से कौरव_वाहिनी बड़े संकट में पड़ गयी है। ये रथी लोग भीम के भय से थर्रा उठे हैं। हाथी उनके नाराचों की मार से विदीर्ण हो_होकर जमीन पर गिर रहे हैं। बड़े_बड़े गजराज भीम से घायल होकर अपनी ही सेना को रौंदते कुचलते हुए भागे जा रहे हैं। अर्जुन ! पहचान लो, संग्राम विजयी वीरवर भीमसेन का ही यह दु:सह  सिंहनाद सुनाई देता है ! यह लो, उन्होंने दस बाण मारकर निषादराज के पुत्र को भी मौत के घाट उतार दिया। अब कौरवों की बोलती बन्द हो गयी है, पहले जैसी उनकी गर्जना नहीं सुनाई देती।
भीमसेन ने दुर्योधन को तीन अक्षौहिणी सेनाओं को आगे बढ़ने से रोककर मार डाला है। जिनकी आंखें कमजोर हैं वे जैसे दोपहर के सूर्य की ओर नहीं सकते, वैसे ही कौरव पक्ष के राजा लोग भीमसेन की ओर आंख उठाकर देख नहीं पाते। उनकी बाणों की मार से भयभीत हुए शत्रुओं को कहीं भी चैन नहीं मिलता।‘ भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से ये बातें सुनकर अर्जुन ने भीमसेन के दुष्कर पराक्रम पर दृष्टिपात किया। फिर अपने बचे_खुचे शत्रुओं को तीखे बाणों से मारना आरम्भ किया। संशप्तक योद्धा बड़े बलवान थे तो भी वे अर्जुन की मार से युद्ध में नहीं ठहर सके। भयभीत होकर सब दिशाओं में भाग गये।

Saturday, 29 January 2022

अश्वत्थामा की प्रतिज्ञा, धृष्टद्युम्न और कर्ण का युद्ध, अश्वत्थामा के द्वारा धृष्टद्युम्न की और अर्जुन के द्वारा अश्वत्थामा की पराजय

संजय कहते हैं_महाराज ! तदनन्तर, दुर्योधन ने कर्ण के पास जाकर कहा_’राधानन्दन ! यह युद्ध खुला हुआ स्वर्ग का दरवाजा है, जो हमें स्वत: प्राप्त हो गया है। सौभाग्यशाली क्षत्रियों को ही ऐसा युद्ध मिला करता है। यदि तुमलोगों ने युद्ध में पाण्डवों को मारा तो धन_ धान्य से सम्पन्न पृथ्वी प्राप्त करोगे और यदि शत्रुओं के साथ से तुम्ही मारे गये तो वीर पुरुषों के प्राप्त होने योग्य _पुण्य_लोक पाओगे। दुर्योधन की बात सुनकर श्रेष्ठ क्षत्रियों ने हर्ष_ध्वनि की। फिर सब ओर बाजे बजने लगे। उस समय अश्वत्थामा ने वहां पहुंचकर आपके योद्धाओं को हर्षित करते हुए कहा_’आप सब लोगों ने तो देखा ही था मेरे पिता अस्त्र डालकर योग में स्थित हो गये थे, तो भी उन्हें धृष्टद्युम्न ने मारा। इसके कारण तो मुझे अमर्ष है ही, मित्र दुर्योधन का हित भी करना है। 
इसलिये क्षत्रियों ! मैं आपके समक्ष यह प्रतिज्ञा करता हूं धृष्टद्युम्न को मारे बिना अपना कवच नहीं उतारूंगा। यदि मेरी प्रतिज्ञा झूठी हो तो मुझे स्वर्ग न मिले। लड़ाई में अर्जुन या भीमसेन जो भी मेरा सामना करने आयेंगे, उन सबको कुचल डालूंगा_इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।अश्वत्थामा के ऐसा कहने पर कौरवों की सेना ने एक साथ होकर पाण्डवों पर धावा किया। साथ ही पाण्डवों का भी उसपर आक्रमण हुआ। दोनों दलों में घोर संग्राम होने लगा। मनुष्यों का भीषण संहार मचा; प्रलयकाल का दृश्य उपस्थित हो गया। उस समय पाण्डवों के पक्ष में युधिष्ठिर की और हमारे दल में कर्ण की प्रधानता थी। खूब जोर से मार_काट हुई। खून की धारा बह चली। संशप्तकों में अब थोड़े ही बच गये थे। इसलिये धृष्टद्युम्न तथा पाण्डव महारथियों ने सब राजाओं को साथ लेकर कर्ण पर ही धावा किया। किंतु कर्ण ने अकेले ही उन सबका बढ़ाव रोक दिया।
