Sunday, 25 June 2023

व्याधों से दुर्योधन का पता पाकर युधिष्ठिर का सेनासहित सरोवर पर जाना और कृपाचार्य आदि का दूर हट जाना

धृतराष्ट्र ने पूछा_'संजय ! पाण्डवों ने रणभूमि में जब हमारी सारी सेना का संहार कर डाला, उस समय बचे हुए महारथी कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा ने क्या किया ? और मूर्ख दुर्योधन ने कौन_सा काम किया ? संजय ने कहा_महाराज ! जब राजरानियां नगर की ओर चल दीं और शिविर के दूसरे लोग भी पलायन कर गये, उस समय सारी छावनी सूनी देखकर उन तीनों महारथियों को बड़ा दु:ख हुआ। अब उस स्थान पर मन न लगा; इसलिये वे भी सरोवर की ओर ही चल दिये। उधर, धर्मात्मा युधिष्ठिर अपने भाइयों को साथ लेकर दुर्योधन का वध करने के लिये इधर_उधर विचरने लगे, किन्तु बहुत ढ़ूंढ़ने पर भी वे उसका पता न पा सके। इधर, उनके वाहन बहुत तक गये थे, इसलिये समस्त पाण्डव अपनी छावनी में जाकर सैनिकों सहित विश्राम करने लगे। तदनन्तर कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्मा उस सरोवर पर गये। जहां दुर्योधन हो रहा था। वहां पहुंचकर वे उससे बोले_'राजन् ! उठो और हमलोगों को साथ लेकर युधिष्ठिर से युद्ध करो या तो युद्ध करके पृथ्वी का राज भोगों या रण में प्राण देकर स्वर्ग प्राप्त करो। पाण्डवों को भी सारी सेना का तुमने संहार कर दिया है, जो सैनिक बच गये हैं, वे भी बहुत घायल हो चुके हैं। अब वे तुम्हारा वेग नहीं सह सकते। हम सर्वथा तुम्हारी रक्षा करेंगे। इसलिये तुम युद्ध के लिये तैयार हो जाओ। दुर्योधन बोला_ जहां इतना बड़ा नर_संहार हुआ है, वहां से आपलोगों को बचकर आये देख मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। अवश्य ही हमलोग शत्रुओं पर विजय पायेंगे; किन्तु यह तभी हो सकता है, जब कुछ समय तक विश्राम करके अपनी थकावट दूर कर ले। आपलोग भी बहुत तक गये हैं और मैं भी विशेष घायल हो चुका हूं। उधर पाण्डवों का बल और उत्साह बढ़ा हुआ है। इसलिये इस समय उनके साथ युद्ध करना मुझे पसंद नहीं है। आज एक रात यहां विश्राम करके कल आपलोगों को साथ लेकर शत्रुओं से युद्ध करूंगा। संजय कहते हैं _दुर्योधन के ऐसा कहने पर अश्वत्थामा ने कहा_'राजन् ! तुम्हारा कल्याण हो। उठो, हमलोग अवश्य अपने शत्रुओं को जीतेंगे। मैं अपने यज्ञ_याग, दान, सत्य तथा जप आदि पुण्यकर्मों की सौगंध खाकर कहता हूं, आज मैं सोमकों को अवश्य मार डालूंगा। यदि इसी रात मैं अपने शत्रुओं का संहार न कर डालूं तो सत्पुरुषों को मिलने योग्य यज्ञ का फल मुझे न मिले। इस प्रकार जब वे बातें कर रहे थे, उसी समय मांस के बोझ से थके हुए कुछ व्याधे पानी पीने के लिये अकस्मात् वहां आ पहुंचे। उनकी भीमसेन के प्रति बड़ी भक्ति थी। वहां खड़े होकर व्याधों ने उन लोगों का एकान्त वार्तालाप सुन लिया। उन्हें दुर्योधन की बात भी सुनायी दी। सब देख_सुनकर उन्होंने जाने दिया कि 'राजा दुर्योधन जल में छिपा है, उसका युद्ध करने काश मन नहीं है, तो भी ये महारथी उसे उकसा रहे हैं।'
अब ये आपस में सलाह करने लगे_'यह तो साफ जाहिर हो गया कि दुर्योधन पोखरे के पानी में आ बैठा है। अतः भीमसेन से जाकर कहना चाहिए कि 'दुर्योधन पानी में सो रहा है'। इससे हमें खुशी होगी और बहुत_सा धन मिल जायगा। इस सूखे मांस को ढ़ोकर व्यर्थ का क्लेश उठाने से क्या फायदा है? यह निश्चय करके वे बड़े प्रसन्न हुए, उन्हें धन का लोभ जो था ! मांस का बोझ सिर पर उठाया और छावनी की ओर चल दिये। उधर पाण्डवों ने भी दुर्योधन का पता लगाने के लिये चारों ओर जासूस रवाने किये थे; किन्तु सबने लौटकर यही बताया कि 'वह कहीं भाग गया, उसका कुछ पता नहीं चलता।' जासूसों की बात सुनकर राजा को बड़ी चिंता हुई। उसका पता न लगने से समस्त पाण्डव उदास होकर बैठे थे, इतने में ही व्याधे वहां आ पहुंचे। उन्होंने भीमसेन के पास जाकर जो वहां देखा_सुना था, सब कह सुनाया। तब भीमसेन ने उन्हें बहुत_सा धन देकर विदा किया और धर्मराज से आकर कहा_'महाराज ! जिसके लिये आप चिंता में पड़े हैं, उस दुर्योधन का पता व्याधों द्वारा लग गया है। वह माया से पानी बांधकर पोखरे में सो रहा है।' यह प्रिय समाचार सुनकर भाइयोंसहित युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और भगवान श्रीकृष्ण को आगे करके तुरंत सरोवर की ओर चल दिये। उनके साथ सोमक क्षत्रिय भी थे। जाते समय उनके रथ की घरघराहट बहुत दूर तक सुनाई देती थी। उस समय अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव, धृष्टद्युम्न, शिखंडी, उत्तमौजा, युधामन्यु, सात्यकि, द्रौपदी के पुत्र तथा शेष पांचाल योद्धा, हाथी सवार, घुड़सवार और सैकड़ों पैदलों के साथ युधिष्ठिर पीछे_पीछे गये। तदनन्तर, महाराज युधिष्ठिर सके साथ उस अत्यंत भयंकर द्वैपायन नाक सरोवर के पास, जहां दुर्योधन छिपा था, जा पहुंचे। युधिष्ठिर की सेना ने जब प्रस्थान किया था, उसी समय उसका महान् कोलाहल सुनकर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा ने दुर्योधन से कहा_'राजन् ! विजयोल्लास से सुशोभित पाण्डव अत्यन्त आनन्द में भरकर इधर ही आ रहे हैं। यदि आप आज्ञा दें तो हमलोग कुछ देर के लिये हट जायें।' उनकी बात सुनकर दुर्योधन ने कहा _'अच्छा, आप लोग जाइये। उनसे ऐसा कहकर वह सरोवर के भीतर चला गया और माया से जल को बांध दिया। कृपाचार्य आदि महारथी राजा की आज्ञा लेकर शोकमग्न हो वहां से दूर चले गये। रास्ते में उन्हें एक बरगद का पेड़ दिखाई पड़ा। वे थके तो थे ही, उसके नीचे बैठ गये और राजा दुर्योधन के विषय में विचार करने लगे। ' अब युद्ध किस तरह होगा ? राजा दुर्योधन की क्या दशा होगी ? पाण्डवों को दुर्योधन का पता कैसे लगेगा ?' यही सब सोचते_सोचते उन्होंने घोड़ों को रथ से खोल दिया और सब_के _सब वृक्ष के नीचे आराम करने लगे।

