Wednesday, 5 February 2025

युद्धभूमि में पहुंचकर स्त्रियों का विलाप करना और गांधारी का श्रीकृष्ण से उनकी दशा का वर्णन करना

श्री वैशम्पायनजी कहते हैं _ जनमेजय ! गांधारी बड़ी ही पतिव्रता, भाग्यवती और तपस्विनी थी।
वह सर्वदा सत्य भाषण ही करती थी। महर्षि व्यास के वर से उसे दिव्यदृष्टि प्राप्त हो गयी थी। उसके प्रभाव से उसे दूर ही से कौरवों की संहारभूमि दिखाई दे रही थी। उसे देखकर वह तरह_तरह से विलाप करने लगी। बहुत दूर होने पर भी उसे वह रणक्षेत्र पास_ही_सा जान पड़ता था। वह बड़ा ही रोमांचकारी था ; हड्डी, केश और चर्बी से भरा हुआ था। उसमें खून की धाराएं बह रही थी; सब ओर सहस्त्रों लोथें पड़ी थीं तथा ख़ून में लथपथ हाथी, घोड़े, रथ और योद्धाओं के मस्तक हीन शरीर एवं श्रीहीन मस्तक पड़े हुए थे।अब भगवान् व्यास की आज्ञा पाकर राजा युधिष्ठिर आदि सब पाण्डव महाराज धृतराष्ट्र और श्रीकृष्ण को आगे कर कुरुकुल की सब स्त्रियों को लेकर रणक्षेत्र की ओर चले। कुरुक्षेत्र में पहुंचकर उन विधवा स्त्रियों ने युद्ध में मरे हुए अपने भाई, पुत्र, पिता और पति आदि को देखा। उस भीषण संहारभूमि को देखकर वे रआजमहइलआएं चित्कार करती हुईं अपने बहुमूल्य रथों से गिर पड़ीं। इस अभूतपूर्व दृश्य को देखकर वे दु:ख से अत्यंत व्याकुल हो गयीं। उनमें से किसी के तो शरीर मुरझा गये और कोई पृथ्वी पर पछाड़ खाने लगीं। वे बहुत थकी हुई थीं और अनाथ हो चुकी थी। इस समय उन्हें कुछ भी होश_हवास नहीं था। पांचाल और करुकुल की स्त्रियों के लिये यह बड़ा ही करुणा पूर्ण प्रसंग था।
तब दु:खिनी महिलाओं के आर्तनाद से उस भीषण युद्धस्थल में बड़ा कोहराम मचा देख धर्मज्ञा गान्धारी ने श्रीकृष्ण को बुलाकर कहा, 'माधव ! देखो तो ये मेरी विधवा बहुएं बाल बिखरे कुर्सियों के समान विलाप कर रही हैं। ये उन भरतकुलभूषणों को याद कर_करके अलग _अलग अपने पुत्र, भाई, पिता और पतियों की ओर दौड़ जाती हैं। वीरवर ! इस ऐसे यद्धस्थल को देखकर तो मैं शोक से जली जाती हूं। मधुसूदन ! इस पांचाल और कौरव वीरों को मारे जाने से मुझे तो ऐसा जान पड़ता है मानो पांचों भूतों का ही नाश हो गया। क्या कोई पुरुष ऐसी कल्पना भी कर सकता था कि इस युद्ध में जयद्रथ, कर्ण, द्रोण, भीष्म और अभिमन्यु जैसे वीर भी स्वाहा हो जायेंगे ? हाय ! मेरे लिये इससे बढ़कर और क्या दु:ख होगा । अवश्य ही पहले जन्मों में मुझसे कोई पाप कर्म हो गया है। इसी से मुझे अपनी आंखों अपने पुत्र, पौत्र और भाइयों की मृत्यु देखनी पड़ी है। पुत्रशोकाकुला गांधारी ने इसी प्रकार दीनतापूर्वक विलाप करते हुए श्रीकृष्णसे की बातें कही; इतने में ही उसकी दृष्टि अपने मृतक पुत्र दुर्योधन पर पड़ी। दुर्योधन को मारा हुआ देखते ही शोकाकुल गांधारी कटे हुए केले के समान सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ी। होश आने पर जब उसने दुर्योधन को खून में लथपथ हुए पृथ्वी पर पड़ा देखा तो वह उससे लिपटकर 'हा पुत्र ! हां पुत्र!' ऐसा कहकर रोने लगी। फिर उसे अपने आंसुओं से सींचती हुई श्रीकृष्ण से कहने लगी, 'वार्ष्णेय ! जब यह बंधुओं को विध्वंस करनेवाला ठन गया तो दुर्योधन ने हाथ जोड़कर मुझसे कहा था, 'माताजी ! मुझे आशीर्वाद दो कि युद्ध में मेरी विजय हो।' तब मैंने यही कहा था कि 'जय तो वहीं रहती है, जहां धर्म रहता है; किन्तु यदि तुम युद्ध करने में घबराये नहीं तो तुम्हे देवताओं के समान शस्त्रों से मरने पर प्राप्त होनेवाले लोक अवश्य मिलेंगे।' इस प्रकार मैंने तो पहले ही दुर्योधन से ऐसी बात कह दी थी। इसलिये मुझे इसके लिये शोक नहीं है। मुझे तो महाराज के लिये चिन्ता है, जिनके सभी सभी संबंधी संग्राम में काम आ गये हैं। जरा काल के उलट_फेर को तो देखो ! जो दुर्योधन मूर्धाभिषिक्त राजाओं के आगे_आगे चलता था, वहीं धूल में पड़ा हुआ है। आज वीरशय्या पर शत्रु के सामने मुंह किये पड़ा है, इसलिये इसे कोई साधारण गति नहीं मिली होगी। ओह ! जो ग्यारह अक्षौहिणी सेना को लेकर युद्ध के मैदान में उतरा था, वह दुर्योधन अपने अन्याय से ही आज मारा गया। यह अभागा बड़ा मूर्ख था। इसने अपने पिता और विदुरजी_जैसे वृद्ध पुरुषों का अपमान किया, इसी से आज काल के गाल में चला गया। जिसने तेरह वर्ष तक पृथ्वी का निष्कण्टक राज किया, वहीं मेरा पुत्र आज मरकर पृथ्वी पर सो रहा है। श्रीकृष्ण ! तुम सुवर्ण की वेदी के समान तेजस्विनी लक्ष्मण की माता को तो देखो। आज उसके भी बाल बिखरे हुए हैं। मेरा यह पुत्रवधू बड़े उदार हृदय की है। पता नहीं इसकी स्थिति कैसी है। यह अपने पति के लिये शोकाकुल है या पुत्र के लाये ? कभी यह पति की ओर देखती है तो कभी पुत्र कि ओर देखने लगती है। किन्तु कुछ भी हो, यदि वेद और शास्त्र सच्चे हैं तो दुर्योधन अवश्य ही अपने बाहुबल के प्रताप से अविनाशी लोक प्राप्त किये होंगे। माधव ! देखो, इधर मेरे सौ पुत्र पड़े हुए हैं। इन सबको भीमसेन ने ही अपनी गदा से पछाड़ा है ! मुझे तो इसी से अधिक दु:ख होता है कि पुत्रों के मारे जाने से आज ये छोटी_छोटी पुत्रवधूएं बाल खोले रणभूमि में फिर रही हैं। हाय ! जो कभी पैरों में आभूषण पहने राजमहल की भूमि पर विचरती थीं, वे ही आज आपत्ति में पड़कर इन खून से लथपथ कठोर रणांगन में घूम रही हैं।
इस सुकुमारी राजदुलारी लक्ष्मण की माता को देखकर तो मेरे मन को किसी प्रकार ढ़ाढ़स नहीं बांधता। देखो ! इन महिलाओं में से कोई भाइयों को, कोई पिताओं को और कोई पुत्रों को पड़ें देखकर उनकी भुजाएं पकड़_पकड़कर पछाड़ खा रही हैं। यही नहीं, इस दारुण संहार में अपने संबंधियों के मारे जाने से तुम्हें कोई मध्यम और वृद्ध अवस्था की स्त्रियों का रुदन सुनाई पड़ेगा। 'इधर देखो, यह दु:शासन पड़ा हुआ है। शत्रुसूदन महावीर भीम ने इसे युद्ध में पछाड़कर इसके शरीर का खून पिया है। हाय ! द्रौपदी के कहने से और जुए के समय सहे हुए दु:खों को याद करके भीम ने मेरू इस पुत्र की कैसी दुर्गति की है। कृष्ण ! मैंने तो दुर्योधन को उसी समय कहा था कि 'तू मौत कई फांसी में बंधे हुए शकुनि का साथ छोड़ दें। अपने इस कुबुद्धि मामा को तू पूरा कलहप्रिय समझ। तू इसे अभी त्यागकर पाण्डवों के साथ संधि कर ले। मूर्ख ! क्या तू नहीं जानता भीमसेन कैसा असहनशील है, जो हाथी को उल्का के समान जलाने के समान तू उसे अपने वावाणों से बींधा करता है ?' आज उसी का फल है कि भीमसेन का पछाड़ा हुआ दु:शासन अपनी लंबी _लंबी भुजाओं को फैलाया हुआ पृथ्वी पर सो रहा है। क्रोधी भीमसेन ने दु:शासन को युद्ध में मारकर उसका खून पिया, यह तो उसका बड़ा ही भीषण काम था। 'माधव ! देखो, यह मेरा पुत्र विकर्ण पड़ा हुआ है।  इसकी तो सभी बुद्धिमान प्रशंसा करते थे। भीम ने इसे भी सैकड़ों टुकड़े करके मार डाला है। कर्णिक, नाविक और नारायण जाति के बाणों से यद्यपि इसके मर्मस्थान छिन्न-भिन्न हो गये हैं, तो भी इसकी कान्ति अभी तक बनी हुई है। यह शत्रुओं का संहार करने वाला दउर्मउख सोया हुआ है। समरशूर भीम ने अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए इसे भी मार डाला है। श्रीकृष्ण ! इसके सामने तो संग्राम में कोई भी नहीं टिक सकता था। इसे शत्रुओं ने कैसे मार डाला। इधर देखो, यह धृतराष्ट्र नन्दन चित्रसेन मरा पड़ा है; यह तो धनुर्धरों के लिये आदर्श रूप था। 'केशव ! इस अभिमन्यु को तो बल और शौर्य में अर्जुन तथा तुम्हारी अपेक्षा भी श्रेष्ठ कहा जाता था, इसने तो अकेले ही मेरे पुत्र के अभेद्य व्यूह को तोड़ डाला था। सो, देखो यह भी अनेकों को मारकर स्वयं मरा पड़ा है। किन्तु मैं देखती हूं कि मर जाने पर भी अतुलित तेजस्वी अभिमन्यु का तेज फीका नहीं पड़ा है। देखो, यह विराटपुत्री अनिन्दिता उत्तरा अपने वीर और अल्पवयस्क पति को देखकर कैसा शोक कर रही है। यह बार_बार अपने पति के पास आकर आपने हाथ से उसके शरीर पर लगी हुई धूल झाड़ रही है। कृष्ण ! यह अभिमन्यु तो बल, वीर्य, तेज और रूप में बहुत कुछ तुम्हारे ही समान है। किन्तु हाय ! शत्रुओं का शिकार होकर आज यह पृथ्वी पर पड़ा है। देखो ! उत्तरा उसके खून सने हुए बालों को हाथ से सुलझा रही है और गोदी में उसका सिर रखकर मानो वह जीवित है, इस प्रकार पूछ रही है कि 'आप तो साक्षात्  श्रीकृष्ण के भांजे और गाण्डीवधारी अर्जुन के पुत्र हैं ! आपको संग्रामभूमि में उन महारथियों ने कैसे मार डाला ।क्रूरकर्मा कृपाचार्य, कर्ण, जयद्रथ तथा द्रोण और अश्वत्थामा को धिक्कार है, जिन्होंने मुझे विधवा बना दिया। युद्ध में अनेकों योद्धाओं ने मिलकर आपको मार डाला, यह देखकर भी आपके पिता अबतक कैसे जी रहे हैं। 'प्राणनाथ ! आपने शस्त्रों से जिन पुण्य लोकों पर विजय पायी है, वहीं मैं भी धर्म तथा अपने इन्द्रिय_निग्रह के बल पर शीघ्र ही आ रही हूं; आप मेरी बांट देखिये ! सम्भवतः: मृत्युकाल आये बिना किसी का मरना बड़ा कठिन होता है, तभी तो मैं अभागिनि आपको मरा देखकर भी अबतक जी रही हूं। वीर ! इस लोक में तो आपके साथ मेरा छ: महीने का ही सहवास बंदा था। सातवें महीने में ही आप परलोक सिधार गये।'उत्तरा को इस प्रकार विलाप करते देखकर मत्स्यराज की दूसरी स्त्रियां उसे खींचकर अन्यत्र ले जा रही हैं। किन्तु राजा विराट को मरा हुआ देखकर वे स्वयं भी विलाप कर रही हैं। धूप, आयास और परिश्रम के कारण इन सभी के मुंह उतर गये हैं। इधर ये रणभूमि के अग्रभाग में ही उत्तर, कम्बोजकुमार, सुदक्षिण और लक्ष्मण आदि की बच्चे मरे परे हैं। माधव ! जरा इनपर भी तो दृष्टि डालो।'







