सौप्तिक पर्व समाप्त
Saturday, 27 July 2024
पाण्डवों का द्रौपदी के पास आकर उसे मणि देना तथा श्रीकृष्ण और राजा युधिष्ठिर को अश्वत्थामा के अद्भुत पराक्रम का रहस्य बताना
वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! उसके बाद अश्वत्थामा पाण्डवों को मणि देकर उन सब के सामने ही उदास मन से वन में चला गया। इधर पाण्डव भी श्रीकृष्ण, नारद और व्यासजी को आगे करके बड़ी तेजी से मनस्विनि के पास आये जो इस समय अन्न त्याग किये बैठी थी। वहां वे सब उसे चारों ओर से घेरकर बैठ गये। फिर राजा युधिष्ठिर की आज्ञा से भीमसेन ने द्रौपदी को वह दिव्य मणि दी और उससे कहा, 'भद्रे ! लो यह मणि है, तुम्हारे पुत्रों का वध करनेवाले को हमने जीत लिया है। अब उठो और शोक त्यागकर क्षात्रधर्म का विचार करो। जिस समय श्रीकृष्ण संधि के लिये कौरवों के पास जा रहे थे, उस समय तुमने इनसे कहा था कि 'केशव ! आज पाण्डव लोग मेरे अपमान की बात भूलकर शत्रुओं के साथ मेल करना चाहते हैं, इससे मैं समझती हूं कि मेरे न तो पति हैं, न पुत्र हैं और न भाई ही है तथा न तुम ही मेरे हो।' सो आज अपने उन क्षत्रिय_धर्मोचित वाक्यों को याद करो। पापी दुर्योधन मारा गया, मैंने तड़पते हुए दु:शासन का रक्तपान भी कर लिया तथा द्रोणपुत्र को तो हमने जीत लिया; ब्राह्मण और गुरुपुत्र समझकर ही उसे जीता छोड़ दिया है। उसका सारा यश मिट्टी में मिल चुका है। हमने उसकी मणि छीन ली है और अस्त्र पृथ्वी पर डलवा लिये हैं।' यह सुनकर द्रौपदी ने कहा_'गुरुपुत्र तो मेरे लिये गुरु ही के समान है, मैं तो उससे केवल अपने अनिष्ट का बदला ही लेना चाहती थी। अब इस मणि को महाराज अपने मस्तक पर धारण करें। तब राजा युधिष्ठिर ने उस मणि को गुरुजी का प्रसाद समझकर द्रौपदी के कहने से उसी समय अपने मस्तक पर धारण कर लिया। उसके बाद पुत्रशोकातुरा द्रौपदी उठकर अपने स्थान पर चली गयी। राजन् ! अब महाराज युधिष्ठिर ने, रात के समय जो वीर मारे गये थे, उनके लिये शोकातुर होकर श्रीकृष्ण से कहा, 'कृष्ण ! अश्वत्थामा तो शस्त्रविद्या में विशेष कुशल भी नहीं था; फिर उसने मेरे सभी महारथी पुत्र और हजारों योद्धाओं के साथ अकेले ही लोहा लेने वाले शस्त्रविद्या विशारद द्रुपद पुत्रों को कैसे मार डाला ? उसने ऐसा कौन पुण्यकर्म किया था, जिसके प्रभाव से उसने अकेले ही हमारे सब सैनिकों को नष्ट कर दिया ? श्रीकृष्ण ने कहा_अश्त्थामा ने अवश्य ही ईश्वरों के ईश्वर देवाधिदेव अविनाशी भगवान् शिव की शरण ली थी, इसी से उसने अकेले ही अनेकों योद्धाओं को मार डाला। महादेवजी तो प्रसन्न होने पर अमरता भी दे सकते हैं और इतना पराक्रम भी देते हैं, जिससे इन्द्र को भी नष्ट किया जा सकता है। भरतश्रेष्ठ! महादेवजी के स्वरूप का मुझे अच्छी तरह ज्ञान है तथा उसके जो अनेकों प्राचीन कर्म हैं, उन्हें भी मैं जानता हूं। वे संपूर्ण भूतों के आदि मध्य और अन्त हैं। यह सारा जगत् उन्हीं के प्रभाव से चेष्टा कर रहा है। वे महान् वीर्यशाली महादेवजी ही अश्वत्थामा पर प्रसन्न हो गये थे। इसी से उसने आपके महारथी पुत्रों को और पांचालराज के अनेकों अनुयायियों को धराशायी कर दिया। अब आप उसके विषय में कोई विचार न करें। अश्वत्थामा ने यह काम महादेवजी के कृपा से ही किया है। आप तो अब आगे जो काम करना हो उसे कीजिये।
Tuesday, 16 July 2024
अश्वत्थामा और अर्जुन का एक_दूसरे पर ब्रह्मास्त्र छोड़ना तथा नारद और व्यासजी का उन्हें शान्त करना देना
वैशम्पायनजी कहते हैं _राजन् ऐसा कहकर श्रीकृष्ण सब प्रकार के अस्त्र_शस्त्रों से सुसज्जित एक श्रेष्ठ रथ पर चढ़े। उस रथ का रंग उदय होते हुए सूर्य के समान लाल था। उसके दाहिने धुरे में शैब्य और बायें में सुग्रीव नाम का घोड़ा जुता हुआ था तथा उसे अगल_बगल से मेघपुष्प औरबलआहक नाम के घोड़े खींचते थे।उस रथ पर विश्वकर्मा का बनाया हुआ रत्न और धातुओं से विभूषित ध्वजा का डंडा उठी हुई माया भीके समान जान पड़ता था। उसकी ध्वजा पर पक्षीराज गरुड़ विराजमान थे।इस अद्भुत रथ पर भगवान् श्रीकृष्ण बैठ गये और उनके बैठने पर अर्जुन तथा राजा युधिष्ठिर उसपर सवार हो गये। उनके चढ़ जाने पर श्रीकृष्ण ने अपने तेज घोड़ों को चाबुक से हांका। घोड़े बड़ी तेजी से भीमसेन के पीछे चल दिये और तुरंत ही उनके पास पहुंच गये।इस समय भीमसेन क्रोधातुर होकर शत्रु का संहार करने के लिये तुले हुए थे; इसलिये इन महारथियों के रोकने पर भी वे रुके नहीं। वे इनके देखते_देखते अपने घोड़े दौड़ाते श्रीगंगाजी के तट पर पहुंच गये, जहां उन्होंने अश्वत्थामा को बैठा सुना था। किन्तु उस स्थान पर पहुंचकर उन्होंने गंगाजी के धार के पास ही परम यशस्वी व्यासजी को अनेकों ऋषियों के साथ बैठे देखा।उनके पास ही क्रूरकर्मा अश्वत्थामा भी मौजूद था। उसने अपने शरीर में घृत लगा रखा था और वह कुशा के वस्त्र पहने हुए था। कुन्तिनन्दन भीमसेन उसे देखते ही 'अरे ! खड़ा तो रह, इस प्रकार चिल्लाते हुए धनुष_बाण लेकर उसकी ओर दौड़े।द्रोणपुत्र अश्वत्थामा यह देखकर कि धनुर्धर भीम तथा उसके पीछे राजा युधिष्ठिर और अर्जुन भी मेरी ओर आ रहे हैं, बहुत डर गया और उसने निश्चय किया कि अब ब्रह्मास्त्र के प्रयोग का समय आ गया है।तुरंत ही अपने उस दिव्य अस्त्र का चिंतन किया और अपने बायें हाथ में एक सींक उखाड़ ली; फिर ऐसा संकल्प करके कि 'पृथ्वी पाण्डव हीन हो जाय' उसने क्रोध में भरकर संपूर्ण लोकों को मोह में डालने के लिये प्रचंड अस्त्र छोड़ दिया। इससे उस सींक में आग पैदा हो गयी और वह प्रलयकाल की अग्नि के समान मानो तीनों लोकों को भस्म करने लगी।श्रीकृष्ण अश्वत्थामा की चेष्टा देखकर ही उसके मन के भाव को ताड़ गये थे। उन्होंने अर्जुन से कहा, 'अर्जुन ! अर्जुन! आचार्य द्रोण का सिखाया हुआ दिव्य अस्त्र तो तुम्हारे हृदय में विद्यमान है, अब उसके प्रयोग का समय आ गया है। अपनी और अपने भाइयों की रक्षा के लिये तुम भी इस समय उसी का प्रयोग करो क्योंकि ब्रह्मास्त्र को ब्रह्मास्त्र के द्वारा ही रोका जा सकता है।'श्रीकृष्ण के इस प्रकार कहते ही अर्जुन धनुष_बाण लेकर तुरंत रथ से कूद पड़े । उन्होंने पहले 'आचार्यपुत्र का मंगल हो' और फिर 'मेरा और मेरे भाइयों का मंगल हो' ऐसा कहकर देवता और गुरुजनों को नमस्कार किया। उसके बाद ' इस ब्रह्मास्त्र से शत्रु का ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय' ऐसा संकल्प करके संपूर्ण लोक के मंगल की कामना से अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया।तब वह अर्जुन का छोड़ा हुआ अस्त्र रयआनल के समान अग्नि की बड़ी _बड़ी शालाओं से प्रज्वलित हो उठा।इसी प्रकार महातेजस्वी अश्वत्थामा का अस्त्र भी तेजोमंडल से घिरकर आग की भीषण लपटें उगलने लगा। उनके आपस में टकराने से बड़ी भारी गर्जना होने लगी और सभी प्राणियों को बड़ा भय मालूम होने लगा। आकाश में बड़ा शब्द होने लगा और सर्वत्र अग्नि की लपटें फैल गयी तथा पर्वत, वन और वृक्षों के सहित सारी पृथ्वी डगमगाने लगी।