Friday, 15 November 2024

शोकमग्न राजा धृतराष्ट्र को महर्षि व्यास का समझाना

श्री वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! विदुर के ये वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र पुरशोक से व्याकुल हो मूर्छा खाकर पृथ्वी पर गिर पड़े। उन्हें इस प्रकार अचेत होकर गिरते देख श्रीव्यासजी, विदुर, संजय, सुहृदगण और जो विश्वासपात्र द्वारपाल थे, वे शीतल जल से छींटे देकर ताड़ के पंखों से हवा करने लगे और उनके शरीर पर हाथ फेरने लगे। इस प्रकार उनके बहुत देर तक उपचार करने पर राजा को चेत हुआ और वे पुत्रशोक से व्याकुल होकर विलाप करने लगे.। 'मनुष्यजन्म को धिक्कार है !' इसमें भी विवाह आदि करके परिवार बढ़ाना तो बड़े ही दु:ख की बात है। इसी के कारण बार_बार तरह_तरह के दु:ख पैदा होते हैं। पुत्र, धन, सुहृद् और संबंधियों का नाश होने पर विष और अग्नि के दाह के समान बड़ा ही दु:ख भोगना पड़ता है। उस दु:ख से शरीर में जलन होने लगती है और बुद्धि नष्ट हो जाती है। ऐसी आपत्ति में फंसने पर तो मनुष्य को जीवित रहने की अपेक्षा मौत ही अच्छी मालूम होती है। इसलिए आज मैं भी अपने प्राणों को त्याग दूंगा।'महात्मा व्यासजी से ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र अत्यंत शोकाकुल हो गये और अपने पुत्रों के ही चिन्तन में डूबकर मौन रह गये।तब भगवान् व्यास ने उनसे कहा, 'धृतराष्ट्र ! तुमने सब शास्त्र सुने हैं। तुम बुद्धिमान हो ! तथा धर्म और अर्थ के साधन में कुशल हो। मनुष्यों का जीवन सदा रहनेवाला नहीं है _यह तो तुम नि:संदेह जानते ही हो। यह मर्त्यलोक अनित्य है, परमपद नित्य है और जीवन का पर्यवसआन मरण में ही होता है, यह सब जानकर तुम शोक क्यों करते हो ? इनइस वैर का प्रादुर्भा श्रम एवं व तो तुम्हारे सामने ही हुआ था। तुम्हारे पुत्र को कारण बनाकर काल ने ही इसे अंकुरित किया था। राजन् ! यह कौरवों का विध्वंस तो होना ही था। फिर तुम इन शूरवीरों के लिये क्यों शोक करते हो ? उन सबने तो परमगति प्राप्त कर ली है। पुराने समय की बात है_एक बार मैं इन्द्र की सभा में गया था। वहां मैंने सब देवताओं को इकट्ठे हुए देखा। इस समय एक विशेष प्रयोजन से पृथ्वी उनके पास आयी और उनसे कहने लगी, 'देवगण ! आप लोगों ने मेरा जो काम करने के लिये ब्रह्माजी की सभा में प्रतिज्ञा की थी, उसे अब शीघ्रही पूरा कर दीजिये।'उसकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु ने कहा, 'राजा धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में जो सबसे बड़ा दुर्योधन है, वह तेरा काम करेगा। उसके निमित्ति से अनेकों राजा कुरुक्षेत्र में आकर अपने सुदृढ़ शस्त्रों के प्रहार से एक_दूसरे का संहार कर डालेंगे। इस प्रकार उस युद्ध में तेरा सारा भार उतर जायगा। अब तू शीघ्र ही जा और सब लोकों को धारण कर। 'राजन् ! तुम्हारा पुत्र जो दुर्योधन था, उसके रूप में कलि के अंश ने ही गान्धारी के गर्भ से जन्म लिया था।
इसी से वह ऐसा असहनशील, चंचल, क्रोधी और कूटनीति से काम लेनेवाला था। दैवयोग से उसके भाई भी ऐसे ही उत्पन्न हुए और मामा शकुनि तथा परममित्र कर्ण भी ऐसे ही मिल गये। ये सब पृथ्वी का भार उतारने के लिये ही एक साथ उत्पन्न हुए थे। जैसा राजा होता है, वैसी ही उसकी प्रजा भी होती है। यदि स्वामी धार्मिक हो तो अधर्मी सेवक भी धार्मिक बन जाते हैं। सेवकों की प्रवृति स्वामी के गुण_दोषों के अनुसार होती है_इसमें संदेह नहीं। राजन् ! दुष्ट राजा का संसर्ग होने से ही तुम्हारे और पुत्र भी मारे गये। इस बात को देवर्षि नारद जानते हैं।
आपके पुत्र अपने ही अपराध से मारे गये हैं। तुम उनके लिये शोक मत करो; क्योंकि इस संबंध में शोक करने का कोई कारण नहीं है। पाण्डवों ने तुम्हारा जरा भी अपराध नहीं किया है। वातव में तो तुम्हारे पुत्र ही दुष्ट थे, उन्हीं ने इस देश का नाश कराया है। पहले राजसूय यज्ञ के समय देवर्षि नारद ने राजा युधिष्ठिर की सभा में कहा था कि राजन् ! तुम्हें जो कुछ करना हो वह कर लो। एक समय ऐसा आया कि सारे कौरव_पाण्डव आपस में युद्ध करके नष्ट हो जायेंगे।'नारदजी की यह बात सुनकर उस समय पाण्डवों को बड़ा शोक हुआ था। इस प्रकार मैंने तुम्हें यह देवसभा का पुरातन गुप्त वृतांत सुनाया है। इसे सुनाने में मेरा यही उद्देश्य है कि किसी प्रकार तुम्हारा शोक दूर हो जाय तथा इस युद्ध को दैवी योजना समझकर तुम पाण्डु पुत्रों से स्नेह करने लगो। यही बात मैंने एकान्त में युधिष्ठिर से भी कहीं थी। इसी से उन्होंने कौरवों के साथ युद्ध रोकने का इतना प्रयत्न किया था।
परन्तु दैव बड़ा प्रबल है। इस जगत् के चराचर प्राणियों के साथ काल का जो सम्बन्ध है, उसे कोई नहीं टाल सकता। राजन् ! तुम तो बड़े धर्मात्मा और बुद्धिमान हो, तुम्हें प्राणियों के जन्म_मरण का रहस्य भी पता है। फिर मोह में क्यों फंसते हो ? राजा युधिष्ठिर को यदि मालूम हो गया कि तुम अत्यंत शोकातुर हो और बार_बार अचेत हो जाते हो तो वे प्राण त्याग देंगे। वीरवर युधिष्ठिर तो सर्वदा पशु_पक्षियों पर भी कृपा करते हैं, फिर तो वे तुम्हारे प्रति दयाभाव क्यों नहीं रखेंगे ? अतः मेरी आज्ञा मानकर और विधि का विधान टल नहीं सकता_ऐसा समझकर तथा पाण्डवों पर करुणा कश्रकए तुम अपने प्राण धारण करो। ऐसा वर्ताव करने से संसार में तुम्हारी कीर्ति होगी
धर्म और अर्थ की प्राप्ति होगी और दीर्घकालिक तपस्या का फल मिलेगा। तुम्हें जो प्रज्ज्वलित अग्नि के समान पुत्रशोक उत्पन्न हुआ है, उसे विचाररूपी जल से सर्वदा शान्त करते रहो।' वैशम्पायनजी कहते हैं_अतुलित तेजस्वी व्यासजी के ये वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र ने कुछ देर विचार किया, इसके बाद वे बोले, 'दिजवर ! मुझे महान् शोकजाल से सब ओर से जकड़ रखा है। मेरी बुद्धि ठिकानें नहीं है और बार_बार मूर्छा_सी आ जाती है। अब आपका यह उपदेश सुनकर मैं प्राण धारण करता हुआ यथासंभव शोक न करने का प्रयत्न करूंगा।' राजा धृतराष्ट्र के ये वचन सुनकर सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यास वहीं अन्तर्धान हो गये।

Thursday, 10 October 2024

विदुरजी का महाराज धृतराष्ट्र के प्रति संसार के स्वरूप, उसकी भयंकरतआ और उससे छूटने के उपाय का वर्णन

