Tuesday, 24 May 2022

अर्जुन की बात से कर्ण के जीवित रहने का पता पाकर युधिष्ठिर का उन्हें

अर्जुन की बात से कर्ण के जीवित रहने का पता पाकर युधिष्ठिर का उन्हें धिक्कारना तथा युधिष्ठिर का वध करने के लिये उद्यत हुए अर्जुन को भगवान द्वारा धर्म का तत्व समझाया जाना

संजय कहते हैं_महाराज ! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर की यह बात सुनकर अतिरथी वीर अर्जुन इस प्रकार बोले_’राजन् ! आज जब मैं संशप्तकों के साथ युद्ध कर रहा था, उस समय अश्वत्थामा बाणों की वर्षा करता हुआ सहसा मेरे सामने आ धमका। मेरा रथ देखते ही उसकी सारी सेना मेरे साथ युद्ध करने के लिये खड़ी हो गयी। तब मैं उस सेना के पांच सौ वीरों को मारकर अश्वत्थामा पर जा चढ़ा। अश्वत्थामा अपने तीखे बाणों से मुझे और भगवान् कृष्ण को पीड़ा देने लगा।
मेरे साथ लड़ते समय उसके पीछे आठ सौ आठ बैल बाणों का बोझा ढो रहे थे, उसने वे सभी बाण मुझपर चलाये; किन्तु मैंने अपने हाथों से उन सबको नष्ट कर डाला। तत्पश्चात् उसके ऊपर मैंने वज्र के समान तीस बाण मारे। उनसे जीत जाने के कारण उसका रूप शिकारी जानवर के तरह दिखाई देने लगा। फिर तो अपने समस्त शरीर से खून की धारा बहाता हुआ वह सूतपुत्र के रथियों के दल में घुस गया। उस समय उसको दूसरे प्रधान_प्रधान योद्धा भी खून से लथपथ ही दिखाई पड़े। तदनन्तर कौरव_सेना को पराजित तथा सैनिकों को भयभीत देख कर्ण पचास  प्रधान प्रधान रथियों को साथ लेकर बड़ी तेजी के साथ मेरी ओर चला। मैंने उसके सैनिकों का संहार तो कर डाला; मगर कर्ण को वहां ही छोड़कर आपके दर्शन करने के लिये जल्दी यहां चला आया। मैंने सुना कि कर्ण ने युद्ध में आपको बहुत घायल कर दिया है। कर्ण बड़ा क्रूर है, उसके सामने से आपका यहां चला आना अनुचित नहीं है। मैं समझता हूं, वह समय युद्ध से हट आने का ही था। युद्ध में अपने सामने ही मैंने कर्ण के अद्भुत अस्त्र को देखा है। पांचालों में कोई भी ऐसा वीर नहीं है, जो आज कर्ण का वेग सह सके। महाराज ! सात्यकि और धृष्टद्युम्न मेरे पहियों की रक्षा करें। राजकुमार युधामन्यु तथा उत्तमौजा_ये मेरे पृष्ठभाग की रक्षा में रहें। फिर मैं इस संग्राम में महारथी कर्ण के साथ युद्ध करूंगा। आपकी भी इच्छा हो तो देखिये, हम दोनों किस प्रकार एक_दूसरे को जीतने का प्रयास करते हैं ।
  मैं आज बलपूर्वक कर्ण को बन्धु_बान्धवों सहित न मार डालूं तो प्रतिज्ञा करके उसका पालन न करने वालों को जो कष्टप्रद गति मिलती है,  वहीं मुझे भी मिले। अब मैं आपसे युद्ध में जाने की आज्ञा चाहता हूं। आशीर्वाद दीजिये, जिससे रण में मेरी विजय हो। राजन् ! मैं सूतपुत्र कर्ण, उसकी सेना तथा संपूर्ण शत्रुओं का संहार करूंगा।‘ युधिष्ठिर कर्ण के बाणों की चोट से बहुत कष्ट पा रहे थे, अर्जुन के मुख से जब उन्होंने कर्ण के जीवित रहने का समाचार सुना तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। वे धनंजय से इस प्रकार बोले_’तात ! तुम्हारी सेना शत्रुओं से तिरस्कृत होकर रण से भाग गयी है और तुम जब कर्ण को नहीं मार सके तो भयभीत होकर भीम को अकेले ही छोड़कर यहां भाग आते, यह तुमने खूब स्नेह निभाया !
वीरमाता कुन्ती के गर्भ से जन्म लेकर यह अच्छा काम नहीं किया। द्वैतवन में तुमने यह सच्ची प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं अकेले ही कर्ण को मार डालूंगा', फिर उसे जीते_जी ही छोड़कर तुम यहां कैसे चले आये ? अर्जुन ! जब तुम जन्म लेकर सात दिन के ही हुए थे, उस समय आकाशवाणी ने कुन्ती से कहा था _’यह बालक इन्द्र के समान पराक्रमी होगा। समस्त शत्रुओं पर विजय पायेगा। यह खाण्डववन में संपूर्ण देवताओं तथा सब प्राणियों को जीत लेगा। राजाओं के बीच यह मद्र, कलिंग, केकय तथा कौरव_वीरों का संहार करेगा। संसार में इससे बढ़कर कोई धनुर्धर नहीं होगा। कोई भी प्राणी कभी युद्ध में इसे परास्त नहीं कर सकेगा। यह संपूर्ण विद्याओं का ज्ञाता तथा जितेन्द्रिय होगा। इच्छा करते ही यह समस्त प्राणियों को अपने अधीन कर लेगा। चन्द्रमा के समान इसकी कान्ति होगी और वायु के समान वेग। यह स्थिरता में मेरू और क्षमा में पृथ्वी के समान होगा। सूर्य के समान तेजस्वी, कुबेर के समान धनी, इन्द्र के समान पराक्रमी और भगवान् विष्णु के समान बलवान होगा। कुन्ती ! जैसे अदिति के गर्भ से शत्रुहन्ता विष्णु ने जन्म लिया था, उसी प्रकार तुम्हारा यह महात्मा पुत्र भी तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न हुआ है। अपने पक्ष की विजय तथा शत्रु पक्ष का संहार करने में इसकी ख्याति होगी। इससे ही वंशपरंपरा का विस्तार होगा।‘ इस प्रकार शतश्रृंगपर्वत के ऊपर यह आकाशवाणी हुई, जिसे अनेकों तपस्वियों ने सुना। किन्तु यह सत्य नहीं हुई। निश्चय ही अब देवता भी झूठ बोलने लगे हैं। सदा ही तुम्हारी प्रशंसा करनेवाले बड़े_बड़े ऋषियों के मुख से भी मैंने ऐसी बातें सुनी है, इसीलिये मुझे दुर्योधन की उन्नति के विषय में कभी भी विश्वास नहीं हुआ तथा आजतक मुझे इस बात का भी पता नहीं था कि तुम कर्ण के भय से डरते हो। ऐसी परिस्थिति में अब मैं क्या कर सकता हूं ? आज कौरवों, अपने मित्रों तथा अन्य संपूर्ण योद्धाओं के सामने मुझे सूतपुत्र के वश में होना पड़ा, इसलिये मेरे जीवन को धिक्कार है। पार्थ ! यदि तुम्हारा पुत्र महारथी अभिमन्यु आज जीवित होता तो वह शत्रु पक्ष के संपूर्ण महारथियों का नाश कर डालता। उसके रहते युद्ध से मुझे ऐसा अपमान कभी नहीं उठाना पड़ता। यदि घतोत्कच जीवित होता तो भी मुझे युद्ध से विमुख नहीं होना पड़ता।  किन्तु मैं अपने अभाग्य के लिये क्या कहूं, जान पड़ता है, मेरे पूर्वजन्म के पाप बड़े ही प्रबल हैं, तभी तो दुरात्मा कर्ण ने तुम्हें तिनके के समान भी न गिनकर मेरे साथ वह व्यवहार किया जो किसी बन्धुहीन एवं असमर्थ मनुष्य के साथ किया जाता है। जो पुरुष आपत्ति में पड़े हुए को उससे छुड़ाता है, वहीं सच्चा बन्धु एवं सुहृद है_ऐसा प्राचीन मुनियों का कथन है तथा सत्पुरुषों ने भी इस धर्म का सदा ही पालन किया है। परन्तु तुमने नहीं किया। तुम्हारे पास विश्वकर्मा का बनाया हुआ रथ है, जिसके धूरे से कभी आवाज नहीं होती तथा जिसकी ध्वजा पर वानर विराजमान है।
