Monday, 7 December 2020

उलूक, युयुत्सु, श्रुतकर्मा_शतानीक, शकुनि_सतसोम और शिखण्डी_कृतवर्मा में द्वन्दयुद्ध; अर्जुन के द्वारा अनेकों वीरों का संहार तथा दोनों ओर की सेनाओं में घमासान युद्ध


संजय ने कहा_राजन् ! एक ओर आपका पुत्र युयुत्सु कौरवों की भारी सेना को खदेड़ रहा था। यह देखकर उलूक बड़ी फुर्ती से उसके सामने आया। उसने क्रोध में भरकर एक क्षुरप्र से  युयुत्सु का धनुष काट डाला और उसे भी घायल कर दिया। युयुत्सु ने तुरंत ही दूसरा धनुष उठाया और साठ बाणों से उलूक और तीन से उसके सारथि पर वार करके फिर उसे अनेकों बाणों से बींध डाला। इसपर उलूक ने युयुत्सु को बीस बाणो से घायल करके उसकी ध्वजा को काट डाला, एक भल्ल से उसके सारथि का सिर उड़ा दिया, चारों घोड़ों को धराशायी कर दिया और फिर पाँच बाणों से उसे भी बींध डाला। महाबली उलूक के प्रहार से युयुत्सु बहुत ही घायल हो गया और एक दूसरे रथ पर चढ़कर तुरंत ही वहाँ से भाग गया। इस प्रकार युयुत्सु को परास्त करके उलूक झटपट पांचाल और सृंजय वीरों की ओर चला गया।
दूसरी ओर आपके पुत्र श्रुतकर्मा ने शतानीक के रथ, सारथि और घोड़ों को नष्ट कर दिया। तब महारथी शतानीक ने क्रोध में भरकर उस अश्वहीन रथमें से ही आपके पुत्र पर एक गदा फेंकी। वह उसके रथ, सारथि और घोड़ों को भष्म करके पृथ्वी पर जा पड़ी। इस प्रकार ये दोनों ही वीर रथहीन होकर एक_दूसरे की ओर देखते हुए रणांगण से खिसक गये। इसी समय शकुनि ने अत्यन्त पैने बाणों से सुतसोम को घायल किया। किन्तु इससे वह तनिक भी विचलित नहीं हुआ। उसने अपने पिता के परम शत्रु को सामने देखकर उसे हजारों बाणों से आच्छादित कर दिया। किन्तु शकुनि ने दूसरे बाण छोड़कर उसके सभी तीरों को काट डाला। इसके बाद उसने सुतसोम के सारथि, ध्वजा और घोड़ों को भी तिल_ तिल करके काट डाला। तब सुतसोम अपना श्रेष्ठ धनुष लेकर रथ से कूदकर पृथ्वी पर कूद गया और बाणों की वर्षा करके अपने साले के रथ को आच्छादित करने लगा। किन्तु शकुनि ने अपने बाणों की बौछार से उन सब बाणों को नष्ट कर दिषा। फिर अनेकों तीखे तीरों से उसने सुतसोम के धनुष और तरकसों को भी काट डाला।
अब सुतसोम एक तलवार लेकर भ्रान्त, ं, आविद्ध, आपुल्त, पुल्त, सृत, सम्पात और समुदीर्ण आदि चौदह गतियों से उसे सब ओर घुमाने लगा। इस समय उसपर जो बाण छोड़ा जाता था, उसे ही वह तलवार से काट डालता था। इसपर शकुनि ने अत्यन्त कुपित होकर उसपर सर्पों के समान विषैले बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। परन्तु सुतसोम ने अपने शस्त्रकौशल और पराक्रम से उन सबको काट डाला। इसी समय शकुनि ने एक पैने बाण से उसकी तलवार के दो टुकड़े कर दिये। सुतसोम ने अपने हाथ में रहे हुए तलवार के आधे भाग को ही शकुनि पर खींचकर मारा। वह उसके धनुष और धनुष की डोरी को काटकर पृथ्वी पर जा पड़ा। इसके बाद वह फुर्ती से श्रुतकीर्ति के रथ पर चढ़ गया तथा शकुनि भी एक दूसरा भयानक धनुष लेकर अनेकों शत्रुओं का संहार करता हुआ दूसरे स्थान पर पाण्डवों की सेना के साथ संग्राम करने लगा। दूसरी ओर शिखण्डी कृतवर्मा से भिड़ा हुआ था। उसने उसकी हँसली में पाँच तीक्ष्ण बाण मारे। इसपर महारथी कृतवर्मा ने क्रोध में भरकर उसपर साठ बाण छोड़े और फिर हँसते_हँसते एक बाण से उसका धनुष काट डाला। महाबली शिखण्डी ने तुरत ही दूसरा धनुष ले लिया और उससे कृतवर्मा पर अत्यन्त तीक्ष्ण नब्बे बाण छोड़े। वे उसके कवच से टकराकर नीचे गिर गये। तब उसने एक पैने बाण से कृतवर्मा का  धनुष काट डाला तथा उसकी छाती और भुजाओं पर अस्सी बाण छोड़े। इससे उसके सब अंगों से रुधिर बहने लगा। अब कृतवर्मा ने दूसरा धनुष उठाया और अनेकों तीखे बाणों से शिखण्डी के कंधों पर प्रहार किया। इस प्रकार वे दोनों वीर एक_दूसरे घायल करके लहूलुहान हो रहे थे तथा दोनो ही एक_दूसरे के प्राण लेने पर तुले हुए थे। इसी समय कृतवर्मा ने शिखण्डी का प्राणान्त करने के लिये एक भयंकर बाण छोड़ा। उसकी चोट से वह तत्काल मूर्छित हो गया और बिह्वल होकर अपनी ध्वजा के डंडे के सहारे बैठ गया। यह देखकर उसका सारथि तुरंत ही रणभूमि से हटा ले गया। इससे पाण्डवों की सेना ते पैर उखड़ गये और वह इधर_उधर भागने लगी। महाराज ! इसी समय अर्जुन आपकी सेना का संहार कर रहे थे। आपकी ओर से त्रृगर्त, शिबि, कौरव, शाल्व, संशप्तक और नारायणी सेना के वीर उससे टक्कर ले रहे थे। सत्यसेन, चन्द्रदेव, मित्रदेव, सतंजय, सौश्रुति, चित्रसेन, मित्रवर्मा और भाइयों से घिरा हुआ त्रिगर्तराज_ये सभी वीर संग्रामभूमि में अर्जुन पर तरह_ तरह के बाणसमूहों की वर्षा कर रहे थे।
योद्धालोग अर्जुन से सैकड़ों और हजारों की संख्या में टक्कर लेकर लुप्त हो जाते थे। इसी समय उनपर सत्यसेन ने तीन, मित्रदेव ने तिरसठ, चन्द्रदेव ने सात, शत्रुंजय ने बीस और सुशर्मा ने नौ बाण छोड़े। इस प्रकार संग्रामभूमि में अनेकों योद्धाओं के बाणों से से बिंधकर अर्जुन के बदले में उन सभी राजाओं को घायल कर दिया।
उन्होंने सात बाणों से सौश्रुति को, तीन से सत्यसेन को, बीस से शत्रुंजय को, आठ से चन्द्रदेव को, सौ से मित्रदेव को, तीन से श्रुतसेन को, नौ से मित्रवर्मा को और आठ से सुशर्मा को बींधकर अनेकों तीखे बाणों से शत्रुंजय को मार डाला, सौश्रुति का सिर धड़ से अलग कर दिया, इसके बाद फौरन ही चन्द्रदेव को अपने बाणों से यमराज के घर भेज दिया और फिर पाँच_पाँच बाणों से दूसरे महारथियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसी समय सत्यसेन ने क्रोध में भरकर श्रीकृष्ण पर एक विशाल तोमर फेंका और बड़ी भीषण गर्जना की। वह तोमर उनकी दायीं भुजा को घायल करके पृथ्वी पर जा पड़ा। इस प्रकार श्रीकृष्ण को घायल हुआ देख महारथी अर्जुन ने अपने तीखे बाणों से सत्यसेन की गति रोककर फिर उसका कुण्डलमण्डित मस्तक धड़ से अलग कर दिया। इसके बाद उन्होंने अपने पैने बाणों से मित्रवर्मा पर आक्रमण किया तथा एक तीखे वत्सदन्त से उसके सारथि पर चोट की। फिर महाबली अर्जुन ने सैकड़ों बाणों से संशप्तकों पर वार किया और उनमें से सैकड़ों हजारों वीरों को धराशायी कर दिया। उन्होंने एक क्षुरप्र से मित्रसेन का मस्तक उड़ा दिया और सुशर्मा की हँसली पर चोट की। इसपर सारे संशप्तक वीर उन्हें चारों ओर से घेरकर तरह_तरह के शस्त्रों से पीड़ित करने लगे। अब महारथी अर्जुन ने ऐन्द्रास्त्र प्रकट किया। उसमें से हजारों बाण निकलने लगे, जिनकी चोट से अनेकों राजकुमार, क्षत्रिय वीर और हाथी_घोड़े पृथ्वी पर लोट_पोट हो गये। इस प्रकार जब धनुर्धर धनंजय संशप्तकों का संहार करने लगे तो उनके पैर उखड़ गये। उनमें से अधिकांश वीर पीठ दिखाकर भाग गये। इस प्रकार वीरवर अर्जुन ने उन्हें रणांगण में परास्त कर दिया। राजन् ! दूसरी ओर महाराज युधिष्ठिर बाणों की वर्षा कर रहे थे। उनका सामना स्वयं राजा दुर्योधन ने किया। धर्मराज ने उसे देखते ही बाणों से बींध डाला। इसपर दुर्योधन ने नौ बाणों से युधिष्ठिर पर और एक भल्ल से उसके सारथि पर चोट की। तब तो धर्मराज ने दुर्योधन पर तेरह बाण छोड़े। उनमें से चार से उसके चारों घोड़ों को मारकर पाँचवें से सारथि का सिर उड़ा दिया, छठे से उसकी ध्वजा काट डाली, सातवें से उसके धनुष के टुकड़े टुकड़े कर दिये, आठवें से तलवार काटकर पृथ्वी पर गिरा दी और शेष पाँच बाणों से स्वयं दुर्योधन को पीड़ित कर डाला। अब आपका पुत्र उस अश्वहीन रथ से कूद पड़ा। दुर्योधन को इस प्रकार विपत्ति में पड़ा देखकर कर्ण, अश्त्थामा और कृपाचार्य आदि योद्धा उसकी रक्षा के लिये आ गये। इसी प्रकार सब पाण्डवलोग भी महाराज युधिष्ठिर को देखकर संग्राम_भूमि में बढ़ने लगे। बस, अब दोनों ओर से खूब संग्राम होने लगा। दोनों ही पक्ष के वीर वीरधर्म के अनुसार एक_दूसरे पर प्रहार करते थे; जो कोई पीठ दिखाता था, उसपर कोई चोट नहीं करता था। राजन् ! इस समय योद्धाओं में बड़ी मुक्का_मुक्की और हाथा_पाई हुई। वे एक_दूसरे के केश पकड़कर खींचने लगे। युद्ध का जोर यहाँ तक बढ़ा कि अपने_पराये का ज्ञान भी लुप्त हो गया। इस प्रकार जब घमासान युद्ध होने लगा तो योद्धालोग तरह_तरह के शस्त्रों से अनेक प्रकार के एक_दूसरे के प्राण लेने लगे। रणभूमि में सैकड़ों_हजारों कबन्ध खड़े हो गये। उनके शस्त्र और कवच खून में लथपथ हो रहे थे। इस समय योद्धाओं को यद्यपि अपने_पराये का ज्ञान नहीं रहा था, तो भी वे युद्ध को अपना कर्तव्य समझकर विजय की लालसा से बराबर जूझ रहे थे। उनके सामने अपना_पराया_ जो भी आता, उसी का वे सफाया कर डालते थे। संग्रामभूमि में दोनों ओर के वीरों से खलबला_सी रही थी तथा टूटे हुए रथ और मारे हुए हाथी, घोड़े एवं योद्धाओं के कारण अगम्य_सी हो रही थी। वहाँ क्षण में खून की नदी बहने लगती थी। कर्ण पांचालों का, अर्जुन त्रिगर्तों का और भीमसेन कौरव तथा गजारोही सेना का संहार कर रहे थे। इस प्रकार तीसरे पहर तक यह कौरव और पाण्डव सेनाओं का भीषण संहार चलता रहा।

