Sunday, 28 March 2021

त्रिपुरों की उत्पत्ति और उनके नाश का प्रसंग

दुर्योधन ने कहा_महाराज शल्य ! पूर्वकाल में महर्षि मार्कण्डेय ने मेरे पिताजी से एक उपाख्यान कहा था। वह सब कथा मैं आपको सुनाता हूँ। उसे सुनिये और मैंने जो प्रार्थना की है, उसके विषय में किसी प्रकार का विचार न कीजिये।
पहले तारकामय नाम का एक संग्राम हुआ था । उसमें देवताओं ने दैत्यों को परास्त कर दिया। उस समय तारक दैत्यों को परास्त कर दिया। उस समय तारक दैत्य के ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली नाम के तीन पुत्र थे। उन्होंने कठोर नियमों का पालन करते हुए बड़ी भीषण तपस्या की और अपने शरीरों को बिलकुल सुखा दिया। उनके संयम, तप, नियम और समाधि से पितामह ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये और उन्हें वर देने के लिये पधारे। उन तीनों दैत्यों ने सर्वलोकेश्वर श्रीब्रह्माजी को प्रणाम किया और और उनसे कहा, ‘पितामह ! आप हमें ऐसा वर दीजिये कि हम तीन नगरों में बैठकर इस सारी पृथ्वी पर आकाशमार्ग  से विचरते रहें। इस प्रकार एक हजार वर्ष बीतने पर हम एक जगह मिलें। उस समय जब हमारे तीनों पुर बनकर एक हो जायँ तो उस समय जो देवता उन्हें एक ही बाण से नष्ट कर सके, वही हमारी मृत्यु का कारण हो।‘ इसपर ब्रह्माजी ‘ऐसा ही हो’ यह कहकर अपने लोक को चले गये। ब्रह्माजी से ऐसा वर पाकर वे दैत्य बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने आपस में सलाह करके मय दानव के पास जाकर तीन नगर बनाने को कहा। मतिमान् मय ने अपने तप के प्रभाव से तीन पुर तैयार किये। उनमें से एक सोने का, एक चाँदी का और एक लोहे का था। सोने का नगर स्वर्ग में, चाँदी का अंतरिक्ष में और लोहे का पृथ्वी में रहा। ये तीनों किसी नगर इच्छानुसार आ_जा सकते थे। इनमें से प्रत्येक की लम्बाई-चौड़ाई सौ-सौ योजन थी। इनमें आपस में सटे हुए बड़े-बड़े भवन और खुली हुई सड़कें थीं तथा अनेकों  प्रासादों और राजद्वारों से इनकी बड़ी शोभा हो रही थी। इन नगरों के अलग-अलग राजा थे। सुवर्णमय नगर तारकाक्ष का था, रजतमय कमलाक्ष का और लोहमय विद्युन्माली का। इन दैत्यों के पास जहां_तहां से करोड़ों दानव योद्धा आकर एकत्रित हो गये। इन तीनों पुरोों में रहनेवाला जो पुरुष जैसी इच्छा करता, उसकी उस कामना को मायासुर अपनी माया से उसी समय पूरी कर देता था। तारकाक्ष के हरि नाम का एक महाबली पुत्र था। उसने बड़ी कठोर तपस्या की। इससे ब्रह्माजी उसपर प्रसन्न हो गयेे। उन्हें संतुष्ट देखकर हरि ने यह वर मांगा कि हमारे नगर में ऐसी बावड़ी बन जाय कि जिसमें डालने पर शस्त्र से घायल हुए योद्धा और भी अधिक बलवान हो जायं। इस प्रकार ब्रह्माजी से वर पाकर तारकाक्ष के पुत्र हरि ने अपने नगर में एक मुर्दों को जीवित कर देनेवाली बावड़ी बनवायी। दैत्य लोग जिस रूप और जिस वेष में मरते थे उस बावड़ी में डालने पर उसी रूप, उसी वेष में जीवित होकर निकल आते थे। इस प्रकार उस बावड़ी को पाकर वे सारे लोकों को कष्ट देने लगे तथा अपनी घोर तपस्या से सिद्धि पाकर वे  देवताओं के भय की वृद्धि करने लगे। युद्ध में उनका किसी भी प्रकार नाश नहीं हो सकता था।
 अब तो वे लोभ और मोह से अंधे होकर एकदम मतवाले हो गये‌। उन्होंने लज्जा को एक ओर रख दिया और सब ओर लूट_मार करने लगे। वरदान के मद में चूर होकर वे समय_समय पर जहां_तहां देवताओं को भगाकर स्वेच्छा से विचरने लगे। उन मर्यादाहीन दुष्ट दानवों ने देवताओं के प्रिय उद्यान और ऋषियों के पवित्र आश्रम को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। इस प्रकार जब सब लोक पीड़ित होने लगे तो मरुद्गन को साथ लेकर देवराज इन्द्र ने चढ़ाई कर दी और उन नगरों पर वे सब ओर वज्र_प्रहार करने लगे। किंतु जब वे ब्रह्माजी के वर के प्रभाव से उन अभेद्य नगरों को तोड़ने में समर्थ न हुए तो भयभीत होकर अनेकों देवताओं को साथ ले ब्रह्माजी के पास गये और उन्हें दैत्यों के कारण मिलने वाले अपने कष्टों की कहानी सुनायी।
इस प्रकार सारा हाल सुनाकर उन्होंने प्रणाम करके ब्रह्माजी से उसके वध का उपाय पूछा। देवताओं की सब बातें सुनकर भगवान ब्रह्माजी से कहा, ‘जो दैत्य तुमलोगों को दुख दे रहा है, वह तो मेरा अपराध करने भी नहीं चूकता। इसमें संदेह नहीं, मैं सब प्राणियों के लिये समान हूं। परन्तु मेरा नियम है कि अधर्मियों का तो नाश ही करना चाहिये। इसके लिये उन तीनों नगरों को एक ही बाण से तोड़ना होगा। किन्तु इस काम को करने में श्रीमहादेवजी के सिवा कोई समर्थ नहीं हैं। इसलिए तुम सब उनके पास जाकर यह वर मांगो। वे अवश्य उन दैत्यों को मार डालेंगे।
ब्रह्माजी की यह बात सुनकर इन्द्रादि देवता उन्हीं के नेतृत्व में श्री महादेवजी की शरण में गये। भगवान् शंकर अपने शरणापन्नों के भय के समय अभयदान करनेवाले और सबके आत्मस्वरूप हैं। उनके पास जाकर वे  सब उनकी स्तुति करने लगे। तब उन्हें तेजोराशि पार्वतीपति श्रीमहादेवजी का दर्शन हुआ। सभी ने पृथ्वी पर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया और महादेवजी ने आशीर्वाद द्वारा सत्कार करके सबको उठाया। फिर वे मुस्कराते हुए कहने लगे, ‘कहो, कहो, तुम्हारी क्या इच्छा है ?’ भगवान की आज्ञा पाकर देवता लोग स्वस्थचित्त होकर कहने लगे, ‘देवाधिदेव ! आपको नमस्कार है। प्रजापति भी आपकी स्तुति करते हैं और सबने आपकी स्तुति भी की है; आप सभी की स्तुति के पात्र हैं और सभी आपकी स्तुति करते हैं। शम्भो ! हम सब आपको नमस्कार करते हआ। आप सबके आश्रय_स्थान और सभी का संसार करनेवाले हैं। ऐसे ब्रह्मस्वरूप आपको हम नमस्कार करते हैं। आप सभी के अधीश्वर और नियन्ता हैं तथा वनस्पति, मनुष्य, गौ और यज्ञों के पति हैं। देव ! हम मन, वाणी और कर्मों से आपके शरणापन्न हैं; आप हमपर कृपा कीजिए।‘ तब भगवान् शंकर ने प्रसन्न होकर उनका स्वागत_सत्कार करते हुए कहा, ‘देवगण ! भय को छोड़िये और बताते, मैं आपका क्या काम करूं ?’ इस प्रकार जब महादेव जी देवता, ऋषि और पितृगण को अभयदान दिया तो ब्रह्माजी ने उनका सत्कार करके संसार के हित के लिए कहा, ‘सर्वेश्वर ! आपकी कृपा से इस प्रजापति के पद पर प्रतिष्ठित होकर मैंने दानवों को एक महान् वर दे दिया था। उसके कारण उन्होंने सब प्रकार की मर्यादा तोड़ दी है। अब आपके सिवा उनका कोई संहार नहीं कर सकता। देवतालोग आपकी शरण में आकर यही प्रार्थना कर रहे हैं, हो आप इनपर कृपा कीजिये। तब महादेवजी ने कहा, ‘देवताओं ! मैं धनुष_बाण धारण करके रथ में सवार हो संग्रामभूमि में तुम्हारे शत्रुओं का संहार करूंगा। अतः तुम मेरे लिये एक ऐसा रथ और धनुष_बाण तलाश करो, जिनके द्वारा मैं इन नगरों को पृथ्वी पर गिरा सकूं।‘ देवताओं ने कहा_’देवेश्वर ! हम तीनों लोकों के तत्वों को जहां_तहां से इकट्ठे करके आपके लिये एक तेजोमय रथ तैयार करेंगे।‘ ऐसा कहकर उन्होंने विश्वकर्मा के रचे हुए एक विशाल रथ को महादेवजी के लिये तैयार किया। उन्होंने विष्णु, चन्द्रमा और अग्नि को बाण बनाया तथा बड़े_बड़े नगरों से भरी हुई पर्वत, वन और द्वीपों से व्याप्त वसुन्धरा को ही उनका रथ बना दिया। इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर आदि लोकपालों को घोड़े बनाया एवं मन को आधार भूमि बनाया। इस प्रकार जब वह श्रेष्ठ रथ तैयार हो गया तो महादेवजी ने उसमें अपने आयुध रखें।