दुर्योधन का सरोवर में प्रवेश और युयुत्सु का हस्तिनापुर जाना

संजय कहते हैं _महाराज ! तदनन्तर शकुनि के अनुचर क्रोध में भर गये और प्राणों का मोह छोड़कर उन्होंने पाण्डवों को चारों ओर से घेर लिया। किन्तु अर्जुन और भीमसेन ने उसकी प्रगति रोक दी। वे लोग शक्ति, ऋष्टि हाथ में लेकर सहदेव को मार डालने की इच्छा से आगे बढ़ रहे थे, परन्तु अर्जुन ने गाण्डीव के द्वारा उनका संकल्प व्यर्थ कर दिया। उन्होंने भल्ल मारकर उन योद्धाओं की आयुधोंसहित भुजाओं तथा मस्तकों को काट डाला और उनके घोड़ों को भी मौत के घाट उतार दिया। इस तरह अपनी सेना का संहार देखकर राजा दुर्योधन को बड़ा क्रोध हुआ। उसने मरने से बचे हुए सब योद्धाओं को एकत्रित किया, उनमें सौ तो रथी थे और बाकी कुछ हाथी सवार, घुड़सवार और पैदल थे। सबके इकठ्ठे हो जाने पर दुर्योधन ने उनसे कहा_'वीरों ! तुमनलोग पाण्डवों को उनके मित्रों सहित मार डालो, साथ ही सेनासहित धृष्टद्युम्न का भी संहार कर डालो। इसके बाद शीघ्र मेरे पास लौट आना। दुर्योधन की आज्ञा शिरोधार्य करके वे रणोन्मत्त वीर पाण्डवों की ओर दौड़े। उन्हें आते देख पाण्डव भी बाणों की बौछार करने लगे। कुछ ही क्षणों में वह सेना पाण्डवों के साथ से मारी गयी, उसे कोई बचाने वाला न मिला। वह युद्ध के लिये प्रस्थित तो हुई, मगर भय के मारे ठहर न सकी। पाण्डव_दल के बहुत_से सैनिकों ने मिलकर आपके उन योद्धाओं का कुछ ही क्षणों में सफाया कर डाला। उनमें _से एक भी सिपाही नहीं बचा। महाराज ! आपके पुत्र ने अट्ठारह अक्षौहिणी सेना इकट्ठी की थी, किन्तु पाण्डव और सृंजयों ने सबका अन्त कर डाला। आपकी ओर से लड़ने वाले हजारों राजाओं में केवल दुर्योधन ही उस समय दिखायी पड़ा, वह भी बहुत घायल हो चुका था। उसने अपने चारों ओर दृष्टिपात किया, किन्तु सारी पृथ्वी सूनी दिखायी पड़ती। दुर्योधन ने जब अपने को सब योद्धाओं से रहित अकेला पाया और पाण्डवों को सफल मनोरथ एवं प्रसन्न देखा तो उसे बड़ा शोक हुआ। उसके पास न सेना थी न सवारी, इसलिये वह भाग जाने का विचार करने लगा। धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! जब मेरे सब सैनिक मार डाले गये तो सारी छावनी सूनी हो गयी, उस समय पाण्डवों के पास कितनी सेना बच गयी थी ? अकेला हो जाने पर मेरे मूर्ख पुत्र दुर्योधन ने क्या किया ? संजय ने कहा_महाराज ! उस समय पाण्डवों के पास दो हजार रथी, सात सौ हाथी सवार, पांच हजार घुड़सवार और दस हजार पैदल थे। उनकी इतनी सेना अभी बची हुई थी। राजा दुर्योधन जब अकेला हो गया और उसे समरभूमि में अपना कोई भी अपना सहायक नहीं दिखायी पड़ा तो अपने मरे हुए घोड़े को वहीं छोड़कर वह पूर्व दिशा की ओर पैदल ही भागा। जो एक दिन ग्यारह अक्षौहिणी सेना का मालिक था वहीं दुर्योधन गदा लेकर अब पैदल ही सरोवर की ओर भागा जा रहा था। अभी थोड़ी ही देर गया था कि उसे धर्मात्मा विदुरजी की कही हुई बातें याद आने लगीं। उसने सोचा_'अहो ! हमारा और इन क्षत्रियों का जो महान् संहार हुआ है, इसे महान् बुद्धिमान विदुरजी ने पहले ही जान लिया था।' इस प्रकार की बातें सोचता हुआ वह सरोवर में प्रवेश करने के लिये बढ़ता चला गया। उस समय अपनी सेना का संहार देखकर उसका हृदय शोक से संतप्त हो रहा था। राजन् ! दुर्योधन की सेना में कई लाख वीर थे, किन्तु उस समय अश्वत्थामा, कृतवर्मा, तथा कृपाचार्य के सिवा कोई भी जीवित नहीं दिखाई पड़ता था। मुझे कैद में पड़ा देख धृष्टद्युम्न ने सात्यकि से हंसकर कहा_'इसको कैद करके क्या करना है, इसके जीवित रहने से अपना कोई लाभ तो है ही नहीं।' उसकी बात सुनकर सात्यकि ने मेरा वध करने के लिये तीखी तलवार उठायी; किन्तु श्रीवेदव्यासजी ने सहसा वहां प्रकट होकर कहा_'संजय को जीवित छोड़ दो, इसे किसी तरह मारना नहीं।' व्यासजी की बात सुनकर सात्यकि ने मुझसे कहा_'सात्यकि ने मुझसे कहा_'संजय ! जा अपना कल्याण साधन कर।' उसकी आज्ञा पाकर संध्या के समय में वहां से हस्तिनापुर के लिये प्रस्थित हुआ। उस समय मेरे पास न कवच था, न कोई हथियार। चलते _चलते जब मैं एक कोस इधर आ गया तो गदा हाथ में लिये दुर्योधन को अकेला खड़ा देखा, उसके शरीर पर बहुत _से घाव हो गये थे। मुझपर दृष्टि पड़ते ही उसकी आंखों में आंसू भर गये, वह अच्छी तरह मेरी ओर देख न सका। मैं भी उसे उस अवस्था में देख शोक में डूब गया, कुछ देर तक मेरे मुंह से कोई बात न निकल सकी। तदनन्तर मैंने अपने कैद होने और व्यासजी की कृपा से जीते-जी छुटकारा पाने का समाचार कह सुनाया। सुनकर थोड़ी देर तक कुछ सोचता रहा, इसके बाद उसने अपने भाइयों और सेना का हाल पूछा। मैंने भी जो कुछ आंखों देखा था, वह सब बता दिया और कहा_राजन् ! तुम्हारे भाई मारे गये और सारी सेना का संहार हो गया। रणभूमि से चलते समय व्यासजी ने मुझसे कहा था कि तुम्हारे पक्ष में तीन ही महारथी बच गये हैं।' यह सुनकर उसने कहा_'संजय ! तुम प्रज्ञा चक्षु महाराज से जाकर कहना कि 'आपका पुत्र दुर्योधन उस महासंग्राम से जीवित बचकर पानी से भरे सरोवर में सो रहा है, वह बहुत घायल हो चुका है।' यों कहकर दुर्योधन ने उस सरोवर में प्रवेश किया और माया से उसका पानी बांध दिया। इसके बाद कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्मा भी उधर ही आ निकले; इन तीनों महारथियों के घोड़े बहुत तक गये थे। मेरे पास आकर उन्होंने कहा_'संजय ! सौभाग्य की बात है कि तुम जीवित हो। 