अंगराज का वध, सहदेव के द्वारा दुःशासन की तथा कर्ण के द्वारा नकुल की पराजय और कर्ण द्वारा पांचालों का संहार

संजय कहते हैं_महाराज ! आपके पुत्र की आज्ञा से बड़े_बड़े हाथीसवार हाथियों के साथ ही क्रोध में भरकर धृष्टधुम्न को मार डालने की इच्छा से उसकी ओर बढ़े। पूर्व और दक्षिण देश के रहनेवाले गजयुद्ध में कुशल जो प्रधान_ प्रधान वीर थे, वे सभी उपस्थित थे। इसके सिवा अंग, बंग, पुण्ड्र, मगध, मेकल, कोसल, मद्र, दशार्ण, निषध और कलिंगदेशीय योद्धा भी, जो हस्तियुद्ध में निपुण थे, वहाँ आए। वे सब लोग पांचालों की सेना पर बाण, तोमर और नाराचों की वर्षा करते हुए आगे बढ़े। उन्हें आते देख धृष्टधुम्न उनके हाथियों पर नाराचों की वर्षा करने लगा। प्रत्येक हाथी को उसने दस_दस, छः_छः और आठ_आठ  बाणों से मारकर घायल कर दिया।उस समय धृष्टधुम्न को हाथियों की सेना से घिर गया देख पाण्डव और पांचाल योद्धा तेज किये हुए अस्त्र_शस्त्र लेकर गर्जना करते हुए वहाँ आ पहुँचे और उन हाथियों पर बाणों की बौछार करने लगे। नकुल, सहदेव, द्रौपदी के पुत्र, प्रभद्रक, सात्यकि, शिखण्डी तथा चेकितान_ ये सभी वीर चारों ओर से बाणों की झड़ी लगाने लगे। 
तब म्लेच्छों ने अपने हाथियों को शत्रुओं की ओर प्रेरित किया। वे हाथी अत्यन्त क्रोध में भरे हुए थे; इसलिये रथों, घोड़ों और मनुष्यों को सूड़ों से खींचकर पटक देते और पैरों से दबाकर कुचल डालते थे। कितने ही योद्धाओं को उन्होंने दाँतों की नोक से चीर डाला और कितनों को सूँड़ में लपेटकर ऊपर फेंक दिया।
दाँतों से कुचले हुए जो लोग जमीन पर गिरते थे, उनकी सूरत बड़ी भयानक  हो जाती थी। 
इसी समय अंगराज के हाथी का सात्यकि से सामना हुआ। सात्यकि ने भयंकर वेगवाले नाराच से हाथी के मर्मस्थानों को बींध डाला। हाथी वेदना से मूर्छित होकर गिर पड़ा। अंगराज  उसकी ओट में अपने शरीर को छिपाये बैठा थ, अब वह हाथी से कूदना ही चाहता था कि सात्यकि ने उसकी छाती पर नाराच से प्रहार किया। चोट को न सँभाल सकने के कारण वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
इसके बाद नकुल ने यमदण्ड के समान तीन नाराच हाथ में लिये और उनके प्रहार से अंगराज से पीड़ित करके फिर सौ बाणों से उसके हाथी को भी घायल किया। तब अंगराज ने नकुल पर एक सौ आठ तोमरों का प्रहार किया, किन्तु उसने प्रत्येक तोमर के तीन_तीन टुकड़े कर डाले और एक अर्धचन्द्राकार बाण मारकर उसके मस्तक को भी काट लिया। फिर तो वह म्लेच्छराज हाथी के साथ ही भूमि पर गिर पड़ा। इस प्रकार अंगदेशीय राजकुमार के मारे जाने पर वहाँ के महावत क्रोध में भर गये और हाथियोंसहित नकुल पर चढ़ गये। उनके साथ ही मेकल, उत्कल, कलिंग, निषध और ताम्रलिप्त आदि देशों के योद्धा भी नकुल को मार डालने की इच्छा से उसपर बाणों और तोमरों की वर्षा करने लगे।
 उन सबके अस्त्रों की बौछार से नकुल को ढ़क गया देख पाण्डव, पांचाल और सोमक क्षत्रिय बड़े क्रोध में भरकर वहाँ आ पहुँचे। फिर तो पाण्डवपक्ष के रथी वीरों का उन हाथियों के साथ घोर युद्ध होने लगा। उन्होंने बाणों की झड़ी लगा दी और हजारों तोमरों का वार किया। 
उनकी मार से हाथियों के कुम्भस्थल फूट गये, मर्मस्थानों में घाव हो गया, दाँत टूट गये और उनकी सारी सजावट बिगड़ गयी। उनमें से आठ बड़े_बड़े गजराजों का सहदेव ने चौंसठ बाण मारे, जिनकी चोट से पीड़ित हो वे हाथी अपने सवारोंसहित गिरकर मर गये। महाराज ! सहदेव जब क्रोध में भरकर आपकी सेना को भष्मसात् कर रहा था, उसी समय दुःशासन उसके मुकाबले में आ गया। आते ही उसने सहदेव की छाती में तीन बाण मारे। तब सहदेव ने सत्तर नाराचों से दुःशासन को तथा तीन से उसके सारथि को बींध डाला। यह देख दुःशासन ने सहदेव का धनुष काटकर उसकी छाती और भुजाओं में तिहत्तर बाण मारे। अब तो सहदेव के क्रोध की सीमा न रही, उसने बड़ी फुर्ती से दुःशासनके रथ पर तलवार का वार किया। वह तलवार प्रत्यंचासहित उसके धनुष को काटकर जमीन पर गिर पड़ी। फिर सहदेव ने दूसरा धनुष लेकर दुःशासन पर प्राणान्तकारी बाण छोड़ा, किन्तु उसने तीखी धारवाली तलवार से उसके दो टुकड़े कर डाले और सहदेव को घायल करके उसके सारथि को भी नौ बाण मारे। इससे सहदेव का क्रोध बहुत बढ़ गया और और उसने काल के समान विकराल बाण हाथ में लेकर उसे आपके पुत्र पर चला दिया। वह बाण दुःशासन का कवच छेदकर शरीर को विदीर्ण करता हुआ जमीन में घुस गया। इससे आपका पुत्र बेहोश हो गया। यह देख सारथि तीखे बाणों की मार सहता हुआ रथ को रणभूमि से दूर हटा ले गया। इस प्रकार दुःशासन को परास्त करके सहदेव ने दुर्योधन की सेना पर दृष्टि डाली और उसका सब ओर से संहार आरंभ कर दिया। दूसरी ओर नकुल भी कौरव_सेना को पीछे भगा रहा था। यह देख कर्ण क्रोध में भरा हुआ वहाँ आया और नकुल को रोककर सामना करने लगा। उसने नकुल का धनुष काटकर उसे तीस बाणों से घायल किया। तब नकुल ने दूसरा धनुष लेकर कर्ण को सत्तर और उसके सारथि को तीन बाण मारे। फिर एक क्षुरप्र से कर्ण के धनुष को काटकर उसपर तीन सौ बाणों का प्रहार किया।
नकुल के द्वारा कर्ण को इस तरह पीड़ित होते देख सभी रथियों को बड़ा आश्चर्य हुआ; देवता भी अत्यन्त विस्मित हो गये। तदनन्तर कर्ण ने दूसरा धनुष उठाया और नकुल के भी सात बाणों से कर्ण को बींधकर उसके धनुष का एक किनारा काट दिया। कर्ण ने पुनः दूसरा धनुष लिया और नकुल के चारों ओर की दिशाएँ बाणों से आच्छादित कर दीं। किन्तु महारथी नकुल ने कर्ण के छोड़े हुए उन सभी बाणों को काट डाला।
उस समय सायकसमूहों से भरा हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो उसमें टिड्डियाँ छा रही हो। उन दोनों के बाणों से आकाश का मार्ग रुक गया था, अन्तरिक्ष की कोई भी वस्तु उस समय जमीन पर नहीं पड़ती थी। उन दोनों महारथियों के दिव्य बाणों से जब दोनों ओर की सेनाएँ नष्ट होने लगीं तो सभी योद्धा उनके बाणों के गिरने के स्थान से दूर हट गये और दर्शकों की भाँति तमाशा देखने लगे। जब सब लोग वहाँ से दूर हो गये तो दोनों महारथी परस्पर बाणों की बौछार से एक_दूसरे को चोट पहुँचाने लगे। कर्ण ने हँसते_हँसते उस युद्ध में बाणों का जाल_सा फैला दिया, उसने सैकड़ों और हजारों बाणों का प्रहार किया। जैसे बादलों की घटा घिर आने पर उसकी छाया से अन्धकार_सा हो जाता है, वैसे ही कर्ण के बाणों से अंधेरा_सा छा गया। इसके बाद कर्ण ने नकुल का धनुष काट दिया और मुस्कराते हुए उसके सारथि को भी रथ से मार गिराया। फिर तेज किये हुए चार बाणों ले उसके चारों घोड़ों को तुरत यमलोक भेज दिया। तत्पश्चात् अपने बाणों की मार से उसने नकुल के दिव्य रथ के तिल के समान टुकड़े करके उसकी धज्जियाँ उड़ा दीं। पहियों के रक्षकों को मारकर ध्वजा, पताका, गदा, तलवार, ढ़ाल तथा अन्य सामग्रियों को भी नष्ट कर दिया। रथ घोड़े और कवच से रहित हो जाने पर नकुल ने एक भयानक परिघ उठाया, किंतु कर्ण ने तीखे बाणों से उनके भी टुकड़े_टुकड़े कर डाले। उस समय उसकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं और वह सहसा रणभूमि छोड़कर भाग खड़ा हुआ। कर्ण ने हँसते हँसते उसका पीछा किया और उसके गले में अपना धनुष डाल दिया। फिर वह कहने लगा, ‘पाण्डुनन्दन ! अब बलवानों के साथ युद्ध करने का साहस न करना। जो तुम्हारे समान हों, उन्हीं से भिड़ने का हौसला करना चाहिए। माद्रीकुमार ! हार गये तो क्या हुआ? लजाओ मत । जाओ घर में जाकर छिप रहो अथवा जहाँ श्रीकृष्ण तथा अर्जुन हों वहीं चले जाओ। यह कहकर कर्ण ने नकुल को छोड़ दिया। यद्यपि उस समय कर्ण के लिये नकुल का मारना सहज था, तो भी कुन्ती को दिये हुए वचन याद करके उसने उसे जीवित ही छोड़ दिया; क्योंकि कर्ण धर्म का ज्ञाता था। नकुल को इस पराजय से बड़ा दुःख हुआ। वह उचछ्वास लेता हुआ अत्यन्त संकोच के साथ जाकर युधिष्ठिर के रथ में बैठ गया। इतने में सूर्यदेव आकाश मे मध्यभाग में आ गये। उस दुपहरी में सूतपुत्र कर्ण चारों ओर चक्र के समान घूमता हुआ पांचालों का संहार करने लगा। शत्रुओं के रथ टूट गये, ध्वजा पताकाएँ कट गयीं, घोड़े और सारथि मारे गये तथा बहुतों के रथ के धुरे खण्डित हो गये।
कुछ ही देर में पांचालसेना के रथी भागते देखे गये। हाथियों के शरीर खून से लथपथ हो गये। वे उन्मत्त की भाँति इधर_उधर भागने लगे।
ऐसा जान पड़ता था, मानो वे किसी बड़े भारी जंगल में जाकर दावानल से दग्ध हो गये हैं। उस समय हमें सब ओर कर्ण के धनुष से छूटे हुए बाणों से कटे अनेकों सिर, भुजा और जंघाएँ दिखायी देती थीं। संग्रामभूमि में सृंजयवीरों पर कर्ण की बड़ी भीषण मार पड़ रही थी, तो भी पतंग जैसे अग्नि पर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार कर्ण की ओर ही बढ़ते जा रहे थे। महारथी कर्ण जहाँ_तहाँ पाण्डव_सेनाओं को भष्म कर रहा था; अतः क्षत्रियलोग उसे प्रलयकालीन अग्नि के समान समझकर उसके आने से भागने लगे। पांचालवीरों में से भी जो योद्धा मरने से बचे थे, वे सब मैदान छोड़कर भाग गये। 

