Tuesday, 28 March 2023

शल्य का वध

संजय कहते हैं_तदनन्तर, महाराज शल्य मेघ के समान बाणों की वर्षा करने लगे। वे सात्यकि को दस, भीमसेन को तीन तथा सहदेव को भी तीन बाणों से घायल करके युधिष्ठिर को पीड़ित करने लगे। शल्य ने धर्मराज की छाती में सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी बाण का प्रहार किया। तब युधिष्ठिर ने भी सावधानी के साथ बाण मारकर मद्रराज को बींध डाला। उसकी चोट खाकर वे मूर्छित हो गये। फिर थोड़ी ही देर बाद जब उन्हें चेत हुआ तो उन्होंने युधिष्ठिर को सौ बाण मारे। अब युधिष्ठिर ने भी नौ सायकों से शल्य की छाती छेद डाली और छः बाण मारकर उनका कवच भी काट दिया। यह देख महाराज शल्य ने दो सायकों से युधिष्ठिर के धनुष के दो टुकड़े कर दिये। तब युधिष्ठिर ने दूसरा धनुष हाथ में ले लिया और शल्य को सब ओर से बींध डाला। शल्य ने नौ बाण मारकर युधिष्ठिर और भीमसेन के कवच काट दिये और उनकी भुजाओं को भी विदीर्ण कर डाला फिर शल्य ने एक क्षुराकार बाण से युधिष्ठिर का धनुष काट डाला और कृपाचार्य ने उनके सारथि को यमलोक भेज दिया। इतना ही नहीं, शल्य ने उनके चारों घोड़ों को भी मौत के घाट उतार दिया। तत्पश्चात् उन्होंने युधिष्ठिर के सैनिकों का संहार आरम्भ किया। राजा युधिष्ठिर की ऐसी अवस्था देख भीमसेन ने बड़े वेग से बाण मारकर शल्य का धनुष काट डाला और दो सायकों से स्वयं उन्हें भी विशेष चोट पहुंचायी। फिर एक बाण से उनके सारथि का सिर अलग करके चारों घोड़ों को भी यमलोक पहुंचा दिया। उस समय मद्रराज शल्य हाथ में ढ़ाल_तलवार लिये रथ से कूद पड़े और नकुल के रथ की ईषा ( हरसा ) काटकर राजा युधिष्ठिर की ओर दौड़े। राजा शल्य को युधिष्ठिर के ऊपर धावा करते देख धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पुत्र, शिखंडी तथा सात्यकि सहसा उनपर टूट पड़े। तदनन्तर, भीमसेन ने नौ बाणों से शल्य की ढाल के टुकड़े_टुकड़े कर दिये और एक भल्ल मारकर उनकी तलवार भी काट डाली। फिर अत्यंत हर्ष में भरकर आपकी सेना में विचरते हुए वे जोर_जोर से सिंहनाद करने लगे। उनकी भयंकर गर्जना सुनकर खून से लथपथ हुई आपकी सेना मूर्छित_सी हो गयी, उसे दिशाओं का भी ज्ञान न रहा। तत्पश्चात् शल्य युधिष्ठिर की ओर बढ़े और तत्पश्चात् शल्य युधिष्ठिर की ओर बढ़े और युधिष्ठिर शल्य की ओर। युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण के कथनानुसार मन_ही_मन शल्य का वध का निश्चय किया और रत्नजड़ित सुवर्णमय दण्डधारी एक शक्ति हाथ में ली। फिर क्रोध से जलती हुई आंखें उठाकर उसने मद्रराज की ओर देखा। उस समय मद्रराज शल्य धर्मराज की दृष्टि पड़ने से भस्म नहीं हो गये_यही सबसे बड़े आश्चर्य की बात मालूम हुई। तदनन्तर, युधिष्ठिर ने उस दमकती हुई भयंकर शक्ति को मद्रराज के ऊपर बड़े वेग से चलाया; जोर से फेंकने के कारण उससे आग की चिंनगारियां छूटने लगीं। पाण्डवों ने चन्दन, माला और उत्तम आसन आदि के द्वारा सदा ही उस शक्ति की पूजा की थी, वह प्रलयकालीन अग्नि के समान प्रज्वलित तथा अथर्वा अंगिरा द्वारा उत्पन्न हुई कृत्या के समान भयंकर थी। उसमें जलचर, थलचर और नभचर जीवों को भी नष्ट करने की शक्ति थी। विश्वकर्मा ने ब्रह्मचरादि नियमों का पालन करके उसका निर्माण किया था, वह ब्रह्मद्रोहियों का विरोध करनेवाली और लक्ष्यभेदन में अचूक थी। बल और प्रयत्न के द्वारा उसका वेग बहुत बढ़ गया था। युधिष्ठिर ने उसे भयंकर मंत्रों से अभिमंत्रित करके यत्न के साथ अपने शत्रु मद्रराज पर छोड़ा था। एक तो वह पूरा बल लगाकर छोड़ी गरी थी, दूसरे उसकी शक्ति को रोकना किसी के लिये भी असम्भव था, तो भी उसकी चोट सहने के लिये मद्रराज शल्य गरज उठे। किन्तु वह शक्ति उनकी छाती छेद थी हुई शरीर के मर्मस्थानों को विदीर्ण कर पृथ्वी में समा गई और राजा का विशाल यश भी अपने साथ ही लेती गयीउनका सारा अंग छिन्न_भिन्न हो गया और वे लोहूलुहान होकर पृथ्वी का आलिंगन करते हुए_से गिर पड़े।युधिष्ठिर शल्य की ओर। युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण के कथनानुसार मन_ही_मन शल्य का वध का निश्चय किया और रत्नजड़ित सुवर्णमय दण्डधारी एक शक्ति हाथ में ली। फिर क्रोध से जलती हुई आंखें उठाकर उसने मद्रराज की ओर देखा। उस समय मद्रराज शल्य धर्मराज की दृष्टि पड़ने से भस्म नहीं हो गये_यही सबसे बड़े आश्चर्य की बात मालूम हुई। तदनन्तर, युधिष्ठिर ने उस दमकती हुई भयंकर शक्ति को मद्रराज के ऊपर बड़े वेग से चलाया; जोर से फेंकने के कारण उससे आग की चिंनगारियां छूटने लगीं। पाण्डवों ने चन्दन, माला और उत्तम आसन आदि के द्वारा सदा ही उस शक्ति की पूजा की थी, वह प्रलयकालीन अग्नि के समान प्रज्वलित तथा अथर्वा अंगिरा द्वारा उत्पन्न हुई कृत्या के समान भयंकर थी। उसमें जलचर, थलचर और नभचर जीवों को भी नष्ट करने की शक्ति थी। विश्वकर्मा ने ब्रह्मचरादि नियमों का पालन करके उसका निर्माण किया था, वह ब्रह्मद्रोहियों का विरोध करनेवाली और लक्ष्यभेदन में अचूक थी। बल और प्रयत्न के द्वारा उसका वेग बहुत बढ़ गया था। युधिष्ठिर ने उसे भयंकर मंत्रों से अभिमंत्रित करके यत्न के साथ अपने शत्रु मद्रराज पर छोड़ा था। एक तो वह पूरा बल लगाकर छोड़ी गरी थी, दूसरे उसकी शक्ति को रोकना किसी के लिये भी असम्भव था, तो भी उसकी चोट सहने के लिये मद्रराज शल्य गरज उठे। किन्तु वह शक्ति उनकी छाती छेद थी हुई शरीर के मर्मस्थानों को विदीर्ण कर पृथ्वी में समा गई और राजा का विशाल यश भी अपने साथ ही लेती गयीउनका सारा अंग छिन्न_भिन्न हो गया और वे लोहूलुहान होकर पृथ्वी का आलिंगन करते हुए_से गिर पड़े।तदनन्तर, राजा युधिष्ठिर ने धनुष उठाया और तेज किते हुए भल्लों से एक ही क्षण में बहुत_से शत्रुओं का नाश कर डाला। उनके बाणों से आच्छादित होने के कारण आपके सैनिकों ने आंखें मीच लीं और आपस में ही एक_दूसरे को घायल करके वे बहुत कष्ट पाने लगे। उस समय उनके शरीरों से खून की धाराएं बह रही थीं और वे अपने अस्त्र_शस्त्र खोकर जीवन से हाथ धो रहे थे। मद्रराज का एक छोटा भाई था, जो अभी नवयुवक था, वह सभी गुणों में अपने भाई की बराबरी करता था। शल्य के मारे जाने पर वह पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर पर चढ़ आया और बड़ी शीघ्रता के साथ नाराचों का निशाना बनाने लगा। तब धर्मराज ने उसे छः बाणों से बींध डाला और दो क्षुराकार सायकों से उसके धनुष तथा ध्वजा को भी काट गिराया। फिर एक तेज किये हुए भल्ल के द्वारा उन्होंने उसका मस्तक काट लिया। तब खून से रंगा हुआ उसका धड़ रथ से नीचे गिर पड़ा। यह देखकर कौरव_सेना में भगदड़ पड़ गयी। उस समय सात्यकि भागते हुए कौरवों पर बाण बरसाने लगा, किन्तु कृतवर्मा ने वहां पहुंचकर उसे आगे बढ़ने से रोक लिया। अब वे ही दोनों एक_दूसरे पर बाणों की बौछार करने लगे। कृतवर्मा ने दस बाणों से सात्यकि को और तीन से उसके घोड़ों को घायल कर दिया; फिर एक बाण मारकर उसके धनुष को काट डाला। सात्यकि ने उसे फेंककर दूसरा धनुष उठाया और कृतवर्मा की छाती में दब बाण मारे; फिर अनेकों भल्लों के प्रहार से उसके रथ और जूए की ईषा को काट डाला। यही नहीं, उसके घोड़ों, पार्श्व रक्षकों तथा सारथि को भी मौत के घाट उतार दिया। कृतवर्मा को रथहीन देख कृपाचार्य ने उसे अपने रथ पर बिठा लिया और दूर हटा लें गये। अब दुर्योधन की सेना फिर भागने लगी। पाण्डवों को वेग से आते  और अपनी सेना को भागते देख दुर्योधन ने अकेले ही समस्त पाण्डवों को रोका। वह रथ पर बैठे हुए पाण्डुपुत्रोंपर, धृष्टद्युम्न पर और अनर्थ देश के राजा पर बाणों की वर्षा करने लगा। जैसे मरणधर्मा मनुष्य अपनी मौत को नहीं टाल सकते, उसी प्रकार ये पाण्डव महारथी दुर्योधन को नहीं लांघ सके। इसी बीच में कृतवर्मा भी दूसरे रथ पर बैठकर वहां आ पहुंचा। तब युधिष्ठिर ने चार बाणों से कृतवर्मा के चारों घोड़ों को यमलोक पहुंचा दिया और तेज किये हुए छः भल्लों से कृपाचार्य को भी घायल किया। घोड़े मारे जाने से कृतवर्मा रथहीन हो गया_यह देख अश्वत्थामा अपने रथ पर बिठाकर युधिष्ठिर से दूर हटा ले गया। महाराज ! आप और आपके पुत्र के अन्याय से इस प्रकार शेष युद्ध हुआ था। युधिष्ठिर के द्वारा शल्य के मारे जाने पर सब पाण्डव प्रसन्न हो शंख बजाने लगे। सबने राजा युधिष्ठिर की भूरि भूरि प्रशंसा की। नाना प्रकार के बाजे बजाते ग्रे, जिससे चारों ओर की पृथ्वी गूंज उठी।