ब्रह्मदण्ड, कालदण्ड, रुद्रदण्ड और ज्वर_ये सब ओर मुख किते उस रथ की रक्षा में नियुक्त हुए; अथर्वा और अंगिरा उनके चक्र रक्षक बने; ऋग्वेद, सामवेद और समस्त पुराण के उस रथ के आगे चलनेवाले योद्धा हुए; इतिहास और यजुर्वेद पृष्ठरक्षक बने तथा दिव्यवाणी और विद्याएं पार्श्वरक्षक बने। स्तोत्र तथा वषट्कार और ओंकार रथ के अग्रभाग में सुशोभित हुए। उन्होंने छहों ऋतुओं से सुशोभित संवत्सर को अपना धनुष बनाया तथा अपनी छाया को धनुष की अखंड प्रत्यंचा के स्थान में रखा। इस प्रकार रथ को तैयार देख वे कवच और धनुष धारण कर विष्णु, सोम और अग्नि से बने हुए दिव्य बाण को लेकर युद्ध के लिये तैयार हो गये। तब देवताओं ने सुगन्ध युक्त वायु को उनके लिखे हवा करने को नियुक्त किया। तब महादेवजी समस्त युद्धसज्जा से सुशोभित हो पृथ्वी को कंपायमान करते रथ पर सवार हुए। बड़े_बड़े ऋषि, गन्धर्व, देवता और अप्सराओं के समूह उनकी स्तुति करने लगे। इस समय भगवान शंकर खड्ग, बाण और धनुष धारण करके बड़ी शोभा पा रहे थे। उन्होंने हंसकर कहा, ‘मेरा सारथि कौन बनेगा ?  देवताओं ने कहा, ‘देवेश्वर ! आप जिसे आज्ञा देंगे, वहीं आपका सारथि बन जायगा_इसमें आप तनिक भी संदेह न करें।‘ तब भगवान् ने कहा, ‘तुम स्वयं ही विचार करके जो मुझसे श्रेष्ठ हो, उसे मेरा सारथि बना दो।,' यह सुनकर देवताओं ने पितामह ब्रह्माजी के पास जाकर उन्हें प्रसन्न करके कहा, ‘भगवन् ! आपने हमसे पहले ही कहा था कि मैं तुम्हारा हित करूंगा, हो अपना वह वचन पूरा कीजिये। देव ! हमने जो रथ तैयार किया है, वह बड़ा ही दुर्धर्ष है; भगवान् शंकर उसके योद्धा नियुक्त किये गये हैं, पर्वतों के सहित पृथ्वी ही रथ है तथा नक्षत्रमाला ही उसका वरूथ है। किन्तु उसका कोई सारथि दिखाई नहीं देता।
सारथि इन सबके अपेक्षा बढ़_चढ़कर होना चाहिये; क्योंकि रथ तो उसी के अधीन रहता है। हमारी दृष्टि में आपके सिवा और कोई भी इसका सारथि बनने योग्य नहीं है। आप सर्वगुण सम्पन्न और सब देवताओं में श्रेष्ठ हैं। अतः अब आप ही बैठकर घोड़ों की रास संभालिये।‘ ब्रहमाजी ने कहा_देवताओं ! तुम जो कुछ कहते हो, उसमें कोई बात झूठ नहीं है। अतः जिस समय भगवान् शंकर युद्ध करेंगे, मैं अवश्य उनके घोड़े हत
तब देवताओं ने संपूर्ण लोक के स्रष्टा ब्रह्माजी को श्रीमहादेवजी का सारथि बनाया। जिस समय वे वे उस विश्र्ववन्द्य रथ पर बैठे, उसके घोड़ों ने पृथ्वी पर सिर टेककर उसे प्रणाम किया।
परम तेजस्वी भगवान् ब्रह्मा उस रथ पर चढ़कर घोड़ों की रास और कोड़ा संभाला और श्रीमहादेव जी से कहा, ‘देवश्रेष्ठ ! रथ पर सवार होइये।‘
तब भगवान् शंकर, विष्णु, सोम और अग्नि से उत्पन्न हुआ बाण लेकर अपने धनुष से शत्रुओं को कम्पायमान करते रथ पर चढ़े। भगवान् शिव रथ पर बैठकर अपने तेज से तीनों लोकों को देदिप्यमान करने लगे। उन्होंने इन्द्रादि देवताओं से कहा, ‘तुमलोग ऐसा संदेह मत करना कि यह बाण इन पुलों को नष्ट नहीं कर सकेगा; अब तुम इस बाण से इन असुरों का अन्त हुआ ही समझो।‘
देवताओं ने कहा, ‘आपका कथन बिलकुल ठीक है। अब इन दैत्यों का अंत हुआ ही समझना चाहिये। आपका कथन किसी प्रकार मिथ्या नहीं हो सकता।‘ इस प्रकार विचार करके देवता लोग बड़े प्रसन्न हुए। इसके बाद देवाधिदेव महादेवजी उस विशाल रथ पर चढ़कर सब देवताओं के साथ चले। उनके इस प्रकार कूच करने पर सारा संसार और देवतालोग प्रसन्न हो गये। ऋषिगण अनेकों स्रोतों से उनकी स्तुति करने लगे और करोड़ों गन्धर्वगण तरह_तरह के बाजे बजाने लगे।
अब भगवान् शंकर ने मुस्कराकर कहा, ‘प्रजापते! चलिये, जिधर वे दैत्यगण है, उधर ही घोड़े बढ़ाइये।‘ तब ब्रह्माजी ने अपने मन और वायु के समान वेगवान् घोड़ों को दैत्य और दानवों से रहित उन तीनों पुत्रों की ओर बढ़ाया।
इस समय नन्दीश्वर ने बड़ी भारी गर्जना की, जिससे सारी दिशाएं गूंज उठी। उनका यह भीषण नाद सुनकर तारकासुर के अनेक दैत्य नष्ट हो गये। उनके सिवा जो शेष रहे वे युद्ध के लिये उनके सामने आ गये। अब त्रिशूलमणि भगवान् शंकर ने क्रोध में रौंदा चढ़ाया और उसपर बाण चढ़ाकर उसे पशुपतास्त्र से युक्त किया। फिर वे तीनों पुरों  के इकट्ठे होने का चिंतन करने लगे।
इस प्रकार जब वे धनुष चढ़ाकर तैयार हो गये तो उसी समय तीनों नगर मिलकर एक हो गये। यह देखकर देवतालोग बड़ी हर्षध्वनि करने लगे तथा सिद्ध और महर्षियों के सहित उनकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार जब असह्य तेजस्वी भगवान् शंकर असुरों का संहार करने की तैयारी कर रहे थे, उनके सामने तीनों पुर एकत्रित हो कर प्रकट हुए। उन्होंने तुरंत ही अपना दिव्य धनुष खींच कर उनपर वह त्रिलोकी का सारभूत बाण छोड़ा। 
उस बाण के छूटते ही तीनों पुर नष्ट हो कर गिर गये। उस समय बड़ा ही आर्तनाद हुआ। महादेवजी ने उन असुरों को भस्म करके पश्चिम समुद्र में डाल दिया। इस प्रकार त्रिलोकहितकारी भगवान् शिव ने कुपित होकर उस त्रिपुर का नाश किया और दैत्यों को निर्मूल कर दिया। फिर अपने क्रोध से उत्पन्न हुई अग्नि को रोककर उन्होंने कहा, ‘तू त्रिलोकी को भष्म न कर।‘
इस प्रकार दैत्यों का नाश हो जाने पर समस्त देवता, ऋषि और लोक प्रफुल्लित हो गये तथा बड़े श्रेष्ठ वचनों से भगवान् शंकर की स्तुति करने लगे। फिर भगवान् की आज्ञा पाकर ब्रह्मादि आदि सभी देवगण सफल मनोरथ होकर अपने_अपने स्थानों  को चले गये। इस तरह श्रीमहादेवजी ने समस्त लोकों का कल्याण किया था। उस समय जिस प्रकार जगत्कर्ता ब्रह्माजी  उनका सारथ्य किया था उसी प्रकार आप भी वीरवर कर्ण के अश्वों का संचालन कीजिये। राजन् ! इसमें संदेह नहीं कि आप श्रीकृष्ण, कर्ण और अर्जुन से भी श्रेष्ठ हैं। कर्ण युद्ध करने में श्रीमहादेवजी के समान है तो आप रथ हांकने में साक्षात् ब्रह्माजी के सदृश हैं।  अतः, आप दोनों मिलकर मेरे शत्रुओं को उन दैत्यों के समान ही परास्त कर सकते हैं। महाराज ! अब आप ऐसा उपाय कीजिये जिससे आज कर्ण संग्रामभूमि में अर्जुन का वध कर सके। कर्ण की, हमारी और हमारे राज्य की स्थिति अब आप ही के ऊपर निर्भर है। हमारी विजय भी आपपर ही अवलम्बित है। अतः आप कर्ण के घोड़ों का नियंत्रण कीजिये।
महाराज ! कर्ण को स्वयं श्रीपरशुरामजी ने धनुर्विद्या सिखायी है। यदि इसमें कोई दोष होता तो इसे कभी दिव्य अस्त्र न देते। मैं तो कर्ण को क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुआ कोई देवपुत्र ही समझता हूं। यह कवच और कुण्डल पहने उत्पन्न हुआ है तथा विशालबाहु और महारथी है; इसलिये इसका जन्म सूतकुल में होना किसी प्रकार संभव नहीं है।