धृष्टद्युम्न ने कर्ण को एक बाण मारकर कहा_’अरे ! खड़ा रह, खड़ा रह, कहां भागा जाता है ?’ यह सुनकर कर्ण क्रोध में भर गया और धृष्टद्युम्न का धनुष काटकर उसने उसको नौ बाण मारे। धृष्टद्युम्न का कवच कट गया। इसके बाद उसने भी दूसरा धनुष लिया और कर्ण को सत्तर बाणों से घायल किया। अब तो कर्ण को बड़ा कोप हुआ, उसने धृष्टद्युम्न पर मृत्युदंड के समान भयंकर बाण का प्रहार किया। उस बाण को धृष्टद्युम्न की ओर आते देख सात्यकि ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए उसके साथ टुकड़े कर डाले। यह देख कर्ण ने बाणों की वर्षा करके सात्यकि को चारों ओर से घेर लिया और सात नाराचों से उसे बींध डाला। सात्यकि ने भी कर्ण का यही हाल किया। फिर उन दोनों में विचित्र प्रकार से घोर युद्ध हुआ, जिससे देखने और सुनने से भी भय होता था। इसी बीच में धृष्टद्युम्न पर अश्वत्थामा ने चढ़ाई की। उसने आते ही क्रोध में भरकर कहा_’ओ ब्रह्महत्यारे ! आज मैं तुझे मौत के मुंह में भेज दूंगा। अगर अर्जुन ने तेरी रक्षा नहीं की, यदि तू लड़ाई में डटा रहा गया और सामना छोड़कर भागा नहीं, तो आज तुझे तेरे पाप का। दण्ड अवश्य मिलेगा, तू कुशल से नहीं रह सकेगा ? उसके ऐसा कहने पर धृष्टद्युम्न बोला_’ तेरी बात का उत्तर मेरी यह तलवार ही देगी, जो तेरे पिता को संग्राम में मुंहतोड़ जवाब दे चुकी है।‘ यों कहकर सेनापति धृष्टद्युम्न ने अमर्ष में भरकर अश्वत्थामा को एक तीखे बाण से बींध डाला। इससे अश्वत्थामा को बड़ा क्रोध हुआ। उसने इतने बाणों की वर्षा की जिससे धृष्टद्युम्न के चारों ओर की दिशाएं ढ़क गयीं। इसी प्रकार धृष्टद्युम्न ने भी कर्ण के देखते_देखते द्रोणकुमार को अपने हाथों से आच्छादित कर दिया  उसका धनुष भी काट डाला। अश्वत्थामा ने वह धनुष फेंक दिया और दूसरा धनुष_बाण हाथ में लेकर उससे धृष्टद्युम्न के शक्ति, गदा, ध्वजा, घोड़े, सारथि तथा रथ को पलक मारते_मारते नष्ट कर दिया। तब धृष्टद्युम्न ने ढ़ाल और तलवार हाथ में ली, किन्तु महारथी अश्वत्थामा ने बल्लों से मारकर उनके भी टुकड़े_टुकड़े कर डाले। साथ ही उसने अनेक बाणों से धृष्टद्युम्न को बहुत घायल कर दिया। यह सब करने पर भी जब वह धृष्टद्युम्न का नाश न कर सका तो धनुष फेंककर धृष्टद्युम्न को पकड़ने के लिये दौड़ा। इसी बीच में श्रीकृष्ण की दृष्टि उधर गयी। उन्होंने अर्जुन से कहा_’पार्थ ! वह देखो, अश्वत्थामा धृष्टद्युम्न को मारने के लिये बड़ा भारी उद्योग कर रहा है। इसमें संदेह नहीं कि वह अश्वत्थामा का ग्रास बना ही चाहता है, इसलिये तुम इसे शीघ्र छुड़ाओ।