Sunday, 19 March 2023

शल्य का पराक्रम तथा शल्य के साथ युधिष्ठिर का युद्ध



संजय कहते हैं_महाराज ! एक ओर दुर्योधन और धृष्टद्युम्न में महान् संग्राम छिड़ा था, जिनमें बाणों और शक्तियों का ही अधिक प्रहार हो रहा था। दोनों ही ओर से सायकों की सहस्त्रों धाराएं बरस रही थीं। पहले दुर्योधन ने ही धृष्टद्युम्न को पांच बाण मारे, तब धृष्टद्युम्न ने भी सत्तर बाण मारकर दुर्योधन को विशेष पीड़ा पहुंचाती। यह देख उसके भाइयों ने बहुत बड़ी सेना के साथ आकर धृष्टद्युम्न को चारों ओर से घेर लिया। गिर जाने पर भी वह अस्त्र संचालन में अपने हाथों की फुर्ती दिखाता हुआ युद्ध में निर्भय विचर रहा था। दूसरी ओर शिखण्डी अपने साथ प्रभद्रकों की सेना लेकर कृपाचार्य और कृतवर्मा से युद्ध कर रहा था। वहां भी प्राणों की बाजी लगाकर भयंकर संग्राम हो रहा था। इधर, राजा शल्य बाणों की झड़ी लगाकर सात्यकि तथा भीमसेन सहित समस्त पाण्डवों को पीड़ित कर रहे थे। साथ ही वे नकुल और सहदेव से भी भिड़े हुए थे। जब शल्य अपने बाणों से पाण्डव महारथियों को आहत कर रहे थे, उस समय उन्हें कोई अपना रक्षक नहीं दिखाती देता था।इसी समय शूरवीर नकुल ने अपने मामा ( शल्य ) पर बड़े वेग से धावा किया और बाणों की वर्षा से उन्हें आच्छादित कर दिया। फिर हंसते_हंसते उसने दस बाणों से उसने शल्य की छाती छेद डाली। अपने भांजे के द्वारा पीड़ित होकर  शल्य भी उसे तीखे बाणों का निशाना बनाने लगे। यह देखकर राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, सात्यकि और माद्री नन्दन सहदेव शल्य पर टूट पड़े। सेनापति शल्य ने तुरंत ही उन सबका सामना किया। उन्होंने युधिष्ठिर को तीन, भीमसेन को पांच, सात्यकि को सौ और सहदेव को तीन बाणों से बींध डाला।इसके बाद मद्रराज ने क्षुरप्र मारकर नकुल के धनुष को काट दिया। तब नकुल ने तुरंत ही दूसरा धनुष लेकर शल्य के रथ को बाणों से भर दिया। साथ ही, युधिष्ठिर और सहदेव ने भी उनकी छाती में दस_दस बाण मारे। फिर भीमसेन ने साठ और सात्यकि ने दस साधकों से उन्हें घायल कर दिया। अब मद्रराज ने क्रोध में भरकर सात्यकि को पहले नौ और फिर सत्तर बाणों से बींध डाला। इसके बाद उसके धनुष को काटकर रथ के घोड़ों को भी मौत के घाट उतार दिया। तत्पश्चात् उन्होंने नकुल, सहदेव, भीमसेन और युधिष्ठिर को भी दस बाणों से घायल किया। इस महान् संग्राम में मैंने शल्य का अद्भुत पराक्रम देखा; वे अकेले ही पाण्डवों के समस्त योद्धाओं के साथ युद्ध कर रहे थे।तदनन्तर वे युधिष्ठिर के बहुत निकट आ गये और उन्हें अपने बाणों से पीड़ित करके पुनः भीम पर टूट पड़े। उस समय राजा शल्य की फुर्ती तथा अस्त्र_संचालन की कुशलता देखकर आपके तथा शत्रु पक्ष के योद्धाओं ने उनकी बहुत प्रशंसा की। शल्य के बाणों से अत्यंत घायल होकर जब पाण्डव योद्धा बहुत कष्ट पाने लगे तो युधिष्ठिर के पुकारने और मना करने पर भी वे युद्ध का मैदान छोड़कर भाग चले।  इससे धर्मराज को बड़ा अमर्ष हुआ, उन्होंने निश्चय कर लिया कि मेरी विजय हो या मृत्यु, युद्ध अवश्य करूंगा।'फिर तो वे अपने पुरुषार्थ का भरोसा करके शल्य को बाणों से पीड़ित करने लगे तथा भगवान् श्रीकृष्ण तथा अपने सब भाइयों को बुलाकर बोले_'मैं अपने मन की बात बताता हूं। मेरे पहियों की रक्षा करनेवाले माद्री कुमार नकुल और सहदेव अब क्षत्रिय धर्म को सामने रखकर अपने मामा से अच्छी तरह लड़ें; या तो शल्य मुझे आज मार डालेंगे या मैं ही उनका वध करूंगा। मेरी इस बात को तुमलोग सत्य समझो। इस समय पहियों की रक्षा करें और धृष्टद्युम्न बातें की। अर्जुन पृष्ठभाग की रक्षा में रहें और भीमसेन मेरे आगे_आगे चलें। ऐसी व्यवस्था हो जाने पर मैं इस महासमर में शल्य से अधिक प्रबल हो जाऊंगा।'राजा की आज्ञा पाकर सबने वैसा ही किया; क्योंकि सभी उनका प्रिय करनेवाले थे। फिर तो पाण्डव सेना में बड़ा उत्साह छा गया। पांचाल, सोमक तथा मत्स्यदेशीय वीर अत्यन्त हर्ष में भर गये। युधिष्ठिर ने 'विजय अथवा मृत्यु की प्रतिज्ञा करके मद्रराज पर चढ़ाई की। उस समय शंख और भेरियां बजने लगीं। पांचाल योद्धा सिंहनाद करते हुए मद्रराज पर टूट पड़े। परन्तु आपके पुत्र दुर्योधन तथा मद्रराज शल्य ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। अब शल्य युधिष्ठिर पर बाणों की बौछार करने लगे। दुर्योधन भी सहायकों की वर्षा करता हुआ अपनी अस्त्र विद्या का परिचय देने लगा।उस समय भीमसेन दुर्योधन से भिड़ गये। धृष्टद्युम्न, सात्यकि, नकुल और सहदेव ने शकुनि आदि वीरों का सामना किया। फिर तो घमासान युद्ध होने लगा। दुर्योधन ने भीमसेन की ध्वजा काट दी। उनके धनुष के टुकड़े_टुकड़े कर डाले। अब भीमसेन ने शक्ति का प्रहार करके दुर्योधन की छाती छेद डाली। वह मूर्छित होकर रथ की बैठक में गिर पड़ा। दुर्योधन के मोहाच्छन्न हो जाने पर भीम ने क्षुरप्र से उसके सारथि का सिर धड़ से अलग कर दिया। सारथि के मरते ही उसके घोड़े जोर से भागे, उस समय हाहाकार मच गया। अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा आपके पुत्र को बचाने के लिये दौड़े।उधर, युधिष्ठिर तेज किये हुए भल्लों से हजारों कौरव योद्धाओं का संहार करने लगे।वे जिस सेना की ओर जाते उसी को बाणों से मार गिराते थे। घोड़े, सारथि, ध्वजा और रथ के सहित रथियों का, घुड़सवारों सहित घोड़ों का तथा हजारों पैदलों का उन्होंने सफाया कर डाला। फिर चारों ओर बाणों की झड़ी लगाते हुए वे मद्रराज शल्य की ओर दौड़े।इसी बीच में शल्य ने युधिष्ठिर को सौ बाण मारे और उनका धनुष भी काट दिया। तब युधिष्ठिर ने दूसरा धनुष लेकर शल्य को तीन सौ बाणों से बींध डाला और क्षुरप्र मारकर उनके धनुष को भी खण्डित कर दिया। फिर वे दो बाणों से उनके पार्श्वरक्षक तथा सारथि को भी मौत के घाट उतारकर एक भल्ल से उनके रथ की ध्वजा काट दी। यह देखकर दुर्योधन की सेना में भगदड़ पड़ गयी। मद्रराज को इस दुर्बलता में पड़े देख अश्वत्थामा दौड़ा आया और उन्हें अपने रथ में बिठाकर तेजी से भाग गया। उस समय युधिष्ठिर सिंह के समान गर्जना करने लगे और मद्रराज शल्य विधिपूर्वक सजाते हुए दूसरे रथ पर बैठकर  पुनः उनका सामना करने आ गये। शल्य के रथ पर निशाना बेधनेवाली मशीन भी थी, जिसे देखते ही शत्रुओं के रोंगटे खड़े हो जाते थे।