यही नहीं, तुम्हारे हाथ में गाण्डीव_जैसा धनुष तथा भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारा रथ हांकते हैं। इन सबके होते हुए भी तुम कर्ण से डरकर भाग कैसे आये ? यदि युद्ध में आज कर्ण का मुकाबला करने की शक्ति नहीं रखते तो जो राजा तुमसे अस्त्र_बल में बड़ा हो उसे अपना गाण्डीव धनुष दे दो। धिक्कार है तुम्हारे इस गाण्डीव को ! धिक्कार है तुम्हारी भुजाओं के पराक्रम को तथा धिक्कार है तुम्हारे इन असंख्य बाणों को !! अग्नि के दिये हुए इस रथ और ध्वजा को भी धिक्कार है!’
युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर अर्जुन को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने धर्मराज को मार डालने की इच्छा से हाथ में तलवार उठा ली। भगवान् श्रीकृष्ण तो सबके हृदय  की बात जानने वाले ही ठहरे, उन्होंने अर्जुन का क्रोध देखते ही उनकी चेष्टा ताड़ ली और कहा_’अर्जुन ! यह क्या ? तुमने तलवार क्यों उठायी ? यहां किसी से युद्ध करना हो_ऐसा तो नहीं दिखाई देता । मैं किसी ऐसे मनुष्य को यहां नहीं देखता, जो तुम्हारा बध्य हो। फिर प्रहार क्यों करना चाहते हो ? तुम पर सनक तो नहीं सवार हो गयी ? मैं पूछता हूं, बताओ, इस समय क्या करने का विचार है ?’ श्रीकृष्ण के पूछने पर क्रोध में भरे हुए अर्जुन ने युधिष्ठिर की ओर देखते हुए कहा_’गोविन्द ! मैंने गुप्त रूप से यह प्रतिज्ञा की है कि ' जो कोई मुझसे ऐसा कह देगा कि तुम अपना गाण्डीव दूसरे को दे डालो, उसका मैं सिर काट लूंगा।‘ राजा ने आपके सामने ही मुझसे ऐसी बात कही है, अत: मैं क्षमा नहीं कर सकता। आज इनका वध करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूंगा। इसलिए मैंने तलवार उठायी है। इस अवसर पर आप क्या करना उचित समझते हैं ? आप ही इस जगत् के भूत और भविष्य को जानते हैं; आप जैसी आज्ञा दें वैसा ही करूंगा। यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा_’धिक्कार है ! धिक्कार है ! !’ फिर वे अर्जुन से बोले _’पार्थ_आज मुझे मालूम हुआ कि तुमने कभी वृद्ध पुरुषों की सेवा नहीं की है, तभी तो तुम्हें बेमौके क्रोध आ गया। धनंजय ! जो धर्म के विभाग को जानता है, वह कभी ऐसा नहीं कर सकता।  इस समय यहां तुमने जैसा वर्ताव किया है, उससे तुम्हारी धर्मभीरुता तथा अज्ञानता का पता चलता है। जो नहीं करने योग्य काम करता है, वह मनुष्य अधम है। जो स्वयं धर्म का आचरण करके शिष्यों द्वारा उपासना किये जाने पर उन्हें धर्म का उपदेश देते हैं; धर्म के संक्षेप और विस्तार को जाननेवाले गुरुजनों का इस विषय में क्या निर्णय है ? इसे तुम नहीं जानते। उस निर्णय को नहीं जाननेवाला मनुष्य कर्तव्य और अकर्तव्य के निश्चय में तुम्हारी ही तरह असमर्थ एवं मोहित हो जाता है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं ? इसे जान लेना सहज नहीं है। इसका ज्ञान होता है शास्त्र से और शास्त्र तुम्हें पता ही नहीं है। अज्ञानवश अपने को धर्मवेत्ता मानकर जो तुम धर्म की रक्षा करने चले हो, उसमें जीवहिंसा का पाप है_ यह बात तुम्हारे जैसे धार्मिक की समझ में नहीं आती ? तात ! मेरे विचार से प्राणियों की हिंसा न करना ही सबसे बड़ा धर्म है। किसी की जान बचाने के लिये झूठ बोलना पड़े तो बोल दे, परंतु उसकी हिंसा न होने दे। भला, तुम्हारे जैसा श्रेष्ठ पुरुष अन्य साधारण मनुष्यों के समान अपने धर्मज्ञ भाई और चक्रवर्ती राजा को मारने के लिए कैसे तैयार होगा ? भारत ! जो युद्ध न करता हो, शत्रुता न रखता हो, रण से विमुख होकर भागा जा रहा हो, शरण में आता हो, हाथ जोड़कर पड़ा हो अथवा असावधान हो, ऐसे मनुष्य का वध करना श्रेष्ठ पुरुष अच्छा नहीं समझते ! तुम्हारे बड़े भाई में प्रायः उपर्युक्त सभी बातें हैं। तुमने नासमझ बालक की तरह पहले प्रतिज्ञा कर ली थी, इसलिये मूर्खतावश अधर्मयुक्त कार्य करने के लिये तैयार हो गये हो। पार्थ ! बताओ तो भला, धर्म के दुर्बोध एवं सूक्ष्म स्वरूप का अच्छी तरह विचार किये बिना ही अपने ज्येष्ठ भ्राता का वध करने कैसे दौड़ पड़े ? पाण्डुनन्दन ! अब मैं तुम्हें धर्म का रहस्य बता रहा हूं,  पितामह भीष्म, धर्मज्ञ युधिष्ठिर, विदुर जी अथवा यशस्विनी कुन्तीदेवी तुम्हें धर्म के जिस तत्व का उपदेश कर सकती हैं उसको मैं ठीक_ठीक बता रहा हूं, सुनो। सत्य बोलना बहुत अच्छा काम है, सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं फिर भी सत्यवादी को ही कभी_कभी सत्य के स्वरूप का ठीक_ठीक ज्ञान कठिन हो जाता है। देखो, सत्य का अनुष्ठान कैसे होता है ? जहां सत्य का परिणाम असत्य और असत्य का परिणाम सत्य होता हो वहां सत्य न बोलकर असत्य बोलना ही उचित है। विवाह_काल में, स्त्री_प्रसंग के समय, किसी के प्राणों के संकट आने पर, सर्वस्व का अपहरण होते समय तथा ब्राह्मण की भलाई के लिये आवश्यकता हो तो असत्य बोल दे। इन पांच अवसरों पर झूठ बोलने पर पाप नहीं होता। जब किसी का सर्वस्व छीना जा रहा हो तो उसे बचाने के लिये झूठ बोलना कर्तव्य है। वहां असत्य ही सत्य और सत्य ही असत्य हो जाता है। जो वहां भी सत्य कह देता है ऐसे मनुष्य को लोग मूर्ख समझते हैं। पहले सत्य और असत्य का अच्छी तरह निर्णय करके जो परिणाम में सत्य हो उसका पालन करें। केवल अनुष्ठान की दृष्टि से असत्यरूप सत्य का भाषण नहीं करना चाहिए। जो ऐसा करता है वही धर्मवेत्ता है। जिसकी बुद्धि निष्काम है वह पुरुष अंधे  पशु को मारने वाले बलाक व्याध की भांति अत्यंत कठोर कर्म करके भी यदि महान् पुण्य प्राप्त कर लें तो क्या आश्चर्य है ?  