Thursday, 9 January 2025

पाण्डवों का राजा धृतराष्ट्र और गांधारी से मिलना, गांधारी का भीमसेन पर क्रोध तथा व्यासजी और भीमसेन का उसे शान्त करना

श्री वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! इधर महाराज युधिष्ठिर ने सुना कि हमारे बूढ़े ताऊजी संग्राम में मरे हुए वीरों का अन्त्येष्टि कर्म कराने के लिये हस्तिनापुर चल दिये हैं। तब वे शोकाकुल धृतराष्ट्र के पास अपने भाइयों को लेकर चले। इस समय श्रीकृष्ण, सात्यकि और युयुत्सु भी उनके साथ हो लिए तथा पांचाल महिलाओं के साथ द्रौपदी ने भी उनका अनुसरण किया। गंगा तट पर पहुंचकर राजा युधिष्ठिर ने कुररी की तरह विलाप करती हुई स्त्रियों केअनेकों यूथ देखे। वहां हाथ उठाकर आर्त स्वर से रोती हुई हजारों स्त्रियों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। वे कहने लगीं, 'राजन् ! आज आपकी धर्मज्ञान और दयालु था कहां चली गयी जो इस तरह अपने चाचा, ताऊ, भाई, गुरु, पुत्र और मित्रों को भी मार डाला। इन सबको और अभिमन्यु तथा द्रौपदी के पुत्रों को भी खोकर अब आप इस राज्य को लेकर क्या करेंगे ?' इस प्रकार रोती हुई उन सब स्त्रियों को पार करके महाराज युधिष्ठिर अपने ज्येष्ठ पइतऋव्य राजा धृतराष्ट्र के पास पहुंचे और उनके चरणों में प्रणाम किया। इसके बाद उनके अन्य साथियों ने भी धर्मानुसार धृतराष्ट्र को प्रणाम करके अपने_अपने नाम लिये। उन्होंने उदास चित्त से युधिष्ठिर को गले लगाया। फिर उनका चित्त एकदम कठोर हो गया और वे अग्नि के समान भीम को भस्म कर डालने का विचार करने लगे। श्रीकृष्ण पहले ही उनका अभिप्राय ताड़ गये थे। इसलिये उन्होंने भीमसेन को हाथों से पकड़कर रोक लिया और भीम के एक लोहे की मूर्ति आगे कर दी। राजा धृतराष्ट्र बड़े बली थे। उन्होंने लोहे के भीम को ही सच्चा भीमसेन समझकर अपनी भुजाओं से दबोचकर तोड़ डाला। धृतराष्ट्र में दस हजार हाथियों का बल था ; इसलिये उन्होंने लोहे के भीम को तोड़ तो डाला, परंतु इससे उनकी छाती पर बहुत दबाव पड़ने से उनके मुंह से खून निकलने लगा और वे खून से लथपथ होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। उस समय संजय ने उन्हें थामकर शान्त किया। क्रोध शांत होने पर वे अत्यंत शोकाकुल हुए और 'हा भीम ! 'हा भीम ! कहकर रोने लगे। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि अब इनका क्रोध उतर गया है और  और भीमसेन का वध कर डालने की आशंका से ये बहुत व्याकुल हो रहे हैं तो उन्होंने कहा, 'राजन् ! आप शोक न करें। आपके हाथ से भीमसेन का वध नहीं हुआ है। यह तो उनकी लोहे की मूर्ति ही है, इसी को आपने कुचल डाला है। आपको क्रोध के वशीभूत देखकर  मैंने भीमसेन को आपके पास आने से रोक लिया था। जिस प्रकार काल के पास पहुंचकर कोई जीता नहीं बच सकता, उसी प्रकार आपकी भुजाओं के बीच में पड़कर किसी के प्राण नहीं बच सकते। यही सोचकर आपके पुत्र ने भीमसेन की जो लोहे की मूर्ति बनवा रखी थी नहीं मैंने आपके आगे कर दी थी। पुत्रशोक की आग ने आपको धर्म से विचलित कर दिया है, इसी से आपको भीमसेन का वध करने की इच्छा हुई थी। किन्तु आपके लिये यह उचित नहीं है कि आप भीम का वध करें। अतः हमने सर्वत्र शान्ति स्थापित करने के उद्देश्य से जो कुछ किया है, उसका आप भी अनुमोदन करें, मन को व्यर्थ शोकाकुल न करें। राजन् ! आपने वेद और सभी शास्त्रों का अध्ययन किया है तथा पुरान और सब प्रकार के राजधर्म भी सुने हैं। ऐसे बुद्धिमान और विद्वान होकर भी आप अपने ही अपराध से होनेवाले इस कुटुम्बनाश को देखकर इतने कुपित क्यों होते है। मैंने तो आपसे पहले ही निवेदन किया था और भीष्म, द्रोण, विदुर एवं संजय ने भी बहुत कुछ समझाया था; किन्तु उस समय तो आपने हमारी बात मानी नहीं। जो पुरुष  हित की बात समझाने पर भी अपने हिताहित को नहीं परख पाता, वह अन्याय का आश्रय लेने से आपत्तियों के आने पर शोक ही करता है। इस आपत्ति में तो आप अपने ही अपराध में पड़े हैं, फिर भीमसेन पर क्रोध क्यों करते हैं। दुर्योधन ने ईर्ष्यावश सभा में द्रौपदी को बुलवाया था; उस वैर का बदला लेने के लिये ही तो भीमसेन ने उसे मारा है। आप अपने और अपने दुष्ट पुत्र के अपराधों की ओर तो देखिये। आप ही ने तो निर्दोष पाण्डवों को राज्य से निकलवाया था राजन् ! इस प्रकार श्रीकृष्ण ने जब साफ_साफ सब बातें कही तो राजा धृतराष्ट्र कहने लगे, 'माधव ! तुम जैसा कहते हो, वह सब ठीक है। यह अच्छा ही हुआ कि तुम्हारे रोक लेने से भीमसेन मेरी भुजाओं के बीच में नहीं आया। अब मैं स्वस्थ हूं, मेरा क्रोध शान्त हो गया है और मैं पाण्डु के शूरवीर मध्यम पुत्र को देखना चाहता हूं। मेरे सब पुत्र और प्रधान_प्रधान राजा लोग तो मारे गये‌। अब तो मेरी शान्ति और प्रीति के आश्रय में पाण्डु पुत्र ही हैं।' ऐसा कहकर उन्होंने भीम_अर्जुन और नकुल_सहदेव_सभी को रोते_रोते गले लगाया और 'तुम्हारा कल्याण हो'ऐसा कहकर आशीर्वाद दिया। इसके बाद उनकी आज्ञा लेकर सब पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ गांधारी के पास आये। पाण्डवों के प्रति गांधारी के मन में पाप है _इस बात को महर्षि व्यास पहले ही ताड़ गये थे। इसलिये वे बड़ी तेजी से वहां पहुंचे। वे दिव्यदृष्टि से और अपने मन की एकाग्रता से सभी प्राणियों का आन्तरिक भाव समझ लेते थे। इसलिए गांधारी के पास जाकर उससे कहने लगे, 'गांधारी ! तुम पाण्डु पुत्र युधिष्ठिर पर क्रोध मत करो, शान्त हो जाओ। तुम जो बात मुंह से निकालना चाहती हो, उसे रोक लो और मेरी बात पर ध्यान दो। गत अठारह दिनों में तुम्हारा विजयाभिलाषी पुत्र नित्य ही तुमसे प्रार्थना करता कि 'मैं शत्रुओं के साथ संग्राम करने के लिये जा रहा हूं; माताजी ! आप मेरे कल्याण के लिये आशीर्वाद दीजिये।' उसके इस प्रकार प्रार्थना करने पर आप हर बार यही कहती थी कि 'जहां धर्म है, वहीं विजय है।' इस प्रकार पहले तुम्हारे मुंह से जो सच्ची बात निकालती थी, वह मुझे याद आती है। यों भी तुम सब प्राणियों का हित चाहनेवाली हो। इस समय प्राण्डवो ने विजय पायी है और इसमें संदेह नहीं कि युधिष्ठिर ही अधिक धर्मनिष्ठ भी हैं। तुम तो सदा से ही बड़ी क्षमावती हो, फिर इस समय तुमने क्षमा को क्यों छोड़ दिया है ? धर्मज्ञान ! तुम अधर्म को छोड़ दो; क्योंकि तुमने अपने धर्म पर दृष्टि रखकर ही ये शब्द कहे थे कि 'जहां धर्म है, वहीं विजय है।' अतः तुम अपने क्रोध को शान्त करो। तुम संत।यभआषण करनेवाली हो, तुम्हारा ऐसा आचरण नहीं होना चाहिए।' गांधारी ने कहा_भगवन् ! पाण्डवों के प्रति मेरा कोई दुर्भाव नहीं है और न मैं इनका नाश ही चाहती हूं। किन्तु पुत्रशोक के कारण मेरा मन जबरदस्ती व्याकुल _सा हो रहा है। इस कुन्ती पुत्रों की रक्षा करना जैसा कुन्ती का कर्तव्य है, वैसा ही मेरा भी है और जैसा यह मेरा कर्तव्य है, वैसा ही महाराज का भी है। यह कौरवों का संहार तो दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और दु:शासन के अपराध से ही हुआ है। इसमें अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव या युधिष्ठिर का कोई दोष नहीं है। कौरवों ने अभिमान में भरकर युद्ध किया और वे अपने दूसरे साथियों के सहित आपस ही में लड़ मरे।
किन्तु साहसी भीम ने दुर्योधन को गदा युद्ध के लिये बुलाकर फिर श्रीकृष्ण के सामने ही उसकी नाभि के नीचे गदा की चोट की_इस अनुचित कार्य ने ही मेरे क्रोध को भड़का दिया है। धर्मज्ञ महापुरुषों ने जिसे 'धर्म' कहा है, क्या शूरवीर अपने प्राणों के लोभ से भी रणभूमि में छोड़ सकते हैं ? गांधारी का यह बात सुनकर भीमसेन ने बहुत डरते _डरते उनसे विनयपूर्वक कहा, 'माताजी ! यह धर्म हो या अधर्म, मैंने तो डरकर अपनी रक्षा के लिये ही ऐसा किया था, सो अब आप क्षमा करें। उस महाबली पुत्र को धर्मयुद्ध में तो कोई नहीं मार सकता था। किन्तु पहले उसने भी तो अधर्म से ही राजा युधिष्ठिर को जीता था और हमें बार_बार तंग किया था। इस समय भी मुझे डर था कि कहीं दुर्योधन गदा युद्ध में मुझे मार न डाले, इसी से मैंने यह काम कर हो गया।गान्धारी ने कहा_भैया ! तुम मेरे पुत्र की ऐसी प्रसंसा कर रहे हो, इसलिये यह तो उसका वध नहीं कहा जा सकता। परंतु तुमने जो संग्रामभूमि में दु:शासन का खून पीता, उस काम को तो सभी सत्पुरुष निंदा करेंगे, ऐसा काम तो आर्य पुरुष कभी नहीं करते। तुमने यह बड़ा ही क्रूर कर्म किया, ऐसा करना उचित नहीं था। भीमसेन बोले_माताजी ! आप चिन्ता न करें। वह खून मेरे दांत और ओठों के आगे नहीं गया। इस बात को कर्ण जानता था। मैंने तो अपने हाथ में ही खून सान लिये थे। जब द्यूतक्रीड़ा के समय दु:शासन ने द्रौपदी के केश पकड़े थे, उसी समय क्रोध में भरकर मैं ऐसी प्रतिज्ञा कर चुका था। यदि मैं उसे पूरा न करता तो अनन्त वर्षों तक क्षात्रधर्म से पतित समझा जाता। इसी से मैंने यह काम किया था। गांधारी ने कहा_भीम ! अब हम बूढ़े हो गये हैं, हमारा राज्य भी तुमने छीन लिया। ऐसी स्थिति में हम दोनों कंधों के सहारे के लिये लकड़ी के समान तुमने एक भी पुत्र को जीवित क्यों नहीं छोड़ा ? यदि तुम मेरे एक पुत्र को भी छोड़ देते तो तुम्हारे कारण मैं इतना दु:ख न पाती, यही समझ लेती कि तुमने अपने धर्म का पालन किया है‌।