Thursday, 9 March 2023

राजा शल्य का पराक्रम, अर्जुन_अश्त्थामा का युद्ध तथा राजा सुरथ का वध

संजय कहते हैं_महाराज ! मद्रराज शल्य जब युधिष्ठिर को पीड़ा देने लगे, उस समय सात्यकि, भीमसेन, नकुल और सहदेव ने आकर शल्य को घेर लिया और उन्हें बींधना आरंभ कर दिया। भीमसेन ने शल्य को पहले एक और फिर सात बाणों से घायल किया। सात्यकि ने उन्हें सौ बाण मारकर सिंह के समान गर्जना की। नकुल ने पांच और सहदेव ने सात बाणों से शल्य को भींचकर पुनः सात सायकों से घायल किया। इन महारथियों से पीड़ित होकर भी शूरवीर शल्य रण में डटे रहे। उन्होंने सात्यकि को पच्चीस भीमसेन को छिहत्तर और नकुल को सात बाणों से बींध दिया। इसके बाद सहदेव के बाण सहित धनुष को काटकर उसे इक्कीस सायकों से घायल किया। सहदेव ने भी दूसरा थनुष लेकर मामाजी को पांच बाण मारे। फिर एक बाण से उनके सारथि को घायल किया, इसके बाद पुनः तीन बाण मारकर शल्य को पीड़ित कर दिया। तदनन्तर भीमसेन ने सत्तर, सात्यकि ने नौ तथा धर्मराज ने साठ बाण मारे। फिर शल्य ने भी प्रत्येक को पांच_पांच बाण मारकर बींध डाला। तब सात्यकि ने क्रोध में भरकर शल्य पर तोमर का प्रहार किया। इस प्रकार पांच वीरों के चलाते हुए पांच अस्त्र एक ही साथ शल्य की ओर छूटे, किन्तु शल्य ने अपने शस्त्रों से मारकर उन सबको पीछे हटा दिया और सिंह के समान गर्जना की। शत्रु की यह गर्जना सात्यकि से नहीं सही गयी। उन्होंने दो बाणों से मद्रराज को और तीन से उनके सारथि को बींध डाला। तब शल्य ने क्रोध में भरकर पाण्डव_पक्ष के उन सभी महारथियों को दस_दस बाण मारे। इस प्रकार शल्य के द्वारा बाधा पाकर वे महारथी अब उनके सामने नहीं ठहर सके। महाराज का यह पराक्रम देखकर दुर्योधन ने समझ लिया कि अब पाण्डव, पांचाल और सृंजय_वीर मरे हुए के ही समान है। तदनन्तर, धर्मराज ने एक क्षुरप्र के द्वारा शल्य के चक्र रक्षक को मार डाला। यह देख शल्य ने बाणों की झड़ी लगाकर पाण्डव_सैनिकों को आच्छादित कर दिया। उस समय राजा युधिष्ठिर सोचने लगे कि 'आज के युद्ध में मैं भगवान श्रीकृष्ण की कही हुई ( शल्य को मार डालने की ) बात कैसे पूर्ण कर सकता हूं ? कहीं ऐसा न हो कि मद्रराज क्रोध में भरकर मेरी सारी सेना का संहार कर डालें ?' वे इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि घोड़े, हाथी तथा रथियों की सेना के साथ पाण्डव_सैनिक वहां आ पहुंचे और महाराज को सब ओर से पीड़ित करने लगे। किन्तु मद्रराज शल्य ने पाण्डवों द्वारा की हुई अस्त्र वर्षा को शान्त कर दिया। इसके बाद हम लोगों ने राजा शल्य की बाणवृष्टि देखी। उनके बाम आसमान से खिलती हुई टिड्डियों के समान जान पड़ते थे। उस समय आकाश सायकों से ठसाठस भर गया था तथा घना अन्धकार छा जाने के कारण पाण्डवों की या हमारे पक्ष की कोई भी वस्तु सूझ नहीं पड़ती थी। मद्रराज की बाण_वर्षा से पाण्डव_सेना विचलित होती देख सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। युधिष्ठिर तथा भीमसेन आदि महारथी यद्यपि बहुत अधिक घायल हो चुके थे, तो भी वे उस युद्ध में शल्य को छोड़कर न जा सके। वे लड़ते ही रहे। दूसरी ओर, अश्वत्थामा तथा उसके पीछे चलने वाले त्रिगर्त देश के महारथियों ने बहुत_से बाण मारकर अर्जुन को घायल किया। तब धनंजय ने तीन बाणों से द्रोण कुमार को और दो_दो बाणों से अन्य महारथियों को बींध डाला। तत्पश्चात् उन्होंने पुनः बाण बरसाना आरंभ किया। इससे आपके पक्ष के योद्धा बहुत घायल हो गये। इसके बाद उन्होंने भी इतनी बाणवर्षा की कि अर्जुन के रथ की बैठक थोड़ी ही देर में भर गयी। श्रीकृष्ण और अर्जुन के सारे अंग बाणों से बींध गये महाराज ! उस समय आपके योद्धाओं ने अर्जुन की जो दशा की, वैसी न तो पहले देखी गयी और न सुनी ही गयी थी। उनके रथ में सब ओर से विचित्र पंखों वाले बाण धंसे हुए थे। तदनन्तर अर्जुन भी आपकी सेना पर बाण_वर्षा करने लगे। उनके नामाक्षरों से अंकित बाणों की मार खाते हुए कौरव_सैनिकों को सबकुछ अर्जुनमय ही प्रतीत होने लगा। अर्जुन रूपी आग आपके योद्धा रूपी ईंधनों को बड़े वेग से भस्म करने लगी। साधकों की चोट से बचाने के लिये जिनपर लोहे के आवरण पड़े थे, ऐसे_ऐसे दो हजार रथों का अर्जुन ने विध्वंस कर डाला। जैसे प्रलयकालीन अग्नि इस चराचर जगत् को दुग्ध करके धूमरहित होकर दमकने लगती है, उसी प्रकार पार्थ भी शत्रुओं का संहार करके देदीप्यमान हो रहे थे। पाण्डु नन्दन का यह पराक्रम देख अश्वत्थामा ने सामने आकर उन्हें आगे बढ़ने से रोका। फिर तो उन दोनों में भीषण बाणवर्षा होने लगी और बहुत देर तक एक_सा ही युद्ध चलता रहा। फिर अश्वत्थामा ने बारह बाणों से अर्जुन को और दस से श्रीकृष्ण को बींध डाला। तब अर्जुन ने भी हंसकर गाण्डीव के टंकार की और बाणों से गुरुपुष्य की पूजा करके उसके घोड़ों और सारथि को मार डाला। अब अश्वत्थामा ने उसी रथ पर खड़ा हो एक लोहे का मूसल लेकर उसे अर्जुन पर दे मारा, किन्तु अर्जुन ने सहसा उसके साथ टुकड़े कर डाले। यह देख द्रोण कुमार ने कुपित हो अर्जुन पर एक भयंकर परिघ का प्रहार किया; परन्तु पार्थ ने पांच बाण मारकर उसके भी टुकड़े_टुकड़े कर डाले। साथ ही तीन भल्लों से द्रोण कुमार को खूब घायल किया। अर्जुन के प्रहार से अत्यंत आहत हो जाने पर भी द्रोण कुमार को घबराहट नहीं हुई, वह अपने पुरुषार्थ का भरोसा करके रण में डटा रहा और पांचाल देश के महारथी सुरत पर बाणों को सही वर्षा करने लगा। सुरत भी अश्वत्थामा की ओर दौड़ा और उसके ऊपर बाणों की बौछार करने लगा। यह देख अश्वत्थामा को बड़ा क्रोध हुआ, उसकी भौंहों में तीन जगह बल पड़ गये। अब उसने धनुष पर कालदण्ड के समान भयंकर नारायण चढ़ाया और उसे सुरथ को लक्ष्य करके छोड़ दिया। वह नारायण सुरत की छाती छेदकर भीतर घुस गया और सुरत प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। वीरवर सुरत के मारे जाने पर अश्वत्थामा उसी के रथ पर जा बैठा और संशप्तकों की सेना साथ लेकर अर्जुन से युद्ध करने लगा। दुपहरी का वक्त था, उस समय अर्जुन का शत्रुओं के साथ महान् संग्राम हुआ जो जो यमलोक की आबादी बढ़ाने वाला था। वहां कौरव योद्धाओं का पराक्रम देखकर तथा उनके साथ जो अर्जुन अकेले ही युद्ध कर रहे थे, इसको लक्ष्य करके हमलोगों को बड़ा आश्चर्य हो रहा था।



Friday, 3 March 2023

शल्य का युधिष्ठिर और भीमसेन के साथ युद्ध, दुर्योधन द्वारा चेकितान तथा युधिष्ठिर द्वारा द्रुमसेन का वध

