Monday, 13 November 2023

भगवान् श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर जाना और धृतराष्ट्र तथा गान्धारी को सांत्वना देकर वापस आना

जनमेजय ने पूछा _विप्रवर ! धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान् श्रीकृष्ण को गान्धारी के पास क्यों भेजा ? जब पहले वे संधि कराने के लिये कौरवों के पास गये थे, उस समय तो उनकी  इच्छा पूरी हुई नहीं, जिसके कारण वह युद्ध हुआ। अब जब सारे योद्धा मारे गये, दुर्योधन गिर गया और पाण्डव शत्रुहीन हो गये, तब ऐसी क्या आवश्यकता आ पड़ी, जिसके लिये भगवान् श्रीकृष्ण को फिर वहां जाना पड़ा! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, इसमें कोई छोटा_मोटा कारण नहीं होगा। वैशम्पायनजी ने कहा_राजन् ! तुमने जो प्रश्न किया है वह ठीक ही है; मैं इसका यथार्थ कारण बताता हूं, सुनो। भीमसेन ने गदायुद्ध के नियम का उल्लंघन करके महाबली दुर्योधन को मारा था_यह देखकर महाराज युधिष्ठिर को बड़ा भय हुआ। उन्होंने सोचा 'दुर्योधन की माता गांधारी बड़ी तपस्विनी है, उन्होंने जीवनभर घोर तपस्या की हैं। वे चाहे तो तीनों लोकों को भस्म कर सकती हैं, इसलिये सबसे पहले उन्हें ही शान्त करना चाहिये। अन्यथा हमलोगों के द्वारा जब वे अपने पुत्र का अन्यायपूर्वक वध सुनेंगी तो क्रोध में भरकर  अपने मन से अग्नि प्रकट करके हमें भष्म कर डालेंगी।' यह सब सोच_विचारकर धर्मराज ने श्रीकृष्ण से कहा_'गोविन्द ! आपकी ही कृपा से मैंने अकण्टक राज्य पाया है, अपने पुरुषार्थ से हम उसे पाने की बात भी नहीं सोच सकते थे। आपने ही सारथि बनकर हमारी सहायता और रक्षा की है। यदि आप इस युद्ध में अर्जुन के कर्णधार न होते, तो ये समुद्र जैसी कौरव_सेना को जीतकर उसके पार कैसे पहुंच पाते ? हमलोगों के लिये आपने कौन_कौन_सा कष्ट नहीं उठाया ? गदआओं के प्रहार, परिघों की मार, शक्ति, भिंदीपाल तोमर और परसों की चोटें सहीं तथा शत्रुओं की कठोर बातें भी सुनी। किन्तु दुर्योधन के मारे जाने से सब सफल हो गया। इस प्रकार यद्यपि हमलोगों की विजय हुई है, तथापि अभी हमारा चित्त संदेह के झूले में झूल रहा है। माधव ! जरा, आप गान्धारी के क्रोध का तो ख्याल कीजिये; वे नित्य कठोर तपस्या में संलग्न रहने के कारण दुर्बल हो गयी हैं, अपने पुत्र_पौत्रों का वध सुनकर निश्चय ही हमें भस्म कर डालेंगी। इसलिये इस समय उन्हें प्रसन्न करना आवश्यक है। पुरुषोत्तम! जब वे पुत्र के शोक से पीड़ित हो क्रोध से लाल_लाल आंखें करके देखेंगी, उस समय आपके सिवा दूसरा कौन उनकी ओर दृष्टि डालने का साहस करेगा ? अतः उन्हें शांत करने के लिये एक बार आपका वहां जाना उचित मालूम होता है। आपसी से इस जगत् का प्रादुर्भाव होता है और आपही में प्रलय। अतः आप ही यथार्थ कारणों से युक्त समयोचित बात कहकर गांधारी को शीघ्र शांत कर सकेंगे। बाबा व्यासजी भी वहीं होंगे। आपको पाण्डवों के हित की दृष्टि से हरेक उपाय करके गांधारी का क्रोध शान्त कर देना चाहिए।'
धर्मराज की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने दारुक को बुलाया और उसे रथ तैयार करने की आज्ञा दी। दारुक ने बड़ी फुर्ती से रथ सजाया और उसे जोतकर भगवान् की सेवा में ला खड़ा किया। भगवान् उसपर सवार हो तुरंत हस्तिनापुर को चल दिये और रथ की घरघराहट से नगर को गुंजाते हुए वहां जा पहुंचे। नगर में प्रवेश करके रथ से उतरे और धृतराष्ट्र को अपने आने की सूचना देकर उनके महल में गये। जाते ही व्यासजी का दर्शन हुआ, जो पहले से ही वहां पधारे हुए थे। श्रीकृष्ण ने व्यासजी तथा राजा धृतराष्ट्र के चरण छूए और गान्धारी को भी प्रणाम किया। फिर वे धृतराष्ट्र का हाथ अपने हाथ में ले फूट_फूटकर रोने लगे। उन्होंने दो घड़ी तक शोक के आंसू बहाये। फिर जल से आंखें धोकर विधिवत् आचमन किया और धृतराष्ट्र से कहा_'भारत ! आप वृद्ध हैं। इसलिये काल के द्वारा जो कुछ संघटित हुआ है और हो रहा है, वह आपसे छिपा नहीं है। पाण्डव सदा से ही आपके इच्छानुसार वर्ताव करते हैं। उन्होंने बहुत चाहा कि आपके कुल का नाश न हो। वे सर्वथा निर्दोष थे; तो भी उन्हें कपटपूर्वक जूए में हराकर वनवास दिया गया। नाना प्रकार के वेष बनाकर उन्होंने अज्ञातवास का कष्ट भोगना। इसके अलावा भी उन्हें असमर्थ पुरुषों की तरह बहुत_से क्लेश सहने पड़े। जब युद्ध छिड़ने का अवसर आया, तो मैं स्वयं आपकी