Friday, 29 January 2021

कर्ण के प्रस्ताव और दुर्योधन के आग्रह से शल्य का आनाकानी के बाद कर्ण का सारथि बनना स्वीकार करना



राजा धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! इसके बाद दुर्योधन ने क्या किया ? वह मंदबुद्धि तो कर्ण का सहारा पाकर पाण्डवों को उनके पुत्र और श्रीकृष्ण के सहित परास्त करने का दम भरता था। किन्तु बड़े ही खेद की बात है कि कर्ण अपने पराक्रम से पाण्डवों से पार नहीं पा सका। निःसंदेह जय_पराजय दैवाधीन ही है। मालूम होता है, अब जूए का परिणाम समीप ही आ गया है। हाय ! इस दुर्योधन के कारण मुझे काँटे के समान अनेकों तीव्रतर कष्ट सहने पड़ेंगे। मैं नित्यप्रति अपने पुत्रों के ही मारे जाने और परास्त होने की बात सुनता रहा हूँ। क्या पाण्डवों को रोकनेवाला हमारी सेना में कोई भी वीर नहीं है? संजय ने कहा_राजन् ! जो पुरुष बीती हुई बात के लिये पीछे से सोच_विचार करता है, उसका वह काम तो नहीं बनता, हाँ, चिन्ता उसे अवश्य खाती रहती है।
अब आपको इस कार्य में सफलता मिलनी तो बड़े दूर की बात है; क्योंकि पहले जानबूझकर भी आपने इसके औचित्य_अनौचित्य के विषय में विचार नहीं किया। महाराज! पाण्डवों ने तो आपसे बार_बार कहा था कि लड़ाई मत ठानिये, किन्तु आपने मोहवश सुना ही नहीं। आपने पाण्डवों के ऊपर बड़े_बड़े जुल्म किये हैं। इस समय भी आपही के कारण यह राजाओं का घोर संहार हो रहा है। परन्तु जो बात बीत गयी, उसके विषय में आप चिन्ता न करें। अब जिस प्रकार यह भयंकर संहार हुआ, वह सुनिये। वह रात बीतने पर कर्ण राजा दुर्योधन के पास आया और उससे कहने लगा, ‘राजन् ! आज मेरी अर्जुन के साथ मुठभेड़ होगी; इसमें या तो मैं उस वीर का काम तमाम कर दूँगा या वह मुझे मार डालेगा।
मैं इन्द्र की दी हुई शक्ति खो बैठा हूँ; इसलिये अर्जुन आज मेरे ऊपर अवश्य धावा करेगा। अब जो काम की बात है वह सुनिये। मेरे और अर्जुन के दिव्य अस्त्रों का प्रभाव तो समान ही है; किन्तु शत्रु के पराक्रम को कुचलने में,  हाथ की सफाई में, युद्धकौशल में और अस्त्र संचालन में अर्जुन मेरे समान नहीं है। इसके सिवा बल, वीर्य, विज्ञान, पराक्रम और निशाना साधने में वह मेरी बराबरी नहीं कर सकता। मेरा जो यह विजय नाम का धनुष है, इसे विश्वकर्मा ने इन्द्र के लिये बनाया था। इसी के द्वारा इन्द्र ने दैत्यों पर विजय प्राप्त की थी। इन्द्र ने यह श्रेष्ठ धनुष परशुरामजी को दिया था और उन्होंने मुझे दिया। यह परशुरामजी का दिया हुआ प्रचण्ड धनुष गाण्डीव से भी बढ़कर है। इसी के द्वारा परशुरामजी ने इक्कीस बार पृथ्वी को जीता था। इसी से अर्जुन के साथ मेरे दो हाथ होंगे। आज संग्राम में विजयी वीर अर्जुन को धराशायी करके मैं आपको और आपके बन्धु_बान्धवों को आनन्दित करूँगा।
जिस प्रकार धर्म में पूर्ण अनुराग रखनेवाले संयमी पुरुष का कार्य में सफलता पाना स्वाभाविक ही है, उसी प्रकार ऐसा कोई काम नहीं है जिसे मैं आपके लिये न कर सकूँ। परंतु जिस बात में मैं अर्जुन से कम हूँ, वह भी मुझे अवश्य बता देनी चाहिये। उसके धनुष की डोरी दिव्य है, तरकस अक्षय हैं तथा उसके पास अग्निदेव का दिया हुआ दिव्य रथ है, जो किसी भी ओर से तोड़ा नहीं जा सकता। इसके सिवा उसके घोड़े मन के समान वेगवान् हैं, ध्वजा भी दिव्य और दीप्तिमती है तथा उसपर बड़ा ही विस्मय में डालनेवाला एक वानर बैठा हुआ है। इससे भी बढ़कर यह बात है कि जगत् की रचना करनेवाले स्वयं श्रीकृष्ण उसके सारथि एवं रक्षक हैं। इन सब बातों की मेरे पास कमी है; तो भी मैं अर्जुन के साथ युद्ध करना चाहता हूँ। हमारे पक्ष में महाराज शल्य अवश्य श्रीकृष्ण की बराबरी कर सकते हैं। यदि वे मेरे सारथि बन जायँ तो निश्चय ही आपकी विजय हो सकती है। अतः आप इन्हें मेरा सारथ्य करने के लिये तैयार कर लीजिये। इसके सिवा कई छकड़े मेरे बाण लेकर चलें बाण लेकर चलें तथा बढ़िया घोड़ों से जुते हुए कई उत्तम रथ मेरे पीछे पीछे चले जिससे कि आवश्यकता होने पर मैं तुरंत दूसरा रथ बदल सकूँ। महाराज शल्य श्रीकृष्ण के समान ही अश्वविद्या के मर्मज्ञ हैं। यदि ये मेरे सारथि हो जायँ तो मेरा रथ श्रीकृष्ण के रथ से भी बढ़ जाय। फिर तो इन्द्र के सहित देवताओं का भी मेरे सामने आने का साहस नहीं होगा। बस, मैं आपसे इतना प्रबंध कराना चाहता हूँ। फिर मैं संग्रामभूमि में जो काम करके दिखाऊँगा, वह आप देखेंगे ही। अजी ! फिर तो जो भी पाण्डव वीर संग्राम में मेरे सामने आवेंगे, उन्हें मैं सर्वथा परास्त करके ही छोड़ूँगा।‘ संजय ने कहा_ जब कर्ण ने आपके पुत्र से इस प्रकार कहा तो उसने प्रसन्न चित्त से उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, ‘कर्ण ! तुम्हारा जैसा विचार है, मैं वैसा ही करूँगा। छकड़े तुम्हारे बाण लेकर चलेंगे तथा हम सब तुम्हारे पीछे_पीछे चलेंगे। राजन् ! कर्ण से ऐसा कहकर आपका पुत्र बड़ी विनय से महारथी शल्य के पास गया और उनसे प्रेमपूर्वक कहने लगा, मद्रेश्वर ! आप सत्यव्रत, महाभाग और वक्ताओं में अग्रगण्य हैं। मैं सिर झुकाकर अत्यन्त विनय के साथ आपसे एक प्रार्थना करता हूँ।
आप अर्जुन के नाश और मेरे हित के लिये केवल प्रेम के ही नाते कर्ण का सारथ्य करना स्वीकार कर लीजिये। आपके सारथि बन जाने पर  राधापुत्र कर्ण मेरे शत्रुओं को परास्त कर देगा।
आपके सिवा कर्ण के घोड़ों की रास पकड़ने योग्य कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है। आप संग्राम में साक्षात् श्रीकृष्ण के समान हैं। अतः जिस प्रकार त्रिपुर युद्ध के समय ब्रह्माजी ने भगवान् शंकर की सहायता की थी तथा जैसे श्रीकृष्ण संपूर्ण आपत्तियों में अर्जुन की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप कर्ण की रक्षा कीजिये। आरंभ में ही शत्रुओं की सैन्यशक्ति कम होने पर भी उन्होंने हमारी बहुत सी सेना को नष्ट कर डाला था, फिर इस समय की तो बात ही क्या है? इसलिये अब आप ऐसा उपाय कीजिये, जिससे पाण्डवलोग मेरी रही सही सेना का संहार न कर सके। पहले संग्रामभूमि में अर्जुन इस प्रकार शत्रुओं का संहार नहीं कर सकता था, परंतु अब श्रीकृष्ण का साथ हो जाने से उसकी इतनी शक्ति बढ़ गयी है।
अब पाण्डवों की सेना में आपके और कर्ण के हिस्से का ही भाग रह गया है, उसे आप कर्ण के साथ मिलकर आज एक साथ नष्ट कर दीजिये। आप कोई ऐसी युक्ति कीजिये, जिससे पांचाल और सृंजयों के सहित कुन्ती के पुत्र अति शीघ्र नष्ट हो जायँ। कर्ण रथियों में श्रेष्ठ है और आप सारथियों में सर्वोत्तम हैं। आप दोनो का_सा संयोग संसार में न कभी हुआ है और न होगा ही। जिस प्रकार श्रीकृष्ण सब अवस्थाओं में अर्जुन की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप कर्ण की रक्षा कीजिये।  आपके सारथि बन जाने पर भी कर्ण इन्द्र और समस्त देवताओं के लिये भी अजेय हो जायगा, फिर पाण्डवों की तो बात ही क्या है?’
दुर्योधन की यह बात सुनकर शल्य एकदम क्रोध में भर गये। उनकी भौंहों में बल पड़ गये तथा हाथ बार_बार काँपने लगे। उन्हें अपने कुल, ऐश्वर्य, विद्या और बल का बड़ा गर्व था। इसलिये उन्होंने क्रोध से आँखें लाल करके कहा, ‘दुर्योधन ! अवश्य ही तुम या तो मेरा अपमान कर रहे हो या तुम्हे मेरे प्रति संदेह है। इसी से तुम मुझे सारथि का काम करने की आज्ञा दे रहे हो। तुम कर्ण को हमारी अपेक्षा भी श्रेष्ठ समझकर उसकी प्रशंसा करते हो। किन्तु मैं उसे संग्राम में अपने समान नहीं समझता। तुम जो बड़े_से_बड़ा वीर हो, उसे मेरे हिस्से में कर दो; मैं उसे संग्राम में जीतकर अपने घर चला जाऊँगा। अथवा आज मैं अकेला ही युद्ध करूँगा। तब तुम शत्रुओं का संहार करते समय मेरा पराक्रम देख लेना। जरा मेरी इस वज्र के समान मोटी और गँठीली भुजाओं को तो देखो तथा मेरे विचित्र धनुष, सर्प के सदृश बाण और सुवर्णपत्र से मढ़ी हुई गदा पर तो दृष्टि डालो। मैं अपने तेज से सारी पृथ्वी को फोड़ सकता हूँ, पर्वतों को छिन्न_भिन्न कर सकता हूँ और समुद्रों को सुखा सकता हूँ। इस प्रकार शत्रुओं का दमन करने में पूर्णतया समर्थ होने पर भी तुम मुझे इस नीच सूतपुत्र के सारथ्य का काम करने की आज्ञा कैसे दे रहे हो? मैं इस नीच की अपेक्षा सभी प्रकार श्रेष्ठ हूँ, इसलिये उसका दासत्व करने को कभी तैयार नहीं हो सकता। जो पुरुष प्रेमवश अपने आश्रित हुए किसी श्रेष्ठ व्यक्ति को नीच पुरुष के अधीन कर देता है, उसे उच्च को नीच और नीच को उच्च करने का पाप लगता है। ब्रह्मा ने ब्राह्मणों को अपने मुख से, क्षत्रियों को भुजाओं से, वैश्यों को जंघाओं से तथा शुद्रों को पैरों से उत्पन्न किया है_ऐसा श्रुति का मत है। इनमें क्षत्रिय जाति सब वर्णों की रक्षा  करनेवाली, सबसे कर लेनेवाली और दान देनेवाली। ब्राह्मणों का काम यहज्ञ कराना, पढ़ाना और विशुद्ध दान लेना है। कृषि, गो पालन, और धर्मानुसार दान देना वैश्यों का कर्म है तथा शूद्रलोग ब्राह्मण, क्षत्रियों और वैश्यों की सेवा के काम में नियुक्त किये गये हैं। यह बात तो मैंने बिलकुल नहीं सुनी कि क्षत्रिय शुद्र की सेवा करे। मैंने राजर्षियों के वंश में जन्म लिया है, मेरे मस्तक पर शास्त्रानुसार राज्याभिषेक किया गया है, लोग मुझे महारथी कहते हैं और बन्दीजन मेरी स्तुति किया करते हैं। ऐसा होकर भी मैं सूतपुत्र का सारथ्य करूँ_यह मेरे वश की बात नहीं है। इस प्रकार अपमानित होकर तो मैं किसी प्रकार युद्ध नहीं कर पाऊँगा। इसलिये अब मैं अपने घर जाने के लिये तुमसे आज्ञा माँगता हूँ।‘ पुरुषसिंह शल्य ऐसा कहकर उठ खड़े हुए और वहाँ जो राजा बैठे थे, क्रोधपूर्वक उसके बीच से जाने लगे। तब आपके पुत्र ने बड़े प्रेम और मान से उन्हें रोका और बड़े मीठे शब्दों में उन्हें समझाते हुए कहने लगा, ‘राजन्! आप अपने विषय में जैसा समझते हैं, निःसंदेह यह बात ऐसी ही है। परंतु मेरे कथन का जो अभिप्राय है, जरा उसे भी सुनने की कृपा करें। आपके पूर्वपुरुष सदा सत्यभाषण ही करते रहे हैं; मैं समझता हूँ , इसी से आप ‘आर्तायनि’ कहलाते हैं। तथा आप अपने शत्रुओं के लिये शल्य ( काँटे ) के समान हैं, इसी से पृथ्वीतल में ‘शल्य’ नाम से विख्यात हैं। आप धर्मज्ञ हैं और मेरा प्रिय करने का वचन दे चुके हैं; अतः अब अपने उसी वचन का पालन करने की कृपा कीजिये। आपकी अपेक्षा न तो कर्ण बलवान् है और न मैं ही हूँ; तो भी अश्वविद्या के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता होने के कारण मैं आपसे ऐसी प्रार्थना कर रहा हूँ। कर्ण शस्त्रविद्या में अर्जुन से श्रेष्ठ है और आप अश्वविद्या में श्रीकृष्ण से बढ़_चढ़कर हैं।‘ इसपर राजा शल्य ने कहा_’दुर्योधन ! तुम सब सेना के सामने मुझे श्रीकृष्ण से बढ़कर बता रहे हो, इसी से मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। अच्छा लो, मैं कर्ण का सारथ्य करना स्वीकार किये लेता हूँ। किन्तु कर्ण के साथ मेरी एक शर्त रहेगी। वह यह कि युद्ध के समय मैं उससे  चाहे जैसी भी बात कह सकूँगा; उसमें वह किसी प्रकार की आपत्ति न करे।‘ इसपर कर्ण और आपके पुत्र ने ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर शल्य की शर्त स्वीकार कर ली।