संजय कहते हैं_ महाराज ! उस समय सेनापति शल्य ने आपकी भागती हुई सेना को खड़ी किया और भयंकर सिंहनाद तथा धनुष की टंकार करते हुए वे शत्रुओं का सामना करने के लिये डट गये। राजा शल्य से सुरक्षित होने पर कौरव_सैनिक निश्चिंत हो उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़े हो ग्रे और युद्ध की इच्छा से शत्रुओं की ओर बढ़ने लगे। उधर से सात्यकि, भीमसेन और नकुल_सहदेव आदि पाण्डव_योद्धा युधिष्ठिर को आगे करके चढ़ आते और जोर_जोर से सिंहनाद करने लगे। तदनन्तर अर्जुन ने भी संशप्तकों का संहार करके कौरव_सेना पर धावा किया। इसी प्रकार धृष्टद्युम्न आदि वीर भी तीखे साधकों की वर्षा करते हुए आपकी सेना पर चढ़ आये। उनकी मार पड़ने से कौरव_सैनिक मूर्छित हो गये। उन्हें दिशा और विदिशाओं का भी ज्ञान न रहा। पाण्डवों की बाणों से कौरव_सेना के मुख्य_मुख्य वीर मारे गये। ऐसे ही आपके पुत्रों ने भी पाण्डव_पक्ष के सैकड़ों और हजारों वीरों का संहार कर डाला। उस समय आपस की मार से दोनों ओर की सेनाएं अत्यंत संतप्त और व्याकुल हो उठीं। युद्ध करनेवाले सैनिक भागने लगे, हाथी चिघ्घार करने लगे। पैदल सिपाही कराहने और चिल्लाने लगे। समस्त प्राणियों का भयंकर संहार होने लगा। पाण्डव बलवान थे, वे जब प्रहार करते तो उनका निशाना कभी खाली नहीं जाता था; इसलिये कौरव_सेना बहुत कष्ट पाने लगी। आपकी सेना को क्लेश में पड़ी देख राजा शल्य उसका उद्धार करने के लिये आगे बढ़े। पाण्डव भी मद्रराज के पास पहुंचकर उन्हें तीखे बाणों से बींधने लगे। तब महाबली मद्रनरेश ने युधिष्ठिर के सामने ही सैकड़ों तीखे बाण मारकर पाण्डव_सेना का संहार आरम्भ किया। उस समय भांति_भांति के अपशकुन होने लगे। पर्वतोंसहित पृथ्वी डोलने लगी। धीरे_धीरे युद्ध का रूप भयंकर हो गया। महाबली शल्य ने द्रौपदी के सब पुत्रों को, नकुल_सहदेव को और धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा सात्यकि को बींध डाला। उन्होंने इनमें से प्रत्येक वीर को दस_दस बाण मारे। तत्पश्चात् शल्य ने बाणों की झड़ी लगा दी। फिर तो प्रभद्रक तथा सोमा क्षत्रिय हजारों की संख्या में गिरते दिखाती देने लगे। उनके सायकों की चोट खाकर कितने ही हाथी, घोड़े, पैदल और रथी योद्धा धराशाही हो गये। कितनों को मूर्छा आ गई और बहुतेरे चीखने_चिल्लाने लगे। उस समय महाबली मद्रनरेश सिंह के समान दहाड़ रहे थे। शल्य के बाणों से पीड़ित हुई पाण्डव_सेना रक्षा के लिये महाराज युधिष्ठिर के बाद भाग गयी। इस प्रकार सेना को कुचलकर वे युधिष्ठिर को पीड़ा देने लगे। यह देख युधिष्ठिर ने तीक्ष्ण बाणों की वर्षा करके शल्य को आगे बढ़ने से रोक दिया। तब शल्य ने उनपर एक भयंकर बाण चलाया। वेग से छूटा हुआ वह बाण युधिष्ठिर को घायल करके पृथ्वी पर जा पड़ा। अब भीमसेन को क्रोध चढ़ा। उन्होंने शल्य को सात बाण मारकर बिंधा डाला। इसी तरह सहदेव ने पांच और नकुल ने दस बाणों से उन्हें घायल किया। द्रौपदी के पुत्रों ने भी बड़े वेग से उनपर बाणों की वृष्टि की। पर यह आप परशल्य को बाणवर्षा से पीड़ित होते देख कृतवर्मा, कृपाचार्य, उलूक, शकुनि, अश्वत्थामा तथा आपके पुत्र_ये सब एकत्रित होकर उनकी रक्षा करने लगे। कृतवर्मा ने तीन बाणों से भीमसेन को बींध डाला। फिर बाणों की बौछार से धृष्टद्युम्न को घायल कर दिया। शकुनि ने द्रौपदी के पुत्रों का तथा अश्वत्थामा ने नकुल_सहदेव का सामना किया। दुर्योधन श्रीकृष्ण और अर्जुन के मुकाबले में खड़ा हुआ और अपने बाणों से उन दोनों को बींधने लगा। इस प्रकार आपके पक्ष के योद्धाओं और शत्रुओं में सैकड़ों द्वन्द युद्ध हुए। सभी भयंकर और विचित्र थे। तदनन्तर, महाराज शल्य ने सहदेव के घोड़ों को मार डाला। तब सहदेव ने भी तलवार उठाती और शल्य के पुत्र का सिर धड़ से अलग कर दिया। उधर अश्वत्थामा ने किंचित् मुस्कराकर द्रौपदी के पुत्रों में से प्रत्येक को दस_दस बाण मारे और कृतवर्मा ने भीमसेन के घोड़ों को यमलोक पठा दिया। घोड़ों के मरने पर भीमसेन रथ से उतर पड़े और हाथ में कालदण्ड के समान गदा लेकर उन्होंने कृतवर्मा के घोड़ों तथा रथ की धज्जियां उड़ाई दीं। कृतवर्मा उस रथ से कूदकर भाग गया।
इधर, शल्य भी सोमक और पाण्डव_योद्धा का संहार करते_करते तीखे बाणों से युधिष्ठिर को पीड़ा देने लगे। यह देख भीमसेन वज्र के समान गदा लिये शल्य पर टूट पड़े और उनके चारों घोड़ों को मार गिराया। तब शल्य ने कुपित होकर भीमसेन की छाती में तोमर से प्रहार किया। और अ इससे उनका कवच कट गया और तोमर से छाती छिद गई। किन्तु भीमसेन इससे तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने वही तोमर अपनी छाती से निकालकर मद्रराज के सारथि की छाती पर दे मारा। उसके प्रहार से सारथि का मर्म विदीर्ण हो गया और वह रक्त वमन करता हुआ राजा के सामने ही गिर पड़ा। मद्रराज रथ छोड़कर दूर हट गये और लोहे की गदा हाथ में लेकर अविचल भाव से खड़े हो गये। भीमसेन भी बहुत जल्दी गदा लेकर शल्य पर टूट पड़े। महाराज ! संसार में मद्रराज शल्य अथवा यदुनंदन बलराम जी के सिवा दूसरा ऐसा कोई योद्धा नहीं है, जो गदाधारी भीम का वेग सह सके। इसी तरह शल्य का वेग भी भीमसेन के सिवा दूसरा कोई सह नहीं सकता था। उन दोनों में युद्ध छिड़ गया। मद्रराज ने अपनी गदा से भीमसेन की गदा पर चोट की तो वह प्रज्वलित_सी हो उठी, उससे आग की लपटे निकलने लगीं। इस प्रकार भीमसेन की गदा के आघात से शल्य की गदा भी अंगारे बरसाने लगी_यह देख सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। गदा की मार से एक ही क्षण में दोनो के शरीर घायल हो गये, दोनों ही लोहूलुहान हो उठे। मद्रराज की गदा से बातें और दायें भाग में अच्छी तरह चोट खाने पर भी महाबाहु भीमसेन  भी विचलित नहीं हुए। पर्वत के समान स्थिर भाव से खड़े रहे। इसी तरह भीम की गदाका बारंबार आघात होने पर भी शल्य को जरा भी घबराहट नहीं हुई। वे दोनों जब एक_दूसरे पर गदा का प्रहार करते थे, उस समय चारों दिशाओं में वज्रपात के समान आवाज सुनायी देती थी। उन दोनों का पराक्रम अलौकिक था। वे लड़ते_लड़ते आठ कदम आगे बढ़ आते और लोहे के डंडे उठाकर एक_दूसरे को मारने लगे। उस समय परस्पर प्रहार करते हुए दोनों वीर मण्डलाकार विचरने और अपना_अपना विशेष कौसल प्रदर्शित करते थे। इसके बाद वे पुनः गदाएं उठाकर परस्पर प्रहार करने लगे। इस तरह लड़ते_लड़ते जब अच्छी तरह घायल हो गये तब दोनों एक ही साथ रणभूमि में गिर पड़े। उस समय दोनों पक्षों की सेनाओं में हाहाकार मच गया। भीम और शल्य_ दोनों के मर्मस्थानों में गहरी चोट लगी थीं, इसलिये दोनों ही अत्यंत व्याकुल हो गये थे।
इतने में ही कृपाचार्य आये और शल्य को अपने रथ में बिठाकर तुरंत रणभूमि से बाहर ले गये। इधर भीमसेन पलक मारते_मारते होश में आकर उठ खड़े हुए और गदा हाथ में ले मद्रराज को युद्ध के लिये ललकारने लगे तब आपके सैनिक नाना प्रकार के अस्त्र_शस्त्र लेकर पाण्डव_सेना पर टूट पड़े। आपकी सेना को आगे बढ़ते देखकर पाण्डव_योद्धा भी सिंहनाद करते हुए दुर्योधन आदि कौरवों पर चढ़ आये। उस समय आपके पुत्र ने एक प्राश मारकर चेकितान की छाती चीर डाली, वह खून से नहा उठा और प्राणहीन होकर रथ की बैठक में गिर पड़ा। यह देख पाण्डव महारथी आपकी सेना पर बाणवर्षा करने लगे तथा कृपाचार्य, कृतवर्मा और शकुनि_ये मद्रराज को आगे करके धर्मराज युधिष्ठिर से युद्ध करने लगे। शल्य ने युधिष्ठिर को मार डालने की इच्छा से उन्हें तीखे बाणों से बींध डाला। तब युधिष्ठिर ने भी मुस्कुराते हुए चौदह नारायण हाथ में लिये और उनसे शल्य के मर्मस्थानों को बींध डाला। अब शल्य क्रोध में भर गये। उन्होंने राजा युधिष्ठिर की प्रगति रोक दी और अनेकों बाणों से उन्हें घायल कर दिया, युधिष्ठिर ने भी तेज किये हुए सहायकों से शल्य को घायल किया; फिर चन्द्रसेन को सत्ताइस और उनके सारथि को नौ बाणों से घायल करके द्रुमसेन को चौसठ बाणों से मार डाला।
चक्र रक्षक के मारे जाने पर शल्य ने पच्चीस चेदि योद्धाओं का सफाया कर डाला; फिर सात्यकि को पच्चीस, भीमसेन को पांच तथा नकुल_सहदेव को सौ बाणों से घायल कर डाला।   राजा शल्य जब इस प्रकार रणभूमि में विचर रहे थे, उस समय उनके ऊपर युधिष्ठिर ने अनेकों तीक्ष्ण बाणों का प्रहार किया। साथ ही उनके रथ की ध्वजा भी काट दी। ध्वजा गिरी हुई देख शल्य को बड़ा क्रोध हुआ और वे शत्रुओं पर बाणों की बौछार करने लगे। उन्होंने सात्यकि, भीम, नकुल और सहदेव_ इनमें से हरेक को पांच_पांच बाणों से घायल कर दिया। फिर युधिष्ठिर की छाती पर बाणों का जाल_सा फैलाकर उन्हें खूब पीड़ित किया।