इसी प्रकार जो धर्म पालन की इच्छा तो रखता है, पर है मूर्ख और गंवार; वह नदियों के संगम पर बने हुए कौशिक मुनि की भांति यदि अज्ञानपूर्वक धर्म करके भी महान् पाप का भागी हो जाय तो क्या आश्चर्य है ?’ अर्जुन ने कहा_भगवन् ! बलाक और कौशिक मुनि की कथा मुझे सुनाते, जिससे मैं इस विषय को अच्छी तरह समझ लूं।  श्रीकृष्ण ने कहा_भारत ! एक व्याध था, जिसका नाम था, बलाक। वह अपनी स्त्री और पुत्रों की जीवनरक्षा के लिये मृगों को मारा करता था, कामना या आसक्ति के वशीभूत होकर नहीं। बूढ़े माता_पिता तथा अन्य आश्रित जनों का पालन_पोषण किया करता था। सदा अपने धर्म में लगा रहता, सत्य बोलता और किसी की निंदा नहीं किया करता था। एक दिन वह मृगों को मारकर लाने के लिए वन में गया; किन्तु कोशिश करने पर भी उसे कोई मृग नहीं मिला। इतने में उसकी दृष्टि पानी पीते हुए एक शिकारी जानवर पर पड़ी, जो अंधा था, वह नाक से सूंघकर ही आंख का काम निकाल लिया करता था। यद्यपि वैसे जानवर को व्याध ने, पहले कभी नहीं देखा था, तो भी उसे मार डाला। अंधे के मरते ही आकाश से फूलों की वृष्टि होने लगी। व्याध को ले जाने के लिये स्वर्ग से एक सुन्दर विमान उतर आया, जिसपर अप्सराओं के गाने_बजाने का मनोरम शब्द हो रहा था। बात यह थी कि उस जन्तु ने पूर्वजन्म में तप करके संपूर्ण प्राणियों का संहार कर डालने के लिये वर प्राप्त किया था, इसलिये ब्रह्मा जी ने उसे अंधा बना दिया था। वह प्राणी समस्त जीवों का अन्त कर देने का निश्चय किये हुए था, अतः उसे मारकर व्याध स्वर्ग में गया। इस प्रकार धर्म के स्वरूप को समझना बड़ा कठिन है। इसी तरह कौशिक नाम का एक तपस्वी ब्राह्मण था, जो बहुत पढ़ा_लिखा नहीं था। वह गांव से दूर नदियों के संगम के बीच रहा करता था। उसने यह व्रत ले लिया था कि ‘मैं सदा सत्य बोलूंगा।‘ इससे वह ‘सत्यवादी’ नाम से विख्यात हो गया। एक दिन की बात है, कुछ लोग लुटेरों के भय से छिपने के रि
लिये उसके आश्रम के पास वन में घुस गये।
एक दिन की बात है, कुछ लोग लुटेरों के भय से छिपने के लिये उसके आश्रम के पास के वन में घुस गये। लुटेरे भी यत्नपूर्वक उनका पता लगा रहे थे। वे सत्यवादी कौशिक के पास आकर बोले_’भगवन् ! बहुत से लोग, जो इधर ही आते हैं, किस रास्ते से गये हैं ? हम सच्ची बात पूछते हैं, यदि आप जानते हों तो बता दीजिये।‘
उनके पूछने पर कौशिक ने सच्ची बात कह दी_’इस वन में जहां घने वृक्ष, लता और झाड़ियां हैं, उधर ही वे गये हैं।‘ पता लग जाने पर उन निर्दयी डाकुओं ने सब लोगों को पकड़कर मार डाला। ऐसी किंवदन्ती है। इस प्रकार वाणी का दुरुपयोग करने के कारण ब्राह्मण को महान् पाप लगा और उस पाप की वजह से कौशिक को दु:खंदायी नरक की हवा खानी पड़ी; क्योंकि वह धर्म के सूक्ष्म स्वरूप को बिलकुल नहीं जानता था। इसी तरह जिसने शास्त्र  बहुत कम पढ़ा है, जो गंवार है, धर्म के विभाग को ठीक_ठीक नहीं जानता, वह मनुष्य यदि वृद्ध पुरुषों से अपने संदेह नहीं पूछता उसे महान् नरक का_सा कष्ट उठाना पड़ता है। अब तुम्हारे लिये संक्षेप से धर्म की पहचान बताती जाती है। कितने ही मनुष्य ‘परमज्ञान’ रूप को तर्क के द्वारा जानने का प्रयत्न करते हैं; किन्तु बहुत लोग ऐसा कहते हैं कि वेदों से ही धर्म का ज्ञान होता है। मैंने तो यहां धर्म के स्वरूप की व्याख्या की है, वह समस्त प्राणियों के लाभ को ही दृष्टि में रखकर की है। धर्म के संबंध में ऐसा निश्चय है कि जो अहिंसायुक्त है, वहीं धर्म है। हिंसकों को हिंसा से रोकने के रिमेक धर्म की यह व्याख्या की गयी है।
धर्म ही प्रजा को धारण करता है और धारण करने के कारण ही उसे धर्म कहते हैं, इसलिये जो प्राणरक्षा से युक्त हो _जिसमें किसी भी जीव की हिंसा न की जाती हो, वही धर्म है_यही धर्मवेत्ताओं का सिद्धांत है। जो लोग स्वयं अन्यायपूर्वक धन छीन लेने की इच्छा रखते हुए दूसरों से सत्यभाषण कराना चाहते हैं, वहां यदि मौन रहने से छुटकारा मिल जाय तो वैसा ही करें, किसी तरह बोले ही नहीं। किन्तु यदि बोलना अनिवार्य हो जाय और न बोलने से लुटेरों को संदेह होने लगे तो वहां असत्य बोलना ही ठीक है। इसी को बिना बिचारे सत्य समझो।
जो मनुष्य किसी काम के लिये प्रतिज्ञा करके उसका प्रकारान्तर से पालन करता है, उसे उसका फल नहीं मिलता_ऐसा मनीषी विद्वानों का कथन है। प्राण संकट में, विवाह में, समस्त कुटुम्बियों के प्राणान्तक का समय उपस्थित होने पर या हंसी_परिहास में यदि असत्य बोला गया तो वह असत्य नहीं माना जाता। धर्म का तत्व जाननेवाले विद्वान उक्त अवसरों पर मिथ्या बोलने में पाप नहीं मानते। जहां लुटेरों के चंगुल में फंस जाने पर झूठी शपथ खाने से छुटकारा मिलता हो, वहां झूठ बोलना ही ठीक है, इसी को बिना बिचारे सत्य समझो। जहां तक वश चले उन लुटेरों को धन नहीं देना चाहिये; क्योंकि पापियों को दिया हुआ धन दाता को दु:ख होता है। अत: धर्म के लिये झूठ बोलने पर भी मनुष्य को झूठ का दोष नहीं लगता। अर्जुन ! मैं तुम्हारा हित चाहता हूं, इसलिये अपनी बुद्धि तथा धर्म के अनुसार मैंने संक्षेप से तुम्हें यह धर्म का लक्षण बताया है। इसे तुमने सुना, अब बताओ, क्या इस समय भी युधिष्ठिर को वध्य ही समझते हो।