भीमसेन से ऐसा कहकर अपने पुत्र_पौत्रों के नाश से पीड़िता गांधारी क्रोध में भरकर बोली_'राजा युधिष्ठिर कहां है ?' यह सुनते ही धर्मराज भय से कांपते हुए हाथ जोड़े उसके सामने आये और बड़ी मीठी वाणी में बोले, ' देवि ! आपके पुत्रों का संहार करनेवाला मैं क्रूरकर्मा युधिष्ठिर आपके सामने खड़ा हूं। पृथ्वी भर के राजाओं का नाश करने में मैं ही हेतु हूं, इसलिये शाप के योग्य हूं; आप मुझे शाप दीजिये। मैं अपने सुहृदों का शत्रु हूं; अतः: ऐसे_ऐसे शत्रुओं का संहार कराकर अब मुझे जीवन, राज्य या धन_किसी की भी इच्छा नहीं है।' महाराज युधिष्ठिर गांधारी के पास खड़े हुए ये सब बातें कह गये। किन्तु उसके मुंह से कोई बात न निकली। वह बार_बार लंबी_लंबी सांसे लेती रही। वे झुककर उसके चरणों में गिरना ही चाहते थे कि दीर्घदर्शी गांधारी की दृष्टि पट्टी में से होकर उनके नखों पर पड़ी। इससे उनके सुन्दर नख उसी समय काले पड़ गये। यह देख अर्जुन तो श्रीकृष्ण के पीछे खिसक गये तथा और भाई भी इधर_उधर छिपने लगे‌ । उन्हें इस प्रकार कसमसाते देखकर गांधारी का क्रोध खण्डा पड़ गया और उसने माता के समान उन्हें धीरज दिया। फिर उसकी आज्ञा पाकर वे अपनी माता कुन्ती के पास गये। कुन्ती ने अपने पुत्रों को बहुत दिनों पर देखा था इसलिये उनके कष्टों का स्मरण करके उसका हृदय भर आया और वह अंचल से मुंह ढ़ांककर आंसू बहाने लगी। उसके साथ पांडवों के आंखों में भी आंसू आ गये। उसके प्रत्येक पुत्रों के अंगों पर बार_बार हाथ फेरकर देखा। सभी के शरीर शस्त्रों की चोट से घायल हो रहे थे। पुत्रहीना द्रौपदी को देखकर उसे बड़ा ही अनुताप हुआ। उसने देखा कि पांचाल कुमारी पृथ्वी पर पड़े _पड़े रो रही है। द्रौपदी कह रही थी_आयें ! अभिमन्यु के सहित आज आपके सभी पौत्र कहां चले गये। अब जब मेरे बच्चे ही नहीं बचे तो मैं राज्य को लेकर क्या करूंगी ? तब कुन्ती ने उसे धैर्य बंधाया। इसके बाद वह शोकाकुला द्रौपदी को उठाकर अपने साथ ले गांधारी के पास आयी। उसके साथ ही सब पाण्डव वहां पहुंचे। तब गांधारी ने बहू द्रौपदी और यशस्विनी कुन्ती से कहा, ' बेटी ! इस प्रकार व्याकुल मत हो; मेरी ओर तो देख, मुझपर कैसा दु:ख का पहाड़ टूट पड़ा है। मैं तो इस नरसंहार को समय के उलट_फेर से हुआ ही समझती हूं। यह रोमांचकारी काण्ड होना ही था, इसी से हुआ है। विदुरजी ने जो बात कही थी, वह ज्यों_की_त्यों सामने आ गयी। जैसी तू है, वैसी ही मैं भी हूं। बता कौन किसको धीरज बंधाने ? वास्तव में इस श्रेष्ठ कुल का संहार तो मेरे अपराध से ही हुआ है‌।


Thursday, 5 December 2024

विदुरजी के समझाने से राजा धृतराष्ट्र का कुरुकुल की स्त्रियों के साथ कुरुक्षेत्र की ओर जाना तथा रास्ते में कृपाचार्य आदि से उनकी भेंट होना