Saturday, 25 February 2023

शल्य के सेनापतित्व में युद्ध का आरंभ और नकुल द्वारा कर्ण के शेष तीन पुत्रों का वध

संजय कहते हैं_महाराज ! यह रात बीत जाने पर दुर्योधन ने आपके सब सैनिकों को आज्ञा दी_'अब सब महारथी तैयार हो जायं।' राजा की आज्ञा पाकर भारी सेना कवच आदि से सुसज्जित हो गयी। बाजे बजने लगे। योद्धाओं का सिंहनाद होने लगा। उस समय मरने से बचे हुए आपके सैनिक मौत की परवा न करके रणभूमि की ओर कूच करते दिखायी देने लगे। मद्रराज शल्य को सेना का नायक बनाकर महारथियों ने संपूर्ण सेना के कई विभाग किये और सबको युद्धभूमि में यथास्थान खड़ा किया। फिर कृपाचार्य, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, शल्य शकुनि तथा अन्य राजाओं ने मिलकर यह शपथ ली कि 'हममें से कोई भी अकेला होकर पाण्डवों से न लड़ें, जो अकेला ही उनसे लड़ेगा अथवा जो किसी लड़ते हुए योद्धा को अकेला छोड़ देगा, उसे पांच महापातक और पांच उपपातक लगेंगे। इसलिये सब एक_दूसरे की रक्षा करते हुए साथ रहकर युद्ध करें।' इस प्रकार शपथ लेकर समस्त महारथियों ने मद्रराज को आगे किया और बड़ी शीघ्रता के साथ शत्रुओं पर चढ़ाई कर दी। इसी तरह पाण्डव भी सेना का व्यूह बनाकर युद्ध की इच्छा से कौरवों पर चढ़ आये। उनकी सेना क्षुब्ध हुए समुद्र की भांति गर्जना कर रही थी। पाण्डवों का सिंहनाद सुनकर आपके पुत्रों के मन में डर समा गया। तब मद्रराज शल्य ने उन्हें धीरज बंधाया और सर्वतोभद्र नामक व्यूह बनाकर पाण्डवों के ऊपर धावा किया। उस समय वे सिंधुदेश के घोड़ों से जुते हुए एक विशाल रथ पर विराजमान थे। उनके साथ मद्रदेश के वीर तथा कर्ण के अजेय पुत्र भी थे। उनके बाम भाग में त्रिगर्तों की सेना से घिरा हुआ कृतवर्मा था। दक्षिण भाग में शक और यवनों के साथ कृपाचार्य थे। तथा पृष्ठभाग में कम्बोजों को साथ लिए अश्वत्थामा मौजूद था। मध्यभाग में दुर्योधन था, जिसकी रक्षा में प्रधान_प्रधान कौरव खड़े थे। वहीं शकुनि भी था, जो घुड़सवारों की विशाल सेना से घिड़ा हुआ था। महारथी कैतव्य भी संपूर्ण सेना के साथ जा रहा था। उधर पाण्डवों ने भी मोर्चाबंदी कर रखी थी। उन्होंने अपनी सेना को तीन भागों में बांटा था; उन तीनों के अध्यक्ष थे_धृष्टधुम्न, शिखण्डी और सात्यकि। इन लोगों ने शल्य की सेना पर धावा किया। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिर भी शल्य का वध करने की इच्छा से अपनी सेना के साथ उन्हीं पर जा चढ़े। अर्जुन ने कृतवर्मा और संशप्तकों पर चढ़ाई की। भीमसेन और सोमकों का कृपाचार्य पर धावा हुआ। नकुल_सहदेव ने शकुनि तथा उलूक पर आक्रमण किया। इसी प्रकार आपके पक्ष के कई हजार सैनिक भी पाण्डवों पर जा चढ़े।
धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! भीष्म, द्रोण तथा कर्ण के मारे जाने के पश्चात् मेरे पुत्रों तथा पाण्डवों के पास कितनी_कितनी सेना बच गयी थी ? संजय ने कहा_महाराज ! शल्य के सेनापतित्व में जब हमलोग युद्ध के लिये उपस्थित हुए थे, उस समय हमारे पास ग्यारह हजार रथ, दस हजार सात सौ हजार हाथी, दो लाख घोड़े तथा तीन करोड़ पैदल थे और पाण्डव के छः हजार रथ, छः हजार हाथी, दस हजार घोड़े तथा एक करोड़ पैदल मौजूद थे। बस, इतनी ही सेना बच गयी थी और यही और यही युद्ध के लिये उपस्थित थीं। प्रात:काल सूर्योदय होते ही दोनों ओर के योद्धा एक_दूसरे को मार डालने की इच्छा से आगे बढ़े।   फिर तो दोनों दलों में अत्यंत भयंकर युद्ध छिड़ गया। हज़ारों घुड़सवार, पैदल, रथी और हाथी सवार पराक्रम दिखाते हुए एक_दूसरे से भिड़ गये। महाराज ! पाण्डवों की मार पड़ने से आपकी सेना जहां_की_तहां बेहोश हो_होकर गिरने लगी। भीमसेन और अर्जुन ने आपके सैनिकों को मूर्छित करके शंख बजाये और सिंहनाद करने लगे। इसी समय धृष्टद्युम्न तथा शिखण्डी ने धर्मराज को आगे करके शल्य पर धावा किया। माद्रीकुमार नकुल और सहदेव भी आपकी सेना पर टूट पड़े। फिर पाण्डवों ने कौरव_सेना को अपने बाणों से बहुत घायल कर दिया। अब कौरव_वाहिनी आपके पुत्रों के देखते_देखते चारों ओर भागने लगी। सबको अपनी_अपनी जान बचाने की फिक्र पड़ गयी। लोगों ने अपने प्यारे पुत्रों और भाइयों को छोड़ दिया; पितामहों और मामाओं की परवा न की, भांजों तथा अन्य संबंधियों का भी ख्याल नहीं किया। सब अपने घोड़ों और हाथियों को जल्दी_जल्दी हांकते हुए भाग खड़े हुए।
सेना को इस तरह भागती देख प्रतापी मद्रराज ने अपने सारथि से कहा_'मेरे घोड़ों को शीघ्रता पूर्वक आगे बढ़ाओ और जहां ये राजा युधिष्ठिर खड़े हैं, वहीं मुझे ले चलो। आज संग्राम में ये मेरे सामने ठहर नहीं सकते।' सेनापति की आज्ञा से सारथि ने उनके रथ को राजा युधिष्ठिर के पास पहुंचा दिया। वहां पहुंचकर बड़े वेग से आक्रमण करती हुई पाण्डवों की विशाल सेना को शल्य ने अकेले ही रोक लिया। उस समय महाराज को समरभूमि में डटे हुए देख भागने वाले कौरव योद्धा भी मृत्यु की परवा न करके लौट आये। इसी बीच में नकुल ने चित्रसेन पर धावा किया। वे दोनों योद्धा एक_दूसरे पर बाणों की वर्षा करने लगे। दोनों ही अस्त्र विद्या के ज्ञाता, बलवान् और रथ द्वारा युद्ध करने में प्रवीण थे। दोनों एक_दूसरे का वध करने के लिये प्रयत्नशील होकर परस्पर प्रहार करने का अवसर ढूंढ़ रहे थे। इतने में ही चित्रसेन ने एक भल्ल मारकर नकुल का धनुष काट दिया। फिर तीन बाणों से उसके ललाट को बींधकर अनेकों तेज किये हुए बाणों से उसके घोड़ों को यमलोक भेज दिया। जब धनुष कटा और रथ टूट गया तो वीरवर नकुल ढ़ाल तलवार लेकर रथ से उतर पड़ा। अब उसने पैदल ही चित्रसेन पर आक्रमण किया। उस समय चित्रसेन उसके ऊपर बाणों की बौछार करने लगा। किन्तु नकुल बिचित्र प्रकार से युद्ध करने वाला था, उसने चित्रसेन के बाणों को ढाल पर ही रोककर नष्ट कर दिया तथा संपूर्ण सेना के सामने ही चित्रसेन के रथ पर चढ़कर उसने उसके कुण्डल और मुकुट से सुशोभित मस्तक को धड़ से अलग कर दिया।  चित्रसेन का मस्तक रथ के पिछले भाग में गिर पड़ा। उसको मरा हुआ देख पाण्डव_महारथी सिंहनाद कटकपंरने लगे किन्तु कर्ण के महारथी पुत्र सुषेण और सत्यसेन तीखे बाणों की वर्षा करते हुए नकुल पर टूट पड़े। उनके बाणों से नकुल का सारा शरीर बिंध गया, तो भी वह नया धनुष ले दूसरे रथ पर सवार हो क्रोध में भरे हुए यमराज की भांति समय में डट गया। अब वे दोनों भाई नकुल के रथ के टुकड़े_टुकड़े कर डालने की चेष्टा में लगे। यह देख नकुल ने हंसते_हंसते चार बाणों से सत्यसेन के चारों घोड़ों को मार गिराया। फिर एक नारायण मारकर उसका धनुष भी काट डाला। तब सत्यसेन ने दूसरा धनुष और दूसरा रथ लेकर अपने भाई पर ही धावा किया और बाणों की झड़ी लगाकर उसे सब ओर से ढक दिया। नकुल ने भी उनके बाणों को रोककर दो दो बाणों से दोनों को अलग_अलग बींध डाला। फिर उन दोनों ने भी नकुल को घायल किया और तीखे साधकों से उसके सारथि को भी बिंध डाला। अब सत्यसेन ने दो पृथक्_पृथक् बाण मारकर नकुल का धनुष और उसके रथ का हरसा काट डाला। तब नकुल ने रथशक्ति हाथ में ली और बहुत ऊंचे उठाकर सत्यसेन पर दे मारी। उसकी चोट से सत्यसेन की छाती के सैकड़ों टुकड़े हो गयेऔर वह प्राचीन होकर जमीन पर जा पड़ा। भाई को मरा देख सुषेण क्रोध में भर गया और नकुल के ऊपर बाणों की वृष्टि करने लगा। उसने चार सायकों से नकुल के चारों घोड़ों को मार डाला, पांच से रथ की ध्वजा काट दी और तीन से सारथि को भी यमलोक पठा दिया। नकुल को रथहीन देख द्रौपदीकुमार सुतसोम दौड़कर वहां आ पहुंचा। कुल उसके रथ पर बैठ गया और दूसरा धनुष लेकर सुषेण से युद्ध करने लगा। तदनन्तर सुषेण ने नकुल को तीन और सुतसोम को उसकी भुजाओं तथा छाती में बीस बाण मारे। तब तो नकुल ने क्रोध में भरकर बाणों की मार से सुषेण को सब ओर से ढंक दिया और एक अर्धचन्द्राकार बात से उसका मस्तक काट गिराया। यह देख कौरव सेना भयभीत होकर भागने लगी।