राजा धृतराष्ट्र ने कहा_परम बुद्धिमान विदुरजी ! तुम्हारे  शुभ संभाषण को सुन मेरा शोक नष्ट हो गया है। अभी मैं तुम्हारी सारगर्भित वाले और भी बातें सुनना चाहता हूं। विदुरजी बोले_महाराज ! विचार करने पर यह सारा जगत् अनित्य ही जान पड़ता है। यह केले के खंभे के समान सारहीन है, इसमें सार कुछ भी नहीं है। मनुष्य जैसे नये या पुराने वस्त्र को उतारकर दूसरा वस्त्र पहन लेता है, उसी प्रकार वह नये_नये शरीर भी धारण करता रहता है। जीव अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार जन्म लेते हैं और नष्ट भी हो जाते हैं। इस प्रकार जब लोक का स्वरूप स्वभाव से ही आगमापायी ( आने_जानेवाला )है तो आप किसके लिये शोक करते हैं। इस लोक में लोग बुद्धिमान, सत्वगुण से युक्त, सबका हित चानेवाले और प्राणियों के समागम को कर्मानुसार जाननेवाले हैं, वे ही परमगति प्राप्त करते हैं। राजा धृतराष्ट्र ने पूछा_विदुरजी ! संसार का स्वरूप बड़ा गहन है। अतः मैं यह सुनना चाहता हूं कि इसे किस प्रकार जाना जा सकता है। सो तुम इसी का वर्णन करो। विदुरजी बोले_ महाराज! जब गर्भाशय में वीर्य और रज का संयोग होता है, तभी से जीवों की क्रियाएं दिखने लगती हैं। आरंभ में जीव कलाल ( वीर्य और रज के संयोग) में रहता है; फिर कुछ दिन बाद पांचवां महीना बीतने पर वह चैतन्य रूप में प्रकट होकर पिण्ड में निवास करने लगता है।इसके बाद वह गर्भस्थ पिण्ड सर्वांगपूर्ण हो जाता है। इस समय उसे मांस और रुधिर से भरे हुए अत्यन्त अपवित्र गर्भाशय में रहना पड़ता है। फिर वायु के वेग से उसके पैर ऊपर की ओर हो जाते हैं और सिर नीचे की ओर। इस स्थिति में योनि द्वार के समीप आ जाने से उसे बड़े दु:ख सहने पड़ते हैं। फिर वह योनिमार्ग से पीड़ित होकर उससे बाहर आ जाता है और संसार में आकर अन्यान्य प्रकार के उपद्रवों का सामना करता है, अब वह जैसे_जैसे बढ़ने लगता है वैसे _वैसे इसे नयी_नयी व्याधियां भी घेरने लगती हैं। इसइस प्रकार अपने कर्मों से पीड़ित होकर यह जीवन व्यतीत करता रहता है। जिनमें आसक्ति होने से ही रस की प्रतीति होती है, वे विषय इसे घेरे रहते हैं तथा उनके कारण यह इन्द्रिय रूप पाशों से बंधा रहता है। एसी स्थिति में इसे तरह_तरह के व्यसन घेर लेते हैं। उससे बंध जाने पर तो इसे तृप्ति भी नहीं मिलती। उस समय भले_बुरे कर्म करने पर इसे उनका कुछ ज्ञान प्राप्त नहीं होता। केवल ध्याननिष्ठ पुरुष ही अपने चित्त को कुमार्ग में फंसने से बचा सकते हैं। साधारण जीवन तो यमलोक के द्वार पर पहुंचकर भी उसे पहचान नहीं पाता। इतने में ही काल उसे मृत्यु के मुख में डाल देता है और यमदूत शरीर से बाहर खींच लेते हैं। इसे बोलने की शक्ति नहीं रहती। इस समय इसका जो कुछ पाप या पुण्य किया होता है वह सामने आ जाता है; किन्तु देहबंधन में बंध जाने पर यह फिर अपने उद्धार का प्रयत्न नहीं करता है। हाय ! लोभ के पंजे में फंसकर संसार स्वयं ही ठगा जा रहा है। यह लोभ,क्रोध और भय में पागल होकर अपनी सुधि ही नहीं लेता। यदि यह कुलीन होता है तो अकुलीनों को हेय दृष्टि से देखता हुआ अपनी उस कुलीनता में ही मस्त रहता है और धनी होने पर भी धन के घमंड में भरकर निर्धनों की निंदा करता है। यह दूसरों को तो मूर्ख बताता है परन्तु अपनी ओर कभी नहीं देखता। इसी तरह दूसरों के दोषों की तो निंदा करता रहता है, किन्तु अपने को काबू में रखने का कभी विचारंदं भी नहीं करता। जब बुद्विमान और मूर्ख, धनी और निर्धन, कुलीन और अकुलीन तथा प्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित_सभी श्मशानभूमि में जाकर वस्त्रहीन अवस्था में पड़ते हैं पड़ते हैं, तब किसी भी व्यक्ति को उनमें कोई ऐसा अन्तर दिखाई नहीं देता, जिससे वे उनके कुल या रूप की विशेषता का पता लगा सके। जब मरने के पश्चात् सभी जीव समान भाव से पृथ्वी की गोद में सोते हैं तो ये मूर्ख एक_ दूसरे को धोखा क्यों देते हैं ? इस नाशवान् लोक में जो पुरुष इस वेदोक्त उपदेश को साक्षात् या किसी के द्वारा सुनकर जन्म से ही धर्म का आचरण करता है, वह अवश्य परमगति को प्राप्त होता है। राजा धृतराष्ट्र ने कहा_ विदुर ! धर्म के इस गूढ़ रहस्य का ज्ञान बुद्धि से ही हो सकता है। अतः तुम मेरे आगे विस्तारपूर्वक इस बुद्धि मार्ग को कहो।
विदुरजी कहने लगे_ राजन्! भगवान् स्वआयम्भू को नमस्कार करके मैं इस संसाररूप गहन वन के उस स्वरूप का वर्णन करता हूं जिसका निरूपण महर्षियों ने किया है। एक ब्राह्मण किसी विशाल वन में जा रहा था। वह एक दुर्गम स्थान में जा पहुंचा। उसे सिंह, व्याघ्र, हाथी और रीछ आदि भयंकर जन्तुओं से भरा देखकर उसका हृदय बहुत ही घबरा उठा; उसे रोमांच हो आया और मन में बड़ी उथल_पुथल होने लगी। उस वन में इधर_उधर दौड़कर उसने बहुत ढ़ूंढ़कर कि कहीं कोई सुरक्षित स्थान मिल जाय। परन्तु वह न तो वन से निकलकर दूर ही जा सका और न उन जंगली जीवों से त्राण ही पा सका। इतने में उसने देखा कि वह भीषण वन सब ओर से जाल से घिरा हुआ है। एक अत्यंत भयानक स्त्री ने उसे अपनी भुजाओं से घेर लिया है तथा पर्वत के समान ऊंचे पांच सिर वाले नाग भी उसे सब ओर से घेरे हुए हैं। उस जंगल के बीच में झाड़ _झंखाड़ों से भरा हुआ एक गहरा कुआं था। वह ब्राह्मण इधर_उधर भटकता उसी में गिर गया। किन्तु लताजाल में फंसकर वह ऊपर को पैर और नीचे को सिर किये बीच में ही लटक गया।इतने ही में कुएं के भीतर उसे एक बड़ा भारी सर्प दिखायी दिया और ऊपर की ओर किनारे पर एक विशालकाय हाथी दिखा। उसके शरीर का रंग काला था तथा उसके छह मुंह और बारह पैर थे। वह धीरे-धीरे उस कूएं की ओर ही आ रहा था। कुएं के किनारे पर जो वृक्ष था, उसकी शाखाओं पर तरह_तरह की मधुमक्खियों ने छत्ता बना रखा था। उससे मधु की की धाराएं गिर रही थीं। मधु तो स्वभाव से ही सब लोगों को प्रिय है । अतः वह कुएं में लटका हुआ पुरुष इन मधु की धाराओं को ही पीता रहता था। इस संकट के समय भी उन्हें पीते_पीते उसकी तृष्णा शान्त नहीं हुई और न उसे न अपने ऐसे जीवन के प्रति वैराग्य ही हुआ। जिस वृक्ष के सहारे वह लटका हुआ था, उसे रात_दिन काले और सफेद चूहे काट रहे थे। इस प्रकार इस स्थिति में उसे की प्रकार के भयों ने घेर रखा था। वन की सीमा के पास हिंसक पशुओं से और अत्यंत उग्र रूपा स्त्री से भय था, कूंए के नीचे नाग से और ऊपर हाथी से आशंका थी, पांचवां भय चूहों के काट देने पर वृक्ष से गिरने का भय था और छठा भय मधु के लोभ के कारण मधुमक्खियों से भी था।