इस प्रकार उन दोनों अस्त्रों के तेज समस्त लोकों को संतप्त करने लगे। यह देख अर्जुन और अश्वत्थामा को शान्त करने के लिये वहां देवर्षि नारद और महर्षि व्यास ने एक साथ दर्शन दिया। दोनों मुनिश्रेष्ठ देवता और मनुष्यों के पूजनीय और अत्यन्त यशस्वी हैं। ये संपूर्ण लोकों के हित की कामना से उन दोनों अस्त्रों को शान्त कराने के लिये उनके बीच में आकर खड़े हो गये और कहने लगे, 'पूर्वकाल में जो तरह _तरह शस्त्रों को जाननेवाले महारथी हो गये हैं, उन्होंने इन अस्त्रों का प्रयोग मनुष्यों पर कभी नहीं किया। फिर वीरों ! तुम दोनों ने यह महान् अनिष्टकारी साहस क्यों किया है ?'उन अग्नि के समान तेजस्वी महर्षियों को देखते ही अर्जुन बड़ी फुर्ती से अपना दिव्य अस्त्र लौटाने लगा।फिर उसने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवन् ! मैंने तो इसी उद्देश्य से यह अस्त्र छोड़ा था कि इसके द्वारा शत्रु का छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय। अब इस अस्त्र के लौटा लेने पर तो पापी अश्वत्थामा अवश्य ही अपने अस्त्र के प्रभाव से हम सबको भष्म कर देगा। इसलिये जैसा करने से हमारा और सब लोगों का हित हो, उसी के लिये आप हमें सलाह दें।'ऐसा कहकर अर्जुन ने उस ब्रह्मास्त्र को वापस लौटा लिया। उसे लौटा लेना तो देवताओं के लिये भी कठिन था। संग्राम में एक बार छोड़ देने पर उसे लौटाने में तो अर्जुन के सिवा स्वयं इन्द्र भी समर्थ नहीं था। वह अस्त्र ब्राह्मतेज से प्रकट हुआ था। असंयमी पुरुष उसे छोड़ तो सकता था किन्तु उसे लौटाने का सामर्थ्य ब्रह्मचारी के सिवा और किसी में नहीं था।यदि कोई ब्रह्मचर्य हीन पुरुष उसे एक बार छोड़कर फिर लौटाने का प्रयत्न करता तो वह अस्त्र कुटुम्बभर उस व्यक्ति का सिर ही काट लेता था। अर्जुन ब्रह्मचारी और व्रती था; उसने दुष्प्राप्य होने पर भी यह परमास्र प्राप्त कर लिया था। परंतु बड़ी भारी विपत्ति पड़ने के सिवा और किसी समय वह इसका प्रयोग नहीं करता था। अर्जुन सत्यवादी, शूरवीर, ब्रह्मचारी और गुरु की आज्ञा का पालन करनेवाला था। इसलिये उसने फिर भी उसे लौटा दिया। अश्वत्थामा ने भी जब उन ऋषियों को अपने अस्त्र के सामने खड़े देखा तो उसे लौटाने का बड़ा प्रयत्न किया, किन्तु वह वैसा कर न सका। तब वह मन में अत्यन्त व्याकुल होकर श्री व्यासजी से कहने लगा, 'मुने ! मैं भीमसेन के भय से बहुत बड़ी आपत्ति में पड़ गया था, तब अपने प्राणों को बचाने के लिये ही मैंने यह अस्त्र छोड़ा है। भीमसेन ने दुर्योधन का वध करने के उद्देश्य से संग्रामभूमि में नियम विरुद्ध आचरण करके अधर्म किया था। इसी से संयमी न होने पर भी मैंने यह अस्त्र छोड़ दिया है। अब इसे लौटाने में तो मैं समर्थ नहीं हूं।
मैंने अग्निमंत्र से अभिमंत्रित करके यह दउर्दम्य दिव्य अस्त्र पाण्डवों का नाश करने के लिये छोड़ा है। अतः आज यह सभी पाण्डवों का प्राण ले लेगा। इस प्रकार क्रोध में भरकर पाण्डवों के वध के लिये यह अस्त्र छोड़कर अवश्य ही मैंने बड़ा पाप किया है।' व्यासजी ने कहा_भैया ! ब्रह्मास्त्र का ज्ञान तो अर्जुन को भी प्राप्त है। किन्तु उसने क्रोध में भरकर या तुम्हें मारने के लिये उसे नहीं छोड़ा है। उसने तो अपने ब्रह्मास्त्र से तुम्हारे ब्रह्मास्त्र को शान्त करने के लिये ही उसका प्रयोग किया है और अब उसे लौटा दिया है।ब्रह्मास्त्र को पाकर भी तुम्हारे पिताजी का उपदेश मानकर महाबाहु अर्जुन क्षात्रधर्म से विचलित नहीं हुआ। यह ऐसा धीर, वीर, साधु और सब प्रकार के अस्त्र_शस्त्र को जाननेवाला है; फिर भी तुम्हें इसे भाइयों के सहित मार डालने की कुबुद्धि क्यों हुई है ? देखो, जिस देश में एक ब्रह्मास्त्र को दूसरे ब्रह्मास्त्र को दबा दिया जाता है, वहां बारह वर्ष तक वर्षा नहीं होती। इसी से प्रजा का हित करने के लिये अर्जुन ने तुम्हारे ब्रह्मास्त्र को नष्ट नहीं किया है। तुम्हें पाण्डवों की, अपनी और राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिये। इसलिये अब तुम इस दिव्य अस्त्र को लौटा लो। अब तुम्हारा क्रोध शान्त हो जाना चाहिये और पाण्डवों को भी स्वस्थ रहने चाहिये। राजर्षि युधिष्ठिर किसी को अधर्म से जीतना नहीं चाहते। तुम्हारे सिर में जो मणि है, वह तुम इन्हें दे दो और उसे लेकर पाण्डव लोग तुम्हें प्राणदान दे दें। अश्वत्थामा बोला_पाण्डवों ने कौरवों का जितना धन और जो_जो रन प्राप्त किये हैं, मेरी यह मणि उन सबसे कीमती है। इसे बांध लेने पर शस्त्र_व्याधि या क्षुधा से अथवा देवता, दानव, नाग, राक्षस या चोरों से होनेवाला किसी भी प्रकार का भय नहीं रहअद्भुत प्रभाव है, इसलिये मुझे इसका त्याग तो किसी भी प्रकार नहीं करना चाहिये। तो भी आपने जो कुछ आदेश मुझे दिया है वह तो मुझे करना ही होगा। किन्तु मेरा छोड़ा हुआ यह दिव्य अस्त्र व्यर्थ तो नहीं हो सकता। इसे एक बार छोड़कर फिर लौटाने की मुझे सामर्थ्य नहीं है। इसलिये अब मैं इस अस्त्र को उत्तरा के गर्भ पर छोड़ता हूं। आपकी आज्ञा का मैं कभी उल्लंघन न करता; परन्तु क्या करूं, इसे लौटाना तो मेरे वश की बात नहीं है। व्यासजी बोले_अच्छा ऐसा ही करो; चित्त में और किसी प्रकार का विचार मत रखो, इस अस्त्र को पाण्डवों के गर्भ पर छोड़कर शान्त हो जाओ।वैशम्पायनजी कहते हैं _ तब अश्वत्थामा ने वह अस्त्र उत्तरा के गर्भ पर छोड़ दिया। यह देखकर भगवान् कृष्ण बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने अश्वत्थामा से कहा, 'कुछ दिन हुए विराट पुत्री उत्तरा से, जब वह उपलव्य नगर में थी, एक तपस्वी ब्राह्मण ने कहा था कि कौरवों का परिचय होने पर एक बालक होगा। उस ब्राह्मण का वह वचन सत्य होगा। वह परिक्षित ही इन पाण्डवों के वंश को चलानेवाला बालक होगा।'
श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर अश्वत्थामा ने क्रोध में भरकर कहा, 'केशव ! तुम पाण्डवों का पक्ष लेकर जो बात कह रहे हो, वह कभी नहीं हो सकती। मेरा वाक्य झूठा नहीं होगा। मेरा यह भयानक अस्त्र अवश्य ही उसके गर्भ पर गिरेगा।
श्रीभगवान् ने कहा_ इस दिव्य अस्त्र का वार तो अवश्य अमोघ ही होगा। किन्तु वह गर्भ मरा हुआ उत्पन्न होने पर भी फिर दीर्घ जीवन प्राप्त करेगा।हां, तुम्हें अवश्य सभी समझदार, पापी और कायर ही समझते हैं; क्योंकि तुम बार_बार पाप ही बटोरते हो और बालकों की हत्या करते हो।इसीलिए तुम्हें इस पाप का फल भोगना ही पड़ेगा। तुम तीन हजार वर्ष तक इस पृथ्वी में भटकते रहोगे और किसी भी जगह किसी पुरुष से तुम्हारी बातचीत नहीं हो सकेगी। तुम्हारे शरीर में से पीब और लहू की गन्ध निकलेगी। इसलिये तुम मनुष्यों के बीच में नहीं रह सकोगे। दुर्गम वनों में ही पड़े रहोगे। परिक्षित तो दीर्घायु प्राप्त करके वेदव्रत धारण करेगा और फिर आचार्य कृप से सब प्रकार के अस्त्र_शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करेगा। इस प्रकार उत्तम_उत्तम अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके वह क्षात्रधर्म का अनुसरण करते हुए साठ वर्षों तक पृथ्वी का राज्य करेगा। दुरात्मन् ! देखना, यह परीक्षित नाम का राजा तुम्हारी आंखों के सामने ही कुरुवंश की गद्दी पर बैठेगा।। वह तुम्हारे शस्त्र की ज्वाला से जल अवश्य जायगा, परन्तु मैं उसे पुनः जीवित कर दूंगा। नराधम ! उस समय तुम मेरे तप और सत्य का प्रभाव देख लेना।