Wednesday, 15 February 2023

राजा शल्य का सेनापति के पद पर अभिषेक और भगवान् श्रीकृष्ण का युधिष्ठिर को शल्य से लड़ने के लिये आदेश

संजय कहते हैं_महाराज ! हिमालय की तराई में विश्राम करने के समय सभी प्रधान_प्रधान योद्धा एक स्थान पर इकट्ठे हुए। शल्य, चित्रसेन, शकुनि, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा, सुसेन, अरिष्टसेन, धृतसेन तथा जयत्सेन आदि राजाओं ने भी वहीं रात्रि बितायी थी। इन सब लोगों ने एकत्रित होकर राजा शल्य के पास बैठे हुए राजा दुर्योधन का विधिवत् पूजन किया और युद्ध के लिये प्रयत्नशील होकर कहा_'राजन् ! तुम किसी को सेनापति बनाकर शत्रुओं के साथ युद्ध करो; क्योंकि सेनापति के संरक्षण में रहकर ही हम अपने वैरियों पर विजय पा सकते हैं।' तब राजा दुर्योधन रथ पर सवार हो महारथी अश्वत्थामा के पास गया। अश्वत्थामा युद्ध की संपूर्ण कलाओं का ज्ञाता, संग्राम में तो वह यमराज के समान जान पड़ता था। सूर्य के समान तेजस्वी और शुक्राचार्य के समान बुद्धिमान था। उसमें सभी प्रकार के शुभ लक्षण थे, वह प्रत्येक कार्य में निपुण और वैदिक ज्ञान का समुद्र था। शत्रुओं को वेग से जीतने वाला वह स्वयं अजेय था। धनुर्वेद के ( व्रत, प्राप्ति, धृति, पुष्टि, स्मृति, क्षेप, अभिरेदन, चिकित्सा, उद्दीपन और कृष्टि_ इन )दस अंगों तथा ( दीक्षा, शिक्षा, आत्मरक्षा और इनका साधन_इन ) चार पादों को ठीक_ठीक जानता था। छ: अंगों सहित चारों वेदों तथा इतिहास_पुराणरूप पंचम वेद का भी उसे पूर्ण ज्ञान था। उस महातपस्वी ने कठोर व्रतों का पालन करके बड़े यत्न से शंकरजी की अराधना की थी। उसके पराक्रम और रूप की कहीं भी तुलना नहीं थी। वह संपूर्ण विद्याओं का पारगामी, गुणों का समुद्र तथा सबकी प्रशंसा का पात्र था। उसके पास पहुंचकर दुर्योधन ने कहा_'आप हमारे गुरु के पुत्र हैं, हम सब लोगों को आपका ही भरोसा है; अतः: आप आज्ञा करें, हम किसे सेनापति बनावें ? अश्वत्थामा ने कहा_ हमलोगों में राजा शल्य भी अब ऐसे हैं, जो उत्तम कुल, पराक्रम, तेज, यश, लक्ष्मी तथा समस्त सद्गुणों से सम्पन्न हैं। ये ही हमारे सेनापति होने योग्य हैं। राजन् ! इन्हीं को सेनाध्यक्ष बनाकर हम शत्रुओं पर विजय पा सकते हैं। द्रोण कुमार के ऐसा कहने पर सभी योद्धा राजा शल्य को घेरकर खड़े हो गये और उनकी जय_जयकार करने लगे। अब उन्होंने बड़े आवेश में भरकर युद्ध का निश्चय किया। राजा शल्य द्रोण तथा भीष्म के समान पराक्रमी थे, वे एक उत्तम रथ पर बैठे हुए थे। दुर्योधन रथ से उतरकर उनके सामने भूमि पर खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर बोला_मित्रवत्सल ! आप शूरवीर हैं, इसलिये हमारी सेना के अध्यक्ष बनिये।' राजा शल्य ने कहा_कुरुराज ! यदि तुम मुझे सेनापति का सम्मान दे रहे हो, तो मैं तुम्हारे कथनानुसार सब कुछ करुंगा। मेरे प्राण, राज्य और धन सब कुछ तुम्हारा प्रिय करने के लिये है। दुर्योधन बोला_मैं आपको अपना सेनापति स्वीकार करता हूं। जैसे स्वामी कार्तिकेय ने युद्ध में देवताओं की रक्षा की थी, उसी प्रकार आप भी मेरी रक्षा कीजिये। शल्य ने कहा_ दुर्योधन ! मेरी बात सुनो_रथ पर बैठे हुए जिन श्रीकृष्ण और अर्जुन को तुम महारथियों में श्रेष्ठ समझते हो, वे दोनों बाहुबल में किसी तरह मेरी समानता नहीं कर सकते। यदि देवता, असुर और मनुष्यों सहित सारा भूमंडल ही मेरे विपक्ष में उठकर आ जाय तो मैं अकेला ही सबसे युद्ध कर सकता हूं, फिर पाण्डवों की तो बात ही क्या है ? नि: संदेह मैं तुम्हारी सेना का संचालक बनूंगा और ऐसा व्यूह बनाऊंगा, जिसे शत्रु नहीं लांघ सकते। तदनन्तर, राजा दुर्योधन ने शास्त्रीय विधि के अनुसार शल्य का सेनापति के पद पर अभिषेक किया। उनका अभिषेक होते ही आपकी सेना में महान् सिंहनाद होने लगा। तरह_तरह के बाजे बज उठे और मद्रदेश के महारथी बड़े हर्ष में भरकर राजा शल्य की स्तुति करने लगे_'राजन् ! तुम्हारी जय हो, तुम चिरंजीवी रहो और सामने आते हुए समस्त शत्रुओं का संहार करो। तुम देवता, असुर और मनुष्य_सबको युद्ध में परास्त कर सकते हो। इन मरणधर्मी सोमकों और सृंजयों की तो बात ही क्या है ?'  इस प्रकार सम्मान पाकर मद्रराज शल्य फूले नहीं समाये। उन्होंने दुर्योधन से कहा_'राजन् ! आज मैं पाण्डवों सहित समस्त पांचालों का संहार कर डालूंगा अथवा स्वयं ही मरकर स्वर्गलोक को चला जाउंगा। आज संपूर्ण पाण्डव, श्रीकृष्ण, सात्यकि, द्रौपदी के पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखंडी तथा पांचाल, चेदि एवं प्रभद्रक योद्धा मेरे पराक्रम पर दृष्टिपात करें, मेरे धनुष का महान् बल देखें। आज मैं पाण्डव सेना को चारों ओर भगा दूंगा। तुम्हारा प्रिय करने के लिये द्रोणाचार्य, भीष्म तथा कर्ण से भी अधिक पराक्रम दिखाता हुआ रणभूमि में विचरूंगा।' महाराज ! जब शल्य का सेनापति के पद पर अभिषेक हो गया उस समय सभी सैनिक कर्ण का दु:ख भूलकर प्रसन्नचित्त हो गये। आपकी सेना का हर्षनाद सुनकर युधिष्ठिर ने सब क्षत्रियों के सामने ही भगवान् श्रीकृष्ण से कहा_'माधव ! दुर्योधन ने महाराज शल्य को सेनापति बनाया है और सब सेनाओं के बीच उनका सम्मान किया है। यह जानकर आप जो उचित समझिये, कीजिये; क्योंकि आप ही मेरे नेता और रक्षक हैं। यह सुनकर श्रीकृष्ण बोले_'भारत ! मैं आर्तायन के पुत्र शल्य को बहुत अच्छी तरह जानता हूं। वे अत्यन्त पराक्रमी और महान् तेजस्वी हैं, युद्ध करने के लिये विचित्र_विचित्र ढ़ंग उन्हें मालूम है। मेरा तो ऐसा ख्याल है कि भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे योद्धा थे वैसे ही महाराज शल्य भी हैं। युद्ध में उनके जोड़ का दूसरा योद्धा मुझे आपके सिवा कोई दिखाती नहीं देता। इस भूमण्डल की कौन कहे, देवलोक में भी आपके सिवा दूसरा और कोई वीर नहीं है, जो क्रोध में भरे हुए मद्रराज शल्य को युद्ध में मार सके। दुर्योधन ने जिनका सत्कार किया है, वे शल्य अजेय वीर हैं, उनके मारे जाने पर आप कौरवों की विशाल सेना को मरी हुई ही समझिये। मेरी बात मानकर आप इस समय महारथी शल्य पर चढ़ाई कीजिये। मामा समझकर उनपर दया करने की आवश्यकता नहीं है, क्षत्रिय धर्म को सामने रखकर उन्हें मार ही डालिये। आज के संग्राम में आप अपना तपोबल और क्षात्रबल दिखाइये। महारथी शल्य को अवश्य मार डालिये।'  यह कहकर भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवों से सम्मानित हो विश्राम के लिये शिविर में चले गये। उनके जाने के बाद राजा युधिष्ठिर ने सब भाइयों, पांचालों और सोमकों को भी विदा किया। फिर सबने अपने_अपने शिविर में सोकर रात बितायी।