Monday, 4 January 2021

दुर्योधन और कर्ण का राजा युधिष्ठिर, अर्जुन एवं सात्यकि के साथ संग्राम

राजा धृतराष्ट्र ने पूछा_संजय ! तुमने कहा कि युधिष्ठिर ने महारथी दुर्योधन को रथहीन कर दिया था, सो उसके बाद उन दोनों का किस प्रकार युद्ध हुआ ? इसके सिवा तीसरे पहर का रोमांचकारी युद्ध भी कैसे कैसे हुआ ? यह सब वृतांत तुम मुझे सुनाओ। संजय ने कहा_राजन् ! जब दोनों ओर की सेनाएँ आपस में भिड़ गयीं तो आपका पुत्र एक दूसरे रथ में चढ़कर संग्रामभूमि में आया। उसने अपने सारथि से कहा ‘सूत ! चल, चल जल्दी से; जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं, वहीं मुझे ले चल।‘! तब सारथि तुरंत ही उस रथ को हाँककर धर्मराज के सामने ले गया। दुर्योधन ने फौरन ही एक पैने बाण से उनका धनुष काट डाला। इसपर महाराज युधिष्ठिर ने दूसरा धनुष लेकर उन्हें घायल कर डाला। इस प्रकार वे दोनों वीर अत्यन्त क्रोध में भरकर एक_दूसरे पर शस्त्रों की वर्षा करने लगे, दोनों ही एक_दूसरे पर वार करने का मौका देखने लगे, दोनों ही बाणों की चोटों से घायल हो गये तथा दोनों ही बार_बार सिंह के समान गर्जना और शंखध्वनि करने लगे।
राजा युधिष्ठिर ने तीन वज्र के समान वेगवान् और दुर्धर्ष बाणों से दुर्योधन की छाती पर चोट की। इसके बदले में आपके पुत्र ने उन्हें पाँच तीक्ष्ण बाणों से घायल कर दिया। इसके बाद उसने उनपर एक अत्यन्त तीक्ष्ण लोहमयी शक्ति छोड़ी। उसे आते देख राजा युधिष्ठिर ने तीन पैने बाणों से उसके टुकड़े_टुकड़े कर दिये तथा पाँच बाणों से दुर्योधन को भी घायल कर दिया। अब दुर्योधन गदा उठाकर बड़े वेग से धर्मराज की ओर दौड़ा। यह देखकर उन्होंने आपके पुत्र पर एक अत्यन्त देदिप्यमान शक्ति छोड़ी। उसने उसके कवच को को तोड़कर छाती पर चोट पहुँचायी। इससे वह अत्यन्त व्याकुल होकर गिर पड़ा और मूर्छित हो गया। इसी समय भीमसेन ने अपनी प्रतिज्ञा याद करके धर्मराज से कहा, ‘महाराज ! इसे आप न मारें।‘ यह सुनकर धर्मराज वहाँ से हट गये।
अब आपके पक्ष के योद्धा कर्ण को आगे करके पाण्डवसेना पर टूट पड़े और उनके साथ युद्ध करने लगे। कर्ण ने अनेकों चमचमाते हुए बाण सात्यकि पर छोड़े। इसपर सात्यकि ने फौरन ही उसे तथा उसके रथ, सारथि और घोड़ों को अनेकों तीखे तीरों से छा दिया। कर्ण को इस प्रकार सात्यकि के बाणों से व्यथित देख आपके पक्ष के अनेकों अतिरथी हाथी, घोड़े, रथी और पैदल सेनाएँ लेकर दौड़े। उनका सामना द्रुपद के पुत्र आदि अनेकों वीरों ने किया। इससे वहाँ हाथी, घोड़े, रथ और सैनिकों का बड़ा भारी संहार होने लगा। इसी समय पुरुषप्रवर श्रीकृष्णऔर अर्जुन अपने नित्यकर्म से निपटकर तथा शास्त्रानुसार भगवान् शंकर का पूजन कर युद्धक्षेत्र में आये। अर्जुन ने गाण्डीव धनुष चढ़ाकर सारी दिशा_विदिशाओं को बाणों से व्याप्त कर दिया; शत्रुओं के अनेकों रथ, आयुध, ध्वजा और सारथियों को नष्ट कर डाला तथा बहुत_से हाथी, महावत, घुड़सवार घोड़े और पैदलों को यमराज के घर भेज दिया। यह देखकर राजा दुर्योधन अकेला ही बाणों की वर्षा करता हुआ अर्जुन पर टूट पड़ा। अर्जुन ने सात ही बाणों की वर्षा करता अर्जुन पर टूट पड़ा। अर्जुन ने सात बाणों से उसके धनुष, सारथि, ध्वजा और घोड़ों को नष्ट करके एक बाण से उसका छत्र काट डाला। 
इसके बाद ज्योंही उन्होंने दुर्योधन पर एक नवाँ प्राणघातक बाण छोड़ा कि अश्त्थामा ने बीच में ही उसके सात टुकड़े कर दिये। इसपर अर्जुन ने अपने बाणों से अश्त्थामा के धनुष, रथ और घोड़ों को नष्ट कर दिया तथा कृपाचार्य के प्रचण्ड कोदण्ड को भी टूक_टूक कर डाला।
इसके बाद वे कृतवर्मा के धनुष, ध्वजा और घोड़ों नष्ट करके तथा दुःशासन का भी धनुष काटकर कर्ण के सामने आये। कर्ण भी फौरन ही सात्यकि को छोड़कर अर्जुन के सामने आया और उन्हें तीन तथा श्रीकृष्ण को बीस बाणों से घायल कर बार_बार बाणों की वर्षा करने लगा।
इतने में ही सात्यकि भी आ गया। उसने कर्ण पर पहले निन्यानबे और फिर सौ बाणों की चोट की। इसके बाद पाण्डवपक्ष के अन्यान्य योद्धा भी कर्ण पर वार करने लगे। युधामन्यु, शिखण्डी, द्रौपदी के पुत्र, प्रभद्रकवीर, उत्तमौजा, युयुत्सु, नकुल_सहदेव, धृष्टधुम्न, चेदि, करूष, मत्स्य और केकय देश के वीर तथा चेकितान और धर्मराज युधिष्ठिर_इन सभी शूरवीरों ने बहुत_सी बलवती सेना लेकर उसे चारों ओर से घेर लिया तथा उसपर तरह_तरह के अस्त्र_शस्त्रों की वर्षा करने लगे। परंतु कर्ण ने अपने पैने बाणों से उस सारी शस्त्रवृष्टि को छिन्न_भिन्न कर डाला।बात_की_बात में कर्ण की अस्त्रशक्ति से आक्रान्त होकर पाण्डवों की सेना शस्त्रहीन और घायल होकर भागने लगी। अर्जुन ने हँसते_हँसते अपने अस्त्रों से कर्ण के अस्त्रों को नष्ट करके संपूर्ण दिशाओं, आकाश और पृथ्वी को बाणों से व्याप्त कर दिया। उसके बाण मूसल और परिघों के समान गिर रहे थे तथा कोई शतध्नी और व्रजों के समान जान पड़ते थे। इस प्रकार आपके और पाण्डवों के पक्ष के योद्धा विजय की लालसा में युद्ध में जुटे हुए थे कि इसी समय सूर्यदेव अस्ताचल के शिखर पर जा पहुँचे। सब ओर अन्धकार फैलने लगा तथा बड़े_बड़े धनुर्धर अपने_अपने योद्धाओं के सहित छावनी की ओर चलने लगे। कौरवों को जाते देख विजयी पाण्डव भी अपने शिविरों की ओर चल दिये। सब वीर बाजे_गाजे के साथ सिंहनाद और गर्जना करते तथा अपने शत्रुओं की हँसी एवं श्रीकृष्ण और अर्जुन की स्तुति करते जाते थे। इस प्रकार उन्होंने छावनी में जाकर रातभर विश्राम किया।

Monday, 7 December 2020

उलूक, युयुत्सु, श्रुतकर्मा_शतानीक, शकुनि_सतसोम और शिखण्डी_कृतवर्मा में द्वन्दयुद्ध; अर्जुन के द्वारा अनेकों वीरों का संहार तथा दोनों ओर की सेनाओं में घमासान युद्ध