जनमेजय ने पुछा_ मुनिवर ! भगवान् व्यास के चले जाने पर राजा धृतराष्ट्र ने क्या किया ?
तथा महामना राजा युधिष्ठिर और कृपाचार्य आदि तीन कौरव महारथियों ने क्या किया ? इसके सिवा संजय ने भी जो कुछ कहा हो, वह मुझे सुनाने की कृपा करें। वैशम्पायनजी बोले_राजन् ! जब दुर्योधन मारा गया और सारी सेना का नाश हो गया तो संजय की दिव्यदृष्टि भी जाती रही और वह राजा धृतराष्ट्र के पास आकर कहने लगा, महाराज ! देश_देश से अनेकों राजा आकर आपके पुत्रों के साथ पितृलोक को प्रस्थान कर गये। इसलिए अब आप अपने पुत्र_पौत्र, चाचा_ताऊ आदि सभी का क्रमशः प्रेत_कर्म कराइये। संजय की यह दु:खमयी वाणी सुनकर राजा धृतराष्ट्र प्राणहीन _से होकर पृथ्वी पर गिर गये। उस समय विदुरजी ने उनसे कहा, 'भरतश्रेष्ठ ! उठाये, इस प्रकार क्यों पड़े हैं ?
शोक न कीजिये। संसार में सब जीवों की अन्त में यही गति होनी है। प्राणी न तो जन्म से पहले होते हैं और न अन्त में ही रहते हैं, केवल बीच में ही उनकी प्रतीति होती है; इसलिये इनके लिये क्या शोक किया जाय ? तथा इस युद्ध में मरे हुए जिन राजाओं के लिये आप शोक करते हैं, वे तो वस्तुत: शोक के योग्य हैंभी नहीं; क्योंकि उन सबने स्वर्गलोक प्राप्त किया है। शूरवीरों को संग्राम में शरीर त्यागने से जैसी स्वर्ग गति प्राप्त होती है, वैसी तो बड़ी_बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञ करने से, तपस्या से और विद्याभ्यास से भी नहीं हो सकती। इन्होंने युद्ध में शत्रुओं का सामना करते हुए प्राण त्यागे हैं, इसलिये इनके लिये क्या शोक ? राजन् !यह बात तो मैंने पहले भी आपसे कहीं थी कि क्षत्रिय के लिये युद्ध से बढ़कर इस लोक में स्वर्गप्राप्ति का और कोई साधन नहीं है। इसलिये आप अपने मन में और शोक करना छोड़िये।' विदुरजी की यह बात सुनकर राजा धृतराष्ट्र ने रथ जोतने की आज्ञा देकर कहा, 'गान्धारी और भरतवंश की सब स्त्रियों को जल्दी ही ले आओ तथा वधू कुन्ती को साथ लेकर वहां जो दूसरी स्त्रियां हैं उन्हें भी बुला लो।' धर्मज्ञ विदुरजी से वे ऐसा कहकर रथ में सवार हुए। उस समय भी शोक के कारण वे संज्ञाशून्य_से हो रहे थे। गान्धारी का भी पुत्रशोक के कारण बुरा हाल था। पति की आज्ञा पाकर वह कुन्ती तथा दूसरी स्त्रियों के साथ उनके पास आयीं। वहां पहुंचकर वे सब अत्यन्त शोकातुर होकर एक_दूसरे से विदा लेकर आयीं और बड़े जोर से विलाप करने लगीं। इस आर्तनाद ने विदुरजी को यद्यपि उनसे भी अधिक शोकाकुल कर दिया था, तो भी उन्होंने उन्हें धीरज बंधाया और सब स्त्रियों को रथ पर चढ़ाकर नगर से बाहर आये।
शअब तो कुरुवंशियों के सभी घरों में कोलाहल मच गया तथा बूढ़े से लेकर बालक तक सभी शोकाकुल हो गये। जिन स्त्रियों पर पहले कभी देवताओं की भी दृष्टि नहीं पड़ी थी, अब पतियों के मारे जाने पर वे सामान्य पुरुषों के भी सामने आ गयीं। उन्होंने बाल खोल दिये थे, आभूषण उतार दिये थे तथा वे एक साड़ी पहने अनाथा_सी होकर रणभूमि की ओर जा रही थी।पहले जिन्हें अपने सखियों के सामने भी एक साड़ी पहनकर निकलने में संकोच होता था, इस समय वही अपने सास_ससुरों के सामने इस दिन वेष में चल रहीं थीं। ऐसी हजारों स्त्रियों ने रुदन करते हुए राजा धृतराष्ट्र को घेर रखा था। उनके साथ अत्यन्त व्याकुल होकर वे रणक्षेत्र की ओर चले। बाकी आपकी सारी सेना नष्ट हो गयी। इस प्रकार वे हस्तिनापुर से एक ही कोस की दूरी पर पहुंचे होंगे कि उन्हें कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा_ये तीनों महारथी मिले। राजा धृतराष्ट्र को देखते ही उनका हृदय भर आया और आंखों में आंसू भरकर लम्बी_लम्बी सांसें लेकर कहने लगे, ' भरतश्रेष्ठ ! दुर्योधन की सेना में केवल हम तीन ही बचे हैं। बाकी आपकी सारी सेना नष्ट हो गयी।' इसके बाद कृपाचार्य ने गान्धारी से कहा, 'गान्धारी ! तुम्हारे पुत्रों ने निर्भय होकर युद्ध किया है और अनेकों शत्रुओं को रणभूमि में सुलाया है। इस प्रकार अनेकों वीरोचित कर्म करते हुए ही वे संग्राम में काम आए हैं। अब वे तेजोमय शरीर धारण करके स्वर्ग में देवताओं के समान विहार करते हैं। तुम्हारे शूरवीर पुत्रों में से ऐसा कोई भी नहीं था, जो युद्ध से पीठ दिखाते हुए मारा गया हो। हमारे प्राचीन ऋषियों ने शस्त्र से मारना जाना क्षत्रियों के लिये परमगति का कारण बताया है। इसलिये तुम उनके लिये शोक मत करो। एक बात और है, उनके शत्रु पाण्डव लोग चैन से रहे हों_ऐसी बात भी नहीं है। अश्वत्थामा आदि हम तीन महारथियों ने जो काम किया है, वह भी सुन लो। जिस समय हमने सुना कि भीमसेन ने अधर्म पूर्वक तुम्हारे पुत्र दुर्योधन को मारा है तो हम पाण्डवों के नींद में बेहोश हुए शिविर में घुस गये और वहां भीषण मार_काट मचा दी। इस प्रकार हमने धृष्टद्युम्नादि सभीफकंआआअ पांचालों को तथा द्रुपद और द्रौपदी के पुत्रों को मार डाला है। इस तरह तुम्हारे पुत्र के शत्रुओं का संहार करके हम भागे जा रहे हैं, क्योंकि हम तीन ही पाण्डवों के सामने संग्राम में नहीं ठहर सकेंगे। पाण्डव बड़े शूरवीर और महान् धनुर्धर हैं। इस समय अपने पुत्रों की मृत्यु का समाचार पाकर वे क्रोध में भरकर हमारे पैरों के चिह्न देखते हुए इस वैर का बदला चुकाने के लिये बड़ी तेजी से हमारा पीछा करेंगे। उन सबका संहार करके अब हमारी यह हिम्मत नहीं है कि पाण्डवों का सामना कर सकें। इसलिये रानी ! तुम हमें यहां से जाने की आज्ञा दो और अपने मन को शोकाकुल मत करो। राजन् ! आप भी हमें जाने की आज्ञा दीजिये और क्षात्रधर्म पर विचार करके अच्छी तरह धैर्य धारण कीजिये।

राजा धृतराष्ट्र से ऐसा कहकर कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा _तीनों ने बड़ी तेजी से गंगाजी की ओर अपने घोड़े बढ़ाये। कुछ दूर निकल जाने पर वे तीनों महारथी आपस में सलाह करके अलग_अलग रास्तों से चले गये। कृपाचार्य हस्तिनापुर की ओर चल दिये, कृतवर्मा अपने देश की ओर चला गया और अश्वत्थामा ने व्यासाश्रम की राह ली।

इस प्रकार महात्मा पाण्डवों का अपराध करने के कारण भयभीत होकर वे तीनों वीर एक_दूसरे की ओर देखते हुए भिन्न-भिन्न स्थानों को चले गये। इसके कुछ ही देर बाद पाण्डवों ने अश्वत्थामा के पास पहुंचकर उसे अपने पराक्रम से संग्राम में परास्त किया था।