'फिर वे लोग आपके पुत्र का समाचार पूछते हुए बोले_'संजय ! क्या हमारे राजा दुर्योधन जीवित हैं ?' मेरी बात सुनकर वे महारथी थोड़ी देर तक वहां विलाप करते रहे, किन्तु पाण्डवों को रण में खड़े देख वहां से भाग चले। उन्होंने मुझे भी कृपाचार्य के रथ में बिठा लिया।  फिर सब लोग छावनी पर आ गये। सूर्यास्त निकट था,  छावनी के पहरेदार घबराये हुए थे; आपके पुत्रों का मरण सुनकर वे सब एक साथ रो पड़े। तदनन्तर स्त्रियों की रक्षा में नियुक्त हुए वृद्ध पुरुषों ने राजरानियों को साथ लेकर नगर की ओर प्रस्थान करने का विचार किया। बेचारी रानियां पतियों का मरण का समाचार सुनकर कुररी के समान विलाप करने लगीं। वे हाय ! हाय ! करती हुई हाथों से सिर और छाती पीटने लगीं। उनका करुणक्रन्दन चारों ओर फैल गया। राज्यमंत्री व्याकुल हो उठे, उनका गला भर आया ; वे रानियों को साथ लेकर नगर की ओर प्रस्थित हुए; साथ में रक्षा करने के लिये छड़ीदार सिपाही भी थे। रक्षा करनेवाले सिपाही रथ पर बैठकर अपनी_अपनी स्त्रियों को साथ ले नगर की ओर जा रहे थे। राजमहल में रहने पर जिन राशियों को सूर्य भी नहीं देख पाते थे। उन्हें ही नगर को जाते समय साधारण लोग भी दे रहे थे। उस समय ग्वाले और भेड़ चरानेवाले तक भीमसेन के डर से नगर की ओर भाग रहे थे। उस भगदड़ के समय युयुत्सु शोक से मूर्छित हो मन_ही_मन सोचने लगा_'भयंकर पराक्रम करनेवाले पाण्डवों ने ग्यारह अक्षौहिणी सेना के स्वामी राजा दुर्योधन को परास्त कर दिया, उसके सब भाइयों को मार डाला और भीष्म और द्रोण जैसे कौरव_वीर भी मौत के घाट उतर गये। भाग्यवश केवल मैं बच गया हूं। दुर्योधन के मंत्री रानियों को साथ लेकर नगर की ओर भागे जा रहे हैं। अब उचित यही होगा कि मैं युधिष्ठिर तथा भीमसेन से पूछकर उनके साथ नगर में चला जाऊं।' यह सोचकर उसने युधिष्ठिर और भीमसेन से अपना मनोभाव प्रकट किया। राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु हैं, युयुत्सु की बात सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उसे छाती से लगाकर उन्होंने जाने की आज्ञा दे दी। तब युयुत्सु ने अपने रथ पर बैठकर घोड़ों को बड़ी तेजी से हांका और राजरानियों को भी साथ लेकर नगर में प्रवेश किया। उस समय सूर्यास्त हो रहा था। नगर में पहुंचते ही उसका गला भर आया, आंखों से आंसुओं की धारा बह चली। इसी अवस्था में उसे विदुरजी मिल गये, उसे देखते ही विदुरजी के नेत्रों में भी अश्रुप्रवाह जारी हो गया। वे विनीत भाव से सामने खड़े हुए युयुत्सु से बोले_' बेटा ! इस कुरुवंश का संहार हो जाने पर भी तुम अभी जीवित हो_ यह बड़े सौभाग्य की बात है ? किन्तु राजा युधिष्ठिर के नगर में प्रवेश करने के पहले तुम यहां कैसे आ गये। इसका कारण विस्तारपूर्वक बताओ।' युयुत्सु ने कहा_' तात ! अपने जाति, भाई और पुत्र के साथ जब मामा शकुनि मारे गये, उस समय राजा दुर्योधन रक्षकों से रहित हो जाने के कारण अपने मरे हुए घोड़ों को वहीं छोड़ डर के मारे पूर्व दिशा की ओर भाग गये। उनके भागते ही छावनी के सब लोग डरकर भागने लगे। फिर स्त्रियों के रक्षक भी राजा और उनके भाइयों की रानियों को सवारी पर बिठाकर भाग चले। तब मैं भी राजा युधिष्ठिर और भगवान् श्रीकृष्ण से पूछकर भागते हुए लोगों की रक्षा के लिये हस्तिनापुर तक आ गया। युयुत्सु की बात सुनकर विदुरजी ने सोचा, 'इसने वही काम किया है, जो ऐसे अवसर पर उचित था।' अतः वे बहुत प्रसन्न हुए और उसकी प्रशंसा करते हुए बोले_'बेटा ! यह ठीक ही हुआ है। दयालु होने के कारण तुमने अपने कुलधर्म की रक्षा की है। उस संहारकारी संग्राम से आज तुम्हें सकुशल लौटे देखकर मुझे बड़ा आनन्द मिला है। अपने अंधे पिता के तुम्हीं लाठी कू सहारे हो। विपत्ति में डूबकर दु:ख पाते हुए राजा धृतराष्ट्र को धैर्य देने के लिये केवल तुम्हीं जीवित हो। आज यहां रहकर विश्राम करो, कर सवेरे ही युधिष्ठिर के पास चले जाना।' यह कहकर विदुरजी आंसू बहाते हुए चले। उन्होंने युयुत्सु को राजभवन में भेजकर स्वयं भी प्रवेश किया। उस समय वहां नगर और प्रांत के लोग एकत्रित होकर बड़े दु:ख से हाहाकार कर रहे थे। वह भवन आनंदशून्य और श्रीहीन दिखाई देता था। राजमहल की यह अवस्था देखकर विदुरजी को बड़ा कष्ट हुआ। वे मन_ही_मन विकल हो धीरे_धीरे उच्छ्वास लेते हुए वहां से लौटकर नगर में चले गये। युयुत्सु ने वह रात अपने ही घर में रहकर व्यतीत की।