इस प्रकार संसार सागर में पड़कर भी वह वहीं डटा हुआ था तथा जीवन की आशा बनी रहने से उसे उससे वैराग्य भी नहीं होता था। महाराज! मोक्ष तत्व के विद्वानों ने यह एक दृष्टांत कहा है। इसे समझकर धर्म का आचरण करने से मनुष्य परलोक में सुख पा सकता है। यह जो विशाल वन कहा गया है, वह यह विस्तृत संसार ही है। 
इसमें जो दुर्गम जंगल बताया है, वह इस संसार की ही गहनता है। इसमें जो बड़े _बड़े हिंसक जीव बताये गये हैं, वह तरह_तरह की व्याधियां हैं तथा इसकी सीमा पर जो बड़े डील_डौलवाली स्त्री है, वह वृद्धावस्था है, जो मनुष्य के रूप_रंग को बिगाड़ देती है। उस वन में जो कुआं है, वह मनुष्य देह है। उसमें नीचे की ओर जो नाग बैठा हुआ है, वह स्वयं काल ही है। वह समस्त देहधारियों को नष्ट कर देनेवाला और सर्वस्व को हड़प जानेवाला है। कुएं के भीतर जो लता है, जिसके तन्तउओं में यह मनुष्य लटका हुआ है, वह इसके जीवन की आशा है तथा ऊपर की ओर जो छ: मुंहवाला हाथी है वह संवत्सर है। छः ऋतुएं उसके मुख हैं तथा बारह महीने पैर हैं। उस वृक्ष को जो चूहे काट रहे हैं उन्हें रात_दिन कहा गया है। तथा मनुष्य की तरह_तरह की जो कामनाएं हैं, वे मधुमक्खियां हैं। मधुमक्खियों के छत्ते से जो मधु की धाराएं धाएं चू रही हैं, उन्हें भोगों से प्राप्त होने वाले रस समझो, जिनमें कि अधिकांश मनुष्य डूबे रहते हैं। बुद्धिमान लोग संसार के चक्र की गति को ऐसा ही समझते हैं। तभी वे वैराग्य रूपी तलवार से इसके पाशों को काटते हैं। धृतराष्ट्र ने कहा_विदुर ! तुम बड़े तत्वदर्शी हो। तुमने मुझे बड़ा सुन्दर आख्यान सुनाया है। तुम्हारे अमृतमय वचनों को सुनकर मुझे बड़ा हर्ष होता है। विदुरजी बोले_ महाराज! सुनिये; अब मैं विस्तारपूर्वक उस मार्ग का विवरण सुनाता हूं, जिसे सुनकर बुद्धिमान लोग संसार के दु:खों से छूट जाते हैं। राजन् ! जिस प्रकार किसी लम्बे रास्ते पर चलने वाला पुरुष थक जाने पर बीच_बीच में विश्राम कर लेता है, उसी प्रकार अज्ञानी लोगों को इस संसार यात्रा में चलते हुए बीच_बीच में गर्भ में रहकर विश्राम कर लेना होता है। इस संसार से मुक्त तो विवेकी पुरुष ही होते हैं। अतः शास्त्रों ने गर्भवास को मिर्गी का रूपक दिया है और गहन संसार को वन बताया है। यही मनुष्यों तथा चराचर प्राणियों का संसार चक्र है। विवेकी पुरुष को इसमें आसक्त नहीं होना चाहिये। मनुष्य की जो प्रत्यक्ष और परोक्ष शारीरिक तथा मानसिक व्याधियां हैं, उन्हीं को विद्वानों ने हिंसक जीव बताया है। मन्दमति पुरुष  इन व्याधियों से तरह_तरह के क्लेश और आपत्तियां उठाने पर भी संसार से विरक्त नहीं होते। यदि किसी प्रकार मनुष्य इन व्याधियों के पंजे से निकल भी जाय तो अन्त में इसे वृद्धावस्था घेर ही लेती है। इसी से वह तरह_तरह के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धों से घिरकर मज्छआ और मांस रूप कीचड़ से भरे हुए आश्रयहीन देहरूप गड्ढे में पड़ा रहता है। वर्ष, मांस, पक्ष औरदिन_रात की संधियां _ये क्रमशः इनके रूप और आयु का नाश किया करते हैं। ये सब काल के ही प्रतिनिधि हैं, इस बात को मूढ़ पुरुष नहीं जानते। किन्तु विद्वानों का कथन है कि प्राणियों के शरीर रथ के समान है, सत्व ( सत्वगुण प्रधान बुद्धि) सारथि है, इन्द्रियां घोड़े हैं और मन लगाम है। जो पुरुष स्वेच्छापूर्वक दौड़ते हुए उन घोड़ों के पीछे लगा रहता है, वह तो इस संसार चक्र में पहिये के समान घूमता रहता है। किन्तु जो बुद्धिपूर्वक उन्हें अपने काबू में कर लेता है, उसे इस संसार में नहीं आना पड़ता। अतः बुद्धिमान पुरुष को संसार की निवृत्ति का ही प्रयत्न करना चाहिये। इस ओर से लापरवाही नहीं करनी चाहिये। जो पुरुष इन्द्रियों को वश में रखता है, क्रोध और लोभ से छूटा हुआ है तथा संतुष्ट और सत्यवादी है, वह शान्ति प्राप्त करता है। मनुष्य को चाहिए कि अपने मन को काबू में करके ब्रह्मज्ञानरूप महौषधि प्राप्त करें और उसके द्वारा इस संसार दु:ख स्वरूप महारोग को नष्ट कर दें। इस दु:ख से संयमी चित्त के द्वारा जैसा छुटकारा मिल सकता है_वैसा पराक्रम, धन, मित्र या हितू, किसी की भी सहायता नहीं मिल सकता। इसलिये मनुष्य को दयाभाव में स्थित रहकर शील प्राप्त करना चाहिये। दम, त्याग और अप्रमाद_ये तीन परमात्मा के धाम ले जानेवाले घोड़े हैं। जो पुरुष शीलरूप लगाम पकड़कर इन घोड़ों से जीते हुए मनरूप रथ पर सवार रहता है, वह मृत्यु के भय से छूटकर ब्रह्मलोक में जाता है। जो व्यक्ति समस्त प्राणियों को अभयदान करता है, वह भगवान् विष्णु के निर्विकार परम पद को प्राप्त होता है। अभयदान से पुरुष को जो फल प्राप्त होता है, वह हजारों यज्ञ और नित्यप्रति उपवास करने से भी नहीं मिल सकता। यह बात निर्विवाद है कि प्राणियों को अपने आत्मा से प्रिय कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि मरण किसी को भी इष्ट नहीं है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को सभी जीवों पर दया करनी चाहिए। जो बुद्धिहीन पुरुष तरह_तरह के माया मोह में फंसे हुए हैं और जिन्हें बुद्धि के जाल ने बांध रखा है, वे भिन्न_भिन्न योनियों में भटकते रहते हैं। सूक्ष्मदृष्टि महापुरुष तो सनातन ब्रह्म को ही प्राप्त कर लेते हैं।