,' ऐसा कहकर महाप्रतापी भगवान् श्रीकृष्ण ने, जहां अश्वत्थामा था उधर ही अपने घोड़े बढ़ाये। श्रीकृष्ण और अर्जुन को आते देख उसने धृष्टद्युम्न को मारने का विशेष उद्योग किया। अर्जुन ने जब देखा कि अश्वत्थामा द्रुपदकुमार को घसीट रहा है, तो उसके ऊपर बहुत से बाण मारे। गाण्डीव से छूटे हुए वे बाण, जैसे सांप अपनी बांबी में घुसते हैं, उसी प्रकार अश्वत्थामा के शरीर में धंस गये। उनसे पीड़ित होकर द्रोणपुत्र ने धृष्टद्युम्न  को तो छोड़ दिया और अपने रथ में बैठकर धनुष हाथ में ले अर्जुन को बींधना आरंभ कर दिया। इतने में सहदेव धृष्टद्युम्न को अपने रथ पर बिठाकर वहां से अन्यत्र हटा दिया। अर्जुन ने भी द्रोणकुमार को बाणों से बींधना आरंभ किया। इससे अश्वत्थामा का क्रोध बहुत बढ़ गया। उसने अर्जुन की भुजाओं तथा छाती में भी बाण मारे। तब अर्जुन ने अश्वत्थामा के ऊपर द्वितीय कालदण्ड के समान एक नाराच चलाया। वह उसके कंधे पर लगा। लगते ही अश्वत्थामा विह्वल होकर रथ की बैठक में बैठ गया। उस समय उसे बड़ी वेदना हुई। उसकी यह अवस्था देख सारथि बड़ी फुर्ती के साथ उसे रणांगण से बाहर ले गया। महाराज ! इस प्रकार धृष्टद्युम्न को संकट से मुक्त और अश्वत्थामा को पीड़ित देख पांचाल वीरों ने बड़े जोर से गर्जना की। हजारों दिव्य बाजे बज उठे। सबलोग सिंहनाद करने लगे। तदनन्तर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से बोले_’अब संशप्तकों की ओर चलिये, उनका संहार करना इस समय मेरे लिये प्रधान काम है।‘ उनकी बात सुनकर भगवान् हवा से बातें करनेवाले अपने रथ के द्वारा संशप्तकों की ओर चल दिये।

Wednesday, 12 January 2022

अर्जुन द्वारा संशप्तकों का संहार तथा अश्वत्थामा की पराजय

संजय कहते हैं_एक ओर तो यह भयंकर संग्राम चल रहा था और दूसरी ओर अर्जुन संशप्तक सेना का विनाश कर रहे थे। शत्रुओं को जीतकर भगवान् श्रीकृष्ण से कहा_’जनार्दन ! ये संशप्तक तो अब युद्ध में मेरे बाणों की चोट न सह सकने के कारण झुंड_के_झुंड भागे जा रहे हैं। दूसरी ओर सृंजयों की बहुत बड़ी सेना भी विदीर्ण हो रही है। उधर कर्ण बड़े आराम से राजाओं की सेना में विचर रहा है, देखिये न, उसकी पताका दिखाई देती है। आप तो जानते ही हैं, कर्ण कितना पराक्रमी और बलवान है। दूसरे कोई महारथी उसे युद्ध में नहीं जीत सकते। यह हमारी सेना को खदेड़ रहा है, इसलिये अब उधर ही चलिये। यहां की लड़ाई बन्द करके महारथी कर्ण के पास चलना चाहिते। मेरी तो यही राय है, आगे आपकी जैसी इच्छा।‘ यह सुनकर भगवान् हंसते हुए बोले_’पाण्डुनन्दन ! अब तुम शीघ्र ही कौरवों का नाश करो’ ऐसा कहकर गोविन्द ने घोड़ों को हांक दिया। वे हंस के समान सफेद रंगवाले घोड़े श्रीकृष्ण और अर्जुन को लिए हुए आपकी विशाल सेना में घुस गये। उनके पहुंचते ही आपकी सेना चारों ओर भागने लगी। अर्जुन को अपनी सेना के भीतर विचरते देख दुर्योधन ने संशप्तकों को पुनः उनसे लड़ने की आज्ञा दी। संशप्तक योद्धा एक हजार रथ, तीन सौ हाथी, चौदह हजार घोड़े तथा दो लाख पैदल सेना लेकर अर्जुन पर आ चढ़े। वे अपनी बाणवर्षा से अर्जुन को आच्छादित करते हुए