Friday, 19 May 2023

शकुनि और उलूक का वध

संजय कहते हैं _महाराज ! उपर्युक्त संग्राम जब आरम्भ हुआ, उस समय शकुनि ने सहदेव पर धावा किया। सहदेव ने भी सउबलपउत्र पर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। शकुनि के साथ उसका पुत्र उलूक भी था, उसने भीमसेन को दस बाणों से बींध डाला। साथ ही शकुनि ने भी भीमसेन को तीन बाणों से घायल करके सहदेव पर नब्बे बाणों की वर्षा की। उस समय दोनों ओर के योद्धाओं द्वारा की हुई बाणों की बौछार से संपूर्ण दिशाएं आच्छादित हो गयीं। क्रोध में भरे हुए भीम और सहदेव दोनों वीर संग्राम में भयंकर संहार मचाते हुए विचर रहे थे। उनके सैकड़ों बाणों से ढंकी हुई आपकी सेना अंधकारपूर्ण आकाश की भांति दिखायी पड़ती थी। इस प्रकार लड़ते_लड़ते जब कौरवों के पास बहुत थोड़ी सी सेना रह गयी तो पाण्डव _योद्धा हर्ष में भरकर बड़े उत्साह से उन्हें यमलोक पहुंचाने लगे। इसी समय शकुनि ने सहदेव के मस्तक पर प्यास का प्रहार किया और सहदेव मूर्छित _सा होकर रथ की बैठक में बैठ गया
 उसकी यह अवस्था देख प्रतापी भीम ने क्रोध में भरकर शकुनि की सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया और नाराचों से मारकर सैकड़ों एवं हजारों सैनिकों का संहार कर डाला। इसके बाद उन्होंने बड़े जोर से सिंहनाद किया, जिसे सुनकर हाथी और घोड़ों सहित समस्त सैनिक थर्रा उठे। डर के मारे वे सहसा भाग चले। उन्हें भागते देख राजा दुर्योधन ने कहा_'अरे पापियों ! लौट आओ, भागने से क्या लाभ होगा ? जो वीर लड़ाई में पीठ न दिखाकर प्राण_त्याग करता है, वह संसार में कीर्ति पाता है और परलोक में उत्तम सुख भोगता है।' उसके ऐसा कहने पर शकुनि के सिपाही मोर की परवाह न करके पुनः पाण्डवों पर टूट पड़े। यह देख पाण्डव योद्धा भी उनका सामना करने को आगे बढ़े। इतने में भी सहदेव ने भी स्वस्थ होकर शकुनि को दस बाणों से बींध डाला और तीन बाणों से उसके घोड़ों को घायल करके हंसते-हंसते उसका धनुष भी काट दिया। शकुनि ने दूसरा धनुष लेकर सहदेव को साफ और भीमसेन को सात बाण मारे। इसी तरह उलूक ने भी भीम को सात और सहदेव को सत्तर बाणों से घायल कर डाला। तब भीमसेन ने उसे तेज किये हुए सायकों से बींध दिया और शकुनि को भी चौंसठ बाण मारकर उसके पार्श्वरक्षकों को तीन_तीन बाणों का निशाना बनाया। भीम के नाराचों से आहत हुए योद्धा क्रोध में भरकर सहदेव के ऊपर बाणों की बौछार करने लगे। तब सहदेव ने एक भल्ल मारकर अपने सामने आये हुए उलूक का मस्तक काट डाला। उसकी लाश जमीन पर गिर पड़ी। बेटे की मृत्यु देखकर शकुनि को विदुरजी की बात याद आ गयी। उसका गला भर आया, उच्छ्वास चलने लगा और वह अपनी आंखों में आंसू भरकर दो घड़ी तक चिंता में डूबा रहा। इसके बाद सहदेव के सामने जाकर उसने तीन बाण मारे, किन्तु सहदेव ने उसे अपने सायकों से का गिराया और शकुनि के धनुष के भी टुकड़े _टुकड़े कर डाले। तब शकुनि ने सहदेव के ऊपर तलवार का वार किया, किन्तु उसने हंसते-हंसते उस तलवार के भी दो टुकड़े कर दिये। अब शकुनि ने गदा चलायी, पर उसका वार खाली चला गया, वह जमीन पर जा पड़ी। इससे उसका क्रोध बहुत बढ़ गया और उसने एक भयंकर शक्ति सहदेव के ऊपर छोड़ी; किन्तु सहदेव ने बाण मारकर उसके भी तीन टुकड़े कर डाले। इस प्रकार जब शक्ति भी नष्ट हो गयी और शकुनि भयभीत हो गया तो आपके सैनिकों पर भी आतंक छा गया। वे सब_के_सब शकुनि के साथ भाग चले। उस समय पाण्डव जो_जोर से सिंहनाद करने लगे। प्रायः सभी कौरव_योद्धा रण से पीठ दिखाकर भाग गये। शकुनि को भी सिसकता देख सहदेव ने सोचा 'यह मेरा हिस्सा बाकी रह गया है_ इसका नाश मुझे करना है।' यह विचारकर अपना महान् धनुष टंकारते हुए उसने शकुनि का पीछा किया और तेज किये हुए बाण मारकर उसे अत्यंत घायल कर दिया और कहने लगा, 'मूर्ख शकुनि! तू क्षत्रियधर्म में स्थित होकर युद्ध कर, पराक्रम दिखाकर पुरुषत्व का परिचय दे। उस दिन सभा में पासा फेंकते समय तो तू खुश हो रहा था, उसका फल आज अपनी आंखों से देख। जिन दुरात्माओं ने पहले हमलोगों का उपहास किया था, वे सब मारे जा चुके हैं, केवल कुलांगार दुर्योधन और उसका मामा तू बाकी रह गया है। आज तेरा मस्तक अवश्य काट डालूंगा।' यह कहकर सहदेव ने शकुनि को दस और उसके घोड़ों को चार बाण मारे, फिर उसका छत्र, ध्वजा और धनुष काटकर उन्होंने सिंह के समान गर्जना की तथा अनेकों सायकों का प्रहार करके उसके मर्मस्थानों को बींध डाला। इससे शकुनि को बड़ा क्रोध हुआ। वह सहदेव को मार डालने की इच्छा से दोनों हाथों में प्रकाश लेकर उसपर टूट पड़ा। सहदेव ने शकुनि के उठाये हुए प्राश को तथा उसे पकड़नेवाली उसकी दोनों गोलाकार भुजाओं को तीन भल्ल मारकर एक ही साथ काट डाला। फिर बड़े जोर से गर्जना की। तदनन्तर, खूब सावधानी के साथ एक मजबूत लोहे का भल्ल धनुष पर चढ़ाया और उसके प्रहार से शकुनि का सिर धड़ से अलग कर दिया। उसकी मस्तकसहित लाश जमीन पर गिर पड़ी। शकुनि की यह दशा देख आपके योद्धा डरके मारे अपना साहस को बैठे। उनका मुंह सूख गया, चेतना जाती रही। और वे भयभीत होकर अपने_अपने हथियार लिये चारों दिशाओं में भागने लगे। गाण्डीव की टंकार सुनकर वे अधमरे हो रहे थे, किसी का रथ टूटा था, किसी के घोड़े मर गये थे और किन्हीं के हाथी ही मौत के मुंह में जा चुके थे। ये सब लोग पांव प्यादे सही भाग रहे थे। इस प्रकार शकुनि के मारे जाने से भगवान् श्रीकृष्ण के साथ ही समस्त पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। वे अपने योद्धाओं का हर्ष और उत्साह बढ़ाते हुए शंख बजाने लगे। सभी लोग सहदेव के इस कर्म की प्रशंसा करते हुए कहते हुए कहने लगे, 'वीरवर ! तुमने इस कपटी और दुरात्मा शकुनि को पुत्र सहित मार डाला, यह बड़ा अच्छा हुआ।