Tuesday, 12 April 2022

अर्जुन द्वारा अश्वत्थामा की पराजय, कर्ण द्वारा भार्गवास्त्र का प्रयोग, श्रीकृष्ण और अर्जुन का युधिष्ठिर से मिलने के रिमेक छावनी पर जाना तथा युधिष्ठिर का उनसे कर्ण के मारे जाने का समाचार पूछना

संजय कहते हैं_’महाराज ! इसी समय अश्वत्थामा रथियों की बहुत बड़ी सेना साथ लेकर, जहां अर्जुन खड़े थे, वहां ही सहसा आ धमका। उसे आते देख अर्जुन ने एकबारगी उसका बढ़ाव रोक दिया। अश्वत्थामा झल्ला उठा, वह बाणों की मार से श्रीकृष्ण और अर्जुन को आच्छादित करने लगा। यह देख अर्जुन ने हंसते_हंसते दिव्यास्त्र का प्रयोग किया किन्तु अश्वत्थामा ने उसका निवारण कर दिया। उस समय अर्जुन ने अश्वत्थामा का वन करने के रिमेक जिस जिस अस्त्र का प्रहार किया, उन सबको द्रोण कुमार ने काट डाला। उसने अपने बाणों से दिशाओं तथा उपदिशाएं को ढ़ककर श्रीकृष्ण की दाहिनी बांह में तीन बाण मारे। तब अर्जुन ने उसके घोड़ों को घायल करके संग्राम में खून की नदी बहा दी। उन्होंने अश्वत्थामा का धनुष काट डाला। यह देख उसने अर्जुन पर वज्र के समान भयंकर परिघ का प्रहार किया। किन्तु अर्जुन ने उसे हंसते_हंसते काट डाला। अब अश्वत्थामा का क्रोध और बढ़ गया।
उसने ऐन्द्रास्त्र का प्रयोग किया, परन्तु अर्जुन ने महेन्द्रास्त्र से उसे शान्त किया। साथ ही अश्त्थामा को भी अपने बाणों से ढ़क दिया। द्रोणकुमार ने अपने सायकों से उन बाणों को काट गिराया और सौ बाणों से श्रीकृष्ण को तथा तीन सौ से अर्जुन को बींध डाला। तब अर्जुन ने भी अश्वत्थामा के मर्मस्थानों में सौ बाण मारे और उसके सारथि को एक भल्ल से मारकर रथ से नीचे गिरा दिया।
उस समय अश्वत्थामा ने स्वयं ही घोड़ों की बागडोर संभाली और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन को बाणों से ढ़कना आरंभ  उसके इस पराक्रम की सभी योद्धा प्रशंसा कर रहे थे। इसी बीच में अर्जुन ने हंसते_हंसते उसके घोड़ों की बागडोर को क्षुरप्रों से तुरंत काट डाला। अब वे घोड़े बाणों की मार से अत्यंत पीड़ित होकर भाग चले। उस समय पाण्डव विजय पाकर चारों ओर तीखे बाणों की वर्षा करते हुए आपकी सेना को खदेड़ने लगे। उन्होंने कौरव_सैनिकों को इतनी पीड़ा पहुंचाई कि वे आपके पुत्रों के रोकने पर भी न रुक सके।
तदनन्तर दुर्योधन ने बड़े स्नेह के साथ कर्ण से कहा_’महाबाहो ! देखो, पाण्डवों ने हमारी इस विशाल सेना को बड़ा कष्ट पहुंचाया है, तुम्हारे रहते हुए यह भय के कारण भागी जा रही है। यह जानकर जो उचित समझो, करो। पाण्डवों के खदेड़े हुए हमारे हजारों योद्धा अब तुम्हें ही सहायता के लिये पुकार रहे हैं।‘ दुर्योधन की यह बात सुनकर कर्ण ने हंसते_हंसते अपने धनुष पर भार्गवास्त्र का संधान किया। फिर तो उससे लाखों, करोड़ों और अरबों बाण प्रकट हुए, जो अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहे थे। उन भयंकर बाणों से समस्त पाण्डव_सेना आच्छादित हो गयी। उस समय कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था। उस युद्ध में भार्गवास्त्र की मार से हजारों हाथी, घोड़े, रथी और पैदल प्राणहीन होकर गिरने लगे। पृथ्वी कांप उठी। पाण्डवों की संपूर्ण सेना व्याकुल हो गयी। कर्ण द्वारा मारे जाते हुए पांचाल और चेदिदेशीय योद्धा भय के मारे भागने और चिल्लाने लगे। साथ ही श्रीकृष्ण भगवान् और अर्जुन की पुकार करने लगे। कर्ण के बाण से मारे जाते हुए सृंजयों का आर्तनाद सुनकर कुन्तीनन्दन अर्जुन ने भगवान् वासुदेव से कहा_’महाबाहो श्रीकृष्ण ! आप इस भार्गवास्त्र के पराक्रम को तो देखिये। युद्ध में किसी भी तरह से इसका नाश नहीं किया जा सकता। उधर कर्ण अपने घोड़ों को बढ़ाता हुआ बारंबार मेरी ओर देख रहा है; इस समय उसके सामने से भाग जाना भी मैं ठीक नहीं समझता।‘ श्रीकृष्ण ने कहा_’पार्थ ! कर्ण ने राजा युधिष्ठिर को बहुत घायल कर दिया है। इस समय उनसे मिलकर और धीरज देकर फिर कर्ण का वध करना। यह कहकर जनार्दन युधिष्ठिर से मिलने के लिये आगे बढ़े।  उनका उद्देश्य यह था कि जबतक अर्जुन धर्मराज से मिलेंगे, जबतक कर्ण युद्ध करते_करते खूब थक जायगा। भगवान् की आज्ञा के अनुसार अर्जुन अपने घायल हुए भाई को देखने के लिये रथ पर बैठे_बैठे चल दिये। चलते_चलते उन्होंने अपनी सेना में सब ओर दृष्टि डाली; परंतु कहीं भी अपने बड़े भाई को नहीं देखा। तब वे बड़ी तेजी के साथ भीमसेन के पास पहुंचकर उन्हें बोले_’राजा युधिष्ठिर कहां हैं ?’ भीम ने कहा_धर्मराज युधिष्ठिर यहां से छावनी पर चले आते। कर्ण के बाणों से घायल होने के कारण उनके शरीर में बड़ी पीड़ा हो रही थी। सम्भव है, किसी तरह जीवित हों।
अर्जुन बोले_यदि ऐसी बात है तो आप शीघ्र ही उनका समाचार लेने जाइये। कर्ण के बाणों से अत्यंत घायल हो जाने के कारण वे अवश्य ही छावनी की ओर चले आते हैं। उनकी क्या हालत है ? यह जानने के लिये आप शीघ्र चले जाइये। मैं यहां खड़ा हो शत्रुओं को रोके रहूंगा। भीम ने कहा_अर्जुन ! यदि मैं चला जाऊंगा तो शत्रुपक्ष के वीर यही कहेंगे कि ‘भीमसेन डर गये' ! इसलिये तुम्हीं जाकर महाराज की खबर लो।
अर्जुन बोले_मेरे शत्रु संशप्तक सामने खड़े हैं, आज इन्हें मारे बिना मैं भी यहां से नहीं जा सकता। भीम ने कहा_धनंजय ! मैं अपने पराक्रम से संशप्तकों का सामना करूंगा। तुम निश्चिंत होकर जाओ। भीमसेन की बात सुनकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा_’हृषीकेश ! अब मैं राजा युधिष्ठिर का दर्शन करना चाहता हूं,  शीघ्र ही घोड़े हांकिये।‘ तब भगवान् गरुड़ के समान तेज चलनेवाले घोड़ों को हांककर बहुत शीघ्र राजा युधिष्ठिर के पास पहुंच गया। फिर दोनों ने रथ से उतरकर धर्मराज के चरणों में प्रणाम किया और उन्हें सकुशल देख वे बड़े प्रसन्न हुए। तदनन्तर, राजा युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण और अर्जुन का अभिनन्दन किया। उस समय धर्मराज ने यह समझ लिया कि कर्ण मारा गया, इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और वे हर्ष गद्गद् वाणी से बोले, ‘देवकीनन्दन ! तुम्हारा स्वागत है ! धनंजय ! तुम्हारा भी स्वागत है ! इस समय तुम दोनों को देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है; तुमलोगों ने स्वयं सकुशल रहकर महारथी कर्ण को मार डाला है। वह सब प्रकार की शस्त्रविद्या में निपुण तथा कौरवों का अगुआ था। परशुरामजी ने अस्त्रविद्या सिखाकर उसे महान् शक्तिशाली बना दिया था। युद्ध में उसपर विजय पाना कठिन था। वह विश्वविख्यात महारथी और संसार का सर्वश्रेष्ठ वीर था। दुर्योधन का हित साधन करता और हमलोगों को दु:ख देने के लिये ही तो वह काल के समान था। ऐसे महाबली कर्ण को तुम दोनों ने युद्ध में मार डाला_यह बड़े आनन्द की बात हुई। भैया श्रीकृष्ण और अर्जुन ! आज कर्ण ने मेरे साथ भयंकर युद्ध किया था। उसने मेरे दोनों चक्ररक्षकों तथा सारथि को मार डाला, घोड़ों को यमलोक पठाया और मेरे पक्ष के बहुत से योद्धाओं को जीतकर मुझे भी परास्त कर दिया।
इतना ही नहीं, उसने मेरा अपमान करके मुझे बहुत_से कटुवचन भी सुनाये। धनंजय ! अधिक क्या कहूं, इस समय जो मैं जीवित हूं_यह भीमसेन का प्रभाव है। मुझसे तो यह अपमान सहा ही नहीं जाता। कर्ण ने मुझे इतना घायल और अपमानित कर दिया तो अब मेरे जीने से क्या लाभ ? अब मैं राज्य लेकर भी क्या करूंगा। पहले कभी भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य से भी मुझे जो अपमान नहीं मिला, वह आज सूतपुत्र से प्राप्त हुआ है। इसलिये अर्जुन ! मैं पूछता हूं कि किस प्रकार सकुशल रहकर तुमने कर्ण का वध किया है ? यह सब समाचार मुझे सुनाओ। वीरवर ! कर्ण के बाणों से जब मैं बहुत घायल हो गया तो उसका वध करने के लिये मैंने तुम्हारा ही स्मरण किया था, उस समय कर्ण का वध करके तुमने मेरे उस स्मरण को सफल बना दिया न ? बताओ तो सूतपुत्र को तुमने किस तरह मारा ?