उन्हें घेरकर खड़े हो गये। अब अर्जुन ने पाश हाथ में लिये यमराज की भांति अपना भयंकर रूप प्रकट किया। वे संशप्तकों का संहार करने लगे। उस समय उनकी झांकी देखने ही योग्य थी। उन्होंने बिजली के समान चमकीले बाणों से वहां के समूचे आकाश को ढ़क दिया, तनिक भी खाली नहीं रखा। उनके धनुष की प्रत्यंचा की आवाज सुनकर ऐसा जान पड़ता मानो पृथ्वी, आकाश, दिशाएं, समुद्र तथा पर्वत_ये सब_के_सब फटे जा रहे हैं। थोड़ी ही देर में अर्जुन ने दस हजार योद्धाओं का सफाया कर डाला। फिर वे बड़ी फुर्ती के साथ उन आततायी शत्रुओं के हथियारसहित हाथ, भुजाएं, जंघा और मस्तक काटने लगे। इस प्रकार अर्जुन संशप्तकों की चतुरंगिणी सेना का नाश कर ही रहे थे कि सुदक्षिण का छोटा भाई वहां पहुंचकर उनके ऊपर बाणों की बौछार करने लगा। उस समय अर्जुन ने दो अर्धचंद्राकार बाणों से उसकी परिचय के समान मोटी भुजाएं काट डालीं तथा क्षुर से मारकर उसके पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मस्तक को भी धर से अलग कर दिया। वह लोहूलुहान होकर जमीन पर गिर गया। उसके गिरते ही बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ गया। लड़नेवाले योद्धाओं की नाना प्रकार से दुर्दशा होने लगी। अर्जुन ने एक_एक बाण से काम्बोजों, यवनों तथा शकों के घोड़ों का संहार करने लगा, वे कम्बोज आदि स्वयं भी खून से लथपथ हो गये। उनके रुधिर से सारी रणभूमि लाल हो गयी।
रथी, सारथि, घुड़सवार, हाथीसवार और महावत सब मारे गये। इस प्रकार वहां भयानक नरसंहार हुआ। तदनन्तर, अश्वत्थामा अर्जुन का सामना करने के लिये चढ़ आया। उस समय वह क्रोध में भरे हुए काल के समान जान पड़ता था। रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण पर दृष्टि पड़ते ही उसने भयंकर अस्त्र-शस्त्र की वृष्टि आरंभ कर दी। अश्वत्थामा के छोड़े हुए बाण चारों ओर से आकर श्रीकृष्ण और अर्जुन पर पड़ने लगे। वे दोनों रथ पर बैठे_ही_बैठे ढ़क गये। प्रतापी अश्वत्थामा ने उन दोनों को निश्चेष्ट कर दिया,  उनसे कुछ भी करते नहीं बनता था। उनकी यह अवस्था देख समस्त चराचर जगत् में हाहाकार मच गया। संग्राम में श्रीकृष्ण और अर्जुन को आच्छादित करते समय अश्वत्थामा ने जो पराक्रम दिखाया, वैसा इसके पहले मैंने कभी नहीं देखा था। उस समय द्रोणपुत्र की ओर देखकर अर्जुन को बड़ा भारी मोह_सा हो गया। उन्हें यह विश्वास_सा होने लगा कि अश्वत्थामा ने मेरा पराक्रम हर लिया है।
यह देख श्रीकृष्ण ने प्रेममिश्रित क्रोध के साथ कहा_’पार्थ ! तुम्हारे विषय में आज मैं बड़ी अद्भुत बात देख रहा हूं। आज द्रोणकुमार तुमसे बहुत बढ़_चढ़कर पराक्रम दिखा रहा है। अब तुममें पहले जैसी वीरता है या नहीं ? तुम्हारी दोनों भुजाओं में बल का अभाव तो नहीं हो गया है ? हाथ में गाण्डीव है न ? यह सब इसलिये पूछता हूं कि आज द्रोणकुमार तुमसे बढ़ता दिखाती देता है। ‘मेरे गुरु का पुत्र है' यह सोचकर उसकी उपेक्षा न करो। यह उपेक्षा करने का समय नहीं है।‘