सेवा में उपस्थित हुआ और यह झगड़ा मिटाने के लिये मैंने सब लोगों के सामने आपसे केवल पांच गांव मांगे थे। किन्तु काल की प्रेरणा से आप भी लोभ में फंस गये और मेरी प्रार्थना ठुकरा दी गयी। इस तरह आपके अपराध से संपूर्ण क्षत्रियों का संहार हुआ है। भीष्म, सोमदत्त, बाह्लीक, कृप, द्रोण, अश्वत्थामा और विदुर जी भी आपसे सर्वथा सन्धि के लिये प्रार्थना करते रहे; किन्तु आपने किसी का कहना नहीं माना। सच है, जिसके मन पर काल का प्रभाव होता है, वह मोह में पड़ ही जाता है। जब युद्ध की तैयारी शुरू हुई, उस समय आपकी भी बुद्धि मारी गयी! इसे काल का प्रभाव या प्रारब्ध के सिवा और क्या कहा जा सकता है ? वास्तव में यह जीवन प्रारब्ध के ही अधीन है। महाराज! आप पाण्डवों पर दोषारोपण मत कीजियेगा, उन बेचारों का तनिक भी अपराध नहीं है। वे न कभी धर्म से गिरे हैं न न्याय से। आपके प्रति उनका स्नेह भी कम नहीं हुआ है और अब तो आपको और गान्धारी देवी पाण्डवों से ही पिण्डा_पानी मिलनेवाला है। उन्हीं से आपका वंश बढ़ेगा। पुत्र से मिलने वाला सारा फल अब पाण्डवों से ही मिलेगा। इसलिये आप लोग पाण्डवों के प्रति मन में मैल न रखें, उनकी बुराई न सोचें। अपना ही अपराध या भूल समझकर उनका कल्याण मनावें, उनकी रक्षा करें। महाराज! आप तो जानते ही हैं, धर्मराज युधिष्ठिर की आपके चरणों में कितनी भक्ति है। कितना स्वाभाविक स्नेह है ! उन्होंने अपनी बुराई करनेवाले शत्रुओं का ही संहार किया है; तो भी वे उनके शोक में दिन_रात जलते रहते हैं, उन्हें तनिक भी चैन नहीं मिलता ! आप और गान्धारी के लिए तो वे बहुत शोक करते हैं, उनके हृदय में शान्ति नहीं है। लज्जा के मारे उन्हें आपके सामने आने की हिम्मत नहीं पड़ती। राजा धृतराष्ट्र से इस प्रकार कहकर श्रीकृष्ण शोक से दुर्बल हुई गान्धारी देवी से बोले_'कल्याणी ! मैं तुमसे भी जो कह रहा हूं, उसे ध्यान देकर सुनो। आज संसार में तुम्हारे जैसी तपस्विनी स्त्री दूसरी कोई नहीं है। तुम्हें याद होगा, उस दिन सभा में मेरे सामने ही तुमने दोनों पक्षों के हित करनेवाला धर्म और अर्थ से संयुक्त वचन कहा था; किन्तु तुम्हारे पुत्रों ने उसे नहीं माना। दुर्योधन विजय का अभिलाषी था, उससे तुमने रुखाई के साथ कहा_'ओ मूर्ख ! जिधर धर्म होता है, उसी पक्ष की जीत होती है।' राजकुमारी! तुम्हारी वहीं बात आज सत्य हुई है, ऐसा समझकर मन में शोक न करो। तुममें तपस्या का बहुत बड़ा बल है, तुम अपनी क्रोध भरी दृष्टि से चराचर जगत् को भस्म कर डालने की शक्ति रखती हो; तो भी तुम्हें पाण्डवों के नाश का विचार कभी मन में लाना न चाहिये।' श्रीकृष्ण की बात सुनकर गांधारी ने कहा_'केशव ! तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है। अबतक मेरे मन में बड़ी व्यथा थी, मैं चिंता की आग में जल रही थी; इसलिये मेरी बुद्धि विचलित हो गयी थी_मैं पाण्डवों के अनिष्ट की बात सोच रही थी। किन्तु अब तुम्हारी बातें सुनने से मेरी बुद्धि स्थिर हो गयी_क्रोध का आवेश जाता रहा। जनार्दन! ये राजा अंधे हैं, बूढ़े हैं और इनके पुत्र मारे गये पसंद नकहैं_इसके कारण शोक से पीड़ित भी हैं; अब वीरवर पाण्डवों के साथ तुम्हीं इनको सहारा देनेवाले हो।' इतना कहते-कहते गांधारी अंचल से मुंह ढांपकर फूट_फूटकर रोने लगी। पुत्रों के शोक सेसे उसे बड़ा संताप होने लगा। उस समय श्रीकृष्ण ने कितने ही कारण बताकर कितनी ही युतियां देकर गांधारी को शान्तवना दी_धीरज बंधाया।धृतराष्ट्र तथा गांधारी को आश्वासन देने के पश्चात् भगवान् ने अश्वत्थामा के भीषण संकल्प का स्मरण किया, फिर तो वे तुरंत खड़े हो गये और व्यासजी के चरणों में मस्तक झुकाकर राजा धृतराष्ट्र से बोले_'महाराज !  अब मैं यहां से जाने की आज्ञा चाहता हूं, आप शोक न करें। इस समय अश्वत्थामा के मन में पापपूर्ण विचार ओ़ोल काजाग्रत हुआ है, इसलिये सहसा उठ पड़ा हूं। उसने आज की रात पाण्डवों को मार डालने का निश्चय कर लिया है। यह सुनकर धृतराष्ट्र और गांधारी ने कहा_'जनार्दन ! यदि ऐसी बात है, तो जल्दी जाओ और पाण्डवों की रक्षा करो। हम फिर तुमसे शीघ्र मिलेंगे। तदनन्तर, भगवान् श्रीकृष्ण दारुक के साथ तुरंत चल दिये। उनके जाने के बाद महात्मा व्यासजी धृतराष्ट्र को आश्वासन देने लगे। छावनी के पास पहुंचकर श्रीकृष्ण पाण्डवों से मिले और हस्तिनापुर का सारा समाचार उन्हें कह सुनाया।