संजय ने कहा_राजन् ! एक ओर आपका पुत्र युयुत्सु कौरवों की भारी सेना को खदेड़ रहा था। यह देखकर उलूक बड़ी फुर्ती से उसके सामने आया। उसने क्रोध में भरकर एक क्षुरप्र से  युयुत्सु का धनुष काट डाला और उसे भी घायल कर दिया। युयुत्सु ने तुरंत ही दूसरा धनुष उठाया और साठ बाणों से उलूक और तीन से उसके सारथि पर वार करके फिर उसे अनेकों बाणों से बींध डाला। इसपर उलूक ने युयुत्सु को बीस बाणो से घायल करके उसकी ध्वजा को काट डाला, एक भल्ल से उसके सारथि का सिर उड़ा दिया, चारों घोड़ों को धराशायी कर दिया और फिर पाँच बाणों से उसे भी बींध डाला। महाबली उलूक के प्रहार से युयुत्सु बहुत ही घायल हो गया और एक दूसरे रथ पर चढ़कर तुरंत ही वहाँ से भाग गया। इस प्रकार युयुत्सु को परास्त करके उलूक झटपट पांचाल और सृंजय वीरों की ओर चला गया।
दूसरी ओर आपके पुत्र श्रुतकर्मा ने शतानीक के रथ, सारथि और घोड़ों को नष्ट कर दिया। तब महारथी शतानीक ने क्रोध में भरकर उस अश्वहीन रथमें से ही आपके पुत्र पर एक गदा फेंकी। वह उसके रथ, सारथि और घोड़ों को भष्म करके पृथ्वी पर जा पड़ी। इस प्रकार ये दोनों ही वीर रथहीन होकर एक_दूसरे की ओर देखते हुए रणांगण से खिसक गये। इसी समय शकुनि ने अत्यन्त पैने बाणों से सुतसोम को घायल किया। किन्तु इससे वह तनिक भी विचलित नहीं हुआ। उसने अपने पिता के परम शत्रु को सामने देखकर उसे हजारों बाणों से आच्छादित कर दिया। किन्तु शकुनि ने दूसरे बाण छोड़कर उसके सभी तीरों को काट डाला। इसके बाद उसने सुतसोम के सारथि, ध्वजा और घोड़ों को भी तिल_ तिल करके काट डाला। तब सुतसोम अपना श्रेष्ठ धनुष लेकर रथ से कूदकर पृथ्वी पर कूद गया और बाणों की वर्षा करके अपने साले के रथ को आच्छादित करने लगा। किन्तु शकुनि ने अपने बाणों की बौछार से उन सब बाणों को नष्ट कर दिषा। फिर अनेकों तीखे तीरों से उसने सुतसोम के धनुष और तरकसों को भी काट डाला।
अब सुतसोम एक तलवार लेकर भ्रान्त, ं, आविद्ध, आपुल्त, पुल्त, सृत, सम्पात और समुदीर्ण आदि चौदह गतियों से उसे सब ओर घुमाने लगा। इस समय उसपर जो बाण छोड़ा जाता था, उसे ही वह तलवार से काट डालता था। इसपर शकुनि ने अत्यन्त कुपित होकर उसपर सर्पों के समान विषैले बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। परन्तु सुतसोम ने अपने शस्त्रकौशल और पराक्रम से उन सबको काट डाला। इसी समय शकुनि ने एक पैने बाण से उसकी तलवार के दो टुकड़े कर दिये। सुतसोम ने अपने हाथ में रहे हुए तलवार के आधे भाग को ही शकुनि पर खींचकर मारा। वह उसके धनुष और धनुष की डोरी को काटकर पृथ्वी पर जा पड़ा। इसके बाद वह फुर्ती से श्रुतकीर्ति के रथ पर चढ़ गया तथा शकुनि भी एक दूसरा भयानक धनुष लेकर अनेकों शत्रुओं का संहार करता हुआ दूसरे स्थान पर पाण्डवों की सेना के साथ संग्राम करने लगा। दूसरी ओर शिखण्डी कृतवर्मा से भिड़ा हुआ था। उसने उसकी हँसली में पाँच तीक्ष्ण बाण मारे। इसपर महारथी कृतवर्मा ने क्रोध में भरकर उसपर साठ बाण छोड़े और फिर हँसते_हँसते एक बाण से उसका धनुष काट डाला। महाबली शिखण्डी ने तुरत ही दूसरा धनुष ले लिया और उससे कृतवर्मा पर अत्यन्त तीक्ष्ण नब्बे बाण छोड़े। वे उसके कवच से टकराकर नीचे गिर गये। तब उसने एक पैने बाण से कृतवर्मा का  धनुष काट डाला तथा उसकी छाती और भुजाओं पर अस्सी बाण छोड़े। इससे उसके सब अंगों से रुधिर बहने लगा। अब कृतवर्मा ने दूसरा धनुष उठाया और अनेकों तीखे बाणों से शिखण्डी के कंधों पर प्रहार किया। इस प्रकार वे दोनों वीर एक_दूसरे घायल करके लहूलुहान हो रहे थे तथा दोनो ही एक_दूसरे के प्राण लेने पर तुले हुए थे। इसी समय कृतवर्मा ने शिखण्डी का प्राणान्त करने के लिये एक भयंकर बाण छोड़ा। उसकी चोट से वह तत्काल मूर्छित हो गया और बिह्वल होकर अपनी ध्वजा के डंडे के सहारे बैठ गया। यह देखकर उसका सारथि तुरंत ही रणभूमि से हटा ले गया। इससे पाण्डवों की सेना ते पैर उखड़ गये और वह इधर_उधर भागने लगी। महाराज ! इसी समय अर्जुन आपकी सेना का संहार कर रहे थे। आपकी ओर से त्रृगर्त, शिबि, कौरव, शाल्व, संशप्तक और नारायणी सेना के वीर उससे टक्कर ले रहे थे। सत्यसेन, चन्द्रदेव, मित्रदेव, सतंजय, सौश्रुति, चित्रसेन, मित्रवर्मा और भाइयों से घिरा हुआ त्रिगर्तराज_ये सभी वीर संग्रामभूमि में अर्जुन पर तरह_ तरह के बाणसमूहों की वर्षा कर रहे थे।
योद्धालोग अर्जुन से सैकड़ों और हजारों की संख्या में टक्कर लेकर लुप्त हो जाते थे। इसी समय उनपर सत्यसेन ने तीन, मित्रदेव ने तिरसठ, चन्द्रदेव ने सात, शत्रुंजय ने बीस और सुशर्मा ने नौ बाण छोड़े। इस प्रकार संग्रामभूमि में अनेकों योद्धाओं के बाणों से से बिंधकर अर्जुन के बदले में उन सभी राजाओं को घायल कर दिया।
उन्होंने सात बाणों से सौश्रुति को, तीन से सत्यसेन को, बीस से शत्रुंजय को, आठ से चन्द्रदेव को, सौ से मित्रदेव को, तीन से श्रुतसेन को, नौ से मित्रवर्मा को और आठ से सुशर्मा को बींधकर अनेकों तीखे बाणों से शत्रुंजय को मार डाला, सौश्रुति का सिर धड़ से अलग कर दिया, इसके बाद फौरन ही चन्द्रदेव को अपने बाणों से यमराज के घर भेज दिया और फिर पाँच_पाँच बाणों से दूसरे महारथियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसी समय सत्यसेन ने क्रोध में भरकर श्रीकृष्ण पर एक विशाल तोमर फेंका और बड़ी भीषण गर्जना की। वह तोमर उनकी दायीं भुजा को घायल करके पृथ्वी पर जा पड़ा। इस प्रकार श्रीकृष्ण को घायल हुआ देख महारथी अर्जुन ने अपने तीखे बाणों से सत्यसेन की गति रोककर फिर उसका कुण्डलमण्डित मस्तक धड़ से अलग कर दिया। इसके बाद उन्होंने अपने पैने बाणों से मित्रवर्मा पर आक्रमण किया तथा एक तीखे वत्सदन्त से उसके सारथि पर चोट की। फिर महाबली अर्जुन ने सैकड़ों बाणों से संशप्तकों पर वार किया और उनमें से सैकड़ों हजारों वीरों को धराशायी कर दिया। उन्होंने एक क्षुरप्र से मित्रसेन का मस्तक उड़ा दिया और सुशर्मा की हँसली पर चोट की। इसपर सारे संशप्तक वीर उन्हें चारों ओर से घेरकर तरह_तरह के शस्त्रों से पीड़ित करने लगे। अब महारथी अर्जुन ने ऐन्द्रास्त्र प्रकट किया। उसमें से हजारों बाण निकलने लगे, जिनकी चोट से अनेकों राजकुमार, क्षत्रिय वीर और हाथी_घोड़े पृथ्वी पर लोट_पोट हो गये। इस प्रकार जब धनुर्धर धनंजय संशप्तकों का संहार करने लगे तो उनके पैर उखड़ गये। उनमें से अधिकांश वीर पीठ दिखाकर भाग गये। इस प्रकार वीरवर अर्जुन ने उन्हें रणांगण में परास्त कर दिया। राजन् ! दूसरी ओर महाराज युधिष्ठिर बाणों की वर्षा कर रहे थे। उनका सामना स्वयं राजा दुर्योधन ने किया। धर्मराज ने उसे देखते ही बाणों से बींध डाला। इसपर दुर्योधन ने नौ बाणों से युधिष्ठिर पर और एक भल्ल से उसके सारथि पर चोट की। तब तो धर्मराज ने दुर्योधन पर तेरह बाण छोड़े। उनमें से चार से उसके चारों घोड़ों को मारकर पाँचवें से सारथि का सिर उड़ा दिया, छठे से उसकी ध्वजा काट डाली, सातवें से उसके धनुष के टुकड़े टुकड़े कर दिये, आठवें से तलवार काटकर पृथ्वी पर गिरा दी और शेष पाँच बाणों से स्वयं दुर्योधन को पीड़ित कर डाला। अब आपका पुत्र उस अश्वहीन रथ से कूद पड़ा। दुर्योधन को इस प्रकार विपत्ति में पड़ा देखकर कर्ण, अश्त्थामा और कृपाचार्य आदि योद्धा उसकी रक्षा के लिये आ गये। इसी प्रकार सब पाण्डवलोग भी महाराज युधिष्ठिर को देखकर संग्राम_भूमि में बढ़ने लगे। बस, अब दोनों ओर से खूब संग्राम होने लगा। दोनों ही पक्ष के वीर वीरधर्म के अनुसार एक_दूसरे पर प्रहार करते थे; जो कोई पीठ दिखाता था, उसपर कोई चोट नहीं करता था। राजन् ! इस समय योद्धाओं में बड़ी मुक्का_मुक्की और हाथा_पाई हुई। वे एक_दूसरे के केश पकड़कर खींचने लगे। युद्ध का जोर यहाँ तक बढ़ा कि अपने_पराये का ज्ञान भी लुप्त हो गया। इस प्रकार जब घमासान युद्ध होने लगा तो योद्धालोग तरह_तरह के शस्त्रों से अनेक प्रकार के एक_दूसरे के प्राण लेने लगे। रणभूमि में सैकड़ों_हजारों कबन्ध खड़े हो गये। उनके शस्त्र और कवच खून में लथपथ हो रहे थे। इस समय योद्धाओं को यद्यपि अपने_पराये का ज्ञान नहीं रहा था, तो भी वे युद्ध को अपना कर्तव्य समझकर विजय की लालसा से बराबर जूझ रहे थे। उनके सामने अपना_पराया_ जो भी आता, उसी का वे सफाया कर डालते थे। संग्रामभूमि में दोनों ओर के वीरों से खलबला_सी रही थी तथा टूटे हुए रथ और मारे हुए हाथी, घोड़े एवं योद्धाओं के कारण अगम्य_सी हो रही थी। वहाँ क्षण में खून की नदी बहने लगती थी। कर्ण पांचालों का, अर्जुन त्रिगर्तों का और भीमसेन कौरव तथा गजारोही सेना का संहार कर रहे थे। इस प्रकार तीसरे पहर तक यह कौरव और पाण्डव सेनाओं का भीषण संहार चलता रहा।