श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर अर्जुन ने चौदह भल्ल हाथ में लिये और उनसे अश्वत्थामा के धनुष, ध्वजा, छत्र, पताका, रथ, शक्ति और गदा को नष्ट कर डाला। फिर ‘वत्सदन्त’ नामक बाणों से उसके गले की हंसली में इतने जोर से प्रहार किया कि उसे मूर्छा आ गयी। वह ध्वजा का डंडा थामकर बैठ गया। उसे बेहोश देखकर सारथि अर्जुन से उसकी रक्षा करने के लिये रणभूमि से बाहर हटा लें गया। इस प्रकार अर्जुन ने संशप्तकों का, भीम ने कौरव_योद्धाओं का तथा कर्ण ने पांचालों का एक ही क्षण में विनाश कर डाला। बड़े_बड़े वीरों का संहार करनेवाले उस भयंकर संग्राम में असंख्यों धड़ उठ_उठकर दौड़ रहे थे।

Wednesday, 29 December 2021

कृपाचार्य के द्वारा शिखण्डी की पराजय, सुकेतु का वध, धृष्टद्युम्न के द्वारा कृतवर्मा और दुर्योधन का परास्त होना तथा कर्ण द्वारा पांचाल आदि महारथियों का संहार

संजय कहते हैं_राजन् ! इस प्रकार कौरव_सेना को अर्जुन की मार से पीड़ित होती देख कृतवर्मा, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, उलूक, शकुनि, दुर्योधन तथा उसके भाइयों ने आकर बताया। उस समय कुछ देर तक वहां घोर संग्राम हुआ, कृपाचार्य ने बाणों की इतनी बौछार की कि टिड्डियों के समान उन बाणों से सृंजयों की सारी सेना आच्छादित हो गयी। यह देख शिखण्डी बड़े क्रोध में भरकर उनका सामना करने के लिये गया और उनके ऊपर चारों ओर  से बाणवर्षा करने लगा। किन्तु कृपाचार्य अस्त्रविद्या के महान् पण्डित थे। उन्होंने शिखण्डी की वाणवर्षा शान्त करके उसे दस बाणों से बिंध डाला। फिर तीखे बाणों के प्रहार से उसके सारथि और घोड़ों को भी यमलोक पठा दिया। तब शिखण्डी सहसा उस रथ से कूद पड़ा और हाथों में ढ़ाल_तलवार लेकर कृपाचार्य पर झपटा। उसे अपने ऊपर आक्रमण करते देख कृपाचार्य ने अनेकों बाण मारकर ढ़क दिया। शिखण्डी ने भी बारंबार तलवार घुमाकर कृपाचार्य के बाणों को काट डाला।
तब कृपाचार्य ने अपने बाणों से शीघ्रतापूर्वक शिखण्डी की ढाल काट दी। अब वह सिर्फ तलवार लेकर ही उनकी ओर दौड़ा। कृपाचार्य अपने बाणों से उसे बार_बार पीड़ा देने लगे। उसकी यह अवस्था देखकर चित्रकेतु_नन्दन सुकेतु तुरंत वहां आ पहुंचा और बाबा कृपाचार्य पर बाणों की झड़ी लगाने लगा। शिखण्डी ने देखा कि ब्राह्मण_देवता अब सुकेतु के साथ उलझे हुए हैं, तो वह मौका पाकर तुरंत भाग निकला। तदनन्तर सुकेतु ने कृपाचार्य को पहले नौ बाणों से बींधकर फिर तिहत्तर तीरों से घायल किया। इसके बाद उनके बाणसहित धनुष को काटकर सारथि के मर्मस्थानों में भी घाव किया।
यह देख कृपाचार्य ने तीस बाणों से सुकेतु के संपूर्ण मर्मस्थानों में चोट पहुंचायी। इससे सुकेतु का सारा शरीर कांप उठा, वह बहुत व्याकुल हो गया। उसी अवस्था में कृपाचार्य ने एक क्षुरप्र मारकर उसके मस्तक को काट गिराया। सुकेतु के मारे जाने पर उसके अग्रगामी सैनिक भयभीत हो सब दिशाओं में भाग गये। दूसरी ओर धृष्टद्युम्न और कृतवर्मा लड़ रहे थे। धृष्टद्युम्न ने क्रोध में भरकर कृतवर्मा की छाती में नौ बाण मारे तथा उसके ऊपर सायकों की भयंकर बौछार की।