Friday, 23 August 2024

स्त्रीपर्व_ शोकाकुल धृतराष्ट्र को संजय और विदुर का समझाना

नारायणं नमस्यकृत्यं नरंचैव नरोत्तम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं तो जयमुदीययेत्।।_अर्थ_ अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण, उनके नित्य सखा नरस्वरूप नवरत्न अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता महर्षि वेदव्यास को नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियों पर विजयप्राप्तिपूर्वक अन्त:करण को शुद्ध करनेवाले महाभारत ग्रंथ का पाठ करना चाहिए।

राजा जनमेजय ने पूछा _मुनिवर ! दुर्योधन और उसकी सारी सेना का संहार हो जाने पर इस समाचार को सुनकर राजा धृतराष्ट्र ने क्या किया ? इसी प्रकार कुराज युधिष्ठिर और कृपाचार्य आदि तीनों महारथियों ने भी इसके बाद क्या किया ? वैशम्पायनजी बोले_राजन् ! अपने सौ पुत्रों का संहार हो जाने से महाराज धृतराष्ट्र बड़े दु:खी हुए; पुत्रशोक से उनका हृदय जलने लगा और वे चिंता में डूब गये।  उस समय संजय ने उनके पास जाकर कहा, 'महाराज ! आप चिंता क्यों करते हैं ? शोक को कोई बंटा तो सकता नहीं। राजन् ! इस युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सेना मारी गयी, यह पृथ्वी निर्जन होकर सूनी हो गयी है। अब आप क्रमश: अपने चाचा_ताऊ, बेटों_पोतों, संबंधियों _सुहृदों और गुरुजनों की प्रेतक्रिया कराइये।' संजय की यह दु:खमयी वाणी सुनकर राजा धृतराष्ट्र बेटे_पोतों के वध से व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। फिर सावधान होने पर वे बोले, 'मेरे पुत्र, मंत्री और सभी सुहृदजन मर चुके हैं। अब तो इस पृथ्वी पर भटक_भटककर मेरे लिये दु:ख ही उठाना बाकी रह गया है। ऐसी जिंदगी से pmला, मुझे क्या लाभ है  मेरा राज्य नष्ट हो गया, भाई_बन्धु सब युद्ध में काम आ गये और आंखें तो पहले ही से नहीं हैं। हाय ! मैंने अपने हितैषी परशुरामजी, नारदजी और भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन की बात नहीं सुनी। श्रीकृष्ण ने सारी सभा के बीच में मेरे भले के लिये ही कहा था कि 'राजन् ! व्यर्थ वैर मत बांधो, अपने बेटे को रोको।'किन्तु मैं ऐसा मूर्ख हूं कि मैंने उनकी बात हीं मानी।  इसी से आज बुरी तरह पछताना पड़ रहा है। संजय ! इस जन्म में किया हुआ कोई ऐसा पाप आज याद तो नहीं आता, जिसके कारण मुझे यह फल भोगना चाहिये था। अवश्य ही पूर्वजन्मों में मुझसे कोई बड़ा अपराध हुआ है। इसी से विधाता ने मुझे इन दु:खमय कर्मों में नियुक्त कर दिया। अब मेरी आयु ढल चुकी है, सब भाई_बन्धु समाप्त हो चुके हैं। भला, अब संसार में मुझसे बढ़कर दु:खी और कौन होगा? अतः पाण्डव लोग मुझे आज ही ब्रह्मलोक के खुले हुए मार्ग पर बढ़ते देखें।' इस प्रकार  राजा धृतराष्ट्र ने अत्यंत शोक प्रकट करते हुए अनेकों बातें कही। तब संजय ने राजा के शोक को शान्त करने के लिये ये शब्द कहे, राजन् ! आपका पुत।र दुर्योधन बड़ी ही खोटी बुद्धिवाला था। दु:शासन, शकुनि, कर्ण, चित्रसेन और शल्य, जिन्होंने सारे संसार को कण्टकाकीर्ण कर दिये थे_ये सब उसके सलाहकार थे। अरे ! उसने पितामह भीष्म, माता गांधारी, चाचा विदुर, गुरु द्रोण, आचार्य कृत, और महामति नारदजी की बात भी नहीं सुनी। यहां तक कि उसने दूसरे_दूसरे ऋषि और अतुलित तेजस्वी व्यासजी का भी कहा नहीं किया। उसे सदा युद्ध की ही लगन रही। इसकै कारण उसने कभी आदरपूर्वक धर्मानुष्ठान नहीं किया और न कभी क्षत्रियों के ही किसी धर्म का आदर किया। उसने तो व्यर्थ ही क्षत्रियों का संहार कराया। आपमें सब प्रकार की सामर्थ्य थी, तथापि इस विषय में आपने भी कुछ नहीं कहा। आपकी बात कोई टाल नहीं सकता था, तथापि आपने निष्पक्ष होकर दोनों ओर के बोझे को तराजू पर नहीं तौला। मनुष्य को यथाशक्ति पहले ही ऐसा काम करना चाहिए जिसमें अपने पिछले कर्म के लिये उसे पछताना न पड़े। आपने तो पुत्र स्नेह में फंसकर उसी का प्रिय करना चाहा, इसी से अब आपको पश्चाताप करना पड़ रहा है; अतः इसके लिये कोई शोक नहीं करना चाहिये। शोक करने से जन तो धन मिलता है, न फल प्राप्त होता है, न ऐश्वर्य मिलता है और न परमात्मा की ही प्राप्ति होती है। जो पुरुष स्वयं अग्नि पैदा करके उसे कपड़े में लपेटकर जलने गया है और फिर पछतावा करने बैठता है, वह बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता।
इस समय आपके पुत्रों और आपने ही पाण्डव रूप अग्नि को अपने वाक्य रूप वायु से सुलगाया था और उसमें लोभरूप घृत छोड़कर प्रज्वलित किया था। जब वह आग धधक उठी तो उसमें आपके पुत्र पतंगों की तरह गिरने लगे और उसकी बाणरूप ज्वालाओं में लेकर भष्म हो गये। अतः आपको उनके लिए शोक नहीं करना चाहिये। इस समय अश्रुपात के कारण आपका मुख अत्यन्त मलिन हो गया है। शास्त्र दृष्टि से ऐसा होना अच्छा नहीं है और समझदार लोग इसे अच्छा भी नहीं कहते। ये शोक के आंसू आग की चिनगारियों के समान मनुष्य को जलाया करते हैं। आप बुद्धि के द्वारा मन को सावधान करके रोष और शोक को छोड़ दीजिये।
वैशम्पायनजी कहते हैं _ इस प्रकार महात्मा संजय ने राजा धृतराष्ट्र को धैर्य बंधाया। इसके बाद विदुरजी अपने अमृत के समान मीठे वाक्यों से उन्हें शान्त्वना देते हुए कहने लगे, 'राजन् ! आप पृथ्वी पर क्यों पड़े हैं ; उठकर बैठ जाइये और विचारपूर्वक मन को सावधान कीजिये।  संसार में सब जीवों की अन्त में यही तो गति होती है। जितने संजय हैं, उनका पर
अवसान क्षय में ही होगा, सारी भौतिक उन्नतियों का अन्त पतन में ही होना है; सारे संयोग वियोग में ही समाप्त होने वाले हैं। इसी प्रकार जीवन का अन्त भी मरण में ही होना है।जब यमराज शूरवीर और डरपोक दोनों ही को अपनी ओर खींचते हैं तब वे क्षत्रिय युद्ध क्यों न करते । राजन् ! समय आने पर कोई बच नहीं सकता। जो युद्ध नहीं करता, वह भी मरता ही है और कभी-कभी युद्ध करनेवाला भी बच ही जाता है।मृत्यु आने पर तो कोई नहीं जी सकता। जितने प्राणी हैं आरम्भ में वे नहीं थे और अन्त में भी नहीं रहेंगे, केवल बीच में ही दिखाई देते हैं। इसलिये उनके वलिये शोक करने की आवश्यकता नहीं है। शोक करने से मनुष्य न तो मरनेवाले के साथ जा सकता है और न मर ही सकता है।। इस प्रकार जब लोक की यही स्वाभाविक स्थिति है तो आप किसलिए शोक करते हैं ? 'इसके सिवा राजन् !  युद्ध में मारे जानेवाले वीरों के लिये तो आपको शोक करना ही नहीं चाहिये। यदि शास्त्र ठीक है तो उन सभी ने परम गति पायी है। इस युद्ध में मरनेवाले सभी वीर स्वाध्यायशील और सदाचारी थे तथा वे सभी शत्रु के सामने डटे रहकर वीरगति को प्राप्त हुए हैं। इसलिए उनके लिए शोक का अवसर ही कहां है ? जन्म से पूर्व ये सभी लोग अदृश्य थे और सब फिर अदृश्य हो गये हैं। न तो वे आपके थे और न आप ही उनके हैं। फिर इसमें शोक करने का क्या कारण है ? युद्ध में जो_जो मनुष्य मारा जाता है, उसे स्वर्ग मिलता है और जो मारता है उसे कीर्ति मिलती है। इस प्रकार हमारी दृष्टि से तो दोनों ही प्रकार का बड़ा भारी लाभ है, युद्ध में निष्फलता तो है ही नहीं। मनुष्य दक्षिणायुक्त यज्ञ और तपस्या से भी उतनी सुगमता से स्वर्ग नहीं प्राप्त कर सकते जैसे कि युद्ध में मारे जाने पर शूरवीर लोग प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार क्षत्रिय के लिये तो इस लोक में धर्मयुग से बढ़कर और कोई साधन नहीं हैं। अतः आप अपने मन को शान्त करके शोक छोड़िये। इस प्रकार शोकाकुल होकर आपको अपने शरीर का त्याग नहीं कर देना चाहिये। संसार में बार_बार जन्म लेकर आप हजारों माता_पिता और स्त्री_पुत्रादि का संग कर चुके हैं। परंतु वास्तव में किसके वे हुए और किसके हम। शोक के हजारों स्थान हैं और भय के भी सैकड़ों स्थान हैं। किन्तु इनका सर्वदा मूर्ख पुरुषों पर ही प्रभाव पड़ता है बुद्धिमानों पर नहीं। 'कुरुश्रेष्ठ ! काल का तो न कोई प्रिय है न अप्रिय और न किसी के प्रति उसका उदासीन भाव ही है। वह तो सभी को मृत्यु की ओर खींचकर ले जाता है। काल ही प्राणियों को बूढ़ा करता है और काल ही उन्हें नष्ट कर देता है। जब सब जीव सो जाते हैं, उस समय भी काल जागता रहता है। नि:संदेह काल से पार पाना बड़ा ही कठिन है। यौवन, रूप, जीवन, धन का संग्रह, आरोग्य और प्रियजनों का सहवास _ये सभी अनित्य हैं। बुद्धिमान पुरुष को इसमें फंसना नहीं चाहिये। यह दु:ख तो सारे ही देश से संबंध रखता है। इसके लिये आप अकेले शोक
यद्यपि प्रियजनों का अभाव होने पर दु:ख दबाता ही है। तथापि शोक करने से वह दूर नहीं होता; क्योंकि चिंतन करने पर दु:ख कभी नहीं घटता, इससे तो वह और भी बढ़ जाता है। जो लोग थोड़ी बुद्धिवाले होते हैं, वे ही अनिष्ट की प्राप्ति और इष्ट का वियोग होने पर मानसिक दु:ख से जला करते हैं। है। तथापि शोक करने से वह दूर नहीं होता; क्योंकि चिंतन करने पर दु:ख कभी नहीं घटता, इससे तो वह और भी बढ़ जाता है। जो लोग थोड़ी बुद्धिवाले होते हैं, वे ही अनिष्ट की प्राप्ति और इष्ट का वियोग होने पर मानसिक दु:ख से जला करते हैं। शोक करने से मनुष्य कर्तव्यविमूढ़ हो जाता है तथा अर्थ, धर्म और कामरूप त्रिवर्ग से भी वंचित रहता है। भिन्न _भिन्न धार्मिक स्थितियों में पड़ने पर असंतोषी पुरुष तो घबरा जाते हैं किन्तु विचारवानों को सभी अवस्थाओं में संतोष रहता है। मनुष्य को चाहिए कि मानसिक दु:ख को विचार से और शारीरिक कष्ट को औषधियों से दूर करें। इसे ही विज्ञान का बल कहते हैं। उसे मूर्खों का_सा व्यवहार नहीं करना चाहिए। मनुष्य का पूर्वकृत कर्म उसके सोने पर सो जाता है, उठने पर उठ बैठता है और दौड़ने पर भी उसके साथ लगा रहता है। वह जिस_जिस अवस्था में जैसा_जैसा भी शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसी_उसी अवस्था में उसका फल भी पा लेता है। मनुष्य आप ही अपना बंधु है, आप ही अपना शत्रु है और आप ही अपने पाप_पुण्य का साक्षी है। वह शुभ कर्म से सुख पाता है और पाप से दु:ख भोगता है। इस प्रकार सर्वदा किये हुए कर्म का फल मिलता है, बिना किये का नहीं।