Friday, 12 May 2023

भीमद्वारा धृतराष्ट्र के बारह पुत्रों का वध, श्रीकृष्ण और अर्जुन की बातचीत तथा अर्जुन द्वारा त्रिगर्तों का संहार

संजय कहते हैं_महाराज ! हाथियों के समुदाय का नाश हो जाने पर आपकी अन्य सेनाओं का संहार करने लगे। वे क्रोध में भरे हुए दण्डधारी यमराज की भांति हाथ में गदा लिये रणभूमि में विचर रहे थे। उस समय ढ़ूंढ़ने पर भी जब दुर्योधन का कहीं पता न लगा तो मरने से बचे हुए आपके पुत्र भीमसेन पर टूट पड़े। दुर्मर्षण, श्रुतान्त, जैत्र, भूरीबल, रवि, जयत्सेन, सुजात, दुविर्षह, दुष्प्रधर्ष तथा श्रुतर्वा ने धावा करके भीम को चारों ओर से घेर लिया। तब भीमसेन पुनः अपने रथ पर जा बैठे और आपके पुत्रों के मर्मस्थानों में तीखे बाणों का प्रहार करने लगे। उन्होंने एक क्षुरप्र मारकर दुर्मर्षण का मस्तक काट गिराया। फिर एक भल्ल के द्वारा श्रुतान्त का अन्त कर दिया। तत्पश्चात् हंसते-हंसते जयत्सेन पर नाराच पर प्रहार किया और उसे रथ की बैठक से भूमि पर गिरा दिया। गिरते ही उसके प्राण निकल गये। यह देख श्रुतर्वा कुपित हो उठा और उसने भीम को सौ बाण मारे। अब भीमसेन का क्रोध और भी बढ़ गया। उन्होंने जैत्र, भूरिबल और रवि_इन तीनों को अपने तीखे बाणों का निशाना बनाया। बाणों की चोट खाकर वे तीनों महारथी प्राणहीन होकर रथ से नीचे गिर पड़े। इसके बाद भीम ने एक तीखे नाराच से दुर्विमोचन को मौत के घाट उतार दिया। फिर दुष्प्रधर्ष और सुजात को दो_दो बाण मारकर यमलोक भेज दिया। यह देख दुर्विषह भीम पर चढ़ आया, उसे आते देख भीम ने उसके ऊपर भल्ल का प्रहार किया, उससे आहत होकर वह सबके देखते-देखते रथ से घिरा और मर गया। श्रुतर्वा ने जब देखा कि भीमसेन ने अकेले ही मेरे बहुत_से भाइयों का काम तमाम कर डाला तो अमर्ष में भरकर धनुष की टंकार करता हुआ वह उनपर टूट पड़ा वह उन्हें अपने बाणों का निशाना बनाने लगा। उसने भीमसेन के धनुष को काटकर उन्हें भी बीस बाणों से घायल कर डाला। तब महारथी भीम ने दूसरा धनुष उठाया और आपके पुत्र पर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। श्रुतर्वा ने भी कुपित होकर भीम की भुजाओं और छाती में बाण मारे। इससे भीम बहुत घायल हो गये। उन्होंने अत्यंत रोष में भरकर श्रुतर्वा के सारथि और चारों घोड़ों को यमलोक भेज दिया। रथहीन होने पर श्रुतर्वा ढ़ाल और तलवार लेने लगा_इतने में ही भीम ने क्षुरप्र मारकर उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया। उसके मरते ही आपके सैनिक भय से विह्वल हो गये और युद्ध की इच्छा से भीमसेन की ओर दौड़े। भीमसेन भी उनका सामना करने के लिये आगे बढ़े। भीम के पास पहुंचकर उन वीरों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। तब भीमसेन अपने तीखे बाणों से उन्हें  पीड़ा देने लगे उन्होंने कवच से सुसज्जित पांच सौ महारथियों का काम तमाम करके सात सौ हाथियों का सफाया कर डाला। फिर आठ सौ घुड़सवारों और दस हजार पैदलों को मौत के घाट उतारकर वे विजयश्री से सुशोभित होने लगे। जिस समय भीमसेन आपके पुत्रों का संहार कर रहे थे, उस समय आपके सैनिकों का उनकी ओर आंख उठाकर देखने का भी साहस नहीं होता था। उन्होंने समस्त कौरवों और उनके अनुचरों को मार भगाया; फिर ताल ठोंककर उसकी विकट आवाज से बड़े_बड़े गजराजों को भयभीत करने लगे। उस लड़ाई में आपके बहुत _से सिपाही काम आये। जो बचे थे उनकी हिम्मत भी टूट गयी थी। महाराज ! दुर्योधन और सुदर्शन_ये ही दो आपके पुत्र बचे हुए थे। ये दोनों घुड़सवारों के बीच खड़े थे। दुर्योधन को वहां खड़ा देख देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा_'अर्जुन ! अब शत्रुओं के अधिकांश योद्धा मारे जा चुके हैं। वह देखो, सात्यकि सृंजय को कैद करके लिये आ रहा है। उधर कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा_ये तीनों राजा दुर्योधन को अलग छोड़कर रण में डटे हुए हैं। इधर, प्रभद्रकोंसहित दुर्योधन की सेना का संहार करके पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न अपनी सुन्दर कान्ति से शोभायमान हो रहा है। और वह है दुर्योधन, जो अपनी सेना का व्यूह बनाकर रण में खड़ा है। अर्जुन ! कौरव पक्ष के योद्धा तुम्हें आये देख जबतक भाग नहीं जाते, उसके पहले ही दुर्योधन को मार डालो। इसकी सेना बहुत तक गयी है, अतः इस समय आक्रमण करने से यह पापी छूटकर जा नहीं सकता।' श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन ने कहा_'माधव ! धृतराष्ट्र के सभी पुत्र भीमसेन के साथ से मारे जा चुके हैं, ये दो, जो अभी बचे हुए हैं, ये भी रह नहीं जायेंगे। शकुनि की सेना में अभी भी पांच सौ घुड़सवार, दो सौ रथी, सौ से कुछ अधिक हाथी और तीन हजार ही पैदल बच गये हैं। दुर्योधन की सेना में अश्वत्थामा, कृपाचार्य, त्रिगर्तों, उलूक, शकुनि, कृतवर्मा आदि कुछ ही योद्धा बचे हैं, बाकी सब मारे गये। अब इनका भी का काल आ ही पहुंचा है। आज वे मेरे सामने आकर भाग नहीं जायेंगे, वे देवता ही क्यों न हो, उन सबको मार डालूंगा। आज सारा झगड़ा समाप्त हो जायेगा। दुर्योधन भी यदि मैदान छोड़कर भाग नहीं गया तो आज अपनी उद्दीप्त राज्यलक्ष्मी तथा प्राणों से हाथ धो बैठेगा। आप घोड़े बढ़ाइये, मैं सबको अभी मारे डालता हूं।' अर्जुन के ऐसा कहने पर भगवान् ने दुर।योधन की सेना की ओर घोड़े बढ़ाये, भीमसेन और सहदेव ने भी अर्जुन का साथ दिया। तीनों महारथी दुर्योधन को मार डालने की इच्छा से सिंहनाद करते हुए आगे बढ़े। उस समय आपके पुत्र सुदर्शन ने भीमसेन का सामना किया। सुवर्णा और शकुनि अर्जुन से लड़ने लगे। दुर्योधन घोड़े पर सवार हो सहदेव से जा भिड़ा। उसने बड़ी फुर्ती के साथ सहदेव के मस्तक पर एक प्रास से प्रहार किया। सहदेव उस चोट से मूर्छित होकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया, उसका सारा शरीर खून से तय हो गया। फिर थोड़ी ही देर में, जब होश हुआ, तो वह क्रोध में भरकर दुर्योधन पर तीखे बाणों की बौछार करने लगा। उधर, अर्जुन भी घोड़ों की पीठ पर बैठे हुए योद्धाओं के मस्तक काट_काटकर गिराने लगे। उन्होंने बहुत_से बाण मारकर सारी सेना का संहार कर डाला। तदनन्तर त्रिगर्तों की रथ सेना पर धावा किया। उन्हें आये देख सारे त्रिगर्त महारथी एक साथ होकर श्रीकृष्ण तथा अर्जुन पर बाणों की वर्षा करने लगे। तब अर्जुन ने सत्कर्मा को एक क्षुरप्र से घायल कर उसके रथ का हरसा ( ईषा) काट डाला, फिर दूसरे क्षुरप्र से उसका मस्तक भी धड़ से अलग कर दिया। इसके बाद उन्होंने सब योद्धाओं के सामने ही सत्येषु के पकड़कर मार डाला। तत्पश्चात् प्रस्तर देश के अधिपति सुवर्णा को तीन बाणों से बींधकर वहां एकत्रित हुए समस्त रथियों को अपने बाणों का निशाना बनाया। फिर, सुवर्णा को सौ बाण मारकर उसके घोड़ों को भी घायल किया, इसके बाद उन्होंने हंसते _हंसते सुवर्णा पर यमदण्ड के समान एक भयंकर बाण चलाया। उससे उसकी छाती छिद गयी और वह प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। इस प्रकार सुवर्णा को मारकर अर्जुन ने उसके पैंतालीस पुत्रों को भी मौत के घाट उतार दिया। फिर उसके समस्त अनुयायियों को यमलोक भेजकर उन्होंने मरने से बची हुई कौरव_सेना में प्रवेश किया। दूसरी ओर भीमसेन हंसते-हंसते बाणों की वर्षा करके सुदर्शन को ढंक दिया, अब वह दिखायी नहीं पड़ता था। प्रहार करते _करते उन्होंने एक तीखे क्षुरप्र से सुदर्शन का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। यह देख उसके अनुचरों ने भीम को चारों ओर से घेरकर उनपर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। तब भीमसेन ने तेज किये हुए बाणों की वर्षा करके उन्हें सब ओर से आच्छादित कर दिया और एक ही क्षण में सबका संहार कर डाला। उस समय परस्पर प्रहार करते हुए दोनों दलों के योद्धाओं में कोई अन्तर नहीं रह गया, दोनों सेनाएं मिलकर एक_सी हो गयीं।