व्यासजी कहने लगे_द्रोणपुत्र ! तुमने मेरी भी बात न मानकर ऐसा क्रूर कर्म किया है और ब्राह्मण होकर भी तुम्हारा आचरण ऐसा खोटा है इसलिये देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ने जो बात कही है, वह अवश्य ठीक होगी, क्योंकि इस समय तुमने स्वधर्म को छोड़कर क्षात्रधर्म स्वीकार कर रखा है।
अश्वत्थामा बोला_ब्रह्मन् ! भगवान् कृष्ण की बात ठीक हो। अब मैं मनुष्यों में केवल आपके ही साथ रहूंगा।
Sunday, 16 June 2024
श्रीकृष्ण का अश्वत्थामा के संबंध में एक पूर्व प्रसंग सुनाना
वैशम्पायनजी कहते हैं_जन्मेजय ! भीमसेन के चले जाने पर यदुश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्मराज से कह, 'राजन् ! आपके भाई भीमसेन पुत्र शोक के कारण अश्वत्थामा को संग्राम में मारने के लिये अकेले ही जा रहे थे। ये आपको अपने सब भाइयों से अधिक प्रिय हैं। फिर इस कठिनाई के समय आप उनकी सहायता का उद्योग क्यों नहीं करते ? आचार्य द्रोण ने अपने पुत्र को जिस ब्रह्मास्त्र की शिक्षा दी है, वह सारी पृथ्वी को भी भष्म कर सकता है। वहीं परमास्र उन्होंने प्रसन्न होकर अर्जुन को भी दिया है। अश्वत्थामा बड़ा असहनशील है। उसने तो अकेले अपने आप को ही इसे सिखाने की प्रार्थना की थी। आचार्य इसकी चपलता ताड़ गये थे और उन्होंने इसे आदेश दिया था कि 'भैया ! बहुत बड़ी आपत्ति में पड़ जाने पर भी तुम इसका प्रयोग मत करना। विशेषतः मनुष्यों पर तो तुम इसे छोड़ना ही मत; क्योंकि मैं देखता हूं तुम सत्पुरुषों के मार्ग पर स्थिर रहनेवाले नहीं हो।' पिता के ये वचन सुनकर दुरात्मा अश्वत्थामा सब प्रकार के सुख की आशा छोड़कर बड़े शोक से पृथ्वी पर विचरने लगा। एक बार जिस समय आप लोग वन में थे, वह द्वारका में आकर वृष्णिवंशियों के साथ रहा था और उन्होंने इसका बड़ा सत्कार किया था। एक दिन इसने एकान्त में मेरे पास अकेले ही आकर कहा, 'कृष्ण ! मेरे पिताजी ने बड़ी भीषण तपस्या करके अगस्त्य जी से जो ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया था, वह इस समय जैसा उनके पास है वैसा ही मेरे पास भी है। सो यदुश्रेष्ठ ! आप मुझसे वह दिव्य अस्त्र लेकर अपना चक्र मुझे दे दीजिये।'तब मैंने कहा, ' देखो ! ये मेरे धनुष, शक्ति, चक्कर और गंद पड़े हैं। तुम इनमें से जो_जो अस्त्र लेना चाहो, वहीं मैं तुम्हें देता हूं। तुम जिसे उठा सको और जिसका युद्ध में प्रयोग कर सको, वहीं अस्त्र ले लो और मुझे जो देना चाहते हो, वह भी मत दो।' तब इसने मेरे साथ स्पर्धा रखते हुए एक हजार अरोंवाला और वज्र के नाभिवाला मेरा लोहे का चक्र लेना चाहा। मैंने कहा_' ले लो।' इसने उछलकर बायें हाथ से ही उसे उठाने का प्रयत्न किया। किन्तु उस स्थान से उसे टस_से_मस भी नहीं कर सका। फिर उसने दायें हाथ से उठाने की चेष्टा करने लगा। किन्तु पूरा_पूरा प्रयत्न करने पर भी जब वह उसे उठाने और चलाने में समर्थ न हुआ तो अत्यंत उदास होकर हट गया।जब अपने उद्देश्य में असफल होकर यह निराश हो गया और इसे बहुत खेद हुआ तो मैंने पास बुलाकर कहा, 'जिसकी ध्वजा में वानर का चिन्ह सुशोभित है वह गाण्डीवधारी अर्जुन देवता और मनुष्य_सभी में सम्मानित है। उसने द्वन्द्वयुद्ध में देवाधिदेव नीलकंठ उमापति भगवान शंकर को भी संतुष्ट कर दिया था। उससे बढ़कर संसार में मुझे कोई भी पुरुष प्रिय नहीं है। किन्तु जैसा तुम कह रहे हो, वैसी बात तो कभी उसने भी मुंह से नहीं निकाली। मैंने बारह वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य_व्रत का पालन करते हुए हिमालय में भीषण तपस्या करके यह अस्त्र पाया था। साक्षात् सनत्कुमारजी ही प्रद्युम्नरूप से मेरी सहधर्मिणी रुक्मिणी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं।किन्तु जिस चक्र को तुम मांग रहे हो, उसे तो कभी उन्होंने भी नहीं मांगा। महाबली बलरामजी तथा गंद और साम्ब ने भी इसे लेने की इच्छा कभी प्रकट नहीं की। तुम भरतवंश के आचार्य द्रोण के पुत्र हो और सभी यादव तुम्हारा सम्मान करते हैं।क्षफिर इस चक्र को लेकर तुम किसके साथ युद्ध करना चाहते हो ? मैंने इस प्रकार कहा तो अश्वत्थामा कहने लग, 'कृष्ण ! मैं आपका पूजन करके फिर आपके ही साथ युद्ध करूंगा। भगवन् ! मैं सच कहता हूं, मैंने आपके इस देवता और दानवों से पूजित चक्र को इसलिये मांगा है जिससे मैं अजेय हो जाऊं। किन्तु अब मैं अपनी दुर्लभ कामना को पूर्ण किये बिना ही यहां से चला जाऊंगा, आप केवल इतना कह दीजिये कि 'तेरा कल्याण हो'। इस भयंकर चक्र को वीर शिरोमणि आपही ने धारण कर रखा है। इसके समान संसार में कोई दूसरा चक्र नहीं हैऔर इसे धारण करने की शक्ति भी आपके सिवा और किसी में नहीं है।' ऐसा कहकर अश्वत्थामा मुझसे रथ में जोतने योग्य घोड़े और तरह_तरह के रत्न लेकर चला गया। यह बड़ा क्रोधी, दुष्ट चंचल और क्रूर स्वभाववाला है तथा इसे ब्रह्मास्त्र का भी ज्ञान है। इसलिये इस समय भीमसेन की रक्षा करना बहुत आवश्यक है।
Wednesday, 29 May 2024
राजा युधिष्ठिर और द्रौपदी का मृत पुत्रों के लिये शोक तथा द्रौपदी की प्रेरणा से भीमसेन का अश्वत्थामा को मारने के लिये जाना
वैशम्पायनजी कहते हैं_वह रात बीतने पर धृष्टद्युम्न के सारथि ने राजा युधिष्ठिर को शिविर सोये हुए वीरों के संहार की सूचना दी। उसने कहा, 'महाराज ! महाराजा द्रुपद के पुत्रों सहित सब द्रौपदी पुत्र शिविर में निश्चिंत होकर बेखबर सोये हुए थे। वे सभी मार डाले गये। आज रात्रि में क्रूर कृतवर्मा, कृपाचार्य और पापी अश्वत्थामा ने आपके सारे शिविर को नष्ट कर डाला है। इन्होंने प्रास, शक्ति और फरसों से हजारों योद्धा तथा हाथी_घोड़े को काटकर आपकी सेना का संहार कर डाला है। कृतवर्मा कुछ व्यग्रचित्त था, इसलिये सारी सेना में से एक मैं ही किसी प्रकार बचकर निकल आया हूं।' सारथि की यह अमंगल वाणी सुनकर कुन्तिनन्दन युधिष्ठिर पुत्र शोक से व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। उस समय सात्यकि, भीमसेन, अर्जुन और नकुल_सहदेव ने उसे संभाला। चेत होने पर वे विलाप करते हुए कहने लगे, 'हाय ! हम तो शत्रुओं को जीत चुके थे, किन्तु आज उन्होंने हमें जीत लिया। हमने भाई, समवयस्क, पिता, पुत्र, मित्र, बंधु, मंत्री और पौत्रों की