Saturday, 27 July 2024

पाण्डवों का द्रौपदी के पास आकर उसे मणि देना तथा श्रीकृष्ण और राजा युधिष्ठिर को अश्वत्थामा के अद्भुत पराक्रम का रहस्य बताना

वैशम्पायनजी कहते हैं_राजन् ! उसके बाद अश्वत्थामा पाण्डवों को मणि देकर उन सब के सामने ही उदास मन से वन में चला गया।   इधर पाण्डव भी श्रीकृष्ण, नारद और व्यासजी को आगे करके बड़ी तेजी से मनस्विनि के पास आये जो इस समय अन्न त्याग किये बैठी थी। वहां वे सब उसे चारों ओर से घेरकर बैठ गये।  फिर राजा युधिष्ठिर की आज्ञा से भीमसेन ने द्रौपदी को वह दिव्य मणि दी और उससे कहा, 'भद्रे ! लो यह मणि है, तुम्हारे पुत्रों का वध करनेवाले को हमने जीत लिया है। अब उठो और शोक त्यागकर क्षात्रधर्म का विचार करो। जिस समय श्रीकृष्ण संधि के लिये कौरवों के पास जा रहे थे, उस समय तुमने इनसे कहा था कि 'केशव ! आज पाण्डव लोग मेरे अपमान की बात भूलकर शत्रुओं के साथ मेल करना चाहते हैं, इससे मैं समझती हूं कि मेरे न तो पति हैं, न पुत्र हैं और न भाई ही है तथा न तुम ही मेरे हो।' सो आज अपने उन क्षत्रिय_धर्मोचित वाक्यों को याद करो। पापी दुर्योधन मारा गया, मैंने तड़पते हुए दु:शासन का रक्तपान भी कर लिया तथा द्रोणपुत्र को तो हमने जीत लिया; ब्राह्मण और गुरुपुत्र समझकर ही उसे जीता छोड़ दिया है। उसका सारा यश मिट्टी में मिल चुका है। हमने उसकी मणि छीन ली है और अस्त्र पृथ्वी पर डलवा लिये हैं।' यह सुनकर द्रौपदी ने कहा_'गुरुपुत्र तो मेरे लिये गुरु ही के समान है, मैं तो उससे केवल अपने अनिष्ट का बदला ही लेना चाहती थी। अब इस मणि को महाराज अपने मस्तक पर धारण करें। तब राजा युधिष्ठिर ने उस मणि को गुरुजी का प्रसाद समझकर द्रौपदी के कहने से उसी समय अपने मस्तक पर धारण कर लिया। उसके बाद पुत्रशोकातुरा द्रौपदी उठकर अपने स्थान पर चली गयी। राजन् ! अब महाराज युधिष्ठिर ने, रात के समय जो वीर मारे गये थे, उनके लिये शोकातुर होकर श्रीकृष्ण से कहा, 'कृष्ण ! अश्वत्थामा तो शस्त्रविद्या में विशेष कुशल भी नहीं था; फिर उसने मेरे सभी महारथी पुत्र और हजारों योद्धाओं के साथ अकेले ही लोहा लेने वाले शस्त्रविद्या विशारद द्रुपद पुत्रों को कैसे मार डाला ? उसने ऐसा कौन पुण्यकर्म किया था, जिसके प्रभाव से उसने अकेले ही हमारे सब सैनिकों को नष्ट कर दिया ? श्रीकृष्ण ने कहा_अश्त्थामा ने अवश्य ही ईश्वरों के ईश्वर देवाधिदेव अविनाशी भगवान् शिव की शरण ली थी, इसी से उसने अकेले ही अनेकों योद्धाओं को मार डाला। महादेवजी तो प्रसन्न होने पर अमरता भी दे सकते हैं और इतना पराक्रम भी देते हैं, जिससे इन्द्र को भी नष्ट किया जा सकता है। भरतश्रेष्ठ! महादेवजी के स्वरूप का मुझे अच्छी तरह ज्ञान है तथा उसके जो अनेकों प्राचीन कर्म हैं, उन्हें भी मैं जानता हूं। वे संपूर्ण भूतों के आदि मध्य और अन्त हैं। यह सारा जगत् उन्हीं के प्रभाव से चेष्टा कर रहा है। वे महान् वीर्यशाली महादेवजी ही अश्वत्थामा पर प्रसन्न हो गये थे। इसी से उसने आपके महारथी पुत्रों को और पांचालराज के अनेकों अनुयायियों को धराशायी कर दिया। अब आप उसके विषय में कोई विचार न करें। अश्वत्थामा ने यह काम महादेवजी के कृपा से ही किया है। आप तो अब आगे जो काम करना हो उसे कीजिये।

सौप्तिक पर्व समाप्त

Tuesday, 16 July 2024

अश्वत्थामा और अर्जुन का एक_दूसरे पर ब्रह्मास्त्र छोड़ना तथा नारद और व्यासजी का उन्हें शान्त करना देना