अर्जुन के द्वारा संशप्तकों तथा अश्त्थामा के हाथ से राजा पाण्ड्य का वध

संजय कहते हैं_महाराज ! अर्जुन ने मंगल ग्रह की भाँति वक्र और अतिवक्र  गति से चलकर बहुसंख्यक संशप्तकों का नाश कर डाला।
अनेकों पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथी अर्जुन के बाणों की मार से अपना धैर्य खो बैठे, कितने ही चक्कर काटने लगे। कुछ भाग गये और बहुत_से गिरकर मर गये। उन्होंने भल्ल, क्षुर, अर्धचन्द्र तथा वत्सदन्त आदि अस्त्रों से अपने शत्रुओं के घोड़े, सारथी, ध्वजा, धनुष, बाण, हाथ, हाथ के हथियार, भुजाएँ और मस्तक काट गिराये।
इसी बीच में उपायुध के पुत्र ने तीन बाणों से अर्जुन को बींध दिया। यह देख अर्जुन ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। उस समय उपायुध के समस्त सैनिक क्रोध में भरकर अर्जुन पर नाना प्रकार के अस्त्र_शस्त्रों की वर्षा करने लगे। परन्तु अर्जुन ने अपने अस्त्रों से शत्रुओं की अस्त्रवर्षा रोक दी और सायकों की झड़ी लगाकर बहुतों_से शत्रुओं का वध कर डाला। उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा_’अर्जुन ! तुम खिलवाड़ क्यों कर रहे हो ? इन संसप्तकों का अंत करके अब कर्ण का वध करने के लिये शीघ्र तैयार हो जाओ।‘ ‘अच्छा ! ऐसा ही करता हूँ’_यह कहकर अर्जुन ने शेष संशप्तकों का संहार आरंभ किया। अर्जुन इतनी शीघ्रता से बाण हाथ में लेते, संधान करते और छोड़ते थे कि बहुत सावधानी से देखनेवाले भी उनकी इन सब बातों को देख नहीं पाते थे। अर्जुन का हस्तलाघव देखकर स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण भी आश्चर्य में पड़ गये। उन्होंने अर्जुन से कहा_’पार्थ ! इस पृथ्वी पर दुर्योधन के कारण राजाओं का यह महासंहार हो रहा है। आज तुमने जो पराक्रम किया है वैसा स्वर्ग में केवल इन्द्र ने ही किया था।‘ इस प्रकार बातें करते हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुन चले जा रहे थे, इतने में ही उन्हें दुर्योधन की सेना के पास शंख, दुंदुभी और भेरी आदि पणव आदि बाजों की आवाज सुनाई दी।
तब श्रीकृष्ण ने घोड़ों को बढ़ाया और वहाँ पहुँचकर देखा कि राजा पाण्ड्य के द्वारा दुर्योधन की सेना का विकट विध्धवंस हुआ है। यह देख उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। राजा पाण्ड्य अस्त्रविद्या तथा धनुर्विद्या में प्रवीण थे। उन्होंने अनेकों प्रकार के बाण मारकर शत्रु समुदाय का नाश कर डाला था। शत्रुओं के प्रधान_प्रधान वीरों ने उनपर जो_जो अस्त्र छोड़े थे, उन सबको अपने सायकों से काटकर वे उन वीरों को यमलोक भेज चुके थे।
धृतराष्ट्र ने कहा_संजय ! अब तुम मुझसे राजा पाण्ड्य के पराक्रम, अस्त्रशिक्षा, प्रभाव और बल का वर्णन करो। संजय ने कहा, महाराज ! आप जिन्हें श्रेष्ठ महारथी मानते हैं, उन सबको राजा पाण्ड्य अपने पराक्रम के सामने तुच्छ गिनते थे। अपने समान भीष्म और द्रोण की समानता बतलाना भी उन्हें बर्दाश्त नहीं होता था। श्रीकृष्ण और अर्जुन से किसी भी बात में अपने को कम नहीं समझते थे। इस प्रकार पाण्ड्य समस्त राजाओं तथा संपूर्ण अस्त्रधारियों में श्रेष्ठ थे।
वे कर्ण की सेना का संहार कर रहे थे। उन्होंने संपूर्ण योद्धाओं को छिन्न_भिन्न कर दिया, हाथियों और उनके सवारों को पताका, ध्वजा और अस्त्रों से हीन करके पादरक्षकों सहित मार डाला। पुलिंद, खस, बाह्लीक, निषाद, आन्ध्र, कुंतल, दक्षिणात्य और भोजदेशीय शूरवीरों को शस्त्रहीन तथा कवचशून्य करके उन्होंने मौत के घाट उतार दिया। इस प्रकार उन्हें कौरवों की चतुरंगिणी सेना का नाश करते देख अश्त्थामा उनका सामना करने के लिये आया। उसने राजा पाण्ड्य के ऊपर पहले प्रहार किया, तब उन्होंने एक कर्णी नामक बाण मारकर अश्त्थामा को बींध डाला। इसके बाद अश्त्थामा ने मर्मस्थान को विदीर्ण कर देनेवाले अत्यंत भयंकर बाण हाथ में लिये और राजा पाण्ड्य के ऊपर हँसते_हँसते उनका प्रहार किया। तत्पश्चात् उसने तेज की हुई धारवाले कई तीखे नाराच उठाये और पाण्ड्य पर उनका दशमी गति से ( दशमी गति से मारा हुआ बाण मस्तक को धड़ से अलग कर देता है।) प्रयोग किया। परन्तु पाण्ड्य ने नौ तीखे बाण मारकर उन नाराचों को काट डाला और उसके पहियों की रक्षा करनेवाले योद्धाओं को भी मार डाला।
अपने शत्रु की यह फुर्ती देखकर अश्त्थामा ने धनुष को मण्डलाकार बना लिया और बाणों की बौछार करने लगा। आठ_आठ बैलों से खींचे जानेवाले आठ गाड़ियों में जितने बाण लदे थे, उन सबको अश्त्थामा ने आधे पहर में ही समाप्त कर दिया। उस समय उसका स्वरूप क्रोध से भरे हुए यमराज के समान हो रहा था। जिन लोगों ने उसे देखा, वे प्रायः होश_हवास खो बैठे। अश्त्थामा के चलाये हुए उन सभी बाणों ने पाण्ड्य ने वयव्यास्त्र से उड़ा दिया और उच्चस्वर से गर्जना की।
तब द्रोणकुमार ने उनकी ध्वजा काटकर चारों घोड़ों और सारथि को यमलोक भेज दिया तथा अर्धचन्द्राकार बाण से धनुष काटकर रथ की भी धज्जियाँ उड़ा दीं। उस समय यद्यपि महारथी पाण्ड्य रथ से शून्य हो गये थे, तो भी अश्त्थामा ने उन्हें मारा नहीं। उनके साथ युद्ध करने की इच्छा अभी बनी ही हुई थी। इसी समय एक महाबली गजराज बड़े वेग से दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा, उसका सवार मारा जा चुका था। राजा पाण्ड्य हाथी के युद्ध में बड़े निपुण थे। उस पर्वत के समान ऊँचे गजराज को देखते ही वे उसकी पीठ पर जा बैठे। अब तो क्रोध के मारे द्रोणकुमार के बदन में आग लग गयी, उसने शत्रु  को पीड़ा देनेवाले यमदण्ड के समान भयंकर चौदह बाण हाथ में लिये। उनमें से पाँच बाणों से तो उसने हाथी को  पैरों से लेकर सूँड़ तक बींध डाला, तीन से राजा की दोनों भुजाओं और मस्तक को काट गिराया तथा शेष छः बाणों पाण्ड्य के अनुयायी छः महारथियों को यमलोक पठाया। इस प्रकार मबाबली पाण्ड्य को मारकर जब अश्त्थामा ने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया तो आपका पुत्र दुर्योधन अपने मितेरों के साथ उसके पास आया और बड़ी प्रसन्नता के साथ उसने उसका स्वागत_सत्कार किया।