Wednesday, 3 May 2023

अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण से दुर्योधन की अनीति का कुपरिणाम बताया जाना तथा कौरवों की रथ सेना और गजसेना का संहार

संजय कहते हैं _तदनन्तर, कौरव_वीरों को बड़े वेग से धनुष उठाये देख अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा_" जनार्दन ! आप घोड़ों को हांकते और इस सैन्य सागर में प्रवेश कीजिये। आज मैं तीखे बाणों से शत्रुओं का अन्त कर डालूंगा। इस संग्राम के आरंभ हुए आज अठारह दिन हो गये। कौरवों के पास समुद्र जैसी अपार सेना थी, हो हमलोगों के पास आकर अब गाय के खुरकी_सी हो गयी। मुझे आशा थी कि पितामह भीष्म के मारे जाने पर दुर्योधन संधि कर लेगा, किन्तु उस मूर्ख ने ऐसा नहीं किया। भीष्म जी ने सच्ची और हितकर बात बतायी थी, किन्तु बुद्धि मारी जाने के कारण उसने उसे भी नहीं स्वीकार किया। फिर क्रमशः आचार्य द्रोण, कर्ण और विकर्ण आदि के मारे जाने के पर बहुत थोड़ी सी सेना बच रही है, तो भी युद्ध बन्द नहीं हुआ। भूरीश्रवा शल्य, शाल्व तथा अवन्ती के राजकुमार मारे गये, फिर भी इस मार_काट का अन्त हो सका। जयद्रथ, बाह्लीक, राक्षस अलआयउध, सोमदत्त, वीरवर भगदत्त, कआम्बओजरआज तथा दु:शासन की मृत्यु हो जाने पर भी यह संहार रुक न सका। भैया भीमसेन के साथ से अनेकों अक्षौहिणी पति मारे गये_यह देखकर भी लोभ या मोह के कारण लड़ाई बन्द नहीं हुई। जिसको अपने हिताहित का ज्ञान है, जो मूर्ख नहीं है, ऐसा कौन पुरुष होगा जो शत्रु को गुण, बल और वीरता में अपने से अधिक जानकर भी उससे लोहा लेने का साहस करेगा ? आपने भी पाण्डवों से सन्धि करने के विषय में उससे हितकारक वचन कहा था, किन्तु वह उनके मन में नहीं बैठा। जब आपकी ही बात पर वह ध्यान न दे सका तो दूसरे की कैसे सुन सकता था ? जिसने संधि के विषय में कहने पर भीष्म, द्रोण और विदुर की भी बात टाल दी, उसे राह पर लाने के लिये अब कौन_सी दवा है? जिसने मूर्खतावश अपने बूढ़े पिता की बात नहीं मानी, हित की बात बतानेवाली माता का अपमान किया, उसे और किसी की बात कैसे अच्छी लगेगी ? निश्चय ही दुर्योधन का जन्म इस कुल का अन्त करने के लिये हुआ है। महात्मा विदुर ने मुझसे बहुत बार कहा था कि 'दुर्योधन जीते_जी तुमलोग को राज्य का भाग नहीं देगा। सदा ही तुम्हारा बुराई किया करेगा। उसके युद्ध के सिवा और किसी प्रकार जीतना असंभव है।' 
आज ये सारी बातें सत्य जान पड़ती हैं। जिस मूर्ख ने परशुरामजी के मुख से यथार्थ और हितकर वचन सुनकर भी उसकी अवहेलना कर दी, वह तो निश्चय ही विनाश के मुख में स्थित है। दुर्योधन के जन्म लेते ही बहुतेरे सिद्ध पुरुषों ने कहा था कि 'इस दुरात्मा के कारण क्षत्रियकुल का महान् संहार होगा।' उनकी बात आज सत्य हो रही है; क्योंकि दुर्योधन के लिये ही वहां असंख्य राजाओं का संहार हुआ है। अतः: आज मैं समस्त कौरव_योद्धाओं का वध करूंगा। आप मुझे दुर्योधन की सेना में ले चलिये, जिससे उसको और उसकी सेना को मैं अपने तीखे बाणों का निशाना बना सकूं।" घोड़ों की बागडोर हाथ में लिये भगवान् श्रीकृष्ण से जब अर्जुन ने उपर्युक्त बात कही तो उन्होंने घोड़े बढ़ा दिये और निर्भय होकर शत्रुओं की सेना में प्रवेश किया। उस समय अर्जुन के सफेद घोड़े चारों ओर दिखाई पड़ते थे। फिर जैसे बादल पानी की धारा बरसाता है, उसी प्रकार अर्जुन बाणों की बौछार करने लगे। उनके छोड़े हुए बाण योद्धाओं के कवच फाड़कर वज्र के समान चोट करते हुए धरती पर गिर जाते थे। उनके द्वारा कितने ही मनुष्यों, घोड़े, हाथियों और प्राणों से हाथ धोना पड़ा। अर्जुन के बाणों पर उनका नाम खुदा हुआ था, उनके चलिये हुए वैसे बाणों से मानो सारा जगत् आच्छादित हो गया। जैसे धधकती हुई आग घास की ढ़ेरी को जला डालती है, उसी प्रकार अर्जुन भी शत्रु सैनिकों को भस्म करने लगे। वे मनुष्य, घोड़ा अथवा हाथी पर दुबारा बाण नहीं छोड़ते थे, उनके एक ही बात से सबका काम तमाम हो जाता था। अनेकों प्रकार के सायकों की वर्षा करके उन्होंने अकेले ही आपके पुत्र की सेना का संहार कर डाला।
यद्यपि कौरव_योद्धा रण में पीठ नहीं दिखानेवाले शूरवीर थे और पूरी शक्ति लगाकर लड़ रहे थे, तो भी अर्जुन ने अपने गाण्डीव से उनके विजय के संकल्प को व्यर्थ कर दिया। धनंजय के वाणी वज्र के समान असह्य और तेजस्वी थे; उनकी मार पड़ने से आपकी सेना साहस को बैठे और दुर्योधन के देखते _देखते रणभूमि से भाग चली। उस समय कोई पिता को पुकारते थे, कोई सहायकों को। कुछ लोग अपने भाई _बन्धु और सम्बन्धितों को जहां_के_तहां छोड़कर भाग गये। बहुत _से महारथी पार्थ के बाणों से अत्यंत घायल हो जाने के कारण मूर्छित हो रणभूमि में पड़े_पड़े उच्छ्वास ले रहे थे। उनको दूसरे लोग रथ पर चढ़ाकर घड़ी_दो_घड़ी आश्वासन देते थे। कुछ लोग उन घायलों को वैसे ही छोड़कर आपके पुर के आज्ञा का पालन करते हुए युद्ध  के लिये चले जाते थे। बहुतेरे योद्धा स्वयं पानी पीकर घोड़ों की भी थकावट दूर करते, उसके बाद कवच पहनकर लड़ने जाते थे। कुछ लोग अपने भाइयों, पुत्रों अथवा पिताओं को धीरज दे दे उन्हें छावनी में ही छोड़कर युद्ध के लिये निकल पड़ते थे। कोई_कोई अपने रथ को रण_सामग्री से सजाकर पाण्डव_सेना में प्रवेश करते थे। इस प्रकार कौरव_पक्ष के योद्धाओं ने पाण्डव_सेना पर चढ़ाई करके धृष्टद्युम्न के साथ युद्ध छेड़ दिया। उधर से धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और शतानीक_ये लोग आपकी रथ सेना का सामना करने लगे। उस समय धृष्टद्युम्न को बड़ा क्रोध हुआ। वह अपनी विशाल सेना के साथ आपके सैनिकों का संहार करने को तैयार हो गया। यह देख आपके पुत्र ने उसके ऊपर नाना प्रकार के बाणों की झड़ी लगा दी। तब धृष्टद्युम्न ने भी नाराच, अर्धनाराच और वत्सदन्त आदि शीघ्रगामी बाणों से दुर्योधन की भुजाओं और छाती पर प्रहार किया। धृष्टद्युम्न आपके पुत्र के प्रहार से पहले बहुत घायल हो चुका था, इसलिये उसने दुर्योधन को बींध कर  उसके चारों घोड़ों को भी मौत के घाट उतार दिया; फिर एक भल्ल मारकर उसके सारथि का मस्तक भी धड़ से अलग कर दिया। अब दुर्योधन दूसरे घोड़े की पीठ पर चढ़कर शकुनि के पास भाग गया। इस प्रकार जब रथ सेना का संहार हो गया, उस सइस प्रकार जब रथ सेना का संहार हो गया, उस समय हमारे पक्ष के तीन हजार हाथी सवारों ने आकर पांचों पाण्डवों को चारों ओर से घेर लिया। भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं; वे अर्जुन पर्वताकार गजराजों से गिरकर उन्हें अपने तीखे नाराचों का निशाना बनाने लगे। वहां हमने देखा, उनके एक ही बाण से विदीर्ण होकर बड़े _बड़े गजराज धराशायी हो रहे हैं। दूसरी ओर महाबली भीमसेन भी अपने रथ से कूदे और बहुत बड़ी गदा हाथ में लेकर दण्डधारी यमराज की भांति उन हाथियों पर टूट पड़े। उन्हें गदा हाथ में लिये देख आपके सैनिक थर्रा उठे, उनका मल_मूत्र निकल पड़ा और सबपर उद्वेग छा गया। भीम की गदा के आघात से हाथियों के कुम्भस्थल फूट जाते और वे धूल में भरे हुए इधर_उधर भागते देखें जाते थे। कितने ही हाथी गदा की चोट से आहत हो चिग्घाड़ कर गिर पड़ते थे। गजसेना की यह दुर्दशा देखकर आपके सारे सैनिक भय से कांप उठे। इस प्रकार युधिष्ठिर और नकुल_सहदेव भी आपके हाथी सवारों को यमलोक भेज रहे थे। हमारे पक्ष के तीन हजार हाथी सवारों ने आकर पांचों पाण्डवों को चारों ओर से घेर लिया। भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं; वे अर्जुन पर्वताकार गजराजों से गिरकर उन्हें अपने तीखे नाराचों का निशाना बनाने लगे। वहां हमने देखा, उनके एक ही बाण से विदीर्ण होकर बड़े _बड़े गजराज धराशायी हो रहे हैं। दूसरी ओर महाबली भीमसेन भी अपने रथ से कूदे और बहुत बड़ी गदा हाथ में लेकर दण्डधारी यमराज की भांति उन हाथियों पर टूट पड़े। उन्हें गदा हाथ में लिये देख आपके सैनिक थर्रा उठे, उनका मल_मूत्र निकल पड़ा और सबपर उद्वेग छा गया। भीम की गदा के आघात से हाथियों के कुम्भस्थल फूट जाते और वे धूल में भरे हुए इधर_उधर भागते देखें जाते थे। कितने ही हाथी गदा की चोट से आहत हो चिग्घाड़ कर गिर पड़ते थे। गजसेना की यह दुर्दशा देखकर आपके सारे सैनिक भय से कांप उठे। इस प्रकार युधिष्ठिर और नकुल_सहदेव भी आपके हाथी सवारों को यमलोक भेज रहे थे। इसी समय अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा ने रथ सेना में दुर्योधन को ढ़ूंढ़ा, जब वह नहीं मिला, तो उन्होंने वहां खड़े हुए क्षत्रियों से पूछा_'राजा दुर्योधन कहां गये ?' उत्तर मिला_'सारथि के मारे जाने पर वे पांचालराज की दुर्धर्ष सेना का सामना करना छोड़ शकुनि के पास चले गये हैं। तब वे तीनों वीर पांचालराज की उस दुर्धर्ष सेना का व्यूह तोड़कर शकुनि के पास जा पहुंचे। उनके चले जाने पर पाण्डवपक्ष के योद्धा आपके सैनिकों का संहार करते हुए उनपर चढ़ आये। उन्हें आक्रमण करते देख हमारे पक्ष के बहुत _से योद्धा जीवन से निराश हो गये। उनका चेहरा फीका पड़ गया। उनके अस्त्र_शस्त्र कम हो गये थे और चारों ओर से घिर भी गये थे। उनकी यह दशा देख मैं अन्य चार महारथियों को साथ लेकर प्राणों की परवाह न करके पांचालों की सेना से युद्ध करने लगा। किन्तु अर्जुन के बाणों से पीड़ित हो जाने के कारण वहां से हम पांचों को भागना पड़ा। तब सेनासहित धृष्टद्युम्न के साथ हमारी मुठभेड़ हुई; किन्तु द्रुपद कुमार ने हम सब लोगों को परास्त कर दिया। वहां से भागकर हम दूसरी ओर आये तो महारथी सात्यकि दिखाई पड़ा। वह बिलकुल पास आ गया था। मुझे देखते ही उसने चार सौ रथियों के साथ धावा कर दिया। धृष्टद्युम्न के चंगुल से किसी तरह निकला तो सात्यकि की सेना में आ फंसा। थोड़ी देर तक वहां बड़ा भयंकर संग्राम हुआ। सात्यकि ने मेरी सारी युद्ध सामग्री नष्ट कर दी और मुझे भी पकड़ लिया। इतने में भीमसेन की गदा और अर्जुन के नाराचों से वहां सारी गजसेना का संहार हो गया। 