Friday, 15 November 2024

शोकमग्न राजा धृतराष्ट्र को महर्षि व्यास का समझाना

श्री वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! विदुर के ये वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र पुरशोक से व्याकुल हो मूर्छा खाकर पृथ्वी पर गिर पड़े। उन्हें इस प्रकार अचेत होकर गिरते देख श्रीव्यासजी, विदुर, संजय, सुहृदगण और जो विश्वासपात्र द्वारपाल थे, वे शीतल जल से छींटे देकर ताड़ के पंखों से हवा करने लगे और उनके शरीर पर हाथ फेरने लगे। इस प्रकार उनके बहुत देर तक उपचार करने पर राजा को चेत हुआ और वे पुत्रशोक से व्याकुल होकर विलाप करने लगे.। 'मनुष्यजन्म को धिक्कार है !' इसमें भी विवाह आदि करके परिवार बढ़ाना तो बड़े ही दु:ख की बात है। इसी के कारण बार_बार तरह_तरह के दु:ख पैदा होते हैं। पुत्र, धन, सुहृद् और संबंधियों का नाश होने पर विष और अग्नि के दाह के समान बड़ा ही दु:ख भोगना पड़ता है। उस दु:ख से शरीर में जलन होने लगती है और बुद्धि नष्ट हो जाती है। ऐसी आपत्ति में फंसने पर तो मनुष्य को जीवित रहने की अपेक्षा मौत ही अच्छी मालूम होती है। इसलिए आज मैं भी अपने प्राणों को त्याग दूंगा।'महात्मा व्यासजी से ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र अत्यंत शोकाकुल हो गये और अपने पुत्रों के ही चिन्तन में डूबकर मौन रह गये।तब भगवान् व्यास ने उनसे कहा, 'धृतराष्ट्र ! तुमने सब शास्त्र सुने हैं। तुम बुद्धिमान हो ! तथा धर्म और अर्थ के साधन में कुशल हो। मनुष्यों का जीवन सदा रहनेवाला नहीं है _यह तो तुम नि:संदेह जानते ही हो। यह मर्त्यलोक अनित्य है, परमपद नित्य है और जीवन का पर्यवसआन मरण में ही होता है, यह सब जानकर तुम शोक क्यों करते हो ? इनइस वैर का प्रादुर्भा श्रम एवं व तो तुम्हारे सामने ही हुआ था। तुम्हारे पुत्र को कारण बनाकर काल ने ही इसे अंकुरित किया था। राजन् ! यह कौरवों का विध्वंस तो होना ही था। फिर तुम इन शूरवीरों के लिये क्यों शोक करते हो ? उन सबने तो परमगति प्राप्त कर ली है। पुराने समय की बात है_एक बार मैं इन्द्र की सभा में गया था। वहां मैंने सब देवताओं को इकट्ठे हुए देखा। इस समय एक विशेष प्रयोजन से पृथ्वी उनके पास आयी और उनसे कहने लगी, 'देवगण ! आप लोगों ने मेरा जो काम करने के लिये ब्रह्माजी की सभा में प्रतिज्ञा की थी, उसे अब शीघ्रही पूरा कर दीजिये।'उसकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु ने कहा, 'राजा धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में जो सबसे बड़ा दुर्योधन है, वह तेरा काम करेगा। उसके निमित्ति से अनेकों राजा कुरुक्षेत्र में आकर अपने सुदृढ़ शस्त्रों के प्रहार से एक_दूसरे का संहार कर डालेंगे। इस प्रकार उस युद्ध में तेरा सारा भार उतर जायगा। अब तू शीघ्र ही जा और सब लोकों को धारण कर। 'राजन् ! तुम्हारा पुत्र जो दुर्योधन था, उसके रूप में कलि के अंश ने ही गान्धारी के गर्भ से जन्म लिया था।
इसी से वह ऐसा असहनशील, चंचल, क्रोधी और कूटनीति से काम लेनेवाला था। दैवयोग से उसके भाई भी ऐसे ही उत्पन्न हुए और मामा शकुनि तथा परममित्र कर्ण भी ऐसे ही मिल गये। ये सब पृथ्वी का भार उतारने के लिये ही एक साथ उत्पन्न हुए थे। जैसा राजा होता है, वैसी ही उसकी प्रजा भी होती है। यदि स्वामी धार्मिक हो तो अधर्मी सेवक भी धार्मिक बन जाते हैं। सेवकों की प्रवृति स्वामी के गुण_दोषों के अनुसार होती है_इसमें संदेह नहीं। राजन् ! दुष्ट राजा का संसर्ग होने से ही तुम्हारे और पुत्र भी मारे गये। इस बात को देवर्षि नारद जानते हैं।
आपके पुत्र अपने ही अपराध से मारे गये हैं। तुम उनके लिये शोक मत करो; क्योंकि इस संबंध में शोक करने का कोई कारण नहीं है। पाण्डवों ने तुम्हारा जरा भी अपराध नहीं किया है। वातव में तो तुम्हारे पुत्र ही दुष्ट थे, उन्हीं ने इस देश का नाश कराया है। पहले राजसूय यज्ञ के समय देवर्षि नारद ने राजा युधिष्ठिर की सभा में कहा था कि राजन् ! तुम्हें जो कुछ करना हो वह कर लो। एक समय ऐसा आया कि सारे कौरव_पाण्डव आपस में युद्ध करके नष्ट हो जायेंगे।'नारदजी की यह बात सुनकर उस समय पाण्डवों को बड़ा शोक हुआ था। इस प्रकार मैंने तुम्हें यह देवसभा का पुरातन गुप्त वृतांत सुनाया है। इसे सुनाने में मेरा यही उद्देश्य है कि किसी प्रकार तुम्हारा शोक दूर हो जाय तथा इस युद्ध को दैवी योजना समझकर तुम पाण्डु पुत्रों से स्नेह करने लगो। यही बात मैंने एकान्त में युधिष्ठिर से भी कहीं थी। इसी से उन्होंने कौरवों के साथ युद्ध रोकने का इतना प्रयत्न किया था।
परन्तु दैव बड़ा प्रबल है। इस जगत् के चराचर प्राणियों के साथ काल का जो सम्बन्ध है, उसे कोई नहीं टाल सकता। राजन् ! तुम तो बड़े धर्मात्मा और बुद्धिमान हो, तुम्हें प्राणियों के जन्म_मरण का रहस्य भी पता है। फिर मोह में क्यों फंसते हो ? राजा युधिष्ठिर को यदि मालूम हो गया कि तुम अत्यंत शोकातुर हो और बार_बार अचेत हो जाते हो तो वे प्राण त्याग देंगे। वीरवर युधिष्ठिर तो सर्वदा पशु_पक्षियों पर भी कृपा करते हैं, फिर तो वे तुम्हारे प्रति दयाभाव क्यों नहीं रखेंगे ? अतः मेरी आज्ञा मानकर और विधि का विधान टल नहीं सकता_ऐसा समझकर तथा पाण्डवों पर करुणा कश्रकए तुम अपने प्राण धारण करो। ऐसा वर्ताव करने से संसार में तुम्हारी कीर्ति होगी
धर्म और अर्थ की प्राप्ति होगी और दीर्घकालिक तपस्या का फल मिलेगा। तुम्हें जो प्रज्ज्वलित अग्नि के समान पुत्रशोक उत्पन्न हुआ है, उसे विचाररूपी जल से सर्वदा शान्त करते रहो।' वैशम्पायनजी कहते हैं_अतुलित तेजस्वी व्यासजी के ये वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र ने कुछ देर विचार किया, इसके बाद वे बोले, 'दिजवर ! मुझे महान् शोकजाल से सब ओर से जकड़ रखा है। मेरी बुद्धि ठिकानें नहीं है और बार_बार मूर्छा_सी आ जाती है। अब आपका यह उपदेश सुनकर मैं प्राण धारण करता हुआ यथासंभव शोक न करने का प्रयत्न करूंगा।' राजा धृतराष्ट्र के ये वचन सुनकर सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यास वहीं अन्तर्धान हो गये।

Thursday, 10 October 2024

विदुरजी का महाराज धृतराष्ट्र के प्रति संसार के स्वरूप, उसकी भयंकरतआ और उससे छूटने के उपाय का वर्णन