अंगराज का वध, सहदेव के द्वारा दुःशासन की तथा कर्ण के द्वारा नकुल की पराजय और कर्ण द्वारा पांचालों का संहार

संजय कहते हैं_महाराज ! आपके पुत्र की आज्ञा से बड़े_बड़े हाथीसवार हाथियों के साथ ही क्रोध में भरकर धृष्टधुम्न को मार डालने की इच्छा से उसकी ओर बढ़े। पूर्व और दक्षिण देश के रहनेवाले गजयुद्ध में कुशल जो प्रधान_ प्रधान वीर थे, वे सभी उपस्थित थे। इसके सिवा अंग, बंग, पुण्ड्र, मगध, मेकल, कोसल, मद्र, दशार्ण, निषध और कलिंगदेशीय योद्धा भी, जो हस्तियुद्ध में निपुण थे, वहाँ आए। वे सब लोग पांचालों की सेना पर बाण, तोमर और नाराचों की वर्षा करते हुए आगे बढ़े। उन्हें आते देख धृष्टधुम्न उनके हाथियों पर नाराचों की वर्षा करने लगा। प्रत्येक हाथी को उसने दस_दस, छः_छः और आठ_आठ  बाणों से मारकर घायल कर दिया।उस समय धृष्टधुम्न को हाथियों की सेना से घिर गया देख पाण्डव और पांचाल योद्धा तेज किये हुए अस्त्र_शस्त्र लेकर गर्जना करते हुए वहाँ आ पहुँचे और उन हाथियों पर बाणों की बौछार करने लगे। नकुल, सहदेव, द्रौपदी के पुत्र, प्रभद्रक, सात्यकि, शिखण्डी तथा चेकितान_ ये सभी वीर चारों ओर से बाणों की झड़ी लगाने लगे। 
तब म्लेच्छों ने अपने हाथियों को शत्रुओं की ओर प्रेरित किया। वे हाथी अत्यन्त क्रोध में भरे हुए थे; इसलिये रथों, घोड़ों और मनुष्यों को सूड़ों से खींचकर पटक देते और पैरों से दबाकर कुचल डालते थे। कितने ही योद्धाओं को उन्होंने दाँतों की नोक से चीर डाला और कितनों को सूँड़ में लपेटकर ऊपर फेंक दिया।
दाँतों से कुचले हुए जो लोग जमीन पर गिरते थे, उनकी सूरत बड़ी भयानक  हो जाती थी। 
इसी समय अंगराज के हाथी का सात्यकि से सामना हुआ। सात्यकि ने भयंकर वेगवाले नाराच से हाथी के मर्मस्थानों को बींध डाला। हाथी वेदना से मूर्छित होकर गिर पड़ा। अंगराज  उसकी ओट में अपने शरीर को छिपाये बैठा थ, अब वह हाथी से कूदना ही चाहता था कि सात्यकि ने उसकी छाती पर नाराच से प्रहार किया। चोट को न सँभाल सकने के कारण वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
इसके बाद नकुल ने यमदण्ड के समान तीन नाराच हाथ में लिये और उनके प्रहार से अंगराज से पीड़ित करके फिर सौ बाणों से उसके हाथी को भी घायल किया। तब अंगराज ने नकुल पर एक सौ आठ तोमरों का प्रहार किया, किन्तु उसने प्रत्येक तोमर के तीन_तीन टुकड़े कर डाले और एक अर्धचन्द्राकार बाण मारकर उसके मस्तक को भी काट लिया। फिर तो वह म्लेच्छराज हाथी के साथ ही भूमि पर गिर पड़ा। इस प्रकार अंगदेशीय राजकुमार के मारे जाने पर वहाँ के महावत क्रोध में भर गये और हाथियोंसहित नकुल पर चढ़ गये। उनके साथ ही मेकल, उत्कल, कलिंग, निषध और ताम्रलिप्त आदि देशों के योद्धा भी नकुल को मार डालने की इच्छा से उसपर बाणों और तोमरों की वर्षा करने लगे।
 उन सबके अस्त्रों की बौछार से नकुल को ढ़क गया देख पाण्डव, पांचाल और सोमक क्षत्रिय बड़े क्रोध में भरकर वहाँ आ पहुँचे। फिर तो पाण्डवपक्ष के रथी वीरों का उन हाथियों के साथ घोर युद्ध होने लगा। उन्होंने बाणों की झड़ी लगा दी और हजारों तोमरों का वार किया। 
उनकी मार से हाथियों के कुम्भस्थल फूट गये, मर्मस्थानों में घाव हो गया, दाँत टूट गये और उनकी सारी सजावट बिगड़ गयी। उनमें से आठ बड़े_बड़े गजराजों का सहदेव ने चौंसठ बाण मारे, जिनकी चोट से पीड़ित हो वे हाथी अपने सवारोंसहित गिरकर मर गये। महाराज ! सहदेव जब क्रोध में भरकर आपकी सेना को भष्मसात् कर रहा था, उसी समय दुःशासन उसके मुकाबले में आ गया। आते ही उसने सहदेव की छाती में तीन बाण मारे। तब सहदेव ने सत्तर नाराचों से दुःशासन को तथा तीन से उसके सारथि को बींध डाला। यह देख दुःशासन ने सहदेव का धनुष काटकर उसकी छाती और भुजाओं में तिहत्तर बाण मारे। अब तो सहदेव के क्रोध की सीमा न रही, उसने बड़ी फुर्ती से दुःशासनके रथ पर तलवार का वार किया। वह तलवार प्रत्यंचासहित उसके धनुष को काटकर जमीन पर गिर पड़ी। फिर सहदेव ने दूसरा धनुष लेकर दुःशासन पर प्राणान्तकारी बाण छोड़ा, किन्तु उसने तीखी धारवाली तलवार से उसके दो टुकड़े कर डाले और सहदेव को घायल करके उसके सारथि को भी नौ बाण मारे। इससे सहदेव का क्रोध बहुत बढ़ गया और और उसने काल के समान विकराल बाण हाथ में लेकर उसे आपके पुत्र पर चला दिया। वह बाण दुःशासन का कवच छेदकर शरीर को विदीर्ण करता हुआ जमीन में घुस गया। इससे आपका पुत्र बेहोश हो गया। यह देख सारथि तीखे बाणों की मार सहता हुआ रथ को रणभूमि से दूर हटा ले गया। इस प्रकार दुःशासन को परास्त करके सहदेव ने दुर्योधन की सेना पर दृष्टि डाली और उसका सब ओर से संहार आरंभ कर दिया। दूसरी ओर नकुल भी कौरव_सेना को पीछे भगा रहा था। यह देख कर्ण क्रोध में भरा हुआ वहाँ आया और नकुल को रोककर सामना करने लगा। उसने नकुल का धनुष काटकर उसे तीस बाणों से घायल किया। तब नकुल ने दूसरा धनुष लेकर कर्ण को सत्तर और उसके सारथि को तीन बाण मारे। फिर एक क्षुरप्र से कर्ण के धनुष को काटकर उसपर तीन सौ बाणों का प्रहार किया।
नकुल के द्वारा कर्ण को इस तरह पीड़ित होते देख सभी रथियों को बड़ा आश्चर्य हुआ; देवता भी अत्यन्त विस्मित हो गये। तदनन्तर कर्ण ने दूसरा धनुष उठाया और नकुल के भी सात बाणों से कर्ण को बींधकर उसके धनुष का एक किनारा काट दिया। कर्ण ने पुनः दूसरा धनुष लिया और नकुल के चारों ओर की दिशाएँ बाणों से आच्छादित कर दीं। किन्तु महारथी नकुल ने कर्ण के छोड़े हुए उन सभी बाणों को काट डाला।
उस समय सायकसमूहों से भरा हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो उसमें टिड्डियाँ छा रही हो। उन दोनों के बाणों से आकाश का मार्ग रुक गया था, अन्तरिक्ष की कोई भी वस्तु उस समय जमीन पर नहीं पड़ती थी। उन दोनों महारथियों के दिव्य बाणों से जब दोनों ओर की सेनाएँ नष्ट होने लगीं तो सभी योद्धा उनके बाणों के गिरने के स्थान से दूर हट गये और दर्शकों की भाँति तमाशा देखने लगे। जब सब लोग वहाँ से दूर हो गये तो दोनों महारथी परस्पर बाणों की बौछार से एक_दूसरे को चोट पहुँचाने लगे। कर्ण ने हँसते_हँसते उस युद्ध में बाणों का जाल_सा फैला दिया, उसने सैकड़ों और हजारों बाणों का प्रहार किया। जैसे बादलों की घटा घिर आने पर उसकी छाया से अन्धकार_सा हो जाता है, वैसे ही कर्ण के बाणों से अंधेरा_सा छा गया। इसके बाद कर्ण ने नकुल का धनुष काट दिया और मुस्कराते हुए उसके सारथि को भी रथ से मार गिराया। फिर तेज किये हुए चार बाणों ले उसके चारों घोड़ों को तुरत यमलोक भेज दिया। तत्पश्चात् अपने बाणों की मार से उसने नकुल के दिव्य रथ के तिल के समान टुकड़े करके उसकी धज्जियाँ उड़ा दीं। पहियों के रक्षकों को मारकर ध्वजा, पताका, गदा, तलवार, ढ़ाल तथा अन्य सामग्रियों को भी नष्ट कर दिया। रथ घोड़े और कवच से रहित हो जाने पर नकुल ने एक भयानक परिघ उठाया, किंतु कर्ण ने तीखे बाणों से उनके भी टुकड़े_टुकड़े कर डाले। उस समय उसकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं और वह सहसा रणभूमि छोड़कर भाग खड़ा हुआ। कर्ण ने हँसते हँसते उसका पीछा किया और उसके गले में अपना धनुष डाल दिया। फिर वह कहने लगा, ‘पाण्डुनन्दन ! अब बलवानों के साथ युद्ध करने का साहस न करना। जो तुम्हारे समान हों, उन्हीं से भिड़ने का हौसला करना चाहिए। माद्रीकुमार ! हार गये तो क्या हुआ? लजाओ मत । जाओ घर में जाकर छिप रहो अथवा जहाँ श्रीकृष्ण तथा अर्जुन हों वहीं चले जाओ। यह कहकर कर्ण ने नकुल को छोड़ दिया। यद्यपि उस समय कर्ण के लिये नकुल का मारना सहज था, तो भी कुन्ती को दिये हुए वचन याद करके उसने उसे जीवित ही छोड़ दिया; क्योंकि कर्ण धर्म का ज्ञाता था। नकुल को इस पराजय से बड़ा दुःख हुआ। वह उचछ्वास लेता हुआ अत्यन्त संकोच के साथ जाकर युधिष्ठिर के रथ में बैठ गया। इतने में सूर्यदेव आकाश मे मध्यभाग में आ गये। उस दुपहरी में सूतपुत्र कर्ण चारों ओर चक्र के समान घूमता हुआ पांचालों का संहार करने लगा। शत्रुओं के रथ टूट गये, ध्वजा पताकाएँ कट गयीं, घोड़े और सारथि मारे गये तथा बहुतों के रथ के धुरे खण्डित हो गये।
कुछ ही देर में पांचालसेना के रथी भागते देखे गये। हाथियों के शरीर खून से लथपथ हो गये। वे उन्मत्त की भाँति इधर_उधर भागने लगे।
ऐसा जान पड़ता था, मानो वे किसी बड़े भारी जंगल में जाकर दावानल से दग्ध हो गये हैं। उस समय हमें सब ओर कर्ण के धनुष से छूटे हुए बाणों से कटे अनेकों सिर, भुजा और जंघाएँ दिखायी देती थीं। संग्रामभूमि में सृंजयवीरों पर कर्ण की बड़ी भीषण मार पड़ रही थी, तो भी पतंग जैसे अग्नि पर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार कर्ण की ओर ही बढ़ते जा रहे थे। महारथी कर्ण जहाँ_तहाँ पाण्डव_सेनाओं को भष्म कर रहा था; अतः क्षत्रियलोग उसे प्रलयकालीन अग्नि के समान समझकर उसके आने से भागने लगे। पांचालवीरों में से भी जो योद्धा मरने से बचे थे, वे सब मैदान छोड़कर भाग गये। 