Sunday, 29 October 2023

पाण्डवों का युधिष्ठिर के शिविर में आकर उसपर अधिकार करना, अर्जुन के रथ का दाह

धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! दुर्योधन को भीमसेन के द्वारा मारा गया देख पाण्डवों और सृंजयों ने क्या किया ? संजय ने कहा_महाराज ! आपके पुत्र के मारे जाने पर श्रीकृष्णसहित पाण्डवों, पाण्डवों तथा सृंजयों को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपने दुपट्टे उछाल_उछालकर सिंहनाद करने लगे। किसी ने धनुष टंकारा तो कोई शंख बजाने लगा। किसी_किसी ने ढ़िंढ़ोरा पीटना शुरू किया बहुतेरे तो हंसने और खेलने लगे। कुछ लोग भीमसेन से बारंबार यों कहने लगे_'दुर्योधन ने गदायुद्ध में बड़ा परिश्रम किया था, उसको मारकर आपने बहुत बड़ा पराक्रम दिखाया ! भला नाना प्रकार के पैंतरे बदलते और सब तरह की मण्डल आकार गतियों से चलते हुए शूरवीर दुर्योधन भीमसेन के सिवा दूसरा कौन मार सकता था ? भीम ! आपने शत्रुओं को परास्त करके दुर्योधन का वध करने के कारण इस पृथ्वी पर अपना महान् यश फैलाया है। यह बड़े सौभाग्य की बात है।'  इस प्रकार जहां _तहां कुछ आदमी इकट्ठे होकर भीमसेन की प्रशंसा कर रहे थे। पांचाल और पाण्डव भी प्रसन्न होकर उनके सम्बन्ध में अलौकिक बातें सुना रहे थे। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा_'राजाओं ! मरे हुए शत्रु को अपनी कठोर बातों से फिर मारना उचित नहीं है। यह पापी तो उसी समय मर चुका था, जब लज्जा को तिलांजलि दे लोभ में फंसा और पापियों की सहायता लेकर हित चाहनेवाले सुहृदों की आज्ञा का उल्लंघन करने लगा। विदुर, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म और सृंजयों ने अनेकों बार अनुरोध किया; तो भी इसने पाण्डवों को उनकी पैतृक संपत्ति नहीं दी।  अब तो यह न तो मित्र कहने योग्य है, न शत्रु; यह महानीच है। काठ के समान जड़ है। इसे वचनरूपई बाणों से बेधने में कोई लाभ नहीं है। सब लोग रथों पर बैठो, अब छावनी में चलें। श्रीकृष्ण की बात सुनकर सब नरेश अपने _अपने शंख बजाते हुए शिविर की ओर चल दिये। आगे_आगे पाण्डव थे; उनके पीछे सात्यकि, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदी के पुत्र तथा दूसरे_दूसरे धनुर्धर योद्धा चल रहे थे। सब लोग पर ले दुर्योधन की छावनी में गये, जो राजा के न होने से श्रीहीन दिखायी दे रहे थे। वहां कुछ बूढ़े मंत्री और हिजड़े बैठे हुए थे। बाकी लोग रानियों के साथ राजधानी चले गये थे। पाण्डवों के पहुंचने पर उनकी सेवा में दुर्योधन के सेवक हाथ जोड़े मैले कपड़े पहने उपस्थित हुए। पाण्डव भी दुर्योधन की छावनी में जाकर अपने_अपने रथों से उतर गये। अन्त में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा_'तुम स्वयं उतरकर अपने अक्षय तरकस और धनुष भी रथ से उतार लो, इसके बाद मैं उतरूंगा। ऐसा करने में ही तुम्हारी भलाई है।' अर्जुन ने वैसा ही किया। फिर भगवान ने घोड़ों की बागडोर छोड़ दी और स्वयं भी रथ से उतर पड़े। समस्त प्राणियों के ईश्वर श्रीकृष्ण के उतरते ही उस स्थान पर बैठा हुआ दिव्य कपि अन्तर्धान हो गया; फिर वह विशाल रथ, जो द्रोणाचार्य और कर्ण के दिव्यास्त्रों से दग्ध_सा ही हो चुका था, बिना आग लगाये ही प्रज्वलित हो उठा। उसके सारे उपकरण, जूआ, धूरी, राम और घोड़े _सब जलकर खाक हो गये। वह राख की ढेर होकर धरती पर बिखर गया। यह देख पाण्डवों को बड़ा आश्चर्य हुआ। अर्जुन ने हाथ जोड़कर भगवान् के चरणों में प्रणाम करके पूछा_'गोविन्द ! यह क्या आश्चर्यजनक घटना हो गयी ? एकाएक रथ क्यों जल गया ? यदि मेरे सुनने योग्य हो तो इसका कारण बताइये।' श्रीकृष्ण ने कहा_अर्जुन ! लड़ाई में नाना प्रकार के अस्त्रों के आघात से यह रथ तो पहले ही जल चुका था, सिर्फ मेरे बैठे रहने के कारण भस्म नहीं हुआ था। जब तुम्हारा सारा काम पूरा हो गया है, तब अभी_अभी इस रथ को मैंने छोड़ा है; इसलिये यह अब भष्म हुआ है। यों तो ब्रह्मास्त्र के तेज से यह पहले ही दग्ध हो चुका था। इसके बाद भगवान् ने किंचित् मुस्कराकर राजा युधिष्ठिर को हृदय से लगाया और कहा _'कुन्तीनन्दन ! आपके शत्रु परास्त हुए और आपकी विजय हुई _यह बड़े सौभाग्य की बात है। अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव तथा स्वयं आप इस विनाशकारी संग्राम से कुशलपूर्वक बच गये_यह और भी खुशी की बात है। अब आपको आगे क्या करना है, इसका शीघ्र विचार कीजिये। उपलव्य में जब मैं अर्जुन के साथ आपके पास आया था, उस समय आपने मुझे मधउपर्क देकर कहा था_'कृष्ण ! अर्जुन तुम्हारा भाई और मित्रों, इसी हर आफत से बचाना।' उस दिन मैंने 'हां' कहकर आपकी आज्ञा स्वीकार की थी।आपके उस अर्जुन की मैंने हर तरह से रक्षा की है, यह भाइयों सहित विजयी होकर इस रोमांचकारी संग्राम से छुटकारा पा गया।' श्रीकृष्ण की बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर को रोमांच हो आया, वे कहने लगे_'जनार्दन ! द्रोण और कर्ण ने जिस ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था, उसे आपके सिवा दूसरा कौन सही सकता था ? वज्र धारी इन्द्र भी उसका सामना नहीं कर सकते थे । आपकी ही कृपा से संशप्तक परास्त हुए हैं। अर्जुन ने इस महासमर में कभी पीठ नहीं दिखायी_ यह भी आपके ही अनुग्रह का फल है। आपके द्वारा अनेकों बार हमारे कार्य सिद्ध हुए हैं। उपलव्य में महर्षि व्यास ने मुझसे पहले ही कहा था_जहां धर्म है, वहां श्रीकृष्ण हैं; और जहां श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है।' तदनन्तर, उन सभी वीरों ने आपकी छावनी में घुसकर खजाना, रत्नों की ढ़ेरी तथा भंडार_घर पर अधिकार कर लिया। चांदी, सोना, मोती, मणि, अच्छे_अच्छे आभूषण, बढ़िया कम्बल, मऋगचर्म तथा राज्य के बहुत_से सामान उनके हाथ लगे। साथ ही असंख्य दास_दासियों को भी उन्होंने अपने अधीन किया। महाराज ! उस समय आपके अक्षय धन का भण्डार पाकर पाण्डव खुशी के मारे उछल पड़े, किलकारियां मारने लगे। इसके बाद अपने वाहनों को खोलकर वे वहीं विश्राम करने लगे। विश्राम के समय श्रीकृष्ण ने कहा_' आज की रात हमलोगों को अपने मंगल के लिए छावनी के बाहर ही रहना चाहिए।' 'बहुत अच्छा' कहकर पाण्डव श्रीकृष्ण और सात्यकि के साथ छावनी से बाहर निकल गये। उन्होंने परम पवित्र ओघवतई नदी के किनारे वह रात व्यतीत की। उस समय राजा युधिष्ठिर ने समयोचित कर्तव्य का विचार करके कहा_'माधव ! एक बार क्रोध में भरी हुई गान्धारी देवी को शान्त करने के लिये आपको हस्तिनापुर जाना चाहिये, यही उचित  जान पड़ता है।'