Thursday, 9 February 2023

शल्यपर्व _____ धृतराष्ट्र का विषाद; कृपाचार्य का दुर्योधन को संधि लिये समझाना, किन्तु दुर्योधन का युद्ध के लिये ही निश्चय करना

नारायणन नमस्कृत्यं नरं चैन नरोत्तम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं त्यों जयमुदीरयेत्।।
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके नित्य सखा नरस्वरूप नररत्न अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता महर्षि वेदव्यास को नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियों पर विजयप्राप्तिपूर्वक अन्त:कर्ण को शुद्ध करनेवाले महाभारत ग्रंथ का पाठ करना चाहिये। 

धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! कौरव_सेना का संचालन करनेवाले सूतपुत्र के मारे जाने पर मेरे पुत्रों ने क्या किया ? क्या कारण है कि मेरे पुत्र जिस_जिस को सेनापति बनाते हैं, उसी_उसी को पाण्डव_लोग थोड़े ही समय में मार डालते हैं ? तुम लोगों को देखते_देखते भीष्म मारे गये, द्रोण की भी यही दशा हुई और अब प्रतापी कर्ण भी जाता रहा। महात्मा विदुर ने मुझसे पहले ही कह दिया था कि 'दुर्योधन के अपराध से प्रजा का नाश हो जायगा।' उन्होंने जो कुछ कहा वह ज्यों का त्यों आज सच हो रहा है। उस वक्त प्रारब्धवश मेरी बुद्धि मारी गरी थी, इसलिए मैंने उनके कहने के अनुसार काम नहीं किया। संजय ! अब मेरे उस अन्याय के फल का पुनः वर्णन करो। कर्ण के मारे जाने पर कौन मेरी सेना का प्रधान बना ? किस महारथी ने श्रीकृष्ण तथा अर्जुन का सामना किया ? संजय ने कहा_महाराज ! कौरव और पाण्डवों के आपस में भिड़ने से जो महान् जनसंहार हुआ, उसकी कथा सावधान होकर सुनिये। नौका से व्यापार करनेवाले व्यापारी जैसे अगाध जल में नाव टूट जाने पर घबरा जाते हैं, उसी प्रकार कौरवों के आश्रयभूत कर्ण के मारे जाने पर आपके सैनिक थर्रा उठे। वे अनाथ की भांति रक्षक ढ़ूंढ़ने लगे। संध्या के समय अर्जुन से परास्त होकर जब हमलोग छावनी में लौटे, उस समय कर्ण की मृत्यु से भरकर आपके सभी पुत्र भाग रहे थे। उनके कवच नष्ट हो गये थे। किस दिशा में जाना है, इसका भी उन्हें पता नहीं था; वे सुध_बुध को बैठे थे। वे आपस में एक_दूसरे को ही मारने लगे। बहुत_से महारथी भय के कारण घोड़ों, हाथियों और रथों पर सवार होकर इधर_उधर भागने लगे। उस भयंकर संग्राम में हाथियों ने रथ तोड़ डाले, महारथियों ने घुड़सवारों को मार डाला तथा रणभूमि से भागने वाले पैदलों को घोड़ों ने कुचला डाला।
इसी समय कृपाचार्य जी आकर दुर्योधन से बोले_'राजन् ! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं, उसे ध्यान देकर सुनो और अच्छा लगे तो उसके अनुसार काम करो। पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, महारथी कर्ण, जयद्रथ, तुम्हारे बहुत से भाई, तुम्हारा पुत्र लक्ष्मण_ये सब तो मारे जा चुके; अब कौन बच गया है, जिसका हम आश्रय ग्रहण करें ? जिन वीरों पर युद्ध का भार रखकर हम राज्य पाने की आशा करते थे, वे तो शरीर छोड़कर वेदवेत्ता ओन की गति को प्राप्त हो गये। हमने भी बहुत से राजाओं को मरवाकर अपने गुणवान महारथियों को खो दिया है। उनके बिना अब हम अकेले रह गये हैं, ऐसी अवस्था में हमें दीनतापूर्ण वर्ताव करना पड़ेगा। जब सब लोग जीवित थे, तब भी अर्जुन किसी के द्वारा परास्त नहीं हुए। कृष्ण जैसे सारथि के होते हुए उन्हें देवता भी नहीं जीत सकते। उनकी वानर की चिह्नवाली ध्वजा देखकर हमारी विशाल सेना थर्रा उठती है। भीमसेन का सिंहनाद, पांचजन्य की भयंकर आवाज और गाण्डीव धनुष की टंकार सुनकर हमलोगों का दिल बैठ जाता है। अर्जुन के हाथ में डोलता हुआ सुवर्ण से जटित महान् धनुष चारों दिशाओं में इस प्रकार दिखाई देता है, जैसे मेघ की घटाओं में बिजली। जिस प्रकार वायु की प्रेरणा से बादल उड़ते फिरते हैं, उसी तरह भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा हांके हुए घोड़े, जो सुनहले साजों से सजे रहते हैं, अर्जुन की सवारी में दौड़ते हैं। अर्जुन अस्त्र विद्या में कुशल हैं; इन्होंने तुम्हारी सेना को उसी प्रकार भस्म किया है, जैसे भयंकर आग घास की ढ़ेरी को जला डालती है। वे धनुष की टंकार से हमारे योद्धाओं को उसी प्रकार भयभीत करते हैं जैसे सिंह मृगों को। आज इस भयंकर संग्राम को प्रारंभ हुए सत्रह दिन बीत गये। महासागर में हवा के थपेड़े खाकर डगमगाती हुई नौका की तरह आपकी सेना को अर्जुन ने कंपा डाला है। उस दिन जयद्रथ को अर्जुन के बाणों का निशाना बनते देखकर भी तुम्हारा कर्ण कहां चला गया था ? अपने अनुयायियों के साथ आचार्य द्रोण, मैं, तुम, कृतवर्मा तथा भाइयों सहित दु:शासन_ये लोग कहां गये थे ? सब वहीं तो थे, पर अर्जुन पर किसी का जोर चला ? तुम्हारे संबंधियों, भाइयों, सहायकों तथा मामाओं को उन्होंने अपने पराक्रम से जीत लिया और तुम्हारे देखते_देखते सबके सबके सिर पर पैर रखकर जयद्रथ को मार डाला ! अब हम किसका भरोसा करें ? यहां कौन ऐसा पुरुष है जो अर्जुन पर विजय पा सकेगा ? उनके पास नाना प्रकार के दिव्य अस्त्र हैं। उनके गाण्डीव की टंकार सुनकर हमलोगों का धैर्य छूट जाता है। जैसे चन्द्रमा के बिना रात्रि अंधकारमयी हो जाती है, उसी प्रकार हमारी यह सेना सेनापति के मारे जाने से श्रीहीन हो रही है। सभी योद्धा घबराये हुए हैं। उधर सात्यकि और भीमसेन का जो वेग है, वह समस्त पर्वतों को विदीर्ण कर सकता है, समुद्रों को सुखा सकता है। राजन् ! ध्यूत_सभा में भीमसेन ने जो बात कही थी, उसे उन्होंने सत्य करके दिखा दिया; आगे भी वे ऐसा ही करेंगे। पाण्डव सज्जन हैं, किन्तु तुमलोगों ने उनके साथ अकारण ही बहुत से अनुचित व्यवहार किये; उन्हीं का अब फल मिल रहा है। तुमने यत्न करके सारे जगत् के लोगों को अपनी रक्षा के लिये एकत्रित किया था, किन्तु तुम्हारा ही जीवन संदेह में पड़ा हुआ है। दुर्योधन ! अब तुम अपने को बचाओ। बृहस्पतिजी की बताई हुई यह नीति है कि 'जब अपना बल कम अथवा बराबर जान पड़े तो शत्रु के साथ संधि कर लेनी चाहिये। लड़ाई तो उस वक्त छेड़नी चाहिये, जब अपनी शक्ति शत्रु से बढ़_चढ़कर हो।' बल और शक्ति में हम पाण्डवों से कम हो गये हैं, अतः: मेरी राय में तो अब उनसे संधि कर लेना ही उचित है। जो राजा अपनी भलाई का बात नहीं जानता और श्रेष्ठ पुरुषों का अपमान किया करता है, वह शीघ्र ही राज्य से भ्रष्ट हो जाता है; उसका भला भी नहीं होता। यदि