वैशम्पायनजी कहते हैं _राजन् ऐसा कहकर श्रीकृष्ण सब प्रकार के अस्त्र_शस्त्रों से सुसज्जित एक श्रेष्ठ रथ पर चढ़े। उस रथ का रंग उदय होते हुए सूर्य के समान लाल था। उसके दाहिने धुरे में शैब्य और बायें में सुग्रीव नाम का घोड़ा जुता हुआ था तथा उसे अगल_बगल से मेघपुष्प औरबलआहक नाम के घोड़े खींचते थे।उस रथ पर विश्वकर्मा का बनाया हुआ रत्न और धातुओं से विभूषित ध्वजा का डंडा उठी हुई माया भीके समान जान पड़ता था। उसकी ध्वजा पर पक्षीराज गरुड़ विराजमान थे।इस अद्भुत रथ पर भगवान् श्रीकृष्ण बैठ गये और उनके बैठने पर अर्जुन तथा राजा युधिष्ठिर उसपर सवार हो गये। उनके चढ़ जाने पर श्रीकृष्ण ने अपने तेज घोड़ों को चाबुक से हांका। घोड़े बड़ी तेजी से भीमसेन के पीछे चल दिये और तुरंत ही उनके पास पहुंच गये।इस समय भीमसेन क्रोधातुर होकर शत्रु का संहार करने के लिये तुले हुए थे; इसलिये इन महारथियों के रोकने पर भी वे रुके नहीं। वे इनके देखते_देखते अपने घोड़े दौड़ाते श्रीगंगाजी के तट पर पहुंच गये, जहां उन्होंने अश्वत्थामा को बैठा सुना था। किन्तु उस स्थान पर पहुंचकर उन्होंने गंगाजी के धार के पास ही परम यशस्वी व्यासजी को अनेकों ऋषियों के साथ बैठे देखा।उनके पास ही क्रूरकर्मा अश्वत्थामा भी मौजूद था। उसने अपने शरीर में घृत लगा रखा था और वह कुशा के वस्त्र पहने हुए था। कुन्तिनन्दन भीमसेन उसे देखते ही 'अरे ! खड़ा तो रह, इस प्रकार चिल्लाते हुए धनुष_बाण लेकर उसकी ओर दौड़े।द्रोणपुत्र अश्वत्थामा यह देखकर कि धनुर्धर भीम तथा उसके पीछे राजा युधिष्ठिर और अर्जुन भी मेरी ओर आ रहे हैं, बहुत डर गया और उसने निश्चय किया कि अब ब्रह्मास्त्र के प्रयोग का समय आ गया है।तुरंत ही अपने उस दिव्य अस्त्र का चिंतन किया और अपने बायें हाथ में एक सींक उखाड़ ली; फिर ऐसा संकल्प करके कि 'पृथ्वी पाण्डव हीन हो जाय' उसने क्रोध में भरकर संपूर्ण लोकों को मोह में डालने के लिये प्रचंड अस्त्र छोड़ दिया। इससे उस सींक में आग पैदा हो गयी और वह प्रलयकाल की अग्नि के समान मानो तीनों लोकों को भस्म करने लगी।श्रीकृष्ण अश्वत्थामा की चेष्टा देखकर ही उसके मन के भाव को ताड़ गये थे। उन्होंने अर्जुन से कहा, 'अर्जुन ! अर्जुन! आचार्य द्रोण का सिखाया हुआ दिव्य अस्त्र तो तुम्हारे हृदय में विद्यमान है, अब उसके प्रयोग का समय आ गया है। अपनी और अपने भाइयों की रक्षा के लिये तुम भी इस समय उसी का प्रयोग करो क्योंकि ब्रह्मास्त्र को ब्रह्मास्त्र के द्वारा ही रोका जा सकता है।'श्रीकृष्ण के इस प्रकार कहते ही अर्जुन धनुष_बाण लेकर तुरंत रथ से कूद पड़े । उन्होंने पहले 'आचार्यपुत्र का मंगल हो' और फिर 'मेरा और मेरे भाइयों का मंगल हो' ऐसा कहकर देवता और गुरुजनों को नमस्कार किया। उसके बाद ' इस ब्रह्मास्त्र से शत्रु का ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय' ऐसा संकल्प करके संपूर्ण लोक के मंगल की कामना से अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया।तब वह अर्जुन का छोड़ा हुआ अस्त्र रयआनल के समान अग्नि की बड़ी _बड़ी शालाओं से प्रज्वलित हो उठा।इसी प्रकार महातेजस्वी अश्वत्थामा का अस्त्र भी तेजोमंडल से घिरकर आग की भीषण लपटें उगलने लगा। उनके आपस में टकराने से बड़ी भारी गर्जना होने लगी और सभी प्राणियों को बड़ा भय मालूम होने लगा। आकाश में बड़ा शब्द होने लगा और सर्वत्र अग्नि की लपटें फैल गयी तथा पर्वत, वन और वृक्षों के सहित सारी पृथ्वी डगमगाने लगी।इस प्रकार उन दोनों अस्त्रों के तेज समस्त लोकों को संतप्त करने लगे। यह देख अर्जुन और अश्वत्थामा को शान्त करने के लिये वहां देवर्षि नारद और महर्षि व्यास ने एक साथ दर्शन दिया।  दोनों मुनिश्रेष्ठ देवता और मनुष्यों के पूजनीय और अत्यन्त यशस्वी हैं। ये संपूर्ण लोकों के हित की कामना से उन दोनों अस्त्रों को शान्त कराने के लिये उनके बीच में आकर खड़े हो गये और कहने लगे, 'पूर्वकाल में जो तरह _तरह शस्त्रों को जाननेवाले महारथी हो गये हैं, उन्होंने इन अस्त्रों का प्रयोग मनुष्यों पर कभी नहीं किया। फिर वीरों ! तुम दोनों ने यह महान् अनिष्टकारी साहस क्यों किया है ?'उन अग्नि के समान तेजस्वी महर्षियों को देखते ही अर्जुन बड़ी फुर्ती से अपना दिव्य अस्त्र लौटाने लगा।फिर उसने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवन् ! मैंने तो इसी उद्देश्य से यह अस्त्र छोड़ा था कि इसके द्वारा शत्रु का छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय। अब इस अस्त्र के लौटा लेने पर तो पापी अश्वत्थामा अवश्य ही अपने अस्त्र के प्रभाव से हम सबको भष्म कर देगा। इसलिये जैसा करने से हमारा और सब लोगों का हित हो, उसी के लिये आप हमें सलाह दें।'ऐसा कहकर अर्जुन ने उस ब्रह्मास्त्र को वापस लौटा लिया। उसे लौटा लेना तो देवताओं के लिये भी कठिन था। संग्राम में एक बार छोड़ देने पर उसे लौटाने में तो अर्जुन के सिवा स्वयं इन्द्र भी समर्थ नहीं था। वह अस्त्र ब्राह्मतेज से प्रकट हुआ था। असंयमी पुरुष उसे छोड़ तो सकता था किन्तु उसे लौटाने का सामर्थ्य ब्रह्मचारी के सिवा और किसी में नहीं था।यदि कोई ब्रह्मचर्य हीन पुरुष उसे एक बार छोड़कर फिर लौटाने का प्रयत्न करता तो वह अस्त्र कुटुम्बभर उस व्यक्ति का सिर ही काट लेता था। अर्जुन ब्रह्मचारी और व्रती था; उसने दुष्प्राप्य होने पर भी यह परमास्र प्राप्त कर लिया था। परंतु बड़ी भारी विपत्ति पड़ने के सिवा और किसी समय वह इसका प्रयोग नहीं करता था। अर्जुन सत्यवादी, शूरवीर, ब्रह्मचारी और गुरु की आज्ञा का पालन करनेवाला था। इसलिये उसने फिर भी उसे लौटा दिया। अश्वत्थामा ने भी जब उन ऋषियों को अपने अस्त्र के सामने खड़े देखा तो उसे लौटाने का बड़ा प्रयत्न किया, किन्तु वह वैसा कर न सका। तब वह मन में अत्यन्त व्याकुल होकर श्री व्यासजी से कहने लगा, 'मुने ! मैं भीमसेन के भय से बहुत बड़ी आपत्ति में पड़ गया था, तब अपने प्राणों को बचाने के लिये ही मैंने यह अस्त्र छोड़ा है। भीमसेन ने दुर्योधन का वध करने के उद्देश्य से संग्रामभूमि में नियम विरुद्ध आचरण करके अधर्म किया था। इसी से संयमी न होने पर भी मैंने यह अस्त्र छोड़ दिया है। अब इसे लौटाने में तो मैं समर्थ नहीं हूं।
मैंने अग्निमंत्र से अभिमंत्रित करके यह दउर्दम्य दिव्य अस्त्र पाण्डवों का नाश करने के लिये छोड़ा है। अतः आज यह सभी पाण्डवों का प्राण ले लेगा। इस प्रकार क्रोध में भरकर पाण्डवों के वध के लिये यह अस्त्र छोड़कर अवश्य ही मैंने बड़ा पाप किया है।' व्यासजी ने कहा_भैया ! ब्रह्मास्त्र का ज्ञान तो अर्जुन को भी प्राप्त है। किन्तु उसने क्रोध में भरकर या तुम्हें मारने के लिये उसे नहीं छोड़ा है। उसने तो अपने ब्रह्मास्त्र से तुम्हारे ब्रह्मास्त्र को शान्त करने के लिये ही उसका प्रयोग किया है और अब उसे लौटा दिया है।ब्रह्मास्त्र को पाकर भी तुम्हारे पिताजी का उपदेश मानकर महाबाहु अर्जुन क्षात्रधर्म से विचलित नहीं हुआ। यह ऐसा धीर, वीर, साधु और सब प्रकार के अस्त्र_शस्त्र को जाननेवाला है; फिर भी तुम्हें इसे भाइयों के सहित मार डालने की कुबुद्धि क्यों हुई है ? देखो, जिस देश में एक ब्रह्मास्त्र को दूसरे ब्रह्मास्त्र को दबा दिया जाता है, वहां बारह वर्ष तक वर्षा नहीं होती। इसी से प्रजा का हित करने के लिये अर्जुन ने तुम्हारे ब्रह्मास्त्र को नष्ट नहीं किया है। तुम्हें पाण्डवों की, अपनी और राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिये। इसलिये अब तुम इस दिव्य अस्त्र को लौटा लो। अब तुम्हारा क्रोध शान्त हो जाना चाहिये और पाण्डवों को भी स्वस्थ रहने चाहिये। राजर्षि युधिष्ठिर किसी को अधर्म से जीतना नहीं चाहते। तुम्हारे सिर में जो मणि है, वह तुम इन्हें दे दो और उसे लेकर पाण्डव लोग तुम्हें प्राणदान दे दें। अश्वत्थामा बोला_पाण्डवों ने कौरवों का जितना धन और जो_जो रन प्राप्त किये हैं, मेरी यह मणि उन सबसे कीमती है। इसे बांध लेने पर शस्त्र_व्याधि या क्षुधा से अथवा देवता, दानव, नाग, राक्षस या चोरों से होनेवाला किसी भी प्रकार का भय नहीं रहअद्भुत प्रभाव है, इसलिये मुझे इसका त्याग तो किसी भी प्रकार नहीं करना चाहिये। तो भी आपने जो कुछ आदेश मुझे दिया है वह तो मुझे करना ही होगा। किन्तु मेरा छोड़ा हुआ यह दिव्य अस्त्र व्यर्थ तो नहीं हो सकता। इसे एक बार छोड़कर फिर लौटाने की मुझे सामर्थ्य नहीं है। इसलिये अब मैं इस अस्त्र को उत्तरा के गर्भ पर छोड़ता हूं। आपकी आज्ञा का मैं कभी उल्लंघन न करता; परन्तु क्या करूं, इसे लौटाना तो मेरे वश की बात नहीं है। व्यासजी बोले_अच्छा ऐसा ही करो; चित्त में और किसी प्रकार का विचार मत रखो, इस अस्त्र को पाण्डवों के गर्भ पर छोड़कर शान्त हो जाओ।वैशम्पायनजी कहते हैं _ तब अश्वत्थामा ने वह अस्त्र उत्तरा के गर्भ पर छोड़ दिया। यह देखकर भगवान् कृष्ण बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने अश्वत्थामा से कहा, 'कुछ दिन हुए विराट पुत्री उत्तरा से, जब वह उपलव्य नगर में थी, एक तपस्वी ब्राह्मण ने कहा था कि कौरवों का परिचय होने पर एक बालक होगा। उस ब्राह्मण का वह वचन सत्य होगा। वह परिक्षित ही इन पाण्डवों के वंश को चलानेवाला बालक होगा।'
श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर अश्वत्थामा ने क्रोध में भरकर कहा, 'केशव ! तुम पाण्डवों का पक्ष लेकर जो बात कह रहे हो, वह कभी नहीं हो सकती। मेरा वाक्य झूठा नहीं होगा। मेरा यह भयानक अस्त्र अवश्य ही उसके गर्भ पर गिरेगा।      
 श्रीभगवान् ने कहा_ इस दिव्य अस्त्र का वार तो अवश्य अमोघ ही होगा। किन्तु वह गर्भ मरा हुआ उत्पन्न होने पर भी फिर दीर्घ जीवन प्राप्त करेगा।हां, तुम्हें अवश्य सभी समझदार, पापी और कायर ही समझते हैं; क्योंकि तुम बार_बार पाप ही बटोरते हो और बालकों की हत्या करते हो।इसीलिए तुम्हें इस पाप का फल भोगना ही पड़ेगा। तुम तीन हजार वर्ष तक इस पृथ्वी में भटकते रहोगे और किसी भी जगह किसी पुरुष से तुम्हारी बातचीत नहीं हो सकेगी। तुम्हारे शरीर में से पीब और लहू की गन्ध निकलेगी। इसलिये तुम मनुष्यों के बीच में नहीं रह सकोगे। दुर्गम वनों में ही पड़े रहोगे। परिक्षित तो दीर्घायु प्राप्त करके वेदव्रत धारण करेगा और फिर आचार्य कृप से सब प्रकार के अस्त्र_शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करेगा। इस प्रकार उत्तम_उत्तम अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके वह क्षात्रधर्म का अनुसरण करते हुए साठ वर्षों तक पृथ्वी का राज्य करेगा। दुरात्मन् ! देखना, यह परीक्षित नाम का राजा तुम्हारी आंखों के सामने ही कुरुवंश की गद्दी पर बैठेगा।। वह तुम्हारे शस्त्र की ज्वाला से जल अवश्य जायगा, परन्तु मैं उसे पुनः जीवित कर दूंगा। नराधम ! उस समय तुम मेरे तप और सत्य का प्रभाव देख लेना।
व्यासजी कहने लगे_द्रोणपुत्र ! तुमने मेरी भी बात न मानकर ऐसा क्रूर कर्म किया है और ब्राह्मण होकर भी तुम्हारा आचरण ऐसा खोटा है इसलिये देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ने जो बात कही है, वह अवश्य ठीक होगी, क्योंकि इस समय तुमने स्वधर्म को छोड़कर क्षात्रधर्म स्वीकार कर रखा है।
अश्वत्थामा बोला_ब्रह्मन् ! भगवान् कृष्ण की बात ठीक हो। अब मैं मनुष्यों में केवल आपके ही साथ रहूंगा।