कृतवर्मा ने भी हजारों बाण मारकर उस शस्त्र वर्षा को शान्त कर दिया, यह देख धृष्टद्युम्न ने कृतवर्मा के निकट पहुंच कर उसे आगे बढ़ने से रोक दिया और तुरंत ही उसके सारथि को भी तीखे भाले से मारकर यमलोक का अतिथि बनाया।इस प्रकार महाबली धृष्टद्युम्न ने अपने बलवान शत्रु को जीतकर साधकों की वर्षा से कौरव_सेना का बढ़ाव रोक दिया। तब आपके सैनिक सिंहनाद करके धृष्टद्युम्न पर टूट पड़े, फिर घमासान युद्ध होने लगा। उस दिन अर्जुन संशप्तकों में, भीमसेन कौरवों में और कर्ण पांचालों में घुसकर क्षत्रियों का संहार कर रहे थे। एक ओर दुर्योधन नकुल_सहदेव से भिड़ा हुआ था। उसने क्रोध में भरकर नौ बाणों से नकुल को और चार सायकों से उसके घोड़ों को बींध डाला।
फिर एक क्षुराकार बाण से उसने सहदेव की सुवर्ण भरी ध्वजा काट दी। नकुल ने भी कुपित होकर आपके पुत्र को इक्कीस बाण मारे तथा सहदेव ने पांच बाणों से उसे घायल किया। अब तो आपका पुत्र क्रोध से आग-बबूला हो गया, उसने उन दोनों भाइयों की छाती में पांच_पांच बाण मारे। फिर दो भल्लों से उन दोनों के धनुष काट डाले। इसके बाद उन्हें इक्कीस बाणों से घायल किया। धनुष काट जाने पर उन दोनों भाइयों ने पुनः दूसरे धनुष लेकर दुर्योधन पर बड़ी भारी बाणवर्षा आरंभ कर दी। दुर्योधन भी बाणों की झड़ी लगाकर उन दोनों को रोकने लगा। उस समय उसके धनुष से निकलते हुऐ बात संपूर्ण दिशा को ढ़कयते दिखाती दे रहे थे। आकाश आच्छान्न होकर बाणमय हो रहा था।नकुल_सहदेव को उसका रूप प्रलयशीघ्रतालीन बादल के समान दिखायी देता था। ठीक उसी समय पाण्डव_सेनापति धृष्टद्युम्न वहां आ पहुंचा और नकुल_सहदेव को पीछे करके ही अपने बाणों से दुर्योधन की प्रगति रोकने लगा।
आपके पुत्र ने हंसकर धृष्टद्युम्न को पहले पच्चीस बाण मारे, फिर पैंसठ बाण मारकर सिंहनाद किया। तत्पश्चात् उसने एक तीखे क्षुरप्र से धृष्टद्युम्न के बाणसहित धनुष और दास्ताने काट दिये। तब आपके पुत्र ने धृष्टद्युम्न पर पंद्रह बाण छोड़े। वे बाण उसके कवच को छेदते हुए पृथ्वी में समा गये। इससे दुर्योधन को बहुत क्रोध हुआ।
उसने एक भल्ल मारकर धृष्टद्युम्न का धनुष काट डाला। फिर बड़ी शीघ्रता के साथ उसकी भृगुटियों में दस बाण मारे। धृष्टद्युम्न को भी अपना कटा हुआ धनुष और सोलह भल्ल अपने हाथ में लिये।
उसमें से पांच भल्लों के द्वारा उसने दुर्योधन के घोड़ों और सारथि को मार डाला, एक से उसका धनुष काट दिया और सामग्रियों सहित रथ, क्षत्र, ध्वजा, शक्ति, गदा और खड्ग आदि को नष्ट कर डाला। राजा दुर्योधन रथहीन हो गया, उसके कवच और आयुध आदि नष्ट हो गये।
यह देख उसके भाई उसकी रक्षा में आ पहुंचे। दण्डधारी नाम का राजा उसे अपने रथ में बिठाकर उसे रणभूमि से बाहर ले गया।