Friday, 2 October 2020

संशप्तकों और अश्त्थामा के साथ अर्जुन का घोर संग्राम, अर्जुन के हाथ से दण्डधार और दण्ड का वध

धृष्टराष्ट्र ने पूछा__संजय ! अर्जुन का संशप्तकों और अश्त्थामा के साथ किस प्रकार युद्ध हुआ ?
संजय ने कहा_महाराज ! सुनिये। संशप्तकों की सेना समुद्र के समान दुर्लंघ्य थी, तो भी अर्जुन ने उसमें प्रवेश कर तूफान सा खड़ा कर दिया।
वे तेज किये हुए बाणों से कौरवों के मस्तक काट_काटकर गिराने लगे। थोड़ी ही देर में वहाँ जमीन पट गयी और वहाँ पड़े हुए ढ़ेर_के_ढ़ेर मस्तक बिना नाल के कमल जैसे दिखायी देने लगे। हजारों बाणों की वर्षा करके उन्होंने रथों, हाथियों और घोड़ों को उनके सवारों_सहित यमलोक भेज दिया। तीखे बाण मार_मारकर शत्रुओं के सारथि, ध्वजा, धनुष, बाण तथा रत्नजटित मुद्रिका से सुशोभित हाथों को काट गिराया। यह देख बड़े_बड़े योद्धा साँड़ों के समान हुँकारते हुए अर्जुन पर टूट पड़े और तीखे तीरों से उन्हें घायल करने लगे। उस समय अर्जुन और उन योद्धाओं में रोमांचकारी संग्राम आरम्भ हो गया।  अर्जुन पर सब ओर अस्त्रों की वर्षा हो रही थी, तो भी वे अपने अस्त्रों से उसका निवारण करके बाणों से मार_मारकर शत्रुओं के प्राण लेने लगे। जैसे हवा बादलों को छिन्न_भिन्न कर देती है, उसी प्रकार वे विपक्षियों के रथों की धज्जियाँ उड़ा रहे थे। उस समय अर्जुन अकेले होने पर भी एक हजार महारथियों के समान पराक्रम दिखा रहे थे। उनका यह पुरुषार्थ देख, सिद्ध,  ऋषि और चारण भी उनकी प्रशंसा करने लगे। देवताओं ने दुंदुभी बजायी और  अर्जुन तथा श्रीकृष्ण पर फूलों की वर्षा की। फिर वहाँ इस प्रकार आकाशवाणी हुई। ‘ जिन्होंने चन्द्रमा की कान्ति, अग्नि की दीप्ति, वायु का बल और सूर्य का प्रताप धारण किया है, वे ही ये श्रीकृष्ण और अर्जुन रणभूमि में विराज रहे हैं। एक रथ पर बैठे हुए ये दोनों वीर ब्रह्मा तथा शंकर की भाँति अजेय हैं। ये संपूर्ण प्राणियों से श्रेष्ठ नर तथा नारायण हैं।‘ इस आश्चर्यमय वृतांत को देख और सुनकर भी अश्त्थामा ने युद्ध के लिये भली_भाँति तैयार हो श्रीकृष्ण तथा अर्जुन पर धावा किया। उसने श्रीकृष्ण को साठ तथा अर्जुन को तीन बाण मारे। तब अर्जुन ने क्रोध मेंभरकर तीन बाणों से उसकाधनुष काट दिया। यह देख उसने दूसरा अत्यन्त भयंकर धनुष हाथ में लिया तथा श्रीकृष्ण पर तीन सौ तथा अर्जुन पर एक हजार बाणों का प्रहार किया।
इतना ही नहीं, अश्त्थामा ने अर्जुन को आगे बढ़ने से रोककर उनके ऊपर हजारों, लाखों और अरबों बाण बरसाये। उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो उसके तरकस, धनुष, प्रत्यंचा, रथ, ध्वजा तथा कवच से बाँह, हाथ, छाती, मुँह, नाक, कान तथा मस्तक आदि अंगों एवं रोम_रोम से बाण छूट रहे हैं। इस प्रकार अपने सायकसमूहों की बौछार से उसने श्रीकृष्ण और अर्जुन को बींध डाला और अत्यन्त प्रसन्न होकर महामेघ के समान भयंकर गर्जना की। अश्त्थामा की गर्जना सुनकर अर्जुन ने उसके चलाये हुए प्रत्येक बाण के तीन_तीन टुकड़े कर डाले। इसके बाद उन्होंने संशप्तकों के रथ, हाथी, घोड़े, सारथि, ध्वजा और पैदल सिपाहियों को भयंकर बाणों से मारना आरम्भ कर दिया। गाण्डीव से छूटे हुए नाना प्रकार के बाण तीन मील पर खड़े हुए हाथी और मनुष्यों को भी मार गिराते थे। उस समय अर्जुन ने शत्रुओं के बहुत_से सजे_सजाये घुड़सवारों और पैदल सैनिकों का सफाया कर डाला। शत्रुओं में से जो लोग रण में पीठ दिशखाकर भाग नहीं गये, बराबर सामने डटे रहे, उसके धनुष, बाण, तरकस, प्रत्यंचा, हाथ, बाँह, हाथ के हथियार, छत्र, ध्वजा, घोड़े, रथ की ईषा, ढ़ाल, कवच और मस्तक को अर्जुन ने काट डाला। पार्थ के बाणों के प्रहार से रथ, घोड़े, और हाथियों के साथ उनके सवार भी धराशायी हो गये। यह देख अंग, बंग, कलिंग और निषाद देशों के वीर अर्जुन को मार डालने की इच्छा से हाथियों पर सवार हो वहाँ चढ़ आये। किन्तु अर्जुन ने उनके हाथियों के कवच, मर्मस्थान, सूँढ़, महावत, ध्वजा और पताका आदि को काट डाला। इससे वे हाथी वज्र के मारे हुए पर्वतशिखर की भाँति जमीन पर ढ़ह पड़े।
इसी बीच अश्त्थामा ने अपने धनुष पर दस बाण चढ़ाये और मानो एक ही बाण छोड़ा हो, इस प्रकार उन दसों को एक ही साथ छोड़ दिया। उनमें से पाँच बाणों ने तो अर्जुन को घायल किया और पाँच ने श्रीकृष्ण को क्षत_विक्षत कर दिया। उन दोनों के शरीर से खून की धारा बहने लगी। उनका इस प्रकार पराभव देखकर सबने यही माना कि अब वे मारे गये। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा_’अर्जुन ! ढ़िठाई क्यों कर रहे हो; मारो इसे। जैसे चिकित्सा न कराने पर रोग बढ़कर कष्टदायक हो जाता है, उसी प्रकार लापरवाही करने से यह शत्रु भी प्रबल होकर महान् दु:खदायीहो जायगा।‘ ‘बहुत अच्छा’ कहकर अर्जुन ने भगवान् की आज्ञा स्वीकार की और सावधान होकर उन्होंने अश्त्थामा की बाँह,छाती,सिर और जंघा को बाणों से छेद डाला।
फिर घोड़ों की बागडोर काटकर उन्हें बाणों से बींधना आरम्भ कर दिया। घोड़े घबराकर भागे और अश्त्थामा को रणभूमि से दूर हटा ले गये।
अश्त्थामा अर्जुन के बाणों से इतना घायल हो चुका था कि फिर लौटकर उनसे लड़ने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। थोड़ी देर तक घोड़ों को रोककर उसने आराम किया और कर्ण की सेना में प्रवेश कर गया। तदनन्तर श्रीकृष्ण और अर्जुन संशप्तकों का सामना करने चल दिये। इसी समय उत्तर की ओर पाण्डवसेना में बड़े जोर का आर्तनाद सुनाई पड़ा। वहाँ दण्डधार पाण्डवों की चतुरंगिणी सेना का संहार कर रहा था। यह देख भगवान् कृष्ण ने रथ को लौटाकर उधर ही घुमा दिया और अर्जुन से कहा_’मगधदेश का राजा दण्डधार बड़ा पराक्रमी है, वह कहीं भी अपना सानी नहीं रखता। इसके पास शत्रुओं का संहार करनेवाला एक महान् गजराज है, इसे युद्ध की उत्तम शिक्षा मिली है और बल तो सबसे अधिक है ही। इनमें से किसी भी दृष्टि से यह राजा भगदत्त से कम नहीं है। पहले तुम इसी का संहार कर डालो, फिर संशप्तकों को मारना।‘
इतना कहकर भगवान् ने अर्जुन को दण्डधार के निकट पहुँचा दिया। वह काले लोहे के कवच पहने हुए घुड़सवार और पैदल सैनिकों को अपने मदोन्मत्त गजराज के द्वारा कुचलवाकर गिरा रहा था। वहाँ पहुँचते ही श्रीकृष्ण को बारह और अर्जुन को सोलह बाण मारकर दण्डधार ने उनके घोड़ों को भी तीन_तीन बाणों से घायल किया। इसके बाद वह बारंबार हँसने और गरजने लगा।
तब अर्जुन ने भल्लों से उसके धनुष_बाण, प्रत्यंचा, और ध्वजा को काट दिया। इससे कुपित हो श्रीकृष्ण और अर्जुन को घबराहट में डालने की इच्छा से अपने मदोन्मत्त गजराज को उनकी ओर बढ़ाया और तोमरों से उन दोनों पर वार किया। यह देख पाण्डुनन्दन अर्जुन ने तीन क्षुर चलाकर उसकी दोनों भुजाओं और मस्तक को एक ही साथ काट डाला, इसके बाद उसके हाथी को भी सौ बाण मारे।
उनकी चोट से पीड़ित होकर हाथी जोर_जोर से चिघ्घारने लगा और चक्कर काटता त़था लड़खड़ाचा हुआ इधर_उधर भागता तथा इधर_उधर भागने लगा। अन्त में ठोकर खाकर वह महावत के साथ ही गिरा और मर गया।
युद्ध में दण्डधार के मारे जाने पर उसका भाई दण्ड श्रीकृष्ण और अर्जुन का वध करने के लिये चढ़ आया। आते ही वह श्रीकृष्ण को तीन  और अर्जुन को तेज किये हुए पाँच तोमर मारकर भीषण गर्जना करने लगा। तब अर्जुन ने उसकी दोनों बाँहें काट डालीं और उसके मस्तक पर एक अर्धचन्द्राकार बाण मारा।
उसकी चोट से दण्ड का मस्तक कटकर हाथी पर से जमीन पर जा पड़ा। इसके बाद उन्होंने दण्ड के हाथी को भी बाणों से विदीर्ण कर डाला। उसकी चोट से अत्यन्त व्यथित वह हाथी चिघ्घारता हुआ गिरकर मर गया।
तत्पष्चात् दूसरे_दूसरे योद्धा भी उत्तम हाथियों पर सवार होकर विजय की इच्छा से चढ़ आये, परन्तु सव्यसाची ने औरों की भाँति उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया। फिर भी शत्रु की बहुत बड़ी सेना भाग खड़ी हुई। और अर्जुन संशप्तकों का संहार करने चल दिये।