Saturday, 26 March 2022

कर्ण से पराजित और घायल होकर युधिष्ठिर का अपनी छावनी में विश्राम के लिये जाना

संजय कहते हैं_राजन् ! दूसरी ओर युधिष्ठिर को आते देख आपका पुत्र दुर्योधन क्रोध में भर गया। उसने अपनी आधी सेना साथ ले सहसा निकट जाकर सब ओर से घेर लिया और छिहत्तर क्षुरप्र मारकर उनको बींध डाला। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने भी क्रोध में भरकर आपके पुत्र को तुरंत ही तीस भल्ल मारे। यह देख उन्हें पकड़ने के लिये कौरव_पक्ष के योद्धा टूट पड़े। उस समय शत्रुओं के खोटे विचार जानकर महारथी नकुल, सहदेव तथा  एक अक्षौहिणी सेना के युधिष्ठिर के पास आ धमके। वहां पहुंचते ही सहदेव ने बड़ी फुर्ती के साथ दुर्योधन को बीस बाण मारे। इतने में कर्ण युधिष्ठिर की सेना का संहार करने लगा। उसके बाणों से पीड़ित होकर वह सेना सहसा भाग खड़ी हुई। तब राजा युधिष्ठिर को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने तेज किये हुए पचास बाणों से कर्ण को बींध डाला। तदनन्तर, उन दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। धर्मराज शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए भांति भांति के बाणों, भल्लों, शक्ति, ऋष्टि तथा मुहरों से आपकी सेना का संहार करने लगे। उस समय आपके योद्धाओं में हाहाकार मच गया। धर्मात्मा युधिष्ठिर जहां_जहां दृष्टि डालते थे, वहां के सैनिकों का सफाया हो जाता था।
यह देख कर्ण अत्यन्त कुपित होकर युधिष्ठिर पर नारायण, अर्धचंद्र तथा वत्सदंत आदि का प्रहार करने लगा। युधिष्ठिर ने भी तेज किते हुए बाणों से कर्ण को घायल कर डाला। फिर कर्ण ने हंसते_हंसते तेज किये हुए बाणों तथा तीन भल्लों से युधिष्ठिर की छाती छेद डाली। इससे धर्मराज को बड़ी पीड़ा हुई। वे रथ के पिछले भाग में बैठ गये और सारथि को वहां से चल देने की आज्ञा दी। उन्हें जाते देख दुर्योधनसहित सभी कौरव ‘इसे पकड़ो_पकड़ो’ कहकर चिल्लाते हुए उनके पीछे दौड़ पड़े। इतने ही में पांचाल योद्धाओं के साथ सत्रह सौ कैकयवीरों ने आकर कौरवों को आगे बढ़ने से रोक दिया। उस समय राजा युधिष्ठिर बाणों के प्रहार से बहुत घायल हो गये थे। वे नकुल तथा सहदेव के बीच में होकर धीरे_धीरे छावनी की ओर जा रहे थे, उनका होश ठिकाने नहीं था। ऐसी अवस्था में भी कर्ण ने दुर्योधन के हित की इच्छा से युधिष्ठिर का पीछा किया और उन्हें तीन तीखे बाणों से बींध डाला। युधिष्ठिर ने भी कर्ण की छाती में बाण मारकर बदला चुकाया। इसके बाद तीन बाणों से उसके सारथि को और चार से चारों घोड़ों को बींध डाला। फिर नकुल और सहदेव ने भी बड़े प्रयास के साथ कर्ण पर बाणों की वर्षा की। इसी प्रकार सूतपुत्र कर्ण ने भी तीखी धारवाले दो बल्लों से नकुल और सहदेव को घायल कर दिया।
फिर युधिष्ठिर के घोड़ों को मारकर एक भल्ल से उसके मस्तक के टोप को नीचे गिरा दिया। इसी तरह नकुल के भी घोड़ों को मौत के घाट उतारकर उसके रथ की ईषा और धनुष को भी काट डाला। रथ टूट जाने पर वे दोनों पाण्डुकुमार अत्यन्त घायल होकर सहदेव के रथ पर जा बैठे।
उन दोनों को रथहीन देख उनके मामा मद्रराज शल्य को बड़ी दया आयी। उन्होंने सूतपुत्र से कहा_’कर्ण ! तुम्हें तो आज अर्जुन से युद्ध करना है, फिर अत्यन्त क्रोध में भरकर धर्मराज से किसलिये लड़ रहे हो ? इन्हें मारने से तुम्हारा क्या फायदा होगा ? इधर देखो, अर्जुन रथियों की सेना का संहार कर रहे हैं। अपने बाणों की वर्षा से हमारी संपूर्ण सेना को काल का ग्रास बना रहे हैं। उधर, भीमसेन दुर्योधन को दबोचे हुए हैं।
हम लोगों के देखते_देखते वे उसे मार न डालें_इसके लिखते प्रयत्न करना चाहिए।
 इन माद्रीपुत्रों अथवा युधिष्ठिर को मारने से क्या लाभ ? दुर्योधन का प्राण संकट में पड़ा है उसे चलकर बचाओ। कर्ण ने शल्य की बात सुनी और देखा कि दुर्योधन भीमसेन के चंगुल में फंस चुका है, तो युधिष्ठिर और नकुल सहदेव को वहां ही छोड़कर आपके पुत्र को बचाने के सब दौड़ पड़ा।
उसके चले जाने के बाद युधिष्ठिर सहदेव के तेज चलने वाले घोड़ों द्वारा वहां से खिसक गये। राजा को अपनी पराजय के कारण बड़ी लज्जा हो रही थी। नकुल और सहदेव के साथ अपने घायल शरीर से छावनी पर पहुंच कर वे रथ से उतरे और एक सुन्दर पलंग पर लेट गये। उस समय उनके देह से बाण निकाल डाले गये फिर भी हृदय के घाव से उन्हें बड़ी पीड़ा होने लगी। उस समय उनके देह से बाण निकाल डाले गये तो भी हृदय के घाव से उन्हें बड़ी पीड़ा होने लगी। उन्होंने दोनों भाई माद्री के पुत्रों से कहा_’भीमसेन मेघ के समान गरज_गरजकर लड़ रहे हैं, तुम दोनों सहायता के लिये उनकी ही सेना में जाओ।‘ उनकी आज्ञा पाकर नकुल दूसरे रथ पर सवार हुआ। सहदेव के पास तो रथ था ही नहीं। दोनों भाई अपने शीघ्र गामी घोड़े हांककर भीमसेन की सेना में जा पहुंचे।