Saturday, 14 October 2023

क्रोध में भरे हुए बलराम को श्रीकृष्ण का समझाना और युधिष्ठिर के साथ श्रीकृष्ण की तथा भीमसैन की बातचीत


धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! जब राजा दुर्योधन अधर्मपूर्वक मारा गया, उस समय बलभद्रजी ने क्या कहा ? वे तो गदायुद्ध के विशेषज्ञ हैं, यह अन्याय देखकर चुप न रहे होंगे; अतः उन्होंने यदि कुछ किया हो तो बताओ। संजय ने कहा_महाराज ! भीमसेन ने आपके पुत्र की जांघों में प्रहार किया_यह देख महाबली बलरामजी को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने सब राजाओं के बीच अपना हाथ ऊपर उठाकर भयंकर आर्तनाद करते हुए कहा_"भीमसेन ! तुम्हें धिक्कार है ! धिक्कार है !! बड़े अफसोस की बात है कि इस युद्ध में नाभि के नीचे के अंग में गदा का प्रहार किया गया। आज भीम ने जैसा अन्याय किया है, वह गदायुद्ध में पहले कभी नहीं देखा गया। शास्त्र ने यह निर्णय कर दिया है कि 'गदायुद्ध में नाभि से नीचे नहीं प्रहार करना चाहिये।' किन्तु यह तो मूर्ख है, शास्त्र को बिलकुल नहीं जानता, इसलिये मनमाना वर्ताव करता है।" इसके बाद उन्होंने दुर्योधन की ओर दृष्टिपात किया, उसकी दशा देख उनकी आंखें क्रोध से लाल हो गयीं; वे फिर कहने लगे_'कृष्ण ! दुर्योधन मेरे समान बलवान है, इसकी समानता करनेवाला कोई योद्धा नहीं है। आज अन्याय करके केवल दुर्योधन ही नहीं गिराया गया है, मेरा भी अपमान किया गया है। शरणागत की दुर्बलता देखकर शरण देनेवाले का तिरस्कार किया जा रहा है।' यह कहकर वे अपना हल ऊपर को उठाया भीमसेन की ओर दौड़े। यह देख श्रीकृष्ण ने बड़ी विनती और बड़े प्रयत्न के साथ अपनी दोनों भुजाओं से बलरामजी को पकड़ लिया और उन्हें शान्त करते हुए कहा_"भैया ! अपनी उन्नति छः प्रकार की होती है _अपनी वृद्धि और शत्रु की हानि, अपने मित्र की वृद्धि और शत्रु के मित्र की हानि। अपने या मित्र को जब विपरीत दशा आ घेरती है, तो मन में ग्लानि होती है ही। आप जानते हैं पाण्डव हमलोगों के स्वाभाविक मित्र हैं; ये विशुद्ध पुरुषार्थ का भरोसा रखनेवाले हैं, बुआ के लड़के होने के कारण हर तरह से अपने हैं। शत्रुओं ने कपटपूर्ण वर्ताव करके पहले इन्हें बहुत कष्ट पहुंचाया है। सभामवन में भीम ने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'मैं अपनी गदा से दुर्योधन की जांघें तोड़ डालूंगा।' प्रतिज्ञा पालन क्षत्रिय के लिये धर्म है और भीम ने उसी का पालन किया है। महर्षि मैत्रेय ने भी दुर्योधन को यह शाप दिया था कि 'भीम अपनी गदा से तेरी जांघें तोड़ डालेगा।' इस प्रकार यही होनहार थी, मैं भीम का इसमें कोई दोष नहीं देखता। इसलिये  आप अपना क्रोध शान्त कीजिये। बुआ और बहन के नाते पाण्डवों के साथ हमलोगों का यौन संबंध भी है; मित्र तो ये हैं ही। अतः इनकी उन्नति में ही हमलोगों की उन्नति है। इसलिये आप क्रोध न कीजिये।" श्रीकृष्ण की बात सुनकर धर्म को जाननेवाले बलदेवजी ने कहा_'सत्पुरुषों ने धर्म का अच्छी तरह आचरण किया है, किन्तु वह अर्थ और काम_इन दो वस्तुओं से संकुचित हो जाता है। अत्यन्त लोभी का अर्थ और अधिक आसक्ति रखनेवाले का काम_ये दोनों ही धर्म को हानि पहुंचाते हैं। जो मनुष्य काम से धर्म और अर्थ को, अर्थ से धर्म और काम को तथा धर्म से काम और अर्थ को हानि न पहुंचाकर धर्म, अर्थ अथवा काम_इन तीनों का सेवन करता है, वहीं अत्यन्त सुख का भागी होता है। भीमसेन ने तो धर्म को हानि पहुंचाकर इन सबको विकृत कर डाला है। श्रीकृष्ण ने कहा_'भैया ! संसार के सबलओग आपको क्रोध रहित और धर्मात्मा समझते हैं; इसलिये शान्त हो जाइये, क्रोध न कीजिये। समझ लीजिये कि कलयुग आ गया। भीम की प्रतिज्ञा को भी भुला न दीजिये। पाण्डवों को वैर और प्रतिज्ञा के ऋण से मुक्त होने दीजिये। संजय कहते हैं_श्रीकृष्ण की बात सुनकर बलदेवजी को बहुत संतोष नहीं हुआ, उन्होंने राजाओं की सभा में फिर से कहा_'धर्मात्मा राजा दुर्योधन को अधर्मपूर्वक मारने के कारण भीमसेन संसार में कपटपूर्ण युद्ध करनेवाला कहा जायगा। दुर्योधन सरलता से युद्ध कर रहा था, उस अवस्था में वह मारा गया है; अतः: वह सनातन सद्गति को प्राप्त करेगा।'  यह कहकर रोहिणीनन्दन बलरामजी द्वारका को चल दिये। उनके चले जाने से पांचाल, वृष्णि तथा पाण्डव वीर उदास हो गये। युधिष्ठिर भी बहुत दुःखी थे, वे नीचे मुंह किये चिंता में मग्न हो रहे थे। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा_'धर्मराज ! आप चुप होकर अधर्म का अनुमोदन क्यों कर रहे हैं? दुर्योधन के भाई और सहायक मर चुके हैं, बेचारा बेहोश होकर गिरा हुआ है; ऐसी दशा में भीम इसके मस्तक को पैरों से ठुकरा रहे हैं और आप धर्मज्ञ होकर चुपचाप तमाशा देखते हैं ! क्यों ऐसा हो रहा है ? युधिष्ठिर ने कहा_कृष्ण ! भीमसेन ने क्रोध में भरकर जो इसके मस्तक को पैरों से ठुकराया है, यह मुझे भी अच्छा नहीं लगा है। अपने कुल का संहार हो जाने से मैं खुश नहीं हूं। किंतु क्या करूं ? धृतराष्ट्र के पुत्रों ने सदा ही हमें अपने कपटजाल का शिकार बनाया, कटु वचन सुनाये और वनवास दिया; भीमसेन के हृदय में इन सब बातों के लिये बड़ा दु:ख था, यही सोचकर मैंने उसके इस काम की उपेक्षा की है। धर्मराज के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने बड़े कष्ट से कहा_'अच्छा, ऐसा ही सही।' राजन् ! आपके पुत्र को मारकर भीमसेन बहुत प्रसन्न हुए थे। उन्होंने युधिष्ठिर के सामने खड़े हो हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विजयोल्लास के साथ कहा _'महाराज ! आज यह संपूर्ण पृथ्वी आपकी हो गयी। इसके कांटे दूर हुए तथा यह मंगलमयी हो गयी। अब आप अपने धर्म का पालन करते हुए इसका शासन कीजिये। कपट से प्रेम करनेवाले जिस मनुष्य ने कपट करके ही वैर की नींव डाली थी, वह मारा जाकर पृथ्वी पर पड़ा हुआ है। जिन्होंने आपसे कटु वचन कहे थे वे दु:शासन, कर्ण तथा शकुनि भी नष्ट हो गये। अब सारा राज्य आपका है।' युधिष्ठिर ने कहा_सौभाग्य की बात है कि राजा दुर्योधन मारा गया और आपस के वैर का अंत हो गया। श्रीकृष्ण की सलाह के अनुसार चलकर हमने पृथ्वी पर विजय पायी। अच्छा हुआ कि तुम माता की ऋण से उऋण हो गये और अपना क्रोध भी तुमने शान्त कर लिया। शत्रु मरा और तुम्हारी विजय हुई, यह कितने आनन्द की बात है !