हत्या करके तो जय प्राप्त की; किन्तु इस प्रकार जीतकर भी आज हम जीत लिये गये। कभी_कभी अनर्थ अर्थ सा जान पड़ता है और अर्थ_सी दिखाई देनेवाली वस्तु अनर्थ के रूप में परिणत हो जाती है। इसी प्रकार हमारी यह विजय पराजय_सी हो गयी है और शत्रुओं की पराजय भी विजय_सी हो गयी। इस मनुष्य लोक में प्रमाद से बढ़कर मनुष्य की कोई और मृत्यु नहीं है। प्रमादी मनुष्य को अर्थ सब प्रकार त्याग देते हैं तथा उसे अनर्थ सब ओर से घेर लेते हैं। वह विद्या, तप, वैभव और यश किसी प्रकार प्राप्त नहीं कर सकता। जिस प्रकार कोई व्यापारियों का बेड़ा समुद्र को पार करके किसी छोटी_सी नदी में डूब जाय उसी प्रकार आज हमारे प्रमाद से ही ये इन्द्र के तुल्य राजाओं के पुत्र_पौत्र सहज ही में मारे गये हैं। शत्रुओं ने अधर्म वश जिसे सोते हुए ही मार डाला है वे तो नि:संदेह स्वर्ग सिधार गये हैं। परन्तु मुझे तो द्रौपदी की चिन्ता है; क्योंकि जिस समय वह अपने भाइयों, पुत्रों और बूढ़े पिता पांचालों द्रुपद की मृत्युओं का समाचार सुनेगी उस समय उनके शोकजनित दु:ख को कैसे सह सकेगी ? उसके हृदय में तो आग_सी लग जायगी।'इस प्रकार अत्यन्त दीनता से विलाप करते _करते वे नकुल से कहने लगे_'भैया ! तुम जाओ और मन्दभागिनि द्रौपदी को उसके मातृ पक्ष की स्त्रियों सहित यहां लिवा लाओ।' धर्मराज की आज्ञा पाकर नकुल रथ पर सवार हो उस डेरे की ओर गया जहां पांचालराज की महिलाएं और महारानी द्रौपदी थी। नकुल को भेजकर महाराज युधिष्ठिर शोकाकुल सुहृदों के सहित रोते_रोते उस स्थान पर गये जहां उनके पुत्र मरे पड़े थे। उस भीषण स्थान में पहुंचकर उन्होंने अपने खून में लथपथ सुहृदों और सखाओं को पृथ्वी पर पड़े देखा। उनके अंग_प्रत्यंग कटे हुए थे और बहुतों के सिर भी काट लिये गये थे। उन्हें देखकर महाराज युधिष्ठिर बहुत ही खिन्न हुए और फूट_फूटकर रोने लगे। अपने पुत्र, पौत्र और मित्रों को संग्राम में मरे देखकर वे अत्यंत दु:खातुर हो गये। उनके आंखों में आंसुओं की बाढ़ _सी आ गयी, शरीर कांपने लगा और बार_बार मूर्छा आने लगी। तब उनके सुहृदगण अत्यंत उदास होकर उन्हें धीरज बंधाने लगे। इसी समय शोकाकुल द्रौपदी को रथ में लेकर वहां नकुल पहुंचा। वह उपलव्य नामक स्थान में गयी हुई थी। जिस समय उसने अपने पुत्रों के मारे जाने का अशुभ समाचार सुना, वह तो बहुत ही दु:खी हुई। उसका मुख शोक से बिलकुल फीका पड़ गया और वह राजा युधिष्ठिर के पास पहुंचकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। द्रौपदी को गिरते देख महापराक्रमी भीमसेन ने लपककर अपनी दोनों भुजाओं में पकड़ लिया और उसे ढ़ाढ़स बंधाया। वह रो_रोकर राजा युधिष्ठिर से कहने लगी 'राजन् ! अपने वीर पुत्रों को क्षात्रधर्म के अनुसार मारा गया सुनकर आप तो उपलव्य नगर में मेरे साथ रहकर याद भी नहीं करेंगे। परन्तु पापी अश्वत्थामा ने उन्हें सोते हुए ही मार डाला_यह सुनकर मुझे तो उनका शोक आग की तरह जला रहा है। यदि आप आज ही साथियों के सहित उस पापी के जीवन का अंत नहीं कर देंगे और वह कुकर्म का फल नहीं पायेगा तो याद रखिये मैं यहीं आजीवन अनशन व्रत आरंभ कर दूंगी।' ऐसा कहकर यशस्विनी द्रौपदी महाराज युधिष्ठिर के समीप ही बैठ गयी। तब धर्मराज ने अपनी प्रिया को पास ही बैठे देखकर कहा, 'धर्मज्ञे ! तुम्हारे पुत्र और भाई धर्मपूर्वक युद्ध करके वीरगति को प्राप्त हुए हैं। तुम्हें उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये। अश्वत्थामा तो यहां से बहुत दूर दुर्गम वन में चला गया है। उसे मार भी डाला जाय तो तुम्हें यह बात कैसे मालूम होगी ?द्रौपदी ने कहा_'राजन् ! मैंने सुना है कि अश्वत्थामा के सिर में जन्म के साथ उत्पन्न हुई एक मणि है। सो संग्राम में उस पापी का वध करके उस मणि को ले आना चाहिए। मेरा यही विचार है कि उसे आपके सिर पर धारण कराकर ही मैं जीवन धारण करूंगी। धर्मराज से ऐसा कहकर फिर द्रौपदी ने भीमसेन के पास आकर कहा, 'भीमसेन ! आप क्षात्रधर्म देखकर मेरी रक्षा करें। इन्द्र ने जैसे शम्बरासुर को मारा था, उसी प्रकार आप उस पापी का वध करें। यहां आपके समान पराक्रमी और कोई पुरुष नहीं है। वारणावत में जब पाण्डवों पर बड़ा संकट आ पड़ा था, तब आप ही ने इन्हें सहारा दिया था। हिडिम्बासुर से पाला पड़ने पर आपसी इनके रक्षक हुए थे। विराटनगर में जब कीचक ने मुझे बहुत तंग किया था, तब भी आपही ने मुझे उस दु:ख से उद्धार किया था। आपने जिस प्रकार ये बड़े _बड़े काम किये हैं, उसी प्रकार इस द्रोणपुत्र को मारकर भी प्रसन्न होइये। द्रौपदी का यह तरह_यरह का विलाप और भीषण दु:ख देखकर भीमसेन सह न पाये। वे अश्वत्थामा को मारने का निश्चय कर एक सुन्दर धनुष लेकर रथ पर सवार हो गये तथा नकुल को अपना सारथि बनाया। उन्होंने बाण चढ़ाकर धनुष की टंकार की और शीघ्र ही घोड़े को हंकवा दिया। छावनी से निकलकर उन्होंने अश्वत्थामा के रथ का चिह्न देखते हुए बड़ी तेजी से उसका पीछा किया।
Friday, 10 May 2024
अश्वत्थामादि का दुर्योधन को सब समाचार सुना तथा दुर्योधन की मृत्यु
संजय ने कहा_राजन् ! वे तीनों वीर संपूर्ण पांचालवीरों और द्रौपदी के पुत्रों को मारकर जहां राजा दुर्योधन मरणासन्न अवस्था में पड़ा था, उस स्थान पर आये। उन्होंने जाकर देखा तो इस समय उसमें कुछ ही प्राण शेष था। वह जैसे_तैसे अपने प्राण बचाये हुए था। उसके मुंह से रक्त का वमन होता था तथा उसे चारों ओर से अनेकों भेड़िये और दूसरे हिंसक जीव घेरे हुए थे। वे सब उसे चट कर जाना चाहते थे और वह बड़ी कठिनता से उन्हें रोक रहा था। इस समय उसे बड़ी ही वेदना हो रही थी। दुर्योधन को इस प्रकार अनुचित रीति से पृथ्वी पर पड़े देखकर उन तीनों वीरों को असह्य कष्ट हुआ और वे फूट_फूटकर रोने लगे। उन्होंने अपने हाथों से दुर्योधन के मुंह का खून पोंछा और फिर दीन होकर विलाप करने लगे। कृपाचार्य ने कहा_हाय ! विधाता के लिये कोई भी काम कठिन नहीं है। आज ग्यारह अक्षौहिणी सेना के स्वामी राजा दुर्योधन इस प्रकार खून से लथपथ हुआ पृथ्वी पर पड़ा है। महलों में जिस प्रकार महारानी शयन करती थी, उसी प्रकार वह सोने के पत्थर से मढ़ी हुई गदा वीर दुर्योधन के साथ सोयी हुई है। काल की कुटिलता तो देखो_ जो शत्रुसूदन सम्राट किसी समय राजाओं के आगे_आगे चलता था, आज वही भूमि पर पड़ा धूल फांक रहा है। जिसके आगे सैकड़ों राजा लोग भय से सिर झुकाते थे, वही आज वीर शैय्या पर पड़ा हुआ है, पहलेजिसे अनेकों ब्राह्मण अर्थ प्राप्ति के लिये घेरे रहते थे, उसी को आज मांस के लोभ से मांसाहारी प्राणियों ने घेर रखा है। अश्वत्थामा बोला_राजश्रेष्ठ ! आपको समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ कहा जाता था। आप साक्षात् भगवान संकर्षण के शिष्य और युद्ध में कुबेर के समान थे, तो भी भीमसेन को किस प्रकार आपपर प्रहार करने का अवसर मिल गया ? आप सब धर्मों के जाननेवाले हैं। क्षुद्र और पापी भीमसेन ने किस प्रकार आपको धोखे से घायल कर दिया ? अवश्य ही काल की गति से पार पाना कठिन है। भीमसेन ने आपको धर्मयुद्ध के लिये बुलाया था, फिर अधर्म पूर्वक गदा से आपकी जांघें तोड़ डालीं। इस प्रकार अधर्म से मारकर जब भीमसेन ने आपको ठुकराया, तब भी कृष्ण और युधिष्ठिर ने उस क्षुद्र से कुछ नहीं कहा ! धिक्कार है उन्हें ! भीम ने आपको कपट से गिराया है। इसलिए जबतक प्राणियों की स्थिति रहेगी, तब तक योद्धालोग उसकी निंदा ही करेंगें। महर्षियों ने क्षत्रियों के लिये जो उत्तम गति बतायी है, युद्ध में मारे जाने के कारण आपने वह प्राप्त कर ली है।