राजा धृतराष्ट्र ने कहा_परम बुद्धिमान विदुरजी ! तुम्हारे  शुभ संभाषण को सुन मेरा शोक नष्ट हो गया है। अभी मैं तुम्हारी सारगर्भित वाले और भी बातें सुनना चाहता हूं। विदुरजी बोले_महाराज ! विचार करने पर यह सारा जगत् अनित्य ही जान पड़ता है। यह केले के खंभे के समान सारहीन है, इसमें सार कुछ भी नहीं है। मनुष्य जैसे नये या पुराने वस्त्र को उतारकर दूसरा वस्त्र पहन लेता है, उसी प्रकार वह नये_नये शरीर भी धारण करता रहता है। जीव अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार जन्म लेते हैं और नष्ट भी हो जाते हैं। इस प्रकार जब लोक का स्वरूप स्वभाव से ही आगमापायी ( आने_जानेवाला )है तो आप किसके लिये शोक करते हैं। इस लोक में लोग बुद्धिमान, सत्वगुण से युक्त, सबका हित चानेवाले और प्राणियों के समागम को कर्मानुसार जाननेवाले हैं, वे ही परमगति प्राप्त करते हैं। राजा धृतराष्ट्र ने पूछा_विदुरजी ! संसार का स्वरूप बड़ा गहन है। अतः मैं यह सुनना चाहता हूं कि इसे किस प्रकार जाना जा सकता है। सो तुम इसी का वर्णन करो। विदुरजी बोले_ महाराज! जब गर्भाशय में वीर्य और रज का संयोग होता है, तभी से जीवों की क्रियाएं दिखने लगती हैं। आरंभ में जीव कलाल ( वीर्य और रज के संयोग) में रहता है; फिर कुछ दिन बाद पांचवां महीना बीतने पर वह चैतन्य रूप में प्रकट होकर पिण्ड में निवास करने लगता है।इसके बाद वह गर्भस्थ पिण्ड सर्वांगपूर्ण हो जाता है। इस समय उसे मांस और रुधिर से भरे हुए अत्यन्त अपवित्र गर्भाशय में रहना पड़ता है। फिर वायु के वेग से उसके पैर ऊपर की ओर हो जाते हैं और सिर नीचे की ओर। इस स्थिति में योनि द्वार के समीप आ जाने से उसे बड़े दु:ख सहने पड़ते हैं। फिर वह योनिमार्ग से पीड़ित होकर उससे बाहर आ जाता है और संसार में आकर अन्यान्य प्रकार के उपद्रवों का सामना करता है, अब वह जैसे_जैसे बढ़ने लगता है वैसे _वैसे इसे नयी_नयी व्याधियां भी घेरने लगती हैं। इसइस प्रकार अपने कर्मों से पीड़ित होकर यह जीवन व्यतीत करता रहता है। जिनमें आसक्ति होने से ही रस की प्रतीति होती है, वे विषय इसे घेरे रहते हैं तथा उनके कारण यह इन्द्रिय रूप पाशों से बंधा रहता है। एसी स्थिति में इसे तरह_तरह के व्यसन घेर लेते हैं। उससे बंध जाने पर तो इसे तृप्ति भी नहीं मिलती। उस समय भले_बुरे कर्म करने पर इसे उनका कुछ ज्ञान प्राप्त नहीं होता। केवल ध्याननिष्ठ पुरुष ही अपने चित्त को कुमार्ग में फंसने से बचा सकते हैं। साधारण जीवन तो यमलोक के द्वार पर पहुंचकर भी उसे पहचान नहीं पाता। इतने में ही काल उसे मृत्यु के मुख में डाल देता है और यमदूत शरीर से बाहर खींच लेते हैं। इसे बोलने की शक्ति नहीं रहती। इस समय इसका जो कुछ पाप या पुण्य किया होता है वह सामने आ जाता है; किन्तु देहबंधन में बंध जाने पर यह फिर अपने उद्धार का प्रयत्न नहीं करता है। हाय ! लोभ के पंजे में फंसकर संसार स्वयं ही ठगा जा रहा है। यह लोभ,क्रोध और भय में पागल होकर अपनी सुधि ही नहीं लेता। यदि यह कुलीन होता है तो अकुलीनों को हेय दृष्टि से देखता हुआ अपनी उस कुलीनता में ही मस्त रहता है और धनी होने पर भी धन के घमंड में भरकर निर्धनों की निंदा करता है। यह दूसरों को तो मूर्ख बताता है परन्तु अपनी ओर कभी नहीं देखता। इसी तरह दूसरों के दोषों की तो निंदा करता रहता है, किन्तु अपने को काबू में रखने का कभी विचारंदं भी नहीं करता। जब बुद्विमान और मूर्ख, धनी और निर्धन, कुलीन और अकुलीन तथा प्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित_सभी श्मशानभूमि में जाकर वस्त्रहीन अवस्था में पड़ते हैं पड़ते हैं, तब किसी भी व्यक्ति को उनमें कोई ऐसा अन्तर दिखाई नहीं देता, जिससे वे उनके कुल या रूप की विशेषता का पता लगा सके। जब मरने के पश्चात् सभी जीव समान भाव से पृथ्वी की गोद में सोते हैं तो ये मूर्ख एक_ दूसरे को धोखा क्यों देते हैं ? इस नाशवान् लोक में जो पुरुष इस वेदोक्त उपदेश को साक्षात् या किसी के द्वारा सुनकर जन्म से ही धर्म का आचरण करता है, वह अवश्य परमगति को प्राप्त होता है। राजा धृतराष्ट्र ने कहा_ विदुर ! धर्म के इस गूढ़ रहस्य का ज्ञान बुद्धि से ही हो सकता है। अतः तुम मेरे आगे विस्तारपूर्वक इस बुद्धि मार्ग को कहो।
विदुरजी कहने लगे_ राजन्! भगवान् स्वआयम्भू को नमस्कार करके मैं इस संसाररूप गहन वन के उस स्वरूप का वर्णन करता हूं जिसका निरूपण महर्षियों ने किया है। एक ब्राह्मण किसी विशाल वन में जा रहा था। वह एक दुर्गम स्थान में जा पहुंचा। उसे सिंह, व्याघ्र, हाथी और रीछ आदि भयंकर जन्तुओं से भरा देखकर उसका हृदय बहुत ही घबरा उठा; उसे रोमांच हो आया और मन में बड़ी उथल_पुथल होने लगी। उस वन में इधर_उधर दौड़कर उसने बहुत ढ़ूंढ़कर कि कहीं कोई सुरक्षित स्थान मिल जाय। परन्तु वह न तो वन से निकलकर दूर ही जा सका और न उन जंगली जीवों से त्राण ही पा सका। इतने में उसने देखा कि वह भीषण वन सब ओर से जाल से घिरा हुआ है। एक अत्यंत भयानक स्त्री ने उसे अपनी भुजाओं से घेर लिया है तथा पर्वत के समान ऊंचे पांच सिर वाले नाग भी उसे सब ओर से घेरे हुए हैं। उस जंगल के बीच में झाड़ _झंखाड़ों से भरा हुआ एक गहरा कुआं था। वह ब्राह्मण इधर_उधर भटकता उसी में गिर गया। किन्तु लताजाल में फंसकर वह ऊपर को पैर और नीचे को सिर किये बीच में ही लटक गया।इतने ही में कुएं के भीतर उसे एक बड़ा भारी सर्प दिखायी दिया और ऊपर की ओर किनारे पर एक विशालकाय हाथी दिखा। उसके शरीर का रंग काला था तथा उसके छह मुंह और बारह पैर थे। वह धीरे-धीरे उस कूएं की ओर ही आ रहा था। कुएं के किनारे पर जो वृक्ष था, उसकी शाखाओं पर तरह_तरह की मधुमक्खियों ने छत्ता बना रखा था। उससे मधु की की धाराएं गिर रही थीं। मधु तो स्वभाव से ही सब लोगों को प्रिय है । अतः वह कुएं में लटका हुआ पुरुष इन मधु की धाराओं को ही पीता रहता था। इस संकट के समय भी उन्हें पीते_पीते उसकी तृष्णा शान्त नहीं हुई और न उसे न अपने ऐसे जीवन के प्रति वैराग्य ही हुआ। जिस वृक्ष के सहारे वह लटका हुआ था, उसे रात_दिन काले और सफेद चूहे काट रहे थे। इस प्रकार इस स्थिति में उसे की प्रकार के भयों ने घेर रखा था। वन की सीमा के पास हिंसक पशुओं से और अत्यंत उग्र रूपा स्त्री से भय था, कूंए के नीचे नाग से और ऊपर हाथी से आशंका थी, पांचवां भय चूहों के काट देने पर वृक्ष से गिरने का भय था और छठा भय मधु के लोभ के कारण मधुमक्खियों से भी था।
इस प्रकार संसार सागर में पड़कर भी वह वहीं डटा हुआ था तथा जीवन की आशा बनी रहने से उसे उससे वैराग्य भी नहीं होता था। महाराज! मोक्ष तत्व के विद्वानों ने यह एक दृष्टांत कहा है। इसे समझकर धर्म का आचरण करने से मनुष्य परलोक में सुख पा सकता है। यह जो विशाल वन कहा गया है, वह यह विस्तृत संसार ही है। 
इसमें जो दुर्गम जंगल बताया है, वह इस संसार की ही गहनता है। इसमें जो बड़े _बड़े हिंसक जीव बताये गये हैं, वह तरह_तरह की व्याधियां हैं तथा इसकी सीमा पर जो बड़े डील_डौलवाली स्त्री है, वह वृद्धावस्था है, जो मनुष्य के रूप_रंग को बिगाड़ देती है। उस वन में जो कुआं है, वह मनुष्य देह है। उसमें नीचे की ओर जो नाग बैठा हुआ है, वह स्वयं काल ही है। वह समस्त देहधारियों को नष्ट कर देनेवाला और सर्वस्व को हड़प जानेवाला है। कुएं के भीतर जो लता है, जिसके तन्तउओं में यह मनुष्य लटका हुआ है, वह इसके जीवन की आशा है तथा ऊपर की ओर जो छ: मुंहवाला हाथी है वह संवत्सर है। छः ऋतुएं उसके मुख हैं तथा बारह महीने पैर हैं। उस वृक्ष को जो चूहे काट रहे हैं उन्हें रात_दिन कहा गया है। तथा मनुष्य की तरह_तरह की जो कामनाएं हैं, वे मधुमक्खियां हैं। मधुमक्खियों के छत्ते से जो मधु की धाराएं धाएं चू रही हैं, उन्हें भोगों से प्राप्त होने वाले रस समझो, जिनमें कि अधिकांश मनुष्य डूबे रहते हैं। बुद्धिमान लोग संसार के चक्र की गति को ऐसा ही समझते हैं। तभी वे वैराग्य रूपी तलवार से इसके पाशों को काटते हैं। धृतराष्ट्र ने कहा_विदुर ! तुम बड़े तत्वदर्शी हो। तुमने मुझे बड़ा सुन्दर आख्यान सुनाया है। तुम्हारे अमृतमय वचनों को सुनकर मुझे बड़ा हर्ष होता है। विदुरजी बोले_ महाराज! सुनिये; अब मैं विस्तारपूर्वक उस मार्ग का विवरण सुनाता हूं, जिसे सुनकर बुद्धिमान लोग संसार के दु:खों से छूट जाते हैं। राजन् ! जिस प्रकार किसी लम्बे रास्ते पर चलने वाला पुरुष थक जाने पर बीच_बीच में विश्राम कर लेता है, उसी प्रकार अज्ञानी लोगों को इस संसार यात्रा में चलते हुए बीच_बीच में गर्भ में रहकर विश्राम कर लेना होता है। इस संसार से मुक्त तो विवेकी पुरुष ही होते हैं। अतः शास्त्रों ने गर्भवास को मिर्गी का रूपक दिया है और गहन संसार को वन बताया है। यही मनुष्यों तथा चराचर प्राणियों का संसार चक्र है। विवेकी पुरुष को इसमें आसक्त नहीं होना चाहिये। मनुष्य की जो प्रत्यक्ष और परोक्ष शारीरिक तथा मानसिक व्याधियां हैं, उन्हीं को विद्वानों ने हिंसक जीव बताया है। मन्दमति पुरुष  इन व्याधियों से तरह_तरह के क्लेश और आपत्तियां उठाने पर भी संसार से विरक्त नहीं होते। यदि किसी प्रकार मनुष्य इन व्याधियों के पंजे से निकल भी जाय तो अन्त में इसे वृद्धावस्था घेर ही लेती है। इसी से वह तरह_तरह के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धों से घिरकर मज्छआ और मांस रूप कीचड़ से भरे हुए आश्रयहीन देहरूप गड्ढे में पड़ा रहता है। वर्ष, मांस, पक्ष औरदिन_रात की संधियां _ये क्रमशः इनके रूप और आयु का नाश किया करते हैं। ये सब काल के ही प्रतिनिधि हैं, इस बात को मूढ़ पुरुष नहीं जानते। किन्तु विद्वानों का कथन है कि प्राणियों के शरीर रथ के समान है, सत्व ( सत्वगुण प्रधान बुद्धि) सारथि है, इन्द्रियां घोड़े हैं और मन लगाम है। जो पुरुष स्वेच्छापूर्वक दौड़ते हुए उन घोड़ों के पीछे लगा रहता है, वह तो इस संसार चक्र में पहिये के समान घूमता रहता है। किन्तु जो बुद्धिपूर्वक उन्हें अपने काबू में कर लेता है, उसे इस संसार में नहीं आना पड़ता। अतः बुद्धिमान पुरुष को संसार की निवृत्ति का ही प्रयत्न करना चाहिये। इस ओर से लापरवाही नहीं करनी चाहिये। जो पुरुष इन्द्रियों को वश में रखता है, क्रोध और लोभ से छूटा हुआ है तथा संतुष्ट और सत्यवादी है, वह शान्ति प्राप्त करता है। मनुष्य को चाहिए कि अपने मन को काबू में करके ब्रह्मज्ञानरूप महौषधि प्राप्त करें और उसके द्वारा इस संसार दु:ख स्वरूप महारोग को नष्ट कर दें। इस दु:ख से संयमी चित्त के द्वारा जैसा छुटकारा मिल सकता है_वैसा पराक्रम, धन, मित्र या हितू, किसी की भी सहायता नहीं मिल सकता। इसलिये मनुष्य को दयाभाव में स्थित रहकर शील प्राप्त करना चाहिये। दम, त्याग और अप्रमाद_ये तीन परमात्मा के धाम ले जानेवाले घोड़े हैं। जो पुरुष शीलरूप लगाम पकड़कर इन घोड़ों से जीते हुए मनरूप रथ पर सवार रहता है, वह मृत्यु के भय से छूटकर ब्रह्मलोक में जाता है। जो व्यक्ति समस्त प्राणियों को अभयदान करता है, वह भगवान् विष्णु के निर्विकार परम पद को प्राप्त होता है। अभयदान से पुरुष को जो फल प्राप्त होता है, वह हजारों यज्ञ और नित्यप्रति उपवास करने से भी नहीं मिल सकता। यह बात निर्विवाद है कि प्राणियों को अपने आत्मा से प्रिय कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि मरण किसी को भी इष्ट नहीं है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को सभी जीवों पर दया करनी चाहिए। जो बुद्धिहीन पुरुष तरह_तरह के माया मोह में फंसे हुए हैं और जिन्हें बुद्धि के जाल ने बांध रखा है, वे भिन्न_भिन्न योनियों में भटकते रहते हैं। सूक्ष्मदृष्टि महापुरुष तो सनातन ब्रह्म को ही प्राप्त कर लेते हैं।