अर्जुन के द्वारा संशप्तकों तथा अश्त्थामा के हाथ से राजा पाण्ड्य का वध

संजय कहते हैं_महाराज ! अर्जुन ने मंगल ग्रह की भाँति वक्र और अतिवक्र  गति से चलकर बहुसंख्यक संशप्तकों का नाश कर डाला।
अनेकों पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथी अर्जुन के बाणों की मार से अपना धैर्य खो बैठे, कितने ही चक्कर काटने लगे। कुछ भाग गये और बहुत_से गिरकर मर गये। उन्होंने भल्ल, क्षुर, अर्धचन्द्र तथा वत्सदन्त आदि अस्त्रों से अपने शत्रुओं के घोड़े, सारथी, ध्वजा, धनुष, बाण, हाथ, हाथ के हथियार, भुजाएँ और मस्तक काट गिराये।
इसी बीच में उपायुध के पुत्र ने तीन बाणों से अर्जुन को बींध दिया। यह देख अर्जुन ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। उस समय उपायुध के समस्त सैनिक क्रोध में भरकर अर्जुन पर नाना प्रकार के अस्त्र_शस्त्रों की वर्षा करने लगे। परन्तु अर्जुन ने अपने अस्त्रों से शत्रुओं की अस्त्रवर्षा रोक दी और सायकों की झड़ी लगाकर बहुतों_से शत्रुओं का वध कर डाला। उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा_’अर्जुन ! तुम खिलवाड़ क्यों कर रहे हो ? इन संसप्तकों का अंत करके अब कर्ण का वध करने के लिये शीघ्र तैयार हो जाओ।‘ ‘अच्छा ! ऐसा ही करता हूँ’_यह कहकर अर्जुन ने शेष संशप्तकों का संहार आरंभ किया। अर्जुन इतनी शीघ्रता से बाण हाथ में लेते, संधान करते और छोड़ते थे कि बहुत सावधानी से देखनेवाले भी उनकी इन सब बातों को देख नहीं पाते थे। अर्जुन का हस्तलाघव देखकर स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण भी आश्चर्य में पड़ गये। उन्होंने अर्जुन से कहा_’पार्थ ! इस पृथ्वी पर दुर्योधन के कारण राजाओं का यह महासंहार हो रहा है। आज तुमने जो पराक्रम किया है वैसा स्वर्ग में केवल इन्द्र ने ही किया था।‘ इस प्रकार बातें करते हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुन चले जा रहे थे, इतने में ही उन्हें दुर्योधन की सेना के पास शंख, दुंदुभी और भेरी आदि पणव आदि बाजों की आवाज सुनाई दी।
तब श्रीकृष्ण ने घोड़ों को बढ़ाया और वहाँ पहुँचकर देखा कि राजा पाण्ड्य के द्वारा दुर्योधन की सेना का विकट विध्धवंस हुआ है। यह देख उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। राजा पाण्ड्य अस्त्रविद्या तथा धनुर्विद्या में प्रवीण थे। उन्होंने अनेकों प्रकार के बाण मारकर शत्रु समुदाय का नाश कर डाला था। शत्रुओं के प्रधान_प्रधान वीरों ने उनपर जो_जो अस्त्र छोड़े थे, उन सबको अपने सायकों से काटकर वे उन वीरों को यमलोक भेज चुके थे।
धृतराष्ट्र ने कहा_संजय ! अब तुम मुझसे राजा पाण्ड्य के पराक्रम, अस्त्रशिक्षा, प्रभाव और बल का वर्णन करो। संजय ने कहा, महाराज ! आप जिन्हें श्रेष्ठ महारथी मानते हैं, उन सबको राजा पाण्ड्य अपने पराक्रम के सामने तुच्छ गिनते थे। अपने समान भीष्म और द्रोण की समानता बतलाना भी उन्हें बर्दाश्त नहीं होता था। श्रीकृष्ण और अर्जुन से किसी भी बात में अपने को कम नहीं समझते थे। इस प्रकार पाण्ड्य समस्त राजाओं तथा संपूर्ण अस्त्रधारियों में श्रेष्ठ थे।
वे कर्ण की सेना का संहार कर रहे थे। उन्होंने संपूर्ण योद्धाओं को छिन्न_भिन्न कर दिया, हाथियों और उनके सवारों को पताका, ध्वजा और अस्त्रों से हीन करके पादरक्षकों सहित मार डाला। पुलिंद, खस, बाह्लीक, निषाद, आन्ध्र, कुंतल, दक्षिणात्य और भोजदेशीय शूरवीरों को शस्त्रहीन तथा कवचशून्य करके उन्होंने मौत के घाट उतार दिया। इस प्रकार उन्हें कौरवों की चतुरंगिणी सेना का नाश करते देख अश्त्थामा उनका सामना करने के लिये आया। उसने राजा पाण्ड्य के ऊपर पहले प्रहार किया, तब उन्होंने एक कर्णी नामक बाण मारकर अश्त्थामा को बींध डाला। इसके बाद अश्त्थामा ने मर्मस्थान को विदीर्ण कर देनेवाले अत्यंत भयंकर बाण हाथ में लिये और राजा पाण्ड्य के ऊपर हँसते_हँसते उनका प्रहार किया। तत्पश्चात् उसने तेज की हुई धारवाले कई तीखे नाराच उठाये और पाण्ड्य पर उनका दशमी गति से ( दशमी गति से मारा हुआ बाण मस्तक को धड़ से अलग कर देता है।) प्रयोग किया। परन्तु पाण्ड्य ने नौ तीखे बाण मारकर उन नाराचों को काट डाला और उसके पहियों की रक्षा करनेवाले योद्धाओं को भी मार डाला।
अपने शत्रु की यह फुर्ती देखकर अश्त्थामा ने धनुष को मण्डलाकार बना लिया और बाणों की बौछार करने लगा। आठ_आठ बैलों से खींचे जानेवाले आठ गाड़ियों में जितने बाण लदे थे, उन सबको अश्त्थामा ने आधे पहर में ही समाप्त कर दिया। उस समय उसका स्वरूप क्रोध से भरे हुए यमराज के समान हो रहा था। जिन लोगों ने उसे देखा, वे प्रायः होश_हवास खो बैठे। अश्त्थामा के चलाये हुए उन सभी बाणों ने पाण्ड्य ने वयव्यास्त्र से उड़ा दिया और उच्चस्वर से गर्जना की।
तब द्रोणकुमार ने उनकी ध्वजा काटकर चारों घोड़ों और सारथि को यमलोक भेज दिया तथा अर्धचन्द्राकार बाण से धनुष काटकर रथ की भी धज्जियाँ उड़ा दीं। उस समय यद्यपि महारथी पाण्ड्य रथ से शून्य हो गये थे, तो भी अश्त्थामा ने उन्हें मारा नहीं। उनके साथ युद्ध करने की इच्छा अभी बनी ही हुई थी। इसी समय एक महाबली गजराज बड़े वेग से दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा, उसका सवार मारा जा चुका था। राजा पाण्ड्य हाथी के युद्ध में बड़े निपुण थे। उस पर्वत के समान ऊँचे गजराज को देखते ही वे उसकी पीठ पर जा बैठे। अब तो क्रोध के मारे द्रोणकुमार के बदन में आग लग गयी, उसने शत्रु  को पीड़ा देनेवाले यमदण्ड के समान भयंकर चौदह बाण हाथ में लिये। उनमें से पाँच बाणों से तो उसने हाथी को  पैरों से लेकर सूँड़ तक बींध डाला, तीन से राजा की दोनों भुजाओं और मस्तक को काट गिराया तथा शेष छः बाणों पाण्ड्य के अनुयायी छः महारथियों को यमलोक पठाया। इस प्रकार मबाबली पाण्ड्य को मारकर जब अश्त्थामा ने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया तो आपका पुत्र दुर्योधन अपने मितेरों के साथ उसके पास आया और बड़ी प्रसन्नता के साथ उसने उसका स्वागत_सत्कार किया।

Friday, 2 October 2020

संशप्तकों और अश्त्थामा के साथ अर्जुन का घोर संग्राम, अर्जुन के हाथ से दण्डधार और दण्ड का वध