Monday, 28 February 2022

दोनों पक्ष के योद्धाओं का द्वंदयुद्ध तथा भीमसेन का पराक्रम

धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! पांडवों और पांचालों की मार खाने से हमारी सेना दु:खी होकर भागने लगी, उस समय कौरवों ने क्या किया ?
संजय ने कहा_महाराज ! उस समय महाबाहु भीमसेन पर कर्ण की दृष्टि पड़ी। उन्हें देखते ही उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गयीं और वह उनपर चढ़ आया। उसने भीमसेन के डर से भागती हुई आपकी सेना को बड़ी कोशिश करके रोका और उसे व्यवस्थापूर्वक खड़ी करके पाण्डवों की ओर बढ़ा। यह देख पाण्डवों के महारथी भीमसेन, सात्यकि, शिखण्डी, जन्मेजय, धृष्टद्युम्न तथा प्रभद्रक आदि  क्रोध में भरकर आपकी सेना का संहार करने के लिये उसपर चारों ओर से टूट पड़े। उस युद्ध में शिखण्डी ने कर्ण का सामना किया और धृष्टद्युम्न ने बहुत बड़ी सेना से घिरे हुए दु:शासन का मुकाबला किया। नकुल ने वृषसेन पर और युधिष्ठिर ने चित्रसेन पर धावा किया। सहदेव उलूक से भिड़ गया। सात्यकि का सहदेव पर और द्रौपदी के पुत्रों का कौरवों पर आक्रमण हुआ। अर्जुन का सामना महारथी अश्वत्थामा ने किया। कृपाचार्य का युधामन्यु से और कृतवर्मा का उत्तमौजा से युद्ध हुआ। भीमसेन ने अकेले ही समस्त कौरवों तथा उनकी सेनाओं का वेग रोका। महाराज ! शिखण्डी ने रणभूमि में निर्भय विचरते हुए कर्ण को अपने बाणों का निशाना बनाया और उसे आगे बढ़ने से रोक दिया। बाधा पाकर रोष के मारे कर्ण के ओंठ फड़कने लगे। उसने शिखण्डी की दोनों भौंहों के बीच तीन बाण मारे। उनसे अत्यन्त आहत होकर शिखण्डी ने भी कर्ण को तेज किये हुए नब्बे बाण मारे। तब महारथी कर्ण ने तीन बाणों से शिखण्डी के सारथि और घोड़ों को मार डाला। इससे शिखण्डी को बड़ा क्रोध हुआ। उसने अपने रथ से कूदकर कर्ण के ऊपर शक्ति का प्रहार किया। कर्ण ने तीन बाणों से उस शक्ति के टुकड़े_टुकड़े कर डाले और नौ तीखे बाण मारकर उसे भी बींध डाला। शिखण्डी के शरीर में बहुत घाव हो गये थे; इसलिये वह कर्ण के धनुष से छूटे हुए बाणों का वार बचाता हुआ तुरंत भाग निकला। अब कर्ण पाण्डव सैनिकों को अपने बाणों से गिराने लगा। दूसरी ओर आपके पुत्र दु:शासन ने धृष्टद्युम्न को बहुत पीड़ित किया। तब धृष्टद्युम्न ने दु:शासन की छाती में तीन बाण मारे। फिर दु:शासन ने भी एक तीखे भल्ल से धृष्टद्युम्न की बायीं भुजा को बींध डाला, इससे धृष्टद्युम्न क्रोध में भर गया और एक तीखा क्षुरप्र मारकर दु:शासन का धनुष काट दिया। यह देख पांचाल योद्धा उच्च स्वर से गर्जना करने लगे। अब आपके पुत्र ने दूसरा धनुष हाथ में लिया और हंसते हंसते बाणों की झड़ी लगाकर धृष्टद्युम्न को चारों ओर से घेर लिया। तदनन्तर पांचालदेशीय सैनिकों ने भी अपने सेनापति को बचाने के लिये आपके पुत्र पर घेरा डाल दिया। फिर तो आपके योद्धाओं का शत्रुओं के साथ घोर संग्राम होने लगा। इसी बीच अपने पिता के पास खड़े हुए वृषसेन ने नकुल को पहले पांच और फिर आठ बाण मारे तब शूरवीर नकुल ने भी हंसते_हंसते एक तीखे नारायण से वृषसेन की छाती छेद डाली। इस चोट से वृषसेन बहुत घायल हो गया। फिर तो वे दोनों वीर हजारों बाणों की बौछार से एक_दूसरे को ढ़कने लगे। इतने में ही कौरव_सेना में भगदड़ पड़ गयी। कर्ण पीछे लौटकर उसे रोकने लगा। उसके लौट जाने पर नकुल ने कौरवों पर चढ़ाई की। कर्णपुत्र वृषसेन भी नकुल का सामना करना छोड़ अपने पिता के पहियों की ही रक्षा में लग गया। इसी प्रकार क्रोध से भरे हुए उलूक को संग्राम में सहदेव ने रोका, उसने उलूक के चारों घोड़ों को मारकर उसके सारथि को भी यमलोक भेज दिया। उलूक रथ से कूदकर भागा और तुरंत त्रिगर्तों की सेना में जा घुसा।
एक ओर सात्यकि और शकुनि में लड़ाई हो रही थी। सात्यकि ने तेज किये हुए बीस बाणों से शकुनि को घायल कर दिया और एक भल्ल मारकर उसकी ध्वजा भी काट डाली। इससे शकुनि को बड़ा कोप हुआ; उसने सात्यकि का कवच काटकर उसकी ध्वजा के भी टुकड़े_टुकड़े कर दिये। सात्यकि ने शकुनि को पुनः तीन बाणों से घायल किया। तीन ही बाण उसके सारथि को भी मारे। इसके बाद अनेकों बाण मारकर उसने शकुनि के घोड़ों को यमलोक भेज दिया। फिर तो शकुनि सहसा रथ से कूद पड़ा और उलूक के रथ पर बैठकर वहां से चम्पत हो गया। अब सात्यकि आपकी सेना पर बाण बरसाने लगा। उसकी बाणो की चोट से आहत हो आपके सैनिक चारों ओर भागने लगे। बहुतेरे अपने प्राण खोकर रणभूमि में ही गिर गये। दूसरी ओर, आपके पुत्र दुर्योधन ने भीमसेन को रोका। किन्तु भीम ने तुरंत ही उसके घोड़ों और सारथि को मार डाला। फिर रथ ध्वजा की धज्जियां उड़ा दीं। इससे पाण्डव पक्ष के योद्धा बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकार परास्त होकर दुर्योधन भीम के सामने से भाग गया।
इधर युधामन्यु ने कृपाचार्य को घायल करके तुरंत ही उनका धनुष भी काट दिया। तब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ आचार्य कृप ने दूसरा धनुष हाथ में ले बाण मारकर युधामन्यु के रथ की ध्वजा, सारथि और छत्र को नीचे गिरा दिया। तब तो महारथी युधामन्यु स्वयं ही रथ हांकता हुआ भाग गया।
इसी प्रकार एक ओर उत्तमौजा ने बाणों की झड़ी लगाकर कृतवर्मा को ढ़क लिया। फिर उन दोनों में अत्यन्त भयानक युद्ध छिड़ गया। कृतवर्मा ने उत्तमौजा की छाती में चोट की, वह मूर्छित होकर रथ की बैठक में बैठ गया। उसकी यह अवस्था देख सारथि उसे रणभूमि से हटा ले गया।
तदनन्तर, कौरवों की सारी सेना भीमसेन पर टूट पड़ी। दु:शासन तथा शकुनि हाथियों की बहुत बड़ी सेना से भीमसेन को घेरकर उनपर बाण मारना आरम्भ किया। हाथियों की सेना देखते ही भीमसेन के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हुए हाथियों का का संहार आरंभ किया। अपने बाणों से हाथियों के हजारों जत्थों का सफाया कर डाला। उस समय बिजली की गड़गड़ाहट के समान भीम के धनुष की टंकार सुनकर हाथी मल_मूत्र त्यागते हुए बड़े वेग से भाग रहे थे। महाराज ! भीमसेन का वह पराक्रम संपूर्ण प्राणियों का संहार करने वाले रुद्र के समान जान पड़ता था।

Thursday, 10 February 2022

भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन से कौरवों के आक्रमण तथा भीम के पराक्रम का वर्णन

संजय कहते हैं_महाराज ! चलते समय राह में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युधिष्ठिर को दिखाते हुए कहा_’पाण्डुनन्दन ! ये हैं तुम्हारे भाई युधिष्ठिर। देखो, इन्हें मारने के लिये अत्यन्त बलवान और महान् धनुर्धर कौरव_योद्धा बड़ी तेजी के साथ इनका पीछा कर रहे हैं। साथ ही इनकी रक्षा के लिये पांचालदेशीय वीर भी उनके पीछे-पीछे आ रहे हैं। यह राजा दुर्योधन भी रथियों की सेना से गिरकर राजा युधिष्ठिर पर धावा कर रहा है। इसका भी उद्देश्य यही है कि युधिष्ठिर को मार डाले। इस कार्य में इसके भाई भी साथ दे रहे हैं। ये हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल_सभी इन्हें पकड़ने के लिये जा रहे हैं।अब देखो, सात्यकि और भीम ने पहुंचकर यद्यपि इन्हें बीच में ही रोक दिया है, तो भी ये संख्या में अधिक होने के कारण राजा की ओर बढ़े ही चले जाते हैं। शत्रु को संताप देने वाले राजा युधिष्ठिर भी यद्यपि बड़े बलवान हैं, युद्ध की कला में निपुण हैं, उनका हाथ भी फुर्ती से चलता है, तथापि कर्ण ने उन्हें रण से विमुख कर दिया है। धृतराष्ट्र के पुत्र शूरवीर हैं, उनकी सहायता मिल जाने पर कर्ण अवश्य ही हमारे महाराज को कष्ट पहुंचा सकता है। इनके तथा और भी बहुत से शूरवीरों के साथ ये युद्ध कर रहे थे। उन सब महारथियों ने मिलकर उन्हें परास्त किया है। राजा युधिष्ठिर उपवास करने के कारण बहुत दुर्बल हो गये हैं। ये अधिकतर ब्राह्मबल ( क्षमा ) में ही स्थित रहते हैं; क्षात्रबल ( निष्ठुरता ) में नहीं; जबसे कर्ण के साथ इनकी भिड़ंत हुई है; तबसे ये बड़े संकट में पड़ गये हैं। कर्ण धृतराष्ट्र के महारथी पुत्रों से यह कह रहा है कि ‘तुमलोग पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर को मार डालो।‘
पार्थ ! ये सभी महारथी स्थूणाकर्ण, इन्द्रजाल तथा पाशुपत नामक अस्त्र-शस्त्रों से राजा को आच्छादित कर रहे हैं। वे आतुर हो गये हैं, इस समय उन्हें विशेष सेवा की आवश्यकता है। अब शीघ्रता करने का समय है_यह जानकर  पांचाल तथा पाण्डव वीर बड़ी तेजी से उनके पीछे दौड़ते हैं। उन्हें यह आशा और विश्वास है कि यदि महाराज युधिष्ठिर पाताल में भी डूबते होंगे तो हम उन्हें बलपूर्वक निकाल लायेंगे। वह देखो, अब कर्ण अत्यन्त क्रोध में भरकर पांचालों की ओर दौड़ रहा है। उसके रथ की ध्वजा धृष्टद्युम्न के रथ की ओर जाती दिखायी दे रही है। पार्थ ! इस समय मैं तुम्हें एक परम प्रिय समाचार सुना रहा हूं कि राजा युधिष्ठिर जीवित हैं। उधर वे महाबाहु भीमसेन हैं, जो सृंजयों की वाहिनी तथा सात्यकि के साथ लौटकर अपनी सेना के मुहाने पर खड़े हैं। पांचाल योद्धा तथा भीमसेन अपने तेज बाणों से अब कौरवों पर प्रहार कर रहे हैं। देखो, कौरव_सेना भाग चली। सैनिकों के गांवों से खून की धारा जारी है। उनकी बड़ी दयनीय दशा दिखाती देती है। अब देखो, भीमसेन शत्रुओं की सेना को खदेड़ने लगे। उनकी वजह से कौरव_वाहिनी बड़े संकट में पड़ गयी है। ये रथी लोग भीम के भय से थर्रा उठे हैं। हाथी उनके नाराचों की मार से विदीर्ण हो_होकर जमीन पर गिर रहे हैं। बड़े_बड़े गजराज भीम से घायल होकर अपनी ही सेना को रौंदते कुचलते हुए भागे जा रहे हैं। अर्जुन ! पहचान लो, संग्राम विजयी वीरवर भीमसेन का ही यह दु:सह  सिंहनाद सुनाई देता है ! यह लो, उन्होंने दस बाण मारकर निषादराज के पुत्र को भी मौत के घाट उतार दिया। अब कौरवों की बोलती बन्द हो गयी है, पहले जैसी उनकी गर्जना नहीं सुनाई देती।
भीमसेन ने दुर्योधन को तीन अक्षौहिणी सेनाओं को आगे बढ़ने से रोककर मार डाला है। जिनकी आंखें कमजोर हैं वे जैसे दोपहर के सूर्य की ओर नहीं सकते, वैसे ही कौरव पक्ष के राजा लोग भीमसेन की ओर आंख उठाकर देख नहीं पाते। उनकी बाणों की मार से भयभीत हुए शत्रुओं को कहीं भी चैन नहीं मिलता।‘ भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से ये बातें सुनकर अर्जुन ने भीमसेन के दुष्कर पराक्रम पर दृष्टिपात किया। फिर अपने बचे_खुचे शत्रुओं को तीखे बाणों से मारना आरम्भ किया। संशप्तक योद्धा बड़े बलवान थे तो भी वे अर्जुन की मार से युद्ध में नहीं ठहर सके। भयभीत होकर सब दिशाओं में भाग गये।