Sunday, 20 September 2020

विन्द_अनुविन्द और चित्रसेन का चित्रक का वध, अश्त्थामा और भीमसेन का भयंकर युद्ध

तदनन्तर श्रुतकर्मा ने क्रोध में भरकर पचास बाणों से राजा चित्रसेन को घायल किया। अभिसारनरेश चित्रसेन ने भी नौ बाणों से श्रुतकर्मा को बींधकर पाँच सायकों से उसके सारथि को भी पीड़ित किया। तब श्रुतकर्मा ने चित्रसेन के मर्मस्थान में तीखे नाराच से वार किया। उसकी गहरी चोट लगने से वीरवर चित्रसेन को मूर्छा आ गयी। थोड़ी देर में जब होश हुआ तो उसने एक भल्ल मारकर श्रुतकर्मा का धनुष काट दिया और फिर सात बाणों से उसे भी बींध डाला। श्रुतकर्मा को पुनः क्रोध आ गया, उसने शत्रु के धनुष के दो टुकड़े कर डाले और तीन सौ बाण मारकर उसे खूब घायल किया। फिर एक तेज किये हुए भाले से चित्रसेन का मस्तक काट गिराया। अभिसारनरेश चित्रसेन मारा गया_ यह देखकर उसके सैनिक श्रुतकर्मा पर टूट पड़े। परंतु उसने अपने सायकों की मार से उन सबको पीछे हटा दिया। दूसरी ओर प्रतिविन्ध्य ने चित्र को पाँच बाणों से घायल करके तीन सायकों से उसके सारथि को बींध दिया और एक बाण मारकर उसकी ध्वजा काट डाली। तब चित्र ने उसकी बाँहों और छाती में नौ भल्ल मारे। यह देख प्रतिविन्ध्य ने उसका धनुष काट दिया और पचीस बाणों से उसे भी घायल किया। फिर चित्र ने भी प्रतिविन्ध्य पर एक भयंकर शक्ति का प्रहार किया, किन्तु उसने उस शक्ति  को हँसते हँसते काट दिया। तब उसने प्रतिविन्ध्य पर गदा चलायी। उस गदा ने प्रतिविन्ध्य के घोड़े और सारथि को मौत के घाट उतार  उसके रथ को भी चकनाचूर कर दिया।
प्रतिविन्ध्य पहले से ही कूदकर पृथ्वी पर आ गया था, उसने चित्र पर शक्ति का प्रहार किया। शक्ति को अपने ऊपर आते देख चित्र ने उसे हाथ से पकड़ लिया और तुरत प्रतिविन्ध्य पर ही चलाया। वह शक्ति प्रतिविन्ध्य की दाहिनी भुजा पर चोट करती हुई भूमि पर जा पड़ी। इससे प्रतिविन्ध्य को बड़ा क्रोध हुआ, उसने चित्र को मार डालने की इच्छा से तोमर का प्रहार किया। वह तोमर उसकी छाती और कवच को छेदता हुआ जमीन में घुस गया तथा राजा चित्र अपनी बाँहें फैलाकर भूमि पर ढ़ह पड़ा। चित्र को मारा गया देख आपके सैनिकों ने प्रतिविन्ध्य पर बड़े वेग से धावा किया, परन्तु उसने अपने सायकसमूहों की वर्षा करके उन सबको पीछे भगा दिया। उस समय, जबकि कौरव_सेना के समस्त योद्धा भागे जा रहे थे, केवल अश्त्थामा ही महाबली भीमसेन का सामना करने के लिये आगे बढ़ा। फि उन दोनों में घोर संग्राम होने लगा। अश्त्थामा ने पहले एक बाण मारकर भीमसेन को बींध दिया। फिर नब्बे बाणों से उसके मर्मस्थानों में आघात किया। 
तब भीमसेन ने भी एक हजार बाणों से द्रोणपुत्र को आच्छादित करके सिंह के समान गर्जना की। किन्तु अश्त्थामा ने अपने सायकों से भीमसेन के बाणों से द्रोणपुत्र को आच्छादित करके सिंह के समान गर्जना की। किन्तु अश्त्थामा ने अपने सायकों से भीमसेन के बाणों को रोक दिया और मुस्कराते हुए उसने भीम के ललाट में एक नाराच मारा। यह देख भीम ने भी तीन नाराचों से अश्त्थामा के ललाट को बींध डाला। तब द्रोणकुमार ने सौ बाण मारकर को पीड़ित किया, किन्तु इससे भीम तनिक भी विचलित नहीं हुए। इसी प्रकार भीम ने भी अश्त्थामा को तेज भीमसेन किये हुए सौ बाण मारे, परन्तु वह डिग न सका। अब उसने बड़े_बड़े अस्त्रों का प्रयोग आरम्भ किया और भीमसेन अपने असेत्रों से उनका नाश करने लगे। इस तरह उन दोनों में भयंकर अस्त्रयुद्ध छिड़ गया। उस समय भीमसेन और अश्त्थामा के छोड़े हुए बाण आपस में टकराकर आपकी सेना के चारों ओर संपूर्ण दिशा में प्रकाश फैला रहे थे। सायकों से आच्छादित हुआ आकाश बड़ा भयंकर दिखायी देता था। बाणों के टकराने से आग पैदा होकर दोनों सेनाओं को दग्ध कर रही थी। उन दोनों वीरों का अद्भुत एवं अचिंत्य पराक्रम देख सिद्ध और चारणों के समुदायों को बड़ा विस्मय हो रहा था।
देवता, सिद्ध तथा बड़े_बड़े ऋषि उन दोनों को शाबाशी दे रहे थे।  वे दोनों महारथी मेघ के समान जान पड़ते थे; वे बाणरूपी जल को धारण किये शस्त्ररूपी बिजली की चमक से प्रकाशित हो रहे थे और बाणों की बौछार से एक_दूसरे को ढ़के देते थे। दोनों ने दोनों की ध्वजा काटकर सारथि और घोड़ों को बींध डाला, फिर एक_दूसरे को बाणों से घायल करने लगे। बड़े वेग से किये हुए परस्पर के आघात से जब वे अत्यन्त घायल हो गये तो अपने_अपने रथ के पिछले भाग में गिर पड़े। अश्त्थामा का सारथि उसे मूर्छित जानकर रणभूमि से दूर हटा ले गया। भीम के सारथि ने भी उन्हें अचेत जानकर ऐसा ही किया।