राजन् ! आपके लिये मुझे चिंता नहीं है; मुझे तो आपके पिता और माता गांधारी के लिये खेद है, जिनके सभी पुत्र काल के गाल में चले गये हैं। हाय ! अब वे भिखारी बनकर दर_दर भटकेंगे और हर समय उन्हें पुत्रों का शोक सताता रहेगा। वृष्णिवंशी कृष्ण और दुष्टबुद्धि अर्जुन को धिक्कार है जिन्होंने मारते समय कोई रोक_टोक नहीं की। ये निर्लज्ज पाण्डव भी किस प्रकार कहेंगे कि हमने ऐसे ऐसे दुर्योधन को मारा था।
गान्धारीनन्दन ! आप धन्य है जो युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। महारथी कृपाचार्य, कृतवर्मा और मुझे धिक्कार है, जो आप_जैसे महाराज के साथ स्वर्ग नहीं सिधार रहे हैं। हम जो आपका अनुकरण नहीं कर रहे हैं_इससे यही जान पड़ता है कि एक दिन आपके सुकृत्यों का स्मरण करते_करते हम यों ही मर जायेंगे, स्वर्ग या अर्थ _इनमें से कोई भी हमारे हाथ नहीं लगेगा। न जाने हमारा ऐसा कौन सा कर्म है, जो हमें आपका साथ देने से रोक रहा है। तब तो नि: संदेह हमें बड़े दु:ख से इस पृथ्वी पर अपने दिन काटने पड़ेंगे।राजन् ! आपके न रहने पर हमें शान्ति और सुख कैसे मिल सकते हैं ? आप स्वर्ग सिधार रहे हैं। वहां सब महारथियों से आपकी भेंट होगी ही। उन सबकी ज्येष्ठता और श्रेष्ठता के अनुसार आप मेरी ओर से पूजा करें। पहले आप समस्त धनुर्धरों के ध्वजआरूप आचार्य जी का पूजन करें और उन्हें सूचना दें कि आज अश्वत्थामा ने धृष्टद्युम्न को मार डाला है। फिर महाराज बाह्लीक, महारथी जयद्रथ, सोमदत्त, भूरिश्रवा तथा और भी जो_जो वीर पहले स्वग पहुंच चुके हैं, उनका मेरी ओर से आलिंगन करें और कुशल पूछें। राजन् ! यदि आपमें कुछ प्राणशक्ति मौजूद हो तो मेरी एक बात सुनिये। इससे आपके कानों को बड़ा आनन्द मिलेगा। अब पाण्डवों के पक्ष में वे पांचों भाई, श्रीकृष्ण और सात्यकि_ये सात वीर बचे हैं और मैं, कृतवर्मा और आचार्य कृप_ये तीन बाकी हैं। द्रौपदी के सब पुत्र, धृष्टद्युम्न के बच्चे तथा समस्त पांचाल और युद्ध से बचें हुए मत्स्य वीरों का सफाया कर दिया गया है। पाण्डवों को जो बदला चुकाया गया है, उसपर ध्यान दीजिये। अब उनके वे बच्चे भी मार दिये गये हैं। आज उनके शिविर में जितने योद्धा और हाथी_घोड़े थे, उन सभी को मैंने तहस_नहस कर दिया है। आज पापी धृष्टद्युम्न को मैंने पशु की तरह पीट_पीटकर मार डाला है। दुर्योधन ने जब अश्वत्थामा की यह मन को प्यारी लगने वाली बात सुनी तो उसे कुछ चेत हो गया और वह कहने लगा, 'भाई ! आज आचार्य कृप और कृतवर्मा के सहित जो काम तुमने किया है वह तो भीष्म, कर्ण और तुम्हारे पिताजी भी नहीं कर सके। तुमने शिखण्डी के सहित सेनापति धृष्टद्युम्न को मार डाला, इससे आज निश्चय ही मैं अपने को इन्द्र के समान समझता हूं। तुम्हारा भला हो, अब स्वर्ग में ही हमारी_तुम्हारी भेंट होगी। ऐसा कहकर मनस्वी दुर्योधन चुप हो गया और अपने सुहृदों को दुख में छोड़कर उसने अपने प्राण त्याग दिये। उसने स्वयं पुण्यधाम स्वर्गलोक में प्रवेश किया और उसका शरीर पृथ्वी पर पड़ा रहा। राजन् ! इस प्रकार आपके पुत्र दुर्योधन की मृत्यु हुई। वह रणांगण में सबसे पहले गया था और सबसे पीछे शत्रुओं द्वारा मारा गया। मरने के पहले दुर्योधन ने तीनों वीरों को गले लगाया और उन्होंने भी उनका आलिंगन किया। अश्वत्थामा के मुख से यह करुणाजनक संवाद सुनकर मैं शोकाकुल होकर दिन निकलते ही नगर में चला गया। इस प्रकार आपकी ही खोटी सलाह से यह पांडवों और कौरवों का भीषण संहार हुआ है। आपके पुत्र का स्वर्गवास होने से मैं अत्यन्त शोकार्त हो गया हूं। अब व्यासजी की कृपा से प्राप्त मेरी दिव्यदृष्टि नष्ट हो गयी है। वैशम्पायनजी कहते हैं _राजन् ! महाराज धृतराष्ट्र इस प्रकार पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर एकदम चिंता में डूबा गये और लम्बे _लम्बे गर्म सांस लेने लगे।
Wednesday, 24 April 2024
अश्वत्थामा द्वारा पाण्डव और पांचाल वीरों का संहार
संजय कहते हैं_राजन् ! अब द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने शिविर में प्रवेश किया तथा कृपाचार्य और कृतवर्मा दरवाजे पर खड़े हो गये। उन्हें अपना साथ देने के लिए तैयार देखकर अश्वत्थामा को बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने उनसे धीरे-से कहा, 'आप दोनों यदि तैयार हो जायं तो सभी क्षत्रियों का संहार कर सकते हैं, फिर निद्रा में पड़े हुए इन बचे_खुचे योद्धाओं की तो बात ही क्या है ? मैं शिविर के भीतर जाऊंगा और काल के समान मार_काट मचा दूंगा। आप लोग ऐसा करें, जिससे कोई भी आपके हाथों से जीवित बचकर न जा सके।'ऐसा कहकर द्रोणपुत्र पाण्डवों के उस विशाल शिविर में द्वार से न जाकर बीच ही से घुस गया।उसे अपने लक्ष्य धृष्टद्युम्न के तंबू का पता था, इसलिये वह चुपचाप वहीं पहुंच गया। वहां उसने देखा कि सब योद्धा थक जाने के कारण अचेत होकर सोये पड़े हैं। उनके पास ही एक रेशमी शय्या पर उसे धृष्टद्युम्न सोता दिखाई दिया। तब अश्वत्थामा ने उसे पैर से ठुकराकर जगाया। पैर लगते ही रणोन्मत्त धृष्टद्युम्न जग पड़ा और महारथी अश्वत्थामा को आया देख ज्योंहि वह पलंग से उठने लगा कि उस वीर ने उसके बाल पकड़कर पृथ्वी पर पटक दिया।इस समय धृष्टद्युम्न भय और निद्रा से दबा हुआ था, साथ ही अश्वत्थामा ने उसे जोर की पटक भी लगायी थी; इसलिये वह निरुपाय हो गया। अश्वत्थामा ने उसकी छाती और गले पर दोनों घुटने टेक दिये। धृष्टद्युम्न बहुतेरा चिल्लाया और छटपटाया, किन्तु अश्वत्थामा उसे पशु की तरह पीटता रहा। अंत में उसने अश्वत्थामा को नखों से बकोटते हुए लड़खड़ाती जबान में कहा, 'आचार्यपुत्र ! व्यर्थ देरी मत करो, मुझे हथियार से मार डालो।' उसने इतना कहा ही था कि अश्वत्थामा ने उसे जोर से दबाया और उसकी अस्पष्ट वाणी सुनकर कहा, 'रे कुलकलंक ! अपने आचार्य की हत्या करनेवाले को पुण्य लोक नहीं मिल सकते। इसलिये तुझे शस्त्र से मारना उचित नहीं है।'ऐसा कहकर कुपित होकर उसने अपने पैरों की चोट से धृष्टद्युम्न के मर्मस्थानों पर प्रहार किया। इस समय धृष्टद्युम्न की चइल्लआहट से घर की स्त्रियां और रखवाले भी जग पड़े। उन्होंने एक अलौकिक पराक्रम वाले पुरुष को प्रहार करते देखकर उसे कोई भूत समझा। इसलिये भय के कारण उनमें से कोई भी बोल न सका।