Sunday, 23 April 2023

दोनों सेनाओं का घोर संग्राम और शकुनि का कूट_युद्ध

संजय कहते हैं_महाराज ! इस प्रकार यह घोर संग्राम चल ही रहा था कि पाण्डवों ने आपकी सेना में भगदड़ डाल दी। उस समय आपका पुत्र दुर्योधन बड़ी कोशिश से अपने सैनिकों को रोककर पाण्डव_सेना से युद्ध करने लगा। इधर, राजा युधिष्ठिर ने तीन बाणों से कृपाचार्य को बींधकर चार से कृतवर्मा के घोड़ों को मार डाला। तब कृपाचार्य को तो अश्वत्थामा ने अपने रथ पर बिठाकर अन्यत्र पहुंचा दिया; किन्तु कृपाचार्य उनका सामना करते रहे। उन्होंने युधिष्ठिर को आठ बाणों से बींध दिया। तदनन्तर, दुर्योधन ने सात सौ रथियों को राजा युधिष्ठिर का सामना करने के लिये भेजा। इन रथियों पर युधिष्ठिर ने चारों ओर से इतनी बाणवर्षा की कि वे अदृश्य हो गये। उनकी यह करतूत शिखण्डी आदि महारथियों से नहीं सही गयी। वे अपने _अपने रथों पर बैठकर युधिष्ठिर की रक्षा के लिये वहां पहुंचे। फिर कौरव तथा पाण्डव योद्धाओं में भयंकर युद्ध छिड़ गया, पानी की तरह खून बहाया जाने लगा, यमलोक की आबादी बढ़ने लगी। उस समय पांचालों और पाण्डवों ने दुर्योधन के भेजे हुए उन सात सौ रथियों को मौत के घाट उतार दिया। तत्पश्चात् पाण्डवों के साथ आपके पुत्र ने महान् युद्ध छेड़ा, वैसा पहले कभी न देखा गया और न सुना ही गया था। चारों ओर मर्यादा तोड़कर लड़ाई हो रही थी। दोनों ओर के योद्धा बेतरह मारे जा रहे थे। इस समय शकुनि ने कौरव_योद्धाओं से कहा_'वीरों ! तुमलोग सामने से युद्ध करो और मैं पीछे से पाण्डवों का संहार करता हूं।' इस सलाह के अनुसार जब हमलोग पीछे की ओर बढ़े तो मद्रदेश के योद्धा अत्यंत प्रसन्न होकर किलकारियां भरने लगे। इतने में ही पाण्डव फिर हमारे सामने आये और धनुष टंकारते हुए हमलोगों पर बाण बरसाने लगे। थोड़ी ही देर में मद्रराज की सेना मारी गयी_यह देख दुर्योधन की सेना फिर पीट दिखाकर भागने लगी। तब शकुनि ने कहा_'पापियों ! तुम्हारे भागने से क्या होगा ? लौटकर युद्ध करो।' उस समय शकुनि के पास दस हजार घुड़सवारों की सेना मौजूद थी। उसी को लेकर वह पाण्डव_सेना के पिछले भाग की ओर गया और सब मिलकर बाणों की वर्षा करने लगे। इस आक्रमण से पाण्डवों की विशाल सेना का मोर्चा टूट गया, वह तितर_बितर हो गयी। राजा युधिष्ठिर ने अपनी सेना की यह अवस्था देख सहदेव से कहा_'भैया ! जरा उस मूर्ख शकुनि को तो देखो, वह पीछे की ओर से पंप अपने झ प्रहार करके पाण्डव_सेना का संहार कर रहा है। अब तुम द्रौपदी के पुत्रों को साथ लेकर जाओ और शकुनि को मार डालो। तब तक मैं पांचालों के साथ रहकर कौरवों की रथ_सेना को भस्म करता हूं। धर्मराज की आज्ञा पाकर सात सौ हाथी सवार, पांच हजार घुड़सवार, तीन हजार पैदल, द्रौपदी के पांचों पुत्र तथा महाबली सहदेव_इन सबने शकुनि पर धावा किया। इस समय पीछे की ओर से आक्रमण करके पाण्डव_सैनिकों का संहार कर रहा था। इन योद्धाओं ने पहुंचकर शकुनि की सेना के बहुत_से घुड़सवारों को मार डाला। तब शकुनि थोड़ी ही देर तक सामना कर मरने से बचे हुए छः हजार घुड़सवारों के साथ भाग गया। तदनन्तर पाण्डव_सेना भी अपने बचे हुए सवारों के साथ लौट चली। द्रौपदी के पुत्र मतवाले हाथियों की सेना लेकर धृष्टद्युम्न के पास जा पहुंचे। शेष योद्धा भी जब इधर_उधर बैठ गये तो शकुनि धृष्टद्युम्न की सेना के पार्श्व भाग में आकर बाणवर्षा करने लगा। फिर तो आपके और शत्रुओं के सैनिक प्राणों के मोह छोड़कर घोर युद्ध करने लगे। सौ_सौ, हजार_हजार योद्धा एक साथ रणभूमि में गिरने लगे। तलवारों से कटे हुए मस्तक जब धरती पर गिरते थे तो ताड़ के फलों के गिरने की_सी धमाकों की_सी आवाज होती थी। कटे हुए शरीरों, आयुधों सहित भुजाओं और जंघाओं के गिरने का घोर शब्द सुनाई पड़ता था। इस युद्ध का वेग जब कुछ कम हुआ तो थोड़े से बचे हुए घुड़सवारों के साथ शकुनि पुनः पाण्डव_सेना पर टूट पड़ा। पाण्डवों ने भी फुर्ती दिखायी और पैदल, घुड़सवार तथा हाथी सवारों को साथ लेकर उसपर धावा कर दिया। पाण्डव विजय के इच्छुक थे, उन्होंने मण्डल बनाकर शकुनि को चारों ओर से घेरे लिया और उसे बाणों से बींधना आरंभ कर दिया। यह देख आपकी सेना के घुड़सवार, हाथीसवार, रथी और पैदल भी पाण्डवों की ओर दौड़े। उस समय जिनके शस्त्र क्षीण हो गये थे, ऐसे बहुत_से पैदल योद्धा लातों और घूसों से एक_दूसरे को मारकर धराशायी होने लगे। पाण्डव योद्धाओं ने जब अधिकांश सेना का संहार कर डाला तो शकुनि शेष सात सौ घुड़सवारों को साथ ले तुरंत दुर्योधन की सेना में पहुंचा और क्षत्रियों से पूछने लगा_'राजा कहां है ? योद्धाओं ने उत्तर दिया 'जहां से यह मेघ की गर्जना के समान तुमुल आवाज आ रही है, वहीं कुराज खड़े हैं, आप शीघ्रतापूर्वक जाइये, वहीं वे मिल जायेंगे।'
उसके ऐसा कहने पर शकुनि, जहां वीरों से घिरा हुआ दुर्योधन खड़ा था, वहीं गया। रथियों के बीच में राजा दुर्योधन को देखकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई और वह सब सैनिकों का हर्ष बढ़ाता हुआ दुर्योधन से कहने लगा_'राजन् ! मैंने पाण्डव _पक्ष के घुड़सवारों को परास्त कर दिया, अब तुम भी इस रथ सेना का संहार कर डालो, क्योंकि प्राण त्यागे बिना युधिष्ठिर हमारे वश में नहीं आ सकते। इनके द्वारा सुरक्षित रथ सेना का नाश हो जाने पर हम हाथियों और पैदलों का भी सफाया कर डालेंगे।शकुनि की बात सुनकर आपके सैनिक पुनः पाण्डव_सेना पर टूट पड़े। सबने धनुष उठाया और तर्कों का मुंह खोल दिया। कुछ ही देर में शूरवीरों के सिंहनाद के साथ ही उनके धनुष की भयंकर टंकारें सुनायी देने लगीं।