Wednesday, 11 October 2023

भीम के प्रहार से दुर्योधन की जंघाओं का टूटना, भीमद्वारा दुर्योधन का तिरस्कार और युधिष्ठिर का विलाप

संजय कहते हैं_भगवान् श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर अर्जुन भीमसेन के देखते _देखते अपनी बायीं जंघा ठोंकने लगे। भीम ने उनका संकेत समझ लिया। फिर वे गदा लिये अनेकों प्रकार के पैंतरे बदलते हुए रणभूमि में विचरने लगे। उस समय शत्रु को चकमा देने के लिये दायें_बायें तथा वक्रगति से घूम रहे थे। इस तरह आपका पुत्र भी भीम को मार डालने की इच्छा से बड़ी फुर्ती के साथ तरह_तरह की चालें दिखा रहा था। दोनों ही चन्दन और अगर से चर्चित हुई अपनी भयंकर गदाएं  घुमाते हुए आपस के वैर का अंत कर डालना चाहते थे। जब उनकी गदाएं टकरातीं तो आग की लपटें निकलने लगती थीं। और उनसे वज्रपात के समान भयंकर आवाज होती थी। लड़ते_लड़ते जब तक जाते तो दोनों ही घड़ी भर विश्राम करते और फिर गदा उठाकर एक_दूसरे से भिड़ जाते थे। गदा के भयंकर प्रहार से दोनो के शरीर जर्जर हो रहे थे, दोनों ही खून में लथपथ थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो हिमालय पर ढ़ाक के दो वृक्ष फूले हुए हों। अर्जुन ने भीम को जो इशारा किया, उसे दुर्योधन भी कुछ_कुछ समझ गया था; इसलिये वह सहसा उनके पास से दूर हट गया। जब वह निकट था, उसी समय भीम ने बड़े वेग से उसपर गदा चलायी; किन्तु वह अपने स्थान से एकाएक हट गया, इसलिये गदा उसे न लगकर जमीन पर आ पड़ी। इस करार उनके प्रहार को बचाकर दुर्योधन ने भीम पर स्वयं गदा का वार किया। भीमसेन को गहरी चोट लगी। उनके शरीर से खून की धारा बह चली और वे मूर्छित_से हो गये। किंतु दुर्योधन को उनकी मूर्छा का पता न चला; क्योंकि भीम अत्यन्त वेदना सहकर भी अपने शरीर को संभाले हुए थे। दुर्योधन ने यहीं समझा कि अब भीमसेन प्रहार करेंगे, इसलिये उसने उनके ऊपर पुनः प्रहार नहीं किया, वह अपने बचाव की फ़िक्र में पड़ गया। थोड़ी ही देर में जब भीमसेन पूरी तरह संभल गये तो उन्होंने दुर्योधन पर बड़े वेग से आक्रमण किया। उन्हें क्रोध में भरकर आते देख दुर्योधन ने पुनः उनके प्रहार को व्यर्थ करने का विचार किया और अवस्थान नामक दांव खेल भीम को धोखे में डालने के लिये ऊपर उछल जाना चाहा। भीमसेन उसका मनोभाव ताड़ गये थे; इसलिये सिंह के समान गर्जना करके उसके ऊपर टूट पड़े। अब वह कूदना ही चाहता था कि भीम ने उसकी जांघों पर बड़े वेग से गदा मारी। उस वज्र सरीखी गदा ने आपके पुत्र की दोनों जांघें तोड़ डालीं और वह आर्तनाद करता हुआ जमीन पर गिर पड़ा। जो एक दिन संपूर्ण राजाओं का राजा था, उस वीरवर दुर्योधन के गिरते ही बड़े जोर की आंधी चली, बिजली कौंधने लगी। धूल की वर्षा शुरु हो गयी तथा वृक्षों और पर्वतओंसहइत सारी पृथ्वी कांप उठी। धूल के साथ रक्त की वर्षा भी होने लगी। आकाश में यक्षों, राक्षसों तथा पिशाचों कोलाहल सुनाई देने लगा। बहुत _से हाथ पैरों वाले भयंकर कबंध नाचने लगे। कुओं और तालाबों में खून उफनने लगा। नदियां अपने उद्गम की ओर बहने लगीं। स्त्रियों में पुरुषों का तथा पुरुषों में स्त्रियों का_सा भाव आ गया। इस करार नाना प्रकार के अद्भुत उत्पात दिखाई देने लगे। देवता, गन्धर्व, अप्सराएं, सिद्ध तथा चारण लोग आपके दोनों पुत्रों के अद्भुत संग्राम की चर्चा करते हुए जहां से आये थे वहीं चले गये।
संजय कहते हैं_महाराज ! आपके पुत्र को इस प्रकार भूमि पर पड़ा देख पाण्डवों तथा सोमकों को बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर, प्रतापी भीमसेन दुर्योधन के पास जाकर बोले_'अरे मूर्ख ! पहले भरी सभा में तूने जो एकवस्त्रा द्रौपदी की हंसी उड़ाई थी और हमलोगों को बैल कहकर अपमानित किया था,उस उपहास का फल आज भोग ले।' यों कहकर उन्होंने बातें पैर से दुर्योधन के मुकुट को ठुकरा दिया और उसके सिर को भी पैर से दबाकर रगड़ डाला। उसके बाद जो कुछ-कुछ कहा, वह भी सुनिये_'हमलोगों ने शत्रुओं कोअ दबाने के लिये छल_कपट से काम नहीं लिया, आग में जलाकर कोशिश नहीं की, न जुआ खेला, न कोई धोखाधड़ी की, न जुआ खेला, न और कोई धोखा_धड़ी; केवल अपने बाहुबल के भरोसे दुश्मनों को पछाड़ा है। ऐसा कहकर भीमसेन खूब हंसे; फिर युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा सृंजय से धीरे धीरे बोले_'आपलोग देखते हैं न ? जो रजस्वला अवस्था में द्रौपदी को सभा के भीतर घसीट लाए थे और जिन्होंने उसे नंगी करने का प्रयत्न किया था, वे धृतराष्ट्र के सभी पुत्र पाण्डवों के हाथ से मारे गये। यह द्रुपद कुमारी की तपस्या का फल है। जिन्होंने हमें तेलहीन तिल के समान सारहीन एवं नपुंसक कहा था, उन सबको सेवकों तथा सम्बन्धियोंसहित मौर के घाट उतार दिया गया।' इसके बाद भीम ने दुर्योधन के कंधे पर रखी हुई गदा ले ली और कपटी कहकर पुनः उसके मस्तक को अपने बायें पैर से दबाया। किन्तु उनके इस वर्ताव को धर्मात्मा सोमकों ने पसंद नहीं किया। उस समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भी उनसे कहा_'भैया भीम ! तुमने अपने वैर का बदला ले लिया, तुम्हारी प्रतिज्ञा भी पूरी हो गयी; अब तो शान्त हो जाओ। दुर्योधन के मस्तक को पैर से न ठुकराओ, धर्म का उल्लंघन न करो। एक दिन यह ग्यारह अक्षौहिणी सेना का स्वामी था और अपना कुटुम्बी रहा है; अतः पैर से इसका स्पर्श नहीं करना चाहिये। इसके भाई और मंत्री मारे गये, सेना भी नष्ट हो गयी और स्वयं भी युद्ध में मारा गया; अतः यह सब प्रकार से सोचनीय है, दया का पात्र है, इसकी हंसी नहीं उड़ानी चाहिये। सोचो तो, इसकी संतानें नष्ट हो गयीं, अब इसे पिण्ड देनेवाला भी कोई न रहा। इसके सिवा अपना भाई ही तो है, क्या इसके साथ यह वर्ताव उचित था ? इसे पैरों से ठुकराकर तुमने न्याय नहीं किया है। भीमसेन ! तुम्हें तो लोग धार्मिक बताते हैं, फिर तुम क्यों राजा का अपमान करते हो ?'भीमसेन से ऐसा कहकर दुर्योधन युधिष्ठिर के निकट गये और बहुत दु:ख प्रगट करते हुए गद्गद् कण्ठ से बोले_'तात ! तुम हमलोगों पर क्रोध न करना, अपने लिये भी शोक न करना; क्योंकि सब प्राणियों को अपने पूर्वजन्म में किये हुए कर्मों का भयंकर परिणाम भोगना पड़ता है। तुमने अपने ही अपराध से इतना बड़ा संकट मोर लिया है। लोभ, मद और मूर्खता के कारण मित्रों, भाइयों, चाचाओं, पुत्रों तथा पौत्रों को मरवाकर अन्त में तुम स्वयं भी मौत के मुख में जा पड़े। तुम्हारे ही अपराध से हमें तुम्हारे महारथी भाइयों तथा अन्य कुटुम्बी का वध करना पड़ा है। वास्तव में प्रारब्ध को कोई टाल नहीं सकता। भैया ! तुम्हें अपने आत्मा के कल्याण के विषय में शोक नहीं करना चाहिये; तुम्हारी मृत्यु इतनी उत्तम हुई है, जिसकी दूसरे लोग इच्छा करते हैं। इस समय तो हम ही लोग सब तरह से शोक के योग्य हो गये; क्योंकि अब हमें अपने प्यारे बन्धुओं के वियोग में बड़े दुःख के साथ जीवन बिताना होगा। जब भाइयों, पुत्रों और पौत्रों की विधवा स्त्रियां शोक में डूबीं हुई हमारे सामने आयेंगी, उस समय हम कैसे उनकी ओर देख सकेंगे ? राजन् ! तुमने तो अकेले स्वर्ग की राह ली है, निश्चय ही तुम्हें स्वर्ग में स्थान मिलेगा।' यह कहकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर शोक से आतुर हो गये और लम्बी_लम्बी सांसें भरते हुए देर तक विलाप करते रहे।