अश्वत्थामा ने धृष्टद्युम्न को इसी प्रकार पशु की तरह पीट_पीटकर मार डाला। इसके बाद वह उस तंबू से बाहर आया और रथ पर चढ़कर सारी छावनी में चक्कर लगाने लगा। पांचाल राज धृष्टद्युम्न को मरा देखकर उसकी रानियां और रखवाले शोकाकुल होकर विलाप करने लगे। उनके कोलाहल से आसपास के क्षत्रिय वीर चौंककर कहने लगे, 'क्या हुआ ?' क्या हुआ ?' तब स्त्रियों ने बड़ी दीन वाणी से कहा, 'अरे ! जल्दी दौड़ो ! जल्दी दौड़ो! हमारी तो समझ में नहीं आता यह कोई राक्षस है या मनुष्य है। देखो, इसने पांचाल राज को मार डाला और अब इधर_उधर घूम रहा है।' यह सुनकर उन योद्धाओं ने एक साथ अश्वत्थामा को घेर लिया। किन्तु पास आते ही अश्वत्थामा ने उन्हें रुद्रास्त्र से मार डाला।इसके बाद उसने बराबर के तंबू में उत्तमौजा को पलंग पर सोते देखा। उसके भी कंठ और छाती को उसने पैरों से दबा लिया। उत्तमौजा चिल्लाने लगा किन्तु अश्वत्थामा ने उसे पशु की तरह पीट_पीटकर मार डाला। युधामन्यु ने समझा कि उत्तमौजा को किसी राक्षस ने मारा है। इसलिये वह गदा लेकर दौड़ा और उससे अश्वत्थामा की छाती पर चोट की। अश्वत्थामा ने लपककर उसे पकड़ लिया और फिर पृथ्वी पर पटक दिया। युधामन्यु ने छूटने के लिये बहुतेरे हाथ_पैर पटके, किन्तु अश्वत्थामा ने उसे भी पशु की तरह मार डाला।
इसी प्रकार उसने नींद में पड़े हुए अन्य महारथियों पर भी आक्रमण किया। वे सब भय से कांपने लगे , किन्तु अश्वत्थामा ने उन सभी को तलवार से मौत के घाट उतार दिया। शिविर के विभिन्न भागों में उसने मध्यम श्रेणी के सैनिकों को भी निद्रा में बेहोश देखा और उन सबको भी एक क्षण में ही तलवार से तहस_नहस कर डाला। इसी तरह अनेकों योद्धा, घोड़े और हाथियों को उस तलवार की भेंट चढ़ा दिया। इससे उसका सारा शरीर खून में लथपथ हो गया और वह साक्षात् काल के समान दिखाई देने लगा। उस समय जिन योद्धाओं की नींद टूटती थी, वे ही अश्वत्थामा का शब्द सुनकर भौंचक्के_से रह जाते थे और उसे राक्षस समझकर आंख मूंद लेते थे। इस प्रकार भयंकर रूप धारण किये वह सारी छावनी में चक्कर लगा रहा था। जब द्रोपदी के पुत्रों ने धृष्टद्युम्न के मारे जाने का समाचार सुना तो वे निर्भय होकर अश्वत्थामा पर बाण बरसाने लगे। अश्वत्थामा अपनी दिव्य तलवार लेकर उनपर टूट पड़ा और उससे प्रतिविन्ध्य की कोख फाड़ डाली। इससे वह प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। सुतसोम ने पहले तो प्रस से चोट की। फिर वह भी तलवार लेकर द्रोणपुत्र की ओर चला। अश्वत्थामा ने तलवार के सहित उसकी वह भुजा काट डाली। और फिर उसकी पहली पर प्रहार किया। इससे हृदय फट जाने के कारण वह पृथ्वी पर गिर गया। इसी समय नकुल के पुत्र शतआनईक ने एक रथ का पहिया उठाकर बड़े जोर से अश्वत्थामा की छाती पर मारा। अश्वत्थामा ने भी तुरंत ही उसपर चोट की। उससे वह व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर अश्वत्थामा ने उसका सिर काट डाला। अब श्रुतशर्मा परिघ लेकर अश्वत्थामा की ओर चला और उसके बायें गाल पर चोट की। किन्तु अश्वत्थामा ने अपनी तीखी तलवार से उसके मुंह पर ऐसा वार किया कि जिससे उसका चेहरा बिगड़ गया और वह बेहोश होकर पृथ्वी पर जा पड़ा। उसका शब्द सुनकर महारथी श्रुतकीर्ति अश्वत्थामा के सामने आया और उसपर बाणों की वर्षा करने लगा। किन्तु अश्वत्थामा के सामने आया और उसपर बाणों की वर्षा करने लगा। किन्तु अश्वत्थामा ने उसकी बाणवर्षा को ढाल पर रोक लिया और उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया। इसके बाद उसने तरह_तरह के शस्त्रों से शिखण्डी और प्रभद्रक वीरों को मारना आरम्भ किया। उसने एक वाण से शिखण्डी की भृकुटियों के बीच में चोट की और फिर पास जाकर तलवार के एक ही हाथ से उसके दो टुकड़े कर दिये। इस प्रकार शिखण्डी को मारकर वह अत्यन्त क्रोध में भर गया और बड़े वेग से प्रभद्रकों पर टूट पड़ा। राजा विराट की जो कुछ सेना बची थी, उसे उसने एकदम कुचल डाला तथा राजा द्रुपद के पुत्र, पौत्र और सम्बन्धियों को खोज_खोजकर मौत के घाट उतार दिया। अश्वत्थामा का सिंहनाद सुनकर पाण्डवों की सेना में सैकड़ों_हजारों वीर जाग पड़े। उसने उनमें से किसी के पैर, किसी की जांघें और किसी की पसलियां काट डालीं। उन सभी को बहुत अधिक कुचल दिया गया था, इससे वे भयानक चित्कार कर रहे थे। इसी प्रकार घोड़े और हाथियों के बिगड़ जाने से भी अनेकों योद्धा पिस गये थे। उन सभी के लोगों से सारी रणभूमि पट गयी थी। घायल वीर 'यह क्या है ? कौन है ? किसका शब्द है? यह क्या कर डाला ?' इस प्रकार चिल्ला रहे थे। उनके लिये अश्वत्थामा प्राणान्तक काल के समान हो रहा था। पाण्डव और संजय वीरों में जो शस्त्र और कवचों से रहित थे और जिन्होंने कवच धारण कर लिये थे, उन सभी को अश्वत्थामा ने यमलोक भेज दिया। जो लोग नींद के कारण अंधे और अचेत_से हो रहे थे, वे उसके शब्द से चौंककर उछल पड़े, किन्तु फिर भयभीत होकर जहां_तहां छिप गये। डर के मारे उनकी घिग्घी बंध गयी और वे एक_दूसरे से लिपटकर बैठ गये। इसके बाद अश्वत्थामा फिर अपने रथ पर सवार हुआ और हाथ में धनुष लेकर दूसरे योद्धाओं को यमराज के हवाले कर दिया। फिर वह हाथ में ढाल तलवार लेकर उस सारी छावनी में चक्कर लगाने लगा। अश्वत्थामा का सिंहनाद सुनकर योद्धालोग चौंक पड़ते थे; किन्तु निद्रा और भय से व्याकुल होने के कारण अचेत_से होकर इधर_उधर भाग जाते थे। उनमें से कोई बुरी तरह चिल्लाने लगते थे और कोई अनेकों उटपटांग बातें करने लगते थे। उनके बाल बिखरे हुए थे। इसलिए आपस में एक_दूसरे को पहचान भी नहीं पाते थे। कोई इधर_उधर भागने में थककर गिर गये थे। किन्हीं को चक्कर आ रहा था। किन्हीं का मल_मूत्र निकल गया था। हाथी और घोड़े रस्से तुड़ाकर सब ओर गड़बड़ी करते दौड़ रहे थे। कोई डर के मारे पृथ्वी पर पड़कर छिप रहते थे; किन्तु हाथी_घोड़े उन्हें पैरों से खूंद डालते थे। इस प्रकार बड़ी ही गड़बड़ी मची हुई थी। लोगों के इधर_उधर दौड़ने से बड़ी धूल छा गयी, जिससे उस रात्रि के समय शिविर में दूना अंधकार हो गया। उस समय पिता पुत्रों को और भाई भाइयों को नहीं पहचान पाते थे। हाथी हाथियों पर और बिना सवार के घोड़े घोड़ों पर टूट पड़े तथा एक_दूसरे पर चोटें करते घायल होकर पृथ्वी पर लोटने लगे। बहुत_से लोग निद्रा में अचेत पड़े थे, वे अंधेरे में उठकर आपस में ही आघात करके एक_दूसरे को गिराने लगे। दैववश उनकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी। 