राजा युधिष्ठिर के सामने झुकने से हमलोग राज्य पा जायं तो इसी में अपनी भलाई है। मूर्खतावश हार जाने में कोई लाभ नहीं है। राजा धृतराष्ट्र और भगवान् श्रीकृष्ण के कहने से युधिष्ठिर तुम्हें राज्य दे सकते हैं। श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन से जो कुछ कहेंगे उसे वे सब लोग मान लेंगे_इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। मेरा विश्वास है कि श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र की बात नहीं टालेंगे और युधिष्ठिर श्रीकृष्ण की आज्ञा के विरुद्ध नहीं करेंगे। इसलिये मैं सन्धि करने में ही कुशल देखता हूं, पाण्डवों के साथ लड़ने में कोई लाभ नहीं है। तुम यह नहीं समझना कि मैं कायरतावश या प्राण बचाने के लिये ऐसी बात कह रहा हूं। मैं तो तुम्हारे ही भले के लिये कहता हूं। यदि इस समय मेरा कहना नहीं मानोगे तो मरते समय तुम्हें मेरी याद आयेगी। कृपाचार्य के इस प्रकार कहने पर दुर्योधन जोर_जोर से गर्म उसांस खींचता हुआ कुछ देर तक चुपचाप बैठा रहा। फिर थोड़ी देर तक सोचने_विचारने के बाद उसने कहा_'विप्रवर ! एक हितैषी को जो कुछ कहना चाहिये, वह सब अपने कह सुनाया। यही नहीं, प्राणों का मोह छोड़कर युद्ध करते हुए आपने मेरी भलाई के लिये सबकुछ किया है। यद्यपि हितचिंतक होने के नाते आपने मेरे भले के लिये ही यह बात बतायी है, तब भी मुझे यह पसंद नहीं आती_ठीक उसी तरह, जैसे मरने वाले रोगी को दवा अच्छी नहीं लगती। राजा युधिष्ठिर महान् धनी थे, मैंने उन्हें जूए में जीतकर दर_दर का भिखारी बनाया और राज्य से बाहर निकाल दिया; अब वे मुझपर कैसे विश्वास करेंगे ? मेरी बातों पर उन्हें क्योंकर एतबार होगा ? श्रीकृष्ण मेरे यहां दूत बनकर आये थे, किन्तु मैंने उनके साथ धोखा किया; अब वे भी मेरी बात कैसे मानेंगे ? सभा में बलात् लाती हुई द्रौपदी ने जो विलाप किया था तथा पाण्डवों का जो राज्य छीन लिया गया था, उसके लिखे श्रीकृष्ण को अबतक अमर्ष बना हुआ है। श्रीकृष्ण और अर्जुन, दो शरीर एक प्राण हैं; वे दोनों एक_दूसरे के अवलम्ब हैं। पहले तो यह बात मैंने केवल सुनी थी, किन्तु अब इसे प्रत्यक्ष देख रहा हूं। जबसे उन्होंने अपने भांजे अभिमन्यु का मरण सुना है, तब से वे सुख की नींद नहीं लेते। हमलोग उनके अपराधी हैं, फिर वे हमें क्षमा कैसे कर सकते हैं ? महाबली भीमसेन का स्वभाव भी बड़ा कठोर है, उसने बड़ी भयंकर प्रतिज्ञा की है। सूखे काठ की तरह वह टूट भले ही जाय, झुक नहीं सकता। नकुल और सहदेव यमराज के समान भयंकर हैं, वे दोनों भी मुझसे वैर मानते हैं। धृष्टद्युम्न और शिखंडी का भी मेरे साथ वैर है, फिर वे मेरे हित के लिये क्यों यत्न करेंगे ? द्रौपदी एक वस्त्र पहने हुई थी, रजस्वला थी, उस अवस्था में वह सभा में लाती गयी और दु:शासन ने सबके सामने उसे क्लेश पहुंचाया। उसके वस्त्र का उतारा जाना_उसकी वह दीनावस्था पाण्डवों को आज भी याद है। अब उन्हें युद्ध से रोका नहीं जा सकता। जबसे द्रौपदी को क्लेश दिया गया, तभी से वे मेरे विनाश का संकल्प लेकर मिट्टी की वेदी पर सोया करती है। जबतक वैर का पूरा बदला न चुका लिया जाय, जबतक के लिये उसने यह व्रत ले रखा है। इस प्रकार वैर की आग पूर्ण रूप से प्रज्वलित हो उठी है, अब वह किसी तरह बुझ नहीं सकती। अभिमन्यु का नाश करने के बाद अर्जुन के साथ मेरा मेल कैसे हो सकता है ? जब मैं समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का एकछत्र राजा होकर पूरा उपभोग कर चुका हूं तो इस समय पाण्डवों का कृपापात्र बनकर कैसे राज्य कर सकूंगा ? समस्त राजाओं का सिरमौर होकर अब दास की भांति युधिष्ठिर के पीछे_पीछे कैसे चलूंगा ? दीनतापूर्वक जीवन क्योंकर व्यतीत करूंगा ? मैं आपकी बातों का खण्डन या तिरस्कार नहीं करता; क्योंकि आपने स्नेहवश मेरे हित के लिये वे बातें कही हैं। मैं तो केवल अपना विचार प्रकट कर रहा हूं। मेरे मन में यही आता है कि अब संधि का अवसर नहीं रहा। इस समय संधि की चर्चा चलाना किसी तरह उचित नहीं जान पड़ता। मुझे अब युद्ध में ही सुंदर नीति दिखाई दे रही है। यह समय भयभीत होकर कायरता दिखाने का नहीं, उत्साह के साथ युद्ध करने का है। मैं पाण्डवों के सामने दीनतापूर्वक वचन नहीं कह सकता। संसार में कोई भी सुख सदा रहनेवाला नहीं है, फिर राष्ट्र और यश भी कैसे रह सकते हैं ? यहां तो कीर्ति का ही उपार्जन करना चाहिये और कीर्ति युद्ध के सिवा दूसरे उपाय से नहीं मिल सकती। घर में खाट पर सोकर मरना क्षत्रिय के लिये बहुत बड़ा पाप है। जो बड़े_बड़े यज्ञ करके वन में या संग्राम में शरीर त्याग करता है, वहीं महत्व को प्राप्त होता है। जिसका बुढ़ापे के कारण शरीर जर्जर हो गया हो, रोग पीड़ा दे रहा हो, परिवार के लोग आसपास बैठकर रोते हो, उस अवस्था में दीनतायुक्त वचन बोलकर विलाप करते_करते प्राण त्यागने वाला क्षत्रिय 'मर्द' कहलाने योग्य नहीं हैं। अतः जिन्होंने नाना प्रकार के भोगों का परित्याग करके उत्तम गति प्राप्त की है, इस समय मैं युद्ध के द्वारा उनके ही लोक में जाऊंगा। जिनके आचरण श्रेष्ठ हैं, जो संग्राम में पीठ नहीं दिखानेवाले, शूरवीर, सत्यप्रतिज्ञ तथा नाना प्रकार के यज्ञ करनेवाले हैं, जिन्होंने शस्त्र की धारा में अवभृथ ( यज्ञान्त ) स्नान किया है, उनका स्वर्ग में निवास होता है। देवताओं की सभा में वे बड़े सम्मान की दृष्टि से देखें जाते हैं। देवता तथा संग्राम में पीठ नहीं दिखानेवाले शूरवीर जिस मार्ग से जाते हैं, उसी से मैं भी जाऊंगा। मित्रों, भाइयों और दादाओं को मरवाकर यदि मैं अपने प्राणों की रक्षा करूं तो निश्चय ही सारा संसार मेरी निंदा करेगा। भला, मित्रों और भाइयों से हीन होकर पाण्डवों के पैरों पर पड़ने से जो राज्य मिलेगा, वह मेरे लिये किस काम का होगा ? इसलिये अब मैं अच्छी तरह युद्ध करके स्वर्ग को ही प्राप्त करूंगा, इसके सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिये।'
दुर्योधन की यह बात सुनकर सब क्षत्रियों ने उसकी प्रशंसा की और उसे बहुत धन्यवाद दिया। सबने अपनी पराजय का शोक छोड़कर मन_ही मन पराक्रम करने की ठान ली। युद्ध करने के विषय में सबको एक निश्चय हो गया। सबके हृदय में उत्साह भर आया। तत्पश्चात् सब योद्धाओं ने अपने_अपने वाहनों को विश्राम दे आठ कोस से कुछ कम दूरी पर जाकर डेरा डाला। वहां रात्रि बिछाकर दूसरे दिन काल की प्रेरणा से वे तुरत रणभूमि की ओर लौटे।