Sunday, 16 June 2024

श्रीकृष्ण का अश्वत्थामा के संबंध में एक पूर्व प्रसंग सुनाना

वैशम्पायनजी कहते हैं_जन्मेजय ! भीमसेन के चले जाने पर यदुश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्मराज से कह, 'राजन् ! आपके भाई भीमसेन पुत्र शोक के कारण अश्वत्थामा को संग्राम में मारने के लिये अकेले ही जा रहे थे। ये आपको अपने सब भाइयों से अधिक प्रिय हैं। फिर इस कठिनाई के समय आप उनकी सहायता का उद्योग क्यों नहीं करते ? आचार्य द्रोण ने अपने पुत्र को जिस ब्रह्मास्त्र की शिक्षा दी है, वह सारी पृथ्वी को भी भष्म कर सकता है। वहीं परमास्र उन्होंने प्रसन्न होकर अर्जुन को भी दिया है। अश्वत्थामा बड़ा असहनशील है। उसने तो अकेले अपने आप को ही इसे सिखाने की प्रार्थना की थी। आचार्य इसकी चपलता ताड़ गये थे और उन्होंने इसे आदेश दिया था कि 'भैया ! बहुत बड़ी आपत्ति में पड़ जाने पर भी तुम इसका प्रयोग मत करना। विशेषतः मनुष्यों पर तो तुम इसे छोड़ना ही मत; क्योंकि मैं देखता हूं तुम सत्पुरुषों के मार्ग पर स्थिर रहनेवाले नहीं हो।' पिता के ये वचन सुनकर दुरात्मा अश्वत्थामा सब प्रकार के सुख की आशा छोड़कर बड़े शोक से पृथ्वी पर विचरने लगा। एक बार जिस समय आप लोग वन में थे, वह द्वारका में आकर वृष्णिवंशियों के साथ रहा था और उन्होंने इसका बड़ा सत्कार किया था। एक दिन इसने एकान्त में मेरे पास अकेले ही आकर कहा, 'कृष्ण ! मेरे पिताजी ने बड़ी भीषण तपस्या करके अगस्त्य जी से जो ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया था, वह इस समय जैसा उनके पास है वैसा ही मेरे पास भी है। सो यदुश्रेष्ठ ! आप मुझसे वह दिव्य अस्त्र लेकर अपना चक्र मुझे दे दीजिये।'तब मैंने कहा, ' देखो ! ये मेरे धनुष, शक्ति, चक्कर और गंद पड़े हैं। तुम इनमें से जो_जो अस्त्र लेना चाहो, वहीं मैं तुम्हें देता हूं। तुम जिसे उठा सको और जिसका युद्ध में प्रयोग कर सको, वहीं अस्त्र ले लो और मुझे जो देना चाहते हो, वह भी मत दो।' तब इसने मेरे साथ स्पर्धा रखते हुए एक हजार अरोंवाला और वज्र के नाभिवाला मेरा लोहे का चक्र लेना चाहा। मैंने कहा_' ले लो।' इसने उछलकर बायें हाथ से ही उसे उठाने का प्रयत्न किया। किन्तु उस स्थान से उसे टस_से_मस भी नहीं कर सका। फिर उसने दायें हाथ से उठाने की चेष्टा करने लगा। किन्तु पूरा_पूरा प्रयत्न करने पर भी जब वह उसे उठाने और चलाने में समर्थ न हुआ तो अत्यंत उदास होकर हट गया।जब अपने उद्देश्य में असफल होकर यह निराश हो गया और इसे बहुत खेद हुआ तो मैंने पास बुलाकर कहा, 'जिसकी ध्वजा में वानर का चिन्ह सुशोभित है वह गाण्डीवधारी अर्जुन देवता और मनुष्य_सभी में सम्मानित है। उसने द्वन्द्वयुद्ध में देवाधिदेव नीलकंठ उमापति भगवान शंकर को भी संतुष्ट कर दिया था। उससे बढ़कर संसार में मुझे कोई भी पुरुष प्रिय नहीं है। किन्तु जैसा तुम कह रहे हो, वैसी बात तो कभी उसने भी मुंह से नहीं निकाली। मैंने बारह वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य_व्रत का पालन करते हुए हिमालय में भीषण तपस्या करके यह अस्त्र पाया था। साक्षात् सनत्कुमारजी ही प्रद्युम्नरूप से मेरी सहधर्मिणी रुक्मिणी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं।किन्तु जिस चक्र को तुम मांग रहे हो, उसे तो कभी उन्होंने भी नहीं मांगा। महाबली बलरामजी तथा गंद और साम्ब ने भी इसे लेने की इच्छा कभी प्रकट नहीं की। तुम भरतवंश के आचार्य द्रोण के पुत्र हो और सभी यादव तुम्हारा सम्मान करते हैं।क्षफिर इस चक्र को लेकर तुम किसके साथ युद्ध करना चाहते हो ? मैंने इस प्रकार कहा तो अश्वत्थामा कहने लग, 'कृष्ण ! मैं आपका पूजन करके फिर आपके ही साथ युद्ध करूंगा। भगवन् ! मैं सच कहता हूं, मैंने आपके इस देवता और दानवों से पूजित चक्र को इसलिये मांगा है जिससे मैं अजेय हो जाऊं। किन्तु  अब मैं अपनी दुर्लभ कामना को पूर्ण किये बिना ही यहां से चला जाऊंगा, आप केवल इतना कह दीजिये कि 'तेरा कल्याण हो'।  इस भयंकर चक्र को वीर शिरोमणि आपही ने धारण कर रखा है। इसके समान संसार में कोई दूसरा चक्र नहीं हैऔर इसे धारण करने की शक्ति भी आपके सिवा और किसी में नहीं है।' ऐसा कहकर अश्वत्थामा मुझसे रथ में जोतने योग्य घोड़े और तरह_तरह के रत्न लेकर चला गया। यह बड़ा क्रोधी, दुष्ट चंचल और क्रूर स्वभाववाला है तथा इसे ब्रह्मास्त्र का भी ज्ञान है। इसलिये इस समय भीमसेन की रक्षा करना बहुत आवश्यक है।