'हा तात ! हा पुत्र !' इस प्रकार चिल्लाते हुए अपने बन्धु_बान्धवों को छोड़कर इधर_उधर भागने लगे। बहुत से तो हाय_हाय करके पृथ्वी पर गिर गये। अनेकों वीर यन्त्र और कवचों के बिना ही शिविर से बाहर जाना चाहते थे। उनके बाल खुले हुए थे और वे हाथ जोड़े भय से थर_थर कांप रहे थे; तो भी कृपाचार्य और कृतवर्मा ने शिविर से बाहर निकलने पर किसी को जीवित नहीं छोड़ा। इन दोनों ने अश्वत्थामा को प्रसन्न करने के लिये शिविर के तीन ओर आग लगा दी। इससे सारी छावनी में उजाला हो गया और उसकी सहायता से अश्वत्थामा हाथ में तलवार लेकर सब ओर घूमने लगा। इस समय उसने अपने सामने आनेवाले और पीठ दिखाकर भागनेवाले दोनों ही प्रकार के योद्धाओं को तलवार से मौत के घाट उतार दिया। किन्हीं किन्ही को उसने तिल के पौधे के समान बीच ही से दो करके गिरा दिया। इसी प्रकार उसने किन्हीं के शस्त्रसहित भुजदण्डों को, किन्हीं के सिरों को, किन्हीं की जंघाओं को, किन्हीं के पैरों को, किन्हीं के पीठ को और किन्हीं की पसलियों को तलवार से उड़ा दिया। इसी प्रकार उसने किसी का मुंह फेर दिया, किसी को कर्णहीन कर डाला, किन्हीं के कंधे पर चोट करके उनका सिर शरीर में घुसेड़ दिया। इस प्रकार वह अनेकों वीरों का संहार करता शिविर में घूमने लगा। उस समय अंधकार के कारण रात बड़ी भयावनी हो रही थी। हजारों मरे और अधमरे मनुष्यों से तथा अनेकों हाथी_घोड़े से पटी हुई पृथ्वी को देखकर हृदय कांप उठता था।
लोग हाहाकार करते हुए आपस में कह रहे थे, 'भाई ! आज पाण्डवों के पास न रहने से ही हमारी यह दुर्गति हुई है। अर्जुन को तो असुर, गन्धर्व, यक्ष और राक्षस _कोई भी नहीं जीत सकता; क्योंकि साक्षात् श्रीकृष्ण उनके रक्षक हैं।' दो घड़ी के बाद वह सारा कोलाहल शान्त हो गया। सारी भूमि खून से तह हो गयी थी। इसलिए एक क्षण में ही वह भयानक धूल दब गयी। अश्वत्थामा ने क्रोध में भरकर ऐसे हजारों वीरों को मार डाला, जो किसी प्रकार प्राण बचाने के प्रयत्न में लगे हुए थे, घबराये हुए थे और जिनमें तनिक भी उत्साह नहीं था। जो एक_दूसरे से लिपटकर पड़ गये थे, शिविर छोड़कर भाग रहे थे, छिपे हुए थे अथवा किसी प्रकार लड़ रहे थे उनमें से भी किसी को उसने जीवित नहीं छोड़ा। जो लोग आग में झुलसे जाते थे और आपस में ही मार_काट कर रहे थे, उन्हें भी उसने यमराज के हवाले कर दिया। राजन् ! इस प्रकार उस आधीरात के समय द्रोणपुत्र ने पाण्डवों की उस विशाल सेना को बात_की_बात में यमलोक पहुंचा दिया। पौ फटते ही अश्वत्थामा ने शिविर से बाहर आने का विचार किया। उस समय नर रक्त से सुनकर वह तलवार इस प्रकार उसके हाथ से चिपक गयी मानो वह उसी का एक अंग हो। इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वह कठोर कर्म करके अश्वत्थामा पिता के ऋण से मुक्त होकर निश्चिंत हो गया। वह छावनी से बाहर आया और कृपाचार्य और कृतवर्मा से मिलकर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अपनी सारी करतूत सुनाकर आनंदित हुआ। वे भी अश्वत्थामा का ही प्रिय करने में लगे हुए थे। अतः उन्होंने भी यह सुनकर कि हमने यहां रहकर हजारों पांचाल एवं संजय वीरों का संहार किया है, उसे प्रसन्न किया।
राजा धृतराष्ट्र पूछते हैं_संजय ! अश्वत्थामा तो मेरे पुत्र के विजय के लिये ही कमर कसे हुए था। फिर उसने ऐसा महान् कर्म पहले क्यों नहीं किया ?
संजय ने कहा_राजन् ! अश्वत्थामा को पाण्डव, श्रीकृष्ण और सात्यकि से खटका रहता था। इसी से वह अबतक ऐसा नहीं कर सका। इस समय इनके पास न रहने से ही उसने कर्म कर डाला। इसके बाद अश्वत्थामा ने आचार्य कृप और कृतवर्मा को गले लगाया और उन्होंने उसका अभिनन्दन किया। फिर उसने हर्ष में भरकर कहा, 'मैंने समस्त पांचालों को, द्रौपदी के पांचों पुत्रों को और संग्राम में बचे हुए सभी मत्स्य एवं सओमक वीरों को नष्ट कर डाला है। अब हमारा काम पूरा हो गया। इसलिये जहां राजा दुर्योधन है, वहीं चलना चाहिये। यदि वे जीवित हैं तो उन्हें भी यह समाचार सुना दिया जाय।'
Saturday, 30 March 2024
अश्वत्थामा का श्रीमहादेवजी पर प्रहार, उसका प्रभाव और फिर आत्मसमर्पण करके उनसे खड्ग प्राप्त करना
संजय कहते हैं _महाराज ! कृपाचार्य जी से ऐसा कहकर द्रोणपुत्र अकेला ही अपने घोड़ों को जोतकर शत्रुओं पर चढ़ाई करने की तैयारी करने लगा। तब उससे कृपाचार्य और कृतवर्मा ने पूछा, 'तुम रथ किसलिये तैयार कर रहे हो, तुम्हारा क्या करने का विचार है ? हम भी तो तुम्हारे साथ ही हैं और सुख_दु:ख में तुम्हारे साथ ही रहेंगे।'यह सुनकर अश्वत्थामा ने जो कुछ वह करना चाहता था उन्हें साफ_साफ सुना दिया। वह बोला, 'धृष्टधुम्न ने मेरे पिताजी को उस स्थिति में मारा था, जब उन्होंने अपने शस्त्र रख दिये थे। अतः आज उस पापी पांचाल पुत्र को मैं भी उसी तरह पाप कर्म करके कवचहीन अवस्था में मारूंगा। मेरा यही विचार है कि उसे शस्त्रों द्वारा प्राप्त होने वाले लोक नहीं मिलने चाहिये। आप दोनों भी जल्दी ही कवच धारण कर लें, खड्ग तथा धनुष लेकर तैयार हो जायं और मेरे साथ रहकर अवसर की प्रतीक्षा करें।' ऐसा कहकर अश्वत्थामा रथ पर सवार हुआ और शत्रुओं की ओर चल दिया। उसके पीछे-पीछे कृपाचार्य और कृतवर्मा भी चले। वह रात्रि में ही, जबकि सब लोग सोये हुए थे, पाण्डवों के शिविर में पहुंचा और उसके द्वार पर जाकर खड़ा हो गया। वहां उसने चन्द्रमा और सूर्य के समान तेजस्वी एक विशालकाय पुरुष को दरवाजे पर खड़ा देखा। उस महापुरुष को देखकर शरीर में रोमांच हो जाता था। वह व्याघ्रचर्म धारण किये था, ऊपर से मृगचर्म ओढ़े था तथा सर्पों का यज्ञोपवीत पहने हुए था। उसकी विशाल भुजाओं में तरह_तरह के शस्त्र सुशोभित थे, बाजूबंदों के स्थान में तरह_तरह के सर्प बंधे हुए थे तथा मुख से अग्नि की ज्वालाएं निकल रही थीं। उसके मुख, नाक, कान और हजारों नेत्रों से भी बड़ी_बड़ी लपटें निकल रही थीं। उसके तेज की किरणों से शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले सैकड़ों _हजारों विष्णु प्रकट हो जाते थे। समस्त लोकों को भयभीत करनेवाले उस अद्भुत पुरुष को देखकर भी अश्वत्थामा घबराया नहीं, बल्कि उसपर अनेकों दिव्य अस्त्रों की वर्षा_सी करने लगा। वह देव अश्वत्थामा के छोड़े हुए समस्त शस्त्रों को निगल गया। यह देखकर उसने एक अग्नि के समान देदीप्यमान रथशक्ति छोड़ी। परन्तु वह भी उससे टकराकर टूट गयी। तब अश्वत्थामा ने उसपर एक चमचमाती हुई तलवार चलायी। वह भी उसके शरीर में लीन हो गयी। इसपर उसने कुपित होकर एक गदा छोड़ी, किन्तु वह उसे भी लील गया। इस प्रकार जब अश्वत्थामा के सब शस्त्र समाप्त हो गये तो उसने इधर_उधर दृष्टि डाली। इस समय उसने देखा कि सारा आकाश वइष्णउओं से भरा हुआ है। शस्त्रहीन अश्वत्थामा यह अत्यंत अद्भुत दृश्य देखकर बड़ा ही दु:खी हुआ और आचार्य कृकप के वचन याद करके कहने लगा, जो पुरुष अप्रिय किन्तु हित की बात कहने वाले अपने सुहृदों की सीख नहीं सुनता, वह मेरी ही तरह आपत्ति में पड़कर शोक करता है । जो मूर्ख शास्त्र जाननेवालों की बात का तिरस्कार करके युद्ध में प्रवृत होता है, वह धर्म मार्ग से भ्रष्ट होकर कुमार्ग