Friday, 23 August 2024

स्त्रीपर्व_ शोकाकुल धृतराष्ट्र को संजय और विदुर का समझाना

नारायणं नमस्यकृत्यं नरंचैव नरोत्तम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं तो जयमुदीययेत्।।_अर्थ_ अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण, उनके नित्य सखा नरस्वरूप नवरत्न अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता महर्षि वेदव्यास को नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियों पर विजयप्राप्तिपूर्वक अन्त:करण को शुद्ध करनेवाले महाभारत ग्रंथ का पाठ करना चाहिए।

राजा जनमेजय ने पूछा _मुनिवर ! दुर्योधन और उसकी सारी सेना का संहार हो जाने पर इस समाचार को सुनकर राजा धृतराष्ट्र ने क्या किया ? इसी प्रकार कुराज युधिष्ठिर और कृपाचार्य आदि तीनों महारथियों ने भी इसके बाद क्या किया ? वैशम्पायनजी बोले_राजन् ! अपने सौ पुत्रों का संहार हो जाने से महाराज धृतराष्ट्र बड़े दु:खी हुए; पुत्रशोक से उनका हृदय जलने लगा और वे चिंता में डूब गये।  उस समय संजय ने उनके पास जाकर कहा, 'महाराज ! आप चिंता क्यों करते हैं ? शोक को कोई बंटा तो सकता नहीं। राजन् ! इस युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सेना मारी गयी, यह पृथ्वी निर्जन होकर सूनी हो गयी है। अब आप क्रमश: अपने चाचा_ताऊ, बेटों_पोतों, संबंधियों _सुहृदों और गुरुजनों की प्रेतक्रिया कराइये।' संजय की यह दु:खमयी वाणी सुनकर राजा धृतराष्ट्र बेटे_पोतों के वध से व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। फिर सावधान होने पर वे बोले, 'मेरे पुत्र, मंत्री और सभी सुहृदजन मर चुके हैं। अब तो इस पृथ्वी पर भटक_भटककर मेरे लिये दु:ख ही उठाना बाकी रह गया है। ऐसी जिंदगी से pmला, मुझे क्या लाभ है  मेरा राज्य नष्ट हो गया, भाई_बन्धु सब युद्ध में काम आ गये और आंखें तो पहले ही से नहीं हैं। हाय ! मैंने अपने हितैषी परशुरामजी, नारदजी और भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन की बात नहीं सुनी। श्रीकृष्ण ने सारी सभा के बीच में मेरे भले के लिये ही कहा था कि 'राजन् ! व्यर्थ वैर मत बांधो, अपने बेटे को रोको।'किन्तु मैं ऐसा मूर्ख हूं कि मैंने उनकी बात हीं मानी।  इसी से आज बुरी तरह पछताना पड़ रहा है। संजय ! इस जन्म में किया हुआ कोई ऐसा पाप आज याद तो नहीं आता, जिसके कारण मुझे यह फल भोगना चाहिये था। अवश्य ही पूर्वजन्मों में मुझसे कोई बड़ा अपराध हुआ है। इसी से विधाता ने मुझे इन दु:खमय कर्मों में नियुक्त कर दिया। अब मेरी आयु ढल चुकी है, सब भाई_बन्धु समाप्त हो चुके हैं। भला, अब संसार में मुझसे बढ़कर दु:खी और कौन होगा? अतः पाण्डव लोग मुझे आज ही ब्रह्मलोक के खुले हुए मार्ग पर बढ़ते देखें।' इस प्रकार  राजा धृतराष्ट्र ने अत्यंत शोक प्रकट करते हुए अनेकों बातें कही। तब संजय ने राजा के शोक को शान्त करने के लिये ये शब्द कहे, राजन् ! आपका पुत।र दुर्योधन बड़ी ही खोटी बुद्धिवाला था। दु:शासन, शकुनि, कर्ण, चित्रसेन और शल्य, जिन्होंने सारे संसार को कण्टकाकीर्ण कर दिये थे_ये सब उसके सलाहकार थे। अरे ! उसने पितामह भीष्म, माता गांधारी, चाचा विदुर, गुरु द्रोण, आचार्य कृत, और महामति नारदजी की बात भी नहीं सुनी। यहां तक कि उसने दूसरे_दूसरे ऋषि और अतुलित तेजस्वी व्यासजी का भी कहा नहीं किया। उसे सदा युद्ध की ही लगन रही। इसकै कारण उसने कभी आदरपूर्वक धर्मानुष्ठान नहीं किया और न कभी क्षत्रियों के ही किसी धर्म का आदर किया। उसने तो व्यर्थ ही क्षत्रियों का संहार कराया। आपमें सब प्रकार की सामर्थ्य थी, तथापि इस विषय में आपने भी कुछ नहीं कहा। आपकी बात कोई टाल नहीं सकता था, तथापि आपने निष्पक्ष होकर दोनों ओर के बोझे को तराजू पर नहीं तौला। मनुष्य को यथाशक्ति पहले ही ऐसा काम करना चाहिए जिसमें अपने पिछले कर्म के लिये उसे पछताना न पड़े। आपने तो पुत्र स्नेह में फंसकर उसी का प्रिय करना चाहा, इसी से अब आपको पश्चाताप करना पड़ रहा है; अतः इसके लिये कोई शोक नहीं करना चाहिये। शोक करने से जन तो धन मिलता है, न फल प्राप्त होता है, न ऐश्वर्य मिलता है और न परमात्मा की ही प्राप्ति होती है। जो पुरुष स्वयं अग्नि पैदा करके उसे कपड़े में लपेटकर जलने गया है और फिर पछतावा करने बैठता है, वह बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता।
इस समय आपके पुत्रों और आपने ही पाण्डव रूप अग्नि को अपने वाक्य रूप वायु से सुलगाया था और उसमें लोभरूप घृत छोड़कर प्रज्वलित किया था। जब वह आग धधक उठी तो उसमें आपके पुत्र पतंगों की तरह गिरने लगे और उसकी बाणरूप ज्वालाओं में लेकर भष्म हो गये। अतः आपको उनके लिए शोक नहीं करना चाहिये। इस समय अश्रुपात के कारण आपका मुख अत्यन्त मलिन हो गया है। शास्त्र दृष्टि से ऐसा होना अच्छा नहीं है और समझदार लोग इसे अच्छा भी नहीं कहते। ये शोक के आंसू आग की चिनगारियों के समान मनुष्य को जलाया करते हैं। आप बुद्धि के द्वारा मन को सावधान करके रोष और शोक को छोड़ दीजिये।
वैशम्पायनजी कहते हैं _ इस प्रकार महात्मा संजय ने राजा धृतराष्ट्र को धैर्य बंधाया। इसके बाद विदुरजी अपने अमृत के समान मीठे वाक्यों से उन्हें शान्त्वना देते हुए कहने लगे, 'राजन् ! आप पृथ्वी पर क्यों पड़े हैं ; उठकर बैठ जाइये और विचारपूर्वक मन को सावधान कीजिये।  संसार में सब जीवों की अन्त में यही तो गति होती है। जितने संजय हैं, उनका पर
अवसान क्षय में ही होगा, सारी भौतिक उन्नतियों का अन्त पतन में ही होना है; सारे संयोग वियोग में ही समाप्त होने वाले हैं। इसी प्रकार जीवन का अन्त भी मरण में ही होना है।जब यमराज शूरवीर और डरपोक दोनों ही को अपनी ओर खींचते हैं तब वे क्षत्रिय युद्ध क्यों न करते । राजन् ! समय आने पर कोई बच नहीं सकता। जो युद्ध नहीं करता, वह भी मरता ही है और कभी-कभी युद्ध करनेवाला भी बच ही जाता है।मृत्यु आने पर तो कोई नहीं जी सकता। जितने प्राणी हैं आरम्भ में वे नहीं थे और अन्त में भी नहीं रहेंगे, केवल बीच में ही दिखाई देते हैं। इसलिये उनके वलिये शोक करने की आवश्यकता नहीं है। शोक करने से मनुष्य न तो मरनेवाले के साथ जा सकता है और न मर ही सकता है।। इस प्रकार जब लोक की यही स्वाभाविक स्थिति है तो आप किसलिए शोक करते हैं ? 'इसके सिवा राजन् !  युद्ध में मारे जानेवाले वीरों के लिये तो आपको शोक करना ही नहीं चाहिये। यदि शास्त्र ठीक है तो उन सभी ने परम गति पायी है। इस युद्ध में मरनेवाले सभी वीर स्वाध्यायशील और सदाचारी थे तथा वे सभी शत्रु के सामने डटे रहकर वीरगति को प्राप्त हुए हैं। इसलिए उनके लिए शोक का अवसर ही कहां है ? जन्म से पूर्व ये सभी लोग अदृश्य थे और सब फिर अदृश्य हो गये हैं। न तो वे आपके थे और न आप ही उनके हैं। फिर इसमें शोक करने का क्या कारण है ? युद्ध में जो_जो मनुष्य मारा जाता है, उसे स्वर्ग मिलता है और जो मारता है उसे कीर्ति मिलती है। इस प्रकार हमारी दृष्टि से तो दोनों ही प्रकार का बड़ा भारी लाभ है, युद्ध में निष्फलता तो है ही नहीं। मनुष्य दक्षिणायुक्त यज्ञ और तपस्या से भी उतनी सुगमता से स्वर्ग नहीं प्राप्त कर सकते जैसे कि युद्ध में मारे जाने पर शूरवीर लोग प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार क्षत्रिय के लिये तो इस लोक में धर्मयुग से बढ़कर और कोई साधन नहीं हैं। अतः आप अपने मन को शान्त करके शोक छोड़िये। इस प्रकार शोकाकुल होकर आपको अपने शरीर का त्याग नहीं कर देना चाहिये। संसार में बार_बार जन्म लेकर आप हजारों माता_पिता और स्त्री_पुत्रादि का संग कर चुके हैं। परंतु वास्तव में किसके वे हुए और किसके हम। शोक के हजारों स्थान हैं और भय के भी सैकड़ों स्थान हैं। किन्तु इनका सर्वदा मूर्ख पुरुषों पर ही प्रभाव पड़ता है बुद्धिमानों पर नहीं। 'कुरुश्रेष्ठ ! काल का तो न कोई प्रिय है न अप्रिय और न किसी के प्रति उसका उदासीन भाव ही है। वह तो सभी को मृत्यु की ओर खींचकर ले जाता है। काल ही प्राणियों को बूढ़ा करता है और काल ही उन्हें नष्ट कर देता है। जब सब जीव सो जाते हैं, उस समय भी काल जागता रहता है। नि:संदेह काल से पार पाना बड़ा ही कठिन है। यौवन, रूप, जीवन, धन का संग्रह, आरोग्य और प्रियजनों का सहवास _ये सभी अनित्य हैं। बुद्धिमान पुरुष को इसमें फंसना नहीं चाहिये। यह दु:ख तो सारे ही देश से संबंध रखता है। इसके लिये आप अकेले शोक
यद्यपि प्रियजनों का अभाव होने पर दु:ख दबाता ही है। तथापि शोक करने से वह दूर नहीं होता; क्योंकि चिंतन करने पर दु:ख कभी नहीं घटता, इससे तो वह और भी बढ़ जाता है। जो लोग थोड़ी बुद्धिवाले होते हैं, वे ही अनिष्ट की प्राप्ति और इष्ट का वियोग होने पर मानसिक दु:ख से जला करते हैं। है। तथापि शोक करने से वह दूर नहीं होता; क्योंकि चिंतन करने पर दु:ख कभी नहीं घटता, इससे तो वह और भी बढ़ जाता है। जो लोग थोड़ी बुद्धिवाले होते हैं, वे ही अनिष्ट की प्राप्ति और इष्ट का वियोग होने पर मानसिक दु:ख से जला करते हैं। शोक करने से मनुष्य कर्तव्यविमूढ़ हो जाता है तथा अर्थ, धर्म और कामरूप त्रिवर्ग से भी वंचित रहता है। भिन्न _भिन्न धार्मिक स्थितियों में पड़ने पर असंतोषी पुरुष तो घबरा जाते हैं किन्तु विचारवानों को सभी अवस्थाओं में संतोष रहता है। मनुष्य को चाहिए कि मानसिक दु:ख को विचार से और शारीरिक कष्ट को औषधियों से दूर करें। इसे ही विज्ञान का बल कहते हैं। उसे मूर्खों का_सा व्यवहार नहीं करना चाहिए। मनुष्य का पूर्वकृत कर्म उसके सोने पर सो जाता है, उठने पर उठ बैठता है और दौड़ने पर भी उसके साथ लगा रहता है। वह जिस_जिस अवस्था में जैसा_जैसा भी शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसी_उसी अवस्था में उसका फल भी पा लेता है। मनुष्य आप ही अपना बंधु है, आप ही अपना शत्रु है और आप ही अपने पाप_पुण्य का साक्षी है। वह शुभ कर्म से सुख पाता है और पाप से दु:ख भोगता है। इस प्रकार सर्वदा किये हुए कर्म का फल मिलता है, बिना किये का नहीं।