Wednesday, 29 May 2024

राजा युधिष्ठिर और द्रौपदी का मृत पुत्रों के लिये शोक तथा द्रौपदी की प्रेरणा से भीमसेन का अश्वत्थामा को मारने के लिये जाना

वैशम्पायनजी कहते हैं_वह रात बीतने पर धृष्टद्युम्न के सारथि ने राजा युधिष्ठिर को शिविर सोये हुए वीरों के संहार की सूचना दी। उसने कहा, 'महाराज ! महाराजा द्रुपद के पुत्रों सहित सब द्रौपदी पुत्र शिविर में निश्चिंत होकर बेखबर सोये हुए थे। वे सभी मार डाले गये। आज रात्रि में क्रूर कृतवर्मा, कृपाचार्य और पापी अश्वत्थामा ने आपके सारे शिविर को नष्ट कर डाला है।  इन्होंने प्रास, शक्ति और‌ फरसों से हजारों योद्धा तथा हाथी_घोड़े को काटकर आपकी सेना का संहार कर डाला है। कृतवर्मा कुछ व्यग्रचित्त था, इसलिये सारी सेना में से एक मैं ही किसी प्रकार बचकर निकल आया हूं।' सारथि की यह अमंगल वाणी सुनकर कुन्तिनन्दन युधिष्ठिर पुत्र शोक से व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। उस समय सात्यकि, भीमसेन, अर्जुन और नकुल_सहदेव ने उसे संभाला। चेत होने पर वे विलाप करते हुए कहने लगे, 'हाय ! हम तो शत्रुओं को जीत चुके थे, किन्तु आज उन्होंने हमें जीत लिया। हमने भाई, समवयस्क, पिता, पुत्र, मित्र, बंधु, मंत्री और पौत्रों की हत्या करके तो जय प्राप्त की; किन्तु इस प्रकार जीतकर भी आज हम जीत लिये गये। कभी_कभी अनर्थ अर्थ सा जान पड़ता है और अर्थ_सी दिखाई देनेवाली वस्तु अनर्थ के रूप में परिणत हो जाती है। इसी प्रकार हमारी यह विजय पराजय_सी हो गयी है और शत्रुओं की पराजय भी विजय_सी हो गयी। इस मनुष्य लोक में प्रमाद से बढ़कर मनुष्य की कोई और मृत्यु नहीं है। प्रमादी मनुष्य को अर्थ सब प्रकार त्याग देते हैं तथा उसे अनर्थ सब ओर से घेर लेते हैं। वह विद्या, तप, वैभव और यश किसी प्रकार प्राप्त नहीं कर सकता। जिस प्रकार कोई व्यापारियों का बेड़ा समुद्र को पार करके किसी छोटी_सी नदी में डूब जाय उसी प्रकार आज हमारे प्रमाद से ही ये इन्द्र के तुल्य राजाओं के पुत्र_पौत्र सहज ही में मारे गये हैं। शत्रुओं ने अधर्म वश जिसे सोते हुए ही मार डाला है वे तो नि:संदेह स्वर्ग सिधार गये हैं। परन्तु मुझे तो द्रौपदी की चिन्ता है; क्योंकि जिस समय वह अपने भाइयों, पुत्रों और बूढ़े पिता पांचालों द्रुपद की मृत्युओं का समाचार सुनेगी उस समय उनके शोकजनित दु:ख को कैसे सह सकेगी ? उसके हृदय में तो आग_सी लग जायगी।'इस प्रकार अत्यन्त दीनता से विलाप करते _करते वे नकुल से कहने लगे_'भैया ! तुम जाओ और मन्दभागिनि द्रौपदी को उसके मातृ पक्ष की स्त्रियों सहित यहां लिवा लाओ।' धर्मराज की आज्ञा पाकर नकुल रथ पर सवार हो उस डेरे की ओर गया जहां पांचालराज की महिलाएं और महारानी द्रौपदी थी। नकुल को भेजकर महाराज युधिष्ठिर शोकाकुल सुहृदों के सहित रोते_रोते उस स्थान पर गये जहां उनके पुत्र मरे पड़े थे। उस भीषण स्थान में पहुंचकर उन्होंने अपने खून में लथपथ सुहृदों और सखाओं को पृथ्वी पर पड़े देखा। उनके अंग_प्रत्यंग कटे हुए थे और बहुतों के सिर भी काट लिये गये थे। उन्हें देखकर महाराज युधिष्ठिर बहुत ही खिन्न हुए और फूट_फूटकर रोने लगे। अपने पुत्र, पौत्र और मित्रों को संग्राम में मरे देखकर वे अत्यंत दु:खातुर हो गये। उनके आंखों में आंसुओं की बाढ़ _सी आ गयी, शरीर कांपने लगा और बार_बार मूर्छा आने लगी। तब उनके सुहृदगण अत्यंत उदास होकर उन्हें धीरज बंधाने लगे। इसी समय शोकाकुल द्रौपदी को रथ में लेकर वहां नकुल पहुंचा। वह उपलव्य नामक स्थान में गयी हुई थी। जिस समय उसने अपने पुत्रों के मारे जाने का अशुभ समाचार सुना, वह तो बहुत ही दु:खी हुई। उसका मुख शोक से बिलकुल फीका पड़ गया और वह राजा युधिष्ठिर के पास पहुंचकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। द्रौपदी को गिरते देख महापराक्रमी भीमसेन ने लपककर अपनी दोनों भुजाओं में पकड़ लिया और उसे ढ़ाढ़स बंधाया। वह रो_रोकर राजा युधिष्ठिर से कहने लगी 'राजन् ! अपने वीर पुत्रों को क्षात्रधर्म के अनुसार मारा गया सुनकर आप तो उपलव्य नगर में मेरे साथ रहकर याद भी नहीं करेंगे। परन्तु पापी अश्वत्थामा ने उन्हें सोते हुए ही मार डाला_यह सुनकर मुझे तो उनका शोक आग की तरह जला रहा है। यदि आप आज ही साथियों के सहित उस पापी के जीवन का अंत नहीं कर देंगे और वह कुकर्म का फल नहीं पायेगा तो याद रखिये मैं यहीं आजीवन अनशन व्रत आरंभ कर दूंगी।' ऐसा कहकर यशस्विनी द्रौपदी महाराज युधिष्ठिर के समीप ही बैठ गयी। तब धर्मराज ने अपनी प्रिया को पास ही बैठे देखकर कहा, 'धर्मज्ञे ! तुम्हारे पुत्र और भाई धर्मपूर्वक युद्ध करके वीरगति को प्राप्त हुए हैं। तुम्हें उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये। अश्वत्थामा तो यहां से बहुत दूर दुर्गम वन में चला गया है। उसे मार भी डाला जाय तो तुम्हें यह बात कैसे मालूम होगी ?द्रौपदी ने कहा_'राजन् ! मैंने सुना है कि अश्वत्थामा के सिर में जन्म के साथ उत्पन्न हुई एक मणि है। सो संग्राम में उस पापी का वध करके उस मणि को ले आना चाहिए। मेरा यही विचार है कि उसे आपके सिर पर धारण कराकर ही मैं जीवन धारण करूंगी। धर्मराज से ऐसा कहकर फिर द्रौपदी ने भीमसेन के पास आकर कहा, 'भीमसेन ! आप क्षात्रधर्म देखकर मेरी रक्षा करें। इन्द्र ने जैसे शम्बरासुर को मारा था, उसी प्रकार आप उस पापी का वध करें। यहां आपके समान पराक्रमी और कोई पुरुष नहीं है। वारणावत में जब पाण्डवों पर बड़ा संकट आ पड़ा था, तब आप ही ने इन्हें सहारा दिया था। हिडिम्बासुर से पाला पड़ने पर आपसी इनके रक्षक हुए थे। विराटनगर में जब कीचक ने मुझे बहुत तंग किया था, तब भी आपही ने मुझे उस दु:ख से उद्धार किया था। आपने जिस प्रकार ये बड़े _बड़े काम किये हैं, उसी प्रकार इस द्रोणपुत्र को मारकर भी प्रसन्न होइये। द्रौपदी का यह तरह_यरह का विलाप और भीषण दु:ख देखकर भीमसेन सह न पाये। वे अश्वत्थामा को मारने का निश्चय कर एक सुन्दर धनुष लेकर रथ पर सवार हो गये तथा नकुल को अपना सारथि बनाया। उन्होंने बाण चढ़ाकर धनुष की टंकार की और शीघ्र ही घोड़े को हंकवा दिया। छावनी से निकलकर उन्होंने अश्वत्थामा के रथ का चिह्न देखते हुए बड़ी तेजी से उसका पीछा किया।