में जाने से उल्टे मुंह की खाता है। मनुष्य को गौ, ब्राह्मण, राजा, स्त्री, मित्र, माता, गुरु, दुर्बल, मूर्ख, कन्धे, सोये हुए, डरे हुए, नींद से उठे हुए, मतवाले, उन्मत्त और असावधान पुरुषों पर हथियार नहीं चलाना चाहिये। गुरुजनों ने पहले ही से सब पुरुषों को ऐसी शिक्षा दे रखी है। किन्तु मैं उस शास्त्रीय सनातन मार्ग का उल्लंघन करके उल्टे रास्ते से चलने लगा था। इसी से इस घोर आपत्ति में पड़ गया हूं। जब मनुष्य किसी काम को आरम्भ करके भय के कारण उसे बीच में ही छोड़ देता है तो बुद्धिमान लोग इसे उसकी मूर्खता ही कहते हैं। इस समय इस काम को करते हुए मेरे आगे भी ऐसा ही भय उपस्थित हो गया है। यों तो द्रोणपुत्र किसी प्रकार युद्ध से पीछे हटने वाला नहीं है। परन्तु यह महआभूत तो मेरे आगे विधाता के दण्ड के समान आकर खड़ा हो गया है। मैं बहुत सोचने पर भी इसे कुछ समझ नहीं पाता हूं। निश्चय ही मेरी बुद्धि जो अधर्म से कलुषित हो गयी है, उसका दमन करने के लिये ही यह भयंकर परिणाम सामने आया है। नि:संदेह इस समय मुझे जो युद्ध से हटना पड़ रहा है वह दैव का ही विधान है। सचमुच दैव की अनुकूलता के बिना आरम्भ किया हुआ मनुष्य का कोई भी काम सफल नहीं हो सकता। अतः: अब मैं भगवान शंकर की शरण लेता हूं, जो जटाजूटधारी, देवताओं के भी वंदनीय, उमापति, सर्वपापापहारी और त्रिशूल धारण करनेवाले हैं, वे ही इस भयानक दैवी विघ्न को नष्ट करेंगे।' ऐसा सोचकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा रथ से उतर पड़ा और देवाधिदेव श्रीमहादेवजी के शरणागत होकर इस प्रकार स्तुति करने लगा, 'आप उग्र हैं, अचल हैं, करुणामय है, रुद्र हैं, शर्व हैं, सकल विद्याओं के अधीश्वर हैं, परमेश्वर हैं, पर्वत पर शयन करनेवाले हैं, वरदायक हैं, देव हैं, संसार को उत्पन्न करनेवाले हैं, वरदायक हैं, देव हैं, संसार को उत्पन्न करनेवाले हैं, देव हैं, संसार को उत्पन्न करनेवाले हैं, जगदीश्वर हैं, नीलकंठ हैं, अजन्मा हैं, शुक्र हैं, दक्ष यज्ञ का विनाश करनेवाले हैं, सर्वसंहारक हैं, विश्वरूप हैं, भयानक नेत्रों वाले हैं, बहुरूप हैं, उमापति हैं, श्मशान में निवास करनेवाले हैं, गर्वीले हैं, महान् गणाध्यक्ष हैं, व्यापक हैं, खड्गवान् धारण करनेवाले हैं। आप रुद्र नाम से प्रसिद्ध हैं, आपके मस्तक पर जटा सुशोभित है, आप ब्रह्मचारी हैं और त्रिपुरासुर का वध करनेवाले हैं। मैं अत्यन्त शुद्ध हृदय से आत्मसमर्पण करके आपका यजन करता हूं। सभी ने आपकी स्तुति की है, सभी के आप स्तुत्य हैं और सभी आपकी स्तुति करते हैं। आप भक्तों के सभी संकल्पों को पूर्ण करनेवाले हैं, गजराज के चर्म से सुशोभित हैं, रक्तवर्ण हैं, नीलग्रीव हैं, असह्य हैं, शत्रुओं के लिये दुर्जय हैं, इन्द्र और ब्रह्मा की भी रचना करनेवाले हैं, साक्षात् परमब्रह्म हैं, व्रतधारी हैं, तपोनिष्ठ हैं, अनन्त है । तपस्वियों के आश्रय हैं, अनेक रूप हैं, गणपति हैं, त्रिनयन हैं, अपने पार्षदों के प्रिय हैं, धनेश्वर हैं, पृथ्वी के मुखस्वरूप हैं, पार्वती जी के प्राणेश्वर हैं, स्वामि कार्तिकेय के पिता है, पीत वर्ण हैं, वृषवाहना हैं, दिगम्बर हैं। आपका वेष बड़ा ही उग्र है; आप पार्वती जी को विभूषित करने में तत्पर हैं, ब्रह्मादि से श्रेष्ठ हैं, परात्पर हैं तथा आपसे श्रेष्ठ कोई नहीं हैं।आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले हैं, संपूर्ण दिशाओं की अन्तिम सीमा हैं, सब देशों के रक्षक हैं, सउवर्णमय कवच धारण करनेवाले हैं, आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप अपने मस्तक पर आभूषण के रूप में चन्द्रकला को धारण करनेवाले हैं, मैं अत्यन्त समाहित होकर आपकी शरण लेता हूं। यदि आज मैं इस दुस्तर आपत्ति के पार हो गया तो समस्त भूतों के संघआतरूप इस शरीर की बलि देकर आपका यजन करूंगा।' इस प्रकार अश्वत्थामा का दृढ़ निश्चय देखकर उसके सामने एक सुवर्णमय वेदी प्रकट हुई। उस वेदी में अग्नि प्रज्वलित हो गयी। उससे बहुत _से गुण प्रकट हुए। उनके मुख और नेत्र देदीप्यमान थे; वे अनेकों सिर पैर और हाथों वाले थे; उनकी भुजाओं में तरह_तरह के रत्न जटित आभूषण सुशोभित थे तथा वे ऊपर की ओर हाथ उठाये हुए थे। उनके शरीर द्वीप और पर्वतों के समान विशाल थे, वे सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रों के सहित संपूर्ण ध्यउलओक को धराशायी करने की शक्ति रखते थे तथा उनमें जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज_चारों प्रकार के प्राणियों का संहार करने की शक्ति थी। उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं था, वे इच्छानुसार आचरण करनेवाले थे तथा तीनों लोकों के ईश्वरों के भी ईश्वर थे। वे सर्वदा आनन्द मग्न रहते थे, वाणी के अधीश्वर थे मत्सरहीन थे तथा ऐश्वर्य पाकर भी उन्हें अभिमान नहीं था। उनके अद्भुत कर्मों से सर्वदा भगवान् शंकर भी चकित रहते थे तथा वे मन, वाणी और कर्मों द्वारा सर्वदा अपने पुत्रों के समान उनकी रक्षा करते थे। ये सब भूत बड़े ही भयंकर थे। इनको देखने से तीनों लोक भयभीत हो सकते थे। तथापि महाबली अश्वत्थामा इन्हें देखकर डरा नहीं। अब उसने स्वयं अपने आप को ही बलिरूप से समर्पित करना चाहा।
इस कर्म को सम्पन्न करने के लिये उसने धनुष को समिधा, बाणों को दर्भ और अपने शरीर को ही हवि बनाया। उसने सोमदेवता का मंत्र पढ़ कर अग्नि में अपनी आहुति देनी चाही। उस समय वह हाथ जोड़कर भगवान् रुद्र की इस प्रकार स्तुति करने लगा, 'विश्वात्मन् ! इस आपत्ति के समय आपके प्रति अत्यन्त भक्तिभाव से समाहित होकर यह भेंट समर्पण करता हूं। आप इसे स्वीकार कीजिये। समस्त भूत आपमें स्थित है, आप संपूर्ण भूतों में स्थित हैं तथा आपसी में मुख्य _मुख्य गुणों की एकता होती है। विभो ! आप समस्त भूतों के आश्रय हैं; यदि इन शत्रुओं का पराभव मेरे द्वारा नहीं हो सकता तो आप हविष्यरूप से अर्पण किये हुए इस शरीर को स्वीकार कीजिये।' द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ऐसा कह उस अग्नि से देदीप्यमान वेदी पर चढ़ गया और अपने प्राणों का मोह छोड़कर आगे के बीच में आसन लगाकर बैठ गया। उसे हवइरूप से ऊध्वर्बाहु होकर निष्चेष्ट बैठे देखकर भगवान् शंकर ने हंसकर कहा, 'श्रीकृष्ण ने सत्य, शौच, सरलता, त्याग, तपस्या, नियम, क्षमा, भक्ति, धैर्य, बुद्धि और वाणी के द्वारा मेरी यथोचित अराधना की है। इसलिये उनसे बढ़कर मुझे कोई भी प्रिय नहीं है। पांचालों की रक्षा करके भी मैंने उन्हीं का सम्मान किया है; किन्तु कारणवश अब ये निस्तेज हो गये हैं, अब इनका जीवन शेष नहीं है।' ऐसा कहकर भगवान् शंकर ने अश्वत्थामा को एक तेज तलवार दी और अपने_आप को उसी के शरीर में लीन कर दिया। इस प्रकार उनसे अवशिष्ट होकर अश्वत्थामा अत्यन्त तेजस्वी हो गया।
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