Saturday, 29 January 2022

अश्वत्थामा की प्रतिज्ञा, धृष्टद्युम्न और कर्ण का युद्ध, अश्वत्थामा के द्वारा धृष्टद्युम्न की और अर्जुन के द्वारा अश्वत्थामा की पराजय

संजय कहते हैं_महाराज ! तदनन्तर, दुर्योधन ने कर्ण के पास जाकर कहा_’राधानन्दन ! यह युद्ध खुला हुआ स्वर्ग का दरवाजा है, जो हमें स्वत: प्राप्त हो गया है। सौभाग्यशाली क्षत्रियों को ही ऐसा युद्ध मिला करता है। यदि तुमलोगों ने युद्ध में पाण्डवों को मारा तो धन_ धान्य से सम्पन्न पृथ्वी प्राप्त करोगे और यदि शत्रुओं के साथ से तुम्ही मारे गये तो वीर पुरुषों के प्राप्त होने योग्य _पुण्य_लोक पाओगे। दुर्योधन की बात सुनकर श्रेष्ठ क्षत्रियों ने हर्ष_ध्वनि की। फिर सब ओर बाजे बजने लगे। उस समय अश्वत्थामा ने वहां पहुंचकर आपके योद्धाओं को हर्षित करते हुए कहा_’आप सब लोगों ने तो देखा ही था मेरे पिता अस्त्र डालकर योग में स्थित हो गये थे, तो भी उन्हें धृष्टद्युम्न ने मारा। इसके कारण तो मुझे अमर्ष है ही, मित्र दुर्योधन का हित भी करना है। 
इसलिये क्षत्रियों ! मैं आपके समक्ष यह प्रतिज्ञा करता हूं धृष्टद्युम्न को मारे बिना अपना कवच नहीं उतारूंगा। यदि मेरी प्रतिज्ञा झूठी हो तो मुझे स्वर्ग न मिले। लड़ाई में अर्जुन या भीमसेन जो भी मेरा सामना करने आयेंगे, उन सबको कुचल डालूंगा_इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।अश्वत्थामा के ऐसा कहने पर कौरवों की सेना ने एक साथ होकर पाण्डवों पर धावा किया। साथ ही पाण्डवों का भी उसपर आक्रमण हुआ। दोनों दलों में घोर संग्राम होने लगा। मनुष्यों का भीषण संहार मचा; प्रलयकाल का दृश्य उपस्थित हो गया। उस समय पाण्डवों के पक्ष में युधिष्ठिर की और हमारे दल में कर्ण की प्रधानता थी। खूब जोर से मार_काट हुई। खून की धारा बह चली। संशप्तकों में अब थोड़े ही बच गये थे। इसलिये धृष्टद्युम्न तथा पाण्डव महारथियों ने सब राजाओं को साथ लेकर कर्ण पर ही धावा किया। किंतु कर्ण ने अकेले ही उन सबका बढ़ाव रोक दिया।
धृष्टद्युम्न ने कर्ण को एक बाण मारकर कहा_’अरे ! खड़ा रह, खड़ा रह, कहां भागा जाता है ?’ यह सुनकर कर्ण क्रोध में भर गया और धृष्टद्युम्न का धनुष काटकर उसने उसको नौ बाण मारे। धृष्टद्युम्न का कवच कट गया। इसके बाद उसने भी दूसरा धनुष लिया और कर्ण को सत्तर बाणों से घायल किया। अब तो कर्ण को बड़ा कोप हुआ, उसने धृष्टद्युम्न पर मृत्युदंड के समान भयंकर बाण का प्रहार किया। उस बाण को धृष्टद्युम्न की ओर आते देख सात्यकि ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए उसके साथ टुकड़े कर डाले। यह देख कर्ण ने बाणों की वर्षा करके सात्यकि को चारों ओर से घेर लिया और सात नाराचों से उसे बींध डाला। सात्यकि ने भी कर्ण का यही हाल किया। फिर उन दोनों में विचित्र प्रकार से घोर युद्ध हुआ, जिससे देखने और सुनने से भी भय होता था। इसी बीच में धृष्टद्युम्न पर अश्वत्थामा ने चढ़ाई की। उसने आते ही क्रोध में भरकर कहा_’ओ ब्रह्महत्यारे ! आज मैं तुझे मौत के मुंह में भेज दूंगा। अगर अर्जुन ने तेरी रक्षा नहीं की, यदि तू लड़ाई में डटा रहा गया और सामना छोड़कर भागा नहीं, तो आज तुझे तेरे पाप का। दण्ड अवश्य मिलेगा, तू कुशल से नहीं रह सकेगा ? उसके ऐसा कहने पर धृष्टद्युम्न बोला_’ तेरी बात का उत्तर मेरी यह तलवार ही देगी, जो तेरे पिता को संग्राम में मुंहतोड़ जवाब दे चुकी है।‘ यों कहकर सेनापति धृष्टद्युम्न ने अमर्ष में भरकर अश्वत्थामा को एक तीखे बाण से बींध डाला। इससे अश्वत्थामा को बड़ा क्रोध हुआ। उसने इतने बाणों की वर्षा की जिससे धृष्टद्युम्न के चारों ओर की दिशाएं ढ़क गयीं। इसी प्रकार धृष्टद्युम्न ने भी कर्ण के देखते_देखते द्रोणकुमार को अपने हाथों से आच्छादित कर दिया  उसका धनुष भी काट डाला। अश्वत्थामा ने वह धनुष फेंक दिया और दूसरा धनुष_बाण हाथ में लेकर उससे धृष्टद्युम्न के शक्ति, गदा, ध्वजा, घोड़े, सारथि तथा रथ को पलक मारते_मारते नष्ट कर दिया। तब धृष्टद्युम्न ने ढ़ाल और तलवार हाथ में ली, किन्तु महारथी अश्वत्थामा ने बल्लों से मारकर उनके भी टुकड़े_टुकड़े कर डाले। साथ ही उसने अनेक बाणों से धृष्टद्युम्न को बहुत घायल कर दिया। यह सब करने पर भी जब वह धृष्टद्युम्न का नाश न कर सका तो धनुष फेंककर धृष्टद्युम्न को पकड़ने के लिये दौड़ा। इसी बीच में श्रीकृष्ण की दृष्टि उधर गयी। उन्होंने अर्जुन से कहा_’पार्थ ! वह देखो, अश्वत्थामा धृष्टद्युम्न को मारने के लिये बड़ा भारी उद्योग कर रहा है। इसमें संदेह नहीं कि वह अश्वत्थामा का ग्रास बना ही चाहता है, इसलिये तुम इसे शीघ्र छुड़ाओ।,' ऐसा कहकर महाप्रतापी भगवान् श्रीकृष्ण ने, जहां अश्वत्थामा था उधर ही अपने घोड़े बढ़ाये। श्रीकृष्ण और अर्जुन को आते देख उसने धृष्टद्युम्न को मारने का विशेष उद्योग किया। अर्जुन ने जब देखा कि अश्वत्थामा द्रुपदकुमार को घसीट रहा है, तो उसके ऊपर बहुत से बाण मारे। गाण्डीव से छूटे हुए वे बाण, जैसे सांप अपनी बांबी में घुसते हैं, उसी प्रकार अश्वत्थामा के शरीर में धंस गये। उनसे पीड़ित होकर द्रोणपुत्र ने धृष्टद्युम्न  को तो छोड़ दिया और अपने रथ में बैठकर धनुष हाथ में ले अर्जुन को बींधना आरंभ कर दिया। इतने में सहदेव धृष्टद्युम्न को अपने रथ पर बिठाकर वहां से अन्यत्र हटा दिया। अर्जुन ने भी द्रोणकुमार को बाणों से बींधना आरंभ किया। इससे अश्वत्थामा का क्रोध बहुत बढ़ गया। उसने अर्जुन की भुजाओं तथा छाती में भी बाण मारे। तब अर्जुन ने अश्वत्थामा के ऊपर द्वितीय कालदण्ड के समान एक नाराच चलाया। वह उसके कंधे पर लगा। लगते ही अश्वत्थामा विह्वल होकर रथ की बैठक में बैठ गया। उस समय उसे बड़ी वेदना हुई। उसकी यह अवस्था देख सारथि बड़ी फुर्ती के साथ उसे रणांगण से बाहर ले गया। महाराज ! इस प्रकार धृष्टद्युम्न को संकट से मुक्त और अश्वत्थामा को पीड़ित देख पांचाल वीरों ने बड़े जोर से गर्जना की। हजारों दिव्य बाजे बज उठे। सबलोग सिंहनाद करने लगे। तदनन्तर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से बोले_’अब संशप्तकों की ओर चलिये, उनका संहार करना इस समय मेरे लिये प्रधान काम है।‘ उनकी बात सुनकर भगवान् हवा से बातें करनेवाले अपने रथ के द्वारा संशप्तकों की ओर चल दिये।