कर्णपर्व _ कर्ण के सेनापतित्व में युद्ध का आरम्भ और भीम के द्वारा क्षेमधूर्ति का वध

नारायणं नमस्कृतयं नरं चैव नरोत्तम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके नित्यसखा नरस्वरूप नर_रत्न अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता महर्षि वेदव्यास को नमस्कार करके आसुरी शक्तियों पर विजय_प्राप्तिपूर्वक अंतःकरण को शुद्ध करनेवाले महाभारत ग्रंथ का पाठ करना चाहिषे।
वैशम्पायनजी कहते हैं_ राजन् ! द्रोणाचार्य के मारे जाने से दुर्योधन आदि राजा बहुत घबरा गये, शोक से उनका उत्साह नष्ट हो गया। वे द्रोण के लिये अत्यन्त अनुताप करते हुए अश्त्थामा के पास जाकर बैठे और कुछ देर तक शास्त्रीय युक्तियों से उसे आश्वासन देते रहे; फिर प्रदोष के समय अपने_अपने शिविर में चले गये। कर्ण, दुःशासन और शकुनि ने दुर्योधन के ही शिविर में वह रात व्यतीत की।
सोते समय वे चारों ही पाण्डवों को दिये हुए क्लेशों पर विचारकरते रहे। पाण्डवों को जूए में जो कष्ट भोगने पड़े थे तथा द्रौपदी को जो भरी सभा में घसीटकर लाया गया था_ वे सब बातें याद करके उन्हें बड़ा पश्चाताप हुआ, उनका चित्त बहुत अशांत हो गया।
तत्पश्चात् जब सबेरा हुआ तो सबने शास्त्रीय विधि के अनुसार अपना_अपना नित्यकर्म पूरा किया; फिर भाग्य पर भरोसा करके धैर्यधारणपूर्वक उन्होंने सेना को तैयार होने की आज्ञा दी और युद्ध के लिये निकल पड़े। दुर्योधन ने कर्ण को सेनापति के पद पर अभिषेक किया और दही, घी, अक्षत, स्वर्णमुद्रा, गौ, सोना तथा बहुमूल्य वस्त्रों द्वारा उत्तम ब्राह्मणों की पूजा करके उनके आशीर्वाद प्राप्त किये। फिर सूत, मागध तथा वंदीजनों ने जयजयकार किया। इसी प्रकार पाण्डव भी प्रातःकृत्य समाप्त कर युद्ध का निश्चय कर शिविर से बाहर निकले।
धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! अब तुम मुझे यह बताओ कि कर्ण ने सेनापति होने के बाद कौन सा कार्य किया ।
संजय ने कहा_महाराज ! कर्ण की सम्मति जानकर दुर्योधन ने रणभेरी बजवायी और सेना को तैयार हो जाने की आज्ञा दी। उस समय बड़े-बड़े गजराजों, रथों, कवच बाँधनेवाल़े मनुष्यों तथा घोड़ों का कोलाहल बढ़ने लगा। कितने ही योद्धा उतावले हो_होकर एक_दूसरे को पुकारने लगे।
इन सबकी मिली हुई ऊँची आवाज से आसमान गूँज उठा। इसी समय सेनापति कर्ण एक दमकते हुए रथ पर बैठा दिखायी पड़ा। उसके रथ पर श्वेत पताका फहरा रही थी। घोड़े भी सफ़ेद थे। ध्वजा में सर्प का चिह्न बना हुआ था। रथ के भीतर सैकड़ों तरकस, गदा, कवच, शतध्नी किंकिणी, शक्ति, शूल, तोमर और धनुष रखे हुए थे। कर्ण ने शंख बजाया और उसकी आवाज सुनते ही योद्धा उतावले होकर दौड़े। इस प्रकार कौरवों की बहुत बड़ी सेना को उसने शिविर से बाहर निकाला तथा पाण्डवों जीतने की इच्छा से उसका मगर के आकार का एक व्यूह बनाकर रणभूमि को कूच किया।
उस मकर_व्यूह के मुख के स्थान में स्वयं कर्ण उपस्थित हुआ। दोनों नेत्रों की जगह शूरवीर शकुनि और उलूक खड़े हुए। मस्तक_भाग में अश्त्थामा तथा कण्ठदेश में दुर्योधन के सभी भाई थे। व्यूह के मध्यभाग में बहुत बड़ी सेना से घिरा हुआ महाराज दुर्योधन था। बायें चरण के स्थान में कृतवर्मा खड़ा हुआ था, उसके साथ रणोन्मत्त ग्वालों की नारायणी सेना थी।
दहिेने चरण की जगह कृपाचार्य थे, उनके साथ महान् धनुर्धर त्रिगर्तों और दक्षिणात्यों की सेना थी। वाम चरण के पिछले भाग में मद्रदेशीय योद्धाओं को साथ लेकर राजा शल्य खड़े हुए। दाहिने चरण के पीछे राजा सुषेण था, उसके साथ एक हजार रथियों और तीन सौ हाथियों की सेना थी। व्यूह की पूँछ के स्थान में अपनी बहुत बड़ी सेना से घिरे हुए दोनों भाई चित्र और चित्रसेन थे।
इस प्रकार व्यूह बनाकर कर्ण ने जब रणांगण की ओर कूच किया तो धर्मराज युधिष्ठिर ने अर्जुन को देखकर कहा_पार्थ ! देखो तो सही, कर्ण ने कौरवसेना की किस तरह मोर्चेबन्दी की है और महारथी वीर कैसे इसकी रक्षा कर रहे हैं।
धृतराष्ट्र की महासेना में जितने बड़े _बड़े  वीर थे, वे सब प्रायः मारे जा चुके हैं; अब थोड़े ही रह गये हैं। अतः मैं तो इसे तिनके के समान समझता हूँ। इस सेना में सूतपुत्र कर्ण ही एक महान् धनुर्धर वीर हैं, जिसे देवता भी नहीं जीत सकते। महाबाहो । अब इस कर्ण को मार डालने से तुम्हारी विजय होगी और मेरे हृदय का काँटा भी निकल जायगा। इसलिये तुम अपनी इच्छानुसार अपनी सेना की व्यूहरचना करो।‘
भाई की बात सुनकर अर्जुन ने शत्रुओं के मुकाबले में अपनी सेना का अर्धचन्द्राकार व्यूह बनाया। उसके वाम भाग में भीमसेन, दाहिने भाग में धृष्टधुम्न तथा मध्य में राजा युधिष्ठिर और अर्जुन खड़े हुए। नकुल और सहदेव_ये दोनों युधिष्ठिर के पीछे थे। पांचालदेशीय युधामन्यु और उत्तमौजा अर्जुन के पहियों की रक्षा करने लगे।
शेष वीरों में से जिन्हें व्यूह में जहाँ स्थान मिला, वे वहीं खूब उत्साह के साथ डट हये। इस प्रकार कौरव तथा पाण्डवों ने व्यूह बनाकर फिर युद्ध में मन लगाया। दोनों दलों में ऊँची आवाज करनेवाले बाजे बज उठे। विजयाभिलाषी शूरवीरों का सिंहनाद सुनायी देने लगा। महान् धनुर्धर कर्ण को व्यूह के मुहाने पर कवच धारण किये उपस्थित देख कौरव योद्धा द्रोणाचार्य के वियोग का दुःख भूल गये। तदनन्तर कर्ण तथा अर्जुन आमने_सामने आकर खड़े हुए और दोनों एक_दूसरे को देखते ही क्रोध में भर गये। उनके सैनिक भी उछलते_कूदते हुए परस्पर जा भिड़े। 
फिर तो भयानक युद्ध छिड़ गया; हाथी, घोड़े और रथों के सवार तथा पैदल योद्धा एक_दूसरे पर प्रहार करने लगे। वे अर्धचन्द्र, भल्ल, क्षुरप्र, तलवार, पट्टिश और फरसों से अपने प्रतिपक्षियों के मस्तक काटने लगे। मरे हुए वीर हाथी, घोड़ों तथा रथों से गिर_गिरकर धराशायी होने लगे। सैनिकों के हाथ, पैर और हथियार सभी चलने लगे; उनके द्वारा वहाँ महान् संहार आरम्भ हो गया। इस प्रकार जब सेना का विध्वंश हो रहा था, उसी समय भीमसेन आदि पाण्डव हमलोगों पर चढ़ आये। भीमसेन हाथी पर बैठे हुए थे। उन्हें दूर से ही आते देख राजा क्षेममूर्ति ने, जो स्वयं भी हाथी पर सवार था, युद्ध के लिये ललकारा और उनपर धावा कर दिया। पहले उन दोनों के हाथियों में ही युद्ध आरम्भ हुआ। जब हाथी लड़ते_लड़ते आपस में सट गये तो वे दोनों वीर तोमरों से एक_दूसरे पर जोरदार प्रहार करने लगे।
फिर धनुष उठाकर दोनों ने दोनो को बींधना आरंभ किया। थोड़ी ही देर में उन्होंने एक_दूसरे का धनुष काटकर सिंहनाद किया और परस्पर शक्ति एवं तोमरों की झड़ी लगा दी। इसी बीच में क्षेममूर्ति ने बड़े लेग से एक तोमर का प्रहार कर भीमसेन की छाती छेद डाली, फिर गरजते हुए उसने छः तोमर और मारे। भीमसेन ने भी धनुष उठाया और बाणों की वर्षा से शत्रु के हाथी को बहुत पीड़ित किया; इससे वह भाग चला, रोकने से भी नहीं रुका। क्षेममूर्ति ने किसी तरह हाथी को काबू में किया। क्षेममूर्ति नेक्रोध में भरकर भीमसेन को बाणों से बींध डाला। साथ ही उसके हाथी के भी मर्मस्थानों में चोट पहुँचायी। हाथी उस आघात को न सह सका। वह प्राण त्यागकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। भीमसेन उसके गिरने से पहले ही कूदकर जमीन पर आ गये और अपनी गदा की प्रहार से शत्रु के हाथी को भी उन्होंने मार गिराया। क्षेमधूर्ति भी हाथी से कूदकर नीचे आ गया और तलवार उठाकर भीमसेन की ओर दौड़ा। यह देख भीम ने उसपर गदा से चोट की। उसके आघात से क्षेममूर्ति के प्राण_पखेरू उड़ गये और वह तलवार के साथ ही हाथी के पास गिर पड़ा। महाराज ! क्षेममूर्ति कुलूत देश का यशस्वी राजा था, उसे मारा गया देख आपकी सेना व्यथित होकर रणभूमि से भागने लगी।