Saturday, 30 September 2023

भीम और दुर्योधन का भयंकर गदायुद्ध

संजय कहते हैं_महाराज ! उन दोनों भाइयों में जब पुनः भिड़ंत हुई तो दोनों _ही_दोनों के चूकने का अवसर देखते हुए पैंतरे बदलने लगे। दोनों की गाएं यमदंड और वज्र के समान भयंकर दिखाई देती थीं। भीमसेन जब अपनी गदा को घुमाकर प्रहार करते, उस समय उसकी भयंकर आवाज एक मुहूर्त तक गूंजती रहती थी। यह देखकर दुर्योधन को बड़ा विस्मय होता था। नाना प्रकार के पैंतरे दिखाकर चारों ओर चक्कर लगाते हुए भीमसेन की उस समय अपूर्व शोभा हो रही थी।दोनों एक_दूसरे से भिड़कर अपनी_अपनी बचाव का प्रयत्न करते थे। तरह_तरह के पैंतरे बदलना, चक्कर देना, शत्रु पर प्रहार करना, उसके प्रहार को बचाना या रोकना तथा आगे बढ़कर पीछे हटना, वेग से शत्रु पर धावा करना, उसके प्रयत्न को निष्फल कर देना, सावधानीपूर्वक एक स्थान पर खड़ा होना, सामने आते ही शत्रु से युद्ध छेड़ना, प्रहार के लिये चारों ओर घूमना, शत्रु को घूमने से रोकना, नीचे से कूदकर शत्रु का वार बचाना, तिरछी गति से उछलकर प्रहार से बचना, पास जाकर और दूर हटकर शत्रु के ऊपर प्रहार करना_इत्यादि बहुत -सी क्रियाएं दिखाते हुए दोनों लड़ रहे थे। दोनों ही प्रहार करते हुए एक_दूसरे को चकमा देने की कोशिश करते थे। युद्ध का खेल दिखाते हुए सहसा गदआओं की चोट कर बैठते थे। इस प्रकार उनमें इन्द्र और वृत्रासुर की भांति भयंकर युद्ध चल रहा था। दोनों ही अपने _अपने मण्डल में खड़े थे। दायें मण्डल में दुर्योधन भीमसेन की पसली में गदा मारी, परन्तु भीमसेन ने उसके प्रहार को कुछ भी न गिनकर यमदण्ड के समान भयंकर गदा घुमायी और उसे दुर्योधन पर दे मारा। यह देख दुर्योधन ने भी भयंकर गदा उठाकर पुनः भीमसेन पर प्रहार किया। गदा प्रहार करते समय बड़े जोर का शब्द होता और आग की चिनगारियां छूटने लगती थीं। दुर्योधन भी अपने युद्ध कौशल का परिचय देता हुआ भीमसेन से अधिक शोभा पाने लगा। भीमसेन भी बड़े वेग से गदा घुमाने लगे। इतने में आपका पुत्र दुर्योधन युद्ध के की पैंतरे दिखाता हुआ भीम पर टूट पड़ा। भीम ने भी क्रोध में भरकर उसकी गदा पर आघात किया। दोनों गदआओं के टकराने की भयानक आवाज हुई, चिनगारियां छूटने लगीं। भीमसेन ने बड़े वेग से गदा छोड़ी थी, वह ज्यों ही नीचे गिरी, वहां की धरती कांपी उठी। यह देख दुर्योधन ने भीमसेन के मस्तक पर गदा का प्रहार किया किन्तु भीमसेन तनिक भी घबराये नहीं _यह एक अद्भुत बात थी। तत्पश्चात् भीमसेन ने आपके पुत्र पर बड़ी भारी गदा चलायी, किन्तु दुर्योधन फुर्ती से इधर_उधर होकर उस प्रहार को बचा गया। इससे लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। अब उसने भीमसेन की छाती पर गदा मारी, उसकी चोट से भीम को मूर्छा आ गयी और एक क्षण तक उन्हें अपने कर्तव्य का ज्ञान तक न रहा। किन्तु थोड़ी ही देर में उन्होंने अपने को संभाल लिया और दुर्योधन की पसली में बड़े जोर से गदा मारी। उस प्रहार से व्याकुल हो आपका पुत्र जमीन पर घुटने टेककर बैठ गया। उसे इस अवस्था में देखकर सृंजय ने हर्षध्वनि की। तब दुर्योधन क्रोध से जल उठा और महान् सर्प की भांति हुंकारें भरने लगा। उसने भीमसेन की ओर इस तरह देखा, मानो उन्हें भष्म कर डालेगा। उनकी खोपड़ी कुचल डालने के लिये वह हाथ में गदा लिये उनकी ओर दौड़ा। पास पहुंचकर उसने भीम के ललाट पर गदा का आघात किया। किन्तु भीम पर्वत के समान अविचल भाव से खड़े रहे, इस प्रहार का उनपर कोई असर नहीं हुआ। तदनन्तर, उन्होंने भी दुर्योधन के ऊपर अपनी लोहमयी गदा का प्रहार किया। उसकी चोट से आपके पुत्र की नस_नस ढ़ीली हो गयी। वह कांपता हुआ पृथ्वी पर जा पड़ा। यह देख पाण्डव हर्ष में भरकर सिंहनाद करने लगे। कुछ ही देर में जब दुर्योधन को होश हुआ तो वह उछलकर खड़ा हो गया और एक सुशिक्षित योद्धा की भांति रणभूमि में विचरने लगा। घूमते _घूमते मौका पाकर उसने सामने खड़े हुए भीमसेन को गदा मारा। उसकी चोट खाकर उनका सारा शरीर शिथिल हो गया और वे धरती पर घूमने लगे। भीम को गिराकर दुर्योधन दहाड़ने लगा। उसकी गदा के आघात से भीम के कवच के चिथड़े उड़ गये थे।  उनकी ऐसी अवस्था देख पाण्डवों को बड़ा भय हुआ। किन्तु एक ही मुहूर्त में भीम की चेतना पुनः लौट आयी। उन्होंने खून से भीगे हुए अपने मुख को पोंछा और धैर्य धारण करके आंखें खोलीं। फिर बलपूर्वक अपने को संभालकर वे खड़े हो गये। उन दोनों के युद्ध को बढ़ता देख अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से कहा_'जनार्दन ! इन दोनों वीरों में आप किसको बड़ा मानते हैं; किस्में कौन_सा गुण अधिक है ? यह मुझे बताइये।' भगवान् बोले_'शिक्षा तो इन दोनों को एक_सी मिली है, किन्तु भीमसेन बल में अधिक है और अभ्यास तथा प्रयत्न में दुर्योधन बढ़ा _चढ़ा है। यदि भीमसेन धर्मपूर्वक युद्ध करेंगे तो नहीं जीत सकते; इन्होंने जूए के समय यह प्रतिज्ञा की है कि 'मैं युद्ध मेंं गदा मारकर दुर्योधन की जांघें तोड़ डालूंगा।' आज ये उस प्रतिज्ञा का पालन करें। अर्जुन ! मैं फिर भी यह कहें बिना नहीं रह सकता कि धर्मराज के कारण हमलोगों पर पुनः भय आ पहुंचा है। बहुत प्रयास करके भीष्म आदि कौरव_वीरों को मारकर हमें विजय और यश आदि की प्राप्ति हुई थी, किन्तु युधिष्ठिर ने उस विजय को फिर से संदेह में डाल दिया है। एक की हार_जीत से सबकी हार_जीत की शर्त लगाकर इन्होंने जो इस भयंकर युद्ध को जूए का दांव बना डाला, वह इनकी बड़ी भारी मूर्खता है। दुर्योधन युद्ध की कला जानता है, वीर है और एक निश्चय पर डटा हुआ है। इस विषय में शुक्राचार्य का कहा हुआ एक श्लोक सुनने में आता है, जिसमें नीति का तत्व भरा हुआ है, मैं उसका भावार्थ तुम्हें सुना रहा हूं_'युद्ध में मरने से बचे हुए शत्रु यदि प्राण बचाने के लिये भाग जायं और फिर युद्ध के लिये लौटें तो उनसे डरते रहना चाहिये; क्योंकि वे एक निश्चय पर पहुंचे हुए होते हैं। ( उस समय वे मृत्यु से भी नहीं डरते ) जो जीवन की आशा छोड़कर साहसपूर्वक युद्ध में कूद पड़ें, उनके सामने इन्द्र भी ठहर नहीं सकते।' दुर्योधन की सेना मारी गयी थी, वह परास्त हो गया था और अब राज्य मिलने की आशा न होने के कारण वह वन में चला जाना चाहता था, इसलिये भागकर पोखरे में छिपा था। ऐसे हताश शत्रु को कौन बुद्धिमान युद्ध के लिये आमंत्रित करेगा ? अब तो मुझे यह भी संदेह होने लगा है कि 'कहीं दुर्योधन हमलोगों के जीते हुए राज्य को फिर न हथिआ ले।'








Monday, 18 September 2023

बलरामजी की सलाह से सबका समन्तपंचक में जाना तथा वहां भीम और दुर्योधन में गदायुद्ध का आरंभ