 तदनन्तर कर्ण ने धृष्टद्युम्न पर धावा कर दिया। उन दोनों में महान् युद्ध छिड़ गया। उस समय पाण्डवों का या हमारे पक्ष का कोई भी योद्धा पीछे पैर नहीं हटाया था। पांचाल देश के लड़ाकू वीर विजय की अभिलाषा से बड़ी फुर्ती के साथ कर्ण पर टूट पड़े। उन्हें इस प्रकार विजय के लिये प्रयत्न करते देख कर्ण उनके अग्रगामी वीरों को बाणों से मारने लगा। उसने व्याघ्रकेतु, सुशर्मा, चित्र, उग्रायुध, जय तथा सिंहसेन को अपने बाणों का निशाना बनाया। उपर्युक्त वीरों ने भी रथों से कर्ण को घेर लिया। कर्ण बड़ा प्रतापी था, उसने अपने साथ युद्ध करते हुए इन आठों वीरों को आठ तीखे बाणों से मारकर खूब घायल कर दिया। फिर की हजार योद्धाओं का सफाया कर डाला। तत्पश्चात् जिष्णु, देवापि, भद्र, दण्ड, चित्र, चित्रायुध, हरि, सिंहकेतू, रोचमान्, शलभ को तथा चेदिदेशीय महारथियों को मौत के घाट उतारा। इस युद्ध में कर्ण ने जैसा पराक्रम किया, वैसा न तो भीष्म ने, न द्रोण ने और न दूसरे योद्धाओं ने ही कभी किया था। उसने हाथी, घोड़े, रथ और पैदल_ इन सबका महान् संहार किया। कर्ण का वह पराक्रम देख मेरे मन में ऐसा विश्वास होने लगा कि अब एक भी पांचाल योद्धा जीवित नहीं बचेगा। उस महासंग्राम में कर्ण को पांचाल सेना का संहार करते देख राजा युधिष्ठिर बड़े क्रोध में भरकर उसकी ओर दौड़े। साथ ही द्रौपदी के पुत्र, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सैकड़ों वीरों ने पहुंचकर कर्ण को चारों ओर से घेर लिया। शिखण्डी, सहदेव, नकुल, जनमेजय, सात्यकि तथा बहुत से प्रभद्रक योद्धा धृष्टद्युम्न के आगे होकर कर्ण पर अस्त्र-शस्त्रों की वृष्टि करने लगे। जैसे गरुड़ अकेला होकर भी बहुत_से सर्पों को दबोच लेता है, उसी प्रकार कर्ण अकेला ही चेदि, पांचाल और पाण्डववीरों पर प्रहार कर रहा था। जब कर्ण पाण्डवों से उलझा हुआ था उसी समय भीमसेन रण में सब ओर विचार अपने यमदण्ड के समान वाणों से वाहीक, वसातीय, मद्र तथा सिंधुदेशीय योद्धाओं का संहार कर रहे थे । भीम के बाणों से मारे गये रथियों, घुड़सवारों, सारथियों, पैदल योद्धाओं तथा हाथी_घोड़ों की लाशों से जमीन पट गयी थी। सारी सेना भीमसेन  के भय से उत्साह खो बैठी थी। किसी से कुछ करते नहीं बनता था। सब पर दैत्य जा रहा था।
कर्ण पाण्डव सेना को भगा रहा था और भीम कौरव वाहिनी को खदेड़ रहे थे_ इस प्रकार रणभूमि में विचरते हुए उन दोनों वीरों की अद्भुत शोभा हो रही थी।

Monday, 22 November 2021

अर्जुन द्वारा संशप्तकों का संहार

संजय कहते हैं_महाराज ! जिस समय क्षत्रियों का संहार करनेवाला वह भयानक युद्ध चल रहा था, उसी समय दूसरी ओर बड़े जोर_जोर से गाण्डीव धनुष की टंकार सुनाई देती थी। वहां अर्जुन संशप्तकों का तथा नारायणी सेना का संहार कर रहे थे। महारथी सुशर्मा ने अर्जुन पर बाणों की बौछार की तथा संशप्तकों ने भी उन्हें अपने तीरों का निशाना बनाया। तत्पश्चात् सुशर्मा ने अर्जुन को दस बाणों से बींधकर श्रीकृष्ण की दाहिनी भुजा में भी तीन बाण मारे। फिर एक भल्ल मारकर उसने अर्जुन की ध्वजा छेद डाली। ध्वजा पर आघात लगते ही उसके ऊपर बैठे विशाल वानर