Wednesday, 12 January 2022

अर्जुन द्वारा संशप्तकों का संहार तथा अश्वत्थामा की पराजय

संजय कहते हैं_एक ओर तो यह भयंकर संग्राम चल रहा था और दूसरी ओर अर्जुन संशप्तक सेना का विनाश कर रहे थे। शत्रुओं को जीतकर भगवान् श्रीकृष्ण से कहा_’जनार्दन ! ये संशप्तक तो अब युद्ध में मेरे बाणों की चोट न सह सकने के कारण झुंड_के_झुंड भागे जा रहे हैं। दूसरी ओर सृंजयों की बहुत बड़ी सेना भी विदीर्ण हो रही है। उधर कर्ण बड़े आराम से राजाओं की सेना में विचर रहा है, देखिये न, उसकी पताका दिखाई देती है। आप तो जानते ही हैं, कर्ण कितना पराक्रमी और बलवान है। दूसरे कोई महारथी उसे युद्ध में नहीं जीत सकते। यह हमारी सेना को खदेड़ रहा है, इसलिये अब उधर ही चलिये। यहां की लड़ाई बन्द करके महारथी कर्ण के पास चलना चाहिते। मेरी तो यही राय है, आगे आपकी जैसी इच्छा।‘ यह सुनकर भगवान् हंसते हुए बोले_’पाण्डुनन्दन ! अब तुम शीघ्र ही कौरवों का नाश करो’ ऐसा कहकर गोविन्द ने घोड़ों को हांक दिया। वे हंस के समान सफेद रंगवाले घोड़े श्रीकृष्ण और अर्जुन को लिए हुए आपकी विशाल सेना में घुस गये। उनके पहुंचते ही आपकी सेना चारों ओर भागने लगी। अर्जुन को अपनी सेना के भीतर विचरते देख दुर्योधन ने संशप्तकों को पुनः उनसे लड़ने की आज्ञा दी। संशप्तक योद्धा एक हजार रथ, तीन सौ हाथी, चौदह हजार घोड़े तथा दो लाख पैदल सेना लेकर अर्जुन पर आ चढ़े। वे अपनी बाणवर्षा से अर्जुन को आच्छादित करते हुए उन्हें घेरकर खड़े हो गये। अब अर्जुन ने पाश हाथ में लिये यमराज की भांति अपना भयंकर रूप प्रकट किया। वे संशप्तकों का संहार करने लगे। उस समय उनकी झांकी देखने ही योग्य थी। उन्होंने बिजली के समान चमकीले बाणों से वहां के समूचे आकाश को ढ़क दिया, तनिक भी खाली नहीं रखा। उनके धनुष की प्रत्यंचा की आवाज सुनकर ऐसा जान पड़ता मानो पृथ्वी, आकाश, दिशाएं, समुद्र तथा पर्वत_ये सब_के_सब फटे जा रहे हैं। थोड़ी ही देर में अर्जुन ने दस हजार योद्धाओं का सफाया कर डाला। फिर वे बड़ी फुर्ती के साथ उन आततायी शत्रुओं के हथियारसहित हाथ, भुजाएं, जंघा और मस्तक काटने लगे। इस प्रकार अर्जुन संशप्तकों की चतुरंगिणी सेना का नाश कर ही रहे थे कि सुदक्षिण का छोटा भाई वहां पहुंचकर उनके ऊपर बाणों की बौछार करने लगा। उस समय अर्जुन ने दो अर्धचंद्राकार बाणों से उसकी परिचय के समान मोटी भुजाएं काट डालीं तथा क्षुर से मारकर उसके पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मस्तक को भी धर से अलग कर दिया। वह लोहूलुहान होकर जमीन पर गिर गया। उसके गिरते ही बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ गया। लड़नेवाले योद्धाओं की नाना प्रकार से दुर्दशा होने लगी। अर्जुन ने एक_एक बाण से काम्बोजों, यवनों तथा शकों के घोड़ों का संहार करने लगा, वे कम्बोज आदि स्वयं भी खून से लथपथ हो गये। उनके रुधिर से सारी रणभूमि लाल हो गयी।
रथी, सारथि, घुड़सवार, हाथीसवार और महावत सब मारे गये। इस प्रकार वहां भयानक नरसंहार हुआ। तदनन्तर, अश्वत्थामा अर्जुन का सामना करने के लिये चढ़ आया। उस समय वह क्रोध में भरे हुए काल के समान जान पड़ता था। रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण पर दृष्टि पड़ते ही उसने भयंकर अस्त्र-शस्त्र की वृष्टि आरंभ कर दी। अश्वत्थामा के छोड़े हुए बाण चारों ओर से आकर श्रीकृष्ण और अर्जुन पर पड़ने लगे। वे दोनों रथ पर बैठे_ही_बैठे ढ़क गये। प्रतापी अश्वत्थामा ने उन दोनों को निश्चेष्ट कर दिया,  उनसे कुछ भी करते नहीं बनता था। उनकी यह अवस्था देख समस्त चराचर जगत् में हाहाकार मच गया। संग्राम में श्रीकृष्ण और अर्जुन को आच्छादित करते समय अश्वत्थामा ने जो पराक्रम दिखाया, वैसा इसके पहले मैंने कभी नहीं देखा था। उस समय द्रोणपुत्र की ओर देखकर अर्जुन को बड़ा भारी मोह_सा हो गया। उन्हें यह विश्वास_सा होने लगा कि अश्वत्थामा ने मेरा पराक्रम हर लिया है।
यह देख श्रीकृष्ण ने प्रेममिश्रित क्रोध के साथ कहा_’पार्थ ! तुम्हारे विषय में आज मैं बड़ी अद्भुत बात देख रहा हूं। आज द्रोणकुमार तुमसे बहुत बढ़_चढ़कर पराक्रम दिखा रहा है। अब तुममें पहले जैसी वीरता है या नहीं ? तुम्हारी दोनों भुजाओं में बल का अभाव तो नहीं हो गया है ? हाथ में गाण्डीव है न ? यह सब इसलिये पूछता हूं कि आज द्रोणकुमार तुमसे बढ़ता दिखाती देता है। ‘मेरे गुरु का पुत्र है' यह सोचकर उसकी उपेक्षा न करो। यह उपेक्षा करने का समय नहीं है।‘
श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर अर्जुन ने चौदह भल्ल हाथ में लिये और उनसे अश्वत्थामा के धनुष, ध्वजा, छत्र, पताका, रथ, शक्ति और गदा को नष्ट कर डाला। फिर ‘वत्सदन्त’ नामक बाणों से उसके गले की हंसली में इतने जोर से प्रहार किया कि उसे मूर्छा आ गयी। वह ध्वजा का डंडा थामकर बैठ गया। उसे बेहोश देखकर सारथि अर्जुन से उसकी रक्षा करने के लिये रणभूमि से बाहर हटा लें गया। इस प्रकार अर्जुन ने संशप्तकों का, भीम ने कौरव_योद्धाओं का तथा कर्ण ने पांचालों का एक ही क्षण में विनाश कर डाला। बड़े_बड़े वीरों का संहार करनेवाले उस भयंकर संग्राम में असंख्यों धड़ उठ_उठकर दौड़ रहे थे।