वैशम्पायनजी कहते हैं_राजा जनमेजय ! इस प्रकार होनेवाले उस तुमुलयुद्ध की बात सुनकर धृतराष्ट्र को बड़ा दु:ख हुआ और उन्होंने संजय से पूछा _'सूत ! गदायुद्ध के समय बलरामजी को उपस्थित देख मेरे पुत्र ने भीमसेन के साथ किस प्रकार युद्ध किया?' संजय ने कहा_महाराज ! बलरामजी को वहां उपस्थित देख दुर्योधन को बड़ी खुशी हुई। राजा युधिष्ठिर तो उन्हें देखते ही खड़े हो गये और बड़ी प्रसन्नता के साथ उनका पूजन करके बैठने को आसन दे कुसल_समाचार पूछने लगे। तब बलरामजी ने उनसे कहा_'राजन् ! मैंने ऋषियों के मुंह से सुना है कि कुरुक्षेत्र बड़ा पवित्र तीर्थ है, वह स्वर्ग प्रदान करनेवाला है, देवता, ऋषि तथा महात्मा, ब्राह्मण सदा उसका सेवन करते हैं, वहां युद्ध करके प्राण त्यागनेवाले मनुष्य निश्चय ही स्वर्ग में इन्द्र के साथ निवास करेंगे। इसलिए हमलोग यहां से समन्तपंचक क्षेत्र में चलें, वह देवलोक में प्रजापति की उत्तर वेदी की नाम से विख्यात है। वह त्रिभुवन का अत्यन्त पवित्र एवं सनातन तीर्थ है, वहां युद्ध करने से जिसकी मृत्यु होगी, वह अवश्य ही स्वर्गलोक में जायगा।' 'बहुत अच्छा' कहकर युधिष्ठिर ने बलरामजी की आज्ञा स्वीकार की और समन्तपंचक क्षेत्र की ओर चल दिये। राजा दुर्योधन भी हाथ में बहुत बड़ी गदा ले पाण्डवों के साथ पैदल ही चला। उस समय शंखनाद होने लगा, भेरियां बज उठीं और शूरवीरों के सिंहनाद से संपूर्ण दिशाएं भर गयीं। तत्पश्चात् वे लोग कुरुक्षेत्र की सीमा में आये, फिर पश्चिम की ओर आगे बढ़कर सरस्वती के दक्षिण किनारे पर जीत एक उत्तम तीर्थ में पहुंचे। वहीं स्थान उन्हें युद्ध के लिये पसंद आया। फिर तो भीमसेन कवच पहनकर हाथ में बड़ी नोकवाली गदा ले युद्ध के लिये तैयार हो गये। दुर्योधन भीअ सिर पर टोप लगाये सोने का कवच बांधे भीम के सामने डट गया। फिर दोनों भाई क्रोध में भरकर एक_दूसरे को देखने लगे। दुर्योधन की आंखें लाल हो रही थीं। उसने भीमसेन की ओर देखकर अपनी गदा संभाली और उन्हें ललकारा। भीम ने भी गदा ऊंची करके दुर्योधन को ललकारा। दोनों ही क्रोध में भरे थे। दोनों की गाथाएं ऊपर को उठी थीं और दोनों ही भयंकर पराक्रम दिखाने वाले थे। उस समय वे राम_रावण और बालि सुग्रीव के समान जान पड़ते थे। तदनन्तर, दुर्योधन ने केकय, सृंजय और पांचालों तथा श्रीकृष्ण, बलराम एवं अपने भाइयों के साथ खड़े हुए युधिष्ठिर से कहा_'मेरा भीमसेन के साथ जो युद्ध ठहरा हुआ है, उसको आप सब लोग पास ही बैठकर देखिये।' दुर्योधन की इस राय को सबने पसंद किया। फिर सब लोग बैठ गये। चारों ओर राजाओं की मंडली बैठी और बीच में भगवान् बलराम विराजमान हुए; क्योंकि सबलओग उनका सम्मान करते थे।वैशम्पायनजी कहते हैं _यह प्रसंग सुनकर धृतराष्ट्र को बड़ा दु:ख हुआ, उन्होंने संजय से कहा_'सूत ! जिसका परिणाम इतना दु:कंद होता है, उस मानव_जन्म को धिक्कार है ! मेरा पुत्र ग्यारह अक्षौहिणी सेना का मालिक था, उसने सब राजाओं पर हुक्म चलाया, सारी पृथ्वी का अकेले उपभोग किया, किन्तु अन्त में यह हालत हुई कि गदा हाथ में लेकर उसे पैदल ही युद्ध में जाना पड़ा ! इसे प्रारब्ध के सिवा और क्या कहा जा सकता ?'
संजय ने कहा_महाराज ! आपके पुत्र ने मेघ के समान गर्जना करके जब भीम को युद्ध के लिये ललकारा, उस समय अनेकों भयंकर उत्पात होने लगे। बिजली की गड़गड़ाहट के साथ आंधी चलने लगी। धूल की वर्षा शुरु हो गयी और चारों दिशाओं में अंधकार छा गया। आकाश से सैकड़ों उल्काएं टूट_टूटकर गिरने लगीं। बिना अमावस्या के ही सूर्य पर ग्रहण लग गया। वृक्षों तथा वनों के साथ धरती डोलने लगी। पर्वतों के शिखर टूट_टूटकर जमीन पर पड़ने लगे। कुओं के पानी में बाढ़ आ गयी। किसी का शरीर नहीं दिखायी देता तो भी देहधारीकी_सी आवाजें सुनायी पड़ती थीं।
इन सब अपशकुनों को देखकर भीमसेन ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा_'भैया ! आपके हृदय में जो कांटा सकता रहता है, उसे आज निकाल फेंकूंगा। इस पापी को गदा से मारकर इसके शरीर के टुकड़े_टुकड़े कर डालूंगा। अब यह पुनः हस्तिनापुर में नहीं प्रवेश करने पायगा। इस दुष्ट ने मेरे बिछौने पर सांप छोड़ा, भोजन में विष मिलाया, प्रमाणकोटि में ले जाकर मुझे पानी में गिरवाया, लाक्षाभवन में जलाने का प्रयत्न किया, सभा में हंसी उड़ायी, हमलोगों का सर्वस्व छीना तथा इसी के कारण हमें वनवास एवं अज्ञातवास का कष्ट भोगना पड़ा। आज सबका बदला चुकाकर मैं उन दु:खों से छुटकारा पा जाऊंगा। इसे मारकर अपने आत्मा का ऋण चुकाऊंगा। इस दुष्ट की आयु पूरी हो गयी है। अब इसे माता_पिता का दर्शन भी नहीं मिलेगा। आज यह कउलकलंक अपने राज्य, लक्ष्मी तथा प्राणों से हाथ धोकर सदा के लिये जमीन पर सो जायगा।' यह कहकर महापराक्रमी भीमसेन गदा ले युद्ध के लिये डट गये और दुर्योधन को पुकारने लगे। दुर्योधन ने भी गदा ऊंची की, यह देख भीमसेन पुनः क्रोध में भरकर बोले_'दुर्योधन ! वारणाव्रत में राजा धृतराष्ट्र ने और तूने जो पाप किये थे, उन्हें आज याद कर ले। तूने भरी सभा में राजस्वला द्रौपदी को जो क्लेश पहुंचाया, जूए के समय तूने और शकुनि ने मिलकर जो राजा युधिष्ठिर के साथ वंचना की_उन सबका बदला चुकाऊंगा। खुशी की बात यह है कि आज तू सामने दिखाई  दे रहा है। तेरे ही कारण पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, कर्ण तथा शल्य जैसे वीर मारे गये। तेरे भाई तथा और भी बहुत _से क्षत्रिय यमलोक पहुंच गये। सबसे पहले वैर की आग लगानेवाला शकुनि और द्रौपदी को दु:ख देनेवाला प्रतिकारी भी चल बसा, अब तू ही रह गया है, इसलिये तुझे भी इस गदा से मौत के घाट उतारूंगा_इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।' राजन् ! भीमसेन ने ये बातें बड़े जोर से कहीं थीं, इन्हें सुनकर आपके पुत्र ने बेधड़क जवाब दिया_'वृकोदर ! इतनी शेखी बघारने से क्या होगा ? चुपचाप लड़ाई कर, आज तेरा युद्ध का सारा हौसला मिटाये देता हूं। दुर्योधन को तू दूसरे साधारण लोगों के समान मत समझ, यह तेरे_जैसे किसी भी मनुष्य की धमकी से नहीं डरता। मैं तो इसे सौभाग्य समझता हूं, मेरे मन में बहुत दिनों से यह इच्छा थी कि तेरे साथ गदायुद्ध होता, सो आज देवताओं ने उसे पूर्ण कर दिया। अब बहुत बड़बड़ाने से कोई लाभ नहीं है, पराक्रम के द्वारा अपनी वाणी को सत्य करके दिखा; विलम्ब न कर।'
दुर्योधन की बात सुनकर सबने उसकी बड़ी प्रशंसा की और भीमसेन गदा उठाकर बड़े वेग से  उसकी ओर दौड़े। दुर्योधन ने भी गर्जना करते हुए आगे बढ़कर उनका सामना किया। फिर दोनों दो सांडों की तरह एक_दूसरे से भिड़ गये। प्रहार_पर_प्रहार होने लगा। उस समय गदा की चोट पड़ने पर वज्रपात के समान भयंकर आवाज होती थी। दोनों खून से नहा उठे। उनके रक्तरंजित शरीर खिले हुए ढ़ाकी के वृक्षों_जैसे दिखाई देने लगे। लड़ते_लड़ते दोनों ही थक गये, फिर दोनों ने घड़ीभर विश्राम किया। इसके बाद दोनों ही अपनी_अपनी गलाएं उठाकर आपस में युद्ध करने लगे।

Friday, 8 September 2023

समन्तपंचक तीर्थ ( कुरुक्षेत्र ) की महिमा तथा नारदजी के कहने से बलदेवजी का भीम और दुर्योधन का युद्ध देखने जाना