Saturday, 27 June 2020

व्यासजी के द्वारा अर्जुन के प्रति भगवान् शंकर की महिमा का वर्णन

धृतराष्ट्र ने पूछा__संजय ! धृष्टधुम्न के द्वारा अतिरथी वीर द्रोणाचार्य के मारे जाने पर मेरे पुत्रों तथा पाण्डवों ने आगे कौन सा कार्य किया ?  संजय ने कहा___महाराज ! उस दिन का युद्ध समाप्त हो जाने पर महर्षि वेदव्यासजी स्वेच्छा से घूमते हुए अकस्मात् अर्जुन के पास आ गये। उन्हें देखकर अर्जुन ने पूछा___’महर्षे ! जब मैं अपने बाणों से शत्रुसेना का संहार कर रहा था, उस समय देखा कि एक अग्नि के समान तेजस्वी महत्रिशूल मेरे आगे चल रहे हैं। वे ही मेरे शत्रुओं का नाश करते थे, किन्तु लोग समझते थे मैं कर रहा हूँ। मैं तो केवल उनके पीछे_पीछे चलता था। भगवन् ! बताइये, वे महापुरुष कौन थे ? 
उनके हाथ में त्रिशूल था, वे सूर्य के समान तेजस्वी थे, अपने पैरों से पृथ्वी का स्पर्श नहीं करते थे । त्रिशूल का प्रहार करते हुए भी वे उसे हाथ से कभी नहीं छोड़ते थे। उनके तेज से उस एक ही त्रिशूल से हजारों नये_नये त्रिशूल प्रकट हो जाते।‘
व्यासजी बोले___अर्जुन ! तुमने भगवान् शंकर का दर्शन किया है । वे तेजोमय अन्तर्यामी प्रभु संपूर्ण जगत् के ईश्वर हैं। सबके शासक तथा वरदाता हैं। तुम उन भगवान् भुवनेश्वर की शरण में जाओ। वे महान् देव हैं, उनका हृदय विशाल है। सर्वत्र व्यापक होते हुए भी वे जटाधारी त्रिनेत्ररूप धारण करते हैं। उनकी ‘रुद्र’ संज्ञा है। उनकी भुजाएँ बडी हैं। उनके मस्तक पर शिखा तथा शरीर पर वल्कल वस्त्र शोभा देता है। वे सबके संहारक होकर भी निर्विकार हैं। किसी से पराजित न होनेवाले और सबको सुख देनेवाले हैं। सबके साक्षी, जगत् की उत्पत्ति के कारण, जगत् के सहारे, विश्व के आत्मा, विश्वविधाता और विश्वरूप हैं। वे ही प्रभु कर्मों के अधिष्ठाता__कर्मों का फल देनेवाले हैं। सबका कल्याण करनेवाले और स्वायम्भू हैं। संपूर्ण भूतों के स्वामी तथा भूत, भविष्य और वर्तमान के कारण भी वे ही हैं। वे ही योग हैं, वे ही योगेश्वर हैं। वे ही सर्व हैं और वे ही सर्वलोकेश्वर। सबसे श्रेष्ठ, सारे जगत् से श्रेष्ठ, श्रेष्ठतम परमेठी भी वे ही हैं। वे ही तीनों लोकों के त्रष्टा और त्रिभुवन के अधिष्ठानभूत विशुद्ध परमात्मा हैं। भगवान् भव भयानक होकर भी चन्द्रमा को मुकुटरूप से धारण करते हैं। वे सनातन परमेश्वर संपूर्ण वागीश्वरों के भी ईश्वर हैं। वे अजेय हैं; जन्म_मृत्यु और जरा आदि विकार उन्हें छू भी नहीं सकते। वे ज्ञानरूप, ज्ञानगम्य तथा ज्ञान में सर्वश्रेष्ठ हैं। भक्तों पर कृपा करके उन्हें मनोवांछित वर दिया करते हैं। भगवान् शंकर के दिव्य पार्षद नाना प्रकार के रूपों में दिखायी देते हैं। वे सब महादेवजी की सदा ही पूजा किया करते हैं। तात् ! वे साक्षात् भगवान् शंकर ही वह तेजस्वी पुरुष हैं, जो कृपा करके तुम्हारे आगे_आगे चला करते हैं उस घोर रोमांचकारी संग्राम में अश्त्थामा, कृपाचार्य और कर्ण जैसे महान् धनुर्धर जिस सेना की रक्षा करते हैं, वे नाना रूपधारी भगवान् महेश्वर के सिवा दूसरा कौन नष्ट कर सकता है ? और जब वे ही आगे आकर खड़े हो जायँ, तो उनके सामने ठहरने का भी कौन साहस कर सकता है ? तीनों लोकों में कोई ऐसा प्राणी नहीं है, जो उनकी बराबरी कर सके। संग्राम में भगवान् शंकर के कुपित होने पर उनकी गंध से भी शत्रु बेहोश होकर काँपने लगते हैं और अधमरे होकर गिर जाते हैं। जो भक्त मनुष्य सदा अनन्यभाव से उमानाथ भगवान् शिव की उपासना करते हैं, वे इस लोक में सुख पाकर अन्त में परमपद को प्राप्त होते हैं। कुन्तीनन्दन ! तुम भी नीचे लिखे अनुसार उन शान्तस्वरूप भगवान् शंकर को सदा नमस्कार किया करो। ‘जो नीलकण्ठ, सूक्ष्मस्वरूप और अत्यन्त तेजस्वी हैं। संसार_समुद्र से तारनेवाले सुन्दर तीर्थ हैं, सूर्यस्वरूप हैं। देवताओं के भी देवता, अनन्त रूपधारी, हजारों नेत्रोंवाले और कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं, परम शान्त और सबके पालक हैं, उन भगवान् भूतनाथ को सदा प्रणाम है।‘
उनके हजारों मस्तक, हजारों नेत्र, हजारों भुजाएँ और हजारों चरण हैं। कुन्तीनन्दन ! तुम उन वरदायक भुवनेश्वर भगवान् शिव की शरण में जाओ।  वे निर्विकार भाव से प्रजा का पालन करते हैं, उनके मस्तक पर जटाजूट सुशोभित होता है। वे धर्मस्वरूप और धर्म के स्वामी हैं। कोटि कोटि ब्रह्माण्डों को धारण करने के कारण उनका उदर और शरीर विशाल है। वे व्याघ्रचर्म ओढा करते हैं। ब्राह्मणों पर कृपा रखनेवाले और ब्राह्मणों के प्रिय हैं।‘जिनके हाथ में त्रिशूल, ढाल_तलवार और पिनाक आदि अस्त्र शोभा पाते हैं, उन शरणागतवत्सल भगवान शिव की शरण में जाता हूँ।‘ इस प्रकार उनकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। जो देवताओं के स्वामी और कुबेर के सखा हैं, उन भगवान् शिव को प्रणाम है। जो सुन्दर व्रत का पालन करते और सुन्दर धनुष धारण करते हैं, जो धनुर्वेद के आचार्य हैं, उन उग्र आयुधवाले देवश्रेष्ठ भगवान् रुद्र को नमस्कार है।
जिनके अनेकों रूप हैं, अनेकों धनुष हैं, जो स्थानु एवं तपस्वी हैं, उन भगवान् रुद्र को नमस्कार है। जो गणपति, वाक्पति, यग्यपति तथा जल और देवताओं के पति हैं, जिनका वर्ण, पीत और मस्तक के बाल सुवर्ण के समान कान्तिमान हैं, उन भगवान् शंकर को नमस्कार है। अब मैं महादेवजी के दिव्य कर्मों को अपने ग्यान और बुद्धि के अनुसार बता रहा हूँ। यदि वे कुपित हो जायँ तो देवता, गन्धर्व, असुर और राक्षस पाताल में छिप जाने पर भी चैन से नहीं रहने पाते।
एक समय की बात है, दक्ष ने भगवान् शंकर की अवहेलना की; इससे उनके यज्ञ में महान् उपद्रव खडा हो गया। जब उन्हें उनका भाग अर्पण किया गया, तभी दक्ष का यज्ञ पूर्ण हो पाया। 
पूर्वकाल की बात है, तीन बलवान असुरों ने आकाश में अपने नगर बना रखे थे। वे नगर विमान के रूप में आकाश में विचरा करते थे। उन तीन नगरों में एक लोहे का, दूसरा चाँदी का और तीसरा सोने का बना था। जो सोने का बना था उसका स्वामी था कमलाक्ष। चाँदी के बने हुए पुर में तारकाक्ष रहता था तथा लोहे के नगर में विद्युन्माली का निवास था। इन्द्रने उन पुरों का भेदन करने के लिये अपने सभी अस्त्रों का प्रयोग किया, पर वे कृतकार्य न हो सके तब इन्द्रादि सभी देवता दुःखी होकर भगवान् शंकर की शरण में गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने कहा___’भगवन् ! इन त्रिपुरनिवासी दैत्यों को ब्रह्माजी ने वरदान दे रखा है, उसके घमण्ड में फूलकर ये भयंकर दैत्य तीनों लोकों को कष्ट पहुँचा रहे हैं। महादेव ! आपके सिवा दूसरा कोई उसका नाश करने में समर्थ नहीं है, आप ही इन देवद्रोहियों का वध कीजिये। ‘देवताओं के ऐसा कहने पर भगवान् शंकर ने उनका हितसाधन करने के लिये ‘तथास्तु’ कहा और गन्धमादन तथा विन्ध्याचल_इन दो पर्वतों को अपनी रथ का ध्वजा बनाया। समुद्र और वनों के सहित संपूर्ण पृथ्वी ही रथ हुई। नागराज शेष को रथ की धुरी के स्थान पर रखा गया। चन्द्रमा और सूर्य_ये दोनों पहिये बने।