ने बड़े जोर से गर्जना करके सबको भयभीत कर दिया। उसका भयंकर नाद सुनकर आपकी सेना थर्रा उठी। डर के मारे कोई हिल_डुल तक न सका। थोड़ी देर में जब उसे होश आया तो सब_के_सब अर्जुन पर बाणों की बौछार करने लगे। फिर सबने मिलकर अर्जुन के विशाल रथ को घेर लिया। यद्यपि उनपर तीखे बाणों की मार पड़ रही थी, तो भी वे रथ पकड़कर जोर_जोर से चिल्लाने लगे। किन्हीं ने घोड़ों को पकड़ा, किन्हीं ने पहियों को। कुछ लोगों ने रथ की ईषा पकड़ने का उद्योग किया। इस प्रकार हजारों योद्धा रथ को जबरदस्ती पकड़कर सिंहनाद करने लगे। कुछ लोगों ने भगवान् श्रीकृष्ण की दोनों बाहें पकड़ लीं; कई योद्धाओं ने रथ पर चढ़कर अर्जुन को भी पकड़ लिया। श्रीकृष्ण ने अपनी बांहे झटककर उन लोगों को जमीन पर गिरा दिया तथा अर्जुन ने भी अपने अपने रथ पर चढ़े हुए कितने ही पैदलों को धक्के देकर नीचे गिराया। फिर आसपास खड़े हुए संशप्तक योद्धाओं को निकट से युद्ध करने में उपयोगी बाण मारकर ढ़क दिया। तदनन्तर अर्जुन ने देवदत्त तथा श्रीकृष्ण ने पांचजन्य नामक शंख बजाया। शंखों की आवाज सुनकर संशप्तकों की सेना भय से सिहर उठी। फिर अर्जुन ने नागास्त्र का प्रयोग करके उन सबके पैर बांध दिये। पैर बांध जाने से निश्चेष्ट होकर वे पत्थर के पुतले जैसे दिखायी देने लगे। उसी अवस्था में अर्जुन ने उनका संहार आरंभ किया। जब मार पड़ने लगी तो उन्होंने रथ छोड़ दिया और अपने समस्त अस्त्र-शस्त्रों को अर्जुन पर छोड़ने का प्रयास किया; परंतु पैर बंधे होने के कारण वे हिल भी न सके। अर्जुन उनका वध करने लगे। इसी समय सुशर्मा गारुड़ास्त्र का प्रयोग किया। उससे बहुत से गरुड़ प्रकट हो_होकर सर्पों को खाने लगे। उन गरुड़ों को देख सर्पगण लापता हो गये। इस प्रकार नागपाश से छुटकारा पाने हुए योद्धा अर्जुन के रथ पर सायकों तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगे। तब बाणों की बौछार से उनकी अस्त्र वर्षा का निवारण करके योद्धाओं का संहार आरंभ किया। इतने में सुवर्णा ने अर्जुन की छाती में तीन बाण मारे। इससे अर्जुन को गहरी चोट लगी और वे व्यथित होकर रथ के पिछले भाग में बैठ गये। थोड़ी ही देर में जब उन्हें चेत हुआ, फिर तो उन्होंने तुरंत ही ऐन्द्रेयास्त्र को प्रकट किया। उससे हजारों बाण निकल_निकलकर चारों दिशाओं में छा गये और आपकी सेना तथा घोड़े_हाथियों का विनाश करने लगे। इस प्रकार सेना का संहार होता देख संशप्तकों तथा नारायणी सेना के ग्वालों को बड़ा भय हुआ।
उस समय वहां एक भी पुरुष ऐसा नहीं था, जो अर्जुन का सामना कर सके। सब वीरों के देखते_देखते आपकी सेना कट रही थी। वह स्वयं निश्चेष्ट हो गयी थी, उससे पराक्रम करते नहीं बनता था। यह सब मेरी आंखों देखी घटना है। अर्जुन ने वहां दस हजार योद्धाओं को मार डाला था। संशप्तकों में से जो शेष बच गये थे उन्होंने मर जाने या विजय पाने का निश्चय करके फिर से अर्जुन को घेर लिया। फिर तो वहां अर्जुन के साथ आपके सैनिकों का बड़ा भारी संग्राम हुआ।