धृष्टराष्ट्र ने पूछा__संजय ! अर्जुन का संशप्तकों और अश्त्थामा के साथ किस प्रकार युद्ध हुआ ?
संजय ने कहा_महाराज ! सुनिये। संशप्तकों की सेना समुद्र के समान दुर्लंघ्य थी, तो भी अर्जुन ने उसमें प्रवेश कर तूफान सा खड़ा कर दिया।
वे तेज किये हुए बाणों से कौरवों के मस्तक काट_काटकर गिराने लगे। थोड़ी ही देर में वहाँ जमीन पट गयी और वहाँ पड़े हुए ढ़ेर_के_ढ़ेर मस्तक बिना नाल के कमल जैसे दिखायी देने लगे। हजारों बाणों की वर्षा करके उन्होंने रथों, हाथियों और घोड़ों को उनके सवारों_सहित यमलोक भेज दिया। तीखे बाण मार_मारकर शत्रुओं के सारथि, ध्वजा, धनुष, बाण तथा रत्नजटित मुद्रिका से सुशोभित हाथों को काट गिराया। यह देख बड़े_बड़े योद्धा साँड़ों के समान हुँकारते हुए अर्जुन पर टूट पड़े और तीखे तीरों से उन्हें घायल करने लगे। उस समय अर्जुन और उन योद्धाओं में रोमांचकारी संग्राम आरम्भ हो गया।  अर्जुन पर सब ओर अस्त्रों की वर्षा हो रही थी, तो भी वे अपने अस्त्रों से उसका निवारण करके बाणों से मार_मारकर शत्रुओं के प्राण लेने लगे। जैसे हवा बादलों को छिन्न_भिन्न कर देती है, उसी प्रकार वे विपक्षियों के रथों की धज्जियाँ उड़ा रहे थे। उस समय अर्जुन अकेले होने पर भी एक हजार महारथियों के समान पराक्रम दिखा रहे थे। उनका यह पुरुषार्थ देख, सिद्ध,  ऋषि और चारण भी उनकी प्रशंसा करने लगे। देवताओं ने दुंदुभी बजायी और  अर्जुन तथा श्रीकृष्ण पर फूलों की वर्षा की। फिर वहाँ इस प्रकार आकाशवाणी हुई। ‘ जिन्होंने चन्द्रमा की कान्ति, अग्नि की दीप्ति, वायु का बल और सूर्य का प्रताप धारण किया है, वे ही ये श्रीकृष्ण और अर्जुन रणभूमि में विराज रहे हैं। एक रथ पर बैठे हुए ये दोनों वीर ब्रह्मा तथा शंकर की भाँति अजेय हैं। ये संपूर्ण प्राणियों से श्रेष्ठ नर तथा नारायण हैं।‘ इस आश्चर्यमय वृतांत को देख और सुनकर भी अश्त्थामा ने युद्ध के लिये भली_भाँति तैयार हो श्रीकृष्ण तथा अर्जुन पर धावा किया। उसने श्रीकृष्ण को साठ तथा अर्जुन को तीन बाण मारे। तब अर्जुन ने क्रोध मेंभरकर तीन बाणों से उसकाधनुष काट दिया। यह देख उसने दूसरा अत्यन्त भयंकर धनुष हाथ में लिया तथा श्रीकृष्ण पर तीन सौ तथा अर्जुन पर एक हजार बाणों का प्रहार किया।
इतना ही नहीं, अश्त्थामा ने अर्जुन को आगे बढ़ने से रोककर उनके ऊपर हजारों, लाखों और अरबों बाण बरसाये। उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो उसके तरकस, धनुष, प्रत्यंचा, रथ, ध्वजा तथा कवच से बाँह, हाथ, छाती, मुँह, नाक, कान तथा मस्तक आदि अंगों एवं रोम_रोम से बाण छूट रहे हैं। इस प्रकार अपने सायकसमूहों की बौछार से उसने श्रीकृष्ण और अर्जुन को बींध डाला और अत्यन्त प्रसन्न होकर महामेघ के समान भयंकर गर्जना की। अश्त्थामा की गर्जना सुनकर अर्जुन ने उसके चलाये हुए प्रत्येक बाण के तीन_तीन टुकड़े कर डाले। इसके बाद उन्होंने संशप्तकों के रथ, हाथी, घोड़े, सारथि, ध्वजा और पैदल सिपाहियों को भयंकर बाणों से मारना आरम्भ कर दिया। गाण्डीव से छूटे हुए नाना प्रकार के बाण तीन मील पर खड़े हुए हाथी और मनुष्यों को भी मार गिराते थे। उस समय अर्जुन ने शत्रुओं के बहुत_से सजे_सजाये घुड़सवारों और पैदल सैनिकों का सफाया कर डाला। शत्रुओं में से जो लोग रण में पीठ दिशखाकर भाग नहीं गये, बराबर सामने डटे रहे, उसके धनुष, बाण, तरकस, प्रत्यंचा, हाथ, बाँह, हाथ के हथियार, छत्र, ध्वजा, घोड़े, रथ की ईषा, ढ़ाल, कवच और मस्तक को अर्जुन ने काट डाला। पार्थ के बाणों के प्रहार से रथ, घोड़े, और हाथियों के साथ उनके सवार भी धराशायी हो गये। यह देख अंग, बंग, कलिंग और निषाद देशों के वीर अर्जुन को मार डालने की इच्छा से हाथियों पर सवार हो वहाँ चढ़ आये। किन्तु अर्जुन ने उनके हाथियों के कवच, मर्मस्थान, सूँढ़, महावत, ध्वजा और पताका आदि को काट डाला। इससे वे हाथी वज्र के मारे हुए पर्वतशिखर की भाँति जमीन पर ढ़ह पड़े।
इसी बीच अश्त्थामा ने अपने धनुष पर दस बाण चढ़ाये और मानो एक ही बाण छोड़ा हो, इस प्रकार उन दसों को एक ही साथ छोड़ दिया। उनमें से पाँच बाणों ने तो अर्जुन को घायल किया और पाँच ने श्रीकृष्ण को क्षत_विक्षत कर दिया। उन दोनों के शरीर से खून की धारा बहने लगी। उनका इस प्रकार पराभव देखकर सबने यही माना कि अब वे मारे गये। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा_’अर्जुन ! ढ़िठाई क्यों कर रहे हो; मारो इसे। जैसे चिकित्सा न कराने पर रोग बढ़कर कष्टदायक हो जाता है, उसी प्रकार लापरवाही करने से यह शत्रु भी प्रबल होकर महान् दु:खदायीहो जायगा।‘ ‘बहुत अच्छा’ कहकर अर्जुन ने भगवान् की आज्ञा स्वीकार की और सावधान होकर उन्होंने अश्त्थामा की बाँह,छाती,सिर और जंघा को बाणों से छेद डाला।
फिर घोड़ों की बागडोर काटकर उन्हें बाणों से बींधना आरम्भ कर दिया। घोड़े घबराकर भागे और अश्त्थामा को रणभूमि से दूर हटा ले गये।
अश्त्थामा अर्जुन के बाणों से इतना घायल हो चुका था कि फिर लौटकर उनसे लड़ने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। थोड़ी देर तक घोड़ों को रोककर उसने आराम किया और कर्ण की सेना में प्रवेश कर गया। तदनन्तर श्रीकृष्ण और अर्जुन संशप्तकों का सामना करने चल दिये। इसी समय उत्तर की ओर पाण्डवसेना में बड़े जोर का आर्तनाद सुनाई पड़ा। वहाँ दण्डधार पाण्डवों की चतुरंगिणी सेना का संहार कर रहा था। यह देख भगवान् कृष्ण ने रथ को लौटाकर उधर ही घुमा दिया और अर्जुन से कहा_’मगधदेश का राजा दण्डधार बड़ा पराक्रमी है, वह कहीं भी अपना सानी नहीं रखता। इसके पास शत्रुओं का संहार करनेवाला एक महान् गजराज है, इसे युद्ध की उत्तम शिक्षा मिली है और बल तो सबसे अधिक है ही। इनमें से किसी भी दृष्टि से यह राजा भगदत्त से कम नहीं है। पहले तुम इसी का संहार कर डालो, फिर संशप्तकों को मारना।‘
इतना कहकर भगवान् ने अर्जुन को दण्डधार के निकट पहुँचा दिया। वह काले लोहे के कवच पहने हुए घुड़सवार और पैदल सैनिकों को अपने मदोन्मत्त गजराज के द्वारा कुचलवाकर गिरा रहा था। वहाँ पहुँचते ही श्रीकृष्ण को बारह और अर्जुन को सोलह बाण मारकर दण्डधार ने उनके घोड़ों को भी तीन_तीन बाणों से घायल किया। इसके बाद वह बारंबार हँसने और गरजने लगा।
तब अर्जुन ने भल्लों से उसके धनुष_बाण, प्रत्यंचा, और ध्वजा को काट दिया। इससे कुपित हो श्रीकृष्ण और अर्जुन को घबराहट में डालने की इच्छा से अपने मदोन्मत्त गजराज को उनकी ओर बढ़ाया और तोमरों से उन दोनों पर वार किया। यह देख पाण्डुनन्दन अर्जुन ने तीन क्षुर चलाकर उसकी दोनों भुजाओं और मस्तक को एक ही साथ काट डाला, इसके बाद उसके हाथी को भी सौ बाण मारे।
उनकी चोट से पीड़ित होकर हाथी जोर_जोर से चिघ्घारने लगा और चक्कर काटता त़था लड़खड़ाचा हुआ इधर_उधर भागता तथा इधर_उधर भागने लगा। अन्त में ठोकर खाकर वह महावत के साथ ही गिरा और मर गया।
युद्ध में दण्डधार के मारे जाने पर उसका भाई दण्ड श्रीकृष्ण और अर्जुन का वध करने के लिये चढ़ आया। आते ही वह श्रीकृष्ण को तीन  और अर्जुन को तेज किये हुए पाँच तोमर मारकर भीषण गर्जना करने लगा। तब अर्जुन ने उसकी दोनों बाँहें काट डालीं और उसके मस्तक पर एक अर्धचन्द्राकार बाण मारा।
उसकी चोट से दण्ड का मस्तक कटकर हाथी पर से जमीन पर जा पड़ा। इसके बाद उन्होंने दण्ड के हाथी को भी बाणों से विदीर्ण कर डाला। उसकी चोट से अत्यन्त व्यथित वह हाथी चिघ्घारता हुआ गिरकर मर गया।
तत्पष्चात् दूसरे_दूसरे योद्धा भी उत्तम हाथियों पर सवार होकर विजय की इच्छा से चढ़ आये, परन्तु सव्यसाची ने औरों की भाँति उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया। फिर भी शत्रु की बहुत बड़ी सेना भाग खड़ी हुई। और अर्जुन संशप्तकों का संहार करने चल दिये।