एलपत्र के पुत्र को और पुष्पदन्त को जुए की कीलें बनाया। मलयाचल का जुआ बनाया गया। तक्षक नाग ने जुआ बाँधने की रस्सी का काम किया। मलयाचल का जुआ बनाया गया। भगवान् शंकर ने संपूर्ण प्राणियों को घोड़ों की बागडोर में सम्मिलित किया। चारों वेद रथ के चार घोडे बनाये गये। उपवेद लगाम बने। गायत्री और सावित्री का पगहा बना। ॐकार चाबुक हुआ और ब्रह्माजी सारथि। मन्दराचल को गाण्डीव धनुष का रूपदिया गया और वासुकि नाग से उसकी प्रत्यंचा का काम लिया गया। भगवान् विष्णु हुए उत्तम बाण और अग्निदेव को उसका फल बनाया गया। बिजली उसबाण की धार हुई। मेरु को प्रधान ध्वजा बनाया गया। इस प्रकार सर्वदेवमय दिव्य रथ तैयार कर भगवान् शंकर उसपर आरूढ हुए। उस समय संपूर्ण देवता उनकी स्तुति करने लगे। भगवान् शंकर उस रथ में एक हजार वर्ष तक रहे। जब तीनों पुर आकाश में एकत्रित हुए, तो उन्होंने तीन गाँठ तथा तीन फलवाले बाण से उन तीनों पुरों को भेद डाला। दानव उनकी ओर आँख उठाकर देख भी न सके। कालाग्नि के समान बाण से जिस समय वे तीनों लोकों को भष्म कर रहे थे, उस समय पार्वती देवी भी देखने के लिये वहाँ आयीं। उनकी गोदी में एक बालक था,  जिसके सिर में पाँच शिखाएँ थीं। पार्वती ने देवताओं से पूछा__’यह कौन है ?’ इस प्रश्न से इन्द्र के हृदय में असूया की आग जल उठी और उन्होंने उस बालक पर वज्र का प्रहार करना चाहा; किन्तु उस बालक ने हँसकर उन्हें स्तंभित कर दिया। उसकी वज्रसहित उठी हुई बाँह ज्यों_की_त्यों रह गयी। अपनी वैसी ही बाँह लिये इन्द्र देवताओं के साथ ब्रह्माजी की शरण में गये तथा उनको प्रणाम करके बोले, ‘भगवन् ! पार्वतीजी की गोद में एक अपूर्व बालक था, हमने उसे नहीं पहचाना। उसने बिना युद्ध किये खेल ही में हमलोगों को जीत लिया। अतः आप पूछते हैं कि वह कौन था ? उनकी बात सुनकर ब्रह्माजी ने उस अमित तेजस्वी बालक का ध्यान किया और सारा रहस्य जानकर देवताओं से कहा_’उस बालक के रूप में चराचर जगत् के स्वामी भगवान् शंकर थे, उनसे श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है। इसीलिये अब तुम मेरे साथ चलकर उन्हीं की शरण लो।‘ उस समय ब्रह्माजी ने उन्हें ही सब देवताओं में श्रेष्ठ जानकर प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की_‘भगवन् ! तुमही यज्ञ हो, तुमही इस विश्व के सहारे हो और तुमही सबको शरण देनेवाले हो। सबको उत्पन्न करनेवाले महादेव तुमही हो। परमधाम या परमपद तुम्हारा ही स्वरूप है। तुमने इस संपूर्ण चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है। भूत और भविष्य के स्वामी जगदीश्वर ! ये इन्द्र तुम्हारे कोप से पीडित हैं,इनपर कृपा करो। ब्रह्माजी की बात सुनकर महेश्वर प्रसन्न हो गये, देवताओं के कृपा करने के लिये वे ठठाकर हँस पड़े। फिर तो देवताओं ने पार्वतीसहित महादेवजी को प्रसन्न किया। शिव के कोप से जो इन्द्र की बाँह सुन्न हो गयी थी, वह ठीक हो गयी। वे भगवान् शंकर ही रुद्र, शिव, अग्नि, सर्वज्ञ, इन्द्र, वायु और अश्विनीकुमार हैं।
वे ही बिजली और मेघ हैं। सूर्य, चन्द्रमा, वरुण, काल, म़ृत्यु, यम, रात, दिवस, मास,पक्ष, सन्ध्या, धाता, विधाता,विश्वात्मा और विश्वकर्मा भी वे ही हैं। वे निराकार होकर भी संपूर्ण देवताओं का आकार धारण करते हैं। सब देवता उनकी स्तुति करते रहते हैं। वे एक, अनेक, सौ, हजार और लाख हैं। वेदज्ञ ब्राह्मण उनके दो शरीर बताते हैं_ शिव और घोर। ये दोनों अलग_अलग हैं। इन दोनों के भी कई भेद हो जाते हैं। उनका घोर शरीर अग्नि और सूर्य आदि के रूप में प्रकट हैं तथा सौम्य शरीर जल, नक्षत्र एवं चन्द्रमा के रूप में। वेद, वेदांग, उपनिषद, पुराण तथा अध्यात्मशास्त्रों में जो परम रहस्य है, वह भगवान् महेश्वर ही हैं। अर्जुन ! यह है महादेवजी की महिमा। इतनी ही नहीं, वह अत्यन्त महान् तथा अनन्त हैं। मैं एक हजार वर्ष तक कहता रहूँ, तो भी उनके गुणों का पार नहीं पा सकता। जो लोग सब प्रकार की ग्रह_बाधाओं से पीडित हैं और सब प्रकार के पापों में डूबे हुए हैं, वे भी यदि उनकी शरण में आ जायँ तो वे प्रसन्न होकर उन्हें पाप_ताप से मुक्त कर देते हैं तथा आयु, आरोग्य,ऐश्वर्य धन एवं प्रचुर भोग सामग्री प्रदान करते हैं। कुपित होने पर वे सबका संहार कर डालते हैं। महाभूतों के ईश्वर होने के कारण उन्हें महेश्वर कहते हैं। वेदों में भी इनकी शतरुद्रिय और अनन्तरुद्रियनाम की उपासना बतायी गयी है। भगवान् शंकर दिव्य और मानव सभी भोगों के स्वामी हैं। संपूर्ण विश्व को व्याप्त करने के कारण वे ही विभु और प्रभु हैं। शिवलिंग की पूजा करने से भगवान् शिव बहुत प्रसन्न होते हैं।
यद्यपि उनके सब ओर नेत्र हैं, तथापि एक विलक्षण अग्निमय नेत्र अलग भी है, जो सदा प्रज्जवलित रहता है। वे सब लोकों में व्याप्त होने के कारण सर्व कहलाते हैं। वे सबके कर्मों में सब प्रकार के अर्थ सिद्ध करते हैं। तथा संपूर्ण मनुष्यों का कल्याण चाहते हैं, इसलिये इन्हें शिव कहते हैं। महान् विश्व का पालन करने से महादेव, स्थिति के हेतु होने से स्थानु और सबके उद्भव होने के कारण भव कहलाते हैं। वे सबके कर्मों में सब प्रकार का अर्थ सिद्ध करते हैं। तथा संपूर्ण मनुष्यों का कल्याण चाहते हैं, इसलिये उन्हें शिव कहते हैं। महान् विश्व का पालन करने से महादेव, स्थिति का हेतु होने से स्थानु और सबके उद्भव होने के कारण भव कहलाते हैं। कपि नाम है श्रेष्ठ का और वृष धर्म का वाचक है; वे धर्म और श्रेष्ठ दोनो हैं, इसलिये उन्हें वृषाकपि कहते हैं। उन्होंने अपने दो नेत्रों को बन्दकर बलात् ललाट में तीसरा नेत्र उत्पन्न किया, इसलिये वे त्रिनेत्र कहे जाते हैं।
अर्जुन ! जो तुम्हारे शत्रुओं का संहार करते हुए देखे गये थे, वे पिनाकधारी महादेवजी ही हैं। जयद्रथवध की प्रतिज्ञा करने पर श्रीकृष्ण ने स्वप्न में गिरिराज हिमालय के शिखर पर तुम्हें जिनका दर्शन कराया था,  वे ही भगवान् शंकर यहाँ तुम्हारे आगे_आगे चलते हैं जिन्होंने ही वे अस्त्र दिये, जिनसे तुमने दानवों का संहार किया है।
यह भगवान् शिव का शतरुद्रिय उपाख्यान तुम्हें सुनाया गया है। यह धन, यश  और आयु की वृद्धि करनेवाला है, परम पवित्र तथा वेद के समान है। भगवान् शंकर का यह चरित्क संग्राम में विजय दिलानेवाला है। इस शतरुद्रिय उपाख्यान को जो सदा पढता और सुनता है तथा जो भगवान् शंकर का भक्त है, वह मनुष्य सभी उत्तम कामनाओं को प्राप्त करता है। अर्जुन ! जाओ, युद्ध करो, तुम्हारी पराजय नहीं हो सकती; क्योंकि तुम्हारे मंत्री, रक्षक और पार्शवर्ती भगवान् श्रीकृष्ण हैं।
संजय कहते हैं_महाराज !  पराशरनन्दन व्यासजी अर्जुन से यह कहकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये।वेदों के स्वाध्याय से जो फल मिलता है, वही इस पर्व के पाठ और श्रवण से भी मिलता है। इनमें वीर क्षत्रियों के महान् यश  का वर्णन किया गया है। जो नित्य इसे पढता और सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। इसके पाठ से ब्राह्मणों को यज्ञ का फल मिलता है, क्षत्रियों को संग्राम में सुयश की प्राप्ति होती है तथा शेष दो वर्णों को भी पुत्र_पौत्र आदि आदि अभीष्ट वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं।
द्रोणपर्व समाप्त