ऋषियों ने कहा_बलरामजी ! समन्तपंचक क्षेत्र सनातन है, यह प्रजापति की उत्तर वेदी कहलाता है। प्राचीन काल से देवताओं ने यहां बहुत बड़ा यज्ञ किया था तथा बुद्धिमान महात्मा राजर्षि कुरु ने पहले बहुत वर्षों तक इस क्षेत्र की जमीन जोती थी, इसलिये उन्हीं के नाम पर यह 'कुरुक्षेत्र' कहा जाने लगा।
बलरामजी ने पूछा _मुनीवरों ! महात्मा कुरु ने इस क्षेत्र में हल क्यों चलाया ?
ऋषियों ने कहा_बलरामजी ! पूर्वकाल में राजा कुरु जब यहां प्रतिदिन उठकर हल चलाया करते थे, उन्हीं दिनों की बात है, इन्द्र ने स्वर्ग से आकर कुरु से इसका कारण पूछा_'राजन् ! आप इतना रयइस क्यों कर रहे हैं ? यहां का जमीन जोतने से आपका क्या अभिप्राय है ?'  कुरु ने कहा_' इन्द्र ! जो लोग इस क्षेत्र में मरेंगे वे पुण्यवानों के लोक में जायेंगे।' यह जवाब सुनकर इन्द्र को हंसी आ गई। वे चुपचाप स्वर्ग लौट आये। इससे राजर्षि करु का उत्साह कम नहीं हुआ, वे वहां की जमीन जोतने में लगे ही रह गये। इन्द्र ने की बार आकर प्रश्न किया, किन्तु वहीं उत्तर पाकर वे हर बार लौट गये। कुरु ने भी कठोर तपस्या के साथ हर जोतना आरम्भ किया। तब इन्द्र ने उनका मनोभाव देवताओं से कह सुनाया। सुनकर देवता बोले_'अगर संभव हो तो राजर्षियों को वरदान देकर राजी कर लीजिये। नहीं तो यदि वे अपने प्रयत्न में सफल हो गये और मनुष्य यज्ञ किये बिना ही स्वर्ग में आने लगे तो हमलोगों का यज्ञभाग नष्ट हो जायगा। Wतब इन्द्र ने कुरु के पास आकर कहा_'राजन् ! अब आप कष्ट न उठाइये, मेरी बात मानिये; मैं वरदान देता हूं कि जो मनुष्य अथवा पशु यहां निराहार रहकर या युद्ध में मारे जाकर शरीर त्याग करेंगे, वे स्वर्ग के अधिकारी होंगे।' राजा कुरु ने 'बहुत अच्छा' कहकर इन्द्र की आज्ञा स्वीकार की और इन्द्र भी राजा की अनुमति ले प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग को चले गये।
बलरामजी ! इस प्रकार शुभ उद्देश्य से राजर्षि कुरु ने इस क्षेत्र को जोता था। पृथ्वी पर इससे बढ़कर कोई पवित्र स्थान नहीं है। जो मनुष्य यहां तप करेंगे, वे देहत्याग के पश्चात् ब्रह्मलोक जायेंगे। जो दान करेंगे उनका दिया हुआ हजार गुना होकर फल देगा। जो सदा यहां निवास करेंगे, उन्हें यमराज के राज्य में नहीं जाना पड़ेगा। यदि राजा लोग यहां आकर बड़े _बड़े यज्ञ करें तो जबतक यह पृथ्वी कायम रहेगी तब तक के लिये उन्हें स्वर्ग में रहने का सौभाग्य प्राप्त होगा। साक्षात् इन्द्र ने भी कुरुक्षेत्र के विषय में यह उद्गार प्रकट किया है_'कुरुक्षेत्र की धूल भी यदि हवा से उड़कर किसी पापी के ऊपर पड़ जाये तो वह उसे उसे उत्तम लोक में पहुंचाती है। यहां  बड़े_बड़े देवता, उत्तम ब्राह्मण तथा नृग आदि नरेश भी यज्ञ करके उत्तम गति को प्राप्त कर चुके हैं। तरन्तुक से लेकर आरन्तुक तक तथा रामहृद से आरम्भ करके यमचक्रकत के बीच का जो स्थान है वहीं कुरुक्षेत्र और समन्तपंचक तीर्थ है। इसे प्रजापति की उत्तर वेदी भी कहते हैं। यह क्षेत्र बहुत ही पवित्र और कल्याणकारी है, देवताओं ने भी इसका सम्मान किया है। यह सभी सद्गुणों से सम्पन्न है; अतः यहां मरे हुए सब क्षत्रिय अक्षय गति को प्राप्त होंगे।' इस प्रकार साक्षात् इन्द्र ने यह बात कही और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवताओं ने इसका समर्थन किया था। वैशम्पायनजी कहते हैं_ तदनन्तर कुरुक्षेत्र का दर्शन और वहां बहुत _सा दान करके बलरामजी एक दिव्य आश्रम के निकट गये। वहां पहुंचकर उन्होंने मुनियों से पूछा_'यह सुन्दर आश्रम किसका है ?' तब उन्होंने कहा_'बलरामजी ! पहले तो यहां भगवान् विष्णु तपस्या कर चुके हैं, फिर अक्षय फल देनेवाले कई यज्ञ भी इस आश्रम पर हुए हैं। बाल्यकाल से ही ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाली एक सिद्ध ब्राह्मणी भी यहां तपस्या कर चुकी है। यह शाण्डिल्य मुनि की पुत्री थी।'
ऋषियों की बात सुनकर बलभद्रजी ने उन्हें प्रणाम किया और हिमालय के समीप उस आश्रम में गये। वहां के उत्तम तीर्थ का तथा सरस्वती के उद्गमभूत श्रोत का दर्शन करके उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। इसके बाद कआरपवन तीर्थ में जाकर उन्होंने वहां के स्वच्छ, शीतल एवं जल में डुबकी लगायी तथा देवताओं और पितरों का तर्पण करके ब्राह्मणों को दान दिया। फिर एक रात वहां निवास करके वे ब्राह्मणों और संन्यासियों के साथ मित्रावरुण के पवित्र आश्रम पर गये। वह स्थान यमुना के तट पर है। सर्वप्रथम उस स्थान पर आकर इन्द्र, अग्नि तथा अर्यमा बहुत प्रसन्न हुए थे। बलरामजी वहां स्नान_दान करके ऋषियों और सिद्धों के साथ बैठकर उत्तम कथाएं सुनने लगे।
उसी समय देवर्षि नारदजी दण्ड, कमण्डलु और मनोहर वीणा लिये वहां आ पहुंचे। उन्हें आते देख बलरामजी उठकर खड़े हो गये और उनका विधिवत् पूजन करके उनसे कौरवों का समाचार पूछने लगे। नारदजी, जिस प्रकार कौरवों का महासंहार हुआ था, वह सब ज्यों_का_त्यों सुना दिया। तब बलभद्रजी ने दी:ख प्रकट करते हुए कहा_' तपोधन ! उस क्षेत्र की क्या अवस्था है तथा वहां आये हुए राजाओं की क्या दशा हुई है ? यह सब संक्षेप के साथ मैं पहले ही सुन चुका हूं। अब मुझे वहां का विस्तृत समाचार जानने की उत्कण्ठा हो रही है।'
नारदजी ने कहा_ भीष्मजी तो पहले ही मारे गये, उनके बाद द्रोणाचार्य, जयद्रथ, कर्ण और उसके पुत्र भी परलोक पहुंच गये। भूरिश्रवा, शल्य तथा दूसरे महाबली राजाओं की भी यही दशा हुई है। ये सब राजा और राजकुमार दुर्योधन की विजय के लिये अपने प्राणों की बलि दे चुके हैं। अब जो मरने से बचे हैं, उनके नाम सुनिये। दुर्योधन की सेना में कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा_ये ही तीन प्रधान वीर बचे हुए हैं। किन्तु जब शल्य मारे गये तो ये भी डर के मारे पलायन कर गये। उस समय दुर्योधन बहुत दु:खी हुआ और भागकर द्वैपायण सरोवर में जा छिपा। माया से सरोवर का पानी बांधकर वह भीतर हो रहा था, इतने में पाण्डवलोग भगवान् श्रीकृष्ण के साथ वहां आ पहुंचे और उसे कड़वी बातें सुनाकर कष्ट पहुंचाने लगे। वह भी बलवान ही ठहरा, इनके ताने क्यों सहता ? हाथ में गदा लेकर उठ पड़ा और भीमसेन से युद्ध करने के लिये उनके पास जाकर खड़ा हो गया। अब उन दोनों में भयंकर युद्ध छिड़नेवाला है, यदि आप देखने को उत्सुक हैं तो शीघ्र जाइये, विलंब न कीजिये। अपने दोनों शिष्यों का युद्ध देखिये।
वैशम्पायनजी कहते हैं _नारदजी की बात सुनकर बलरामजी ने अपने साथ आये हुए ब्राह्मणों की पूजा करके उन्हें विदा कर दिया और सेवकों को द्वारका चले जाने की आज्ञा दी। फिर वे, जहां सरस्वती का श्रोत निकला हुआ है, उस श्रेष्ठ पर्वत शिखर से नीचे उतरे और उस तीर्थ का महान् फल सुनकर ब्राह्मणों के समीप उसकी महिमा का इस प्रकार वर्णन करने लगे _'सरस्वती के तट पर निवास करने में जो सुख है, आनन्द है, वह अन्यत्र कहां मिल सकता है? उसमें जो गुण हैं, वे और कहां हैं? सरस्वती का सेवन करके स्वर्गलोक में पहुंचे हुए मनुष्य उसका सदा ही स्मरण करते रहेंगे। सरस्वती सब नदियों में पवित्र है, वह संसार का कल्याण करने वाली है, सरस्वती को पाकर मनुष्य इहलोक और परलोक में पापों के लिये शोक नहीं करते।'
तदनन्तर, बारंबार सरस्वती की ओर देखते हुए बलरामजी सुंदर रथ पर सवार हुए और शिष्यों का युद्ध देखने के लिये तेज चाल से चलकर द्वैपायन सरोवर के पास जा पहुंचे