Saturday, 15 April 2023

शाल्व का वध, सात्यकि और कृतवर्मा का युद्ध तथा दुर्योधन का पराक्रम

संजय कहते हैं_तदनन्दर म्लेच्छों का राजा शाल्व क्रोध में भरकर पाण्डव_सेना पर चढ़ आया। वह ऐरावत के समान एक पर्वताकार गजराज पर बैठा हुआ था। उसने इन्द्र_वज्र के समान अत्यंत भयंकर बाणों से पाण्डवों को बींधना आरम्भ किया। उसके बाण छोड़ने और सैनिकों को यमलोक पहुंचने में कितनी देर लगती है, इसे कौरव या पाण्डव कोई भी नहीं जान सके। म्लेच्छ राज का वह हाथी यद्यपि अकेला ही रणभूमि में विचर रहा था, तो भी पाण्डव, सृंजय और सोमक उसे हजारों की संख्या में देखते थे, सब ओर वहीं वह नजर आता था। वह शत्रुओं की सेना को चारों ओर भगाने लगा। योद्धा अत्यंत भयभीत हो जाने के कारण अब समरभूमि में ठहर नहीं सके। आपस में ही धक्के खाकर कुचले जाने लगे। हाथी के वेग को न सहने के कारण पाण्डवों की वह विशाल वाहिनी तितर_बितर हो चारों दिशाओं में भाग गयी।
यह देख आपके प्रधान_प्रधान योद्धा म्लेच्छराज की प्रशंसा करते हुए गर्जने और शंख बजाने लगे। उनका शंखनाद सेनापति धृष्टद्युम्न से नहीं सहा गया। वह बड़ी उतावली के साथ हाथी की ओर बढ़ा। उसे आते देख शाल्व ने द्रुपद पुत्र का  वध करने के लिये हाथी को उसी ओर दौड़ाया। तब धृष्टद्युम्न ने तीन भयंकर नारायणों से हाथी को बींध डाला, उसके कुम्भस्थल को लक्ष्य करके उसने पांच सौ नाराच और मारे। हाथी उन प्रहारों से घायल होकर पीछे की ओर भागा, किन्तु शाल्व ने सहसा उसे लौटाकर धृष्टद्युम्न के रथ की ओर बढ़ा दिया। नागराज को पुनः अपनी ओर आता देख धृष्टद्युम्न भय से घबरा गया और हाथ में गदा ले बड़े वेग के साथ रथ से कूद पड़ा। इतने में हाथी ने रथ के पास पहुंचकर घोड़ों और सारथि को कुचल डाला; फिर जोर_जोर से गर्जना करते हुए उसने रथ को सूंड़ से उठाकर जमीन पर पटक दिया। उस समय पांचालराजकुमार को शाल्व के हाथी से पीड़ित देख भीमसेन, शिखण्डी और सात्यकि सहसा उसके पास दौड़े आये। आते ही उन्होंने अपने बाणों से हाथी का वेग रोक दिया। उन महारथियों के द्वारा अपनी प्रगति रुक जाने से हाथी विचलित हो उठा; इसी समय राजा वाल्व ने बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। उसके हाथों की मार खाकर पाण्डव रथी इधर_उधर भागने लगे। वाल्व का यह पराक्रम देख पांचालों और सृंजयों ने हाहाकार करते हुए उसके गजराज को चारों ओर से घेर लिया। तदनन्तर धृष्टद्युम्न ने बड़े वेग से धावा किया।  और उस पर्वताकार हाथी के ऊपर गदा की चोट करके उसे बहुत घायल किया। उस आघात से हाथी का कुम्भस्थल फट गया और वह चिग्घाड़ कर मुख से रक्त वमन करता हुआ धराशायी हो गया। इतने में ही सात्यकि ने एक तीक्ष्ण भल्ल से वाल्व का सिर धड़ से अलग कर दिया। तब वह म्लेच्छराज उस नागराज के साथ ही धरती पर गिर पड़ा। शाल्व के मारे जाने पर आपकी सेना का व्यूह टूट गया_सब सैनिक तितर_बितर हो गये। यह देख महारथी कृतवर्मा ने आगे बढ़कर शत्रुओं की सेना को रोक दिया। उसे रणभूमि में डटा हुआ देखकर आपके भागे हुए सैनिक भी लौट आये। उस समय प्राणों की भी परवाह न करके लौटे हुए कौरवों का पाण्डवों के साथ घोर युद्ध होने लगा। कृतवर्मा की युद्धकला आश्चर्यजनक थी। अकेला होने पर भी उसने समस्त पाण्डव_सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया। कौरव हर्ष में भरकर सिंहनाद करने लगे। उनकी गर्जना सुनकर पांचाल योद्धा थर्रा उठे। इतने में महाबाहु सात्यकि वहां आ पहुंचा। आते ही उसे राजा क्षेमधूर्ति से मुठभेड़ हुई। सात्यकि ने सात बाण मारकर उन्हें तत्काल यमलोक पहुंचा दिया।
यह देख कृतवर्मा ने बड़े वेग से सात्यकि पर धावा किया। फिर दोनों महारथी एक_दूसरे से भिड़ गये। थोड़ी ही देर में उस युद्ध ने बड़ा भयंकर रूप धारण किया। अब पाण्डव और पांचाल योद्धा दूर खड़े होकर दर्शक की भांति तमाशा देखने लगे। कृतवर्मा ने चार तीखे बाणों से सात्यकि के चारों घोड़ों को बींध डाला। इससे सात्यकि को बड़ा क्रोध हुआ, उसने भी आठ सायकों से कृतवर्मा को घायल कर दिया। तब कृतवर्मा ने सात्यकि को तीन बाणों से आहत करके एक बाण से उसका धनुष काट दिया। सात्यकि ने कटे हुए धनुष को फेंककर दूसरा उठाया और कृतवर्मा के पास पहुंचकर दस बाणों से उसके सारथि तथा घोड़ों को मौत के घाट उतार दिया; फिर रथ की ध्वजा भी काट डाली। अब कृतवर्मा के क्रोध की सीमा न रही, उसने सात्यकि को मार डालने की इच्छा से उसपर शूल का प्रहार किया; किन्तु सात्यकि ने अपने तीखे बाणों से उस शूल को चकनाचूर कर दिया। कृतवर्मा हक्का_बक्का सा हो देखता रह गया।
कृतवर्मा को इस अवस्था में पड़ा देख कृपाचार्य दौड़े आये और उसे अपने रथ में बिठाकर रणभूमि से दूर हटा ले गये। सात्यकि रण में डटा रहा और कृतवर्मा रथहीन हो गया_यह देख दुर्योधन की सेना में फिर से भगदड़ पड़ी। परन्तु उस समय इतनी दूर उड़ रही थी कि कुछ दिखाई नहीं पड़ता था; इसलिये आपके सैनिकों का भागना शत्रुओं को नहीं विदित हो सका। सबके भागने पर दुर्योधन वहां डटा रहा। वह बड़े वेग से शत्रुओं पर टूट पड़ा और अकेला होने पर भी समस्त पाण्डव_योद्धाओं को उसने आगे बढ़ने से रोक दिया। यही नहीं, उसने शिखण्डी, द्रौपदी के पुत्र, केकय, सोमक तथा सृंजय_इन सब योद्धाओं को अपने तीखे बाणों का निशाना बनाया। शत्रु_पक्ष का एक भी घोड़ा, हाथी, रथ या मनुष्य ऐसा नहीं था, जो दुर्योधन के बाणों से अछूता बचा हो। जैसे धूल से सारी सेना ढकी हुई थी, वैसे ही उसके बाणों से भी ढकी दिखाई देती थी। उस समय दुर्योधन ने सारी पृथ्वी को बाणमयी कर दिया था। आपके या शत्रु पक्ष के हजारों योद्धाओं में वह एक ही मर्द था। उस युद्ध में आपके पुत्र का अद्भुत पराक्रम देखा गया_समस्त पाण्डव एक साथ मिलकर भी उसे पीछे नहीं हटा सके। उसने युधिष्ठिर को सौ, भीमसेन को सत्तर, सहदेव को पांच, नकुल को चौंसठ, धृष्टद्युम्न को पांच, द्रौपदी के पुत्रों को पांच तथा सात्यकि को तीन बाणों से घायल कर दिया। साथ ही एक भल्ल मारकर उसने सहदेव के धनुष भी काट डाला। सहदेव ने वह कटा हुआ धनुष फेंक दिया और दूसरा विशाल धनुष हाथ में लेकर दुर्योधन पर धावा किया। उसने दस बाण मारकर दुर्योधन को बींध डाला। तत्पश्चात् नकुल ने नौ, सात्यकि ने एक, द्रौपदी के पुत्रों ने छिहत्तर, धर्मराज ने पांच और भीमसेन ने अस्सी बाण मारकर उसे फिर पीड़ा पहुंचायी। इस प्रकार चारों ओर से बाणों की बौछार होने पर भी दुर्योधन ने पीछे पैर नहीं हटाया। उस समय उसकी फुर्ती, उसकी सफाई तथा उसकी वीरता सब सीमातीत दिखाई पड़ती थी। इसी समय शकुनि ने युधिष्ठिर के चारों घोड़ों को मार डाला और उन्हें भी बाणों से पीड़ित किया। तब सहदेव राजा को अपने रथ पर बिठाकर रणभूमि से दूर हटा ले गया। थोड़ी ही देर में दूसरे रथ पर सवार होकर युधिष्ठिर पुनः आ पहुंचे और उन्होंने शकुनि को पहले नौ बाण मारकर फिर पांच बाणों से बींध डाला। इसके बाद वे बड़े जोर से गर्जना करने लगे। उधर उलूक चारों ओर बाण की बौछार करता हुआ नकुल पर जा चढ़ा। तब नकुल ने भी बाणों की बड़ी भारी वर्षा की और शकुनि पुत्र उलूक को चारों ओर से ढक दिया। दूसरी ओर कृपाचार्य ने क्रोध में भरकर बाणों की मार से द्रौपदी के पुत्रों को घायल कर दिया। तब वे भी कृपाचार्य को अपने सायकों से पीड़ित करने लगे। इस प्रकार उनमें विचित्र युद्ध होने लगा। उस समय हाथी हाथियों से, घोड़े घोड़ों से और रथी रथियों से भिड़ गये। पैदलों का पैदलों के साथ मुकाबला होने लगा। फिर तो बड़ा ही भयंकर और घमासान युद्ध छिड़ गया। एक_दूसरे का सामना करते हुए सभी योद्धा गरजने और शस्त्रों का प्रहार करने लगे।