Saturday, 27 July 2024

पाण्डवों का द्रौपदी के पास आकर उसे मणि देना तथा श्रीकृष्ण और राजा युधिष्ठिर को अश्वत्थामा के अद्भुत पराक्रम का रहस्य बताना

वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! उसके बाद अश्वत्थामा पाण्डवों को मणि देकर उन सब के सामने ही उदास मन से वन में चला गया।   इधर पाण्डव भी श्रीकृष्ण, नारद और व्यासजी को आगे करके बड़ी तेजी से मनस्विनि के पास आये जो इस समय अन्न त्याग किये बैठी थी। वहां वे सब उसे चारों ओर से घेरकर बैठ गये।  फिर राजा युधिष्ठिर की आज्ञा से भीमसेन ने द्रौपदी को वह दिव्य मणि दी और उससे कहा, 'भद्रे ! लो यह मणि है, तुम्हारे पुत्रों का वध करनेवाले को हमने जीत लिया है। अब उठो और शोक त्यागकर क्षात्रधर्म का विचार करो। जिस समय श्रीकृष्ण संधि के लिये कौरवों के पास जा रहे थे, उस समय तुमने इनसे कहा था कि 'केशव ! आज पाण्डव लोग मेरे अपमान की बात भूलकर शत्रुओं के साथ मेल करना चाहते हैं, इससे मैं समझती हूं कि मेरे न तो पति हैं, न पुत्र हैं और न भाई ही है तथा न तुम ही मेरे हो।' सो आज अपने उन क्षत्रिय_धर्मोचित वाक्यों को याद करो। पापी दुर्योधन मारा गया, मैंने तड़पते हुए दु:शासन का रक्तपान भी कर लिया तथा द्रोणपुत्र को तो हमने जीत लिया; ब्राह्मण और गुरुपुत्र समझकर ही उसे जीता छोड़ दिया है। उसका सारा यश मिट्टी में मिल चुका है। हमने उसकी मणि छीन ली है और अस्त्र पृथ्वी पर डलवा लिये हैं।' यह सुनकर द्रौपदी ने कहा_'गुरुपुत्र तो मेरे लिये गुरु ही के समान है, मैं तो उससे केवल अपने अनिष्ट का बदला ही लेना चाहती थी। अब इस मणि को महाराज अपने मस्तक पर धारण करें। तब राजा युधिष्ठिर ने उस मणि को गुरुजी का प्रसाद समझकर द्रौपदी के कहने से उसी समय अपने मस्तक पर धारण कर लिया। उसके बाद पुत्रशोकातुरा द्रौपदी उठकर अपने स्थान पर चली गयी। राजन् ! अब महाराज युधिष्ठिर ने, रात के समय जो वीर मारे गये थे, उनके लिये शोकातुर होकर श्रीकृष्ण से कहा, 'कृष्ण ! अश्वत्थामा तो शस्त्रविद्या में विशेष कुशल भी नहीं था; फिर उसने मेरे सभी महारथी पुत्र और हजारों योद्धाओं के साथ अकेले ही लोहा लेने वाले शस्त्रविद्या विशारद द्रुपद पुत्रों को कैसे मार डाला ? उसने ऐसा कौन पुण्यकर्म किया था, जिसके प्रभाव से उसने अकेले ही हमारे सब सैनिकों को नष्ट कर दिया ? श्रीकृष्ण ने कहा_अश्त्थामा ने अवश्य ही ईश्वरों के ईश्वर देवाधिदेव अविनाशी भगवान् शिव की शरण ली थी, इसी से उसने अकेले ही अनेकों योद्धाओं को मार डाला। महादेवजी तो प्रसन्न होने पर अमरता भी दे सकते हैं और इतना पराक्रम भी देते हैं, जिससे इन्द्र को भी नष्ट किया जा सकता है। भरतश्रेष्ठ! महादेवजी के स्वरूप का मुझे अच्छी तरह ज्ञान है तथा उसके जो अनेकों प्राचीन कर्म हैं, उन्हें भी मैं जानता हूं। वे संपूर्ण भूतों के आदि मध्य और अन्त हैं। यह सारा जगत् उन्हीं के प्रभाव से चेष्टा कर रहा है। वे महान् वीर्यशाली महादेवजी ही अश्वत्थामा पर प्रसन्न हो गये थे। इसी से उसने आपके महारथी पुत्रों को और पांचालराज के अनेकों अनुयायियों को धराशायी कर दिया। अब आप उसके विषय में कोई विचार न करें। अश्वत्थामा ने यह काम महादेवजी के कृपा से ही किया है। आप तो अब आगे जो काम करना हो उसे कीजिये।

सौप्तिक पर्व समाप्त